आज रात 8.30 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी​ ‘संभवतः’ राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे, यह पिछले 12 साल में ’13 वां’ संबोधन होगा 

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - तस्वीर: संजय शर्मा

नई दिल्ली, 18 अप्रैल​:​ संसद में महिला आरक्षण अधिनियम से संबंधित ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’ पास नहीं होने के कारण ​संभवतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ​आज रात 8:30 बजे राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं। यह संबोधन ऐसे समय में हो रहा है जब सरकार को एक बड़ा विधायी झटका लगा है और भू-राजनीतिक चिंताएं बढ़ रही हैं। इस बहुप्रतीक्षित प्रसारण को सरकार के राजनीतिक और नीतिगत संदेश के लिए एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।​ संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 विधेयक लंबे समय से चर्चा में रहे ‘महिला आरक्षण’ के ढांचे से जुड़ा था, लेकिन इसे लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका।

प्रधानमंत्री द्वारा यह संभावित सम्बोधन पिछले 12 वर्षों (2014-2026) में लगभग तेरहवां संबोधन होगा। 8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक टेलीविज़न संबोधन में घोषणा की कि आधी रात से ₹500 और ₹1,000 के नोट अब वैध मुद्रा नहीं रहेंगे; इसका उद्देश्य काले धन, भ्रष्टाचार और जाली मुद्रा पर लगाम लगाना था। नोटबंदी को घोषणा के बाद 31 दिसंबर 2016 को नए साल की पूर्व संध्या पर नरेंद्र मोदी राष्ट्र को संबोधित किये थे। 27 मार्च 2019 को एंटी-सैटेलाइट मिसाइल टेस्ट के अवसर पर, फिर 8 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A का निष्प्रभावी होने के बाद, मार्च-मई 2020 में जनता कर्फ्यू (19 मार्च), लॉकडाउन (24 मार्च, 3 अप्रैल) और आत्मनिर्भर भारत अभियान (12 मई) की घोषणाएं किये थे।

इस विधेयक में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव था। इसके साथ ही, इसमें एक ‘परिसीमन’ प्रक्रिया का भी प्रावधान था, जिससे लोकसभा (निचले सदन) की सदस्य संख्या बढ़कर 816 हो जाती। हालांकि, एक तीखी और ध्रुवीकृत बहस के बाद यह विधेयक पारित नहीं हो सका, क्योंकि विपक्षी दलों ने इसे अपना समर्थन नहीं दिया।​ हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय ने आधिकारिक तौर पर इस संबोधन का एजेंडा स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि प्रधानमंत्री अपने भाषण में इस अटके हुए विधेयक, महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े व्यापक सवालों और भविष्य के लिए सरकार के ‘रोडमैप’ पर बात कर सकते हैं।

यह घटना एक दुर्लभ उदाहरण है, जिसमें एक उच्च-स्तरीय संवैधानिक संशोधन अपने अंतिम चरण में आकर विफल हो गया। यह घटना सत्ताधारी गठबंधन और विपक्षी दलों के बीच बढ़ती हुई गहरी दरारों को भी उजागर करती है।​ सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया कि मोदी इस मंच का उपयोग सीधे जनता से अपील करने के लिए कर सकते हैं। वे इस विधेयक को ‘लैंगिक समानता’ की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं, जिसे ‘राजनीतिक स्वार्थों’ के चलते बाधित किया गया।

हालांकि, इस विधेयक को ‘परिसीमन’ प्रक्रिया से जोड़ने का मुद्दा एक विवाद का विषय बन गया। विपक्षी दलों ने तर्क दिया कि इस तरह की क्रमबद्धता के कारण विधेयक के कार्यान्वयन में देरी हो सकती है, और इससे विभिन्न राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन भी बिगड़ सकता है। बिल के पास न हो पाने से जो राजनीतिक असर पड़ा है, उसके प्रधानमंत्री के भाषण में हावी रहने की उम्मीद है, खासकर तब जब सरकार आने वाले चुनावों से पहले अपनी बात को मज़बूती से रखना चाहती है। जानकारों का कहना है कि यह भाषण सरकार के सुधार एजेंडे का बचाव करने और लोगों की सोच को बदलने की एक सोची-समझी कोशिश, दोनों का काम कर सकता है। संसदीय मामलों के जानकार एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, “ऐसे हालात में देश के नाम संबोधन शायद ही कभी सामान्य होता है—इसका मकसद अक्सर अपनी बात को नए सिरे से रखना और लोगों का समर्थन जुटाना होता है।”

ये भी पढ़े   नरेंद्र मोदी ने 'घर-ही-घर' और नितिन गडकरी मजबूत सड़क की व्यवस्था कर दिए, 10 लाख करोड़ का बजट, 2029 आम चुनाव तक पूरा हो जायेगा - अब क्या चाहिए

