पत्रकार, गैर-पत्रकार बिलखते रहे, दरभंगा राज की ‘गरिमा’ को बचाने का ‘तथाकथित दावा’ करने वाले महाराजा द्वारा स्थापित ‘यूएनआई’ को बचाने के लिए ​कभी ​आगे नहीं आये

तस्वीर: संजय शर्मा

पटना / नई दिल्ली: अपने स्थापना के 65वें वर्ष में भारत का एक विश्वसनीय समाचार एजेंसी – यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया – को बेघर इसलिए होना पड़ा कि उसके स्थापना काल के 27-शेयरधारकों ने इस संस्थान को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए शायद दशकों पहले ही मन बना चुके थे। संतानहीन दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ.सर कामेश्वर सिंह और उनका ‘दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड’ का यूएनआई के स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान था, की मृत्यु के बाद उनके परिवार के लोगों ने भी, एक महत्वपूर्ण शेयर होल्डर होने के वावजूद, पत्रकारिता के इस मंदिर को बचाने, दरभंगा राज की गरिमा को बरक़रार रखने के लिए एक भी कदम आगे नहीं बढ़ाये, जिसकी उम्मीद यहाँ के पत्रकार और गैर-पत्रकार किये थे। 

अगर ऐसा नहीं होता तो यूएनआई के स्थापना के 18 वर्ष बाद, तत्कालीन सरकार द्वारा आवंटित भूखंड – 9, रफ़ी मार्ग – पर एक आलीशान भवन बन गया होता। आज देश से प्रकाशित समाचार पत्र और पत्रिकाओं के मालिक/संपादक यूएनआई की सेवा (सब्सक्रिप्शन) लेते होते। आज यूएनआई जैसी पत्रकारिता से सम्बंधित विश्वसनीय संस्था को जीवन के इस वृद्धावस्था में बेघर नहीं होना होता। आज दशकों कार्य किये पत्रकार, गैर पत्रकारों को जीवन के अंतिम वसंत में रोजी-रोटी की तलाश में ‘अग्निपथ’ पर नहीं चलना होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यूएनआई की स्थापना की गई थी, आज संसद मार्ग से तत्कालीन योजना भवन से मुड़ती सड़क के सामने 9-रफ़ी मार्ग की मिट्टी भी बिलख रही है – स्थापना काल के शेयरधारकों ने छल कर दिया।
 
यह कहा जाता है कि औसतन यूएनआई के स्थापना काल में वे ही शेयर धारक बने तो पहले से ही एक दूसरे समाचार एजेंसी के भी शेयर धारक थे। यह भी कहा जाता है कि उस समाचार एजेंसी में नियमों/शर्तों में यह बात उद्धृत किया गया था कि ‘जो भी शेयरधारक हैं, उन्हें एजेंसी का सब्सक्रिप्शन लेना बाध्यकारी होगा।’ यह शर्त यूएनआई के स्थापना काल में लोगों ने नहीं रखा। शायद यही कारण है कि स्थापना और सेवा शुरुआत के कुछ वर्षों के बाद ही शेयर धारकों ने न केवल अपनी भागीदारी यूएनआई के प्रति, उनके कार्य कलाप के प्रति, आमदनी-खर्च के प्रति अपनी जबाबदेही से हाथ धोने लगे, बल्कि समाचार, लेख और एजेंसी द्वारा प्रदत्त सभी सुविधाओं के सब्सक्रिप्शन को भी निरस्त करते गए। 

‘वास्तविक यूएनआई’ के लोगों का कहना है कि विगत दो दशकों और अधिक समय में यूएनआई के शेयर धारकों को न जाने कितने बार संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गयी, निवेदन किया गया, विनती की गयी; दुर्भाग्यवश दरभंगा राज के दी न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन लिमिटेड, जो एक महत्वपूर्ण शेयर धारक थे, विनती को नहीं सुना। काश !! महाराजाधिराज जीवित होते। परिणाम यह हुआ कि यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया ‘तथाकथित आतंरिक राजनीतिक चक्रव्यूह के साथ-साथ विपन्नता से ग्रसित होता गया। कल जिसके शब्दों की तूती बोली जाती थी, आज उसके शब्दों को सुनने वाला कोई नहीं दिखा रहा है। यह अलग बात है कि अनेकानेक प्रेस विज्ञप्तियां जारी हो रही है, भर्त्सना की जा रही है।  

शायद देश के पत्रकार इस बात से अनभिज्ञ होंगे कि यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया की स्थापना के बाद बिहार की राजधानी पटना में इसकी पहली शाखा ‘दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड (आर्यावर्त और दी इंडियन नेशन दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशक) के मजहरूल हक़ रोड स्थित आलीशान भवन के परिसर में खुला था। ‘दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड’ के मालिक दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह यूएनआई के स्थापनकालीन 27-शेयर होल्डरों में प्रमुख थे।

इस परिसर में कुछ वर्ष कार्य करने के बाद उसी मार्ग पर आगे डी लाल एंड संस के पीछे जाने वाली गली में स्थित होटल में दो कमरे से कार्य करना शुरू किया। सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में आकाशवाणी, पटना के प्रवेश द्वार पर स्थित एक बंगाली परिवार के मकान के प्रथम मंजिल पर आया। उसी भवन के निचले तले में ‘मंगोलिया बार’ खुला। यूएनआई का यह कार्यालय बिहार सहित राष्ट्रीय स्तर पर सत्तर के दशक और उसके बाद होने वाली राजनीतिक महाभारतों का प्रथम द्रष्टा रहा। 

