‘चिठ्ठी-चिठ्ठी खेलते’ यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया ‘अस्तित्वहीन’ हो गया, वह कहने से ‘कतराते’ रहे, वे सुनने के लिए ‘तरसते’ रहे (भाग-3)

सत्ता के गलियारे में इस बात की चर्चा भी थी कि अगर यूएनआई सरकार से देश की बेहतर पत्रकारिता के नाम पर आर्थिक मदद (बैंक ऋण सहित) मांगता है, तो शायद न तो प्रधानमंत्री कार्यालय और ना ही शहरी विकास मंत्रालय पीछे होता।

रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली : बड़े बुजुर्ग कहते हैं हकलाकर ही सही, तुतलाकर ही सही बोलो ज़रूर। लेकिन देश का प्रसिद्ध न्यूज़ एजेंसी यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया, जिसने भारतीय पत्रकारिता को मूर्धन्य हस्ताक्षरों से अलंकृत किया, न वह और उसके लोग मुख से अपनी बात, परेशानी उनसे बोल सके जो कुछ भी करने की ताकत रखते थे, और वे इंतज़ार करते कार्यालय से बाहर होते गए। बस,  चिट्ठी-चिट्ठी खेलते यूएनआई एक दिन 9-रफ़ी मार्ग से बेदखल हो गया।  

जिस कालखंड में यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया को सरकार के तरफ़ से देश के संसद और प्रधानमंत्री कार्यालय से सौ कदम दूर भूखंड का आवंटन हुआ, उस भूखंड से यूएनआई को न्यायालय के आदेश पर बाहर निकालने के बीच श्रीमती  इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिंहराव, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसे पत्रकार और पत्रकारिता को समझने वाले प्रधानमंत्री आए। लेकिन इन छह दशकों में यूएनआई सरकार, शासन, व्यवस्था, विभागों के साथ चिठ्ठी-चिट्ठी खेलता रहा और एक दिन सरकार द्वारा आवंटित भूखंड से बेदखल होकर बाहर कर दिया गया। लोग बाग कहते हैं यह पत्रकारिता पर कुठाराघात है, जबकि सत्ता के गलियारे में बैठे उन दिनों के लोगों का कहना है “वे खुलकर कहने से कतराते रहे, हम खुलकर सुनने को तरसते रहे। न वे 9-रफ़ी मार्ग से विजय चौक के रास्ते रायसीना पहाड़ी पर आए और न हमें कभी मसले को सुलझाने के लिए बुलाए। जो गए वे राजनीति की रोटियां सेक कर निकल गए।”

समयांतराल देश के राजनीतिक गलियारे में भ्रष्टाचार का आलम इतना अधिक हो गया कि उस यूएनआई को जी-टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा द्वारा ख़रीदने की खबर एजेंसी के तत्कालीन अधिकारी, पदाधिकारी, रक्षक, संरक्षक सबों को राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव और उनके सहयोगी तथा राज्यसभा के सदस्य प्रेमचंद गुप्ता से मिली थी। कहते हैं लालू यादव ने हँसकर कहा था: “मेरा मित्र यूएनआई को खरीद लिया है,” यही सात शब्द थे जो उस दिन आग की तरह देश की राजधानी दिल्ली से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘बिजली की तरह’ फैली थी। 

दुर्भाग्य यह है कि अपने स्थापना काल से लेकर आज तक, जिन-जिन लोगों के बारे में लिखकर यूएनआई के शब्द उन्हें ‘आम आदमी’ से ‘खास आदमी’ तक बनाया, ‘शोहरत’ दिलाया, सबों ने एजेंसी के अस्तित्व के साथ ‘तथाकथित तौर पर राजनीति ही किये’, किसी ने भी आगे बढ़कर समस्याओं के समाधान का मार्ग नहीं ढूंढा, ढूंढने में मदद नहीं किया। इधर, यूएनआई के कार्यालय में तो राजनीति चरम की ओर अग्रसर थी ही। 

आज स्थिति यह है कि यूएनआई, जिसकी तूती कभी 9-रफ़ी मार्ग से बोली जाती थी, जहाँ से कहानियों के माध्यम से शब्दों का अलंकरण होता था, आज एजेंसी के सभी पत्रकार और गैर-पत्रकार अपने-अपने कार्य तो कर रहे हैं, लेकिन अपने-अपने घरों से, मीडिया सेंटर से, सड़क के किनारे चाय की दुकानों पर बैठकर अपने लैपटॉप से कहानियां भेज रहे हैं। दफ्तर में जहाँ लोगबाग एक-दूसरे से मिलकर अपना-अपना सुख-दुःख बांटते थे, आज व्हाटएप पर संवाद का आदान-प्रदान कर रहे हैं। जो भी सब्सक्राइबर्स बचे हैं, उन तक अपनी सेवा उपलब्ध कराने के लिए निजी क्षेत्र की कंपनी को रखकर वेबसाइट चला रहे हैं। यूएनआई का क्रियाकलाप पुनः कोरोना काल में प्रवेश कर चुका है। 

यूएनआई कर्मचारी यूनियन के पूर्व अध्यक्ष और कन्फेडरेशन ऑफ़ न्यूजपेपर्स एंड न्यूज एजेंसीज एम्पलॉयज ऑर्गेनाइजेशन के कोषाध्यक्ष एम एल जोशी, जो यूएनआई को विगत चार दशकों से देखते आ रहे हैं, कहते हैं: “यूएनआई को इस स्थिति तक लाने में कौन दोषी है, कौन नहीं, इस बात पर चर्चा सार्वजनिक होनी चाहिए। साथ ही, इस ऐतिहासिक एजेंसी के अस्तित्व को पुनः स्थापित करने की कोशिश भी होनी चाहिए। हमें दुख है की देश का कोई भी नेता इसे बचाने के लिए आगे नहीं आए। लेकिन जब यह पूछा कि यूएनआई इन वर्षों में निजी तौर पर कितने प्रधान मंत्रियों से मिलकर, बात कर इस मसले को सुलझाने का पहल किया ? वे कहते हैं “चिट्ठी लिखी गई थी।” 

