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	<title>bjp Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>कोने-कोने बात उठी है पता चला है, अरे &#8216;चड्डा&#8217; पहन के &#8216;फूल&#8217; खिला है &#8216;फूल&#8217; खिला है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Apr 2026 07:21:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[aap]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[Raghav Chadda]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन जब तक पुरानी दिल्ली में लालकिले के सामने से उम्र से लम्बी चांदनी चौक सड़क के बाएं हाथ गली कासिमजान स्थित मिर्जा ग़ालिब की हवेली जीवित रहेगा,  गुलजार साहब जीवित रहेंगे। वजह है गुलजार के द्वारा ग़ालिब के सम्मान में स्थापित संगमरमर से बनी ग़ालिब की प्रतिमा। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/raghav-chadda-six-others-aap-mps-join-bjp">कोने-कोने बात उठी है पता चला है, अरे &#8216;चड्डा&#8217; पहन के &#8216;फूल&#8217; खिला है &#8216;फूल&#8217; खिला है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन जब तक पुरानी दिल्ली में लालकिले के सामने से उम्र से लम्बी चांदनी चौक सड़क के बाएं हाथ गली कासिमजान स्थित मिर्जा ग़ालिब की हवेली जीवित रहेगा,  गुलजार साहब जीवित रहेंगे। वजह है गुलजार के द्वारा ग़ालिब के सम्मान में स्थापित संगमरमर से बनी ग़ालिब की प्रतिमा। वैसे दिल्ली सल्तनत के लोगों को, नेताओं को, अधिकारियों को &#8216;ग़ालिब&#8217; और &#8216;गुलज़ार&#8217; को समझना आसान नहीं तो मुश्किल जरूर है। </strong></p>
<p>इसके अलावे भी गुलजार की सोच और उनकी कलम का लोहा तो दुनिया मान ही चुकी है। ऑस्कर से सम्मानित होना &#8216;मजाक&#8217; थोड़े ही है। अगर ऐसा होता तो हमारे देश के सैकड़ों नहीं, हज़ारों नेतागण सम्मानित हो गए होते अब तक। लेकिन आज शायद देश के अब तक बने सभी प्रधानमंत्रियों में नरेंद्र मोदी के बाद आज के बच्चे अगर किसी भी प्रधानमंत्री का नाम बता सकता है तो वे है &#8211; डॉ मनमोहन सिंह, अटल बिहार वाजपेयी, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी और पंडित जवाहर लाल  नेहरू। शेष बचे प्रधानमंत्रियों को जानने के लिए शायद बच्चों को गूगल महाशय के शरण में आना पड़े। </p>
<p><strong>परन्तु &#8216;गुलजार&#8217; की कलम से शब्दबद्ध &#8216;जंगल बुक&#8217; का &#8216;शीर्षक गीत&#8217; न केवल देश के बच्चे, बल्कि जवान, बूढ़े, समाज-सेवक, राजनेता, नौकरी पेशे के लोग, बनिया, व्यापारी, चिकित्सक, मजदूर, या यूँ कहें कि समाज का शायद ही कोई वर्ग और शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जो नहीं सुना होगा, या नहीं गुनगुनाया होगा। बच्चों की बात ही अलग है। </strong></p>
<p>शायद श्रोताओं को यह मालूम नहीं हो। गुलजार साहब के इस गीत को कोई और संगीतकार संगीत देने वाला था। लेकिन कहते हैं समय बड़ा बलवान। अंतिम समय में वह संगीतकार &#8216;गच्चा&#8217; दे दिया। परिणाम यह हुआ कि दूरदर्शन वाले गुलजार साहब से एक अच्छे संगीतकार के बारे में पूछे जो इस गीत में संगीत दे। गुलजार साहब तत्काल विशाल भारद्वाज का नाम लिए। गीत बना, संगीत बना। लेकिन दूरदर्शन में आखिर हैं तो सभी सरकारी अधिकारी, &#8216;एक शब्द&#8217; के इस्तेमाल पर अटक गए। उधर दूरदर्शन के अधिकारी &#8216;अटके&#8217;, उधर गुलजार साहब &#8216;भड़के&#8217; और कहे कि &#8216;गंदगी सोचने वालों के दिमाग में होता है।&#8217; दूरदर्शन वाले अंततः गुलजार साहब के सामने झुके और गुलजार साहब का गीत और विशाल भारद्वाज का संगीत विश्वविख्यात हो गया:<br />
 </p>
<blockquote><p>जंगल जंगल बात चली है पता चला है<br />
अरे चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है</p></blockquote>
