“​इतिहास गवाह है: 7-जंतर-मंतर पिछले 50 वर्षों में किसी का नहीं हुआ है, ‘अभिशप्त है यह इमारत’, नीतीश कुमार का भी नहीं होगा” – लिख लीजिये

7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय। तस्वीर: संजय शर्मा

7-जंतर मंतर (नई दिल्ली) : आप माने या नहीं माने, आपकी मर्जी । लेकिन 7-जंतर मंतर स्थित जनता दल – यूनाइटेड का ऐतिहासिक इमारत का इतिहास अगर गलत नहीं है, तो आगामी आने वाले दिनों में जनता दल – यूनाइटेड का ‘दिवाइटेड’ होना भी तय है, यही नियति है। कांग्रेस का आधिपत्य रहने वाले इस भवन का स्वामित्व सन 1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस (ओ) को मिला। सन 1977 में जब कांग्रेस (ओ) जनता पार्टी में विलय हो गया,  जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यालय 7-जंतर मंतर बना। तब से लेकर आज तक, पिछले पचास वर्षों से यह ‘अभिशप्त भवन’ यहाँ दर्जनों राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को उछलते, मुस्कुराते आते तो देखा, लेकिन कोई मुस्कुराते नहीं गए, यह भी सत्य है। इन पांच दशकों में यह कार्यालय “जनता” उपसर्ग और प्रत्यय वाली पार्टियों को चकनाचूर होते देखा है, स्वाभाविक है जनता दल – यूनाइटेड भी अछूता नहीं रह पाएगा। यही यहाँ की मिट्टी का प्रारब्ध है। आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। 

वैसे कोई तीस सीढ़ियों के ऊपर पहली मंजिल पर जनता दल यूनाइटेड का आलीशान कार्यालय है, जहाँ कीमती लकड़ी के फर्नीचर और कुर्सियां भी लगे हैं, सफेद संगमरमर का गलीचा  नुमा सतह भी है, लेकिन लोगों का कहना है कि “नीतीश कुमार प्रदेश के मतदाताओं के साथ विश्वासघाती राजनीति किए। प्रदेश का मतदाता उन्हें और जनता दल – यूनाइटेड के नेतृत्व को मत दिया था। अपने हित में, या अपने पुत्र के हित में मतदाताओं के अधिकार को कैसे हस्तांतरित कर सकते हैं नीतीश कुमार ? मतदाताओं के पास कल भी विकल्प था, आज भी है, वैसी स्थिति में प्रदेश का मतदाता ही नहीं, पार्टी का एक बड़ा भाग जंतर मंतर से दीनदयाल उपाध्याय मार्ग अथवा अन्य रास्ता निकल सकता है। और इस बात को हल्के में नहीं लिया जाय। पार्टी के दर्जनों वरिष्ठ नेता जो गणित को बिगाड़ सकते हैं, नीतीश के निशांत को आशीष तो दे सकते, उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकते, यह भी तय है। खैर। 

भारत के संसद से कोई पौने किलोमीटर दूर जंतर मंतर रोड पर ऐतिहासिक जंतर मंतर (जिसके नाम से यह इलाका है) के बाद अगर कोई स्थान बहुत मशहूर है तो दिल्ली पुलिस की आज की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मुद्दत से चलने वाली ‘सांभर-बड़ा’ की दूकान, जहाँ नित्य लाखों का व्यवसाय होता है। कल इसी मार्ग पर खड़े होकर, 7-जंतर मंतर ईमारत की  ओर मुख किये सोच रहा था कि राजनीतिक पार्टियों में ‘विचारवान’, ‘प्रबुद्धजनों’ की किल्लत क्यों हो गयी है। यह भी सोचने को विवश हो गया कि कैसे तीन दशक पहले एक छोटी से चूक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके समर्थकों को ‘वास्तु विज्ञानं’ का अध्ययन करने, निर्णय लेने पर मजबूर किया था। निर्णय लिया गया और फिर इतिहास भी रचा गया। 