कौन हैं 29+ फीसदी शेयर के मालिक अवीक सरकार 

बहरहाल, शेष बातें तो इतिहासकार बताएँगे, लेकिन एक बात तो तय है कि कलकत्ता में प्रफुल्ल कुमार सरकार (जिनके नाम से प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट भी है) और सुरेश चंद्र मजूमदार द्वारा तत्कालीन ब्रितानिया सरकार के शासन के विरुद्ध आनंद बाजार पत्रिका अख़बार का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ था। दोनों ने मिलकर बंगाल के लोगों, खासकर क्रांन्तिकारियों, श्रमिकों की आवाज बुलंद करने के लिए 13 मार्च, 1922 को इस अख़बार को स्थापित किये थे। उन दिनों यह अख़बार चार पन्नों में संध्याकाल प्रकाशित होता था इस विश्वास के साथ कि यह का सूर्योदय बेहतर होगा। आज का सांध्यकालीन अख़बार कल का प्रातःकालीन बनेगा। ऐसा हुआ भी। लेकिन कल का यूएनआई, जो क्षितिज पर चमक रहा था, आज उसके लिए अवसान हो गया – यह भी उतना ही सच है। 

अवीक सरकार

बिस्मिल्लाह खान का जन्म हो गया था और वे शहनाई की दुनिया में अपना नाम स्थापित करने के लिए शहनाई में अपने मामा अली बक्स ‘विलायतु’ खान के साथ बनारस स्थित विश्वनाथ मंदिर के चबूतरे पर ‘उस्ताद’ बनने के लिए अपनी साँसें फूंक चुके थे। बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च, 1916 को डुमरांव (बिहार) में हुआ था, जबकि प्रफुल्ल सरकार को आनंद बाजार पत्रिका स्थापित करने के 23 वर्ष बाद 9 जून, 1945 उनके पुत्र अशोक कुमार सरकार को अवीक सरकार के रूप में पुत्ररत्न प्राप्त हुआ था। यानी प्रफुल्ल सरकार दादा बन गए। समय का खेल देखिए – आनंद बाजार पत्रिका भी क्षितिज पर पहुंचा, बिस्मिल्लाह खान भी विश्वनाथ मंदिर के चबूतरे से उठकर भारत रत्न बन गए; लेकिन अवीक सरकार और एबीपी समूह द्वारा लगभग 30 फीसदी यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया में शेयर होने के बाद भी यूएनआई रोता-बिलखता अपने परिसर से बाहर निकाल दिया गया।  

जिस दिन श्री अवीक सरकार का जन्म हुआ था, उस कालखंड में सन 1942 में शुरू हुए ‘अंग्रेज भारत छोड़ो’ आंदोलन अपने अंतिम चरण में लगभग प्रवेश कर चुका था। 9 जून, 1945 को कांग्रेसी नेता जवाहरलाल नेहरू को बरेली केंद्रीय कारा में स्थानांतरित किया गया था, और छह दिन बाद, उन्हें रिहा किया गया था। यह दौर एक तरफ जहाँ कलकत्ता से प्रकाशित समाचार पत्रों, मसलन आनंद बाजार पत्रिका, अमृत बाजार पत्रिका, बंदेमातरम, युगांतर जैसे क्रांतिकारी विचारधारा वाले अख़बारों के लिए क्षितिज पर छाने का समय था, पाठकों का विश्वास जितने का समय था, वहीँ वह दौर अंग्रेजी हुकूमत के लिए सूर्यास्त का समय संकेत दे रहा था। द्वितीय विश्वयुद्ध भी समाप्त हो गया था और सभी का ध्यान भारत की स्वतंत्रता पर केंद्रित हो रहा था। 

आज अवीक सरकार, आनंद बाजार पत्रिका प्रकाशन समूह के उपाध्यक्ष और एडिटर एमेरिटस हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक किया। अपने ब्रिटेन प्रवास के दौरान उन्होंने ‘द संडे टाइम्स’ के संपादक सर हेरोल्ड इवांस के अधीन प्रशिक्षण ली। “पेपर टाइगर्स” के लेखक निकोलस कोलरिज ने अपनी किताब में अवीक सरकार को “भारत का सबसे परिष्कृत अख़बार मालिक” बताया है, और आगे उन्हें “बेहद उम्दा पसंद और चुनाव वाला व्यक्ति” बताया है – फिर चाहे वह उनके खाने की बात हो या उनके कपड़ों की। आज अवीक सरकार ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया’, ‘एबीपी न्यूज़ नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड’, ‘सीमा गैलरी प्राइवेट लिमिटेड’ और ‘सरकार कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशक भी हैं। लेकिन यूएनआई के मामले में अवीक सरकार के साथ-साथ अन्य 26 शेयर होल्डरों ने जो ‘बर्ताव’ किया, शायद समय में लिखा जायेगा। 

कितने-कितने शेयर के मालिक हैं कौन-कौन?  

