नई दिल्ली: आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन जब तक पुरानी दिल्ली में लालकिले के सामने से उम्र से लम्बी चांदनी चौक सड़क के बाएं हाथ गली कासिमजान स्थित मिर्जा ग़ालिब की हवेली जीवित रहेगा, गुलजार साहब जीवित रहेंगे। वजह है गुलजार के द्वारा ग़ालिब के सम्मान में स्थापित संगमरमर से बनी ग़ालिब की प्रतिमा। वैसे दिल्ली सल्तनत के लोगों को, नेताओं को, अधिकारियों को ‘ग़ालिब’ और ‘गुलज़ार’ को समझना आसान नहीं तो मुश्किल जरूर है।
इसके अलावे भी गुलजार की सोच और उनकी कलम का लोहा तो दुनिया मान ही चुकी है। ऑस्कर से सम्मानित होना ‘मजाक’ थोड़े ही है। अगर ऐसा होता तो हमारे देश के सैकड़ों नहीं, हज़ारों नेतागण सम्मानित हो गए होते अब तक। लेकिन आज शायद देश के अब तक बने सभी प्रधानमंत्रियों में नरेंद्र मोदी के बाद आज के बच्चे अगर किसी भी प्रधानमंत्री का नाम बता सकता है तो वे है – डॉ मनमोहन सिंह, अटल बिहार वाजपेयी, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू। शेष बचे प्रधानमंत्रियों को जानने के लिए शायद बच्चों को गूगल महाशय के शरण में आना पड़े।
परन्तु ‘गुलजार’ की कलम से शब्दबद्ध ‘जंगल बुक’ का ‘शीर्षक गीत’ न केवल देश के बच्चे, बल्कि जवान, बूढ़े, समाज-सेवक, राजनेता, नौकरी पेशे के लोग, बनिया, व्यापारी, चिकित्सक, मजदूर, या यूँ कहें कि समाज का शायद ही कोई वर्ग और शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जो नहीं सुना होगा, या नहीं गुनगुनाया होगा। बच्चों की बात ही अलग है।
शायद श्रोताओं को यह मालूम नहीं हो। गुलजार साहब के इस गीत को कोई और संगीतकार संगीत देने वाला था। लेकिन कहते हैं समय बड़ा बलवान। अंतिम समय में वह संगीतकार ‘गच्चा’ दे दिया। परिणाम यह हुआ कि दूरदर्शन वाले गुलजार साहब से एक अच्छे संगीतकार के बारे में पूछे जो इस गीत में संगीत दे। गुलजार साहब तत्काल विशाल भारद्वाज का नाम लिए। गीत बना, संगीत बना। लेकिन दूरदर्शन में आखिर हैं तो सभी सरकारी अधिकारी, ‘एक शब्द’ के इस्तेमाल पर अटक गए। उधर दूरदर्शन के अधिकारी ‘अटके’, उधर गुलजार साहब ‘भड़के’ और कहे कि ‘गंदगी सोचने वालों के दिमाग में होता है।’ दूरदर्शन वाले अंततः गुलजार साहब के सामने झुके और गुलजार साहब का गीत और विशाल भारद्वाज का संगीत विश्वविख्यात हो गया:
जंगल जंगल बात चली है पता चला है
अरे चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है

इस गीत का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि भारत के राजनीतिक गलियारे में ‘चड्डा पहन के फूल खिला है – फूल खिला है’ हो गया है । राघव ‘चड्डा’ के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने अपने-अपने हाथों से ;झाड़ू’ त्यागकर, हाथ धोकर, ‘कमल’ हाथ में ले लिए हैं। इनके भाजपा में शामिल होने के साथ ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राज्यसभा में मजबूत स्थिति में पहुंच चुकी है। हालांकि उच्च सदन में सत्तारूढ़ गठबंधन दो-तिहाई बहुमत से अब भी 18 सदस्य दूर है, जबकि भाजपा सदन में साधारण बहुमत से महज 10 सांसद पीछे है। राज्यसभा में राजग के पास अब 145 सांसदों का समर्थन है। कुल 244 सदस्यों वाले सदन में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 163 होता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि राजग राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लेता है, तो उसके लिए संविधान संशोधन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराना आसान हो जायेगा। लोकसभा में भी राजग के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है, हालांकि उसे साधारण बहुमत प्राप्त है। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 363 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन द्वारा आप संसदीय दल के भाजपा में विलय को मंजूरी दिए जाने के बाद सत्तारूढ़ पार्टी के पास कुल 113 सांसद हो जाएंगे. फिलहाल भाजपा के पास 106 सांसद हैं। सत्तारूढ़ दल को सात मनोनीत सदस्यों और दो निर्दलीय सांसदों का समर्थन मिलने की भी संभावना है, जिससे भाजपा के समर्थन में सांसदों की संख्या 122 तक पहुंच जाएगी, जो सदन के सदस्यों की संख्या का ठीक आधा है।
