“मोदी है तो मुमकिन है” का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर ‘चारो खाने चित्त’, आप शताब्दी पुराने ‘आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते’

लाल बंगला आपको दीखता है क्या?

नई दिल्ली, 8 मई:  पिछले वर्ष 3 अप्रैल को एक प्रश्न के लिखित जवाब में, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री टोखन साहू ने संसद को बताया कि केंद्र सरकार ने दिल्ली गोल्फ क्लब की लीज़ 2050 तक बढ़ा दी है। यह फैसला क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की उसकी गुज़ारिश को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, खासकर इसलिए क्योंकि 2016 से गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा बन गया। 

अब जब मंत्रीजी लीज-अवधि बढ़ा ही दिए हैं, स्वाभाविक है, इस बात की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को होगा ही। इस दृष्टि से ”मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर ‘चारो खाने चित’ दिखाई दिया। देश के लोगों को, खासकर पुरातत्व और विरासत प्रेमियों को, चाहे वे ‘देशज’ हों या ‘विदेशज’, यह समझ लेना चाहिए कि वे कई शताब्दी पुराने न्यूनतम आठ पुरातत्वों को अपने जीवनकाल में देखने से वंचित रह जायेंगे। 

जनसँख्या के दृष्टिकोण से अगर भारत के लोगों की आयु संभाविता (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) को देखें तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यह 70 वर्ष है 2026 तक। इस दृष्टि से भारत में आज 162.8 मिलियन लोग 60+ वर्ष के हैं। यानी आगामी 2050 में, जब तक दिल्ली गोल्फ क्लब का विस्तारित लीज अवधि है, वे सभी अपने जीवन प्रत्याशा उम्र से 15 वर्ष अधिक के रहेंगे, अगर जीवित रहे तो। और आज जो 50-वर्ष के हैं, जिनकी संख्या करीब 250 मिलियन है, दिल्ली गोल्फ क्लब की अगली लीज के नवीकरण के समय जीवन प्रत्याशा उम्र को पार कर जायेंगे। यानी इस धरती पर पैदा होने के बाद भी उन्हें अपने देश, देश की राजधानी में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्वों, विरासतों को देखे बिना धरती से कूच करना होगा। फिर ‘मोदी है तो मुमकिन है’ का क्या मतलब? 

विडम्बना यह है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासतों और धरोहरों की गरिमा के प्रति न केवल भारत के लोगों के लिए, बल्कि वैश्विक स्तर पर आकर्षण का मार्ग ढूंढ रहे हैं, प्रशस्त कर रहे हैं; वहीं दूसरे तरफ उन्हीं के मंत्रिमंडल के लोग देशज-विदेशज पर्यटकों को दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर के विरासतों को देखने से वंचित कर रहे हैं। यानी केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय और मंत्री के सामने सम्मानित प्रधानमंत्री की बातों का, विचारों का – कोई मोल नहीं।  

संसद में साहू ने कहा कि “पिछली बार लीज़ का विस्तार दिल्ली गोल्फ क्लब के अनुरोध पर वर्ष 2050 तक किया गया। यह विस्तार दिल्ली गोल्फ क्लब के उस अनुरोध को ध्यान में रखते हुए किया गया जिसमें क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की बात कही गई थी, क्योंकि 2016 से गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा बनने वाला था।” मंत्री के अनुसार, इस उद्देश्य के लिए बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए, दिल्ली गोल्फ क्लब ने लंबी अवधि की योजना के तहत लीज़ को 2070 तक बढ़ाने का अनुरोध किया था। दिल्ली गोल्फ क्लब की स्थापना 1930 के दशक की शुरुआत में एक म्युनिसिपल कोर्स के तौर पर हुई थी और पहले इसे लोधी गोल्फ क्लब के नाम से जाना जाता था। मंत्री ने ‘लीज अवधि’ तो विस्तारित कर दिए, लेकिन यह नहीं सोचे कि प्रधानमंत्री का सांस्कृतिक विरासतों से संबंधित प्रयासों का क्या होगा?