<figure id="attachment_7648" aria-describedby="caption-attachment-7648" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-scaled.jpeg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1710" class="size-full wp-image-7648" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-scaled.jpeg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-1024x684.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-768x513.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-1536x1026.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-2048x1368.jpeg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7648" class="wp-caption-text">राघव &#8216;चड्डा&#8217; भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नविन के साथ &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p><strong>इस गीत का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि भारत के राजनीतिक गलियारे में &#8216;चड्डा पहन के फूल खिला है &#8211; फूल खिला है&#8217; हो गया है । राघव &#8216;चड्डा&#8217; के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने अपने-अपने हाथों से ;झाड़ू&#8217; त्यागकर, हाथ धोकर, &#8216;कमल&#8217; हाथ में ले लिए हैं। इनके भाजपा में शामिल होने के साथ ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राज्यसभा में मजबूत स्थिति में पहुंच चुकी है। हालांकि उच्च सदन में सत्तारूढ़ गठबंधन दो-तिहाई बहुमत से अब भी 18 सदस्य दूर है, जबकि भाजपा सदन में साधारण बहुमत से महज 10 सांसद पीछे है। राज्यसभा में राजग के पास अब 145 सांसदों का समर्थन है। कुल 244 सदस्यों वाले सदन में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 163 होता है।</strong> </p>
<p>राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि राजग राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लेता है, तो उसके लिए संविधान संशोधन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराना आसान हो जायेगा। लोकसभा में भी राजग के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है, हालांकि उसे साधारण बहुमत प्राप्त है। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 363 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन द्वारा आप संसदीय दल के भाजपा में विलय को मंजूरी दिए जाने के बाद सत्तारूढ़ पार्टी के पास कुल 113 सांसद हो जाएंगे. फिलहाल भाजपा के पास 106 सांसद हैं। सत्तारूढ़ दल को सात मनोनीत सदस्यों और दो निर्दलीय सांसदों का समर्थन मिलने की भी संभावना है, जिससे भाजपा के समर्थन में सांसदों की संख्या 122 तक पहुंच जाएगी, जो सदन के सदस्यों की संख्या का ठीक आधा है। </p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में महिला आरक्षण (131वां संविधान संशोधन) बिल गिर गया, क्योंकि यह 352 मतों (दो-तिहाई बहुमत) की अनिवार्य संख्या तक नहीं पहुँच पाया। इसके पक्ष में केवल 298 वोट पड़े, जबकि 230 सदस्यों ने विरोध किया, जिससे यह 54 मतों के अंतर से पास नहीं हो सका। यह बिल परिसीमन से जुड़ा था। राज्यसभा में सामान्य बिल पास करने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत (50%+1) की आवश्यकता होती है, जबकि संवैधानिक संशोधनों के लिए विशेष बहुमत (कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित सदस्यों का 2/3) चाहिए। अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, NDA के पास राज्यसभा में लगभग 145 सांसद हैं, जो साधारण बहुमत के लिए पर्याप्त है। लेकिन विशेष बहुमत (2/3) के लिए 245 के सदन में 163-164+ की आवश्यकता होगी। </strong></p>
<p>बहरहाल, आम आदमी पार्टी अभी &#8216;वयस्क&#8217; भी नहीं हुई है। उम्र के मुताबिक आगामी 12 नवम्बर को आम आदमी पार्टी &#8217;14-वर्ष&#8217; की होगी। पार्टी को भारत के एक नए मतदाता की आयु तक पहुँचने में अभी चार वर्ष और लगेंगे, यानी 26 नवम्बर 2012 को गठित आम आदमी पार्टी 26 नवम्बर 2030 को, अर्थात 18वीं लोकसभा का जून 2029 में कार्यकाल समाप्त होने और 19 वीं लोकसभा के गठन के 17 महीने बाद, भारत के एक नए मतदाता की आयु में प्रवेश करेगी। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आम आदमी पार्टी के नेता अपनी उम्र को आधार मानकर स्वयं भू &#8216;वरिष्ठ नेता&#8217; से अलंकृत हो रहे हैं। मुख्यमंत्री होना, मंत्री होना, लोकसभा और राज्यसभा की कुर्सियों पर बैठना &#8216;वरिष्ठ नेता होने या कहलाने का मापदंड नहीं हो सकता है। दुर्भाग्य यह है कि पार्टी में किसी भी कार्यकर्ता को &#8216;वरिष्ठ कार्यकर्ता&#8217; शब्द से अलंकृत नहीं किया जाता है। यह बात आम आदमी पार्टी के साथ ही नहीं, बल्कि भारत में जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं, चाहे क्षेत्रीय हैं अथवा राष्ट्रीय, सभी पर लागू होती है जहाँ पाँच साल पार्टी में शरणागत होने के साथ ही सभी &#8216;वरिष्ठ नेता&#8217; शब्द से स्वयं भू अलंकृत होने लगते हैं। </p>