ज्ञातव्य हो कि 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में महिला आरक्षण (131वां संविधान संशोधन) बिल गिर गया, क्योंकि यह 352 मतों (दो-तिहाई बहुमत) की अनिवार्य संख्या तक नहीं पहुँच पाया। इसके पक्ष में केवल 298 वोट पड़े, जबकि 230 सदस्यों ने विरोध किया, जिससे यह 54 मतों के अंतर से पास नहीं हो सका। यह बिल परिसीमन से जुड़ा था। राज्यसभा में सामान्य बिल पास करने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत (50%+1) की आवश्यकता होती है, जबकि संवैधानिक संशोधनों के लिए विशेष बहुमत (कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित सदस्यों का 2/3) चाहिए। अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, NDA के पास राज्यसभा में लगभग 145 सांसद हैं, जो साधारण बहुमत के लिए पर्याप्त है। लेकिन विशेष बहुमत (2/3) के लिए 245 के सदन में 163-164+ की आवश्यकता होगी।
बहरहाल, आम आदमी पार्टी अभी ‘वयस्क’ भी नहीं हुई है। उम्र के मुताबिक आगामी 12 नवम्बर को आम आदमी पार्टी ’14-वर्ष’ की होगी। पार्टी को भारत के एक नए मतदाता की आयु तक पहुँचने में अभी चार वर्ष और लगेंगे, यानी 26 नवम्बर 2012 को गठित आम आदमी पार्टी 26 नवम्बर 2030 को, अर्थात 18वीं लोकसभा का जून 2029 में कार्यकाल समाप्त होने और 19 वीं लोकसभा के गठन के 17 महीने बाद, भारत के एक नए मतदाता की आयु में प्रवेश करेगी। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आम आदमी पार्टी के नेता अपनी उम्र को आधार मानकर स्वयं भू ‘वरिष्ठ नेता’ से अलंकृत हो रहे हैं। मुख्यमंत्री होना, मंत्री होना, लोकसभा और राज्यसभा की कुर्सियों पर बैठना ‘वरिष्ठ नेता होने या कहलाने का मापदंड नहीं हो सकता है। दुर्भाग्य यह है कि पार्टी में किसी भी कार्यकर्ता को ‘वरिष्ठ कार्यकर्ता’ शब्द से अलंकृत नहीं किया जाता है। यह बात आम आदमी पार्टी के साथ ही नहीं, बल्कि भारत में जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं, चाहे क्षेत्रीय हैं अथवा राष्ट्रीय, सभी पर लागू होती है जहाँ पाँच साल पार्टी में शरणागत होने के साथ ही सभी ‘वरिष्ठ नेता’ शब्द से स्वयं भू अलंकृत होने लगते हैं।

आम आदमी पार्टी में, अगर 2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव को आधार माना जाए, तो यहाँ औसतन 40-45 वर्ष की आयु वाले लोग इसके सदस्य थे। इतना ही नहीं, उस कालखंड में जिन 70 लोगों को विधानसभा चुनाव में उतारा गया था, उनकी आयु सीमा न्यूनतम 27 वर्ष और अधिकतम 66 वर्ष था। वैसी स्थिति में अगर नेतागण स्वयं को ‘वरिष्ठ’ मान लें, तो कुछ और हो न हो, पार्टी प्रतिवर्तन में मदद अवश्य मिलता है। वैसे कल जब 11 नवम्बर, 1988 को जन्म लिए 37-वर्षीय राघव चड्डा अपने सात अन्य राज्य सभा सांसदों के साथ आप आदमी पार्टी की सीमा रेखा से छलांग लगाकर भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किये यह कहते कि “आम आदमी पार्टी अपने सिद्धांतों, मूल्यों और नैतिकता से भटक गयी है, अब यह पार्टी देश हित में कार्य नहीं कर, स्वहित में अधिक कार्य करती है’, तो जंतर मंतर के साथ-साथ रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के विरुद्ध चिल्ला-चिल्ला कर बोलने वाले अन्ना हज़ारे याद आ गए।
15 जून 1937 को गुजरात के भिंगर में जन्म लिए किसान बाबूराव हज़ारे, जो बाद में ‘अन्ना हज़ारे’ के नाम से चर्चित हुए, को आम आदमी पार्टी सहित, देश के कई राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ सैकड़ों लोगों ने, जो बाद में पहले ‘तथाकथित नेता’ बने और फिर स्वयं भू नेताओं की श्रेणियों में पंक्तिबद्ध हो गए, शायद अन्ना हज़ारे के आंदोलन की नैतिकता को, मूल्य को, सिद्धांतों को अपने-अपने पैरों तले रगड़ते राजनीति में आगे बढ़ने में कोई कोताही नहीं किये, आज भी नहीं कर रहे हैं। आज दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों नेता हैं जो अपने-अपने कलेजे पर हाथ रखकर जब सोचेंगे तो उन्हें अपनी-अपनी बेईमानी दिखेगी। लेकिन देखेंगे नहीं।
