पटना का UNI: 1959 में एक कमरा में था, आज बेसमेंट के एक कमरे में आ गया, जबकि प्रदेश के नेता, मंत्री अरबपति, खरबपति (भाग-4)

बिहार के मुख्यमंत्री और यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया का हाल

पटना / नई दिल्ली : श्रीकृष्ण सिंह से लेकर नीतीश कुमार तक, बिहार में अब तक 23 मुख्यमंत्री बने। चौबीसवें अभी राजनीतिक गर्भ में अदृश्य हैं। सौभाग्य की बात यह है कि इन 23 मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को प्रदेश के दो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित समाचार एजेंसियां – प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई) तथा यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) ने शब्दों से इतिहास लिखता आया। मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान होने से लेकर, उनके मंत्रिमंडल के निर्माण और फिर कार्यालय से विदाई के साथ-साथ उनके अंतिम साँस तक, उनके बारे में लिख-लिखकर देश-प्रदेश के लोगों को उनकी कीर्तियों, यश-अपयशों के बारे में जानकारी देते आया है। 

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन एजेंसियों के बारे में अब तक कोई भी चाहे ‘तथाकथित विकास पुरुष नीतीश कुमार हों या भारत रत्न से अलंकृत कर्पूरी ठाकुर हों, न उनके मंत्रिमंडल के लोग, नहीं सोचे। अगर सोचे होते तो शायद आज 65-70 साल बाद आज भी ये दो एजेंसियां किराये के मकान में भटकती नहीं होती। जबकि, तत्कालीन मुख्यमंत्रियों, राजनेताओं के ‘आशीष’ से पत्रकारों के नाम से ‘पत्रकार नगर’ बन गया, लेकिन इन एजेंसियों को अपने टेलीप्रिंटर का सर छुपाने के लिए जगह नहीं मिला। विचार जरूर करें। 
अगर अब तक बने 22-मुख्यमंत्री एक निश्चित स्थान आवंटित किये होते तो शायद खानाबदोश की तरह इन एजेंसियों को साल-दो साल-पांच साल पर घर नहीं बदलना होता। वैसे ‘घर बदलने में क्या मानसिक तकलीफ होती है, यह नेताओं को नहीं मालूम होगा।

पटना में पीटीआई और यूएनआई कार्यालय खुलने के बाद आज भी दोनों एजेंसियां ‘किराये के मकान में कार्यालय चला रहे हैं। पीटीआई अब तक पांच से अधिक मकानों में अपना पनाह ढूंढा है, जबकि यूएनआई आर्यावर्त-इंडियन नेशन परिसर (1959) से निकलने के बाद फ़्रेज़र रोड स्थित ‘प्रकाश होटल’ के दो कमरों के रास्ते आज अपने दसवें किराये के मकान में, वह भी एक कमरे में (बेसमेंट) में पहुँच गया है। टेलीप्रिंटर की आवाज थम गयी है। टेलीप्रिंटर में लगे कागज फटने लगे हैं, रिबन के नीचे प्रकाशित होने वाले अक्षर धूमिल होते गए हैं। कहते हैं बिहार में उद्योगों का विकास हो रहा है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यूएनआई संस्था को इस कगार तक लाने में प्रबंधन और शेयरधारकों सहित, प्रदेश के कई संभ्रांत लोगों का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हाथ है। अगर ऐसा नहीं होता तो दिल्ली स्थित 9-रफ़ी मार्ग को खाली कराने का आदेश न्यायालय से नहीं लाया गया होता। कहते हैं जिस कारण से 9-रफ़ी मार्ग को खाली कराया गया (सरकार द्वारा आवंटित भूमि में 45-वर्ष में मकान नहीं बना पाने के कारण), उस कारण का निदान तो शायद तत्कालीन महाप्रबंधक जी.जी. मीरचंदानी के कार्यकाल में ही हो गया होता। लेकिन ‘आंतरिक कलह’, ‘शेयर धारकों की लापरवाही’ के कारण ऐसा नहीं हो सका। मीरचंदानी के बाद जैसे ही नरेश मोहन (अब दिवंगत) का आगमन यूएनआई परिसर में हुआ, यूएनआई का अधोमुख यात्रा का सूचक बन गया। वजह आज भी शोध का विषय है। 