आप कहेंगे कि यहाँ आविक सरकार पर इतनी बातें क्यों कही जा रही है। जरूरी है। यदि यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया के स्थापना काल के शेयरहोल्डिंग पैटर्न को देखा जाय (जो दस्तावेज कहता है), कुल 27 शेयर होल्डरों में आनंदबाजार पत्रिका प्राइवेट लिमिटेड, 6-प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट, कलकत्ता-700001 का 2214 (फेस वैल्यू 100) यानी कुल शेयर का 21.73 प्रतिशत के साथ-साथ आविक सरकार C/o एबीपी लिमिटेड, 6-प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट, कलकत्ता का 759 शेयर (7.45 %) और भी है। यानी कुल 2973 शेयर अर्थात 21.73 + 7.43 = 29.16 प्रतिशत उनका ही है। शेष में 70.84 फीसदी में 26 अन्य शेयर होल्डर्स हैं। इसके अन्य शेयर होल्डरों में दूसरे स्थान पर 1200 (फेस वैल्यू 100) शेयर के साथ ‘द स्टेट्समैन’ शामिल है, जिसका प्रतिशत में 11.78 प्रतिशत है। तीसरे स्थान पर एक्सप्रेस पब्लिकेशन (मदुरै) लिमिटेड, एक्सप्रेस गार्डन्स, 29-2, मेनरोड, अम्बत्तुर इंडस्ट्रियल एस्टेट, चेन्नई-600058 है, जिनके पास 801 शेयर (7.86 %) के अलावे दी इंडियन एक्सप्रेस लिमिटेड, एक्सप्रेस टावर्स, नरीमन पॉइंट, मुंबई- का 125 शेयर (1.23 %) है।

ये भी पढ़े   खेलो इंडिया: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जन भागीदारी, खेल उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है, बच्चों के हुनर निर्माण में मदद करें

अमृत बाजार पत्रिका, 9-इंडिया एक्सचेंज प्लेस, 7 वां तल्ला, रूम नंबर-1A, कलकत्ता-700001 का 744 शेयर (7.3 %) और तुषार कांति घोष का 5 शेयर (0.05 %) है। बेनेट कोलेमन एंड कंपनी लिमिटेड का 548 शेयर (5.38 %) है, मणिपाल मीडिया नेटवर्क लिमिटेड का 600 शेयर (5.89%), दी प्रिंटर (मैसूर) लिमिटेड का 600 (5.89 %), नवा समाज लिमिटेड का 50 शेयर (0.49%), एच.टी. मीडिया लिमिटेड का 738 शेयर (7.24%)  संतोषनाथ, हिंदुस्तान टाइम्स लिमिटेड का 1 शेयर (0.01%), कस्तूरी एंड साँस लिमिटेड, कस्तूरी बिल्डिंग, माउन्ट रोड, चेन्नई का 345 शेयर (3.39%), सकल पेपर्स प्राइवेट लिमिटेड, पुणे का 100 शेयर (0.98%), जुगांतर लिमिटेड का 5 शेयर (0.05%), न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड, माझारूलहक पथ, पटना का 736 शेयर (7.24%),  नव भारत, नागपुर का 250 शेयर (2.45 %) , जागरण प्रकाशन लिमिटेड का 150 शेयर (1.47%) के साथ पीसी गुप्ता, जागरण प्रकाशन लिमिटेड का 1 शेयर (0.01%), एससी रॉय, 36-न्यू रोड, अलीपुर, कोलकाता का 2 शेयर (0.02%), राइटर्स एंड पब्लिशर्स लिमिटेड, जी-3A, काननवाले चैम्बर्स, माहिम वेस्ट, मुंबई का 100 शेयर (0.98%), एसोसिएटेड पब्लिशर्स (मद्रास) लिमिटेड का 5 शेयर (0.05%), सर्वेंट्स ऑफ़ पीपुल्स सोसाइटी, गोपालबंधु भवन, कटक का 100 शेयर (0.98%), राम एस तरनेजा और रानी तरनेजा, 4-पश्मीना, 33 A, पेडर रोड, मुंबई का 6 शेयर (0.06%), मोहम्मद यूनुस असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड, हेराल्ड हॉउस, बहादुरशाह ज़फर मार्ग,नई दिल्ली का 1 शेयर (0.01%), और जी कस्तूरी का 1 शेयर (0.01%) है। 

यूएनआई परिसर का दृश्य जिस रात परिसर को न्यायालय के आदेश से खाली कराया गया था। तस्वीर: संजय शर्मा

क्या कहते हैं यूएनआई कर्मचारी के नेता एम एल जोशी 

यूएनआई कर्मचारी यूनियन के पूर्व अध्यक्ष और कन्फेडरेशन ऑफ़ न्यूजपेपर्स एंड न्यूज एजेंसीज एम्पलॉयज ऑर्गेनाइजेशन के कोषाध्यक्ष एम एल जोशी आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम से बात करते हुए कहते हैं: “इतने बड़े-बड़े लोगों के शेयर होल्डर्स होते हुए भी कोई यूएनआई को बचाने में आगे नहीं आये। वैसे यूएनआई के सम्पूर्ण हादसे के लिए एबीपी सम्पूह और समूह के स्वामी अवीक सरकार को दोषी हैं ।” आर्यावर्तइंडियननेशन।कॉम अवीक सरकार की बातों को जानने के लिए ईमेल भी किया ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या सच में एबीपी समूह दोषी है? लेकिन इस कहानी को लिखते समय तक उनका कोई उत्तर नहीं आया। 

जोशी का कहना है कि सन 1979 में पालेकर वेज बोर्ड आया था। न्यायमूर्ति (अवकाशप्राप्त) डीजी पालेकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रह चुके थे। पालेकर के बाद मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश यू.एन. बछावत का वेज बोर्ड बना था, जो बछावत वेज बोर्ड के नाम से जाना गया। यह वेज बोर्ड 1989 में अपना अनुशंसा प्रस्तुत किया। बछावत के बाद गौहाटी उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.पी.एस. मणिसाना की अध्यक्षता वाला मणिसाना वेज बोर्ड 2000 में अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया और अंत में मुंबई उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरबख्श राय मजिथा की वेजबोड अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किया। 

यूएनआई परिसर से सभी कर्मचारियों, पत्रकारों, गैर-पत्रकारों को हटाने के बाद प्रवेश द्वार सील करते अधिकारी – तस्वीर: संजय शर्मा