आइये, इसी बहाने पहले 11-अशोक रोड चलते हैं। कभी जीवंत रहने वाला यह बंगला आज भले बिल्कुल शांत दिखा, बिलकुल वीरान दिखा, लेकिन तीन दशक पहले उस रात क्या हुआ था, शायद आज के गणमान्यों को नहीं मालूम होगा। आज भी जीवित हैं गोविन्द आचार्य जी, मन करे तो पूछ लेंगे। आज मुख्य प्रवेश द्वारा पर सुरक्षाकर्मी दिखे। उसके बाएं हाथ लकड़ी का एक और दरवाजा दिखा, जो एक कक्ष में खुल रहा था। सुरक्षाकर्मी महोदय उस दरवाजे की ओर इशारा किये और मैं अपनी पहचान बताते प्रवेश लिया। सामने ‘ट्रिंग-ट्रिंग’ करने वाला यंत्र लगा था जिसके रास्ते अंदर आना बाध्यकारी होता है – सुरक्षा जांच के लिए । कभी यह भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यालय हुआ करता था, 11 – अशोक रोड । कभी जीवंत होता था यह बंगला। आज मुश्किल से चार-पांच गाड़ियां इस बंगले के सामने बायीं ओर खड़ी दिखाई दी। कोई बैनर नहीं, कोई झंडा-पताखा नहीं। भाजपा के किसी भी नेता की कहीं कोई तस्वीर नहीं। कहीं भी जिन्दावाद-जिन्दावाद लिखा नहीं दिखाई दिया। लगभग 99 फीसदी नामोनिशान नहीं था। खैर। आज के लोगबाग़ नहीं समझेंगे आखिर ऐसा क्या हुआ कि 11 अशोक रोड तिरस्कृत हो गया। यहाँ आज कोई कर्यालय हैं, लेकिन किसका करयलय है, सभी चुप थे।  

7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय और अंदर दीवारों पर सजे नेताओं का पोस्टर । तस्वीर: संजय शर्मा

11-अशोक रोड भवन के पास आज की इस विरानीयत की बुनियाद सन 1996 में पड़ गई थी, जब दो सप्तक 13 दिन (मई 16, 1996 से जून 1, 1996) प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद, राष्ट्र का नेतृत्व करने के बाद, भारतीय जनता पार्टी के स्तम्भ सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री कार्यालय से बाहर आना पड़ा, भारी मन से। आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी ‘अदृश्य कारणवश’ मुख्यमंत्री की कुर्सी को त्यागकर 250-संख्या वाली राज्यसभा में रखी कुर्सियों की क़तार में छह वर्ष के लिए एक कुर्सी के मालिक बने हैं। लेकिन कल क्या होगा उनके राजनीतिक जीवन में, यह वे भी नहीं जानते, भले उनके सहयोगी, सहकर्मी यह दावा करें कि नीतीश कुमार का अंतरी कई मीलों का है, शरीर मैं कहाँ कहाँ दांत है, कोई नहीं जानता । खैर ।

उस ऐतिहासिक, परन्तु, भारतीय राजनीतिक पटल के उस काला दिवस के कुछ ही दिनों के बाद भारत के बड़े-बड़े वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ, ज्ञानी, महात्मा, अंक-दिशा के ज्ञाता इस 11 अशोक रोड बंगला, बंगला की स्थिति की जांच-पड़ताल हुयी थी। कुछ परिस्थितियां भयंकर बाधक थी जो भाजपा के तत्कालीन समय और भविष्य के लिए अपसकुन था, प्रतिकूल था । उन तमाम विशेषज्ञों की एक बैठक हुई थी। पूरी रात, तक़रीबन छः घंटा का मनन-चिंतन किया गया था। उस बैठक में उपस्थित सभी महात्मनों के मुख से निकलने वाले शब्दों को भाजपा के, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी सज्जन एकांत-चित होकर सुन रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन महात्मनों, विद्वानों, ज्ञानियों, विशेषज्ञों के जिह्वा पर माँ सरस्वती विराजमान हों। 

फिर यह निर्णय लिया गया कि संसद की दिशा से जब हम अपने बाएं हाथ कार्यालय परिसर में प्रवेश लेते हैं, प्रवेश के साथ ही विशालकाय नीम का वह वृक्ष सामने खड़ा दीखता है। कोई भी आगंतुक उस वृक्ष को नजर अंदाज नहीं कर सकता, चाहे पार्टी के नेता हों या पार्टी के कार्यकर्त्ता अथवा देश के मतदाता, जो भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान और भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात थी। सभी विशेषज्ञों का एक मत हुआ – या तो प्रवेश द्वार बदला जाय अथवा उस नीम के वृक्ष का ‘कतरन’ किया जाए। वाजपेयी जी ‘सजीव’ थे जीवन पर्यन्त और जीवों की पीड़ा जानते थे, महसूस किये थे। स्वाभाविक है वे वृक्ष के कतरन के विरुद्ध थे। हां, द्वार अलग किया जा सकता है, स्वीकार्य था उन्हें। 