<figure id="attachment_7649" aria-describedby="caption-attachment-7649" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-scaled.jpeg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1710" class="size-full wp-image-7649" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-scaled.jpeg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-1024x684.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-768x513.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-1536x1026.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-2048x1368.jpeg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7649" class="wp-caption-text">राघव &#8216;चड्डा&#8217; की अगुवाई में &#8216;आप&#8217; के सात &#8216;सांसद अब &#8216;उनके&#8217; हुए। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>आम आदमी पार्टी में, अगर 2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव को आधार माना जाए, तो यहाँ औसतन 40-45 वर्ष की आयु वाले लोग इसके सदस्य थे। इतना ही नहीं, उस कालखंड में जिन 70 लोगों को विधानसभा चुनाव में उतारा गया था, उनकी आयु सीमा न्यूनतम 27 वर्ष और अधिकतम 66 वर्ष था। वैसी स्थिति में अगर नेतागण स्वयं को &#8216;वरिष्ठ&#8217; मान लें, तो कुछ और हो न हो, पार्टी प्रतिवर्तन में मदद अवश्य मिलता है। वैसे कल जब 11 नवम्बर, 1988 को जन्म लिए 37-वर्षीय राघव चड्डा अपने सात अन्य राज्य सभा सांसदों के साथ आप आदमी पार्टी की सीमा रेखा से छलांग लगाकर भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किये यह कहते कि &#8220;आम आदमी पार्टी अपने सिद्धांतों, मूल्यों और नैतिकता से भटक गयी है, अब यह पार्टी देश हित में कार्य नहीं कर, स्वहित में अधिक कार्य करती है&#8217;, तो जंतर मंतर के साथ-साथ रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के विरुद्ध चिल्ला-चिल्ला कर बोलने वाले अन्ना हज़ारे याद आ गए। </p>
<p><strong>15 जून 1937 को गुजरात के भिंगर में जन्म लिए किसान बाबूराव हज़ारे, जो बाद में &#8216;अन्ना हज़ारे&#8217; के नाम से चर्चित हुए, को आम आदमी पार्टी सहित, देश के कई राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ सैकड़ों लोगों ने, जो बाद में पहले &#8216;तथाकथित नेता&#8217; बने और फिर स्वयं भू नेताओं की श्रेणियों में पंक्तिबद्ध हो गए, शायद अन्ना हज़ारे के आंदोलन की नैतिकता को, मूल्य को, सिद्धांतों को अपने-अपने पैरों तले रगड़ते राजनीति में आगे बढ़ने में कोई कोताही नहीं किये, आज भी नहीं कर रहे हैं। आज दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों नेता हैं जो अपने-अपने कलेजे पर हाथ रखकर जब सोचेंगे तो उन्हें अपनी-अपनी बेईमानी दिखेगी। लेकिन देखेंगे नहीं। </strong></p>
<p>कल राघव चड्डा बीजेपी मुख्यालय पहुंचकर पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात की।  फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि जिस आम आदमी पार्टी को मैंने अपनी जिंदगी के 15 साल दिए, अब वह पार्टी ईमानदार राजनीति से दूर हो गई है। फिर कहा कि  राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 सदस्य हैं, जिसमें दो-तिहाई सदस्य &#8211; हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल &#8211; उनके साथ हैं और सभी भाजपा में शामिल हो रहे हैं। </p>
<p>वैसे, राघव चड्डा ही नहीं, दिल्ली विधानसभा के माननीय विधायक गण भी इस बात से भिज्ञ होंगे कि 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद आई एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के अनुसार, 70 चुने हुए विधायकों में से 24 (या 34%) ने अपने ऊपर आपराधिक मामले होने की घोषणा की। आम आदमी पार्टी के 67 विधायकों में से 23 ने और भारतीय जनता पार्टी के 3 विधायकों में से 1 ने आपराधिक मामलों की घोषणा की। रिपोर्ट में यह बताया गया कि 2015 में ऐसा कोई भी विधायक नहीं था जिसने हत्या या हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों की घोषणा की हो। </p>