जोशी का कहना है कि उस समय तक हिंदुस्तान टाइम्स समूह के वरिष्ठ अधिकारी नरेश मोहन यूएनआई की देखरेख करने के लिए आ गए थे। मणिसाना वेज बोर्ड पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकारों के वेतन और अन्य आर्थिक सुविधाओं में लाभ अनुशंसित किया था। उस समय एक जॉइंट एक्शन कमिटी भी बना जो यह निर्णय लिए की वेज बोर्ड के अनुशंसा को तीन बार में लागू कर भुगतान किया जायेगा। अगर देखा जाय तो यूएनआई की आर्थिक स्थिति में अधोमुखी गिरावट यहीं से प्रारम्भ हुआ। वैसे इसके लिए सिर्फ नरेश मोहन (अब दिवंगत) को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, उनके अलावे सभी शेयर होल्डर उतने ही दोषी हैं। नरेश मोहन के समय यूएनआई के पास 25 करोड़ रूपये का एफडीआर था। लेकिन वेज बोर्ड लागु होने के साथ ही, एफडीआर क्रमशः समाप्त होने लगा। इसका मुख्य कारण था आमदनी के अन्य श्रोतों की कमी। 

जब उनसे पूछा कि यूएनआई एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय समाचार सेवा होने के बाद भी इसका सब्सक्रिप्शन समाप्त क्यों होता गया? जोशी का कहना था कि “आम तौर पर दोनों समाचार एजेंसियों में नब्बे फीसदी से अधिक शेयर होल्डर्स एक ही है। यह कहना मुश्किल है, लेकिन जब व्यवहार को देखते हैं तो यही प्रतीत होता है कि उन लोगों का पीटीआई के प्रति एक अलग सोच है और यूएनआई के प्रति अलग। परिणामस्वरूप वे पीटीआई के सब्सक्रिप्शन को बरकरार रखते यूएनआई का सब्सक्रिप्शन समाप्त करने लगे। सब्सक्रिप्शन का समाप्त होना आर्थिक रूप से कमजोर करने का तरीका बना। इतना ही नहीं, उन शेयर होल्डरों का यूएनआई के क्रियाकलाप में भी कोई दिलचस्पी नहीं रहा। साथ ही, यूएनआई के तरफ से अगर कोई भी सकारात्मक पहल की जाती थी, तो उसमें उनका समर्थन तो नहीं ही रहता था, अलबत्ता रोड़े भी अटकने लगे थे। जब वित्तीय स्थिति ख़राब होने लगी थी, कई मर्तबा फाइनेंसियल मोबिलाइजेशन के लिए जो भी प्रस्ताव लाये जाते थे, उसे ठुकराना उन शेयर होल्डरों की एक आदत हो गयी थी। यूएनआई में 27 शेयर होल्डर्स थे, उनमें कई ‘निष्क्रिय’ थे। इसका सबसे बड़ा कारण था मुनाफा का नहीं बाँट पाना।”

जोशी का कहना है कि जब भी बाहर से पैसे एकत्रित करने का प्रयास किया गया, स्वाभाविक है पैसा निवेश करने वाला अपना आधिपत्य भी चाहेगा, लेकिन ये शेयर धारक ऐसा नहीं होने देना चाहते थे। साल 2006 में जब वित्तीय स्थिति संकट में आने लगी, यूएनआई के साथ-साथ कर्मचारियों का भविष्य भी संकट में दिखने लगा, नरेश मोहन पत्रकार और गैर-पत्रकारों के साथ बैठक किये। अब तक संस्थान में पुरानी पद्धतियां, तकनीक बदलने लगी थी, लोगों की जरूरतें कम होने लगी थी, स्वाभाविक है प्रबंधन अतिरिक्त लोगों को हटाने पर आमादा होगी, नरेश मोहन ने भी यही किया था। उनके अनुसार करीब 350 ‘अनुत्पादक’, ‘अतिरिक्त’ लोगों को या तो बाहर निकालने पर जोर दे रहे थे, या फिर यह कर रहे थे कि वेतन को कम करना होगा, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प नहीं था। यूनियन का प्रतिनिधि होने के कारण यह दोनोने शर्त हमें मंजूर नहीं थी। नरेश मोहन जाने से पहले एक कमेटी बनाकर चले गए जिसका कर्ताधर्ता एम.के लौल थे। अब तक वित्तीय स्थित बैकलॉग में चली गयी थी। 

जब जी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा यूएनआई आये

जोशी आगे कहते हैं कि 2006 में निदेशक मंडलों का निर्णय हुआ कि एजेंसी का शेयर किसी और के हाथों बेचा जाए ताकि पैसे का एकत्रीकरण हो। और यहीं आगमन हुआ – एस्सेल ग्रुप के प्रमुख सुभाष चंद्रा का, जो यूएनआई का 51 प्रतिशत हिस्सेदारी 32 करोड़ रुपये में खरीद कर आगे आये। इसमें चार अन्य बोली लगाने वाले भी थे, लेकिन सुभाष चंद्रा को ‘अप्रूव’ किया गया। जब उनसे पूछा कि आखिर इतने शेयर होल्डरों की उपस्थिति में, उसमें भी धनाढ्यों की उपस्थिति में सुभाष चंद्रा कहाँ से अवतरित हो गए और बोर्ड ने उन्हें कैसे ‘अप्रूव’ कर दिया? शेष अन्य चार बोली लगाने वालों का क्या हुआ? जोशी कहते हैं 26 सितंबर, 2006 को बोर्ड की वार्षिक आम बैठक हुई। उस बैठक में कुछ हो अथवा नहीं, ‘लोब्बिंग’ प्रारम्भ हो गया। दो फांक में बंट गए। लेफ्ट विंग और राइट विंग हो गया। इसमें दिल्ली के साथ साथ राष्ट्रीय नेताओं ने भी आकर विरोध करने लगे। इस बात पर दो राय नहीं थी की यूएनआई को पैसों की ज़रूरत थी ताकि तत्कालीन आर्थिक विपन्नता और मुसीबतों का सामना किया जा सके। लेकिन इस बात का भी उतना ही भय था की सुभाष चंद्रा यूएनआई पर कब्ज़ा भी कर सकते हैं या फिर इस प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी का उपयोग अपनी संस्थान को मजबूत करने में भी कर सकते हैं। चार शेयर होल्डरों – एबीपी समूह, दी हिन्दू समूह, मणिपाल और डेक्कन हेराल्ड इस मसले को लेकर दोनों शेयर धारक और कुछ अन्य ‘कंपनी लॉ बोर्ड’ पहुँच गए।”

