बिहार को 400000 लाख करोड़+ का ‘ऋणी’ बनाकर नीतीश दिल्ली गए; अब नेता, ठेकेदार कहने लगे ‘ठेका खोलो-ठेका खोलो’ (नीतीश के बाद बिहार-2)

नीतीश कुमार भले 'विकास पुरुष' के अलंकरण से अलंकृत हों, इन वर्षों में प्रदेश को उन्होंने आर्थिक रूप से 'दिव्यांग' बना दिया गया है। बिहार के 'विकास पुरुष' जाते-जाते प्रदेश के ऊपर लगभग 400000 लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण का बोझ छोड़कर गए हैं। तस्वीर: संजय शर्मा

पटना / नई दिल्ली : इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार में 5 अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी के बाद प्रदेश की महिलाओं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी आयी और तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और उनके सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम था। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन प्रतिबंधित कालखंड में प्रदेश में गैर-क़ानूनी ढंग से ‘देशज-विदेशज शराबों को बोतलों का जितना आयात हुआ, वह भी प्रदेश सरकार की क़ानूनी व्यवस्था को प्रश्न चिन्ह आज भी लगाए बैठा है। आज बिहार के 38 जिलों, 8406 पंचायतों, 534 ब्लॉकों और 45103 गावों एक तरफ जहाँ चिल्लम, चरस, स्मैक, ब्राउन शुगर, अफीम की भूसी जैसी मादक पदार्थों के गिरफ्त में है, वहीँ बिहार करीब चार लाख करोड़ कर्ज में डूबा है।

नीतीश कुमार भले ‘विकास पुरुष’ के अलंकरण से अलंकृत हों, इन वर्षों में प्रदेश को उन्होंने आर्थिक रूप से ‘दिव्यांग’ बना दिया गया है। बिहार के ‘विकास पुरुष’ जाते-जाते प्रदेश के ऊपर लगभग 400000 लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण का बोझ छोड़कर गए हैं। आशा है यह उनके राज्यसभा में बैठने की शुरूआती दिनों में बढ़कर करीब 4.06 करोड़ पहुँच जाएगी। प्रदेश के कोषागार पर प्रतिमाह 30000 – 35-000 हज़ार करोड़ का बोझ महज ऋणों के ब्याज पर खर्च होता है। आप प्रतिव्यक्ति आय की गणना जितना भी कर लें, विकास पुरुष प्रदेश के प्रतिव्यक्ति पर तक़रीबन 27000 रुपये का कर्ज बोझ डालकर पटना से अगले छह वर्ष के लिए दिल्ली विस्थापित हुए हैं। यह एक गहन शोध का विषय है।

आप मानें अथवा नहीं। बिहार एक जटिल वित्तीय स्थिति का सामना कर रहा है, जिसमें उच्च आर्थिक विकास के साथ-साथ नकदी की गंभीर कमी भी है। सरकारी कागज पर जहाँ 2025–26 में अर्थव्यवस्था 13.1% की दर से बढ़ी (जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है) और डीएसडीपी ₹9.9 लाख करोड़ के पार पहुँच गई है, वहीँ नकदी की गंभीर कमी के कारण सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन और पेंशन विलंबित हो रहे हैं। इतना ही नहीं, विभिन्न क्षेत्रों में जितने भी कार्य कराये गए हैं, उसमें ठेकेदारों के ₹12,000–15,000 करोड़ के भुगतान रुके पड़े हैं। अनुमान है कि सरकार को केवल वेतन और पेंशन के भुगतान के लिए हर महीने लगभग 9,000-10,000 करोड़ रुपये का इंतजाम करना पड़ता है।