वैसे, दिल्ली गोल्फ क्लब के आस-पास ही नहीं, दिल्ली सल्तनत के लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अगर पुराने कानूनों को रद्द करने, उनमें संशोधन करने पर विशेष जोर दिया और परिणामस्वरूप अगस्त 2025 तक 1,500 से अधिक पुराने या अनावश्यक केंद्रीय अधिनियमों को रद्द किया जा सकता है; तो दिल्ली गोल्फ क्लब के लीज को ‘शर्तयुक्त’ क्यों नहीं किया जा सकता है, ताकि भारत के लोगों को ऐतिहासिक पुरातत्व और विरासतों को, जो परिसर के अंदर है, प्रतिबंधित है, देखने से वंचित नहीं होना पड़े। लोगों का कहना है कि सरकार ने विभिन्न कानूनों के तहत 3,700 से अधिक प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया है या उन्हें सरल बनाया है, और 40,000 से अधिक अनुपालन आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया है। ज्ञातव्य हो कि भारत के विधि आयोग और विधायी विभाग द्वारा गठित दो-सदस्यीय समिति द्वारा 1824 ऐसे केंद्रीय कानूनों की पहचान किये गए थे, जो अब अनावश्यक और पुराने हो चुके थे। 

इतना ही नहीं, 1 जुलाई, 2024 से, भारतीय दंड संहिता, 1860 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की जगह क्रमशः भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने ले ली है। मुख्य बदलावों में सामुदायिक सेवा की शुरुआत, कानूनी प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण, न्याय के लिए अनिवार्य समय-सीमाएं, आतंकवाद की परिभाषाएं, और धाराओं का पुनर्कर्मांकन तथा उन्हें सुव्यवस्थित किया गया। ऐसी स्थिति में, अगर प्रधानमंत्री देश के लोगों के कल्याणार्थ, देश की गरिमा के लिए अंग्रेजी हुकूमत कालीन कानूनों को भारतीय बना सकते हैं तो फिर दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर स्थित पुरातत्व को देखने, समझने के लिए भारत के लोगों के लिए विशेष पहल तो कर ही सकते हैं।

वैसे भी, यह क्लब कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत रजिस्टर्ड है—जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी कंपनी है जिसका मकसद कॉमर्स, कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, रिसर्च, समाज कल्याण, धर्म, दान या पर्यावरण की सुरक्षा को बढ़ावा देना है। धारा 8 कंपनियों का मुनाफा सिर्फ़ उसी मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जिसके लिए उन्हें बनाया गया है। यह क्लब आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12A के तहत भी रजिस्टर्ड है, जिससे इसे आयकर देने से भी छूट मिलती है। आय-व्यय के बारे में तो सरकार का कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय है ही, जांच करने के लिए। 

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जाकिर हुसैन रोड पर 179 एकड़ ज़मीन पर बना है दिल्ली गोल्फ क्लब, जिसे केंद्र सरकार ने 1950 के दशक की शुरुआत में क्लब को लीज पर दिया था। हाई कोर्ट में कर्मचारियों की एक याचिका के मुताबिक, भले ही इस ज़मीन की कीमत पचपन हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा है, फिर भी क्लब केंद्र सरकार को हर महीने प्रति एकड़ सिर्फ़ 16,620 रुपये की नाममात्र की लाइसेंस फीस देता है। 

प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर शहरी विकास मंत्रालय ने अपने तीन अधिकारियों को क्लब की जनरल कमेटी का सदस्य बनाया है। क्लब आवेदन और सब्सक्रिप्शन फीस लेता है। इसके अलावा, सदस्यता के लिए चुने गए आवेदकों से एंट्री फीस 3.5 लाख रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक ली जाती है, जिसमें लागू टैक्स भी शामिल होता है। कहते हैं यहाँ करीब 4000 + सदस्य हैं। इस क्लब की खासमखास विशेषता यह है कि चतुर्दिक लाल रंग से रंगे चारदीवारी वाले इस क्लब में भारतीय नौकरशाहों, न्यायविदों, न्यायमूर्तियों, राजनेताओं, व्यापारियों, कारोबारियों, के साथ-साथ खिलाड़ियों की सदस्यता की सूची काफी लम्बी है।  