इस संबोधन को और भी ज़्यादा ज़रूरी बनाने वाली बात संसद के बाहर हो रहे घटनाक्रम हैं। दिन की शुरुआत में, मोदी ने सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति और आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति की बैठकें कीं, जहाँ कथित तौर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और भारत की ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर इसके संभावित असर पर चर्चा हुई। वैश्विक बाज़ारों में उतार-चढ़ाव के संकेत दिख रहे हैं, ऐसे में प्रधानमंत्री इस संबोधन का इस्तेमाल नागरिकों को यह भरोसा दिलाने के लिए भी कर सकते हैं कि सरकार बाहरी झटकों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।

घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल और अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितता के मेल ने इस भाषण को लेकर उत्सुकता और बढ़ा दी है, और सरकार के अगले कदमों के संकेतों का इंतज़ार उसके समर्थक और आलोचक, दोनों ही कर रहे हैं। यह देखना होगा कि क्या यह संबोधन आम सहमति बनाने के मकसद से सुलह का रास्ता अपनाता है, या विपक्ष के खिलाफ ज़्यादा आक्रामक रुख अपनाता है; आने वाले हफ़्तों में देश की राजनीतिक चर्चा का रुख इसी बात से तय हो सकता है।

​ज्ञातव्य हो कि कल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों पर महिला आरक्षण का विरोध करने का आरोप लगाते हुए लोकसभा में कहा कि देश की महिलाएं देख रही हैं कि उनके ‘‘रास्ते का रोड़ा’’ कौन है और विपक्ष के नेताओं को चुनाव में महिलाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। शाह ने महिला आरक्षण अधिनियम से संबंधित ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’, ‘परिसीमन विधेयक, 2026’ और ‘संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026’ पर सदन में चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि जो लोग परिसीमन का विरोध कर रहे हैं, वे कहीं न कहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) के लिए आरक्षित सीटों में बढ़ोतरी का विरोध कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के सभी सदस्यों ने ‘‘अगर-मगर, किंतु-परंतु का उपयोग करके स्पष्ट रूप से महिला आरक्षण का विरोध किया है। यह दिखाने का प्रयास किया गया कि विरोध हमारे क्रियान्वयन के तरीके पर है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह विरोध क्रियान्वयन का नहीं, बल्कि केवल महिला आरक्षण का विरोध है।’’​ नरेन्द्र मोदी सरकार महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देकर रहेगी। उन्होंने कहा कि सरकार और प्रधानमंत्री मोदी का उद्देश्य महिला सशक्तीकरण करने वाले इस संविधान सुधार को समयबद्ध तरीके से लागू करके 2029 का चुनाव महिला आरक्षण के साथ करने का है।

ये भी पढ़े   ​वर्षाकालीन सत्र आज से: राजनीतिक दलों के बीच सौहार्द और परस्पर सम्मान का आह्वान

शाह ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि अगर ये (विपक्ष) वोट नहीं देंगे तो संविधान संशोधन विधेयक सदन में गिर जाएगा, लेकिन विपक्षी दलों के नेताओं को चुनाव में महिलाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। चुनाव में वे जब जाएंगे तब मातृशक्ति हिसाब मांगेगी।’’​ शाह के जवाब के बाद, मत विभाजन में महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’ गिर गया। इसके पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े।​ लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है।​ संविधान संशोधन विधेयक गिरने के बाद इससे संबंधित दोनों विधेयकों परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को आगे नहीं बढ़ाया जा सका।

इससे पहले, शाह ने अपने जवाब में कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए भी विधायिका में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण को बार-बार रोका और अब विपक्ष में रहते हुए भी इसे रोक रही है।​ उन्होंने कहा, ‘‘2023 में प्रधानमंत्री मोदी जानबूझकर महिला आरक्षण विधेयक लाए क्योंकि 2024 का चुनाव था और उन्हें पता था कि कांग्रेस विरोध नहीं कर पाएगी। तब पहली बार इसे सर्वसम्मति से पारित किया गया। हमें लगता था कि तब हो गया तो अब भी पारित हो जाएगा, लेकिन ये (विपक्ष) ‘किंतु-परंतु, अगर-मगर’ करके पांचवीं बार फिर विरोध कर रहे हैं।’’

उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी के सभी कामों का विरोध करने की ठान रखी है और उसने अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का, राम मंदिर (निर्माण) का, तीन तलाक को समाप्त करने का, जीएसटी का विरोध किया। उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस ने नये संसद भवन का, सहकारिता मंत्रालय का विरोध किया, सर्जिकल स्ट्राइक का, एयर स्ट्राइक का और ऑपरेशन सिंदूर तक का विरोध किया।’’​ शाह ने कहा कि महिला आरक्षण से कांग्रेस के पीछे हटने का कारण यह है कि वह इसका श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को नहीं देना चाहती।

