
अरविंदो मार्ग (नई दिल्ली) : आज ही नहीं, आने वाले कल के भी युवापीढ़ी देश के कोने-कोने में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्व और ऐतिहासिक विरासतों की दीवारों पर “आई लव यू पिंकी”, “स्वीटी लव्स जानू”, “कॉल मी एट …. ” लिखना बंद कर दें, तो इन विरासतों के रख-रखाव पर होने वाले खर्चों में न्यूनतम 20 फीसदी की कमी तो आ ही जाएगी। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अभिलाषा – विरासत सिर्फ इतिहास नहीं, यह मानवता की एक साझा चेतना भी है – उनके ही काल में पूरा हो जाता। लेकिन ‘का पर करब श्रृंगार पिया मोर आन्हर।’
पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि ‘विरासत सिर्फ़ इतिहास नहीं है। बल्कि यह मानवता की एक साझा चेतना है। जब भी हम ऐतिहासिक स्थलों को देखते हैं, तो यह हमारे मन को मौजूदा भू-राजनीतिक कारकों से ऊपर उठा देता है।’ प्रधानमंत्री ने यह भी स्वीकारा कि हमारी विरासत सिर्फ़ पत्थरों, लिपियों या खंडहरों से नहीं बनी है। यह मंदिर की दीवार की हर सरसराहट, प्राचीन किलों पर की गई हर नक्काशी और पीढ़ियों से चले आ रहे हर लोकगीत में जीवित है। यह उन कहानियों को बताती है कि हम कौन थे, हम किन मूल्यों के लिए खड़े थे और हमने कैसे विपरीत परिस्थितियों का सामना किया। विश्व विरासत दिवस एक दिल को छू लेने वाली याद दिलाता है कि ये कालातीत खजाने सिर्फ़ प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए भी हैं।
बहरहाल, नवाब शुजा-उद-दौला द्वारा अपने पिता मिर्ज़ा मुकीम अबुल मंसूर खान ‘सफदरजंग’ के सम्मानार्थ बनाए गए मकबरे के प्रवेश के साथ दाहिने हाथ दूर तक लोहे की बनी कृत्रिम सीढ़ियों के बीच कुछ मजदूर बाहरी दीवारों पर सदियों पुराने पत्थरों, ईंटों के बीच की परत को साफ़ कर रहे थे। छेनी-हथौड़े की चोट से खट-खट ध्वनि आ रही थी। और हम उसी ध्वनि के बीच से 43 वां विश्व विरासत दिवस मनाने के सप्ताह में प्रवेश कर रहे हैं। इस वर्ष ‘संघर्षों और आपदाओं के संदर्भ में जीवित विरासत के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया’ विषय को आधार मानकर आगामी 18 अप्रैल, 2026 मनाया जा रहा है।

यह कहा जा रहा है कि यह विषय उन सांस्कृतिक स्थलों और विरासत समुदायों को सुदृढ़ बनाने, उनकी रक्षा करने और उसमें लचीलापन विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देता है, जो अचानक आए संकटों और संघर्षों का सामना कर रहे हैं। आगे पचास-पचास कदम पर चारो दिशाओं से सफदरजंग मकबरे को जोड़ने वाली कभी प्रयोग में नहीं आयी सड़कों पर 550/- रूपये प्रतिदिन की दैनिक मजदूरी पर दिल्ली सल्तनत के बाहर के ‘भारतीय’ महिला-पुरुष मजदूर उपेक्षित सड़कों पर मौसम के प्रभाव से जमने वाली मिट्टी, उगने वाले घास को खुरपी, छेनी, हथौड़ा, करनी से साफ़ कर रहे थे।
विश्व विरासत दिवस की घोषणा ‘स्मारकों और स्थलों पर अंतरराष्ट्रीय परिषद’ ने ट्यूनीशिया में की थी जिसे बाद में यूनेस्को ने मंजूरी दी और सदस्य देशों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस दिवस का उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत की विविधता के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इसके संरक्षण तथा बचाव के लिए आवश्यक प्रयासों को बढ़ावा देना है।इसका मकसद मानव विरासत का उत्सव मनाना और उन समूहों को सम्मानित करना है जो इसके संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। यह सभी बातें कागजों और फाइलों पर लिखा है। पुरातत्वों और विरासतों की दीवारों पर तो कुछ और लिखा होता है। इस कहानी में उन बातों को नहीं लिखा जा सकता है। विश्वास नहीं हो तो देश के किसी भी शहर में स्थित पुरातत्वों पर भ्रमण-सम्मेलन का विश्वास अर्जित कर लें।

