
पटना / नई दिल्ली: शायद यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया में कार्य करने वाले आज के लोगों को ज्ञात नहीं होगा, हो सकता है स्वीकार भी नहीं करें, एक समय यूएनआई के एक संवाददाता की शिकायत पर बिहार के पुलिस उप-महानिदेशक का अपने सम्पूर्ण कार्यकाल में कभी ‘फिल्ड पोस्टिंग’ नहीं हो पाया, जबकि बिहार में ‘जाति की राजनीति’ थी, आज तो है ही। आज भी प्रदेश के मुख्यालय के दस्तावेज में कहीं-न-कहीं उद्धृत होगा। उक्त पुलिस उप-महानिदेशक का ‘फिल्ड-पोस्टिंग’ नहीं करने का आदेश पुलिस मुख्यालय अथवा प्रदेश के गृह मंत्रालय से नहीं, अपितु प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं फ़ाइल पर लिखे थे।
एक समय आज है जब दिल्ली की मुख्यमंत्री कार्यालय से तीन किलोमीटर और प्रधानमंत्री कार्यालय से पचास कदम दूरी पर स्थित यूएनआई मुख्यालय से सभी पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकारों को देर रात दिल्ली पुलिस और सरकारी अधिकारी बाहर निकाल दिए, धक्का-मुक्की देकर; न दिल्ली की मुख्यमंत्री कुछ कहीं, ना ही प्रधानमंत्री कुछ बोले ना पत्रकार और संपादक से राजनीतिक गलियारे में बने राजनेता और मंत्री ही कुछ कहे। सन्नाटा चतुर्दिक बहाल रहा। गिरावट, चाहे सोच में हो या आंतरिक प्रशासन में या फिर प्रबंधन-कर्मचारी की राजनीति में, आई तो जरूर है, आप माने या नहीं, तभी यह सन्नाटा है ।
दिल्ली ही नहीं, देश में स्थित यूएनआई के पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकारों को शायद ज्ञात नहीं होगा कि आपातकाल के दौरान जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी उस समय देश के सभी चार संवाद एजेंसियों – प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई), यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई), हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती – को मिलाकर ‘समाचार’ नामक एजेंसी बनाई थी, उस समय यूएनआई ‘स्थापना विरोधी तथ्य से भरपूर कहानियों’ और लेखों के लिए विख्यात था। इतना ही नहीं, संस्थान के प्रति प्रतिबद्धता से सम्बंधित एक दृष्टान्त ऐसा भी है जब यूएनआई के सैकड़ों कर्मियों में से एक कर्मी संस्था के वजूद के रक्षार्थ सपरिवार, अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ हज़ारों सीढ़ियों को लांघकर ईश्वर से युद्ध किया था, संस्था के अस्तित्व के रक्षार्थ और मिन्नतें भी पूरी हुयी थी। खैर।
स्थापना के बाद पटना में यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया की शुरुआत आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्र समूह के प्रांगण से ही हुआ था। कई एकड़ में फैले परिसर में बने ‘दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड’ के भवन के दो कमरों से यूएनआई समाचार सेवा का श्रीगणेश हुआ था। उन दिनों संस्थान के प्रबंधक थे श्री उपेंद्र आचार्या और अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक इन दोनों अख़बारों के संस्थापक दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह स्वयं थे। यूएनआई की स्थापना प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया के समानांतर सेवा देना था। लेकिन यूएनआई बहुत मामलों में अपने स्थापना के प्रारंभिक दिनों से ही ‘कुछ अलग’ था, जहाँ तक कहानियों, समाचारों की गुणवत्ता का सवाल है।