ज्ञातव्य हो कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मानसिक उपज से स्थापित साथ-सत्तर-अस्सी-नब्बे के ज़माने तक का भारत का सबसे अधिक जीवंत समाचार एजेंसी का आज़ादी के 78 वर्ष आते-आते यह हश्र हो गया । कहते हैं उन दिनों देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने आधिकारिक यात्रा पर जम्मू-कश्मीर गए थे। प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया था यूएनआई के स्थापना से पूर्व। जिस दिन पंडित नेहरू जम्मू और कश्मीर में थे, पीटीआई के पत्रकार और गैर-पत्रकार अपनी मांगों के समर्थजन में हड़ताल पर थे। परिणाम यह हुआ की पंडित नेहरू की यात्रा की खबर देश के अख़बारों में प्रकाशित नहीं हो पाया, सिवाय जम्मू और कश्मीर के स्थानीय अख़बारों को छोड़कर, या फिर टेलीफोन/ट्रंकाल से प्रेषित समाचार का प्रकाशन को छोड़कर। 

पंडित नेहरू तत्काल पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. विधानचंद्र रॉय को एक ऐसा समाचार एजेंसी बनाने को कहे, जिसमें देश के सभी अख़बारों के मालिकों का हिस्सा हो और वे निष्पक्षता के साथ-साथ शब्दों की गरिमा को बरकरार रखकर, समाचार और लेख उपलब्ध करा सके। यह भी कहा जाता है कि डॉ. रॉय इस सम्बन्ध में सबसे पहले दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह से संपर्क स्थापित कर इस दिशा में पहल करने की बात की। यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया का गठन इसी सोच पर किया गया और उसकी पहली कहानी 21 मार्च, 1961 को टेलीप्रिंटर के माध्यम से देश के प्रमुख शहरों और राजधानियों से प्रकाशित अख़बारों में प्रकशित हुयी थी। 

दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित और पटना से प्रकाशित ‘दी इंडियन नेशन (1930) और ‘आर्यावर्त (1940) के प्रकाशक ‘दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड’ के तत्कालीन महाप्रबंधक श्री उपेंद्र आचार्य को यूएनआई की बेहतर स्थापना कराने, भागीदारी निभाने (अर्थ और सामर्थ्य दोनों से) का दायित्व सौंपा गया। दी न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड का इस एजेंसी की स्थापना में क्या योगदान रहा, यह आज की व्यवस्था या आज के पत्रकार नहीं समझ पाएंगे। उपेंद्र आचार्य जब कार्यालय से अवकाश मुक्त हुए तो उनके स्थान पर आये ‘मास्टर साहब’ यानी काली कान्त झा। उस कालखंड में, जब यूएनआई अपने उत्कर्ष की ओर उन्मुख था, उसके इतिहास में शायद यह पहली घटना थी जब दी न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड का प्रतिनिधित्व करते काली कान्त झा दो बार यूएनआई के अध्यक्ष बने थे। साल 1971 और 1972 का कालखंड था। 

यूएनआई के स्थापना के अगले वर्ष 1 अक्टूबर, 1962 को महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह का निधन हो गया। महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद ‘मास्टर साहब’ अपने जीते-जी और सेवाकाल /अवकाश प्राप्त करने के बाद भी, यथासंभव अपने संस्थान के साथ-साथ यूएनआई के स्थापना उद्देश्य की प्राप्ति में भरपूर योगदान दिया। लेकिन कालांतर में यूएनआई के अन्य शेयरधारकों से वह सहयोग नहीं मिल पाया जिसकी अपेक्षा थी। परिणाम यह हुआ की वास्तविक यूएनआई ‘उपेक्षित’ होता चला गया और अंततः यह आर पी गुप्ता का हो गया।  

और उसका ज्वलंत दृष्टान्त विगत दिनों देखा गया जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने शहर के प्रमुख सेंट्रल दिल्ली इलाके में यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया को आवंटित की गई जमीन का आवंटन रद्द करने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि कोई भी डिफ़ॉल्ट करने वाला लाइसेंसी, जो उस मकसद को ही पूरा करने में नाकाम रहा हो जिसके लिए उसे जमीन आवंटित की गई थी, सरकारी जमीन को “बंधक” बनाकर नहीं रख सकता। और शुक्रवार शाम को दिल्ली पुलिस ने रफ़ी मार्ग स्थित यूएनआई के दफ़्तर को सील कर दिया। यह कार्रवाई तब हुई जब दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने अपने 98 पन्नों के आदेश में कहा कि यह न्यूज़ एजेंसी अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में नाकाम रहने के बावजूद, 45 साल से भी ज़्यादा समय से सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा जमाए बैठी थी।

न्यायालय ने कहा कि यह ज़मीन असल में न्यूज़ मीडिया संगठनों के लिए एक कॉम्प्लेक्स ऑफ़िस बनाने के मकसद से आवंटित की गई थी, लेकिन दशकों तक इस पर कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ। यूएनआई ने 2023 में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफ़िस द्वारा जारी उस पत्र को चुनौती दी थी जिसमें शर्तों का उल्लंघन करने के आधार पर उसका आवंटन रद्द कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इतने सालों में कई बार आवंटन पत्र जारी किए जाने और कई मौके दिए जाने के बावजूद, न तो निर्माण कार्य शुरू करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया और न ही आवंटन की शर्तों का पालन किया गया।

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न्यायालय ने कहा, “याचिकाकर्ता को अलग-अलग अलॉटमेंट पत्रों के ज़रिए जो अधिकार दिए गए हैं, वे एक ‘सामान्य लाइसेंसी’ के अधिकारों जैसे ही हैं। ज़ाहिर है कि याचिकाकर्ता का लाइसेंस कभी भी रद्द किया जा सकता है, खासकर तब जब वह मकसद ही 45 साल से भी ज़्यादा समय से पूरी तरह से अधूरा पड़ा हो, जिसके लिए उसे यह लाइसेंस दिया गया था।” असल में, न्यायालय का मानना था कि लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफ़िस ने यूएनआई को लगातार डिफ़ॉल्ट करने और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा न करने के बावजूद, ज़रूरत से ज़्यादा और असामान्य रियायतें दीं।