यह तो सर्वविदित है कि भारत, दुनिया के कुछ सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक और पुरातात्विक खजानों का घर है। खजुराहो के बारीक नक्काशी वाले मंदिरों और हम्पी के ऐतिहासिक खंडहरों से लेकर पूजनीय सोमनाथ मंदिर तक, यह देश ऐसे स्मारकों की एक विशाल श्रृंखला का दावा करता है जो इसके समृद्ध इतिहास, विविध परंपराओं और स्थापत्य कला की भव्यता को दर्शाते हैं। उत्तरी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी के दक्षिणी छोर तक फैले ये स्थल भारत के गौरवशाली अतीत और सांस्कृतिक विरासत के प्रमाण हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और मौसम के चरम पैटर्न, जैसे कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर, लू, जंगल की आग, मूसलाधार बारिश और तेज़ हवाएँ, इन अमूल्य ऐतिहासिक स्थलों को गंभीर खतरे में डाल रहे हैं। इन कारकों से होने वाला नुकसान चल और अचल, दोनों प्रकार की विरासतों के क्षरण की गति को तेज कर रहा है, जिससे भारत की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर खतरा मंडरा रहा है। इन ऐतिहासिक खजानों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि तत्काल सुरक्षा उपायों के अभाव में इनका भविष्य खतरे में बना रहेगा।

1861 में स्थापित, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण 3,698 स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा और रखरखाव के लिए जिम्मेदार है, जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। ये स्थल ‘प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904’ और ‘प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958’ के तहत संरक्षित हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण प्रागैतिहासिक शैल-आश्रयों, नवपाषाणकालीन स्थलों, महापाषाणकालीन समाधियों, शैल-उत्कीर्ण गुफाओं, स्तूपों, मंदिरों, चर्चों, मस्जिदों, मकबरों, किलों, महलों और अन्य सहित विरासत की एक विस्तृत श्रृंखला का संरक्षण करता है। ये स्थल भारत के समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को दर्शाते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपने 37 सर्कल कार्यालयों और 1 मिनी सर्कल कार्यालय के माध्यम से काम करता है, जो मुख्य रूप से राज्यों की राजधानियों में स्थित हैं; यहाँ यह संरक्षण प्रयासों और पर्यावरणीय विकास का समन्वय करता है। इसका लक्ष्य इन ऐतिहासिक स्थलों की अखंडता को आने वाली पीढ़ियों के लिए बनाए रखना है, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे अपने मूल रूप में संरक्षित रहें और भारत की विरासत को दर्शाते रहें। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत स्मारकों के संरक्षण के लिए आवंटित राजस्व में 70% की वृद्धि हुई है। वर्ष 2020-21 में, आवंटन ₹260.90 करोड़ था और व्यय ₹260.83 करोड़ था, जबकि वर्ष 2023-24 में, आवंटन और व्यय दोनों बढ़कर ₹443.53 करोड़ हो गए।

वैसे, भारत ने विश्व धरोहर सूची में अपनी उपस्थिति का लगातार विस्तार किया है। जुलाई 2024 में, असम के “मोइडाम्स: अहोम राजवंश की टीला-समाधि प्रणाली” को एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में शामिल करके एक गौरवपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अक्टूबर 2024 तक, 196 देशों में 1,223 विश्व विरासत स्थल हैं (952 सांस्कृतिक, 231 प्राकृतिक, 40 मिश्रित)। भारत के अब विश्व धरोहर सूची में 43 स्थल हो गए हैं, और 62 अन्य स्थल यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल हैं। देश की यह यात्रा 1983 में आगरा किले को सूची में शामिल करने के साथ शुरू हुई थी, जिसके बाद ताजमहल, अजंता गुफाएं और एलोरा गुफाएं भी इस सूची में शामिल हुईं। इन स्थलों को न केवल इतिहास के प्रतीकों के रूप में संरक्षित किया जाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सीखने के स्थानों के रूप में भी सहेज कर रखा जाता है।
भारत ने अपनी विशाल सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर की रक्षा, जीर्णोद्धार और उसे बढ़ावा देने के लिए कई सार्थक कदम उठाए हैं। ये पहलें देश की शाश्वत परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। साथ ही, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। सरकार ने वर्ष 1976 से 2024 के बीच विदेशों से 655 प्राचीन वस्तुएँ वापस हासिल की हैं, जिनमें से 642 प्राचीन वस्तुएँ 2014 के बाद वापस लाए गए हैं।

