उस दिन बाबूजी का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए बांस घाट की ओर प्रस्थान करने के लिए सज्ज था। आज से 34 साल पहले 1992 साल के जून महीने के 23 तारीख को बाबूजी अनंत यात्रा पर निकले थे। उन दिनों हम सभी पटना के कंकड़बाग के अशोक नगर, रोड नंबर-11 में रहते थे किराये क मकान में । मैं संडे पत्रिका में था।
बाबूजी से कुछ घंटे पहले ही बात हुई थी श्री किशुन जी (श्री कृष्णानंद झा) की। मेरे बाबूजी किशुन जी के बाबा थे। बहुत सम्मान करते थे बाबूजी और माँ को। माँ-बाबूजी के बिना उनके घर में कोई भी कार्य संपन्न नहीं होता था। माँ को टुकुर-टुकुर बाबूजी का चेहरा देखते किशुन जी और उनके अपने मौसेरे भाई श्री ज्वाला नंदन सिंह (ज्वाला बाबू) अश्रुपूरित थे। कोई नहीं जानते थे कि बाबूजी कुछ घंटे बाद अंतिम सांस लेंगे।
बाबूजी का अंतिम यात्रा निकल रहा था तभी मुझे पांच कदम आगे ले जाकर किशुन जी कहते हैं: “रास्ता में बाबा की यात्रा में बाधा नहीं होनी चाहिए, इसलिए जब आप भाई जी के घर के पास आयंगे, गति घीमी कर लेंगे। मैं कागज में स्वर्ण लेकर आ जाऊंगा। बाबा के मुखाग्नि के समय उनके मुख में स्वर्ण देना नितांत आवश्यक है।”
इन बातों को बोलते किशुन जी और ज्वाला बाबू दिनों अश्रुपूरित थे। जब बाबूजी का पार्थिव शरीर लेकर निकला था, माँ मन ही मन बिलख रही थी कि उसके पति के अंतिम यात्रा के समय मुखाग्नि के लिए घर में स्वर्ण नहीं है। लेकिन किशुन जी और ज्वाला बाबू माँ की बिलखता को और हम सभी के आर्थिक स्थिति से अवगत थे। उन दोनों की संवेदनशीलता उस दिन कंकड़बाग के रोड नंबर – 11 की ओर से आने वाली सड़क के अंतिम छोड़ पर दिख गया था, जब वे मरे हाथों में कागज में स्वर्ण का टुकड़ा दिए। बांस घाट पर मुखाग्नि के समय बाबूजी को स्वर्ण के बिना नहीं जाना पड़ा।
आज शायद किशुन जी भी नहीं जानते होंगे कि जब उनके पार्थिव शरीर को उनका बड़ा पुत्र समीर और छोटा पुत्र सुमित अपने पिता को पुणे में अंतिम यात्रा के लिए विदा करेंगे, 34-वर्ष पहले की एक मानवीय और संवेदनशील घटना को उसी अखबार के वेबसाइट पर, जिस अख़बार के पालन-पोषण में उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया, लिखा जायेगा।
ज्वाला बाबू कुछ वर्ष पहले अनंत यात्रा पर निकले, जबकि किशुन जी की पत्नी श्रीमती द्वितीया झा, किशुन जी के अंतिम सांस से 11-माह पूर्व अनंत यात्रा पर निकली थी। किशुन जी 87 वर्ष के थे और पिछले कुछ वर्षों से अस्वस्थ थे। श्रीमती द्वितीया झा 20 अप्रैल, 2025 को अंतिम सांस ली थी।
साठ के दशक से लगातार किशुन जी दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित ‘आर्यावर्त और इंडियन नेशन’अखबार के शीर्षस्थ प्रबंधन में थे।भारत के कंपनी सेक्रेटरी संस्थान से उपाधि लिए किशुन जी
इंडियन नेशन-आर्यावर्त के प्रकाशक दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड के सचिव थे।
महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की अपनी सगी बहन श्रीमती लक्ष्मी बौआसिन – श्री ओझा मुकुंद झा के एकमात्र पुत्र श्री कन्हैया जी – श्रीमती कृष्णलता बौआसिन की पुत्री श्रीमती द्वितीया दाई के साथ सन 1965 में इनका विवाह हुआ था। पटना के बोरिंग केनाल रोड स्थित अपने मकान में मुद्दत तक रहे। पत्नी की मृत्यु के बाद अकेले हो जाने के कारण वे अपने छोटे पुत्र सुमित के पास रहने लगे थे। अस्वस्थ रहने के कारण वे सिम्बोसिस अस्पताल के चिकित्सकों की देखरेख में थे। चिकित्सकों ने आज सुबह करीब 3.56 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिए।