दिल्ली गोल्फ क्लब परिसर में नौ स्मारक स्थित हैं। 
1. लाल बंगला (प्रवेश द्वार के पास), 
2. गोल्फ क्लब में होल नंबर 6 के पास स्थित मस्जिद, 
3. गोल्फ क्लब में होल नंबर 4 के पास स्थित बगीची, 
4. गोल्फ क्लब में होल नंबर 10 के पास स्थित सैयद आबिद का मकबरा, 
5. गोल्फ क्लब में होल नंबर 14-16 के पास स्थित अज्ञात मकबरा, 
6. गोल्फ क्लब में होल नंबर 18 के पास स्थित अज्ञात मकबरा, 
7. बारह खंभा, 8. मीर तकी का मकबरा और 
9. स्विमिंग पूल से सटा हुआ स्मारक।

प्रवेश द्वार पर स्थित लाल बंगला को छोड़कर, दिल्ली गोल्फ क्लब में, ऐतिहासिक इमारतों को उनके अपने इतिहास से पूरी तरह से काट दिया गया है। अब वे किसी सांस्कृतिक या पुरातात्विक परंपरा की प्रतिनिधि बनकर खड़ी नहीं हैं, बल्कि उन्हें महज़ एक सजावटी वस्तु के तौर पर इस्तेमाल परिसर के अंदर है। अब तो इनके लाल बलुआही रंग को भी बदलकर सफ़ेद कर दिया गया है। परिसर के अंदर स्थित विरासतों की बात तत्काल के लिए किनारे कर, लाल बंगला, जो क्लब के प्रवेश द्वार के पास बाएं तरफ स्थित है, करते हैं। यह ‘प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958’ के तहत संरक्षित है। लाल रंग के एक बोर्ड पर लिखा है। कहते हैं कि सर लाल बंगला ही ‘राष्ट्रीय स्मारक’ घोषित है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। 

लेकिन यहाँ की अवस्था, बंगले की स्थिति, साफ़-सफाई देखकर ऐसा लगता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी शायद फाइलों पर अधिक साफ़-सफाई दिखा रहे हैं। इस बात को न तो संस्कृति मंत्रालय या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी प्रधानमंत्री को बताएँगे। शौचालय में प्रवेश जैसा मार्ग जो एक तरफ पुरातत्व और दूसरे तरफ दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा निर्मित लोहे के बाड़ से घिरा है, लाल बंगला परिसर की ओर जाता है। यहाँ निजी क्षेत्र के एक सुरक्षाकर्मी दिखे तो जरूर, लेकिन परिसर की गंदगी को देखकर, सूखे पत्तों का विशाल अम्बार देखकर, मिट्टी से बनी कई परतों की काई को देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसकी देखरेख करता है। 

दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर बिखरे हुए लगभग 10 स्मारक एक पहेली के टुकड़ों की तरह हैं। सबसे पहले तो, इनमें से ज़्यादातर जगहों पर जाना मना है और परिसर में प्रवेश करने के लिए क्लब अधिकारियों से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।  इसका मतलब यह भी है कि न केवल पर्यटक, बल्कि दिल्ली के कई लोग भी इन मध्ययुगीन इमारतों के अस्तित्व से अनजान हैं। इसके अलावा, गोल्फ कोर्स शायद एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ कोई दिल्ली के सभी सात शहरों के अवशेष देख सकता है। इनमें से ज़्यादातर स्मारक भव्य हैं, लेकिन वे गुमनाम मकबरे हैं — जो शहर के वास्तुशिल्प इतिहास के दस्तावेज़ीकरण में कमियों की ओर इशारा करते हैं।

लाल बलुआ पत्थर से बने दो मकबरों का एक समूह, जो निजामुद्दीन की ओर  से आते फ्लाईओवर से दिखाई देता है, का निर्माण 1779-80 में हुआ था। इन उत्तर-मुगलकालीन संरचनाओं के केंद्र में चौकोर कमरे हैं, कोनों पर छोटे चौकोर कमरे हैं जिनके बीच आयताकार हॉल हैं, और चौकोर छतों के केंद्र में गुंबद हैं। प्रवेश द्वार के पास वाला मकबरा ज़्यादा पुराना लगता है, जिसमें एक ऊँचे चबूतरे पर एक चौकोर कमरा बना है। दोनों का लेआउट केंद्रीय कक्ष के चारों ओर बने बड़े मकबरों जैसा है, लेकिन आकार में ये छोटे हैं। पास में ही उत्तर-मुगलकालीन दो-मंज़िला प्रवेश द्वार है, जिसमें एक केंद्रीय मंडप और गुंबददार छतरियाँ बनी हैं। 