पटना का डाक बंगला चौराहा

आइये, पहले आज की तारीख को देखते हैं। 

आज 2026 साल का 4 अप्रैल है। भारतीय राजनीति के अलावे भारतीय पत्रकारिता और भारतीय साहित्य में 4 अप्रैल का अपना अलग महत्व है, जिसे न तो बीते हुए कल, न आज और ना ही आने वाला कल अपना स्थान ले सकता है। आज से 137-वर्ष पहले मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाबई ग्राम में श्री नन्दलाल चतुर्वेदी जी के घर में एक बालक का जन्म हुआ था। माता-पिता नाम रखे था ‘माखनलाल’ और वंश का उपनाम ‘चतुर्वेदी’ आगे जुड़ गया । श्री नन्दलाल चतुर्वेदी गाँव के एक प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक थे। स्वाभाविक है अपने पुत्र को एक बेहतर नागरिक बनाने के लिए एक पिता और एक शिक्षक की भूमिका निभाने में कोई कोताही नहीं किये। हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी, गुजराती और कई अन्य भाषाओं पर अपना आधिपत्य जमाने वाला माखनलाल चतुर्वेदी 16 वर्ष की आयु में एक शिक्षक हो गए। साल 1905 आ गया था। 

उसी वर्ष 1905 में ही, 4 अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले और घाटी में करीब 7.8 + की तीव्रता पर भूकंप आया। उस भूकंप ने कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज के अलावे हिमाचल की घाटियों के रास्ते जम्मू-कश्मीर की घाटियों को भी तवाह कर दिया। अनुमानतः 20,000 से भी अधिक लोग अंतिम सांस लिए। इस भूकंप के कोई 20 साल बाद 4 अप्रैल, 1925 को एक आह्वान के साथ – “आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, उच्च और नीच, जित और पराजित को ठुकराइए, प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिये, जिसका आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करे – खंडवा से ‘कर्मभूमि’ का पुनः प्रकाशन शुरू हुआ। सम्पादन का कार्य माखनलाल चतुर्वेदी के सर पर था। वह माखनलाल चतुर्वेदी ही थे जिन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में महाकोशल अंचल से पहली गिरफ़्तारी दी थी। वे एक सफल पत्रकार थे और ‘प्रभा’, ‘कर्मवीर’ तथा ‘प्रताप’ का संपादन भी किये थे। 

आज से अस्सी साल पहले 4 अप्रैल, 1946 को ब्रिटिश कैबिनेट मिशन ने तत्कालीन मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना के साथ बातचीत प्रारम्भ किया था। वैसे ब्रिटिश कैबिनेट मिशन, जिसमें लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर शामिल थे, सत्ता के हस्तांतरण पर चर्चा करने के लिए 24 मार्च, 1946 को भारत आये, लेकिन उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को 4 अप्रैल, 1946 को पूछा था कि एक अलग पाकिस्तान से उन्हें क्या फायदा होगा?  

साल 1973 में वैसे दिसंबर महीने में अहमदाबाद के एल.डी. कालेज ऑफ़ इंजीनियरिंग और मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रावासों में लगभग 20 से 25 फीसदी शुल्क में वृद्धि हुई। इस वृद्धि के परिणामस्वरुप छात्र उग्र हुए और कालेज परिसर से सड़क पर आ गए। इस घटना क्रम में कई छात्रों का निलंबन भी हुआ और आंदोलन का स्वरुप भी उत्तरोत्तर बदलते गया था।कालेज छात्रावास के खाने की शुल्क में वृद्धि का राजनीतिकरण शुरू हो गया। दिन, सप्ताह, और महीना बदल रहा था और आंदोलन का स्वरुप भी। छात्रों की मांग उत्तरोत्तर गुजरात के लोगों की मांग बन गयी। करीब 63-दिनों के आंदोलन के बाद 9 फरवरी, 1974 को तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर आना पड़ा। गुजरात विधानसभा को भंग हो गया । 

पटना के फ़्रेज़र रोड पर आकाशवाणी भवन के प्रवेश द्वार पर आज जहाँ जूते की यह दूकान है, कल यहाँ यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया-यूनीवार्ता का दफ्तर हुआ करता था