आंकड़ों के आधार पर 2010-11 में वित्तीय देनदारी ₹62,858 करोड़ थी जो बढ़कर 2014-15 में ₹99,055 करोड़ हो गईं। 2021-22 (असल) में फिर बढ़कर ₹1,84,377 करोड़ हो गया। अगले वर्ष, यानी 2022-23 वर्ष में यह देनदारी की राशि ₹2,17,553 करोड़ हुआ और फिर 2023-24 में ₹3,32,740.90 करोड़ हो गया। 2024-25 वित्तीय वर्ष में संशोधित अनुमान के मुताबिक यह राशि ₹3,48,000 करोड़ हुआ। 2025-26 वित्तीय वर्ष ₹3,88,554 करोड़ देनदारी का बजट अनुमान था जो सार्वजनिक खाता और देनदारी सहित यथार्थ में बढ़कर ₹4,46,326.07 करोड़ हो गया। बिहार के मामले में इस राशि को देखकर चावार्क ऋषि का भौतिकवादी श्लोक याद आ गया – यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः – बस इतना समझ लें कि विकास पुरुष नीतीश कुमार अपने उत्तराधिकारी को एक ऐसा राज्य देकर गए हैं जो गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है।

मुख्यमंत्री बनेंगे तो कर्ज समेत बिहार का नेता बनना होगा

वित्त वर्ष 2024-25 के लिए बिहार का कुल सालाना बजट लगभग 2.78 लाख करोड़ रुपये था । वैसे राज्य सरकार कर और अन्य स्रोतों से करीब 60,000-65,000 करोड़ रुपये एकत्रित कर पाती है, लेकिन लगभग 70 फ़ीसदी हिस्सा बाहरी स्रोतों पर निर्भर करता है। राजनीतिक लाभ उठाने के लिए जिस कदर सामाजिक कल्याण योजनाओं पर सरकार खर्च करती आ रही है, मसलन , महिलाओं को आर्थिक मदद, स्कॉलरशिप, पेंशन और मुफ़्त राशन योजनाओं जैसी पहल, जो ‘उत्पादक’ नहीं है, के कारण भी हालत खास्ता हुआ है।

वैसे देश के कई शैक्षणिक और शोध संस्थाएं इस दिशा में कार्य कर रही हैं, लेकिन ऐसी आशा की जा रही है कि भारतीय जनता पार्टी सभी राज्यों में समान कानून के तहत बिहार से भी शराबबंदी समाप्त करने की दिशा में पहल करें। वैसे बिहार के प्रशासनिक व्यवस्था से नीतीश कुमार को निकलते ही प्रदेश में शराब के क्षेत्र में कार्य करने वाले ‘व्यापारी’, जिन्हे कथित रूप से ‘राजनीतिक संरक्षण’ भी प्राप्त है, शराबबंदी समाप्त करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मिलना-जुलना, ज्ञापन देने का कार्य शुरू कर दिए हैं। कहा जाता है कि प्रदेश में जितने भी शराब के देशज/विदेशज ठेके थे, अधिकांश राजनेताओं द्वारा परोक्ष रूप से नियंत्रित हैं।

इस बीच, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद दृष्टान्त हैं। वे मुख्यमंत्री को सुझाव दिए हैं कि प्रतिबंध से राजस्व का नुकसान हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी सिर्फ कागज पर है, धरातल पर नहीं। वैसे प्रदेश के राजनीतिक समीक्षक इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि अन्य भाजपा शासित प्रदेशों की तरह बिहार में तत्काल प्रभाव से शराबबंदी समाप्त किया जायेगा। अगर ऐसा होता है तो यह गलत संदेश जाएगा, साथ ही, वर्तमान सरकार में अभी भी नीतीश कुमार के जनता दल के सदस्यों की संख्या कम नहीं है। लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता है।

वैसे शराबबंदी हटाने की मांग कई बार उठाई गई है। पिछले चुनावों के दौरान, कई नेताओं और पार्टियों ने इस नीति की समीक्षा करने या इसे पूरी तरह खत्म करने का वादा किया था। सरकार भी इस बात को स्वीकार करती होगी कि प्रतिबंध को लागू करने का काम पूरी तरह से प्रभावी नहीं रहा। आलोचकों का तर्क है कि शराब के सेवन को खत्म करने के बजाय, इसने इस व्यापार को ‘अंडरग्राउंड’ धकेल दिया है। वैसे सम्राट चौधरी यह स्वीकार किया है कि शराबबंदी के कारण राज्य के राजस्व को भारी नुकसान हुआ है। दूसरी तरफ, उन्होंने इस नीति की सराहना करते हुए इसे नीतीश कुमार के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक बताया।