<p>2020 विधानसभा  चुनावों पर एडीआर की एक रिपोर्ट के अनुसार, नए चुने गए 50% से अधिक विधायकों ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए थे, जैसे कि मारपीट, हत्या, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े मामले।इसी तरह, 2025 की एडीआर रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के 31 विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं, जिनमें से 17 पर भ्रष्टाचार और गंभीर अपराधों सहित गंभीर आरोप हैं। रिपोर्टों से पता चलता है कि आम आदमी पार्टी के 68% नवनिर्वाचित उम्मीदवारों और भारतीय जनता पार्टी के 33% विधायकों पर आपराधिक मामले लंबित हैं, जो गंभीर आरोपों में वृद्धि को दर्शाता है। राघव चड्डा को इन बातों का भी जिक्र करना चाहिए था। </p>
<p>एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, चड्ढा ने कहा कि आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ दी है और वे एक गुट के तौर पर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। चड्ढा ने कहा कि पार्टी के सांसद हरभजन सिंह और स्वाति मालीवाल भी आम आदमी पार्टी छोड़ दिए हैं। अपने इस कदम को सही ठहराते हुए, चड्ढा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तारीफ़ की और कहा कि सरकार ने &#8220;मज़बूत फ़ैसले&#8221; लिए हैं, जिन्हें लेने से पिछली सरकारें हिचकिचाती थीं; इनमें आतंकवाद से निपटना और भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति को मज़बूत करना शामिल है। </p>
<p>चड्ढा ने कहा, &#8220;AAP, जिसे मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह अपने सिद्धांतों, मूल्यों और बुनियादी नैतिकता से भटक गई है। अब यह पार्टी देश के हित में काम नहीं करती, बल्कि अपने निजी फ़ायदे के लिए काम करती है&#8230; पिछले कुछ सालों से, मुझे महसूस हो रहा था कि मैं गलत पार्टी में सही आदमी हूँ। इसलिए, आज हम यह ऐलान करते हैं कि मैं AAP से खुद को अलग कर रहा हूँ और जनता के करीब जा रहा हूँ।&#8221;</p>
<p>उधर, अन्ना हजारे ने कहा कि अगर आम आदमी पार्टी ‘सही’ रास्ते पर चलती तो राघव चड्ढा और पार्टी के छह अन्य राज्यसभा सदस्य पार्टी नहीं छोड़ते। हजारे ने कहा, ‘लोकतंत्र में हर किसी को अपनी राय रखने का अधिकार है. उन्हें (चड्ढा और अन्य लोगों को) कुछ परेशानी का सामना करना पड़ा होगा, इसलिए वे चले गए। हज़ारे के अनुसार, &#8216;यह उनकी (आप नेतृत्व की) गलती है। अगर पार्टी ने सही राह अपनाई होती, तो वे पार्टी नहीं छोड़ते। चड्ढा और अन्य लोगों को आप के भीतर कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा और इसीलिए उन्होंने पार्टी छोड़ी।&#8217;</p>
<figure id="attachment_7650" aria-describedby="caption-attachment-7650" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/3-scaled.jpeg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/3-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1710" class="size-full wp-image-7650" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/3-scaled.jpeg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/3-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/3-1024x684.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/3-768x513.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/3-1536x1026.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/3-2048x1368.jpeg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7650" class="wp-caption-text">राघव &#8216;चड्डा&#8217; की अगुवाई में &#8216;आप&#8217; के सात &#8216;सांसद अब &#8216;उनके&#8217; हुए। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>राघव चड्ढा की प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद, AAP के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने मीडिया को संबोधित किया और भाजपा पर एक बार फिर विरोधी पार्टियों के नेताओं को तोड़ने के लिए &#8220;ऑपरेशन लोटस&#8221; शुरू करने का आरोप लगाया। उन्होंने राघव चड्ढा और पार्टी छोड़ने वाले अन्य सांसदों की भी कड़ी आलोचना की और कहा कि पंजाब की जनता उन लोगों को कभी माफ़ नहीं करेगी, जिन्होंने उनके साथ विश्वासघात किया है। पंजाब के लोगों को इन सात नामों को याद रखना चाहिए। वे उन लोगों को कभी माफ़ नहीं करेंगे जिन्होंने उनके साथ विश्वासघात किया है। पार्टी ने राघव चड्ढा को विधायक और सांसद बनाया; पंजाब के लोगों ने उन्हें क्या कुछ नहीं दिया? और अब, वह BJP की गोद में जाकर बैठ गए हैं,&#8221; संजय सिंह ने कहा।</strong></p>
<p>एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर, दिल्ली चुनावों के बाद 2015 में उन्हें आम आदमी पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। उन्हें अक्सर अरविंद केजरीवाल का करीबी सहयोगी और संस्थापक सदस्य बताया जाता था। उन्होंने दिल्ली के विधायक (राजिंदर नगर) के रूप में और बाद में पंजाब से राज्यसभा सांसद (2022–2026) के रूप में कार्य किया। चड्डा के अनुसार, AAP, जिसे मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और जिसे मैंने अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह अपने सिद्धांतों, मूल्यों और मूल नैतिक आदर्शों से पूरी तरह भटक गई है।&#8221; चड्ढा को हाल ही में राज्यसभा में AAP के उप-नेता पद से हटा दिया गया था और उनकी जगह उच्च सदन में मित्तल को नियुक्त किया गया था।</p>
<p>राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 सांसद हैं। राघव चड्डा का कहना है कि दो-तिहाई से ज़्यादा सांसद उनके साथ हैं। सभी ज़रूरी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं जो राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की तारीफ करते चड्डा न कहा कि &#8220;जनता ने इस नेतृत्व को एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि तीन बार अपना समर्थन दिया है और अब वे सभी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में और अमित शाह के साथ काम करने के लिए उत्सुक हैं। उधर, आप के दिल्ली के प्रमुख सौरभ भारद्वाज ने चड्ढा की आलोचना करते हुए उन पर यह आरोप लगाया कि वे संसद में बड़े राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय &#8220;सॉफ्ट जनसंपर्क) को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं। हम सब अरविंद केजरीवाल जी के सिपाही हैं, और हमने सिर्फ़ एक ही बात सीखी है: &#8216;जो डर गया समझो मर गया&#8217;&#8230; क्योंकि एक छोटी पार्टी के पास संसद में बहुत कम समय होता है, इसलिए देश के बड़े मुद्दों को उठाना ज़्यादा ज़रूरी है।&#8221; </p>
<blockquote><p>अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी पर निशाना साधते हुए चड्ढा ने कहा कि पार्टी अब देश के लिए नहीं, बल्कि अपने फ़ायदे के लिए काम कर रही है। उन्होंने कहा, &#8220;पिछले कुछ सालों में, मुझे यह एहसास तेज़ी से हुआ है कि मैं गलत पार्टी में सही व्यक्ति हूँ। आज, मैं आप से अलग होने और &#8216;जनता&#8217; (आम लोगों) के साथ ज़्यादा करीब से काम करने के अपने फ़ैसले की घोषणा करता हूँ।&#8221; एक अन्य राज्यसभा सांसद, संदीप पाठक ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसी स्थिति आएगी, लेकिन ऐसा हो गया है। पाठक ने कहा, &#8220;10 साल तक मैं इस पार्टी से जुड़ा रहा। और आज, मैं आम आदमी पार्टी से अपने रास्ते अलग कर रहा हूँ।&#8221;</p></blockquote>
<figure id="attachment_7651" aria-describedby="caption-attachment-7651" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/4-scaled.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/4-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1710" class="size-full wp-image-7651" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/4-scaled.jpeg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/4-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/4-1024x684.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/4-768x513.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/4-1536x1026.