गुजरात की घटना की कहानी यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया के साथ-साथ प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया समाचार एजेंसी भी प्रेषित कर रहा था, जो पटना के अख़बारों के पन्नों को रंग रहा था। जैसे-जैसे पटना से प्रकाशित तत्कालीन अखबारें – आर्यावर्त, इंडियन नेशन, सर्चलाइट और प्रदीप – क्रांतिकारी शब्दों से रंग रहे थे, पटना के तत्कालीन विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं भी गुजरात के छात्रों के समर्थन में सड़क पर उतर रहे थे। उन दिनों समाचार एजेंसियों से प्रसारित अक्षरों का रंग और अख़बारों में प्रकाशित समाचारों के अक्षरों का रंग दोनों “काला” ही था। वह तो तत्कालीन नेतागण थे, कुछ सत्ता में बैठे तो कुछ सत्ता पर कब्ज़ा करने को तत्पर, जो काले अक्षरों को राजनीतिक रंगों में रंगकर स्वार्थलाभ के लिए दण्ड बैठकी कर रहे थे।

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बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों, विशेषकर पटना विश्वविद्यालय के छात्रों की ख़बरें भी स्थानीय अख़बारों के पन्नों पर छपना शुरू हो गया था। शैक्षिक स्तर में गिरावट, महंगाई, बेकारी, शासकीय अराजकता और राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के मुद्दों को घसीटकर पटना के डाक बंगला चौराहे पर लाया जा रहा था। नेतृत्वहीन आंदोलन कभी फ़्रेज़र रोड पर कुस्ती लड़ता था तो कभी गाँधी मैदान में। कभी विश्वविद्यालय प्रांगण में तो कभी रेलवे पटरियों पर। 

बाद में, कई छात्रों ने जयप्रकाश नारायण से अनुरोध किया कि वह आंदोलन का नेतृत्व करें। साल 1902 में जन्में जयप्रकाश नारायण भी सत्तर वसंतों को पार कर 72-वर्ष की आयु में सांस ले रहे थे। इस अवस्था में वे यह जानते थे कि वे ‘हिंसक आंदोलन’ का नेतृत्व नहीं कर सकते हैं। तदर्थ उन्होंने शर्त रखा कि वे तभी आंदोलन का नेतृत्व करेंगे जब आंदोलन पूर्णरूपेण ‘अहिंसक’ होगा। कोई भी राजनीतिक दल इसमें शरीक होकर रोटियां नहीं सकेंगे। छात्रों को सभी शर्तें मंजूर थी। कहने के लिए भले ‘राजनीतिक पार्टियों का प्रवेश इस आंदोलन में निषेध था, लेकिन नेता कब किसी का हुआ है, अपनों को छोड़कर।  बिहार के नेता तो इसके गवाह है ही, चाहे जगन्नाथ मिश्र हों, लालू यादव हों, नीतीश कुमार हों, उपेंद्र कुशवाहा हो – आज सभी अपने-अपने परिवारों को प्रदेश की राजनीती में पनाह दे रहे हैं। खैर, जैसे-जैसे आंदोलन देशव्यापी होता गया, चंद्रशेखर, मोहन धारिया, हेमवती नंदन बहुगुणा, जगजीवन राम, रामधन, रामकृष्ण हेगड़े जैसे दर्जनों लोग आंदोलन का हिस्सा बनते गए।

18 मार्च 1974 को पटना में छात्रों और युवाओं द्वारा आंदोलन हुआ। उसी दिन बिहार विधानसभा का संयुक्त अधिवेशन होना तय था। तत्कालीन राज्यपाल आर.डी. भंडारे संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करने वाले थे। वे किसी भी हाल में दोनों सदनों के संयुक्त बैठक को संबोधित करने के लिए विधानसभा पहुंचना चाहते थे। लेकिन आंदोलनकारियों के सामने भंडारी का कहाँ चलना था। रणनीति यह बनी थी कि आंदोलनकारी छात्र राज्यपाल को विधानमंडल भवन में जाने से रोकेंगे और उनका घेराव करेंगे। उस दिन सत्ताधारी विधायक सुबह 6 बजे ही विधानमंडल पहुंच गए थे। दूसरी तरफ विपक्षी विधायकों ने राज्यपाल के अभिभाषण का बहिष्कार किया। लेकिन भंडारे की गाड़ी को रास्ते में रोक लिया। पुलिस को लाठियों का प्रयोग करना पड़ा। आंसू गैस के गोले भी छोड़े गए। कई छात्र हताहत भी हुए। 