​@अखबारवाला001 यूट्यूब पर सुनें जरूर – 7-जंतर मंतर: एक अभिशप्त भवन, जेडी (यू) का राष्ट्रीय कार्यालय​ और नीतीश कुमार का दिल्ली आना

वास्तु-विशेषज्ञों, विद्वानों, महात्मनों का यह फैसला हुआ कि इस अवरोध के बाद भारतीय जनता पार्टी का स्थान देश के मतदाताओं के हृदय में अनमोल होगा, लिख लीजिये। अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में बनी और बिगड़ी वह 13 दिन की सरकार भाजपा के भविष्य का केंद्र बिंदु बन गया। 16 मई, 1996 से 1 जून, 1996 तक की सरकार और उनकी सरकार के विरोधी में, पार्टी के विरोध में जन्म ले रही अन्य पार्टियों की विचारधाराएं वाजपेयी जी के ह्रदय को छल्ली कर दिया था। फिर सरकार बनी और 19 मार्च, 1998 से 13 अक्टूबर, 1999 तक वाजपेयी जी प्रधानमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए। बहरहाल, 11 अशोक रोड का वह मनहूस, वास्तु-विरोधी प्रवेश द्वार टूटना प्रारम्भ हो गया था और एक दूसरा रास्ता कोई 20 कदम दूर आगे सुरक्षित कर दिया गया था।   

मैं सन 1996 में उस दिन अपने एक मित्र सुश्री अदिति कौल (अब दिवंगत) के साथ 11-अशोक रोड गोविंद आचार्य जी से मिलने आया था। कहानी की तलाश कर रहा था। लिखने के लिए कुछ भी नहीं था। दोपहर के एक बज गया था। उन दिनों गोविन्द जी 11 – अशोक रोड परिसर वाले भवन में पीछे दाहिने हाथ स्थित एक रसोई युक्त कमरे में रहते थे। हम दोनों को देखकर खुश हो गए। खाना नहीं बना था। फिर खिचड़ी-चोखा बना और बात-बात में बात निकल गई विगत रात की बैठक की, मंथन की, निर्णय की, भाजपा की वर्तमान मांगलिक-दशा की और वास्तु-दोष निवारण हेतु देश के महात्मनों द्वारा सुझाये उपायों की। मैं उस समय इण्डियन एक्सप्रेस का एक छोटा सा रिपोर्टर था। कोई पांच सौ शब्दों की कहानी लिखा गया जिसे प्रथम पृष्ठ पर प्राथमिकता के साथ प्रकाशित किया गया ।


7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय और सन्नाटा । तस्वीर: संजय शर्मा

अगली सुबह दिल्ली सल्तनत के पत्रकार मित्र-मित्राणी मेरी कहानी का मज़ाक उड़ाए। वे कटाक्ष में हंस रहे थे और मैं यथार्थ में स्वीकार कर रहा था। कुछ दिन बाद 11-अशोक रोड का वह द्वार बंद हो गया। नीम के पेड़ का जीवन बच गया। इधर यह सब हो रहा था, उधर समय बदल रहा था। ‘वास्तु’ अपना करवट ले रहा था। भाजपा की भाग्य रेखाएं बदल रही थी। ‘कुंडली’ के घरों में बैठे तत्कालीन नेताओं का स्थान परिवर्तित हो रहा था। कहीं आकर्षण हो रहा था तो कहीं विकर्षण। 13 अक्टूबर, 1999 से 22 मई, 2004 तक वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किये। लेकिन देश में एक नए राजनेता का अभ्युदय अब तक हो गया था। समय और वास्तु अपने-अपने तरह से उसे संरक्षित, सम्पोषित कर रहा था। दस वर्ष बाद ‘वास्तु’ और भाजपा की कुंडली में बैठे सभी नेताओं (अपवाद छोड़कर) के घरों में बेतहाशा परिवर्तन हुआ। एक आंधी चली। कई उस तूफ़ान में दूर अदृश्य हो गए। वास्तु-मंथन के बाद कई नए चेहरे अवतरित हुए।