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नीतीश कुमार के जाते ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के कुछ दलों ने भी यह सुझाव दिया है कि अब इस नीति की समीक्षा करने का समय आ गया है। नेताओं का तर्क है कि लगभग एक दशक बीत जाने के बाद, सरकार को यह आकलन करना चाहिए कि क्या यह कानून अपने तय मकसद के अनुसार काम कर रहा है, या इसमें कुछ बदलावों की ज़रूरत है। हालाँकि, इस प्रतिबंध पर पुनर्विचार करने या इसे वापस लेने के संबंध में अभी तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक कदम आसार नहीं दिखता है, लेकिन राजनीति में कभी भी, कुछ भी हो सकता है।

जब नीतीश कुमार ने शराब की बिक्री और सेवन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया, उस समय महिलाओं ने बड़े पैमाने पर समर्थन किया, क्योंकि इसका मकसद घरेलू हिंसा को कम करना और घर की कमाई को शराब पर खर्च होने से रोकना था। इस कदम से नीतीश कुमार को अपना राजनीतिक समर्थन मजबूत करने में मदद मिली, खासकर महिला मतदाताओं के बीच। जहाँ एक तरफ इस प्रतिबंध के सामाजिक फायदे थे, वहीं इसने कुछ चुनौतियां भी खड़ी कीं। शराबबंदी के कारण राज्य में अवैध शराब के व्यापार में बढ़ोतरी हुई और बार-बार जहरीली शराब से जुड़ी त्रासदियां हुईं। साथ ही, सरकार को एक्साइज ड्यूटी से होने वाले राजस्व का भारी नुकसान हुआ। इतना ही नहीं, इस प्रक्रिया में, सरकार के सबसे अहम समर्थकों में से एक माने जाने वाले ‘महा-दलित’ (दलित समूहों में सबसे गरीब तबका) ही सरकार से दूर हो गए। यह समुदाय अपनी ज्यादातर कमाई देसी शराब बनाकर ही करता था; शराबबंदी की वजह से उनकी कमाई का एक बहुत बड़ा ज़रिया ही खत्म हो गया है।

बिहार का नुकसान उसके पड़ोसी राज्यों का फायदा बन गया है। बिहार की सीमाएँ पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल जैसे राज्यों से लगती हैं। जहाँ एक तरफ़ बिहार हर साल होने वाले 4000 करोड़ रुपये के राजस्व के नुकसान की भरपाई करने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ़ झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के आबकारी राजस्व में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली है। उदाहरण के लिए, झारखंड का राजस्व 2015-2016 में 912 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-2018 में 1600 करोड़ रुपये हो गया। पश्चिम बंगाल में तो और भी चौंकाने वाली बढ़ोतरी हुई है; 2015-2016 में 4014 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-2018 में यह 5781 करोड़ रुपये हो गया।

अब तो केंद्र सरकार पर ही भरोसा है, कर्जा चुकाने में मदद करें या कर्ज में और डूबा दे। तस्वीर: संजय शर्मा

बहरहाल, जब मोहनदास करमचंद गांधी के जन्म स्थान गुजरात में शराबबंदी के कारण राज्य के कोषागार को हो रहे राजस्व नुकसान की कमी पूर्ति के लिए राज्य सरकार वित्त आयोग के सामने हाथ फैला सकती है, तो बिहार में तो मोहनदास करम चंद गाँधी को ‘महात्मा की उपाधि’ मिली थी, यहाँ इस दिशा में कुछ विशेष पहल होने चाहिए ताकि प्रदेश आर्थिक रूप से स्वस्थ रहे। क्योंकि प्रदेश स्वस्थ रहेगा तभी तो मतदाता और महिलाएं भी स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगी। इस वर्ष की शुरुआत में भारतीय जनता पार्टी अब तक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, असम, हरियाणा, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, गोवा, मणिपुर और त्रिपुरा में स्वयं अथवा गठबंधन में सरकार का नेतृत्व कर रही हैं। गुजरात छोड़कर, किसी भी राज्यों में शराब बंदी नहीं है।