​सन्नाटा विजय चौक पर – तस्वीर: संजय शर्मा

गृह मंत्री ने कहा कि इन विधेयकों का उद्देश्य संविधान की ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य (वैल्यू)’ की भावना को लागू करना भी है।​ उन्होंने कहा कि देश में 127 से अधिक लोकसभा क्षेत्र 20 लाख से अधिक मतदाताओं वाले हैं, और कुछ सीटों पर 28 लाख से 48 लाख तक मतदाता हैं, ऐसे में जन प्रतिनिधि के रूप में सांसद कैसे अच्छी तरह जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकते हैं।​ उन्होंने कहा कि इसे देखते हुए संविधान में समय-समय परिसीमन का प्रावधान किया गया है और उसी से एससी, एसटी की सीटें भी बढ़ने का प्रावधान है।​ उन्होंने कहा, ‘‘इस तरह परिसीमन का विरोध करने वाले एक तरह से एससी-एसटी सीटें बढ़ने का विरोध कर रहे हैं।’’

उन्होंने 2026 में संविधान संशोधन विधेयक लाने के विपक्ष के सवालों पर कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) में जिक्र है कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के बाद जो परिसीमन होगा, उसमें महिला आरक्षण सुनिश्चित करेंगे।​ शाह ने कहा कि 1976 में कांग्रेस की सरकार के समय से 2026 तक, 50 वर्षों तक देश में लोकसभा सीटों की संख्या ‘फ्रीज’ थी और जनता को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिला। उन्होंने कहा, ‘‘2026 में यह सीमा समाप्त हो गई। अब परिसीमन करते हैं तो 2029 से पहले समाप्त नहीं हो सकता। इसलिए 2029 का चुनाव नारी शक्ति वंदन अधिनियम की भावना से करना चाहते हैं और आधी आबादी को 33 प्रतिशत आरक्षण देना चाहते हैं तो इसे अभी लाना होगा।’’​ उन्होंने कहा कि 140 करोड़ जनता के मन में किसी तरह की भ्रांति, भ्रम नहीं हो, इसलिए ‘‘मैं फिर से स्पष्ट करना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री मोदी की कैबिनेट ने जाति जनगणना का जो निर्णय लिया है वह 2026 की जनगणना के साथ कराने का है।’’

ये भी पढ़े   काशी सिर्फ़ एक नगर नहीं है - यह एक जीवंत आत्मा है

शाह ने 2011 की जनगणना के अनुसार परिसीमन के साथ महिला आरक्षण लागू होने से दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय होने के विपक्ष के दावों को खारिज करते हुए दोहराया कि दक्षिणी राज्यों का इस सदन पर उतना ही अधिकार है जितना उत्तर के राज्यों का।​ उन्होंने कहा, ‘‘हम उत्तर-दक्षिण का भेद नहीं होने देंगे।’’​ गृह मंत्री ने विपक्षी नेताओं को आड़े हाथ लेते हुए कहा, ‘‘आप ऐसी धारणा पैदा करके लोकप्रिय नहीं हो पाओगे, बाल सफेद हो जाएंगे लेकिन यहां (सत्तापक्ष में) नहीं बैठ पाओगे।’’

शाह ने कहा कि दक्षिणी राज्यों — कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और केरल की इस समय लोकसभा में 129 सीटें हैं जिनका (वर्तमान में) कुल 543 सीटों में प्रतिशत 23.76 है। उन्होंने कहा कि सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि के साथ इन पांचों राज्यों में सीटें 195 हो जाएंगी जो कुल 816 सीटों में 23.87 प्रतिशत होंगी।​ उन्होंने यह भी कहा कि यदि विधेयक में सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ाने का लिखित उल्लेख नहीं होने के कारण विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं तो एक घंटे का समय दें, वह इस बारे में तत्काल संशोधन ले आएंगे।​ शाह ने महिला आरक्षण में मुस्लिम आरक्षण की समाजवादी पार्टी की मांग पर कहा कि संविधान के तहत धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता।

उन्होंने ओबीसी महिलाओं के आरक्षण की मांग के संबंध में कहा कि जाति जनगणना के बाद रिपोर्ट आएगी और उस पर इस सदन में विचार करने के बाद जो भी सामूहिक मत बनेगा, उस बारे में आगे बढ़ा जा सकता है।​ शाह ने कांग्रेस पर लंबे अरसे तक ओबीसी का आरक्षण रोकने का आरोप लगाया।​ उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस ने बार-बार ओबीसी आरक्षण को रोका और अब, जब वे चुनाव हारते जा रहे हैं तो ओबीसी के हितैषी बनने आए हैं। कांग्रेस ने अब तक एक भी ओबीसी प्रधानमंत्री नहीं दिया, वहीं भाजपा ने अति पिछड़े समाज के मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाया।’’

शाह ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर सदन में प्रधानमंत्री के लिए असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए कहा, ‘‘विपक्ष के नेता का व्यवहार किस प्रकार का है। उनकी भाषा किस प्रकार की है, देश भी सुन रहा है। आप अपने वरिष्ठों से सीख लें, नहीं तो अपनी बहन प्रियंका जी से सीख लें कि सदन में कैसे बोलते हैं।’’
​—————

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here