आंकड़ों के अनुसार देश में तकरीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। अगर औसतन भारतीयों से पूछा जाय की वे अपने ही राज्य में स्थित न्यूनतम 10 ऐतिहासिक पुरातत्व और घरोहरों का नाम बताएं, तो उम्मीद है वे पांच अथवा छठे नाम बताते-बताते दम तोड़ देंगे। वजह यह है कि उन्हें उन ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है (अपवाद छोडकर्) यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है।
उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्णाटक का है जहाँ 506 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडु का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पांचवा स्थान गुजरात (293 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); छठा स्थान मध्य प्रदेश (292 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); सातवां स्थान महाराष्ट्र (285 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर), आठवां स्थान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ 174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; आंध्र प्रदेश में 129 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हरियाणा में 91 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; ओडिसा में 79 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; बिहार में 70 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; जम्मू-कश्मीर में 56 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; असम में 55 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; छत्तीसगढ़ में 47 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; उत्तराखंड में 42 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हिमाचल प्रदेश में 40 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; पंजाब में 33 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; केरल में 27 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; गोवा में 21 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; झारखण्ड में 13 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं और अंत में दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं।
बहरहाल, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का भारतीयऐतिहासिक स्मारकों, पुरातत्वों और विरासतों के संरक्षण के बारे में क्या कहना है यह तो गहन शोध का विषय है ही, लेकिन मुगलकालीन अवध के गर्वनर मिर्ज़ा मुक़ीम अबुल मंसूर खान ‘सफदरजंग’ का मकबरा और उसका परिसर इस साल के अंत तक भव्य अवश्य दिखेगा – बशर्ते ऐतिहासिक विरासतों के रखवालों की नियत साफ़ रहे। अगर सरकारी कोष से निकली राशि का कुछ अंश खर्च कर, दीवारों को लाल-पीला कर, चुना लेप कर, शेष राशियों को मुनाफा में तब्दील करने की सोच होगी तो शायद विरासतों का हाल भी दयनीय ही रहेगा। क्योंकि मुद्दत बाद सफदरजंग मकबरा के साथ-साथ परिसर में चारो तरफ इसके रख-रखाव को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

मुहम्मद मुकीम, जिन्हें सफदरजंग के नाम से ज़्यादा जाना जाता है, अवध के दूसरे नवाब (शासनकाल: 1539-54) और मुग़ल दरबार के एक अहम व्यक्ति थे। उन्होंने मुगल दरबार में प्रधानमंत्री के तौर पर काम किया और मुग़ल शासक मुहम्मद शाह (शासनकाल: 1719-48) ने उन्हें ‘सफदरजंग’ की उपाधि दी। मुहम्मद शाह, जिन्हें रंगीला (रंगीन मिज़ाज वाला) के नाम से ज़्यादा जाना जाता था, दरबार के बजाय हरम में ज़्यादा समय बिताना पसंद करते थे। उन्हें अपना साम्राज्य सफदरजंग के हाथों में सौंपने में बहुत खुशी होती थी। रंगीला की मौत के बाद भी यह परंपरा जारी रही, क्योंकि उनके उत्तराधिकारी अहमद शाह बहादुर (शासनकाल: 1748-54) ने अपने पिता के नक्शेकदम पर ही चले। इससे सफदरजंग और भी ज़्यादा ताकतवर हो गए। 1753 में, सफदरजंग ने अपनी योजना में कुछ ज़्यादा ही दांव लगा दिया और मराठों की मदद से उन्हें मुग़ल दरबार से बाहर निकाल दिया गया। वे भागकर अवध चले गए और अपनी मौत के समय ही दिल्ली लौटे, जब उनके बेटे शुजा-उद-दौला ने अपने पिता का मकबरा दिल्ली में बनवाने की इजाज़त मांगी।

सफदरजंग का मकबरा, ऐसा माना जाता है कि हुमायूँ के मकबरे से प्रेरित है। यह मकबरा परिसर के केंद्र में स्थित है और चारों ओर से बगीचों से घिरा हुआ है। पहली नज़र में यह ताज महल का बलुआ पत्थर वाला रूप लग सकता है, लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि इस मकबरे में ताज महल जैसा अनुपात नहीं है; इसकी ऊंचाई कुछ ज़्यादा ही सीधी है और इसमें पिरामिड जैसा एहसास नहीं है, जिसकी वजह से इसका संतुलित स्वरूप कहीं खो सा गया है। विलियम डेलरिम्पल अपनी किताब, *सिटी ऑफ़ जिन्स* में लिखते हैं: “दुनिया भर का हर स्कूली बच्चा ताज के स्वरूप को जानता है, और जहाँ तक सफदरजंग के मकबरे की बात है, तो पहली नज़र में यह कुछ अलग और गलत सा लगता है: इसकी रेखाएं कहीं न कहीं दोषपूर्ण और खटकने वाली हद तक गलत लगती हैं।” वे आगे कहते हैं, “…आप इसे जितनी देर तक देखते हैं, इस मकबरे के गुण और इसका चरित्र उतने ही ज़्यादा स्पष्ट होते जाते हैं, और यह बात भी उतनी ही साफ हो जाती है कि इसका वास्तुकार सिर्फ़ ताज की नकल करने की कोशिश नहीं कर रहा था, और न ही वह इसमें नाकाम रहा।”