आपातकाल के दिनों में, पटना ही नहीं देश के अन्य अख़बारों, पत्रिकाओं के पत्रकारों, सम्पादकों को इस बात की तकलीफ अवश्य थी की वे अपने पाठकों के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं क्योंकि एक पाठक अख़बार खरीदकर पढ़ता है। यूएनआई भी अपनी गुणवत्ता को लेकर भयभीत था। यूएनआई के तत्कालीन पत्रकारों के साथ-साथ संस्थान के प्रबंधकीय पदों पर बैठे अधिकारियों के मन में भय होने लगा था कि अगर यूएनआई आने वाले दिनों में इसी तरह कार्य करने के लिए बाध्य होते रहा तो पाठकों/सब्सक्राइबरों की नज़रों में ‘सम्पादकीय अस्तित्व खतरे में आ जायेगा।’

इसी उद्देश्य से यूएनआई के एक प्रबंधकीय पद के शीर्षस्थ अधिकारी, जो यूएनआई के जन्म काल से साथ थे, मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर नामक गाँव में पहाड़ी पर स्थित माँ शारदा के मंदिर में सपरिवार पैदल चलकर देवी से याचना करने को ठान लिए। उनका कहना था कि अगर संस्थान नहीं बचेगा तो हम और हमारे जैसे लोगों, उनके परिवारों का अस्तित्व कहाँ बच पायेगा। उस दिन भी, और आज भी मान्यता यह भी है कि इस मंदिर में पैदल चलकर आने वाला कभी भी खाली हाथ वापस नहीं जाता है। उन दिनों यूएनआई के अधिकारी श्री बी.एन. झा, सपरिवार मैहर मंदिर जाने निकल पड़े। देवी शारदा के सामने याचना करने और उनसे मिन्नत करने कि ‘हे देवी!! हमें (यूएनआई) अस्तित्वहीन हो रहा है, इसे बचाएं।”
मैं नहीं समझता हूँ कि यूएनआई के स्थापना काल से अब तक संस्थान का कोई भी कर्मचारी, अधिकारी, कर्मचारी संघ के लोग अपने संस्थान के अस्तित्व को बचाने के लिए कभी ऐसी याचना अथवा प्रयत्न किये होंगे। अगर किये होते तो शायद आज संस्थान का यह हश्र भी नहीं हुआ होता। संस्था के पुराने लोगों का कहना है कि विगत तीन दशक से यह संस्था अपने ‘आंतरिक राजनीति का शिकार होता आ रहा है। बदलते वक्त में भी लोगों ने अपनी सोच को नहीं बदला जिसका परिणाम सबों के सामने हैं।”
त्रिकूटा पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी पर स्थित माँ शारदा देवी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। पहाड़ी की चोटी तक पहुँचने के लिए 1063 सीढ़ियाँ हैं। श्री बी.एन. झा सपरिवार, अपनी पत्नी, अपने छोटे-छोटे बच्चों का हाथ पकड़े इन सीढ़ियों को पार करते देवी दर्शन के लिए पहुंचे थे। याचना करने पहुंचे थे। संस्था को तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था से मुक्त कराने के लिए पहुंचे थे। श्री झा की याचना देवी ने सुन ली और 14 अप्रैल 1978 को यूएनआई के साथ-साथ अन्य अन्य तीन समाचार एजेंसियां फिर से अपने पुराने जीवन में वापस आया। मैहर भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए भी प्रसिद्ध है। मैहर-सेनिया घराना के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खान मैहर के ही निवासी थे। उन्हें 1971 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। उनके प्रसिद्ध शिष्यों में सितार वादक पंडित रवि शंकर और उस्ताद अली अकबर खान शामिल हैं।
बहरहाल, पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र राय की अगुवाई में गठित देश का प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी ‘चापलूसी रहित’ अपनी ‘सम्पादकीय गुणवत्ता’ के कारण आपातकाल के दिनों में सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी और नौकरशाहों के लिए गले की हड्डी बन गया था। कहते हैं कि यूएनआई जब अपना कार्य शुरू किया था उस समय इसके पास दो अंकों में भी कर्मचारियों की संख्या नहीं थी। लेकिन समयांतराल कर्मचारियों, खासकर पत्रकारों – स्ट्रिंगर से लेकर संपादक तक – हज़ारों में पहुँच गयी थी।