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आज, 7-जंतर मंतर ईमारत के सामने सड़क के दूसरे तरफ चाय की दुकान पर, दिल्ली पुलिस और अन्य तैनात सुरक्षा कर्मियों के बीच चाय की चुस्की लेते, 7-जंतर मंतर मुख्य प्रवेश जंग लगा द्वार पर विशालकाय कूड़ा करकट का अम्बार, कुत्ते को विचरण करते, विशालकाय नीम का वृक्ष से सूखे पत्तों को गिरते देख तीन दशक पूर्व 11-अशोक रोड याद आ गया। कुछ कदम आगे बढ़ने, सड़क के दूसरे तरफ दिल्ली पुलिस द्वारा स्थापित लोहे के बड़े-बड़े पीले रंग के विरोधक के बाद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में दूसरा प्रवेश द्वार के पास बिलखती हुई मिटटी, ऊपर ईंट-से-ईंट अलग होते दीवार के ऊपर जंग लगा लोहे का एक नाम पट्टिका, जिसपर लिखा था ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल स्मारक ट्रस्ट (निबंधित)’ को देखकर मन बिचलित हो गया। कहने को तो वल्लभ भाई पटेल के नाम की राजनीति उनके मरने के बाद से आज तक हो ही रही है, दिल्ली में भी उनके नाम से पटेल चौक, पटेल चेस्ट अस्पताल, पटेल भवन, आदि हैं; लेकिन सरदार पटेल को दिल्ली में वह सम्मान नहीं मिला, जिसका वे हकदार थे – 7, जंतर मंतर ईमारत के दूसरे प्रवेश द्वार पर जंग लगा बोर्ड गवाह है।

आइये इमारत के अंदर चलते हैं। आप माने या नहीं मान आपकी मर्जी। भारत के संसद से पौने किलोमीटर दूर एक तरफ संसद मार्ग और दूसरे तरफ रायसीना रोड के बीच स्थित है 7-जंतर मंतर इमारत है । जंतर मंतर रोड का एक छोड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में निर्मिग नए संसद भवन के एक द्वार से मिलने वाला रायसीना रोड से मिलता है, जबकि दूसरा छोड़ सवई मानसिंह – II द्वारा निर्मित ऐतिहसिक जंतर मंतर को अपने दाहिने हाथ छोड़ते कनॉट प्लेस से संसद की ओर जाने वाला संसद मार्ग से मिलता है। वैसे इस भवन में इसके स्थापना काल से अनेकानेक राजनीतिक पार्टियां शरणागत हुई, लेकिन सबों ने इसका ‘शोषण’ ही किया। परिणामस्वरूप यह भी किसी का भी नहीं हुआ। आज यह एक अभिशप्त इमारत के रूप में जाना जाता है, यह अलग बात है कि नई दिल्ली में इस भवन की, यहाँ की जमीन और मिटटी की कीमत कई सौ नहीं, बल्कि कई हज़ार करोड़ की होगी। 

7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय का पिछला हिस्सा । तस्वीर: संजय शर्मा

वर्तमान में 7-जंतर मंतर रोड इमारत में जनता दल यूनाइटेड का दफ्तर है, भले पार्टी के अंदर लोगों का मन अपने नेतृत्व के विरुद्ध हो, उनके प्रति खटास हो, मन और आत्मा से लोग ‘डिवाइडेड’ हों। जनता दल यूनाइटेड के संस्थापक नीतीश कुमार हैं । अब यह बंगला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश से राजनीतिक पलायन लिए नीतीश कुमार के लिए कितना ‘फलीभूत’ होगा, यह तो समय बताएगा। लेकिन इस भवन का इतिहास यही कहता है कि यह भवन ‘अभिशप्त भवन’ है और यह अपने स्थापना काल से किसी का नहीं हुआ है। जो भी इस भवन में आया वह राजनीतिक दृष्टि से अंततः नीचे गिरा ही है – नीतीश कुमार तरोताजा दृष्टान्त हैं। 

7-जंतर मंतर को पिछले साढ़े तीन दशक से देखता आया हूँ। भारत के संसद से कोई पौने किलोमीटर दूर सर इडविन  लुट्येन्स द्वारा डिजाइन की गयी दिल्ली में करीब 950 ऐतिहसिक भवनों, जिसक निर्माण 1920-1940 के बीच हुआ, 7-जंतर मंतर भवन भी उसी भवनों में एक है। यह भवन अपने अंदर इतिहास के पन्नों को समेटे साँस ले रहा है। प्रवेश के साथ ही परिसर का अतिक्रमण दिखने लगता है। जो एक बार उन दिनों इस परिसर में प्रवेश ले लिए, निकलने का नाम नहीं ले रहे हैं। प्रवेश के साथ दाहिने हाथ कोई 105 डिग्री के कोण पर ‘पुस्तकालय’ लिखा देख मन खुश तो हो गया। 