न्यायालय का मानना था कि “आवंटन रद्द करने का आदेश बिल्कुल सही है, क्योंकि इसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि याचिकाकर्ता इमारत बनाने में पूरी तरह से नाकाम रहा है और उसकी तरफ़ से लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की गई, जिसका कोई उचित स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया।” न्यायालय ने आगे कहा कि इस मामले के तथ्यों से एक ऐसी स्थिति सामने आती है, जिसमें एक लाइसेंसी ने दशकों तक अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा न करके, सरकारी ज़मीन को असल में बंधक बनाकर रखा हुआ था। खैर। 

बहरहाल, आज पटना ही नहीं, दिल्ली ही नहीं, भारत के किसी भी कोने में अगर संपादक की कुर्सी पर बैठे वरिष्ठतम पत्रकार इस बात को स्वीकार करेंगे कि अपने स्थापना काल से लेकर उस कालखंड तक, जब यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इण्डिया अधोगति की ओर उन्मुख हुआ, या अनेकानेक कारणों से उन्मुख होने लगा था, यूएनआई द्वारा जारी समाचार या लेख का एक-एक शब्द सत्यता की तराजू पर जितना जांचा-परखा, नपा-तौला होता था, उतना देश की किसी भी समाचार एजेंसी का नहीं था। 

इस बात का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि अगर यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया को बचाने के क्रम में सबसे पहले इसके शेयर होल्डर्स आगे आये होते तो शायद आज अपने स्थापना के 65 वे वर्ष में, अपने पहली कहानी के निर्गत होने के 65वें वर्ष में यूएनआई कार्यालय के दफ्तर से देर रात पत्रकारों को, गैर पत्रकारों को, अधिकारियों को, चपरासियों को दिल्ली पुलिस बाहर नहीं निकाल पाती। इसमें दिल्ली पुलिस को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। उसे जो आदेश निर्गत हुआ, वह उसका पालन कर रहा था। लेकिन यूएनआई के स्थापना काल अथवा उसके कुछ समय बात तक भी यूएनआई के शेयर होल्डरों ने जो लुक्का-छिप्पी की राजनीति कर इस संस्थान में कार्य करने वाले हज़ारों कर्मियों और उनके परिवारों के साथ क्रूर मजाक किये।

यूएनआई के शेयर होल्डरों में 27 लोगों/संस्थाओं का नाम है। यह नाम कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता में अपना हस्ताक्षर है। एसोसिएटेड पब्लिशर्स, 856/57, अन्ना सलाई, चेन्नई-600002, सर्वेन्ट्स ऑफ़ दी पीपुल्स सोसाइटी (दी समाज), गोपबंधु भवन, बक्शी बाजार, कटक; श्री जी कस्तूरी, दी हिन्दू, कस्तूरी बिल्डिंग्स, माउन्ट रोड, चेन्नई-600002; मोहम्मद यूनुस, एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड, हेराल्ड हॉउस, बहादुरशाह ज़फर मार्ग, ने दिल्ली- 110002; राम एस तरनेजा और रानी एस टरनेजा, फ्लेट-2012, प्लेनेट गोदरेज, एक्वा टावर-II, केके मार्ग, जैकब सर्किल, महालक्ष्मी, मुंबई-400001; दी स्टेट्समैन लिमिटेड, 4 चौरंगी स्क्वायर, कोलकाता-700001; बैनेट, कोलेमन एंड कंपनी लिमिटेड, डॉ. डीएन रोड, मुंबई-400001; मणिपाल मीडिया नेटवर्क लिमिटेड, उदयवाणी बिल्डिंग्स, मणिपाल-576119 (एसके); दी प्रिंटर्स (मैसूर) लिमिटेड, 16-महात्मा गाँधी रोड, बंगलोर-560001; नवा समाज लिमिटेड, 37-फार्मलैंण्ड लेआउट्स, रामदास पथ, नागपुर-440010; आनंद बाजार पत्रिका लिमिटेड, 6 – प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट, कोलकाता-700001; एचटी मिडिया लिमिटेड, हिंदुस्तान टाइम्स हॉउस, 18-20, कस्तूरबा गाँधी मार्ग, नई दिल्ली-110001; सकाळ पेपर प्राइवेट लिमिटेड, 595-बुधवार पथ, पुणे-411002; जुगांतर लिमिटेड, १४, आनंद चटर्जी लें, कोलकाता-700003; अमृत बाजार पत्रिका लिमिटेड, ९-इनिडा एक्सचेंज प्लेस, ७वां तल्ला, रम नंबर-1 ए, कोलकाता-700001; नेव्स्पपेर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड, मजहरुल हक़ पथ, पटना; दी इंडियन एक्सप्रेस लिमिटेड, एक्सप्रेस टावर, नरीमन पॉइंट, मुंबई-440021; नव भारत, नव भारत भवन, पीबी नंबर-382, नागपुर-440018; श्री अविक कुमार सरकार, C/o एबीपी लिमिटेड, 6-प्रफुल्ला सर्कार स्ट्रीट, कोलकाता-700001; एक्सप्रेस पब्लिकेशंस (मदुरै) लिमिटेड, एक्सप्रेस गार्डन्स, 29, 2मेन रोड, अम्बत्तूर इंडस्ट्रियल एस्टेट, चेन्नई-208005; श्री तुषार काँटी घोष, अमृत बाजार पत्रिका लिमिटेड, 72-1, बाघ बाजार स्ट्रीट, कोलकाता-700003; श्री एससी रॉय, 36, न्यू रोड, अलीपोल, कोलकाता-700021; श्री पीसी गुप्ता, जागरण प्रकाशन लिमिटेड, 2-सर्वोदय नगर, कानपूर; श्री संतोष नाथ, हिंदुस्तान टाइम्स लिमिटेड, कस्तूरबा गाँधी मार्ग, नई दिल्ली-110001 और मेसर्स राइटर्स एंड पब्लिसर्स लिमिटेड, जी-3ए, कानन वाले चैम्बर्स, मोगलाम, माहिम वेस्ट, मुंबई-400006 