जनसत्ता के पूर्व वरिष्ठ संवाददाता पद्मश्री सुरेंद्र किशोर कहते हैं: यूएनआई के साथ मेरा सम्बन्ध छह दशक से है। पटना में पदस्थापित श्री बी.एन. झा और श्री डी.एन. झा के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों और दिल्ली के पत्रकारों के साथ मेरा मधुर सम्बन्ध रहा है। मेरा मानना है कि अपने स्थापना काल से ही यूएनआई जीवंत समाचार एजेंसी रहा है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया की तुलना में यूएनआई अधिक विश्वसनीय और अशुद्धता रहित रहा है। यूएनआई समाचार निर्गत करने से पूर्व कई मर्तबा शब्दों का चयन, वाक्यों का विन्यास और शुद्धता का परख करता है। यह उसकी खास विशेषता रही है। यहाँ कार्य करने वाले पत्रकारों, विशेषकर जो संवाददाता के रूप में कार्य किये हैं, इस बात से सहमत होंगे कि यहाँ रिपोर्ट में सभी प्रकार की स्वतंत्रता शुरू से रही है। आज यूएनआई के बारे में खबर सुनकर मन दुःखी हो गया।”

एक घटना की चर्चा करते सुरेंद्र किशोर कहते हैं: “1989 लोकसभा चुनाव में पटना से जनरल एस.के. सिन्हा चुनाव लड़ रहे थे। उनके खिलाफ डॉ. सी.पी. ठाकुर थे। दिल्ली से प्रकाशित ‘जनसत्ता’ अख़बार में एक कहानी प्रकाशित हुई कि इस चुनाव में जनरल सिन्हा का पलड़ा भारी है। कहानी मैंने लिखी थी। यूएनआई के वरिष्ठ पत्रकार श्री धैर्या बाबू (श्री डीएन झा) ‘जनसत्ता’ के रिपोर्ट को पढ़कर मुझे कहे कि आपने जो लिखा है, वह सही नहीं है। आपको जो दिख रहा है, वह सच नहीं है क्योंकि इस चुनाव में सीपी ठाकुर ही विजय होंगे। इसलिए कहानी लिखने और प्रेषित करने से पहले सभी दृष्टि थे ठोक-ठाक कर जांच लें, तभी भेजा करें, अन्यथा अपनी साख ख़राब हो जाएगी।”
भारत में पत्रकार, पत्रकारिता के संस्थान और पत्रकारिता
एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अनुसार भारत में पहले समाचार पत्र का श्रेय जेम्स ऑगस्टस हिक्की को दिया जाता है, जिन्होंने 1780 में द बंगाल गजट (जिसे कलकत्ता जनरल एडवरटाइज़र के नाम से भी जाना जाता है) की शुरुआत की थी। यह समाचार पत्र राज की मुखर आलोचना के कारण 1782 में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा जब्त किए जाने से पहले केवल दो वर्षों तक ही चल सका। इसके बाद कई अन्य समाचार पत्र भी प्रकाशित हुए, जैसे कि द बंगाल जर्नल, कलकत्ता क्रॉनिकल, मद्रास कूरियर और बॉम्बे हेराल्ड। हालांकि, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लागू किए गए सेंसरशिप उपायों के कारण इन सभी पर अंकुश लगा दिया गया।
सन् 1799, 1818 और 1823 के दौरान, औपनिवेशिक प्रशासन ने देश में प्रेस को विनियमित करने के लिए कई अधिनियम पारित किए। इस अवधि के दौरान अपवाद स्वरूप 1835 का प्रेस अधिनियम था, जिसे मेटकाफ अधिनियम के नाम से जाना जाता है, जिसने अधिक उदार प्रेस नीति की शुरुआत की। यह सिलसिला 1857 के विद्रोह तक चला, जिसके बाद, विद्रोह से विचलित विदेशी प्रशासन ने 1857 में लाइसेंसिंग अधिनियम लागू किया। इसने औपनिवेशिक प्रशासन को किसी भी मुद्रित सामग्री के प्रकाशन और प्रसार को रोकने की शक्तियां प्रदान कीं। 1867 में, प्रशासन ने पंजीकरण अधिनियम लागू किया, जिसके अनुसार प्रत्येक पुस्तक या समाचार पत्र पर मुद्रण कर्ता, प्रकाशक और प्रकाशन स्थान का नाम अंकित होना अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त, सभी पुस्तकों को प्रकाशन के एक महीने के भीतर स्थानीय सरकार को प्रस्तुत करना आवश्यक था।
भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाए गए सबसे कड़े नियमों में से एक 1878 का वर्नाकुलर प्रेस अधिनियम था। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिटन द्वारा लागू किए गए इस अधिनियम ने सरकार को स्थानीय भाषा के प्रेस में प्रकाशित रिपोर्टों और संपादकीय लेखों पर सेंसरशिप लगाने के व्यापक अधिकार प्रदान किए। इसका उद्देश्य स्थानीय भाषा के प्रेस को ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करने से रोकना था। यह उपाय ‘गैगिंग एक्ट’ की खामियों का समाधान था, जिसका प्रेस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। 1908 और 1912 के बीच चार नए उपाय लागू किए गए – समाचार पत्र (अपराधों के लिए उकसाने) अधिनियम और आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 1908, प्रेस अधिनियम 1910 और राजद्रोह पूर्ण बैठकों की रोकथाम अधिनियम 1911 इत्यादि।

1910 के प्रेस अधिनियम ने विशेष रूप से भारतीय समाचार पत्रों को भारी नुकसान पहुंचाया। इसने स्थानीय सरकार को सरकार के विरुद्ध किसी भी ‘आपत्तिजनक सामग्री’ के लिए सुरक्षा शुल्क वसूलने का अधिकार दिया। इस अधिनियम के तहत लगभग 1,000 समाचार पत्रों पर मुकदमा चलाया गया। महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह ने अंग्रेजों के खिलाफ जनता को एकजुट करने के लिए प्रेस का व्यापक रूप से उपयोग किया। इससे प्रेस और सरकार के बीच तनाव और बढ़ गया। 1930 में गांधी की गिरफ्तारी के बाद, सरकार ने 1931 का प्रेस (आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम लागू किया। इसने प्रांतीय सरकारों को सेंसरशिप की शक्तियां प्रदान कीं। इसके बाद, सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होने से और भी प्रतिबंध लग गए। 1931 के प्रेस आपातकालीन अधिनियम के बावजूद, सरकार ने कड़ी सेंसरशिप की मांग की। इसने आने वाली अंतरराष्ट्रीय खबरों को नियंत्रित और फ़िल्टर किया।
स्वाधीनता के बाद प्रेस जांच समिति की स्थापना 1947 में संविधान सभा द्वारा प्रतिपादित मौलिक अधिकारों के आलोक में प्रेस कानूनों की जांच करने के उद्देश्य से की गई थी। चार साल बाद, 1951 में प्रेस (आपत्तिजनक सामग्री) अधिनियम पारित किया गया, साथ ही अनुच्छेद 19 (2) में संशोधन किया गया, जिसने सरकार को “आपत्तिजनक सामग्री” के प्रकाशन के लिए सुरक्षा राशि मांगने और जब्त करने का अधिकार दिया। यह अधिनियम 1956 तक लागू रहा। 1954 में न्यायमूर्ति राज्याध्यक्ष की अध्यक्षता में एक प्रेस आयोग का गठन किया गया था। समिति की एक प्रमुख सिफारिश अखिल भारतीय प्रेस परिषद की स्थापना थी। इसकी औपचारिक स्थापना 4 जुलाई, 1966 को एक स्वायत्त, वैधानिक, अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में हुई, जिसके अध्यक्ष तत्कालीन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.आर. मुधोलकर थे।
कहते हैं कि भारत में पत्रकारिता संस्थान 20वीं सदी की शुरुआत में यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग से विकसित होकर खास, सरकारी मदद वाले और निजी संस्थानों में बदल गए। डॉ. एनी बेसेंट ने 1920 में मद्रास के अड्यार में नेशनल यूनिवर्सिटी में पहला पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू किया। 1941 में, प्रो. पी.पी. सिंह ने लाहौर की पंजाब यूनिवर्सिटी (जो बाद में भारत आ गई) में पत्रकारिता का पहला औपचारिक यूनिवर्सिटी विभाग स्थापित किया। मद्रास यूनिवर्सिटी ने 1947 में एक डिप्लोमा कोर्स शुरू किया। 