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/4-2048x1368.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7651" class="wp-caption-text">राघव &#8216;चड्डा&#8217; की अगुवाई में &#8216;आप&#8217; के सात &#8216;सांसद अब &#8216;उनके&#8217; हुए। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>वैसे दिल्ली में लोगों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ने में किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं है, लेकिन अपने हित में आम लोगों की वेदना और संवेदना के साथ खेलना, यह राजनीति का हिस्सा नहीं होना चाहिए, जिसे राघव चड्डा ने किया। बंगाली मार्किट के एक दुकानदार का कहना है कि संसद में जिन बातों को उन्होंने उठाया, लगा जैसे आम लोगों की बात हो रही है; लेकिन अब लगता है वह भी राजनीति का हिस्सा था अपने आप को &#8216;प्रोमोट&#8217; करने के लिए। </p>
<p><strong>मध्यम वर्ग की आवाज़ के तौर पर जाने जाने वाले चड्ढा ने संसद में अक्सर ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिनका सीधा असर आम नागरिकों की आर्थिक स्थिति और अधिकारों पर पड़ता है। यहाँ 10 ऐसे प्रमुख मुद्दे दिए गए हैं जिन्हें उन्होंने उठाया और जो काफी वायरल हुए। उन्होंने &#8220;10 मिनट में डिलीवरी&#8221; वाले मॉडलों से पैदा होने वाले भारी दबाव की आलोचना की, और आरोप लगाया कि ये प्लेटफॉर्म &#8216;गिग वर्कर्स&#8217; (अस्थायी कर्मचारियों) के साथ &#8220;हेलमेट पहने बंधकों&#8221; जैसा बर्ताव करते हैं। उन्होंने डिलीवरी कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा लाभ, उचित वेतन और बेहतर सुरक्षा मानकों की मांग की। इसी तरह, &#8216;पितृत्व अवकाश&#8217; को एक कानूनी अधिकार के तौर पर मान्यता देने की ज़ोरदार वकालत की, और इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चों की देखभाल एक साझा ज़िम्मेदारी है। उन्होंने तर्क दिया कि पिताओं को अपने करियर और बच्चे के जन्म के बाद अपने परिवार का सहारा बनने के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए।</strong></p>
<p>यह बताते हुए कि यात्रियों का हर साल ट्रैफिक में लगभग 168 घंटे बर्बाद हो जाता है, उन्होंने एक राष्ट्रीय मिशन का प्रस्ताव रखा। इस मिशन का उद्देश्य बेहतर पार्किंग व्यवस्था और उन्नत सार्वजनिक परिवहन के ज़रिए शहरी भीड़भाड़ की समस्या से निपटना था। उन्होंने एयरलाइंस द्वारा अतिरिक्त सामान के लिए भारी शुल्क वसूलने, जबकि उड़ानों में बड़ी देरी होने पर कोई मुआवज़ा न देने की नीति की निष्पक्षता पर सवाल उठाया। उन्होंने एक ऐसी नीति की मांग की जो एयरलाइंस को जवाबदेह ठहराए, और जिसमें यात्रियों के बर्बाद हुए समय के आधार पर मुआवज़ा तय किया जाए।</p>
<p>पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण बाज़ार में आई अस्थिरता को देखते हुए, उन्होंने SIP निवेशकों और छोटे बचतकर्ताओं के लिए एक &#8220;सुरक्षा कवच&#8221; की मांग की। इसके तहत उन्होंने म्यूचुअल फंड में &#8216;टैक्स-न्यूट्रल स्विचिंग&#8217; (बिना टैक्स के एक फंड से दूसरे में जाने की सुविधा) और &#8216;सिक्योरिटीज़ ट्रांज़ैक्शन टैक्स&#8217; (STT) में छूट जैसे उपायों का प्रस्ताव रखा। चड्ढा ने तर्क दिया कि इस्तेमाल न हुआ डेटा (unused data) उपभोक्ता की अपनी संपत्ति है। उन्होंने एक &#8216;रोलओवर सिस्टम&#8217; (बचे हुए डेटा को अगले महीने में ले जाने की सुविधा) या दोस्तों और परिवार वालों को डेटा ट्रांसफर करने की सुविधा देने का सुझाव दिया, ताकि कंपनियाँ आधी रात को उस डेटा को ज़ब्त न कर सकें।</p>
