सनद रहे: खेत में काम करने वाली महिला, महिला मतदाताओं का “हक़” राजधानी की संभ्रांत महिलाएं न “खा” लें प्रधानमंत्री जी ….

देश की मिट्टी को छानती भारत की महिला मतदाता।  तस्वीर: संजय शर्मा 

संसद मार्ग, नई दिल्ली: भारत के संसद की ओर से आती सड़क संसद मार्ग जब सरदार बल्लभ भाई पटेल के नाम से अंकित पटेल चौक और पार्लियामेंट थाना को लांघते-फांदते, अपने दाहिने हाथ जयसिंह -II द्वारा निर्मित जंतर-मंतर और बाएं हाथ पार्क होटल से आगे 1929-1933 कालखंड में रोबर्ट रसल्ल के डिजाइन पर निर्मित और कोनॉट और स्ट्रैथर्न के प्रथम ड्यूक प्रिंस आर्थर के नाम से अलंकृत कनाट प्लेस के बाहरी घेरा से मिलकर अपना अस्तित्व समाप्त करती है, वहीँ सड़क के दूसरे तरफ मुद्दत से गरीबी रेखा से मीलों दूर रहने वाली दिल्ली की एक महिला मतदाता – ‘महिला आरक्षण विधेयक’ के बारे में नहीं जानती है। 

लेकिन, संसद के तरफ ऊँगली उठाते सत्तर-वर्षीय महिला, जो मिट्टी को छलनी से छान रही थी, कहती है कि “क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने बाद देश की किसी महिला को प्रधानमंत्री बनाएंगे जिस तरह श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थी, शायद नहीं ।” वह महिला तो सिर्फ इतना जानती है कि न केवल वह, बल्कि उसके जैसी कई करोड़ महिला, जो दिल्ली सहित, भारत के 28 राज्यों, आठ केंद्र शासित प्रदेशों के तक़रीबन 5,97,608 गांव में रहती है, सिर्फ एक महिला मतदाता है और अपने जीवन के अंतिम सांस तक मतदाता ही रह जाएगी। उसका मानना है कि यहाँ से एक किलोमीटर दूर भारत के संसद में प्रस्तुत महिला आरक्षण कानून का लाभ, देश और राज्य के शहरी इलाकों में रहने वाली “तथाकथित संभ्रांत” महिलाएं लाभ उठाकर उन करोड़ों महिला मतदाताओं को “थम्सअप” करेगी। 

बहरहाल, आज 7 अप्रैल है। विश्व के देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए आपसी सहयोग एवं मानक विकसित करने का दायित्व निभाते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 7 अप्रैल 1948 को विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना किया था। आज के दिन को भारतीय और वैश्विक इतिहास में ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो दिल्ली मेट्रो के रास्ते यमुना बैंक और इंद्रप्रस्थ के बीच रिंग रोड पर स्थित विश्व स्वास्थ्य संगठन का कार्यालय अवश्य देखे होंगे। नवनिर्मित गगनचुंबी इमारत के पीछे दिल्ली सचिवालय/आई.टी.ओ. की ओर से आता दुर्गंधित नाला इसी भवन के पीछे से निकलता है, जहाँ कई सौ झुग्गी और जानवर रहते हैं। खुली नाक से इस रास्ते जाना बीमारियों को साथ लाना है। 

आज के ही दिन, यानी 7 अप्रैल सन 1818 में अंग्रेजों द्वारा ‘बंगाल राज्य कैदी विनियमन अधिनियम’ लागू किया था। इसका जिक्र यहाँ इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि बंगाल में विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है। वैसे इसी माह 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में 294 पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्यों के लिए चुनाव होना निश्चित है। मतगणना और परिणाम की घोषणा 4 मई को होगा। 7 अप्रैल, 1920 को महान सितार वादक, जो बाद में भारतरत्न से भी अलंकृत हुए थे, पंडित रवि शंकर का भी जन्म हुआ था। 7 अप्रैल, 1969 को दुनिया में इंटरनेट का जन्म हुआ था। और आज के ही दिन कोई 199 वर्ष पहले, साल 1827 में महान रसायन शास्त्री जॉन वॉकर ने घर-घर की जरूरत माचिस की बिक्री शुरू की थी। 