1952-53 में, हिस्लोप क्रिश्चियन कॉलेज (नागपुर यूनिवर्सिटी) ने अमेरिकी शैक्षणिक मदद से पत्रकारिता का एक प्रमुख विभाग स्थापित किया। बाद में सरकारी क्षेत्र में, खासकर संचार से जुड़े लोगों/अधिकारियों को उचित प्रशिक्षण देने के लिए 1965 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन की स्थापना की गई। जो बाद में एक पत्रकारिता संस्थान के रूप में विकसित हुयी। दिल्ली से बाहर, 1970–1990 का दशक में ओडिशा की बेरहामपुर यूनिवर्सिटी ने 1974 में अपना पत्रकारिता कार्यक्रम शुरू किया। बाद में, IIMC का विस्तार कई जगहों पर हुआ, जिनमें आइजोल, अमरावती, जम्मू और कोट्टायम शामिल हैं।
यूएनआई और पत्रकारिता
यहाँ इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि उन दिनों देश में आज की तरह पत्रकारों का सृजन करने वाला संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह नहीं पनपा था। स्वाभाविक भी हैं क्योंकि अख़बार, पत्रिका, आकाशवाणी और दूरदर्शन के अतिरिक्त कुछ नहीं था। जैसे-जैसे मीडिया के क्षेत्र में टीवी और इंटरनेट का आगमन हुआ, पत्रकारों का सृजन करने वाली संस्थाएं भी बढ़ती गयी। आज तो गली-कूचियों में पत्रकार बनने, बनाने के बोर्ड टंगे दीखते हैं। लेकिन यूएनआई के साथ सबसे बड़ी बात यह है कि यह संवाद एजेंसी अपने स्थापना काल से आज तक (पटना कार्यालय के मद्दे नजर) देश को बेहतरीन पत्रकारों को दिया है। आज भी दिल्ली के मीडिया घरानों में सैकड़ों ऐसे पत्रकार हैं जो यूएनआई से सीखकर आये हैं।

आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम से बात करते वरिष्ठ पत्रकार श्री युवराज घिमरे कहते हैं: “यूएनआई एक ऐसी संस्था थी उन दिनों जो अगर आप एक बार यूएनआई के हो गए, तो जीवन पर्यन्त यूएनआई से नाता नहीं तोड़ सकते हैं। मैं सत्तर के दशक के अंत में पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विषय के स्नातकोत्तर विभाग में प्रवेश लिया था। लिखने-पढ़ने की असीम इच्छा तो थी ही, पत्रकारिता के प्रति भी अभिरुचि भी जग गयी थी। इसी क्रम में एक दिन घूमते यूएनआई के दफ्तर में पहुंचा फ़्रेज़र रोड। उन दिनों यूएनआई पटना में मीडिया के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा ‘हब’ था। कार्यालय में न्यूनतम स्थान होने के बावजूद वहां शहर के शायद ही कोई विद्वान, विदुषी, लेखक, पत्रकार रहे होंगे जो उस दफ्तर के चौखट पर नहीं आये होंगे, कार्यालय के नीचे सड़क पर (आकाशवाणी, पटना के प्रवेश द्वार के सामने) खड़े होकर गाँव-मोहल्ला से लेकर प्रदेश, देश और अंतराष्ट्रीय मसलों पर चर्चा नहीं करते थे। लिखते थे।”
घिमरे कहते हैं: “यूएनआई के दोनों झा जी में एक अलग आकर्षण था। जब मैं पत्रकारिता के प्रति अपनी अभिरुचि बताया, तो श्री धैर्या बाबू कहे कि वे पैसे नहीं देंगे अभी, लेकिन लिखने की पूरी स्वतंत्रता होगी। एक युवक को और क्या चाहिए। स्नातकोत्तर करने के क्रम में पत्रकारिता सीखते रहा, लिखना सीखते रहा, लिखते रहा और जैसे ही परीक्षा उत्तीर्ण किया यूएनआई में सेवा शुरू कर दिया। मैं यूएनआई में करीब ढाई साल काम किया और फिर वहां से कलकत्ता से प्रकाशित और एमजे अकबर के संपादन वाले दी टेलीग्राफ ज्वाइन कर लिया। उन दिनों यूएनआई का रेपुटेशन इतना मजबूत था की सभी, चाहे राजनेता हों या अधिकारी, उसके शब्दों का, लिखने वालों का कद्र करते थे। उसी समय हेमेन्द्र नारायण और अमरेंद्र सिन्हा भी थे। बाद में हेमेंद्र इंडियन एक्सप्रेस और दी स्टेट्समैन आ गए। टेलीग्राफ के बाद मैं दिल्ली आ गया, फिर इंडियन एक्सप्रेस। यूएनआई के साथ सबसे बड़ी खासियत यह थी की अगर आप एक बात यूएनआई के हो गए तो जीवन पर्यन्त आप यूएनआई के बने रहेंगे और इसका ज्वलंत दृष्टान्त यह है कि आज हम पचास साल पहले की बात को दोहरा रहे हैं।”