लाल बंगला परिसर में घूमने, देखने से प्रतीत होता है कि यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी, या उनके द्वारा ठेकेदारी प्रथा से ही सही, श्रमिक कभी आये ही नहीं हैं। इस स्मारक या इस परिसर की मरम्मत कभी हुई ही नहीं है। यह जानना शोध का विषय है कि आखिर इसके रखरखाव पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अब तक कितनी राशि व्यय की है।अंदर प्रवेश के साथ दाहिने हाथ दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा निर्मित टेंट दीखते हैं। सामने क्लब के मैदान में घास काटने वालों की भीड़ दिखाई देती है। सामने मैदान में सफ़ेद रंग का मकबरा नुमा विरासत दिखाई देता है, जो सफ़ेद रंग का दीखता है । कहते हैं कि वह मकबरा सैयद आबिद, शाहजहाँ की सेना के एक प्रमुख सिपाही—खान दौराँ खान—के सहयोगी थे, की है। सामने लोहे के ग्रिल पर रसोइयों का वस्त्र भी दिखाई दिया। इस हिस्से में क्लब के कई पुराने सामानों के अलावे टूटे-फूटे सामानों का भण्डार भी दिखा। 

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कोई पांच साल पहले, यानी 19 अगस्त, 2021 को दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली गोल्फ क्लब और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से एक याचिका पर उनका पक्ष पूछा था । इस याचिका में दावा किया गया था कि नागरिकों को क्लब परिसर में स्थित स्मारकों को देखने की अनुमति नहीं दी जा रही है। जस्टिस रेखा पल्ली ने केंद्र, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग और दिल्ली गोल्फ क्लब को नोटिस भी जारी किए थे, जवाब भी माँगा था। कोर्ट ने केंद्र और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से अपने जवाब में विशेष रूप से इस बात का ज़िक्र करने को कहा कि यहाँ के अन्य ऐसे ही स्मारकों में प्रवेश की अनुमति है या नहीं क्योंकि मामला सिर्फ़ दिल्ली गोल्फ क्लब से जुड़ा नहीं है। लेकिन आज जब दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर अंदर स्थिर विरासतों को देखने पर प्रतिबन्ध देखा तो पांच साल पहले की घटना याद आ गयी। 

बहरहाल, लाल बंगला के मामले में, इस बात पर कुछ बहस है कि यहाँ किसे दफनाया गया है। ज्यादातर ऐतिहासिक खोजें इस बात की पुष्टि करती हैं कि यह मकबरा बेगम जान—सम्राट शाह आलम द्वितीय की बेटी—और उनकी माँ नवाब ज़ीनत महल साहिबा (जिन्हें लाल कुँवर के नाम से भी जाना जाता था) का है; शायद इसी नाम के कारण इस स्मारक का नाम भी पड़ा हो। कुछ अन्य लोगों का मानना है कि यह मकबरा लाल कुंवर का हो सकता है, जो औरंगजेब के बेटे जहाँदार शाह की पत्नी थीं। मूल लाल बंगला परिसर में तीन गुंबददार मकबरे है। प्राचीन प्रवेश द्वार के पास वाला मकबरा लगभग 1626 ईस्वी में बनाया गया था और इसमें सैयद आबिद की कब्र है, जो शाहजहाँ के प्रमुख सैनिकों में से एक, खान दौरन खान के सहयोगी थे। यह मकबरा आम जनता के लिए सुलभ नहीं है क्योंकि यह दिल्ली गोल्फ क्लब के परिसर के अंदर स्थित है। शेष दो मकबरों में मुग़ल शैली की वास्तुकला को दर्शाता है। ये मकबरे पास में ही बने सफ़दरजंग के मकबरे से वास्तुकला के मामले में काफ़ी मिलते-जुलते हैं।