<p>उन्होंने विवाहित जोड़ों को संयुक्त आयकर रिटर्न (Joint Income Tax Returns) दाखिल करने की सुविधा देने का प्रस्ताव रखा। इसके तहत उन्होंने एक &#8220;विवाह बोनस&#8221; (Marriage Bonus) का सुझाव दिया, जिससे मध्यम वर्ग के परिवारों पर टैक्स का कुल बोझ कम हो सके और रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया भी आसान हो जाए। उन्होंने बैंक खाते में कम बैलेंस होने पर लगने वाले शुल्क को &#8220;गरीबी पर लगाया गया जुर्माना&#8221; करार दिया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि बैंकों ने पिछले तीन वर्षों में इस मद से 19,000 करोड़ रुपये की वसूली की है, और मांग की कि किसानों तथा पेंशनभोगियों के लिए इन शुल्कों को माफ किया जाए। उन्होंने मासिक धर्म की स्वच्छता को एक मौलिक अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया, न कि किसी दान-पुण्य के कार्य के तौर पर; और लड़कियों को सैनिटरी पैड तथा एकांत उपलब्ध कराने के लिए एक व्यापक नीति की मांग की, जिसका उद्देश्य स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या को कम करना है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/raghav-chadda-six-others-aap-mps-join-bjp">कोने-कोने बात उठी है पता चला है, अरे &#8216;चड्डा&#8217; पहन के &#8216;फूल&#8217; खिला है &#8216;फूल&#8217; खिला है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>लालू यादव के &#8216;चरवाहा विद्यालय&#8217; के छात्र को &#8216;भाजपा&#8217; बिहार का &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; बनाया, &#8216;पैरवी&#8217; नीतीश कुमार किये, भाजपा में &#8216;कलह&#8217; शुरू (नीतीश के बाद बिहार-1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Apr 2026 07:00:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[chief minister]]></category>
		<category><![CDATA[samrat chaudhari]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली: आज इंडियन नेशन अख़बार के पूर्व संपादक ब्रजनन्दन आज़ाद, दीनानाथ झा, आर्यावर्त के संपादक श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, ब्रज किशोर झा &#8216;भास्कर&#8217;, हीरानंद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, परमाननद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, रामजी मिश्र &#8216;मनोहर&#8217;, सर्चलाइट के महेश प्रसाद, मुरारी मोहन प्रसाद, टीजेएस जॉर्ज, आरके मुक्कर, प्रदीप अख़बार के संपादक रामसिंह भारतीय, हरिओम पांडे, पारसनाथ सिंह, [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/a-student-of-lalu-yadavs-charwaha-vidyalaya-become-the-chief-minister-of-bihar">लालू यादव के &#8216;चरवाहा विद्यालय&#8217; के छात्र को &#8216;भाजपा&#8217; बिहार का &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; बनाया, &#8216;पैरवी&#8217; नीतीश कुमार किये, भाजपा में &#8216;कलह&#8217; शुरू (नीतीश के बाद बिहार-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली: आज इंडियन नेशन अख़बार के पूर्व संपादक ब्रजनन्दन आज़ाद, दीनानाथ झा, आर्यावर्त के संपादक श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, ब्रज किशोर झा &#8216;भास्कर&#8217;, हीरानंद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, परमाननद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, रामजी मिश्र &#8216;मनोहर&#8217;, सर्चलाइट के महेश प्रसाद, मुरारी मोहन प्रसाद, टीजेएस जॉर्ज, आरके मुक्कर, प्रदीप अख़बार के संपादक रामसिंह भारतीय, हरिओम पांडे, पारसनाथ सिंह, हरिनारायण निगम याद आ गए। उनकी धारदार कलम याद आ गया। आज अगर वे सभा होते तो देश के महान ज्ञाता, संविधान के निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के 135 वें जन्मदिवस पर बिहार की राजनीति में जो भूचाल आया उस पर सम्पादकीय अवश्य लिखते कि &#8220;स्वतंत्रता के 80 साल बाद भी, कागज पर प्रदेश का शैक्षिक दर भले 74 प्रतिशत (पुरुष-82% और महिला-66%) दीखता हो, लालू प्रसाद यादव द्वारा स्थापित चरवाहा विद्यालय का छात्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बना।&#8221;</strong></p>
<p>कहने-सुनने में यह शब्द बहुत कटु लगता है, लेकिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 16 नवम्बर, 1968 को जन्म लिए 57-वर्षीय राकेश कुमार या सम्राट चौधरी में ऐसा क्या दिखा जो पहले समता पार्टी, फिर राष्ट्रीय जनता दल, फिर जनता दल यूनाइटेड और अंत में भारतीय जनता पार्टी का दामन पकड़ने वाले सकुनी चौधरी के पुत्र के हाथों प्रदेश का कमान सौंप दिया। उधर, दो दशक से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे नीतीश कुमार, जो बाद में तथाकथित विकास पुरुष&#8217; के प्रत्यय से अलंकृत हुए, के समक्ष ऐसी कौन सी &#8216;मज़बूरी&#8217; थी जो &#8220;सत्ता का हस्तानांतरण&#8217; इस कदर किये कि 4 जून, 1947 को वायसराय माउंटबेटेन द्वारा देश को सम्बोधित किये गए संवादों को भी पीछे छोड़ गए। </p>