और आज के ही दिन बिहार की राजधानी पटना की एक विशेष अदालत ने सन 1997 के अंतिम महीना (दिसंबर) के पहले दिन अरवल जिले के लखनपुर और बाथे गांव में 58 दलितों की निर्मम हत्या के मामले में 2010 में 16 दोषियों को फांसी और 10 को उम्र कैद की सजा सुनाई। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि 2010 में निचली अदालत द्वारा फांसी और उम्र कैद के सजा सुनाने के तीन साल बाद 9 अक्टूबर, 2013 को पटना उच्च न्यायालय के एक फैसले ने सभी 26 अभियुक्तों को बा-इज्जत बरी कर दिया। यानी, 1997 में मारे गए 58 लोगों को कोई न्याय नहीं मिल पाया। उन 58 मृतकों में 27 महिलाएं थी, जिसमें करीब 8 गर्भ से थी, 16 बच्चे थे जिसमें एक की आयु एक वर्ष थी। 

जिन आधारों पर दो न्यायमूर्तियों का पीठ ने अपना फैसला सुनाया, उनकी कानूनी वैधता या अन्यथा को एक तरफ़ रखते हुए पटना उच्च न्यायालय का कहा था कि जिन गवाहों के बयानों के आधार पर सेशंस जज ने आरोपियों को दोषी ठहराया था, वे भरोसेमंद नहीं थे। वह फैसला एक बार फिर गरीबों का गणतंत्र और संवैधानिक लोकतंत्र के सिद्धांतों पर से भरोसा डिगा दिया था। पटना उच्च न्यायालय ने अप्रैल 2012 में बथानी टोला (1996 में ऐसी ही परिस्थितियों में 21 दलितों की हत्या कर दी गई थी) मामले में दिए गए अपने फैसले को ही दोहराया। लक्ष्मणपुर-बाथे और बथानी टोला मामलों में आरोपियों का बरी होना कोई नई बात नहीं थी, आज भी नहीं है। 

राष्ट्रपति भवन के पिछले हिस्से के प्रवेश द्वार पर पानी की बोतल बेचती एक वृद्ध महिला मतदाता। तस्वीर: संजय शर्मा

आप कहेंगे कि आज के दिन इन बातों का जिक्र क्यों किया जा रहा है। आगामी 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद का एक विशेष बैठक आहूत किया गया है। बैठक का उद्देश्य है – महिलाओं के सशक्तिकरण पर ‘विशेष ध्यान’ सुनिश्चित करने के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लागू करने के उपायों में तेजी लाना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि आगामी 2029 के आम चुनावों से इस अधिनियम को लागू कर दिया जाय। इससे बेहतर बात और क्या हो सकती है – देश की महिलाएं मजबूत हों, सशक्त हों, आत्मनिर्भर हों। 

लेकिन देश में आज भी महिलाओं की साक्षरता कागज पर 100 अंक में करीब 35 अंक पीछे हैं। देश की कुल महिला आबादी लगभग 715 मिलियन, यानी कुल आबादी में 48.5 फीसदी की भागीदारी है। अगर 2024 के लोकसभा चुनावों में मतदान केंद्रों पर वोट डालने के मामले में महिलाओं की तुलना पुरुषों से करें, तो ये महिलाएं पीछे छोड़ दी। महिलाओं का मतदान प्रतिशत 65.8 रहा था, जबकि पुरुषों का प्रतिशत 65.6 था। हालांकि, संसदीय चुनावों में कुल 8,360 उम्मीदवारों में से केवल 9.5% महिलाएं थीं, और इनमें से जो 74 महिलाएं चुनकर आई, वे लोकसभा की कुल सीटों का 13.6% थीं।लोकसभा के आम चुनावों के इतिहास में यह दूसरी बार है जब महिलाओं की मतदान में भागीदारी पुरुषों की भागीदारी से ज़्यादा रही है। कुल मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी भी 2019 के आम चुनावों के 48.1% से बढ़कर 48.6% हो गई; इसी तरह, प्रति 1,000 पुरुष मतदाताओं पर महिला मतदाताओं की संख्या भी 2019 के चुनावों के 926 से बढ़कर 946 के नए उच्च स्तर पर पहुँच गई। 

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अगर इस ट्रेंड को आधार मानें तो आगामी 2029 लोकसभा चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या तक़रीबन 37+ करोड़ होगी, जबकि पुरुष मतदाता उस समय में महिलाओं की तुलना में पीछे (36+ करोड़) रहेंगे। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत का लोकतांत्रिक ढांचा, जिसकी अक्सर उसकी संस्थागत मजबूती और चुनावी जीवंतता के लिए तारीफ की जाती है, अपने ग्रामीण इलाकों में एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव से गुज़र रहा है। इस बदलाव के मूल में ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक दृश्यता और भागीदारी है। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में ग्रामीण महिलाओं का प्रवेश न केवल घरों के भीतर, बल्कि जाति परिषदों, ग्राम सभाओं और पार्टी संरचनाओं के भीतर भी पितृसत्तात्मक सत्ता को चुनौती दे रही हैं।  

लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते है कि आज भी भारत की कुल आबादी का आधा से अधिक हिस्सा 5,97,608 गांव में रहती है, जहाँ आज भी महिलाओं के घरों में शिक्षा की रोशनी नहीं पहुंची है। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि इन महिलाओं को अपने-अपने मताधिकारों का इस्तेमाल करने में स्वतंत्रता है अथवा नहीं, क्या आज भी ये महिलाएं महज मूक दर्शक या आश्रित की भूमिका में हैं, यह भी एक शोध का विषय है। अब 100 अंक में 35 अंक पीछे की अशिक्षित होने का पदक लिए इन महिलाओं को अगर यह कहा जाता है कि भारत के संसद में उनकी भागीदारी के लिए 33 फीसदी स्थान आरक्षित किया गया है – तो क्या सच में यह आरक्षण इन ‘वास्तविक महिलाओं, मतदाताओं के लिए होगा, या शहर की महिलाएं महिला आरक्षण के नाम पर संसद में बैठेंगे? खैर। 

कर्तव्य पथ। तस्वीर: संजय शर्मा

प्रथम आम चुनाव से लेकर 18 वें लोकसभा के गठन तक कुल 9546 लोकसभा सीटों पर 8766 पुरुषों का आधिपत्य  रहा, जबकि महिलाओं की संख्या मात्र 749 रही। प्रतिशत के हिसाब से यह 8.17% रहा। वैसे विद्वानों, विदुषियों, लेखकों ने अपना-अपना मंतव्य यह देते आये कि महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक निरक्षरता रही है। आम तौर पर, महिला उम्मीदवार पुरुष उम्मीदवारों की तुलना में कम शिक्षित और अनुभवी होती हैं। भारत में, पुरुषों की 82% साक्षरता दर की तुलना में महिलाओं की साक्षरता दर 65% है। इसके अलावे, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी महिलाओं में बताया गया। यह तथ्य कि महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने वाला विधेयक बार-बार पारित नहीं हो पाया, यह दर्शाता है कि कानून निर्माताओं में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। 

सभी पार्टियों के घोषणापत्रों में यह उपाय अभी भी शामिल है, लेकिन इसे कभी भी अमल में नहीं लाया गया है। इसके अलावे, (अपवाद को छोड़कर) महिलाएं वास्तव में अपने अधिकार का अनुभव नहीं कर पातीं, क्योंकि उनके निर्णयों में अक्सर उनके पुरुष जीवन साथी या परिवार के अन्य सदस्यों का दखल होता है। पंचायतों में ‘सरपंच-पति’ की प्रथा इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। महिलाओं को अभी भी शिक्षा, संसाधनों के स्वामित्व और लोगों के दृष्टिकोण के मामले में लैंगिक पूर्वाग्रहों और असमानताओं के रूप में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। आत्मविश्वास और वित्त की किल्लत भी महिलाओं को राजनीति में करियर बनाने से रोके रखा। इसके अलावे, श्रम का लैंगिक विभाजन एक ऐसी व्यवस्था रही है, और आज भी है, जिसमें घर की महिलाएं या तो घर के सारे काम खुद करती हैं या घरेलू सहायकों के माध्यम से करवाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में घर और बच्चों की देखभाल में कहीं अधिक समय देती हैं।

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क्या महिला आरक्षण अधिनियम इनके लिए भी है? तस्वीर: संजय शर्मा

यह बताते हुए कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला कानून एनडीए सरकार के शासनकाल में बनाया गया था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को जम्मू और कश्मीर में 16, 17 और 18 अप्रैल को होने वाली संसद की बैठक का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि इस बैठक में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में संशोधन पारित किया जाना है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस के लोगों को एक बैठक के लिए बुलाया गया है और उन्हें उम्मीद है कि वे सरकार की बात “सुनेंगे”। उन्होंने कहा कि इसका मकसद 2029 से संसद में महिलाओं का 33% प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि “यह हमारी ही सरकार है जिसने लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण दिया है, उसका लाभ 2029 के लोकसभा चुनावों से मिलना शुरू हो जाना चाहिए। संसद में महिलाओं की 33% भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक कानून बनाने की ज़रूरत है।