कल राघव चड्डा बीजेपी मुख्यालय पहुंचकर पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात की। फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि जिस आम आदमी पार्टी को मैंने अपनी जिंदगी के 15 साल दिए, अब वह पार्टी ईमानदार राजनीति से दूर हो गई है। फिर कहा कि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 सदस्य हैं, जिसमें दो-तिहाई सदस्य – हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल – उनके साथ हैं और सभी भाजपा में शामिल हो रहे हैं।
वैसे, राघव चड्डा ही नहीं, दिल्ली विधानसभा के माननीय विधायक गण भी इस बात से भिज्ञ होंगे कि 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद आई एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के अनुसार, 70 चुने हुए विधायकों में से 24 (या 34%) ने अपने ऊपर आपराधिक मामले होने की घोषणा की। आम आदमी पार्टी के 67 विधायकों में से 23 ने और भारतीय जनता पार्टी के 3 विधायकों में से 1 ने आपराधिक मामलों की घोषणा की। रिपोर्ट में यह बताया गया कि 2015 में ऐसा कोई भी विधायक नहीं था जिसने हत्या या हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों की घोषणा की हो।
2020 विधानसभा चुनावों पर एडीआर की एक रिपोर्ट के अनुसार, नए चुने गए 50% से अधिक विधायकों ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए थे, जैसे कि मारपीट, हत्या, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े मामले।इसी तरह, 2025 की एडीआर रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के 31 विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं, जिनमें से 17 पर भ्रष्टाचार और गंभीर अपराधों सहित गंभीर आरोप हैं। रिपोर्टों से पता चलता है कि आम आदमी पार्टी के 68% नवनिर्वाचित उम्मीदवारों और भारतीय जनता पार्टी के 33% विधायकों पर आपराधिक मामले लंबित हैं, जो गंभीर आरोपों में वृद्धि को दर्शाता है। राघव चड्डा को इन बातों का भी जिक्र करना चाहिए था।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, चड्ढा ने कहा कि आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ दी है और वे एक गुट के तौर पर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। चड्ढा ने कहा कि पार्टी के सांसद हरभजन सिंह और स्वाति मालीवाल भी आम आदमी पार्टी छोड़ दिए हैं। अपने इस कदम को सही ठहराते हुए, चड्ढा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तारीफ़ की और कहा कि सरकार ने “मज़बूत फ़ैसले” लिए हैं, जिन्हें लेने से पिछली सरकारें हिचकिचाती थीं; इनमें आतंकवाद से निपटना और भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति को मज़बूत करना शामिल है।
चड्ढा ने कहा, “AAP, जिसे मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह अपने सिद्धांतों, मूल्यों और बुनियादी नैतिकता से भटक गई है। अब यह पार्टी देश के हित में काम नहीं करती, बल्कि अपने निजी फ़ायदे के लिए काम करती है… पिछले कुछ सालों से, मुझे महसूस हो रहा था कि मैं गलत पार्टी में सही आदमी हूँ। इसलिए, आज हम यह ऐलान करते हैं कि मैं AAP से खुद को अलग कर रहा हूँ और जनता के करीब जा रहा हूँ।”
उधर, अन्ना हजारे ने कहा कि अगर आम आदमी पार्टी ‘सही’ रास्ते पर चलती तो राघव चड्ढा और पार्टी के छह अन्य राज्यसभा सदस्य पार्टी नहीं छोड़ते। हजारे ने कहा, ‘लोकतंत्र में हर किसी को अपनी राय रखने का अधिकार है. उन्हें (चड्ढा और अन्य लोगों को) कुछ परेशानी का सामना करना पड़ा होगा, इसलिए वे चले गए। हज़ारे के अनुसार, ‘यह उनकी (आप नेतृत्व की) गलती है। अगर पार्टी ने सही राह अपनाई होती, तो वे पार्टी नहीं छोड़ते। चड्ढा और अन्य लोगों को आप के भीतर कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा और इसीलिए उन्होंने पार्टी छोड़ी।’