लेकिन दो कदम आगे बढ़ते ही मन उतना ही खिन्न हो गया जितना इस भवन में आने-जाने वाले राजनेताओं, राजनीतिक पर्टियों का भूत के बारे में सोचकर। इस पुस्तकलय में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ साथ, दीवारों पर टंगी नेताओं की तस्वीरों के साथ-साथ जो असहाय, दर्दनाक हाल किताबों, दस्तावेजों का देखा, वही हाल जनता दल – यूनाइटेड और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नितीश कुमार की तस्वीरों के साथ साथ पार्टी कार्यालय का। पार्टी कार्यालय के प्रवेश के सामने पान के पीक और अन्य गंदगियों के साथ सफ़ेद संगमरमर ‘काला रंग’ का दिखा। चूहे मरने की बदबू भी आ रही थी। अगल-बगल दीवारों के साथ-साथ पेड़ों की टहनियों पर पार्टी के नेताओं की तस्वीरें भी लटके दिखे। परिसर में गंदगियों का अम्बार देखा।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत अभियान को निःसहाय परिसर में चतुर्दिक देखा।  

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विशेषज्ञ अरविन्द कुमार सिंह

बहरहाल, पटना से दिल्ली तक नीतीश कुमार और जनता दल – यूनाइटेड के भविष्य पर चर्चा करने के लिए दिल्ली सल्तनत के वरिष्ठ और राजनीतिक गलियारे में अपना बेदाग़ हस्तक्षर कायम रखने वाले पत्रकार अरविन्द कुमार सिंह से बातचीत किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “इतिहस गावह है कि यह ईमारत अभिशप्त है। अपने स्थापना काल से आज तक, अपवाद छोड़कर, यह ईमारत इसमें पनाह लेने वालों का कभी नहीं हुआ है। पिछले 50 वर्षों का ही इतिहास अगर देखें तो सन 1977 के बाद, जो भी यहाँ आये, सीढ़ी से ऊपर नहीं चढ़े, अलबत्त नीचे ही गिरते गए। 1947 से 1971 तक इंडियन नेशनल कांग्रेस का मुख्यालय था। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद जैसे बड़े नेता अक्सर इस जगह आते थे।जब 1969 में कांग्रेस में विभाजन हुआ, समय एक तरफ इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस (आर) बनी, वहीँ जो पुराने कांग्रेसी, मसलन के. कामराज , मोरारजी देसाई वाली काँग्रेस (ओ) बनी। उस कालखंड में इस भवन पर आधिपत्य कांग्रेस (ओ ) की हो गयी। 

इस भवन का एक ऐतिहासिक महत्व और भी है। 12 नवंबर, 1969 को, उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया था, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के अंदर उनके और “सिंडिकेट” ग्रुप के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया था। पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा, जो “सिंडिकेट” के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे, ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को “एक तरह की पर्सनालिटी को बढ़ावा देने” के लिए पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा को निकालने की वजह से आखिरकार कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ गई। यह कहा जाता है कि सिंडिकेट ने फैसला किया कि विपक्षी जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार सी.डी. देशमुख को दूसरी प्रायोरिटी का वोट दिया जाए। लेकिन इंदिरा गांधी ने अपनी बात मनवा ली और यह पक्का किया कि कांग्रेस के ऑफिशियल उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी, बागी कांग्रेस उम्मीदवार वी.वी. गिरी से हार जाएं। राष्ट्रपति चुनाव के बाद, इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी पर सिंडिकेट की पकड़ कमजोर करने के लिए एक बड़ा कैंपेन शुरू किया। उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों का दौरा किया और सिंडिकेट को ताकत दिखाने के लिए कांग्रेसियों को इकट्ठा किया।

यह भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज है कि इंदिरा गांधी के समर्थक अपनी ही पार्टी के खिलाफ चले गए, और नए राष्ट्रपति को चुनने के लिए एक स्पेशल कांग्रेस सेशन की मांग की। उन्हें यकीन था कि सिंडिकेट के पास मेजोरिटी नहीं है और वह गलत तरीकों से सत्ता पर काबिज है। इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों से नाराज होकर, निजलिंगप्पा ने एक खुला पत्र  लिखा, जिसमें प्रधानमंत्री और उनके साथियों पर पार्टी की अंदरूनी प्रजातंत्र को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया। पत्र  के जवाब में, इंदिरा गांधी ने निजलिंगप्पा की बुलाई मीटिंग में जाना बंद कर दिया।