इन 27 शेयर होल्डरों में 17वां नाम ‘न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड, मजहरुल हक़ पथ, पटना-800001’ का है। यह प्रकाशन दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह का था। यूएनआई के स्थापना के अगले वर्ष 1 अक्टूबर, 1962 को महाराजा अंतिम सांस लिए। महाराजा संतानहीन थे। अगर महाराजा की मृत्यु के बाद दरभंगा राज के लोग – जो उनकी संपत्ति के भागीदार हुए – यूएनआई की गरिमा के साथ महाराजा की गरिमा को बचने के लिए आगे आये होते, तो शायद कल का वास्तविक यूएनआई, आज का ‘गुप्ता जी के यूएनआई’ नहीं होता। 

बहरहाल, दस्तावेजों के अनुसार, 14.12.1979 को भूमि और विकास कार्यालय (L&DO), भारत सरकार द्वारा यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया के पक्ष में एक आवंटन पत्र जारी किया गया था, जिसके द्वारा 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में स्थित भूमि आवंटित की गई थी। उक्त पत्र में भूखंड का क्षेत्रफल 1.453 एकड़ (0.588 हेक्टेयर) दर्ज किया गया था। यह आवंटन न केवल यूएनआई के लाभ के लिए किया गया था, बल्कि चार अन्य सहभागी समाचार मीडिया संस्थानों – प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया, प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार – के संबंध में भी किया गया था; इसका उद्देश्य एक संयुक्त कार्यालय परिसर का निर्माण करना था, जिसमें उक्त समाचार मीडिया संगठनों के कार्यालय स्थित हो सकें।

पत्र (भारत सरकार, कार्य और आवास मंत्रालय, भूमि और विकास कार्यालय, निर्माण भवन सं. L.II.1(576)/78, नई दिल्ली, दिनांक 14 दिसंबर 1979) में कहा गया था “मुझे यह कहने का निर्देश दिया गया है कि राष्ट्रपति महोदय ने यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया को – यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया तथा चार अन्य सहभागी समाचार मीडिया, यथा प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया, प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार की ओर से – रफी मार्ग, नई दिल्ली पर स्थित लगभग 1.453 एकड़ या 0.588 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले भूखंड (जैसा कि संलग्न L&DO की योजना सं. 3453 में दर्शाया गया है) के आवंटन को मंजूरी प्रदान की है; यह आवंटन इन समाचार मीडिया संस्थानों के कार्यालयों को समायोजित करने हेतु एक संयुक्त कार्यालय परिसर के निर्माण के लिए किया गया है।” 

पत्र में यह भी कहा गया कि “यह आवंटन ‘पट्टे और शाश्वत पट्टे के समझौते’ में दी गई शर्तों और निबंधनों के अधीन है। 08.08.1980 को, दिनांक 14.12.1979 के उपर्युक्त आवंटन पत्र में संशोधन किया गया, जिसके तहत प्लॉट के क्षेत्रफल के साथ-साथ उससे संबंधित देय प्रीमियम और ज़मीनी किराए के संबंध में कुछ छोटे-मोटे बदलाव किए गए। 

14.12.1979 की आवंटन चिट्ठी के अनुसार, याचिकाकर्ता को जमीन का औपचारिक कब्जा सौंपे जाने की तारीख से दो साल के अंदर प्रस्तावित इमारत का निर्माण पूरा करना ज़रूरी था। इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता द्वारा 14.12.1979 की आवंटन चिट्ठी में दी गई शर्तों के अनुसार इमारत/मिश्रित कार्यालय परिसर के निर्माण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया था। इसके बावजूद, 07.11.1986 की एक संशोधित आवंटन चिट्ठी जारी की गई, जिसने 08.08.1980 की पिछली कार्यालय चिट्ठी संख्या L-I-II-I(576)/78 का स्थान ले लिया।

पत्र के अनुसार, ‘इस कार्यालय के पत्र संख्या L-1(576)/78 दिनांक 8.8.80 को रद्द करते हुए, मुझे यह कहने का निर्देश दिया गया है कि राष्ट्रपति महोदय ने यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और प्रेस एसोसिएशन के लिए एक संयुक्त कार्यालय परिसर के निर्माण हेतु, रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली पर 1 एकड़ जमीन के एक भूखंड के आवंटन को मंजूरी देने की कृपा की है। यह आवंटन ‘समझौता ज्ञापन’ और ‘स्थायी पट्टा’ में दी गई शर्तों और निबंधनों के अधीन है, जिसमें निम्नलिखित बातें भी शामिल की गयी: (i) साइट के आवंटन की तारीख इस पत्र की तारीख मानी जाएगी और इस आवंटन के संबंध में सभी भुगतान, कब्ज़ा सौंपने के प्रस्ताव की तारीख या कब्ज़ा लेने की तारीख—इनमें से जो भी पहले हो—उस तारीख से देय हो जाएंगे। (ii) यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और प्रेस एसोसिएशन को, जिस तारीख से पक्षों को जमीन में प्रवेश करने की अनुमति दी जाती है, उस तारीख से 24 महीनों के भीतर, क्षेत्र के वास्तुशिल्प परिवेश के अनुरूप भवन का निर्माण करना आवश्यक होगा। (iii) उक्त समाचार मीडिया को ज़मीन के लिए सुरक्षा राशि 3 लाख रुपये प्रति एकड़ की रियायती दर पर और लाइसेंस शुल्क सुरक्षा राशि का 2.1% प्रति वर्ष की दर से भुगतान करना आवश्यक होगा। पट्टा-धारण अधिकार  प्रदान किए जाने पर, सुरक्षा राशि को ज़मीन के लिए ‘प्रीमियम’ माना जाएगा और उक्त समाचार मीडिया प्रीमियम के 2% की दर से वार्षिक ज़मीनी किराया देने के लिए उत्तरदायी होगा।