पटना संग्रहालय (पुराना) के पास यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया का दफ्तर था

और यहीं जन्म हो गया जयप्रकाश नारायण के करीबी छात्र नेता लालू प्रसाद यादव जो ‘समाजवाद’ की लड़ाई लड़ते-लड़ते, समाजवाद को पीछे धकेल कर, नब्बे के दशक के मध्य में 950-करोड़ रूपये वाला चारा घोटाला में मुख्य अभियुक्त तो बने ही, राजनीति में परिवारवाद का विरोध करने वाले लालू यादव अपने और अपने ससुराल के सभी प्रमुख लोगों को राजनीति में न केवल प्रवेश दिए, बल्कि विधायक, सांसद, मंत्री, उप-मुख्यमंत्री भी बना दिए। पटना स्थित यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया यानी यूएनआई समाचार एजेंसी इन तमाम घटनाओं का चश्मदीद गवाह रहा। 

अब तक लालू यादव के साथ-साथ सुशील मोदी और अन्य तत्कालीन छात्र नेता अब तक ‘छपास रोग’ से ग्रसित हो गए थे। यूएनआई, पीटीआई दफ्तरों में बैठना शुरू कर दिए थे। कहानियों का रंग कैसे बदलता है, सीखना शुरू कर दिए थे। जय प्रकाश नारायण का आंदोलन तूल पकड़ रहा था। तभी शायद उस दिन 4 अप्रैल ही था, साल 1974 का जब तत्कालीन छात्र नेता लालू यादव अख़बारों की सुर्खियों में बने रहने के लिए स्वयं को भूमिगत कर बाजार में ‘अपहरण’ का अफवाह फैला दिए थे। लालू यादव के अपहरण की खबर न केवल प्रदेश के अख़बारों में, बल्कि देश दुनिया में भी प्रकाशित हुआ था। खैर। 

स्वतंत्र भारत में जब बिहार को पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) के रूप में मिला, यूएनआई पटना में उपस्थित था ‘आर्यावर्त’ और ‘दी इंडियन नेशन’ समाचार पत्रों के कार्यालय परिसर में। साल 1959 में यूएनआई के स्थापना के बाद आर्यावर्त और इंडियन नेशन अख़बारों के संस्थापक दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह ने तत्कालीन प्रबंधक उपेंद्र आचार्य और तत्कालीन संपादक ब्रजनंदन आज़ाद को यूएनआई के विस्तार और प्रसार के लिए सम्पूर्ण जिम्मेदारी दी। महाराजा ने कहा कि जब तक यूएनआई पटना में ‘स्थापित’ नहीं हो जाता, यह ‘हमारे परिसर’ से कार्य करेगा – बिना किसी किराये के। और इस तरह मजहरुल हक़ पथ पर यूएनआई अवतरित हुआ। 

श्रीकृष्ण सिंह के बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) आए । बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968 तक, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968 तक, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968 तक, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972 तक, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969 तक, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973 तक, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980 तक, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985 तक, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988 तक, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 तक और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए । 

बहरहाल, अनुग्रह नारायण सिन्हा इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ प्राध्यापक, जो बिहार के अखबारी दुनिया के लोगों से विशेष ताल्लुक रखते थे, एक शर्त पर कि हम उनका नाम नहीं लेंगे, कहते हैं:  “श्रीकृष्ण सिन्हा के बाद नीतीश कुमार तक प्रदेश से प्रकाशित अख़बारों में 22 मुख्यमंत्रियों का नाम प्रकाशित हुआ है। अब 23 वां नाम भी प्रकाशित होने वाला है। श्रीकृष्ण सिन्हा को अगर छोड़ भी दें तो अब तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे मुख्यमंत्रियों ने स्थानीय अख़बारों और संवाद एजेंसियों का जितना अपने हित में इस्तेमाल किया, यह एक गहन शोध का विषय है। अपवाद छोड़कर, शायद ही कोई मुख्यमंत्री होंगे या उनके मंत्रिमंडल के सदस्य होंगे, प्रदेश के अधिकारी, पदाधिकारी, नेताओं द्वारा संरक्षित और सम्पोषित ठेकेदार, अपराधी होंगे, जिनका प्रदेश के बाहर दिल्ली में, नोएडा में, गाजियाबाद में, लखनऊ में, कानपुर में, कोलकाता में,चेन्नई में, मुंबई में, राजस्थान में, मध्यप्रदेश में, उत्तराखंड में सम्पत्तियों का साम्राज्य है । लेकिन यूएनआई और पीटीआई के लिए अपना एक कमरा भी नहीं मुहैय्या हुआ। 