अरविन्द जी कहते हैं कि “फिर 12 नवंबर 1969 को, कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग दो जगहों पर हुई — एक प्रधानमंत्री के घर पर और दूसरी इसी 7-जंतर मंतर में कांग्रेस के पास थी । 7-जंतर-मंतर कार्यालय में हुई मीटिंग में, निजलिंगप्पा ने अनुशासन के आधार पर इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा के निकाले जाने से कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ गई, जिसमें 705 कांग्रेस सदस्यों में से 446 इंदिरा के साथ चले गए। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को कांग्रेस (आर)  के नाम से जाना जाता था और इसे “इंडिकेट” भी कहा जाता था, जबकि सिंडिकेट नेताओं के नेतृत्व वाले गुट को कांग्रेस (O) या “सिंडिकेट” के नाम से जाना जाने लगा।”

7-जंतर मंतर: एक हिस्से में सरदार पटेल क नाम से  पुस्तकालय । तस्वीर: संजय शर्मा 

आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम से बात करते अरविन्द जी कहते हैं कि “1947 में इस भवन को मुंबई कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एस के पाटिल कोई सात लाख रुपये में खरीदकर कांग्रेस पार्टी को दिए थे। वैसे इस भवन पर सरकार भी अपना आधिपत्य जमाती है, लेकिन इस भवन का असली मालिक कौन है, यह भी आज शोध का  विषय बना है। मंत्रालय  के पास यह दिखाने के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं है। कुछ दिन पहले भारत के अखबारों में सबसे अधिक पत्र प्रकाशित होने के लिए गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले 76-वर्षीय सूचना का अधिकार कार्यकर्त्ता सुभाष अग्रवाल को सिर्फ यह बताया गया कि यह प्रॉपर्टी 1969 में अविभाजित कांग्रेस पार्टी को दी थी।  

अरविन्द जी आगे कहते हैं कि “जब 1977 में कांग्रेस (ओ) जनता पार्टी में विलय हो गयी, इस भवन पर जनता पार्टी का आधिपत्य हुआ । सन 1977 में जन्म लिए जनता पार्टी अगले 12-वर्षों में एक नहीं, सहस्त्र खण्डों में विभाजित हो गया और सभी अपने अपने नाम के साथ अलग होते गए। सबसे पहले 1979 में राज नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी (सेकुलर) बनी। यह पहला, लेकिन महत्वपूर्ण खंडन था। सन 1980 में तत्कालीन जनसंघ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ भागीदारी सम्बन्धी दोहरी सदस्यता के कारण जनता पार्टी से अलग होकर ‘भरतीय जनता पार्टी’ के रूप में राजनीतिक गलियारे में खड़ी हुयी। इसके आठ साल बाद सन 1988 में जनता दल बना। सं 1990 में जनता पार्टी के कभी अग्रणी रहे नेता, जो प्रधानमंत्री भी बने, चंद्रशेखर समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) बनाये। फिर पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह, जो जनता पार्टी में अहम् भूमिका निभाए थे, के पुत्र अजित सिंह राष्ट्रीय लोकदल बनाये।

सल 1992 में जनता दल का एक और खंड हुआ समाजवादी पार्टी के रूप में जिसका नेतृत्व मुलायम सिंह यादव किये। और इसी क्रम में 1997 में सम्पूर्ण क्रांति में अहम् भूमिका निभाने वाले लालू यादव जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल बनाये। उसी वर्ष अपने पिता के सम्मानार्थ नवीन पटनायक ने अपने पिता के नाम पर बीजू जनता दल का गठन किया और 24 वर्षों तक ओड़िसा में स्थायी सरकार दिए। आज प्रतिपक्ष में बैठे हैं। 1999 में पूर्व प्रधनमंत्री एच डी देवेगौड़ा के नेतृत्व में जनता दाल का एक खंड जनता दल (स्कुलर) बना। 

अरविन्द सिंह कहते हैं कि साल 2003 में नितीश कुमार की अगुवाई में जनता दल (युनाइट्ड) का गठन हुआ। संख्या नहीं होने के बाद भी अपने तीर-कमान से अवसरवादियों का लाभ उठाते नितीश कुमार 20 वर्ष तक बिहार में रहे, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि मुख्यमंत्री कार्यालय को त्यागकर दिल्ली आ गए। कांग्रेस से लकर जनता पार्टी के रास्ते जनता दल यूनाइटेड तक, सभी पार्टियों और पार्टी के नेताओं, चाहे वे आदमद के हों या घुटने और तलबे के कद के, सभी की तस्वीरें यहां दीवारों पर, पेड़ों  टहनियों पर लटके – लेकिन अंततः सभी का क्या हश्र हुआ, इस विषय पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। यह अभिशप्त इमारत है। मैं नहीं समझता कि 20 वर्ष तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद नीतीश कुमार राज्यसभा में बैठकर कोई ऐतिहासिक कार्य कर देंगे। लेकिन यह भी तय है कि यह भवन जनता दल यूनाइटेड एक नेताओं को कितना संरक्षण देगा, यह कहना कठिन है। यदि इतिहास देखें तो संरक्षण नहीं दिया है, अतः इतिहास दोहराने की सम्भावना अधिक है। खैर। 