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यह भी उद्धृत किया गया कि ये मीडिया यूनिट्स आपस में एक समझौता करेंगी कि वे निर्माण की लागत किस आधार पर साझा करेंगी। इस समझौते में अन्य संबंधित मामलों का भी प्रावधान होगा, जिसमें निर्माण की व्यवस्था, संपत्ति का प्रबंधन आदि शामिल हैं। वे इस समझौते की तीन प्रतियां इस कार्यालय को भेजेंगी, और ये प्रतियां लाइसेंस समझौते (यानी, सरकार के साथ उनके द्वारा किए जाने वाले समझौता ज्ञापन) का हिस्सा बनेंगी। इस आवंटन के तहत सरकार को सुरक्षा राशि/लाइसेंस शुल्क/प्रीमियम/भूमि किराया और अन्य बकाया राशियों के भुगतान की जिम्मेदारी संयुक्त और पृथक होगी।

जिन मीडिया यूनिट्स को संयुक्त रूप से भूमि आवंटित की गई है, वे उस भूमि को सीमांकन द्वारा विभाजित करने या उस पर संबंधित पक्षों के हिस्से को अलग से चिह्नित करने के हकदार नहीं होंगे। यदि इस संयुक्त आवंटन के पक्षों द्वारा कोई उल्लंघन किया जाता है, तो पुनः प्रवेश का अधिकार केवल भवन के उस हिस्से तक और चूक करने वाले पक्ष के भूमि में अविभाजित हित तक ही सीमित रहेगा। यह भी कहा गया कि भवन योजना पर स्पष्ट रूप से दर्शाएंगे कि इस आवंटन के तहत प्रत्येक पक्ष को कितनी जगह आवंटित की गई है, और उसे सरकार को भेजेंगे। यह योजना सरकार और पक्षों के बीच होने वाली पट्टा विलेख का हिस्सा बनेगी।

यह भी उल्लेख किया गया कि यदि मीडिया यूनिट्स की आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद कोई अतिरिक्त जगह बच जाती है, तो सरकार को यह अधिकार होगा कि वह किसी अन्य समाचार संगठन को जगह खरीदने या उस संयुक्त कार्यालय भवन में आवास किराए पर लेने के लिए प्रायोजित करे। भूमि का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए किया जाएगा जिसके लिए इसे आवंटित किया गया है; पट्टादाता की पूर्व अनुमति के बिना इसका उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए बिल्कुल भी नहीं किया जाएगा। इस ज़मीन पर किसी भी तरह की रिहायशी यूनिट बनाने की इजाज़त नहीं होगी, सिवाय केयरटेकर या चौकीदार की यूनिट के। केयरटेकर या चौकीदार की रिहायशी यूनिट का प्लिंथ एरिया पट्टेदार अपनी पूरी मर्ज़ी से तय करेगा, लेकिन यह चौकीदार के रहने के लिए 34 वर्ग मीटर (365 वर्ग फ़ीट) से ज़्यादा नहीं होगा, और केयरटेकर के रहने के लिए 55.75 वर्ग मीटर (600 वर्ग फ़ीट) से ज़्यादा नहीं होगा।

पत्र में यह भी लिखा गया कि अगर उक्त मीडिया यूनिट्स बनाने वाली कंपनी/सोसायटी/सहकारी सोसायटी बंद हो जाती है या मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनी में बदल जाती है, तो सरकार के पास लाइसेंस (समझौता ज्ञापन) को रद्द करने या वापस लेने, या पट्टा विलेख को रद्द करने का अधिकार होगा।  यह तय किया गया था कि आवंटित भूखंड का क्षेत्रफल 1 एकड़ जमीन का संयुक्त आवंटन यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (50%), प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया (25%) और प्रेस एसोसिएशन (25%) किया जायेगा। 

07.11.1986 के आवंटन पत्र में यह प्रावधान था कि उक्त मीडिया संस्थानों को आपस में एक समझौता करना होगा, जिसमें यह तय किया जाएगा कि प्रस्तावित भवन के निर्माण की लागत किस आधार पर आपस में बांटी जाएगी; साथ ही, इसमें अन्य प्रासंगिक मामलों को भी शामिल किया जाएगा, जिनमें संपत्ति के निर्माण, प्रबंधन और रखरखाव की व्यवस्थाएं शामिल हैं। परन्तु, 07.11.1986 के आवंटन पत्र के अनुसार जो आवश्यक कदम उठाए जाने थे, वे नहीं उठाए गए; क्योंकि न तो संबंधित आवंटियों के बीच कोई समझौता किया गया और न ही आवश्यक निर्माण कार्य शुरू करने के लिए कोई कदम उठाया गया।

