भारत की प्रत्येक चौदहवीं महिला ‘विधवा’ है और उसे ‘सशक्त बनाना’ हमारा दायित्व है

भारत की विधवाओं को 'सशक्त बनाना' उन्हें सम्मानित जीवन देना हमारा दायित्व है। तस्वीर: शिवनाथ झा

नई दिल्ली: जनवरी को छोड़े। फरवरी महीने के 14 तारीख को जिस कदर विश्व के लोग – महिला, पुरुष, बच्चे – ‘प्यार का त्यौहार’ (वेलेंटाइंस डे) मनाते हैं, मई के महीने में दूसरे रविवार को वैश्विक स्तर पर ‘मातृ दिवस’ मनाते हैं, इसके अलावे संयुक्त राष्ट्र के निर्णयानुसार प्रत्येक वर्ष 365 दिनों में 218 दिनों को मानव जीवन, इतिहास, पर्यावरण और अन्य के नाम पर मानते हैं ताकि विश्व में जागरूकता बनी रहे; क्या ‘विधवा दिवस’ के प्रति हम जागरूक हो पाए हैं? शायद नहीं। आइये, आज समय आ गया है कि हमें भारत की नहीं, वैश्विक स्तर पर ‘विधवाओं’, जो सिर्फ पति हीन होती हैं, संतानहीन नहीं; के नाम पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित एक भारतीय की पहल को भारत के 28 राज्यों, आठ केंद्र शासित प्रदेशों के2,67,000 ग्राम पंचायतों में रहने वाले लोगों में जागरूकता फैलाएं, ताकि जीवन के अंतिम वसंत में एक पति हीन माँ, यानी विधवा, सम्मान के साथ जी सके।

“न्याय, गरिमा और आर्थिक शक्ति” – 23 जून, 2026 को संपन्न होने वाले अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस का विषय (थीम) है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में औसतन 14 महिलाओं में एक विधवा होने के बाद भी, आज आज़ादी के 80 साल तक हम इन विधवाओं को सच में न्याय, गरिमा दे पाए या उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत कर पाए जिससे वे परिवार और समाज के सामने बिना अपना हाथ फैलाये अपने जीवन की शेष साँसे ले सकें? अगर सरकारी स्तर पर देखें तो प्रश्न उठना लाजिमी है। लेकिन जब निजी क्षेत्र के लोकोपकारकों को देखते हैं तो ऐसा संभव कर पाना ‘कठिन’ नहीं दीखता।

आज देश की कुल आबादी में करीब 71.55 करोड़ महिलाएं हैं जिसमें करीब 5.6 करोड़ विधवाएं हैं। यानि सामान्य महिलाओं और विधवाओं का अनुपात 14:1 का अनुपात है। अगर वैश्विक स्टार पर देखें तो विश्व के किसी भी देशों की तुलना में भारत में विधवाओं की संख्या सबसे अधिक है। इतना ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में पति हीन महिलाओं की जो स्थिति है, चाहे वह सामाजिक हो, पारिवारिक हो, शैक्षिक हो, आर्थिक हो, न्यायिक हो, की तुलना में भारत की विधवाओं की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। 

लार्ड राज लूम्बा और उनकी पत्नी

आर्यावर्तइंडियननेशन(डॉट)कॉम से बात करते हुए वैश्विक स्तर पर स्थापित लूम्बा फाउंडेशन के संस्थापक और लन्दन के हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स के सदस्य राज लूम्बा का कहना है: “भारत की विधवाओं की दयनीय स्थिति को जड़ से मिटाने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं और कोशिश है कि हम भारत के सभी राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशों में स्थित लगभग 2,67,000 ग्राम पंचायतों के माध्यम से प्रत्येक घरों में रहने वाली विधवाओं तक पहुंचूं और उनके जीवन के अंतिम वसंत में ही सही, उन्हें जीने और हंसने का वजह दे सकूँ। मैं उनके मृत पतियों को जीवित नहीं कर सकता हूँ, लेकिन अपनी सोच से, अपने क्रियाकलाप से उन्हें इस उम्र में भी अर्थ से सक्षम बना सका हूँ कि वे शेष जीवन जी सकें।”