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अरविन्द सिंह कहते हैं कि यहां नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स का लंबे समय तक कार्यालय रहा है। आज भी उसका बोर्ड लटका है। इस भवन में जनता दल (यूनाइटेड), अखिल भारतीय सेवा दल (ऑल इंडिया सर्विसेज पार्टी) और इंडियन फ्रीडम फाइटर्स सक्सेसर्स ऑर्गनाइजेशन के ऑफिस भी हैं। सिंह का कहना है कि 1952 में पंडित नेहरू ने सोचा था की संसद के आस-पास कार्यालय होने से आम कार्यकर्ताओं के अलावे पार्टी को भी विचार-विमर्श करने का स्थान मिल जायेगा। यहाँ महात्मा गांधी भी आये हैं, नेहरू, पटेल और अन्य लोगों का भी आना-जाना तो होता ही था। जब पहला लोकसभा चुनाव हुआ था, जिसके कर्ताधर्ता लाल बहादुर शास्त्री थे, इसी भवन में बैठकर चुनाव संबधी रणनीति बनाये थे। 

आज पुस्तकालय में प्रवेश के साथ अध्ययन कक्ष में सफेद दीवारों पर कांग्रेस के राष्ट्रवादी नेताओं की फ्रेम की हुई तस्वीरें लगी हैं जो इस बात का सबूत है कि उन दिनों यहाँ अलग-अलग विचारधारा वाले कई कांग्रेसी नेता, जिनमें नरमपंथी दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, कट्टरपंथी लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट का सेल्फ-रूल गुट, चित्तरंजन दास, गोपाल कृष्ण गोखले, कंजर्वेटिव राजेंद्र प्रसाद, मदन मोहन मालवीय और गांधी, नेहरू, बोस, अबुल कलाम आज़ाद और पट्टाभि सीतारमैया जैसे दूसरे देशभक्त शामिल हैं, आते थे। आज इस भवन पर सरकार के अलावे, दिल्ली सल्तनत ही नहीं, भारत के अन्य राज्यों के बड़े-बड़े भू-माफियाओं का, बड़े-बड़े बिल्डरों की नजर टिकी है। 

लाइब्रेरी में 23,000 से ज़्यादा किताबें हैं, जिनमें पॉलिटिक्स, बायोग्राफी, इकोनॉमिक्स, स्वतंत्रता संग्राम और इतिहास से जुड़ी किताबें शामिल हैं। ओरिजिनल रिकॉर्ड का यह अनदेखा खजाना ही लाइब्रेरी को शहर की किसी भी दूसरी पब्लिक लाइब्रेरी से अलग बनाता है। लाइब्रेरी में रखे भाषणों का एडिट किया हुआ कलेक्शन, मशहूर नेताओं के लेटर, शोधकर्ताओं को सच में कीमती जानकारी देता है। लाइब्रेरी के आर्काइवल सेक्शन में 1929 से 1974 तक राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी ओरिजिनल रिकॉर्ड पड़े हैं। इसमें कांग्रेस के सभी प्रेसिडेंट के भाषण, प्रस्ताव, अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठकों की कार्यवाही और कांग्रेस के बड़े नेताओं के भाषणों के 400 टेप शामिल हैं। इसके अलावा, कांग्रेस बुलेटिन का कलेक्शन और द जर्नल ऑफ़ इंडियन नेशनल कांग्रेस (1891-1921 के दौरान लंदन से पब्लिश हुआ) के 55 वॉल्यूम का एक सेट भी है, जो मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री के किसी भी शोधकर्ता के लिए बहुत खुशी की बात होगी। लेकिन पुस्तकालय की दीवारों को, छतों को, अलमारी को, किताबों को, रखरखाव को देखकर मन दुःखी हो जाता है।  खैर, शायद यही प्रारब्ध है। 