सुभाष चंद्रा, जी-टीवी के मालिक 

3 अक्टूबर, 2006 को सुभाष चंद्रा यूएनआई दफ्तर आये। चारो तरफ से उनका घेराव भी हुआ था। वह बात भी करना चाहे, यह भी कहे कि किसी को नहीं निकला जाएगा। तीन घंटे तक हो-हल्ला होता राह। लेकिन वह नहीं हो सका जो वे चाहते थे। 5 अक्टूबर, 2006 को धरना-प्रदर्शन भी हुआ। इस कालखंड में प्रियरंजन दास मुंशी, जनार्दन द्विवेदी और अन्य नेताओं ने भी इस प्रकरण में शामिल हुए। जो बैठक यूएनआई के परिसर में होना था, वह ललित होटल में चला गया। इस बीच, कंपनी लॉ बोर्ड ने सुभाष चंद्र की खरीद को निरस्त का दिया और यूएनआई को अपने स्तर पर अन्य उपायों के साथ धन एकत्रित करने को कहा। साथ ही, यह भी कहा कि अगर शेयरहोल्डर्स खुद ही इस न्यूज़ एजेंसी की सेवाओं का सब्सक्रिप्शन ले लें, तो इससे बहुत मदद मिलेगी। सब्सक्रिप्शन की दरें अखबार के प्रसार के आधार पर हर महीने 10,000 रुपये से लेकर 7 लाख रुपये तक की है ।

ये भी पढ़े   #भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (1) ✍ मोदी​ की दिल्ली

इस बीच, यूएनआई को एक और आर्थिक धक्का लगा जब अचानक 17 लाख रुपये मासिक की सब्सिडी समाप्त हो गयी। यह सब्सिडी नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू लैंग्वेज’ से मिलती थी केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत उर्दू भाषा को बढ़ावा देने के लिए मुख्य निगरानी संस्था के तौर पर काम करती है। यह सब्सिडी उन छोटे और मध्यम प्रसार वाले उर्दू अखबारों के लिए एक वित्तीय सहायता थी, जिसके जरिए वे यूएनआई की सेवा 50 प्रतिशत कम कीमत पर हासिल कर सकते थे। सब्सिडी रद्द होने के कारण कई उर्दू अखबारों ने यूएनआई से अपनी सदस्यता वापस ले ली। 

ज्ञातव्य हो कि यूएनआई 1992 में उर्दू टेलीप्रिंटर सेवा प्रारम्भ करने वाली पहली समाचार एजेंसी थी। इस घटना के बाद भी यूएनआई को आर्थिक झटका लगा। वैसे आज तक इस बात का खुलासा नहीं हो पाया कि इतने बड़े समाचार एम्पायर का मालिक होने के बाद भी अचानक सुभाष चंद्रा को यूएनआई जैसी संस्था के प्रति लगाव कैसे हो गया? लोगों का कहना है कि शायद यूएनआई जिस स्थान पर स्थित था, वह जमीन किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है, खासकर जो ‘व्यवसायी’ हैं। इस दृष्टि से अगर एबीपी, या दी हिन्दू, या मणिपाल, या डेक्कन हेराल्ड सुभाष चंद्रा के खरीद-फरोश के लिए कंपनी लॉ बोर्ड के पास गया तो क्या गलत किया ?

क्या कहते हैं भूमि और विकास मंत्रालय के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी 

बहरहाल, भारत सरकार के भूमि और विकास मंत्रालय के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी (अपना नाम नहीं लिखने के शर्त पर) आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम को कहते हैं: “शेयरहोल्डर तो यह कंपनी (दी न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन लिमिटेड) भी था। सवा-सात प्रतिशत शेयर का मालिक था यह कंपनी। इस कंपनी के तत्कालीन प्रबंधन उपेंद्र आचार्य के नेतृत्व में शुरुआती दिनों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। यहाँ तक कि पटना के अलावे भी यूएनआई को स्थापित करने में मदद किये। लेकिन अचानक संस्थान के स्वामी महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद जो हश्र उनकी कंपनी का हुआ, दरभंगा राज का हुआ; आज यूएनआई उसी रास्ते पर है। यूएनआई के स्थापना के बीस वर्ष बाद दिल्ली शहर के सबसे महत्वपूर्ण इलाके में कार्यालय के लिए भूमि आवंटित हुआ। 1979 के बाद, केंद्र सरकार में कई ऐसे अवसर थे, जिस अवसर का लाभ उठाकर यूएनआई 9-रफ़ी मार्ग पर एक बेहतरीन और आकर्षक भवन खड़ा कर सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। 