विशेषज्ञ का कहना है कि ‘हम यह नहीं कहते कि बिहार में शराबबंदी जारी रहेगा। अभी भाजपा की पूरी निगाह स्वयं को मजबूत करने के साथ-साथ अकेले सरकार बनाने पर ध्यान केंद्रित है। नीतीश कुमार के जाने के बाद, प्रदेश में राजनीतिक समीकरण में बदलाव आना स्वाभाविक है। आज जनता दल यूनाइटेड में कई (दो-तीन दर्जन भी मान सकते हैं) विधायक और सांसद ऐसे हैं जो ‘समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं’, झंडा बदलने के लिए। आप जिन्हें नीतीश कुमार का अनुयायी आप मान रहे हैं, कल कई लोगों को साथ लेकर भाजपा के अनुयायी हो सकते हैं। जनता दल में भी भाजपा के लोग बैठे हैं। राजनीति और सत्ता में शराब से भी अधिक तेजी से नशा चढ़ता है और अभी नशा चढ़ने का वक्त है। राजनेता, विधायक, सांसद भले नीतीश कुमार को सांत्वना दें कि वे उनके सपने को साकार करेंगे; हकीकत यह है कि सभी का अपना-अपना सपना है और वे अपने सपने को साकार करने में कोई कसार नहीं छोड़ेंगे।’

हम चले, अब कर्जा चुकाते रहिये

2025 के इंडस्ट्री अनुमानों के अनुसार, भारत में लगभग 80,000 लाइसेंस्ड शराब की दुकानें हैं। आबादी के हिसाब से रिटेल सेक्टर में अभी भी कम पहुंच मानी जाती है, जहाँ हर 1 लाख ग्राहकों पर लगभग 5.2 दुकानें हैं। सबसे ज़्यादा दुकानों वाले राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में है। देश में राज्य सरकारें शराब से भारी राजस्व कमाती है जो लगभग ₹30,000–₹40,000 करोड़ के आसपास होती है।

पहले दिल्ली की बात। दिल्ली की वर्तमान आबादी 32,941,000 में शराब पीने वालों की संख्या उम्मीद से अधिक है। यह बात भी अलग है कि सरकार शराब की बोतलों पर अंग्रेजी में, हिंदी में, पंजाबी में, उर्दू में, चाहे जिस भाषा में लिखकर चिपकाती रहे – शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। दिल्ली सल्तनत में कुल 573+12 = 585 शराब के ठेके हैं। कुछ ठेके/दुकानें दिल्ली के मॉलों में भी स्थित है। शराब की बिक्री से दिल्ली सरकार की कमाई 2025-26 वित्त वर्ष की पहली छमाही में एक्साइज रेवेन्यू लगभग ₹4,192.86 करोड़ तक पहुँच गयी, जो कि 2023-24 वित्त वर्ष में लगभग ₹5,164 करोड़ था।

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जबकि, बिहार में शराब पर पूरी तरह से रोक लगने से पहले राज्य में लगभग 6,000 शराब की दुकानें (जिनमें भारतीय-निर्मित विदेशी शराब और देसी शराब की दुकानें शामिल थीं) चल रही थीं। 2006 और 2013 के बीच, लाइसेंसी दुकानों की संख्या 3,436 से बढ़कर 5,467 हो गई, जिससे आबकारी राजस्व में काफ़ी बढ़ोतरी हुई। शराबबंदी के बाद दुकानें तो बंद हुई है, शराब के कारोबार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काम करने वाले लगभग 25,000 से 35,000 लोगों पर इसका असर पड़ा।