आगे, 17.06.1999 को जारी एक पत्र के अनुसार, 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में स्थित जमीन प्लॉट का कुल क्षेत्रफल 1.841 एकड़ था, जिसमें से 1 एकड़ जमीन पहले ही यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और प्रेस एसोसिएशन को संयुक्त रूप से आवंटित की जा चुकी थी। इस पत्र में आगे शेष 0.841 एकड़ जमीन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और विदेश व्यापार संयुक्त महानिदेशक, वाणिज्य मंत्रालय को आवंटित करने का प्रस्ताव था। इसमें आगे यह भी परिकल्पना की गई थी कि पूरे प्लॉट पर एक मिश्रित भवन का निर्माण केंद्रीय लोक निर्माण विभाग द्वारा किया जाएगा, जिसमें विभिन्न आवंटिती उक्त आवंटन पत्र में निर्दिष्ट अनुपात में निर्मित स्थान को साझा करने के हकदार होंगे। 

परन्तु, 17.06.1999 की आवंटन पत्र की धारा (xi) में निहित शर्त के बावजूद, उक्त भूमि/आवंटित क्षेत्र के संबंध में कोई समझौता ज्ञापन या कोई पट्टा विलेख निष्पादित नहीं किया गया । इसके बाद, उक्त भूमि के संबंध में 27.06.2000 को एक संशोधित आवंटन पत्र जारी किया गया, जो 17.06.1999 के पिछले आवंटन पत्र में आंशिक संशोधन किया गया था, जिसके अनुसार, 5289.52 वर्ग मीटर भूमि के आवंटन की स्वीकृति प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया के पक्ष में समान रूप से किया गया था।  इस पत्र के अनुसार, संयुक्त कार्यालय भवन का निर्माण करना था।

आगे, 27.06.2000 एक और पत्र जारी किया गया जिसका उद्देश्य प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, प्रेस एसोसिएशन और वाणिज्य मंत्रालय के विदेश व्यापार के संयुक्त महानिदेशक के पक्ष में पहले किए गए आवंटनों को रद्द करना था । उक्त पत्र के अनुसार, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को 1244.76 वर्ग मीटर और यूएनआई को 620.76 वर्ग मीटर अतिरिक्त भूमि आवंटित करने का प्रावधान था।  यह आवंटन उस 1400 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त थी जो पहले ही प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को आवंटित की जा चुकी थी, और उस 2024 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त थी जो पहले ही यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया को आवंटित की जा चुकी थी। पांच साल बाद, L&DO द्वारा 30.03.2005 को यूएनआई को दी गयी 620.76 वर्ग मीटर का वह अतिरिक्त क्षेत्र रद्द कर दिया गया, जो मूल रूप से आवंटित 2024 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त आवंटित किया गया था। 

09.10.2012 के पत्र के माध्यम से यह बताया गया कि 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया के लिए एक मिश्रित भवन के निर्माण हेतु नेशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के माध्यम से स्वीकृति प्रदान कर दी है; यह स्वीकृति सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के स्थान पर दी गई है, जिसे पहले निष्पादन एजेंसी के रूप में परिकल्पित किया गया था। 20.02.2018 को, यूएनआई ने भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) को एक पत्र प्रेषित किया जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया था कि क्या यूएनआई, भारतीय प्रेस परिषद और शहरी विकास मंत्रालय के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता किया जाना चाहिए, इस तथ्य को देखते हुए कि तब तक लगभग 620 वर्ग मीटर का अतिरिक्त क्षेत्र CPWD/सरकारी उपयोग के लिए निर्धारित किया जा चुका था। 

तीन माह बाद,  यूएनआई ने L&DO को 30.05.2018 को एक रिमाइंडर भेजा, जिसमें उसने इस मामले में स्पष्टीकरण के लिए अपने अनुरोध को दोहराया। इसके बाद, यूएनआई ने L&DO को 09.12.2019 को एक और पत्र भेजा, जिसमें L&DO के कार्यालय में 29.11.2018 को हुई एक बैठक का ज़िक्र किया गया था। उस बैठक में यह बात सामने आई कि 620 वर्ग मीटर का वह अतिरिक्त क्षेत्र, जो पहले याचिकाकर्ता को आवंटित किया गया था और जिसका आवंटन बाद में 30.03.2005 के पत्र के ज़रिए रद्द कर दिया गया था, अब ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ को आवंटित करने का प्रस्ताव था। इसके परिणामस्वरूप, 620.76 वर्ग मीटर का वह क्षेत्र, अंततः 15.03.2021 के पत्र के जरिए ‘प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया’ को आवंटित कर दिया गया।

यानी, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को कुल 3,265.52 वर्ग मीटर का क्षेत्र आवंटित किया गया था, जिसमें 17.06.1999 के पत्र द्वारा आवंटित 1,400 वर्ग मीटर, 27.06.2000 के पत्र द्वारा आवंटित 1,244.76 वर्ग मीटर, और 15.03.2021 के पत्र द्वारा आवंटित 620.76 वर्ग मीटर शामिल थे। इसके विपरीत, यूएनआई के पास 2,024 वर्ग मीटर का आवंटन बना रहा। विशेष रूप से, इस तथ्य के बावजूद कि प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को आवंटित भूमि का विस्तार यूएनआई को आवंटित भूमि से अधिक था। व्यावहारिक तौर पर प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया केवल नाममात्र के कब्जे में रहा, जबकि भूमि के पूरे भूखंड का वास्तविक भौतिक कब्जा यूएनआई के पास ही बना रहा।

यदि देखा जाए तो 9, रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली स्थित भूमि के संबंध में समय-समय पर कई आवंटन पत्र जारी किए गए। जिन संस्थाओं के पक्ष में आवंटन की परिकल्पना की गई थी, साथ ही उनमें से प्रत्येक को आवंटित की जाने वाली प्रस्तावित भूमि का विस्तार भी, कई अवसरों पर बदलता रहा। इन घटनाक्रमों के बावजूद, आवंटन का मूल उद्देश्य, यानी उक्त भूखंड पर एक मिश्रित कार्यालय भवन का निर्माण, किसी भी समय पूरा नहीं हो सका। इस बीच, 23.11.2022 के एक पत्र के माध्यम से, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक आपत्ति उठाई, जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर 620 वर्ग मीटर भूमि के उस हिस्से पर एक रेस्तरां/कैंटीन चलाना शुरू कर दिया है, जो प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को आवंटित किया गया था; और यह कार्य उसने बिना किसी पूर्व सूचना के तथा आवंटन को नियंत्रित करने वाले नियमों और शर्तों का उल्लंघन करते हुए किया है।