वे आगे कहते हैं: “अपनी मृत्यु से कुछ पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में भीष्म नारायण सिंह  और बूटा सिंह शहरी विकास और हाउसिंग मंत्री थे। उस समय कुछ चर्चाएं भी हुयी थी। अगर कोई आगे बढ़ता तो मामला उसी समय निपट जाता। इसके बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। राजीव गांधी पत्रकारों और पत्रकारिता के साथ बहुत मधुर सम्बन्ध था। एक बार उन्होंने इस विषय की चर्चा भी किये थे। फिर पीवी नरसिम्हा राव आये, अटल बिहार वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह आये। यूएनआई के साथ-साथ यूएनआई के संवाददाताओं और प्रबंधकों के साथ (कुछ खास शेयर होल्डर सहित) इन प्रधानमंत्रियों का जितना बेहतर सम्बन्ध था, शायद आज के लोग सोच भी नहीं सकते। सत्ता के गलियारे में इस बात की चर्चा भी थी कि अगर यूएनआई सरकार से देश की बेहतर पत्रकारिता के नाम पर आर्थिक मदद (बैंक ऋण सहित) मांगता है, तो शायद न तो प्रधानमंत्री कार्यालय और ना ही शहरी विकास मंत्रालय पीछे होता। लेकिन यहां तो यूएनआई के तत्कालीन अधिकारियों, यहाँ तक कि पत्रकारगण भी, सरकार और मंत्रालय के साथ चिठ्ठी-चिठ्ठी खेलने में लगे रहे और चिठ्ठी-चिठ्ठी का वह खेल इतना भयंकर हो गया कि देश का एक महत्वपूर्ण समाचार एजेंसी अपनी जमीन और जमीर से बेदखल हो गया – यह दुर्भाग्य है।”

भूमि और विकास मंत्रालय के अधिकारी आगे कहते हैं: “मेरी आयु आज 85+ वर्ष की है। मेरी आयु के लोग जो यूएनआई से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े थे, आज उनकी संख्यां ऊँगली की गिनती पर आ गयी है, आज के लोग, चाहे वे सत्ता के गलियारे में हैं या सत्ता के बाहर, या फिर सत्ता में अपनी पहचान बनाने के लिए सभी तरह के कर्मकांड कर रहे हैं, वे उस दौड़ के बारे में सोच भी नहीं सकते जब यूएनआई के पत्रकार से लेकर गैर-पत्रकार तक, इस संस्थान को बनाने में कितनी मेहनत किये थे। लेकिन, 1979 के बाद से लगातार, यूएनआई के तत्कालीन और आने वाले अधिकारी चिठ्ठी-चिठ्ठी का खेल खेलते इसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिए। हम सिर्फ शेयर होल्डर्स को दोषी नहीं करार कर सकते हैं। यहाँ कार्य करने वाले लोग, चाहे पत्रकार हो या गैर पत्रकार उतना ही दोषी हैं। आज भी समय है कि लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस विषय का निदान के लिए गुहार करें। गुहार करने से हम छोटे नहीं हो जायेंगे और अगर सैकड़ों परिवारों के हित के लिए छोटे हो भी जाते हैं (जैसा लोग सोचते हैं) तो इसमें कोई बुराई नहीं है। यह मेरी सोच है। ऐसा नहीं कि हमें क्या लाभ होगा, बल्कि इसलिए की यूएनआई की पत्रकारिता बच पायेगी।”

चिठ्ठी-चिठ्ठी का खेला 

* 14.12.1979 को भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) द्वारा यूएनआई के पक्ष में एक आवंटन पत्र जारी किया गया था, जिसके द्वारा 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में स्थित भूमि आवंटित की गई थी। उक्त पत्र में भूखंड का क्षेत्रफल 1.453 एकड़ (0.588 हेक्टेयर) दर्ज किया गया था। यह आवंटन न केवल यूएनआई के लाभ के लिए किया गया था, बल्कि चार अन्य सहभागी समाचार मीडिया संस्थानों – प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया, प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार – के संबंध में भी किया गया था; इसका उद्देश्य एक संयुक्त कार्यालय परिसर का निर्माण करना था, जिसमें उक्त समाचार मीडिया संगठनों के कार्यालय स्थित हो सकें।

* 08.08.1980 को, दिनांक 14.12.1979 के आवंटन पत्र में संशोधन किया गया, जिसके तहत प्लॉट के क्षेत्रफल के साथ-साथ उससे संबंधित देय प्रीमियम और ज़मीनी किराए के संबंध में कुछ छोटे-मोटे बदलाव किए गए। 

* 14.12.1979 की आवंटन चिट्ठी के अनुसार, जमीन का औपचारिक कब्जा सौंपे जाने की तारीख से दो साल के अंदर प्रस्तावित इमारत का निर्माण पूरा करना ज़रूरी था। 

* यूएनआई दावा किया कि उक्त आवंटन चिट्ठी में तय किया गया प्रीमियम और जमीन का किराया विधिवत चुका दिया गया था, और प्लॉट पर मौजूद मौजूदा ऊपरी ढांचे की घटी हुई लागत भी जमा कर दी गई थी। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि 22.01.1981 का एक समझौता ज्ञापन, और उसके साथ 25.02.1981 की एक सुधार विलेख, जिसमें उक्त समझौता ज्ञापन में संशोधन करने की मांग की गई थी, निष्पादित किए गए थे। 

* 07.11.1986 की एक संशोधित आवंटन चिट्ठी जारी की गई, जिसने 08.08.1980 की पिछली कार्यालय चिट्ठी संख्या L-I-II-I(576)/78 का स्थान ले लिया।

* 07.11.1986 के आवंटन पत्र के खंड (xi) में यह प्रावधान था कि उक्त मीडिया संस्थानों को आपस में एक समझौता करना होगा, जिसमें यह तय किया जाएगा कि प्रस्तावित भवन के निर्माण की लागत किस आधार पर आपस में बांटी जाएगी; साथ ही, इसमें अन्य प्रासंगिक मामलों को भी शामिल किया जाएगा, जिनमें संपत्ति के निर्माण, प्रबंधन और रखरखाव की व्यवस्थाएं शामिल हैं। यह स्वीकार्य है कि 07.11.1986 के आवंटन पत्र के अनुसार जो आवश्यक कदम उठाए जाने थे, वे नहीं उठाए गए; क्योंकि न तो संबंधित आवंटियों के बीच कोई समझौता किया गया और न ही आवश्यक निर्माण कार्य शुरू करने के लिए कोई कदम उठाया गया।