जय प्रकाश नारायण आंदोलन से जन्म लिए नेता जो प्रदेश की सत्ता में हिस्सेदार रहे, की बात ही नहीं करें। चाहे बाहुबली हों या नेता, सबों ने मिलकर बिहार का चतुर्दिक लुटे और लूट रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि किसी ने भी यहाँ से प्रकाशित, या बिहार का अपना अख़बार या एजेंसी, जिसमें छप छप कर सभी चवन्नी छाप से आदमकद के नेता बने, इसके प्रति ध्यान नहीं दिए। अगर ध्यान दिए होते तो इन 65 वर्षों में यूएनआई जैसे प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी की भी अपनी एक जमीन होती जहाँ उसकी जमीर की तूती बोली जाती। यूएनआई का अंत सिर्फ उस संस्थान के प्रबंधन या कर्मचारी यूनियन को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इसके इस अंत के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रदेश सरकार के साथ-साथ दिल्ली के सिंहासन पर बैठे लोग भी हैं।”

वे आगे कहते हैं: “श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार तक के वर्षों मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुल 35 वर्षों तक सत्ता में विराजमान रहे, मुख्यमंत्री रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है।”

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अगर पत्रकारिता की दृष्टि से देखें तो प्रदेश में पत्रकारिता के अंत की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बिहार प्रेस बिल से हो गया था। लालू यादव, नीतीश कुमार शिक्षित होते हुए भी पत्रकारिता को नेश्तोनाबूद कर दिया। राबड़ी देवी तो अशिक्षित थी। इससे भी अधिक दुखद बात यह है कि सत्तर, अस्सी, नब्बे के ज़माने में बिहार में, खासकर प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया या फिर यूनाइटेड  न्यूज ऑफ़ इंडिया के जो कर्ताधर्ता थे, जितने सम्मानित वे थे, आज उस सम्मान के एक फीसदी के भी लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में नहीं हैं। कल तक प्रदेश की पत्रकारिता में प्रदेश के लोग थे। आज प्रदेश का अपना कोई भी अखबार नहीं है। सभी बाहरी व्यापारियों ने अपने-अपने उत्पाद को बेचने के लिए, लाभ कमाने के लिए यहाँ आये हैं। उन्हें यूएनआई जैसी शब्दों की जरुरत नहीं है।” 

यूनीवार्ता के प्रमुख रहे (अब अवकाश प्राप्त) महेश सिन्हा कहते हैं कि “अपनी स्थापना से लेकर 2000 साल तक यूएनआई और यूनीवार्ता का रुतबा इतना मजबूत था कि प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं कार्यालय आते थे। वे न केवल पत्रकारों का सम्मान करते थे, बल्कि उनकी नज़रों में पत्रकारिता सम्मानित थी। दो मुख्यमंत्रियों – अब्दुल गफूर और कर्पूरी ठाकुर – का आना-जाना आम था। उन दिनों पत्रकारों की इतनी अधिक अहमियत थी कि संस्थान के मालिक भी मंत्रियों, चाहे केंद्रीय मंत्री हों या प्रदेश के मुख्यमंत्री, से मिलने के लिए पत्रकारों से मिन्नत किया करते थे। आज समय बदल गया है। आज मंत्री और मुख्यमंत्री का राजनीतिक स्वरूप भी बदल गया है, पत्रकार और पत्रकारिता तो बदला ही है। 

