​फोटोग्राफी की दुनिया में ‘रघु राय’ होना इत्तेफाक नहीं, ‘सात-दशक की साधना का परिणाम’ था, अन्यथा ‘कैमरा पकड़ने वाले सभी रघु राय हो जाते’ ​

​इंदिरा गांधी की इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

सन 1974 के जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के समय जब श्री रघु राय उस क्रांति की तस्वीरों को क्लिक-क्लिक कर आने वाले दिनों के लिए छायाकारिता की दुनिया में इतिहास का पन्ना जोड़ रहे थे, मैं पटना और दिल्ली से प्रकाशित अख़बारों को पटना की सड़कों पर बेच रहा था । पद्मश्री रघु राय भी हम-आप जैसे एक सामान्य व्यक्ति थे । लेकिन उनकी दृष्टि और उनकी ऊँगली का कैमरे के साथ तारतम्य सामान्य नहीं थी । एक साधना का परिणाम था जो ईश्वर प्रदत्त था अन्यथा कैमरा पकड़ने वाले सभी रघु राय हो जाते। आज 83-वर्ष की आयु में रघु राय अंतिम सांस लिए।

@अखबारवाला001(209✍ #पद्मश्रीरघुराय: #फोटोग्राफी एक #दृष्टि है 👁 एक #साधना है जो स्वयं करना होता है

पिछले कुछ माह पहले @अखबारवाला001 यूट्यूब के लिए एक कहानी करने के निमित्त राय साहब से मिला था। सन 1974 में जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के दौरान जिस दिन पटना के कदमकुआं से जिस जीप पर जयप्रकाश नारायण बैठे थे, उसी जीप पर चालक के बगल में लटक कर कैमरे से इतिहास को किलिक-क्लिक कर रहे थे, मैं दसवीं कक्षा का छात्र था। परीक्षा दे चुका था और परीक्षाफल का इंतज़ार कर रहा था। अखबार बेचने का समय का अवसान होने वाला था और अखबार में लिखने-पढ़ने का समय आने वाला था।उस दिन श्री रघु राय दि स्टेट्समैन, दिल्ली संस्करण के मुख्य छायाकार थे। मैं नहीं जानता था कि जिस अखबार के वे मुख्य छायाकार थे रघु राय उस दिन, उसी अखबार में 25-साल बाद दिल्ली संस्करण में, मैं विशेष संवाददाता बनूँगा। जिस संडे पत्रिका की शुरूआती संस्करणों में रघु राय की तस्वीरें प्रकाशित होंगी, उसी संडे पत्रिका में उनके कार्य करने के कोई 12 साल बाद मैं भी संवाददाता बनूँगा। विगत माह मुद्दत बाद उनसे मिला था । बातचीत किया। वे कहे ‘आप प्रश्न करें’, मैंने कहा ‘मैं सिर्फ सुनने आया हूँ, आप कहें और कैमरा अपना काम करेगा।’

देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

ऐतिहासिक फोटो-पत्रकार/संपादक’ रघु राय जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के चश्मदीद गवाह थे। जिस दिन जय प्रकाश नारायण पर पटना की सड़कों पर लाठी प्रहार हुआ था, रघु राय उनके बगल में, उसी जीप पर सवार थे चालक के पास लटके हुए। जेपी पर लाठी प्रहार की वह तस्वीर दो दिन बाद दिल्ली से प्रकाशित स्टेट्समैन अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी। उधर संसद अपने सत्र में था। उस तस्वीर को देखकर एक और जहाँ सत्ता पक्ष के लोग लाठी प्रहार को गलत कह रहे थे, सत्ता से पदच्युत करने वाले सत्ताधारियों की तीव्र आलोचना कर रहे थे। रघु राय की वह तस्वीर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में भूचाल ला दी थी उन दिनों। पटना से लेकर भारत के प्रत्येक राज्यों में, दिल्ली में रघु राय ‘राय साहब’ हो गए।  

इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

रघु राय कहते हैं: “उस दिन 4 नवम्बर था। मैं दिल्ली से पटना पहुँच गया था। सुबह-सवेरे तैयार होकर, कैमरे उठाकर मैं जयप्रकाश नारायण के कदमकुआं स्थित घर पर पहुँचने निकल गया था। घर पर बहुत उथल-पुथल नहीं था। शांति थी। एक जीप सामने लगी थी। कुछ तीन-चार छात्र वाहिनी के युवक-युवतियां उपस्थित थी। लोगों की उपस्थिति नहीं देखकर किसी ने जेपी साहब को सलाह दिया कि या तो यात्रा रोक देते हैं अथवा कुछ समय और प्रतीक्षा करते हैं। इन शब्दों को सुनकर जेपी साहब कहते हैं ‘ना’ ‘ना’, हम जो भी हैं निकलेंगे और निकल लिए। 

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इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

“जब चलने की बात आई तब मैं जेपी साहब से कहा कि क्या मैं चालक के तरफ रह सकता हूँ? मैं किसी तरह कुछ स्थान बनाकर चालक की ओर खड़ा हो गया। तस्वीर लेने के लिए हमें कुछ स्थान भी चाहिए था और सामने जेपी साहब भी। हम लोग जब निकले अधिकाँश लोगों के घरों के द्वार बंद थे। कुछ चलने पर एक-दो- मंजिले मकान की खिड़कियों पर खड़े दो-चार लोग दिखे जो जेपी साहब को नमन कर रहे थे, हौसला बढ़ा रहे थे। जिंदाबाद – जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। यह देखकर हम सबों का मनोबल बढ़ा। मैं और मेरा कैमरा अपना काम कर रहा था – क्लिक-क्लिक।” 

राय साहब कहते हैं: “जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए दो, चार, दस, बीस लोग साथ होते गए। सड़क पर स्थानीय प्रशासन के तरफ से बहुत अधिक मात्रा में सुरक्षा की व्यवस्था थी। स्थानीय पुलिस (पटना पुलिस, बिहार पुलिस) के अलावे केंद्रीय रिजर्व पुलिस के बल तैनात थे। लेकिन टुकड़ियों में लोगों का हम लोगों के साथ मिलने के कारण जन सैलाब क्रमशः बढ़ रहा था। जैसे-जैसे घडी की सुई आगे बढ़ रही थी, जेपी साहब के प्रति लोगों का विस्वास भी बढ़ रहा था। उनके घर से आगे निकलने पर धीरे-धीरे उनके जीप के पीछे, आगे, दाहिने-बाएं सैकड़ों, हज़ारों की संख्या में लोग चलने लगे थे। रास्ते में विशाल जन सैलाब हो गया था।” 
 

इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

“कई घंटे बाद हम सभी आयकर चौराहे के पास पहुंचे थे। वहां की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही मजबूत थी। एक तरफ जनसैलाब था तो दूसरे तरफ वर्दी-टोपी धारी पुलिस बल। अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि कुछ होने वाला है। मैं तो जेपी के साथ था, इसलिए यह देख नहीं पाया कि और कितने छायाकार है। तभी अचानक पहले अश्रु गैस के गोले चले और फिर लाठी प्रहार। उस भगदड़ में कैमरा और स्वयं को सँभालते, सुरक्षित रखते क्लिक-क्लिक करता रहा। 

रघु राय का जन्म 1942 में झांग नाम के एक छोटे से गाँव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। उन्होंने 1965 में फ़ोटोग्राफ़ी शुरू की, और अगले ही साल ‘द स्टेट्समैन’ अख़बार में मुख्य फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। 1971 में पेरिस में उनके काम की एक प्रदर्शनी से प्रभावित होकर, हेनरी कार्टियर-ब्रेसन ने 1977 में राय को ‘मैग्नम फ़ोटोज़’ में शामिल होने के लिए नॉमिनेट किया। 

इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

राय ने 1976 में ‘द स्टेट्समैन’ छोड़ दिया और कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली एक साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘संडे’ के लिए पिक्चर एडिटर के तौर पर काम करने लगे। उन्होंने 1980 में यह काम छोड़ दिया और भारत की अग्रणी समाचार पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ के शुरुआती सालों में पिक्चर एडिटर/विज़ुअलाइज़र/फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर काम किया। 1982 से 1991 तक, उन्होंने विशेष अंकों और डिज़ाइनों पर काम किया, और सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर ज़बरदस्त पिक्चर निबंधों का योगदान दिया; इनमें से कई निबंध पत्रिका की चर्चा का मुख्य विषय बन गए। पिछले 18 सालों में, राय ने भारत की व्यापक कवरेज में विशेषज्ञता हासिल की है। उन्होंने 18 से ज़्यादा किताबें लिखी हैं, जिनमें ‘रघु रायज़ दिल्ली’, ‘द सिख्स’, ‘कलकत्ता’, ‘खजुराहो’, ‘ताजमहल’, ‘तिब्बत इन एग्ज़ाइल’, ‘इंडिया’ और ‘मदर टेरेसा’ शामिल हैं।

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इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

ग्रीनपीस के लिए, उन्होंने 1984 में भोपाल में हुई रासायनिक आपदा और गैस पीड़ितों के जीवन पर इसके लगातार पड़ रहे प्रभावों पर एक गहन डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट पूरा किया है। इस काम के परिणामस्वरूप एक किताब और तीन प्रदर्शनियाँ तैयार हुईं, जो 2004 से – जो इस आपदा की 20वीं वर्षगांठ थी – यूरोप, अमेरिका, भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया का दौरा कर रही हैं। राय को उम्मीद है कि यह प्रदर्शनी ज़्यादा जागरूकता पैदा करके कई जीवित बचे लोगों की मदद कर सकेगी – यह जागरूकता आपदा के बारे में भी होगी और पीड़ितों के बारे में भी – जिनमें से कई को अभी तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला है और जो भोपाल के आस-पास के दूषित वातावरण में ही रहने को मजबूर हैं।

रघु राय का फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया में आना काफ़ी हद तक एक इत्तेफ़ाक था। एक सिविल इंजीनियर, जो उस समय अपने काम से ब्रेक पर थे, 1960 के दशक में दिल्ली में अपने भाई, फ़ोटोग्राफ़र एस. पॉल से मिलने गए थे। वहीं उन्हें इस कला की बारीकियों से पहली बार परिचय मिला। हरियाणा के एक गाँव में एक दोस्त के साथ जाते हुए, उन्होंने अपनी पहली तस्वीरों में से एक खींची: एक गधा सीधे कैमरे की तरफ़ देख रहा था। इस तस्वीर से प्रभावित होकर, पॉल ने इसे लंदन के ‘द टाइम्स’ अख़बार को भेजा, जहाँ यह छपी। इससे राय को न सिर्फ़ इनाम की रक़म मिली, बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा अहम, फ़ोटोग्राफ़ी में एक ऐसा करियर मिला जो 26 अप्रैल को दिल्ली में अपनी मृत्यु तक उनके साथ रहा। वे 83 वर्ष के थे।

इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

दृढ़ निश्चयी, गहरी नज़र रखने वाले और बेहद जिज्ञासु राय ने अपनी हर तस्वीर में जान डाल दी और देश की नब्ज़ को पकड़ा। 2024 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “एक पेशेवर फ़ोटोग्राफ़र से कहीं ज़्यादा, मैं ज़िंदगी का एक खोजकर्ता बन गया।” हालाँकि अब वह ज़िंदगी ख़त्म हो चुकी है, लेकिन जो पल उन्होंने कैमरे में क़ैद किए, वे हमेशा उनकी समृद्ध तस्वीरों के संग्रह (आर्काइव) के रूप में हमारे बीच रहेंगे। इस संग्रह में फ़ोटो-पत्रकारिता से लेकर दस्तावेज़ीकरण और अलग-अलग क्षेत्रों—राजनीति से लेकर संस्कृति तक—की कुछ सबसे जानी-मानी हस्तियों के पोर्ट्रेट शामिल हैं।