* 17.06.1999 को, 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में स्थित ज़मीन के संबंध में एक और आवंटन पत्र जारी किया गया। उक्त पत्र में यह दर्ज है कि प्लॉट का कुल क्षेत्रफल 1.841 एकड़ था, जिसमें से 1 एकड़ जमीन पहले ही यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और प्रेस एसोसिएशन को संयुक्त रूप से आवंटित की जा चुकी थी। इस पत्र में आगे शेष 0.841 एकड़ जमीन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और विदेश व्यापार संयुक्त महानिदेशक, वाणिज्य मंत्रालय को आवंटित करने का प्रस्ताव था। इसमें आगे यह भी परिकल्पना की गई थी कि पूरे प्लॉट पर एक मिश्रित भवन का निर्माण केंद्रीय लोक निर्माण विभाग द्वारा किया जाएगा, जिसमें विभिन्न आवंटिती उक्त आवंटन पत्र में निर्दिष्ट अनुपात में निर्मित स्थान को साझा करने के हकदार होंगे।

ये भी पढ़े   इसमें इतना शोरगुल क्यों? वित्त मंत्री बजट में ₹214.82 लाख करोड़ कर्ज बताई थी, मोदी जी की 'विदेश यात्रा खर्च' उसी खाते में जोड़ दिया जाय

* 27.06.2000 की तारीख वाले पत्र का उद्देश्य प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, प्रेस एसोसिएशन और वाणिज्य मंत्रालय के विदेश व्यापार के संयुक्त महानिदेशक के पक्ष में पहले किए गए आवंटनों को रद्द करना था।  उक्त संचार में आगे प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को 1244.76 वर्ग मीटर और याचिकाकर्ता को 620.76 वर्ग मीटर अतिरिक्त भूमि आवंटित करने का प्रावधान है; यह आवंटन उस 1400 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त है जो पहले ही प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को आवंटित की जा चुकी थी, और उस 2024 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त है जो पहले ही याचिकाकर्ता/यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया को आवंटित की जा चुकी थी।

* इसके बाद, L&DO द्वारा 30.03.2005 को यूएनआई को भेजे गए संचार के माध्यम से, 620.76 वर्ग मीटर का वह अतिरिक्त क्षेत्र रद्द कर दिया गया, जो यूएनआई को मूल रूप से आवंटित 2024 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त आवंटित किया गया था।
 

* 09.10.2012 के पत्र के माध्यम से यह सूचित किया गया था कि सक्षम प्राधिकारी ने 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया के लिए एक मिश्रित भवन के निर्माण हेतु नेशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के माध्यम से स्वीकृति प्रदान कर दी है; यह स्वीकृति सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के स्थान पर दी गई है, जिसे पहले निष्पादन एजेंसी के रूप में परिकल्पित किया गया था। 

* 20.02.2018 को, यूएनआई ने भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) को एक पत्र भेजा, जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया था कि क्या याचिकाकर्ता, भारतीय प्रेस परिषद और शहरी विकास मंत्रालय के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता किया जाना चाहिए, इस तथ्य को देखते हुए कि तब तक लगभग 620 वर्ग मीटर का अतिरिक्त क्षेत्र केंद्रीय लोक निर्माण विभाग /सरकारी उपयोग के लिए निर्धारित किया जा चुका था। 

* यूएनआई ने L&DO को 30.05.2018 को एक रिमाइंडर भेजा, जिसमें उसने इस मामले में स्पष्टीकरण के लिए अपने अनुरोध को दोहराया।

* यूएनआई ने L&DO को 09.12.2019 को एक और पत्र भेजा, जिसमें L&DO के कार्यालय में 29.11.2018 को हुई एक बैठक का ज़िक्र किया गया था। उस बैठक में यह बात सामने आई कि 620 वर्ग मीटर का वह अतिरिक्त क्षेत्र, जो पहले याचिकाकर्ता को आवंटित किया गया था और जिसका आवंटन बाद में 30.03.2005 के पत्र के ज़रिए रद्द कर दिया गया था, अब ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ को आवंटित करने का प्रस्ताव था। इसके परिणामस्वरूप, 620.76 वर्ग मीटर का वह क्षेत्र, अंततः 15.03.2021 के पत्र के जरिए ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ को आवंटित कर दिया गया। 

* 26. 23.11.2022 के एक पत्र के माध्यम से, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक आपत्ति उठाई, जिसमें कहा गया था कि यूएनआई ने कथित तौर पर 620 वर्ग मीटर भूमि के उस हिस्से पर एक रेस्तरां/कैंटीन चलाना शुरू कर दिया है, जो प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को आवंटित किया गया था; और यह कार्य उसने बिना किसी पूर्व सूचना के तथा आवंटन को नियंत्रित करने वाले नियमों और शर्तों का उल्लंघन करते हुए किया है।

* 24.01.2022 के एक पत्र के माध्यम से, प्रस्तावित भवन के निर्माण के बाद और उसका कब्जा प्राप्त करने के उपरांत, उस भवन के 70% (सत्तर प्रतिशत) तक हिस्से को व्यावसायिक रूप से पट्टे पर देने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, यूएनआई  ने प्रस्तावित इमारत के बन जाने के बाद उसके एक हिस्से को कमर्शियल तौर पर लीज़ पर देने की जो अनुमति माँगी थी, उसे L&DO ने 29.03.2022 की बातचीत के ज़रिए नामंज़ूर कर दिया। 

* 18.05.2022 के एक ईमेल के ज़रिए बताया कि, मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए, वह फ़िलहाल प्रस्तावित मिली-जुली इमारत के निर्माण में हिस्सा लेने में असमर्थ है और उसने प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया से अनुरोध किया कि या तो वह अपने शेयरधारकों द्वारा प्रस्तावित फ़ंड आने के नतीजे का इंतज़ार करे या फिर ज़मीन के अपने अलॉट किए गए हिस्से पर निर्माण का काम आगे बढ़ाए।