पहले आम चुनाव में 22 महिलाएं संसद में आयी थी, जबकि दूसरे लोक सभा में 27, तीसरे में 31, चौथे में 29, पांचवें में 28 छठे में 19, सातवें में 28, आठवें में 45, नवमी लोकसभा में 29, दसवीं लोक सभा में 39,  ग्यारहवीं में 40, बारहवीं में 43 तेरहवीं में 52, चौदहवीं लोकसभा में 45, पंद्रहवीं लोकसभा में 58, सोलहवीं में 62, सत्रहवीं में 78 और अठारहवीं लोक सभा में 74 महिलाएं लोकसभा में बैठीं। राज्यसभा की बात अलग है। 

बहरहाल, 1993 में पास हुए 73वें और 74वें संशोधन, जिन्होंने संविधान में पंचायतों और नगरपालिकाओं को शामिल किया, इन निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित किया था। संविधान में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए, जनसंख्या में उनकी संख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित करने का प्रावधान भी है। संविधान में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का कोई प्रावधान नहीं है। 2015 में, ‘भारत में महिलाओं की स्थिति पर रिपोर्ट’ में यह बात सामने आई कि राज्य विधानसभाओं और संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी बहुत कम है। इसमें यह बताया गया कि राजनीतिक दलों में निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं की उपस्थिति न के बराबर है। इसमें स्थानीय निकायों, राज्य विधानसभाओं, संसद, मंत्री स्तरों और सरकार के सभी निर्णय लेने वाले निकायों में महिलाओं के लिए कम से कम 50% सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी। ‘महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय नीति’ (2001) में कहा गया था कि उच्च विधायी निकायों में आरक्षण पर विचार किया जाएगा।

संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए संविधान में संशोधन करने वाले विधेयक 1996, 1998, 1999 और 2008 में पेश किए गए थे। पहले तीन विधेयक अपनी-अपनी लोकसभाओं के भंग होने के साथ ही समाप्त हो गए। 2008 का विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया और वहीं से पास भी हो गया, लेकिन 15वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही यह भी समाप्त हो गया। 1996 के विधेयक की जांच संसद की एक संयुक्त समिति ने की थी, जबकि 2008 के विधेयक की जांच कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति ने की थी। दोनों समितियों ने महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के प्रस्ताव पर सहमति जताई थी। समितियों द्वारा दी गई कुछ सिफारिशों में ये शामिल हैं: (i) सही समय पर अन्य पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षण पर विचार करना, (ii) 15 साल की अवधि के लिए आरक्षण देना और उसके बाद उसकी समीक्षा करना, और (iii) राज्यसभा और राज्य विधान परिषदों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के तौर-तरीके तय करना। 

क्या महिला आरक्षण अधिनियम इनके लिए भी है? तस्वीर: संजय शर्मा

बहरहाल, नया अधिनियम लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभा में महिलाओं के लिए, जहाँ तक संभव हो, सभी सीटों में से एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। यह लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा। यह आरक्षण इस बिल के लागू होने के बाद होने वाली जनगणना के प्रकाशित होने के बाद प्रभावी होगा। जनगणना के आधार पर, महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने हेतु परिसीमन किया जाएगा। यह आरक्षण 15 वर्षों की अवधि के लिए प्रदान किया जाएगा। हालांकि, यह तब तक जारी रहेगा जब तक संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा कोई तारीख निर्धारित नहीं कर दी जाती।

ज्ञातव्य हो कि 2023 में, भारत की संसद ने संविधान (एक सौ छठा संशोधन) अधिनियम, 2023, “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” पारित किया; जो संघीय ढांचे के सभी स्तरों पर सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के समान प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने की अपनी राष्ट्रीय यात्रा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ है। यह ऐतिहासिक कानून संसद के निचले सदन – लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं (जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभा भी शामिल है) में महिलाओं के लिए कुल सीटों में से एक-तिहाई सीटें बारी-बारी से आरक्षित करता है। इस प्रकार यह सार्वजनिक निर्णय लेने के उच्चतम स्तरों पर राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को संस्थागत रूप प्रदान करता है। सरकार ने “सशक्त पंचायत-नेत्री अभियान” शुरू किया है। यह एक व्यापक और लक्षित क्षमता-निर्माण पहल है, जिसका उद्देश्य पूरे देश में पंचायती राज संस्थाओं की महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों को सशक्त बनाना है। इसका मुख्य ज़ोर उनके नेतृत्व कौशल को निखारने, उनकी निर्णय लेने की क्षमताओं को बढ़ाने और जमीनी स्तर के शासन में उनकी भूमिका को मजबूत करने पर है। 