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अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस, हर साल 23 जून को मनाया जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित एक विशेष दिन है। यह दिन लाखों विधवाओं और उनके आश्रितों द्वारा झेली जा रही गरीबी और अन्याय को दूर करने के लिए समर्पित है। संयुक्त राष्ट्र जनगणना ब्यूरो का कहना है कि अमेरिका में 13 मिलियन से ज्यादा ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने जीवनसाथी को खो दिया है, और इनमें से 11 मिलियन से ज्यादा महिलाएं हैं। अपने जीवनसाथी को खोना और फिर अकेला जीवन जीना कभी भी आसान नहीं होता। इसलिए हमारा, समाज का, परिवार का यह दायित्व है कि हम दुनिया भर की विधवाओं की स्थिति के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाएँ।

वैश्विक स्तर पर, करीब 258 महिलाएं विधवा है और इसमें भारत का योगदान 56 मिलियन से अधिक का है। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि और मृत्यु दर में असमानताओं में कमी का अर्थ है कि विधवापन की घटनाओं में वृद्धि। इसके गंभीर व्यक्तिगत और सामाजिक परिणामों के बावजूद, भारत में विधवापन से संबंधित विस्तृत जनसांख्यिकीय और अन्य जानकारियाँ आज भी सीमित हैं। सांख्यिकी के अनुसार, भारत में 1993 से 2021 के बीच विधवाओं की संख्या 40,819,749 से बढ़कर 77,079,889 हुई है। देश के अलग-अलग राज्यों में, विधवापन की समस्या ज्यादातर बुजुर्ग महिलाओं में ही देखने को मिलती है। आज देश की विधवाएं कई तरह की मुश्किलों का सामना कर रही हैं, और उन्हें ठीक से समझने और उनका समाधान करने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम उन इलाकों से जानकारी हासिल करें और समाधान का उपाय ढूंढें। 

भारत की एक विधवा। तस्वीर: शिवनाथ झा

लार्ड राज लूम्बा कहते हैं: “हमारी कोशिश है कि हम अपने स्तर पर लाखों ऐसी विधवाओं के दरवाजे तक पहुंचें और उनकी समस्याओं का समाधान करें। हमारी कोशिश यह भी है कि भारत के राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में पदस्थापित करीब 800 से अधिक जिलाधिकारियों और हज़ारों अन्य अधिकारियों के माध्यम से, प्रदेशों के समाज कल्याण मंत्रालयों, बाल विकास मंत्रालयों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में, प्रखंडों में, अंचलों में रह रही ऐसी माताओं को ढूंढे और फिर एक स्थायी रूप से उन्हें सामाजिक न्याय के साथ-साथ गरिमा के साथ जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करें। मेरा मानना है कि मानवीयता के लिए यह कार्य सबसे बड़ा समर्पण होगा।”

ज्ञातव्य हो कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 दिसंबर, 2010 को 23 जून को आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस के रूप में अपनाया। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस 2005 से ही लूम्बा फाउंडेशन द्वारा मनाया जा रहा था। राजिंदर लूम्बा, जो यूनाइटेड किंगडम में हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के सदस्य हैं, ने विकासशील देशों में विधवा होने पर महिलाओं को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उन पर काम करने के लिए लूम्बा फाउंडेशन की स्थापना की। उन्हें इस फाउंडेशन को शुरू करने की प्रेरणा तब मिली, जब उन्होंने देखा कि उनकी माँ को 1954 में 37 साल की उम्र में विधवा होने के बाद किन-किन मुश्किलों से गुज़रना पड़ा था। 

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प्रेरणास्रोत: ​लार्ड राज लूम्बा की माँ श्रीमती पुष्पा वती लुम्बा (दिवंगत)

2005 में शुरू होने के बाद, लूम्बा फाउंडेशन ने संयुक्त राष्ट्र से मान्यता प्राप्त करने के लिए पाँच साल का एक वैश्विक अभियान चलाया। इसके परिणामस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस को एक वार्षिक ‘वैश्विक कार्य दिवस’ के रूप में अपनाने का निर्णय लिया। चूंकि किसी भी रूप में किसी प्रियजन को खोना कठिन और दुखद होता है, इसलिए इस दिन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दुनिया भर की विधवाओं को उस बेहद कठिन समय से गुज़रने के लिए ज़रूरी सहायता मिले। क्योंकि कई देशों में, लोग—विशेषकर महिलाएँ जो विधवा हो जाती हैं—ऐसी स्थितियों में फँस जाती हैं जहाँ उन्हें विरासत के अपने अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कुछ ऐसी संस्कृतियाँ भी हैं, जहाँ विधवाओं को शापित माना जाता है या उन्हें जादू-टोने से जोड़कर देखा जाता है। यह गलत सोच उन्हें उनके समुदाय से, और यहाँ तक कि उनके अपने बच्चों से भी अलग कर देती है।