* 19.07.2022 की एक चिट्ठी में यह दर्ज है कि प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने कई मौकों पर याचिकाकर्ता से 620 वर्ग मीटर ज़मीन खाली करने का अनुरोध किया था, जो उसे आवंटित की गई थी।  प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने 20.07.2022 के पत्र के ज़रिए L&DO से इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक मीटिंग बुलाने का अनुरोध किया। हालांकि, यह मामला अनसुलझा ही रहा।

* 08.08.2022 को यूएनआई द्वारा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को भेजे गए एक ई-मेल में, यूएनआई ने फिर से कहा कि वह आर्थिक दिक्कतों की वजह से प्रस्तावित इमारत के निर्माण में हिस्सा लेने की स्थिति में नहीं है। 

* 12.01.2023 को L&DO द्वारा यूएनआई को एक ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया गया।  

*  14.02.2023 को ‘कारण बताओ नोटिस’ के संबंध में एक अस्पष्ट और मनमाना जवाब प्रस्तुत किया। यूएनआई, अन्य बातों के साथ-साथ, यह कहा कि चूंकि उस समय उसके पास ‘निदेशक मंडल’ नहीं था, इसलिए वह उक्त ‘कारण बताओ नोटिस’ का समुचित जवाब देने में असमर्थ होगा।  

* 29.03.2023 का वह विवादित निरस्तीकरण पत्र जारी किया गया, जिसके द्वारा यूएनआई के पक्ष में किया गया आवंटन रद्द कर दिया गया।

* 12.02.2025 को CIRP की प्रक्रिया NCLT द्वारा को पारित एक आदेश के साथ समाप्त हुई, जिसके तहत सफल रिज़ॉल्यूशन आवेदक, यानी ‘द स्टेट्समैन लिमिटेड’ द्वारा प्रस्तुत रिज़ॉल्यूशन योजना को मंज़ूरी दे दी गई। 

*  08.07.2025 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक आवेदन दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह आरोप लगाया गया कि यूएनआई विचाराधीन ज़मीन पर अनधिकृत निर्माण कार्य कर रहा है; इसके साथ ही, यह निर्देश देने की मांग की गई कि उस स्थल (साइट) पर सभी प्रकार के निर्माण कार्य तत्काल रोक दिए जाएं। 

*
13.08.2025 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने इसके बाद एक और आवेदन दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह निर्देश देने की मांग की गई कि यूएनआई को किसी भी प्रकार की बाधा या रुकावट पैदा करने से रोका जाए। 

* 11.07.2025 और 18.08.2025 के आदेशों के माध्यम से, न्यायालय ने भूमि और विकास कार्यालय को निर्देश दिया कि वह संबंधित स्थल का भौतिक निरीक्षण करे, ताकि यह जांच की जा सके कि क्या वहाँ कोई नया निर्माण हुआ है, और उसके बाद एक स्थिति रिपोर्ट रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे।

* 14.07.2025 को, उक्त निरीक्षण किया गया और इस संबंध में एक निरीक्षण/स्थिति रिपोर्ट L&DO द्वारा दिनांक 04.08.2025 को दायर की गई, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि यूएनआई द्वारा अनधिकृत निर्माण गतिविधियाँ की जा रही थी, और ऐसी गतिविधियों के परिणामस्वरूप संबंधित भूखंड की प्रकृति में बदलाव आ गया था।

* 24.09.2025 को, यूएनआई आरोपों का खंडन करते हुए एक जवाब दाखिल किया, और यह तर्क देने की मांग की कि केवल मरम्मत और नवीनीकरण का काम किया गया था, और संबंधित ज़मीन पर कोई स्थायी ढांचा नहीं बनाया गया था।

* 09.07.2025 को, याचिकाकर्ता ने भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष को एक पत्र लिखा, जिसमें उसने तत्काल आधार पर निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने का अपना इरादा व्यक्त किया। 

* 19.08.2025 के पत्र के माध्यम से, यूएनआई ने भारतीय प्रेस परिषद को एक और पत्र लिखा, जिसमें उसने भारतीय प्रेस परिषद द्वारा एकतरफा रूप से संपत्ति की स्थिति को बदलने के प्रयास पर आपत्ति जताई; इस प्रयास में संबंधित ज़मीन पर अपना बोर्ड लगाना भी शामिल था। 

*  21.08.2025 को भारतीय प्रेस परिषद ने पत्र के माध्यम से यूएनआई को एक जवाब भेजा, जिसमें यह दावा किया गया कि आवंटन पत्रों में निहित शर्तों के अनुसार निर्माण कार्य न कर पाने का कारण यूएनआई की ओर से हुई चूक थी।
 
* 27.08.2025 को L&DO द्वारा याचिकाकर्ता को एक पत्र भेजा गया। 

* 19.09.2025 को न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में, विचाराधीन संपत्ति का एक और संयुक्त निरीक्षण किया गया। 

* 24.09.2025 की निरीक्षण रिपोर्ट से पुनः यह संकेत मिलता है कि यूएनआई द्वारा संपत्ति पर कुछ अनधिकृत निर्माण किए गए थे, जो न्यायालय द्वारा पारित ‘यथास्थिति’ आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है।

*  24.09.2025 की उक्त निरीक्षण रिपोर्ट पर यूएनआई आपत्ति जताई है और जवाब में तर्क दिया है कि कोई भी अनाधिकृत निर्माण कार्य नहीं किया गया था, और मौजूदा संरचना पर केवल नवीनीकरण और मरम्मत का काम किया गया था।

यूएनआई कार्यालय से न्यायालय आदेश के बाद पत्रकारों, गैर-पत्रकारों को परिसर खाली कराते दिल्ली पुलिस के कर्मी। तस्वीर: संजय शर्मा 

आगे क्या हुआ सभी जानते हैं। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here