किदवईपुरी आईएएस कालोनी में आया यूएनआई का कार्यालय

यूएनआई, पटना कार्यालय की यात्रा 

इंडियन नेशन – आर्यावर्त परिसर से जब यूएनआई अपना दफ्तर फ़्रेज़र रोड पर ही माड़वाड़ी वासा के सामने वाली गली में, जिसमें कई होटल कल भी थे, आज भी हैं, के एक प्रकाश होटल में दो कमरे में गया, उस कालखंड में यूएनआई एक तरफ जहाँ अपने शब्दों के वजूद को मजबूत कर रहा था, वहीँ प्रदेश की पत्रकारिता से राष्ट्र की पत्रकारिता को नया आयाम देने को संकल्पित था। प्रकाश होटल से यूएनआई अपना कार्यालय पटना जंक्शन की ओर से आती सड़क फ़्रेज़र रोड जब आकाशवाणी के पास से दाहिने मुड़कर गाँधी मैदान की ओर निकलती है, यहीं बाएं हाथ मंजीत सिंह होटल के आगे स्थित एक मकान के पहली मंजिल पर यूएनआई का कार्यालय खुला कई सारे टेलीप्रिंटर्स के साथ। इस भवन के नीचले हिस्से में एक मंगोलिया नामक बार खुला था। 

उस कालखंड में, डाक बांग्ला चौराहे के नुक्कड़ के बाएं हाथ कोने पर शराब की एक दूकान के अलावे, या फिर न्यू डाक बांग्ला रोड में सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया के सामने शराब की दूकान के अलावे कहीं अन्यत्र को अड्डा नहीं था। परिणाम यह हुआ की मैंगोलिया बार और उसका अगला हिस्सा प्रदेश के सम्मानित, शिक्षित लोगों का अड्डा बन गया। इस स्थान पर संध्याकाळ में प्रदेश के नेताओं के अलावे अधिकारियों, पदाधिकारियों, लेखकों, रंगकर्मियों की भीड़ एकत्रित होती थी। विभिन्न विषयों पर चर्चाएं होती थी। प्रेस ट्रस्ट का कार्यालय उन दिनों बन्दर बगीचा के नुक्कड़ पर था और वहां भी प्रदेश के संभ्रांत एकत्रित होते थे, लेकिन यूएनआई की बात ही कुछ अलग थी। 

पटना साइंस कॉलेज में तक़रीबन 41-वर्ष ‘भूगर्भ शास्त्र’ पढ़ाने और सांइस कालेज के प्राचार्य पद से अवकाश ग्रहण करने वाले डॉ. बसंत मिश्र का पटना की पत्रकारिता से विशेष लगाव रहा है, जहाँ तक उच्चतर शिक्षा का रिपोर्टिंग का प्रश्न है। साढ़े पांच दशक से अधिक समय तक वे शिक्षा के क्षेत्र का रिपोर्टिंग पहले इंडियन नेशन और बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए करते आये हैं। बसंत मिश्र कहते हैं: “देश के विख्यात पत्रकार फ़रज़न्द अहमद सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इंडियन नेशन के लिए विश्वविद्यालय संवाददाता थे। उन दिनों ब्रजनन्दन आज़ाद इंडियन नेशन के संपादक और दीनानाथ झा सहायक संपादक हुआ करते थे। जब फ़रज़न्द जी यूएनआई का संवाददाता बन गए तो मैं इंडियन नेशन में विश्वविद्यालय का समाचार लिखने लगा। उस समय छात्र था, लेकिन लिखने का बहुत शौक था। ब्रजनन्दन आज़ाद और दीनानाथ झा मुझे इंडियन नेशन में विश्वविद्यालय और शिक्षा संबधी समाचार लिखने को कहे और मेरी यात्रा शुरू हो गयी। बाद में पटना विश्वविद्यालय के साइंस कालेज में व्याख्याता बनने के बाद भी मैं लिखने का काम नहीं छोड़ा जो मेरी पहचान और व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। 

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कृष्णानगर, रोड नंबर – 6 में किराये के मकान में आया यूएनआई कार्यालय 