वैसे, सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक ट्रस्ट, प्रॉपर्टी का होल्डर होने का दावा करता है। इसमें दावा किया गया है कि 30 अप्रैल, 1977 को, इंडियन नेशनल कांग्रेस के उस समय के प्रेसिडेंट अशोक मेहता, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और चार अन्य लोगों ने सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक ट्रस्ट के पक्ष में डीड बनाई थी, जिसमें 1959 में हुए समझौते के अनुसार सरकार से उस प्रॉपर्टी पर सुविधा पाने के अपने सभी अधिकार और हित ट्रांसफर कर दिए गए थे। सरदार पटेल के नाम पर बने एक ट्रस्ट द्वारा मैनेज की जाने वाली यह लाइब्रेरी गांधी, पटेल और आज़ादी की लड़ाई के दूसरे बड़े नेताओं के आदर्शों और सोच को बढ़ावा देने की कोशिश करती है। 

अरविन्द सिंह का कहना है कि धर्म सिंह का बनाया घर बाद में कांग्रेस हेडक्वार्टर बना। कुछ सालों तक, यह नवाब अब्दुल हसन खान के पास था, लेकिन 1947 के बंटवारे के बाद जब नवाब पाकिस्तान चले गए तो यह खाली प्रॉपर्टी बन गई। यह भी कहा जाता है कि धर्म सिंह को राष्ट्रपति भवन, साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक बनाने के लिए धौलपुर, राजस्थान और आगरा से पत्थर सप्लाई करने का काम सौंपा गया था। शोभा सिंह ने धर्म सिंह के बंगले के बगल वाली ज़मीन पर अपना बंगला बनवाया, जो बाद में केरल हाउस बन गया। शोभा सिंह ने जंतर मंतर में अपने बंगले का डिज़ाइन वाल्टर जॉर्ज को सौंपा, जिन्होंने मिरांडा हाउस, सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी के सबसे पुराने हॉस्टल ग्वायर हॉल और सुजान सिंह पार्क को भी डिजाइन किया था। 

अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि “अगर नीतीश कुमार जनता दल यूनाइटेड को मिले जनादेश को कायम रखते तो इतिहास रचते। लेकिन जनादेश मिलने के बाद उन्होंने जो विश्वासघाती राजनीति प्रदेश के मतदाताओं से किए, ग़लत किये। मैं पिछले पांच और अधिक दशकों में बीच की राजनीति कई बार देखा हूँ। अनुग्रह नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री बनने के लिए काफ़ी लॉबिंग किये, लेकिन बन नहीं पाए। यह अलग बात है कि आज बीजेपी कभी भी किसी भी राजनेता को, चाहे अपनी पार्टी का क्यों न हो, इतिहास लिखने नहीं देगा, शायद नीतीश कुमार भी उस चक्रव्यूह में फँस गए। कुछ तो कारण अवश्य है। लेकिन जब 7-जंतर-मंतर का यह इमारत देखता हूँ, तो यह स्पष्ट दिखता है कि यह भवन, यहाँ की मिट्टी इस बात का गवाह है कि यहाँ कोई ऊपर नहीं चढ़ा। अगर नीतीश कुमार राज्य सभा में पहली पंक्ति में भी बैठते हैं जहाँ सोनिया गांधी, मल्लिका अर्जुन, देवगौड़ा या फिर जेपी नड्डा बैठे हैं, उस राज्यसभा में वे क्या कर लेंगे? क्या बोलेंगे क्योंकि हरिवंश और आर सी पी सिन्हा पहले से मौजूद हैं। वैसी स्थिति में मौन द्रष्टा ही रह सकते हैं।” 

बहरहाल, नीतीश कुमार को अभी सात दिन भी नहीं हुए हैं बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, यकीन मानिए बिहार के मतदाता, जनता दल यूनाइटेड के अनुयायी या फिर उनके पार्टी के लोग भले उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे हैं, यथार्थ यह है कि सभी उन्हें भूलकर अपना अपना रास्ता देख रहे हैं, मनन मंथन कर रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में आधिकारिक रूप से शराबबंदी कर समाजवादी धारा को मजबूत बनाया, लेकिन राजनीति के अंतिम वसंत में लोहिया के समाजवाद को उनकी तस्वीर के साथ दीवार पर लटका कर भाजपा के आदेशानुसार पटना से दिल्ली का प्रयास उन्हें राजनीति में कहीं का नहीं रखेगा। 

1 COMMENT

  1. Bahut sunder jankari padhne samajhne ko mila. Harek ka ant hota hai kabhi na kabhi, wahi isthit sayad JDU (Nitish Kumar, CM, BIhar) ke sath hua hoga aisa p ratit hota hai. Mai kamna karta hun ki manniye Nitish Kumar jee Rajya Sabha men aisa kaam apne durdristi se karen ki samast Bihar bale ka man prafullit ho jaye. Hardik Subhkamna

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