सफदरजंग का मकबरा एक ऊंचे चबूतरे पर बना है, जिस तक जुड़वां सीढ़ियों से पहुंचा जा सकता है। मकबरे के ऊपर एक बड़ा, गोल गुंबद बना हुआ है। इस चौकोर मकबरे के कोनों पर बहुभुजी मीनारें बनी हैं, जिनके ऊपर छतरियां लगी हैं। मकबरे का बीच वाला कमरा चौकोर आकार का है और इसमें सफदरजंग की संगमरमर से बनी एक सुंदर और नक्काशीदार कब्र है। इसके नीचे स्थित निचले कमरे (जो आम जनता के लिए खुला नहीं है) में दो कब्रें हैं; माना जाता है कि दूसरी कब्र सफदरजंग की पत्नी की है। बीच वाले कमरे के चारों ओर आठ छोटे कमरे बने हैं, जिनमें से कोनों वाले कमरे अष्टभुजी आकार के हैं। इन सभी कमरों को नक्काशीदार और रंगीन प्लास्टर के काम से सजाया गया है। आज, सफदरजंग का मकबरा रात के समय रोशनी से जगमगा उठता है, जिससे यह एक भव्य और शानदार नज़ारा पेश करता है। कहते हैं इस मकबरे को बनाने में लगभग तीन लाख रुपये खर्च हुए थे।

इस मकबरे के गुंबद के संगमरमर के काम में पिछले दो सालों में दरारें और खाली जगहें आ गई थी, जिसे बाद में संगमरमर के बीच की दरारों और खाली जगहों को भरा गया था। इस कार्य पर ₹45 लाख खर्च हुआ था। गुंबद के चारों ओर अलग-अलग हिस्सों में भी दरारें भरी गयी थी। मरम्मत के अलावा, संगमरमर को चमकाया गया था ताकि पर्यटन की दृष्टि से यह अधिक आकर्षक लग सके। चूंकि 18वीं सदी के इस मकबरे का गुंबद सफ़ेद संगमरमर से बना है, इसलिए इस कार्य के लिए कच्चा माल राजस्थान के मकराना और धौलपुर से मंगाया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक अधिकारी का कहना है कि “हमारी पूरी कोशिश होती है कि हम न केवल सफदरजंग मकबरा, बल्कि हमारे अधिक के सभी ऐतिहासिक पुरातवों और विरासतों को उनकी मूल विशेषताओं को बनाए रखकर उसे बनाए रखें। दिल्ली में खासकर ऐसे स्थानों पर उनके बगीचे सबसे अधिक आकर्षक होते हैं, यहाँ भी हैं, इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सफदरजंग मकबरा उप-सर्कल में पुरातात्विक उद्यानों के वार्षिक रखरखाव और देखभाल के लिए 29 अगस्त 2025 को (संदर्भ संख्या 15/36/2025-W (गार्डन) 4594445/- रुपये का एक ई-टेंडर निकाला गया था। आप बगीचे की स्थिति देख सकते हैं।”

विगत वर्ष 18 सितम्बर 2015 को केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा था कि देश में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकार क्षेत्र में 3685 केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारक/स्थल हैं। इन केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों और स्थलों का संरक्षण, परिरक्षण और रखरखाव एक सतत प्रक्रिया है, और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति के अधीन, आवश्यकता और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार कार्य किए जाते हैं। आवश्यकतानुसार, स्मारक/स्थल की मरम्मत, जीर्णोद्धार और संरचनात्मक स्थिरीकरण कार्यों के लिए LiDAR मैपिंग, GIS और ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण जैसे आधुनिक उपकरणों को अपनाया जाता है। ज्ञातव्य हो कि देश में केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों और स्थलों के संरक्षण पर 2020-21 में 260.83 करोड़, 2021-22 में 269.57 करोड़, 2022-23 में 391.93 करोड़, 2023-24 में 443.53 करोड़ और 2024-25 में 313.04 करोड़ खर्च हुए थे।

बहरहाल, भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना एक निरंतर और बहुआयामी प्रयास है, जिसके लिए पर्यावरणीय, कानूनी और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने हेतु सक्रिय उपायों की आवश्यकता होती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, विभिन्न एजेंसियों के सहयोग से, राष्ट्र के स्मारकीय खजानों की निगरानी, सुरक्षा और संरक्षण का कार्य जारी रखे हुए है। निरंतर समर्पण के साथ, ये प्रयास यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत का समृद्ध इतिहास आने वाली पीढ़ियों के अनुभव और सराहना के लिए सुरक्षित रहे।