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इतना ही नहीं, एक हलफनामे से यह पता चलता है कि, उससे भी पहले, यूएनआई ने 24.01.2022 के एक पत्र के माध्यम से, प्रस्तावित भवन के निर्माण के बाद और उसका कब्ज़ा प्राप्त करने के उपरांत, उस भवन के 70% तक हिस्से को व्यावसायिक रूप से पट्टे पर देने की अनुमति मांगी थी। यह कहा गया था कि यूएनआई बहुत ज़्यादा आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा था और उस पर अपने मौजूदा और पुराने कर्मचारियों को देने वाली सैलरी और दूसरे बकाए का काफ़ी बड़ा बोझ जमा हो गया था। हालांकि, यूएनआई ने प्रस्तावित इमारत के बन जाने के बाद उसके एक हिस्से को कमर्शियल तौर पर लीज़ पर देने की जो अनुमति माँगी थी, उसे L&DO ने 29.03.2022 की बातचीत के ज़रिए नामंज़ूर कर दिया।

इस बीच, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया, जिसे ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा अलॉट किया गया था, उस ज़मीन पर मिली-जुली इमारत के तेज़ी से निर्माण के लिए लगातार ज़ोर देता रहा। परन्तु, 18.05.2022 के एक ईमेल के ज़रिए यूएनआई ने बताया कि, मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए, वह फ़िलहाल प्रस्तावित मिली-जुली इमारत के निर्माण में हिस्सा लेने में असमर्थ है और उसने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से अनुरोध किया कि या तो वह अपने शेयरधारकों द्वारा प्रस्तावित फ़ंड आने के नतीजे का इंतज़ार करे या फिर ज़मीन के अपने अलॉट किए गए हिस्से पर निर्माण का काम आगे बढ़ाए। 

जबकि, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया द्वारा यूएनआई को संबोधित 19.07.2022 की एक चिट्ठी में यह दर्ज है कि प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने कई मौकों पर याचिकाकर्ता से 620 वर्ग मीटर जमीन खाली करने का अनुरोध किया था, जो उसे आवंटित की गई थी। प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने 20.07.2022 के पत्र के ज़रिए L&DO से इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक मीटिंग बुलाने का अनुरोध किया। हालांकि, यह मामला अनसुलझा ही रहा। इसके अतिरिक्त, यह भी संज्ञान में आया है कि L&DO द्वारा 29.09.2022 को लंबित मुद्दों पर विचार-विमर्श करने हेतु बुलाई गई बैठक में यूएनआई उपस्थित नहीं हुआ। 

यदि देखा जाए तो यूएनआई कथित तौर पर संपत्ति के एक हिस्से का उपयोग ऐसे उद्देश्यों के लिए कर रहा था, जिसकी परिकल्पना आवंटन की शर्तों के तहत नहीं की गई थी; गंभीर वित्तीय बाधाओं के कारण प्रस्तावित मिश्रित भवन के निर्माण में भाग लेने में अपनी असमर्थता स्पष्ट रूप से व्यक्त कर दी थी; यूएनआई ने यह रुख अपनाया था कि भारतीय प्रेस परिषद, याचिकाकर्ता की भागीदारी के बिना, स्वतंत्र रूप से निर्माण कार्य आगे बढ़ा सकती है; और परियोजना से संबंधित लंबित मुद्दों को सुलझाने के लिए L&DO द्वारा बुलाई गई बैठकों में भाग नहीं लिया। परिणाम यह हुआ कि L&DO द्वारा यूएनआई को दिनांक 12.01.2023 का एक ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया गया। 

एक महीने दो दिन बाद यूएनआई ने उपर्युक्त ‘कारण बताओ नोटिस’ के संबंध में दिनांक 14.02.2023 को एक ‘अस्पष्ट’ और ‘मनमाना’ जवाब प्रस्तुत किया। अन्य बातों के साथ-साथ, यह कहा कि चूंकि उस समय उसके पास ‘निदेशक मंडल’ (Board of Directors) नहीं था, इसलिए वह उक्त ‘कारण बताओ नोटिस’ का समुचित जवाब देने में असमर्थ होगा। इन पृष्ठभूमि के तहत, दिनांक 29.03.2023 का वह विवादित निरस्तीकरण पत्र जारी किया गया, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता के पक्ष में किया गया आवंटन रद्द कर दिया गया। बाद में, बैंकरप्सी कोड, 2016 के तहत, यूएनआई के कुछ कर्मचारियों/पूर्व-कर्मचारियों द्वारा, यूएनआई के विरुद्ध कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस शुरू किया गया; यह प्रक्रिया नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल, नई दिल्ली बेंच (कोर्ट-II)  द्वारा दिनांक 19.05.2023 को पारित आदेश के माध्यम से शुरू हुई। परिणामस्वरूप, कोड की धारा 14 के प्रावधानों के अनुसार, एक मोरेटोरियम (स्थगन) लागू हो गया।