राघव चड्ढा की प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद, AAP के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने मीडिया को संबोधित किया और भाजपा पर एक बार फिर विरोधी पार्टियों के नेताओं को तोड़ने के लिए “ऑपरेशन लोटस” शुरू करने का आरोप लगाया। उन्होंने राघव चड्ढा और पार्टी छोड़ने वाले अन्य सांसदों की भी कड़ी आलोचना की और कहा कि पंजाब की जनता उन लोगों को कभी माफ़ नहीं करेगी, जिन्होंने उनके साथ विश्वासघात किया है। पंजाब के लोगों को इन सात नामों को याद रखना चाहिए। वे उन लोगों को कभी माफ़ नहीं करेंगे जिन्होंने उनके साथ विश्वासघात किया है। पार्टी ने राघव चड्ढा को विधायक और सांसद बनाया; पंजाब के लोगों ने उन्हें क्या कुछ नहीं दिया? और अब, वह BJP की गोद में जाकर बैठ गए हैं,” संजय सिंह ने कहा।
एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर, दिल्ली चुनावों के बाद 2015 में उन्हें आम आदमी पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। उन्हें अक्सर अरविंद केजरीवाल का करीबी सहयोगी और संस्थापक सदस्य बताया जाता था। उन्होंने दिल्ली के विधायक (राजिंदर नगर) के रूप में और बाद में पंजाब से राज्यसभा सांसद (2022–2026) के रूप में कार्य किया। चड्डा के अनुसार, AAP, जिसे मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और जिसे मैंने अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह अपने सिद्धांतों, मूल्यों और मूल नैतिक आदर्शों से पूरी तरह भटक गई है।” चड्ढा को हाल ही में राज्यसभा में AAP के उप-नेता पद से हटा दिया गया था और उनकी जगह उच्च सदन में मित्तल को नियुक्त किया गया था।
राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 सांसद हैं। राघव चड्डा का कहना है कि दो-तिहाई से ज़्यादा सांसद उनके साथ हैं। सभी ज़रूरी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं जो राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की तारीफ करते चड्डा न कहा कि “जनता ने इस नेतृत्व को एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि तीन बार अपना समर्थन दिया है और अब वे सभी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में और अमित शाह के साथ काम करने के लिए उत्सुक हैं। उधर, आप के दिल्ली के प्रमुख सौरभ भारद्वाज ने चड्ढा की आलोचना करते हुए उन पर यह आरोप लगाया कि वे संसद में बड़े राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय “सॉफ्ट जनसंपर्क) को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं। हम सब अरविंद केजरीवाल जी के सिपाही हैं, और हमने सिर्फ़ एक ही बात सीखी है: ‘जो डर गया समझो मर गया’… क्योंकि एक छोटी पार्टी के पास संसद में बहुत कम समय होता है, इसलिए देश के बड़े मुद्दों को उठाना ज़्यादा ज़रूरी है।”
अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी पर निशाना साधते हुए चड्ढा ने कहा कि पार्टी अब देश के लिए नहीं, बल्कि अपने फ़ायदे के लिए काम कर रही है। उन्होंने कहा, “पिछले कुछ सालों में, मुझे यह एहसास तेज़ी से हुआ है कि मैं गलत पार्टी में सही व्यक्ति हूँ। आज, मैं आप से अलग होने और ‘जनता’ (आम लोगों) के साथ ज़्यादा करीब से काम करने के अपने फ़ैसले की घोषणा करता हूँ।” एक अन्य राज्यसभा सांसद, संदीप पाठक ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसी स्थिति आएगी, लेकिन ऐसा हो गया है। पाठक ने कहा, “10 साल तक मैं इस पार्टी से जुड़ा रहा। और आज, मैं आम आदमी पार्टी से अपने रास्ते अलग कर रहा हूँ।”