कहते हैं कि लाल कुँवर को कभी गाने वाली लड़की, कभी नाचने वाली लड़की, कभी ‘नौच गर्ल’ या ‘कंचनी’ कहकर पुकारा जाता था। उनका दरबार से पहले कोई लेना-देना नहीं था और न ही वे किसी शाही परिवार से थीं, लेकिन धीरे-धीरे वे जहाँदार शाह की सबसे पसंदीदा साथी बन गईं। कहा जाता है कि उनके पिता, ख़ुसूसियत ख़ान, अकबर के ज़माने के मशहूर संगीतकार मियाँ तानसेन के वंशज थे। लाल कुंवर का बादशाह पर बहुत ज़्यादा असर था। उन्होंने बादशाह को ऐशो-आराम और मौज-मस्ती में डूबे रहने के लिए उकसाया, जिसकी वजह से आख़िरकार बादशाह का बहुत ही शर्मनाक पतन हुआ। इसका एक बहुत ही बुरा उदाहरण यह है कि उन्होंने अपनी सहेली ज़ुहरा को, जो दिल्ली की सड़कों पर फल और सब्ज़ियाँ बेचती थी, बादशाह की सबसे खास सेविका बना दिया था।

जहाँदार शाह का राज बहुत कम समय तक चला—29 मार्च 1712 से 11 फ़रवरी 1713 तक। उन्हें और लाल कुँवर, दोनों को ही जेल में डाल दिया गया था। इसके बाद जहाँदार शाह को पीट-पीटकर मार डाला गया और फिर उनका सिर काट दिया गया। जहाँदार शाह के शव को बाद में दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया—दो हाथियों से उल्टा लटकाकर—और फिर उन्हें हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया। लाल कुंवर सज़ा से बच गईं, और 17 जून 1759 को अपनी मृत्यु तक उन्हें सुहागपुरा में निर्वासित रखा गया। यह भी कहा जाता है कि दोनों मकबरे ज़ीनत महल साहिबा (जिन्हें प्यार से लाल कुंवर भी कहा जाता था) और बेगम जान के थे; ये दोनों ही दिवंगत मुगल बादशाह शाह आलम II (1728-1806) की माँ और बेटी थीं। 

कैर स्टीफन ने अपनी किताब “The Archaeology and Monumental Remains of Delhi” (1876 में प्रकाशित) में लिखा है कि इस मकबरे में एक कब्र मौजूद थी, जिसे हाल ही में वहाँ से हटा दिया गया था। यह कब्र बेगम जान की थी—जो शाह आलम II की बेटी थीं। मज़े की बात यह है कि पहले मकबरे में मौजूद कब्रों में से एक कब्र को भी इन्हीं बेगम जान का बताया जाता है! हो सकता है कि पहले मकबरे में मौजूद दूसरी कब्र शाही परिवार के किसी और सदस्य की रही हो। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि पिछले कई सालों में ऐसी बहुत सी कब्रें (या स्मारक) गायब हो चुकी होंगी।

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कुछ विद्वानों का यह भी दावा है कि इस मकबरे में – जो अब पूरी तरह खाली है – कभी और भी कब्रें मौजूद थीं। ये कब्रें मिर्ज़ा सुल्तान परवेज़, मिर्ज़ा दारा बख्त (जिनकी मृत्यु 1849 में हुई थी; ये बीसवें और आखिरी मुगल बादशाह, बहादुर शाह ज़फ़र के सबसे बड़े बेटे थे) और मिर्ज़ा दाऊद की थीं। यह बात थोड़ी अजीब लगती है कि मिर्ज़ा दारा बख्त की मृत्यु के महज़ 25 साल बाद प्रकाशित हुई कैर स्टीफन की किताब में इन लोगों का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। इस तरह, यह भी एक और रहस्य बनकर ही रह जाता है। इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि तीन लापता मकबरे अकबर द्वितीय (मृत्यु 1837) के परिवार से जुड़े हैं। ज़ाहिर है, इस जगह में काफ़ी बदलाव आए हैं। लाल बंगला की कुछ मूल इमारतें अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी हैं, इसके घेरे के बचे हुए हिस्से को गोल्फ़ कोर्स में बदल दिया गया है, और पिछले कुछ सालों में छतरियों को भी हटा दिया गया है; ऐसे में आज यहाँ जो कुछ भी बचा है, वह उस मूल स्वरूप का बस एक छोटा सा हिस्सा भर है जो कभी यहाँ मौजूद था।