भारत के सबसे जाने-माने फ़ोटोग्राफ़रों में से एक, राय पाँच दशकों से भी ज़्यादा समय तक एक फ़ोटो-पत्रकार भी रहे। उन्होंने अपनी सहज और अंतर्ज्ञानी भावना को उन सभी न्यूज़रूम में पहुँचाया, जिनका वे हिस्सा रहे। 2024 के उसी इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “अगर ज़िम्मेदार पत्रकारिता इतिहास का पहला मसौदा है, तो फ़ोटो-पत्रकारिता उस इतिहास के जिए जाने का पहला सबूत है। मेरे पेशे की पवित्रता की यह माँग है कि तस्वीरें लोगों के रोज़मर्रा के जीवन की गहराइयों में उतरें—उनकी भावनाओं और अलग-अलग स्थितियों पर उनकी प्रतिक्रियाओं को किसी भी दिए गए समय या स्थान पर कैमरे में क़ैद करें। मैं यहाँ सिर्फ़ सुंदर तस्वीरें बनाने या ऐसी दस्तावेज़ी तस्वीरें खींचने के लिए नहीं हूँ, जो महज़ जानकारी देती हों।”

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इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

तो सात दशकों के दौरान, 1972 के पद्म श्री विजेता ने देश के इतिहास के कई पहलुओं को अपने काम में समेटा, जिसमें 1984 में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ से ठीक पहले अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीरें भी शामिल हैं। उनकी कुछ सबसे यादगार तस्वीरें भोपाल गैस त्रासदी की जगह और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान शरणार्थियों की थीं। आपातकाल के दौरान एक फोटो जर्नलिस्ट के तौर पर काम करते हुए, उन्होंने सेंसरशिप से बचकर काम करने के तरीके ढूंढ निकाले। उन सालों को याद करते हुए, 2025 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “कई ऐसी तस्वीरें थीं जिन्हें छापा नहीं जा सका, जिनमें गिरफ्तार किए गए राजनीतिक नेताओं और प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें शामिल थीं। हमने प्रतीकात्मक तरीकों से सच्चाई को दिखाने के रास्ते निकाले।”

तो सात दशकों के दौरान, 1972 में पद्म श्री से सम्मानित इस कलाकार ने देश के इतिहास के कई पहलुओं को अपने कैमरे में कैद किया; इनमें 1984 में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ से ठीक पहले अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीरें भी शामिल हैं। उनकी कुछ सबसे यादगार तस्वीरें भोपाल गैस त्रासदी की जगह और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान शरणार्थियों की थीं। आपातकाल के समय एक फोटो जर्नलिस्ट के तौर पर काम करते हुए, उन्होंने सेंसरशिप से बचने और काम जारी रखने के कई तरीके खोज निकाले। उन दिनों को याद करते हुए, 2025 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “कई ऐसी तस्वीरें थीं जिन्हें छापा नहीं जा सकता था; इनमें गिरफ्तार किए गए राजनीतिक नेताओं और प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें शामिल थीं। हमने वास्तविकता को दिखाने के लिए नए तरीके अपनाए, जिसमें प्रतीकात्मक तस्वीरों का सहारा लिया गया।”

इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

1977 में, वह देश के पहले ऐसे फोटोग्राफर बने जिन्हें ‘मैग्नम फोटोज’ में शामिल होने का न्योता मिला। यह न्योता उन्हें महान फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसन की सिफारिश पर मिला था, जिन्होंने 1971 में पेरिस में आयोजित एक प्रदर्शनी में उनकी तस्वीरें देखी थीं। कार्टियर-ब्रेसन का मानवीय दृष्टिकोण राय के अपने काम में भी साफ झलकता है—चाहे वह पुरानी दिल्ली की हलचल भरी सड़कों की तस्वीरें हों, गंगा के घाटों की, अलग-अलग इलाकों के नज़ारे हों या फिर महाकुंभ की तस्वीरें।

इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे

आत्म-मंथन और चीजों को सहेजकर रखने के प्रति उनके झुकाव का प्रमाण उनकी कई किताबें भी हैं; इनमें ‘दिल्ली’, ‘रघु रायज़ इंडिया’, ‘पिक्चरिंग टाइम’ और ‘तिब्बत इन एग्ज़ाइल’ शामिल हैं। दूसरी ओर, ‘रघु राय: पीपल’ (2016) नामक किताब में उनके बेहतरीन पोर्ट्रेट्स (चित्र) का संग्रह है—जिनमें आम लोगों से लेकर जानी-मानी हस्तियां तक शामिल हैं। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, शहनाई के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, दलाई लामा, रोमन कैथोलिक नन मदर टेरेसा और फिल्म जगत की हस्तियां सत्यजीत रे और अपर्णा सेन प्रमुख हैं।

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