उन दिनों देश के किसी भी कोने से कोई भी पत्रकार या संपादक कहानी के क्रम में बिहार आते थे तो यूएनआई आये बिना उनकी यात्रा और लेखनी पूरी नहीं होती थी। सन 1973 में आनंद बाजार पत्रिका समूह का ‘संडे’ और ‘रविवार’ पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इसके दो साल बाद लिविंग मिडिया समय द्वारा ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। टाइम्स ऑफ़ इंडिया का ‘इलूस्ट्रेटेड वीकली’, ‘करेंट’, ‘ब्लिट्ज’, ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’ आदि पत्रिकाओं में लिखने वाले लोगों के लिए यूएनआई का कार्यालय एक ‘शैक्षिक अड्डा’ था। बिना यहाँ आये, विषय पर बात किये उनकी कहानियां पूरी हो ही नहीं सकती थी। यह बात पीटीआई के साथ लागू नहीं था। देश के जाने-माने पत्रकार फ़रज़न्द अहमद (इण्डिया टुडे के वरिष्ठ संपादक, अब दिवंगत) जब तक पटना में रहे, यूएनआई के दफ्तर में एक टाइपराइटर लेकर बैठे होते थे और सभी नए-नए संवाददाताओं की लिखनी को दुरुस्त करते रहते थे। यूएनआई और फ़रज़न्द साहब एक दूसरे के पूरक थे।

पटना के सुधाकर झा, जिनके पिता यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया के दो बार अध्यक्ष थे, कहते हैं: “मैं उन दिनों पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर कर रहा था। मेरे पास खाली समय था और लिखने, पढ़ने की अभिरुचि तो थी ही। एक दिन मैं फ़्रेज़र रोड स्थित आकाशवाणी के प्रवेश द्वार पर यूएनआई के दफ्तर पहुंचा। शाम का समय था। वहां शहर से प्रकाशित अख़बारों के बड़े-बड़े पत्रकार, जिनका नाम अख़बार के पन्नों पर लिखा पढता था, भी उपस्थित थे। श्री धैर्या बाबू और श्री बी.एन. झा मुझे जानते थे। एक शिक्षक जैसा उन्होंने लिखना सिखाया। लिखने के साथ सबसे अधिक महत्व जो उनसे सीखा वह था ‘समय का महत्व’, ‘शब्दों का चयन’, ‘छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग, जो आज भी मेरे लिए उपयोगी है। दी इंडियन नेशन, दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया, नेशनल हेराल्ड अख़बारों में दशकों तक कार्य किया, देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर लिखा, यह उसी शिक्षण-प्रशिक्षण का परिणाम हैं।
सत्तर के दशक के उत्तरार्ध की बात है। उन दिनों आनंद मार्ग के संस्थापक श्री आनंदमूर्ति पटना के बांकीपुर कारावास में बंद थे। उन पर अपने शिष्यों की हत्या करने का आरोप लगाया गया था। पटना का केंद्रीय कारावास उन दिनों महरुल हक़ पथ पर था। कारा का प्रवेश द्वार आर्यावर्त और इंडियन नेशन अख़बारों के दफ्तर के ठीक सामने था, जबकि इस दीवार का अंतिम सिरा पटना रेलवे स्टेशन के सामने वाले गोलंबर के पास समाप्त होता था। इस दशक में न केवल पटना, बल्कि राष्ट्र की राजधानी दिल्ली में भी राजनीतिक तापमान सर्दी के मौसम में भी 40 डिग्री से अधिक चल रहा था। देश में आपातकाल की घोषणा हो गयी थी। उन दिनों रात में कार्य समाप्त कर यूएनआई के तत्कालीन प्रमुख घर जा रहे थे। जब कारावास के पास आये, वे लघुशंका से निवृत होने के लिए वहां खड़े हुए। वहां उपस्थित सुरक्षाकर्मी उनके साथ दुर्व्यवहार किया। इस बात की खबर न केवल अख़बारों के दफ्तर में बिजली की तरह फैली, बल्कि मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुँच गयी। अखबार के पन्ने रंगे गए। बल्कि मुख्यमंत्री कार्यालय से भी ‘क्षमा’ याचना की बात हुयी।