पटना के आज के मैथिल समाज के बारे में नहीं कह सकता, लेकिन साठ के दशक से लेकर कोई 2010 तक पटना के मैथिल समाजों, खासकर चेतना समिति के सक्रीय सदस्य थे। चेतना समिति द्वारा सन 1954 से आयोजित होने वाला विद्यापति पर्व समारोहों में वे सक्रीय भूमिका निभाते रहे।
सुरेंद्र नाथ झा ‘सुमन’ से लेकर डॉ. जयकांत मिश्र, डॉ. प्रवोध नारायण सिंह, रामदेव झा, लिली रे, मायानन्द मिश्र, भीमनाथ झा, सोमदेव, मंत्रेश्वर झा, ताराकांत झा, गोविन्द झा, विद्यानाथ मिश्र ‘यात्रीजी’, यशोधर झा, काशिकान्त मिश्र ‘मधुप;’, गिरीन्द्र मोहन मिश्र, उपेंद्र ठाकुर, श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, दीनानाथ झा, हीरानंद झा ‘शास्त्री’, परमांनद झा ‘शास्त्री’, आनंद मिश्र, तंत्रनाथ झा, रमानाथ झा, मारकंडे प्रवासी, काली कान्त झा, आरसी प्रसाद सिंह, कन्चिनाथ झा ‘किरण’, गणेश गुंजन आदि जैसे मिथिला के घनुर्धरों के साथ किशुन जी का बहुत ही बेहतर सम्बन्ध था, जो मिथिला और मैथिली के विकास के लिए सतत प्रयत्नशील रहे।
किशुन जी अथवा इनकी पत्नी श्रीमती द्वितीया दाई का जाना पटना स्थित मिथिला समाज ही नहीं, बल्कि मिथिलांचल के शिक्षित, विद्वान-विदुषियों के परिवारों के लिए कष्टदायक है। दोनों को मैं निजी तौर पर अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों से जानता हूँ। करीब पांच वर्ष पहले अपनी पत्नी के माध्यम से जब आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम वेबसाइट के बारे में सुने थे तो पति-पत्नी दोनों क साथ कहे थे: “आप इस अखबार में काम किये। सैकड़ों लोग और उनका परिवार इन अख़बारों से जुड़ा था। लेकिन अख़बार समाप्त होने के बाद वेबसाइट क रूप में इसके नाम को जीवित रखना न केवल महाराजाधिराज, जिन्होंने इसे स्थापित किया था, बल्कि कुमार शुभेश्वर सिंह के प्रति बहुत बड़ा सम्मान और श्रद्धांजलि है। कुमार साहब आपको नौकरी दिए थे। आप जब भी पटना आएं, आप घर जरूर आएं। हज़ारों पुरानी तस्वीरें उपेक्षित पड़ी है। आप बहुत अच्छा लिखते हैं। आपके लिखने में तस्वीरें काम आएँगी।
किशुन जी वृद्धावस्था के कारण सुनने मन भी कुछ कमजोर हो गए थे, लेकिन उनकी बात को उनकी पत्नी दोहराती कही थी: “अपने पिता महाराजा रामेश्वर सिंह के सम्मानार्थ उनके पुत्र महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह जिन दो अख़बारों को इंडियन नेशन (1930) और आर्यावर्त (1940) स्थापित कर प्रदेश के लोगों की आवाज के साथ, रोजी-रोटी का भी बंदोबस्त किए, आप अख़बारों के नाम को जीवित कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दिए हैं। हम दोनों बीच-बीच में अस्वस्थ हो जाते हैं, तथापि हम जरूर चाहेंगे की आपके इस अदम्य साहस और कार्य में हम भागीदारी अर्पित कर सकें।”
आज जब श्रीमती द्वितीय जी भी नहीं हैं, उनके पति किशुन जी भी नहीं रहे – उनके अखबार के वेबसाइट पर उन दोनों के बारे में मृत्युलेख लिखते अन्तःमन से अश्रुपूरित हूँ। मैं नहीं जानता, शायद प्रारब्ध यही चाहता था की उनके अख़बारों के वेबसाइट पर उनकी मृत्युलेख प्रकाशित हो। महादेव से प्रार्थना करूँगा की उन्हें अपने शरण में स्थान दें। भारत रत्न शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान आपकी शादी में शहनाई से मंगल गान गाये थे। आपका मेरे जीवन के प्रारंभिक वर्षों में बहुत उपकार रहा है।
आज इन शब्दों को लिखते समय आपकी बहुत याद आ रही है । मैं शब्दों से आपको श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।