इस बीच, 07.11.2023 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक आवेदन (CM APPL. 58548/2023) दायर किया, जिसमें उसने मौजूदा कार्यवाही में खुद को शामिल करने की मांग की।  साथ ही, यह भी तर्क दिया कि, विचाराधीन ज़मीन के सह-आवंटी होने के नाते, कार्यवाही में उसकी भागीदारी के अभाव में उक्त संपत्ति में उसके अधिकारों की पर्याप्त रूप से रक्षा नहीं हो पाएगी। इसके बाद, चूंकि याचिकाकर्ता को कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस में शामिल कर लिया गया था, इसलिए यूएनआई की ओर से एक आवेदन (CM APPL. 9313/2024) दायर किया गया, जिसमें यह मांग की गई कि IBC के तहत स्थगन अवधि (moratorium period) के समाप्त होने तक मौजूदा कार्यवाही को स्थगित रखा जाए।

कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस की प्रक्रिया NCLT द्वारा 12.02.2025 को पारित एक आदेश के साथ समाप्त हुई, जिसके तहत सफल रिज़ॉल्यूशन आवेदक, यानी ‘द स्टेट्समैन लिमिटेड’ द्वारा प्रस्तुत रिज़ॉल्यूशन योजना को मंज़ूरी दे दी गई। तत्पश्चात, 08.07.2025 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक आवेदन (CM APPL. 39879/2025) दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता विचाराधीन ज़मीन पर अनधिकृत निर्माण कार्य कर रहा है; इसके साथ ही, यह निर्देश देने की मांग की गई कि उस स्थल (साइट) पर सभी प्रकार के निर्माण कार्य तत्काल रोक दिए जाएं ।

तत्पश्चात, 13.08.2025 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने इसके बाद एक और आवेदन (CM APPL. 50043/2025) दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह निर्देश देने की मांग की गई कि याचिकाकर्ता को किसी भी प्रकार की बाधा या रुकावट पैदा करने से रोका जाए, अथवा 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली स्थित उस ज़मीन के हिस्से तक पहुँचने या उसका उपयोग करने से किसी भी तरह से न रोका जाए, जिसे L&DO द्वारा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को आवंटित किया गया है। इन बातों के मद्दे नजर, दिनांक 11.07.2025 और 18.08.2025 के आदेशों के माध्यम से, इस न्यायालय ने भूमि और विकास कार्यालय (Land and Development Office) को निर्देश दिया कि वह संबंधित स्थल का भौतिक निरीक्षण करे, ताकि यह जाँच की जा सके कि क्या वहाँ कोई नया निर्माण हुआ है, और उसके बाद एक स्थिति रिपोर्ट (status report) रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे।

दिनांक 14.07.2025 को, उक्त निरीक्षण किया गया और इस संबंध में एक निरीक्षण/स्थिति रिपोर्ट L&DO द्वारा दिनांक 04.08.2025 को दायर की गई, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि यूएनआई द्वारा अनधिकृत निर्माण गतिविधियाँ की जा रही थीं, और ऐसी गतिविधियों के परिणामस्वरूप संबंधित भूखंड की प्रकृति में बदलाव आ गया था। 24.09.2025 को, यूएनआई ने CM APPL. 50043/2025 में लगाए गए आरोपों का खंडन करते हुए एक जवाब दाखिल किया, और यह तर्क देने की मांग की कि केवल मरम्मत और नवीनीकरण का काम किया गया था, और संबंधित ज़मीन पर कोई स्थायी ढांचा नहीं बनाया गया था।

09.07.2025 को, यूएनआई ने भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष को एक पत्र लिखा, जिसमें उसने तत्काल आधार पर निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने का अपना इरादा व्यक्त किया। इसके बाद, 19.08.2025 के पत्र के माध्यम से, याचिकाकर्ता ने भारतीय प्रेस परिषद को एक और पत्र लिखा, जिसमें उसने भारतीय प्रेस परिषद द्वारा एकतरफा रूप से संपत्ति की स्थिति को बदलने के प्रयास पर आपत्ति जताई; इस प्रयास में संबंधित ज़मीन पर अपना बोर्ड लगाना भी शामिल था। उक्त पत्र में, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि पूरी ज़मीन L&DO द्वारा 08.08.1980 के पत्र के माध्यम से ‘यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया’ को आवंटित की गई थी।

इसके जवाब में, भारतीय प्रेस परिषद ने 21.08.2025 के पत्र के माध्यम से एक जवाब भेजा, जिसमें यह दावा किया गया कि आवंटन पत्रों में निहित शर्तों के अनुसार निर्माण कार्य न कर पाने का कारण उनकी ओर से हुई चूक थी। इसमें आगे इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि संबंधित ज़मीन में भारतीय प्रेस परिषद की हिस्सेदारी लगभग 62% है, और इसलिए उसे संबंधित ज़मीन पर अपना बोर्ड लगाने का पूरा अधिकार है। जबकि, दिनांक 24.09.2025 की निरीक्षण रिपोर्ट से पुनः यह संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ता द्वारा संपत्ति पर कुछ अनधिकृत निर्माण किए गए थे, जो इस न्यायालय द्वारा दिनांक 19.09.2025 को पारित ‘यथास्थिति’ (status quo) आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है। हालाँकि, यूएनआई ने 24.09.2025 की उक्त निरीक्षण रिपोर्ट पर आपत्ति जताई है और एक जवाब दाखिल करते हुए यह तर्क दिया है कि कोई भी अनाधिकृत निर्माण कार्य नहीं किया गया था, और मौजूदा संरचना पर केवल नवीनीकरण और मरम्मत का काम किया गया था।

सभी तस्वीरें – संजय शर्मा
क्रमशः…..

1 COMMENT

  1. Poora padhne ke baad mai ye samjha ki sahi tarah se nahin chalane (Terms & Conditions) jo aadesh mila tha, ke karan aisa isthit utpan hua aur court ka sahara bibhag ko lena pda. Dhire dhire sambandhit bibhag (Press) ko chhati hua. Pranam.

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