बहरहाल, 27 अक्टूबर, 2024 को गुजरात सरकार ने 16वें वित्त आयोग से राज्य की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने का अनुरोध किया था। साथ ही, राज्य के अधिकारियों ने शराबबंदी नीति के कारण हुए भारी राजस्व नुकसान को उजागर किया था, जिसके कारण उत्पाद शुल्क संग्रह में काफी कमी आई है। गुजरात सरकार ने राज्य के लिए आवंटित होने वाले फंड में काफी बढ़ोतरी की मांग भी की थी। वजह था उत्पाद शुल्क राजस्व में लगभग 12,000 करोड़ रुपये के सालाना नुकसान होता है। तदर्थ शराबबंदी के कारण हुई राजस्व की कमी की भरपाई के लिए वित्त आयोग से अधिक फंड हासिल किया जाए।

कुर्सी की हालत इससे बेहतर नहीं है। तस्वीर: संजय शर्मा

बिहार सरकार भी, शराब बंदी के कारण राज्य के खजाने को होने वाले राजस्व घाटे की बार वित्त आयोग के सामने अनेकों बार उठाया और मुआवजे की मांग की। बिहार सरकार के अनुसार, शराबबंदी पूर्णरूपेण लागू होने के बाद प्रदेश को आबकारी शुल्क से होने वाली लगभग 3000 से 4000 करोड़ की वार्षिक आय बंद हो गयी। बिहार सरकार ने बार-बार यह तर्क दिया कि सामाजिक सुधार/महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए शराबबंदी लागू की गयी, जिससे राजस्व में कमी आयी। साथ ही, केंद्र सरकार और वित्त आयोग से विशेष सहायत की मांग की। इन वर्षों में एक अनुमान के मुताबिक बिहार को करीब 30000 से 40000 करोड़ राजस्व का नुकसान हुआ है।

शराबबंदी का एक और बुरा नतीजा यह निकला कि लोग शराब छोड़कर नशीले पदार्थों (ड्रग्स) के आदी होने लगे। जहाँ एक तरफ़ सारा ध्यान शराब पर ही केंद्रित था—और अब भी है—वहीं दूसरी तरफ़ नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता पर किसी का ध्यान नहीं गया और नशे के आदी लोगों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। 2017 में तीन डॉक्टरों की एक टीम ने एक पायलट स्टडी की थी, जिसमें पाया गया कि बैन के बाद 25% से ज़्यादा पक्के शराबी ताड़ी, गांजा (मारिजुआना), चरस जैसी चीज़ों की तरफ मुड़ गए। नशीली दवाओं के बढ़ते चलन और फैलाव को समझने का नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो से बेहतर कोई तरीका नहीं है।

इतना ही नहीं, बिहार में अधिकारियों द्वारा जब्त की गई नशीली दवाओं में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जो शराब से नशीली दवाओं के गलत इस्तेमाल की तरफ़ बदलाव का संकेत है। गांजे की ज़ब्ती में 2700 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है; 2015 में यह 14 किलो था, जो 2016 में बढ़कर 10,800 किलो और 2021 में 27,395 किलो हो गया। हशीश की बरामदगी भी 2015 में 0 किलो से बढ़कर 2016 में 115 किलो और 2021 में 363 किलो हो गई। शराब के साथ-साथ बिहार में तंबाकू का इस्तेमाल भी काफ़ी ज्यादा है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, जहां पूरे देश में औसतन 38 प्रतिशत पुरुष तंबाकू का सेवन करते हैं, वहीं बिहार में यह आंकड़ा 49 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में यह 44 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 46 प्रतिशत, राजस्थान में 42 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 34 प्रतिशत है। आंकड़ों से पता चलता है कि तंबाकू के व्यापक इस्तेमाल के कारण बिहार में टीबी (तपेदिक) के मामले काफ़ी ज़्यादा हैं। जहां पूरे देश में हर एक लाख की आबादी पर 229 लोग टीबी से पीड़ित हैं, वहीं बिहार में यह आंकड़ा 450 है। NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार, केवल कम आबादी वाले राज्यों में ही टीबी का बोझ बिहार से ज़्यादा है।