बहरहाल, विगत दिनों भारत का सर्वोच्च न्यायालय के  न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति  एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिल्ली पुलिस को राजधानी में सभी सुरक्षित स्मारकों और हेरिटेज जगहों को अतिक्रमण और तोड़-फोड़ से बचाने का निर्देश दिया। साथ ही, इन इमारतों को बचाने की तुरंत जरूरत पर ज़ोर दिया। कंजर्वेशनिस्ट और इतिहासकार स्वप्ना लिडल की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए, जिसमें इन ज़रूरी चिंताओं को बताया था। कोर्ट ने कहा, “हम दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को निर्देश देते हैं कि वे उन सभी लोकल स्टेशन हाउस ऑफिसर को निर्देश दें जो या तो सुरक्षित हैं या हेरिटेज या ऐतिहासिक महत्व की जगहों की कैटेगरी में आते हैं, ताकि उन्हें अतिक्रमण या तोड़-फोड़ के खतरे से बचाया जा सके।” कोर्ट दिल्ली के रहने वाले राजीव सूरी की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें डिफेंस कॉलोनी में शेख अली की गुमटी को बचाने की मांग की गई थी। 

न्यायालय ने लिडल की रिपोर्ट की जांच की, जिसमें महरौली में प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स के 100 मीटर के बैन एरिया में बन रहे स्ट्रक्चर दिखाने वाली तस्वीरें शामिल थीं। उन्होंने कई जगहों पर तोड़-फोड़ के मामलों का भी ज़िक्र किया। लिडल ने दिल्ली सरकार को अपने आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा कंज़र्व किए जा रहे कई स्ट्रक्चर को “प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स” के तौर पर नोटिफ़ाई करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। सीनियर एडवोकेट शिखिल सूरी ने कहा, “दिल्ली में 48 मॉन्यूमेंट हैं जिन्हें दिल्ली सरकार को प्रोटेक्टेड के तौर पर नोटिफाई करना है, लेकिन 2015 से ऐसा नहीं किया गया है।” उनकी रिपोर्ट में 1397 के मॉन्यूमेंट ‘तरबूज का गुंबद’ का उदाहरण दिया गया, जो अभी साउथ दिल्ली के एक स्कूल में है। इसमें दिल्ली गोल्फ क्लब में मुगल-काल के तीन स्ट्रक्चर को भी मार्क किया गया है जो बहुत खराब हालत में हैं।

पीठ ने कहा: “हमें लगता है कि गोल्फ क्लब के अंदर के स्ट्रक्चर पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किए गए हैं। इंटेक ने दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा स्ट्रक्चर का पूरी तरह से मेंटेनेंस करने की ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए सुपरविज़न और विजिलेंस न रखकर आंखें मूंद ली हैं। हमें नई दिल्ली म्यूनिपाल कौंसिल का ऐसा बर्ताव लापरवाही का एक बड़ा मामला लगता है।” नई दिल्ली म्यूनिपाल कौंसिल के वकील ने बताया कि ज़मीन क्लब को लीज़ पर दी गई थी। बेंच ने कहा, “एक बार जब आप इसे दे देते हैं, तो आप इस पर सोते रहते हैं और इसकी परवाह नहीं करते। ऐसा लगता है कि राज्य इन स्ट्रक्चर की हेरिटेज वैल्यू को नहीं समझता है। वे पूरी तरह से खराब हो चुके हैं और उन पर पेड़-पौधे उग रहे हैं।”इंटेक की 2021 की रिपोर्ट में दिल्ली में 1,100 से ज़्यादा नोटिफ़ाइड हेरिटेज साइट्स और स्ट्रक्चर्स का डॉक्यूमेंटेशन है, जो मुगल-पूर्व से लेकर कॉलोनियल समय के आखिर तक के समय को कवर करते हैं।

इतना ही नहीं, विगत दिनों अपने आदेश के जानबूझकर किए गए उल्लंघन पर सख्त रुख अपनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को अवमानना का नोटिस जारी किया है। यह नोटिस राष्ट्रीय राजधानी में 173 अधिसूचित विरासत स्थलों के संरक्षण की स्थिति पर जवाब दाखिल करने में विफल रहने के कारण जारी किया गया है।

तस्वीरें: संजय शर्मा 

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