ज्ञातव्य हो कि राजू भरतन ने द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया (जनवरी 1992) में ‘चित्रगुप्त सहाय @चित्रगुप्त’ के बारे में लिखते कहा था कि असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण 1930 में जेल में बंद ब्रज नंदन ‘आजाद’ एक उच्च सम्मानित पत्रकार थे, जो पटना से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी दैनिक ‘ इंडियन नेशन’ और इसके हिंदी संस्करण ‘आर्यावर्त’ में लिखे गए अपने तीखे संपादकीय लेखों के लिए जाने जाते थे। चित्रगुप्त श्रीवास्तव उनके अपने छोटे भाई थे। चित्रगुप्त पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर किये थे, साथ ही, पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की थी। चित्रगुप्त की बेटी सुधा श्रीवास्तव, जो मुंबई विश्वविद्यालय से प्रोफ़ेसर के पद से अवकाश प्राप्त की थी, कही थी,  चित्रगुप्त को गायन में अधिक रुचि थी और अपने भाई को बिना बताए, वे पेशेवर गायक बनने की गुप्त इच्छा रखते थे। अपनी दो डिग्रियों के बल पर चित्रगुप्त को पटना विश्वविद्यालय में नौकरी मिल गई। लेकिन जब उनके मित्र मदन सिन्हा (जो बाद में एक प्रसिद्ध छायाकार बने और 1974 में विनोद खन्ना अभिनीत फिल्म ‘ इम्तिहान’ का निर्देशन भी किया ) ने उन्हें मुंबई जाकर फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने का सुझाव दिया, तो चित्रगुप्त मान गए। यह निर्णय उनके भाई को पसंद नहीं आया।

बसंत मिश्र कहते हैं: “उन दिनों जब फरजंद साहब यूएनआई गए, मैं अक्सर यहां आया-जाया करता था। वहां धैर्यानन्द झा पहले से थे। बाद में श्री बीएन झा प्रबंधक के रूप में आये। चंद्रमोहन मिश्र का मेरे परिवार से बहुत मधुर सम्बन्ध था। उनकी पत्नी के कहने पर बीएन झा कुछ कुछ समय के लिए, जब तक वे पटना में स्थिर न हो जाएँ, मेरे घर में किराये पर रहे। यूएनआई को पिछले 55 से अधिक वर्षों से देखता आया हूँ। यूएनआई के द्वारा लिखे गए, भेजे गए संवादों को देखता आया हूँ, उसकी गरिमा को भी देखा हूँ; लेकिन आज जब उसकी स्थिति के बारे में अख़बारों में पढ़ता हूँ, देखता हूँ, मन दुखी हो जाता है।”

कोई तीन दशक तक पटना यूएनआई का चीफ ऑफ़ ब्यूरो रहने वाले शिवाजी सिंह आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम को कहते हैं कि “आकाशवाणी के प्रवेश द्वार के बाएं हाथ नुक्कड़ पर कल जहाँ यूएनआई का कार्यालय था, उस भवन के नीचे मैंगोलिया बार था। आज वहां जूते का शो रूम हैं। इस स्थान से यूएनआई का कार्यालय पटना म्यूजियम (पुराना) के सामने आया। कुछ वर्ष यहाँ से सेवा देने के बाद यूएनआई का कार्यालय किदवईपुरी स्थित आईएएस कालोनी में आ गया। यह कालखंड नब्बे के दशक का प्रारंभिक वर्ष था। सं 1995 आते-आते श्रीकृष्ण नगर रोड नंबर आठ पर यूएनआई कार्यालय का बोर्ड टंगा। यह सभी किराये का मकान था। यहाँ  1998-1999 तक था।

डॉ. जीडीएन सिंह परिसर में यूएनआई का कार्यालय

शिवाजी सिंह कहते हैं: “यह कड़वा सच है कि UNI में ‘जिस किसी’ को भी (कुछ अपवादों को छोड़कर) पद या थोड़ी-सी शक्ति मिली, उसने खुद को ‘खुदा’ समझने में देर नहीं लगाई। चाहे प्रबंधन हो या यूनियन, इस प्रवृत्ति से कोई भी अछूता नहीं रहा। अहंकार इतना बढ़ गया कि संस्था के हितों की चिंता वे भूल गए । ऐसे लोगों ने अपनी ऊर्जा, समय और मेहनत संस्था को आगे बढ़ाने या बचाने के बजाय व्यक्तिगत बदले, हिसाब बराबर करने और असहमति रखने वालों या ‘सलाम’ नहीं करने वालों को सबक सिखाने में लगा दी । ऐसे लोगों को “साहब” बनने का बड़ा शौक़ था । सच है ख़ाली बर्तन ज़्यादा शोर मचाता है।”