कुल समय पहले एक टेलीविजन के आर्थिक पत्रकार मयंक मिश्रा ने कहा था कि भारत में हर पांच में से लगभग एक पुरुष शराब पीता है। शराब-मुक्त राज्य बिहार में, यह हिस्सा थोड़ा कम है, लेकिन उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तुलना में ज़्यादा है। हालांकि, बिहार के विपरीत, इन तीनों राज्यों में शराब की बिक्री और सेवन पर कोई रोक नहीं है। नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, तेलंगाना, अरुणाचल प्रदेश, असम के कुछ हिस्सों, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के पुरुषों में शराब का सेवन व्यापक रूप से प्रचलित है। इन राज्यों में, यह दर 40 प्रतिशत या उससे अधिक है। हालांकि, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों में, शराब पीने वाली आबादी का अनुपात राष्ट्रीय औसत के बराबर या उससे कम है।

बिहार में, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के 15 प्रतिशत से अधिक पुरुषों के शराब का सेवन करने का अनुमान है, जबकि राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के लिए ये आँकड़े क्रमशः 11 प्रतिशत, 13.9 प्रतिशत और 14.5 प्रतिशत हैं। बिहार में, 2016 में शराबबंदी लागू हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार, अक्टूबर 2021 तक, बिहार निषेध और आबकारी कानून के तहत लगभग 3.5 लाख मामले दर्ज किए गए और चार लाख से अधिक गिरफ्तारियां की गईं। बताया जाता है कि शराबबंदी के कारण राज्य को हर साल राजस्व में 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। आँकड़े दिखाते हैं कि कड़े उपायों के बावजूद, बिहार में शराब का सेवन अभी भी ज़्यादा है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, गुजरात में, जो एक और शराब-मुक्त राज्य है, छह प्रतिशत से भी कम पुरुष शराब पीते हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह ही, बिहार के ग्रामीण इलाकों में भी शराब का सेवन ज्यादा है। और महिलाओं में इसका प्रचलन कम है।

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पूरे देश के लिए, पिछले 15 वर्षों में शराब के सेवन का रुझान यह दिखाता है कि अब इसका प्रचलन कम हो गया है। उदाहरण के लिए, 2005-06 में, 35-49 आयु वर्ग के हर दस में से चार पुरुष (39 प्रतिशत) शराब का सेवन करते थे। यह 2015-16 में घटकर 36.8 प्रतिशत हो गया और 2019-21 में और घटकर 27.4 प्रतिशत रह गया। बिहार में भी 2005-06 से शराब की खपत में कमी का ऐसा ही रुझान देखने को मिला है। 15-49 आयु वर्ग के पुरुषों में शराब की खपत में कमी 2005-06 से 2015-16 के बीच लगभग 17 प्रतिशत और उसके बाद के पाँच वर्षों में 41 प्रतिशत रही। पूरे देश के लिए यह कमी क्रमशः 8.5 प्रतिशत और 23 प्रतिशत थी। इससे पता चलता है कि शराबबंदी लागू होने से पहले भी बिहार में शराब की खपत तेज़ी से घट रही थी।

जिंदल स्कूल ऑफ़ गवर्नमेंट एंड पब्लिक पॉलिसी की शोधकर्ता आयुश्री खेत्री के अनुसार, 1 अप्रैल 2016 को बिहार सरकार ने राज्य के इलाके में शराब और नशीले पदार्थों के बनाने, बेचने, जमा करने और इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी। यह घोषणा सरकार की अपनी 2005 की आबकारी नीति से बिल्कुल अलग थी। 2005 वह साल था जब राज्य का बजट सिर्फ़ 27,000 करोड़ रुपये था और आमदनी के साधन भी बहुत कम थे। उस समय सरकार का हाल यह था कि पंचायतों में दुकानों की संख्या बढ़ाकर शराब की बिक्री बढ़ाई जाए। इस पहल की वजह से दुकानों की संख्या 2006-07 में 3,436 से बढ़कर 2012-13 में 5,467 हो गई, और गाँवों में 200 प्रतिशत से भी ज़्यादा की बढ़ोतरी देखी गई। यह राज्य के बजट के लिए एक वरदान साबित हुआ, क्योंकि आबकारी से होने वाली आमदनी 2006 में 500 करोड़ रुपये से बढ़कर 2015 में 6,000 करोड़ रुपये हो गई।