उसी कालखंड की एक और घटना है जब मिथिलेश स्टेडियम में ऑल इंडिया पुलिस खेलकूद प्रतियोगिता हो रहा था। इस प्रतियोगिता में सीमा सुरक्षा बल (बॉर्डर सेक्युरिटी फ़ोर्स) और बिहार मिलिट्री पुलिस का भिड़ंत फ़ाइनल में हो रहा था। इस कार्यक्रम में बीएमपी के जनसम्पर्क अधिकारी ने पटना के प्रेस प्रतिनिधि को भी आमंत्रित किया था। श्री धैर्यानन्द झा (यूएनआई) सबसे श्रेष्ठ थे। इस बीच बीएमपी के डीआईजी टीपी सिंह ने पत्रकारों को खड़ा कर परिचय पूछने लगे। इस घटना से क्षुब्ध होकर श्री धैर्या बाबू बीएमपी के जनसम्पर्क अधिकारी को कहे कि क्या टीपी पैरेड करा रहे हैं, आप लाये हैं तो परिचर आप दें। इस बात से टीपी सिंह की भाषा तनिक टेढ़ी हो गयी और उनकी भृकुटि भी तन गयी।
परिणाम यह हुआ कि पत्रकार दीर्घा में बैठे सभी लोग श्री धैर्या बाबू की अगुआई में कार्यक्रम को ‘बॉयकॉट’ कर अपने-अपने दफ्तर की और निकल गए। इस बात की खबर फिर मुख्यमंत्री कार्यालय में पहुंची। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र सभी पत्रकारों, खासकर श्री धैर्या बाबू से कहे कि आज अंतिम दिन है और बिहार का सवाल है, कृपया। इस पर श्री धैर्या बाबू का एक ही जबाब था – टीपी सिंह माफ़ी मांगे। यह पत्रकारों की ‘बेइज्जती’ है। टीपी सिंह ‘तत्काल प्रभाव से पदमुक्त किये गए और उनके फाइल पर लिखा गया कि इन्हे भविष्य में कभी फिल्ड में पदस्थापित नहीं किया जाय।’ खैर।
विगत दिनों जब दिल्ली उच्च न्यायालाय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सचिन दत्ता यूएनआई की याचिका को ख़ारिज करते L&DO/शहरी विकास मंत्रालय को यह निर्देश दिया वे यह सुनिश्चित करें कि सार्वजनिक भूमि का सशर्त आवंटन पूरी सावधानी, तत्परता और संस्थागत सख्ती के साथ लागू किया जाए, ताकि लाइसेंस की शर्तों का कोई भी उल्लंघन या पालन न होना, बहुत लंबे समय तक बिना किसी कार्रवाई के न रह जाए। मूल्यवान सार्वजनिक संपत्तियों के प्रबंधन का दायित्व संभालने वाले सार्वजनिक प्राधिकारियों को इस बात को सुनिश्चित करने के लिए सदैव सतर्क रहना चाहिए कि ऐसी भूमि का उपयोग पूरी तरह से उसी उद्देश्य के अनुसार किया जाए जिसके लिए उसे आवंटित किया गया है, और किसी भी विचलन (नियमों से हटने) की स्थिति में समय पर उचित कार्रवाई की जाए – यूएनआई के तत्कालीन अधिकारी और संवाददाता बहुत याद आ रहे थे ।
न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि वे तत्काल प्रश्नगत भूमि/संपत्ति का कब्ज़ा प्राप्त करें और यह सुनिश्चित करें कि उसका उपयोग विधि के अनुसार ही किया जाए। यह भी स्पष्ट किया कि इस न्यायालय ने प्रश्नगत संपत्ति/भूमि में PCI के अधिकारों के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की है और न ही कोई निर्णय दिया है। यह संबंधित सरकारी प्रतिवादियों का दायित्व होगा कि वे आगे उचित कदम उठाएं, और ऐसा करते समय इस अनिवार्य आवश्यकता को ध्यान में रखें कि प्रश्नगत भूमि/संपत्ति का उचित और कुशल उपयोग सुनिश्चित किया जाए। न्यायालय ने कहा कि “यह न्यायालय यह टिप्पणी करने के लिए भी बाध्य है कि L&DO को तत्परता से कार्रवाई करनी चाहिए थी, जब निर्माण के लिए निर्धारित दो वर्ष की अवधि (जैसा कि 14.12.1979 के आवंटन पत्र में परिकल्पित था) बिना किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य के ही समाप्त हो गई थी। इसके बजाय, समय-समय पर संशोधित आवंटन पत्र जारी किए जाते रहे, जिससे याचिकाकर्ता को लगातार अपने दायित्वों का पालन न करने के बावजूद, मूल्यवान सार्वजनिक भूमि पर अपना कब्ज़ा जारी रखने का अवसर मिलता रहा।”