लार्ड लूम्बा कहते हैं: “हमने यह समझा कि विधवा होना न केवल एक व्यक्तिगत दुख है, बल्कि यह एक वैश्विक मानवाधिकार का मुद्दा भी है – एक ऐसा मुद्दा जो गहरी जड़ों वाली सांस्कृतिक प्रथाओं, कानूनी बहिष्कार और सामाजिक उपेक्षा के कारण बना हुआ है। इस सच्चाई को बदलने के लिए अंतर्राष्ट्रीय जागरूकता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामूहिक प्रयास की जरूरत है। इस बदलाव की शुरुआत करने के लिए, फाउंडेशन ने 26 मई 2005 को अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस की शुरुआत की, और 23 जून – जिस तारीख को 1954 में मेरी माँ, श्रीमती पुष्पा वती लूम्बा विधवा हुई थीं – को वैश्विक कार्रवाई दिवस के रूप में घोषित किया। हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में घोषित इस अभियान का उद्देश्य लाखों विधवाओं के अनदेखे दुखों को दुनिया के सामने लाना और दुनिया भर की सरकारों, गैर-सरकारी संस्थाओं, व्यवसायों और समुदायों को इस दिशा में सक्रिय करना था।”

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भारत की एक विधवा। तस्वीर: शिवनाथ झा

लार्ड लूम्बा कहते हैं: “अपनी शुरुआत से ही, अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस ने ज़ोर पकड़ा। 2005 में पहली बार यह दिवस लंदन, भारत, नेपाल, श्रीलंका, युगांडा और दक्षिण अफ्रीका में मनाया गया। अगले कुछ वर्षों में, फाउंडेशन ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और जन-जागरूकता अभियान आयोजित किए, जिनमें कोफी अन्नान और सीनेटर हिलेरी क्लिंटन से लेकर योको ओनो, प्रिंस ऑफ़ वेल्स और चेरी ब्लेयर जैसी वैश्विक हस्तियों ने हिस्सा लिया। 22 दिसंबर 2010 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस को संयुक्त राष्ट्र के एक आधिकारिक वैश्विक दिवस के रूप में मान्यता दे दी – यह एक असाधारण परिणाम था जो फाउंडेशन के दृढ़ संकल्प और गैबॉन के नेतृत्व में सदस्य देशों के समर्थन से संभव हुआ। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, हरदीप सिंह पुरी का अटूट समर्थन अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में निर्णायक साबित हुआ।”

ज्ञातव्य हो कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त पहला अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस 23 जून 2011 को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मनाया गया। इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व, विभिन्न देशों के मंत्रियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने लॉर्ड लूम्बा और फाउंडेशन की अध्यक्ष, चेरी ब्लेयर के साथ एक सम्मेलन में हिस्सा लिया, जिसकी अध्यक्षता महासचिव की पत्नी, यू सून-टैक ने की। आज, हर साल 23 जून को, संयुक्त राष्ट्र की महिलाएं, सभी सदस्य देशों के लिए विधवाओं की दुर्दशा पर एक बयान जारी करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता मिलने के बाद से, फाउंडेशन एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका – लंदन ब्रिज और ट्राफलगर स्क्वायर से लेकर वाराणसी, नैरोबी और कोलंबो तक – विभिन्न जगहों पर कार्यक्रमों के माध्यम से दुनिया भर में जागरूकता फैलाने का काम लगातार कर रहा है। जमीनी स्तर के और राष्ट्रीय साझेदार रैलियों, सेमिनारों, व्यावसायिक सशक्तिकरण प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ इस दिन को मनाते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस मनाने का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस बात को स्वीकार करना है कि विधवाएँ नीति निर्माताओं की नज़र में अब तक अनदेखी रह गई हैं । नीतियाँ आम नागरिकों, मज़दूरों, बेरोज़गार युवाओं और समाज के अन्य पीड़ितों पर केंद्रित होती हैं; हालांकि, नीति-निर्माण बैठकों में विधवाओं के बारे में विशेष रूप से कोई चर्चा भी नहीं की जाती है। इस तरह के उपेक्षापूर्ण रवैये का मतलब है कि 258 मिलियन से अधिक लोगों के मुद्दे अनसुलझे रखना। यदि देखा जाय तो ‘अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस’ विधवाओं के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करने के वैश्विक आंदोलन की धीरे-धीरे आधारशिला बन गया है, लेकिन आज भी जागरूकता की कमी है। 

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