पानी में डुबोकर रोटी खाने को मजबूर हो गया हूँ नीतीश बाबू प्रदेश को इतना कर्ज में डुबो दिए। तस्वीर: संजय शर्मा

आमदनी में यह तेज़ी से हुई बढ़ोतरी ज़्यादा समय तक नहीं रही, क्योंकि बिहार में नए चुनावों के साथ ही सोच में भी बदलाव आ गया। बिहार में अब एक नया कानून लागू किया जाना था, जो ‘राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों’ और गांधीवादी विचारों के सिद्धांतों पर आधारित था, और इसका नाम ‘बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम’ रखा गया। इस कानून में सज़ा के बहुत कड़े प्रावधान थे, जैसे कि पूरे समुदाय पर जुर्माना लगाना और अगर परिवार का कोई एक सदस्य शराब पीते हुए पकड़ा जाता है, तो पूरे परिवार को गिरफ़्तार कर लेना। तब से इस कानून में तीन बार बदलाव किए जा चुके हैं, और अब पहली बार अपराध करने वालों को 2,000 से 5,000 रुपये का जुर्माना देकर छोड़ा जा सकता है।

2016 से लेकर अब तक, इस कानून को सख्ती से लागू करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, और विधानसभा में हुई चर्चाओं से इसकी कमियाँ भी सामने आई हैं। कानूनों में लगातार होने वाले बदलाव और मेरे हिसाब से उनका ज़्यादा से ज़्यादा नरम होते जाना, मौजूदा समर्थित विचारधारा से ‘यू-टर्न’ लेने का एक और तरीका है, जैसा कि 2005 से साफ तौर पर देखा जा सकता है। गठबंधन में अनिश्चितता और राजनीतिक उथल-पुथल इस बात की ओर इशारा कर सकती है कि यह चुनाव जीतने के लिए उठाया गया एक पूरी तरह से राजनीतिक कदम हो सकता है। विचारधाराओं में इस बदलाव की जांच हम अकेले में नहीं कर सकते। 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव JDU के लिए दोबारा चुने जाने के लिहाज़ से एक मुश्किल साल था। जहाँ RJD और BJP ने वोटों के लिए जाति समूहों पर भरोसा किया, वहीं JDU ने, जिसके पीछे कोई खास जाति नहीं थी, महिला मतदाताओं पर भरोसा करने का फैसला किया।

शुरुआत में, शराबबंदी को दो चरणों में लागू किया जाना था—शराबबंदी का पहला चरण ग्रामीण इलाकों में शराब की सभी दुकानों को बंद करने पर केंद्रित था, और दूसरा चरण वह था जिसमें वे पहले चरण के पूरा होने के छह महीने के भीतर इसे पूरे राज्य में लागू कर देते। लेकिन यह चरणबद्ध और सोच-समझकर बनाया गया प्लान तब तेज़ी से खत्म हो गया, जब राज्य की महिलाओं ने इस फैसले का स्वागत किया; दूसरा चरण तय समय से पहले ही लागू कर दिया गया। लागू करने की प्रक्रिया को दो चरणों में बाँटने से लागू करने वाली संस्था को दी गई नीति का मूल्यांकन करने और उसमें सुधार करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह एक जल्दबाजी में लिया गया फैसला था या फिर दूरदर्शिता की कमी का नतीजा।

अब बात करते हैं एक्साइज और टैक्स की; शराब से मिलने वाला टैक्स हमेशा से ही राज्य की अर्थव्यवस्था को बनाए रखने का एक मुख्य ज़रिया रहा है। असल में, ज़रूरत के समय, जब अर्थव्यवस्था में मंदी आती है, तो राज्य इसी शराब का सहारा लेते हैं। लेकिन शराबबंदी के फैसले से बिहार का पहले से ही छोटा खज़ाना खतरे में पड़ गया। साल 2015-16 में इसका एक्साइज़ राजस्व 3,142 करोड़ रुपये था। अगले ही साल, यह गिरकर 46 करोड़ रुपये रह गया। और, 2017-18 में तो यह बिल्कुल शून्य हो गया।

क्रमशः……

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