इधर दिल्ली स्थित यूएनआई मुख्यालय में प्रशासन के साथ साथ प्रबंधन में भी ‘गिरावट’ आने लगा, वित्तीय स्थिति दयनीय होने लगी। यह नरेश मोहन का कार्यकाल था। शिवाजी सिंह कहते हैं कि “उन दिनों साज सज्जा पर करीब पंद्रह से बीस लाख रुपये खर्च किए गए थे । उस समय कार्यालय के एक हॉल और तीन कमरे थे। आप अंदाजा लगाएं कि इन जगहों में 8 एसी, 15 कंप्यूटर, 50 से भी अधिक ट्यूबलाईट, रिवॉल्विंग चेयर, रेफ़्रिजरेटर, वाटर कूलर आदि लगाए गए थे जबकि उस समय पीटीआई के दफ्तर में एक कंप्यूटर और एक एसी से काम चल रहा था। पटना में उस समय किसी मीडिया हाउस का कार्यालय यूएनआई जैसा नहीं था।

पटना के ही एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि ‘वह दृश्य देखकर आज भी मन खिन्न हो जाता है कि कैसे दिल्ली कार्यालय में प्रशासनिक बदलाव होने के बाद आर्थिक लूट प्रारम्भ हुआ था। यूएनआई के पास उस कालखंड में जो भी पैसे एकत्रित थे, उसे धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में लोग लग गए। यहाँ पटना कार्यालय में इतने अधिक विस्तार के साथ ही कार्यालय में बिजली का अत्यधिक लोड होने के कारण एक स्पेशल ट्रांसफार्मर भी यूएनआई के लिए लगाया गया था जिसका किराया 45 हज़ार के क़रीब देना पड़ता था। उस समय ट्रांसफार्मर का रेंट समेत बिजली बिल क़रीब 70 हज़ार रुपया के आस पास आता था।

श्रीकृष्णापुरी से यूएनआई का कार्यालय 2010 में जब बोरिंग रोड स्थित डाक्टर जी.एन. सिंह के तीन कमरे के मकान में शिफ्ट हुआ तब किराया 12,000 और बिजली का बिल दो से ढाई हज़ार रुपया हो गया। यहाँ किसी कमरे में एसी नहीं लगा था। दस साल में जब किराया बढ़ते बढ़ते 31 हजार हो गया और किराया समय पर नहीं दिया जा रहा था तब मकान मालिक ने मकान ख़ाली करने को कहा। दिल्ली हेड ऑफिस का निर्देश जारी किया कि पांच से दस हज़ार रुपये किराया का मकान ढूंढा जाए। इतना कम किराया पर यूएनआई जैसी प्रतिष्ठित संस्था के लिए अच्छे स्थान पर मकान मिलना असंभव था। कहते हैं कि यूएनआई में जो भी कर्मचारी बचे थे वे पुराने मकान मालिक से काफ़ी मिन्नत के बाद उसी परिसर में एक गराजनुमा कमरा में पाँच हज़ार रुपये मासिक किराया पर ऑफिस को 2020 में शिफ्ट कर दिया गया। इस स्थान पर शौचालय था और ना ही पीने के पानी की व्यवस्था । अमानवीय स्थिति में लोग वहां काम करने को मजबूर थे । 

कोरोना काल में लोग जब घर से काम कर रहे थे तो बहुत ज़्यादा मुश्किल पत्रकारों को नहीं थी लेकिन ग़ैर पत्रकार ज्यादा परेशानी में थे उन्हें हर दिन दफ़्तर आना होता था। इस गराजनुमा कार्यालय में यूएनआई के लोग पांच साल से अधिक रहे। विगत 31 मार्च 2026 को यूएनआई कार्यालय को एक नया पता मिला। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद के घर से दस कदम दूर स्थित एक मकान के बेसमेंट में स्थित एक छोटे से कमरे में।

ओह !!

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