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बिल में कहा गया है कि हर परिसीमन प्रक्रिया के बाद आरक्षित सीटें रोटेशन के आधार पर आवंटित की जाएंगी। इसका मतलब है कि लगभग हर 10 साल में रोटेशन होगा, क्योंकि 2026 के बाद हर जनगणना के बाद परिसीमन होना अनिवार्य है। आरक्षित सीटों के रोटेशन से सांसदों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए काम करने का प्रोत्साहन कम हो सकता है, क्योंकि हो सकता है कि वे उस निर्वाचन क्षेत्र से दोबारा चुनाव लड़ने के योग्य न रहें। पंचायती राज मंत्रालय के एक अध्ययन में यह सुझाव दिया गया था कि पंचायत स्तर पर निर्वाचन क्षेत्रों का रोटेशन बंद कर देना चाहिए, क्योंकि लगभग 85% महिलाएं पहली बार चुनी गई थीं और केवल 15% महिलाएं ही दोबारा चुनी जा सकीं, क्योंकि जिन सीटों से वे चुनी गई थीं, उन्हें अनारक्षित कर दिया गया था। 

‘महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर कन्वेंशन’ यह प्रावधान करता है कि राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव को समाप्त किया जाना चाहिए। हालांकि भारत इस कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता है, फिर भी निर्णय लेने वाले निकायों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामलों में भेदभाव जारी रहा है। पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण के प्रभाव के बारे में 2003 के एक अध्ययन से पता चला कि आरक्षण नीति के तहत चुनी गई महिलाएं उन सार्वजनिक वस्तुओं में अधिक निवेश करती हैं जो महिलाओं की चिंताओं से निकटता से जुड़ी होती हैं।

क्या महिला आरक्षण अधिनियम इनके लिए भी है? तस्वीर: संजय शर्मा

आरक्षण नीति के विरोधी यह तर्क देते हैं कि महिलाओं के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र न केवल उनके दृष्टिकोण को संकीर्ण करेंगे, बल्कि असमान स्थिति को भी बनाए रखेंगे, क्योंकि उन्हें योग्यता के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने वाला नहीं माना जाएगा। उदाहरण के लिए, संविधान सभा में रेणुका रे ने महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के विरुद्ध तर्क देते हुए कहा था: “जब महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होती हैं, तो सामान्य सीटों के लिए उन पर विचार किए जाने का प्रश्न—भले ही वे कितनी भी सक्षम क्यों न हों—आमतौर पर उठता ही नहीं है। हमारा मानना है कि यदि विचार का आधार केवल योग्यता हो, तो महिलाओं को अधिक अवसर प्राप्त होंगे।” विरोधी यह तर्क भी देते हैं कि आरक्षण से महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण नहीं होगा, क्योंकि चुनावी सुधारों से जुड़े बड़े मुद्दे – जैसे राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगाने के उपाय, राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और काले धन के प्रभाव को नियंत्रित करना – अभी तक हल नहीं किए गए हैं।

पिछले दिनों महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर ने राज्यसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते कही थी कि हाल ही में, सरकार ने “आदर्श महिला-अनुकूल ग्राम पंचायत पहल” शुरू की है। इसका उद्देश्य देश के हर ज़िले में कम से कम एक ऐसी आदर्श ग्राम पंचायत स्थापित करना है, जो महिलाओं और लड़कियों, दोनों के लिए अनुकूल हो। यह पहल लैंगिक समानता और सतत ग्रामीण विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को और मजबूत करती है। स्वयं सहायता समूहों को बदलाव के वाहक के रूप में देखते हुए, आज 10 करोड़ से अधिक महिलाएं 90 लाख से ज़्यादा समूह से जुड़ी हुई हैं। सरकार के सहयोग से ये महिलाएं ग्रामीण परिदृश्य में आर्थिक बदलाव ला रही हैं और जमीनी स्तर पर नेतृत्व की भूमिका में आगे बढ़ रही हैं।

विपक्ष के लोग यह भी कहते हैं कि 16, 17 और 18 अप्रैल को होने वाला संसद का सत्र आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है। उनका आरोप है कि इसका मकसद इस महीने के आखिर में होने वाले पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के नतीजों पर असर डालना है। कांग्रेस ने संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के संबंध में संविधान में संशोधन करने में किसी भी तरह की जल्दबाजी के खिलाफ भी आगाह किया, और कहा कि यह एक संवेदनशील मामला है और इससे कई राज्यों को भारी नुकसान हो सकता है। 

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