न्यायालय ने माना कि “यूएनआई द्वारा अपनी रिट याचिका में संशोधन की मांग करने वाले आवेदन में (जो मामले में अंतिम बहस शुरू होने के काफी बाद विलंब से दायर किया गया था) उठाए गए तर्क, प्रथम दृष्टया ही भ्रामक और आधारहीन हैं। याचिकाकर्ता के लिए ‘भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882’ की धारा 60(a) और 60(b) पर निर्भर रहना (जैसा कि संशोधित रिट याचिका में करने का प्रयास किया गया है) पूरी तरह से अस्वीकार्य है; और यह तर्क देना कि एक चारदीवारी का निर्माण या किसी मूल्यह्रासित संरचना के लिए किया गया भुगतान, किसी तरह एक ‘शर्त-आधारित लाइसेंस’ को प्रमुख सार्वजनिक भूमि पर एक ‘अपरिवर्तनीय अधिकार’ में बदल देता है, सरासर गलत है।
न्यायालय ने कहा कि इस बात पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए कि सरकारी संपत्ति पर लाइसेंस कोई इनाम या खैरात नहीं है, जिसका लाइसेंसी अपनी मर्ज़ी से आनंद ले सके। ऐसी इजाज़त किसी खास सरकारी मकसद के लिए दी जाती है और यह स्वाभाविक रूप से लाइसेंसी द्वारा ली गई ज़िम्मेदारियों को पूरा करने की शर्त पर आधारित होती है। एक बार जब लाइसेंसी उन ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में नाकाम हो जाता है, तो वह कब्ज़े में बने रहने के लिए किसी भी तरह के न्यायसंगत या कानूनी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। सरकारी ज़मीन को किसी ऐसे डिफ़ॉल्ट करने वाले लाइसेंसी द्वारा बंधक नहीं बनने दिया जा सकता, जो उस मकसद को ही पूरा करने में नाकाम रहा है जिसके लिए उसे लाइसेंस दिया गया था।
निरस्तीकरण आदेश में इस बात को सही ढंग से ध्यान में रखा गया है कि याचिकाकर्ता बिल्डिंग बनाने में पूरी तरह से नाकाम रहा है और उनके तरफ से लंबे समय तक और बिना किसी स्पष्टीकरण के कोई कार्रवाई नहीं की गई है। 1999 के बाद भी, जब कंस्ट्रक्शन प्रोसेस में CPWD/NBCC की भूमिका तय की गई थी, तब भी याचिकाकार्य ने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए कोई भी सक्रिय कदम नहीं उठाया। इसके बजाय, जैसा कि कैंसलेशन लेटर में सही ढंग से बताया गया है, पिटीशनर मौजूदा बनी हुई बिल्डिंग के कमर्शियल इस्तेमाल और उसे सब-लेट करने की इजाज़त लेने में कहीं ज़्यादा सक्रिय दिखाई दिया, भले ही अलॉटमेंट की शर्तों के मुताबिक पूरी बिल्डिंग का कोई कंस्ट्रक्शन शुरू नहीं किया गया था।
ज्ञातव्य हो कि यूएनआई के मौजूदा मालिक ‘द स्टेट्समैन’ ने पुलिस की इस कार्रवाई को “भारत में मीडिया की आज़ादी पर एक अभूतपूर्व ज़्यादती और हमला” बताया। न्यूज़ एजेंसी के दफ़्तर पर चिपकाए गए एक नोटिस में लिखा था, “दिल्ली हाई कोर्ट के 20.03.2026 के फ़ैसले के अनुसार, भारत सरकार ने 20.03.2026 को 9, रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली स्थित परिसर को अपने कब्ज़े में ले लिया है। L&DO की अनुमति के बिना किसी भी व्यक्ति द्वारा उक्त परिसर में प्रवेश करना, उस पर कब्ज़ा करना या उसका उपयोग करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है और ऐसा करने पर कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी।” चेयरमैन RP गुप्ता कोलकाता में ‘द स्टेट्समैन हाउस’ को लेकर भी एक कानूनी मामले का सामना कर रहे हैं।
क्रमशः …… यूएनआई को इस स्तर तक आने में आखिर कौन है ज़िम्मेदार ?