वैसे दिल्ली में लोगों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ने में किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं है, लेकिन अपने हित में आम लोगों की वेदना और संवेदना के साथ खेलना, यह राजनीति का हिस्सा नहीं होना चाहिए, जिसे राघव चड्डा ने किया। बंगाली मार्किट के एक दुकानदार का कहना है कि संसद में जिन बातों को उन्होंने उठाया, लगा जैसे आम लोगों की बात हो रही है; लेकिन अब लगता है वह भी राजनीति का हिस्सा था अपने आप को ‘प्रोमोट’ करने के लिए।
मध्यम वर्ग की आवाज़ के तौर पर जाने जाने वाले चड्ढा ने संसद में अक्सर ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिनका सीधा असर आम नागरिकों की आर्थिक स्थिति और अधिकारों पर पड़ता है। यहाँ 10 ऐसे प्रमुख मुद्दे दिए गए हैं जिन्हें उन्होंने उठाया और जो काफी वायरल हुए। उन्होंने “10 मिनट में डिलीवरी” वाले मॉडलों से पैदा होने वाले भारी दबाव की आलोचना की, और आरोप लगाया कि ये प्लेटफॉर्म ‘गिग वर्कर्स’ (अस्थायी कर्मचारियों) के साथ “हेलमेट पहने बंधकों” जैसा बर्ताव करते हैं। उन्होंने डिलीवरी कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा लाभ, उचित वेतन और बेहतर सुरक्षा मानकों की मांग की। इसी तरह, ‘पितृत्व अवकाश’ को एक कानूनी अधिकार के तौर पर मान्यता देने की ज़ोरदार वकालत की, और इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चों की देखभाल एक साझा ज़िम्मेदारी है। उन्होंने तर्क दिया कि पिताओं को अपने करियर और बच्चे के जन्म के बाद अपने परिवार का सहारा बनने के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए।
यह बताते हुए कि यात्रियों का हर साल ट्रैफिक में लगभग 168 घंटे बर्बाद हो जाता है, उन्होंने एक राष्ट्रीय मिशन का प्रस्ताव रखा। इस मिशन का उद्देश्य बेहतर पार्किंग व्यवस्था और उन्नत सार्वजनिक परिवहन के ज़रिए शहरी भीड़भाड़ की समस्या से निपटना था। उन्होंने एयरलाइंस द्वारा अतिरिक्त सामान के लिए भारी शुल्क वसूलने, जबकि उड़ानों में बड़ी देरी होने पर कोई मुआवज़ा न देने की नीति की निष्पक्षता पर सवाल उठाया। उन्होंने एक ऐसी नीति की मांग की जो एयरलाइंस को जवाबदेह ठहराए, और जिसमें यात्रियों के बर्बाद हुए समय के आधार पर मुआवज़ा तय किया जाए।
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण बाज़ार में आई अस्थिरता को देखते हुए, उन्होंने SIP निवेशकों और छोटे बचतकर्ताओं के लिए एक “सुरक्षा कवच” की मांग की। इसके तहत उन्होंने म्यूचुअल फंड में ‘टैक्स-न्यूट्रल स्विचिंग’ (बिना टैक्स के एक फंड से दूसरे में जाने की सुविधा) और ‘सिक्योरिटीज़ ट्रांज़ैक्शन टैक्स’ (STT) में छूट जैसे उपायों का प्रस्ताव रखा। चड्ढा ने तर्क दिया कि इस्तेमाल न हुआ डेटा (unused data) उपभोक्ता की अपनी संपत्ति है। उन्होंने एक ‘रोलओवर सिस्टम’ (बचे हुए डेटा को अगले महीने में ले जाने की सुविधा) या दोस्तों और परिवार वालों को डेटा ट्रांसफर करने की सुविधा देने का सुझाव दिया, ताकि कंपनियाँ आधी रात को उस डेटा को ज़ब्त न कर सकें।
उन्होंने विवाहित जोड़ों को संयुक्त आयकर रिटर्न (Joint Income Tax Returns) दाखिल करने की सुविधा देने का प्रस्ताव रखा। इसके तहत उन्होंने एक “विवाह बोनस” (Marriage Bonus) का सुझाव दिया, जिससे मध्यम वर्ग के परिवारों पर टैक्स का कुल बोझ कम हो सके और रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया भी आसान हो जाए। उन्होंने बैंक खाते में कम बैलेंस होने पर लगने वाले शुल्क को “गरीबी पर लगाया गया जुर्माना” करार दिया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि बैंकों ने पिछले तीन वर्षों में इस मद से 19,000 करोड़ रुपये की वसूली की है, और मांग की कि किसानों तथा पेंशनभोगियों के लिए इन शुल्कों को माफ किया जाए। उन्होंने मासिक धर्म की स्वच्छता को एक मौलिक अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया, न कि किसी दान-पुण्य के कार्य के तौर पर; और लड़कियों को सैनिटरी पैड तथा एकांत उपलब्ध कराने के लिए एक व्यापक नीति की मांग की, जिसका उद्देश्य स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या को कम करना है।