<p>भारतीय हाथों में सत्ता के हस्तांतरण से सम्बंधित अपने अंतिम प्रसारण में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन कहा था: &#8220;आज रात आपको एक बयान पढ़कर सुनाया जाएगा, जिसमें महामहिम की सरकार का वह अंतिम फैसला बताया जाएगा कि किस तरीके से सत्ता ब्रिटिश हाथों से भारतीय हाथों में सौंपी जाएगी। लेकिन ऐसा होने से पहले, मैं भारत की जनता को एक निजी संदेश देना चाहता हूँ, और साथ ही उन चर्चाओं के बारे में भी संक्षेप में बताना चाहता हूँ जो मैंने राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ की हैं, और जिनके आधार पर मैंने लंदन की अपनी हालिया यात्रा के दौरान महामहिम की सरकार को अपनी सलाह दी थी। मार्च के आखिर में भारत आने के बाद से, मैंने लगभग हर दिन ज़्यादा से ज़्यादा समुदायों और हितों के नेताओं और प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करने में बिताया है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझे जो भी जानकारी और उपयोगी सलाह दी है, उसके लिए मैं उनका कितना आभारी हूँ। पिछले कुछ हफ्तों में मैंने जो कुछ भी देखा या सुना है, उससे मेरी यह पक्की राय ज़रा भी नहीं बदली है कि अगर समुदायों के बीच थोड़ी-बहुत भी सद्भावना हो, तो एक एकीकृत भारत ही इस समस्या का सबसे बेहतरीन हल होगा।</p>
<p><strong>वायसराय माउंटबेटन आगे कहे थे: &#8220;सौ साल से भी ज़्यादा समय से, आप 40 करोड़ लोग एक साथ रहते आए हैं, और इस देश का शासन एक ही इकाई के तौर पर चलाया गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि संचार, रक्षा, डाक सेवाएँ और मुद्रा व्यवस्था एकीकृत हो गई हैं; टैरिफ और सीमा-शुल्क की रुकावट खत्म हो गई है; और एक एकीकृत राजनीतिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी गई है। मेरी सबसे बड़ी उम्मीद यही थी कि सांप्रदायिक मतभेद इस एकता को नष्ट नहीं करेंगे भारतीय लोगों का फ़ैसला चाहे जो भी हो, मुझे पूरा भरोसा है कि जिन भी ब्रिटिश अधिकारियों या अफसरों से कुछ समय के लिए रुकने को कहा जाएगा, वे उस फैसले को लागू करने में अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। हिज़ मैजेस्टी और उनकी सरकार, दोनों ने ही मुझसे आप सभी को भारत में आपके भविष्य के लिए अपनी दिली शुभकामनाएं और अपने निरंतर सद्भाव का भरोसा देने को कहा है। मुझे भारत के भविष्य पर पूरा भरोसा है और इस ऐतिहासिक समय में आप सबके साथ होने पर मुझे गर्व है। उम्मीद है कि आपके फैसले समझदारी से लिए जाएंगे और उन्हें गांधी-जिन्ना की अपील की शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण भावना के साथ लागू किया जाएगा।&#8221;</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s.jpg" alt="" width="1280" height="854" class="aligncenter size-full wp-image-7607" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>लेकिन, नीतीश कुमार, जो पिछले दो दशक से प्रदेश मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे, करीब छह मिनट तक अपने मंत्रिमंडल के लोगों के समक्ष विदाई भाषण तो दिए, यह भी कहा कि वे अपने सामर्थ्य और क्षमता के अनुरूप कार्य करने की अनवरत कोशिश किये, उनके कुछ खास लोग भाव विह्वल भी हुए, वे अपने मंत्रिमंडल के लोगों से पूछे भी कि क्या उनका फैसला सबों को मंजूर है अथवा नहीं? सभी हामी भी भरे, सभी यह भी कहे कि उनकी कमी खलेगी &#8211; लेकिन अपने इस निर्णय को लेने से पहले अथवा निर्णय लेने के बाद प्रदेश की जनता से, चाहे उसकी शैक्षिक दर औसतन 74 फीसदी ही हो, एक बड़ा समुदाय भले पढ़ना-लिखना नहीं जानता हो, लेकिन बहरा कोई नहीं है, सुन सकता था, उसे अपने बात न जाते-जाते अथवा जाने के बाद भी नहीं कहे &#8211; जिसने इन 21 वर्षों में अपना बहुमूल्य मत देकर उन्हें और उनके जनता दल यूनाइटेड को सूत्रबद्ध रखा। यह तो उनकी &#8216;कुछ निजी&#8217; और &#8216;कुछ राजनीतिक कमजोरी&#8217; रही होगी, जिसके कारण अपने दर्जनों  विधानसभा क्षेत्र, जिस पर वे जीतते आये, भारतीय जनता पार्टी को शनै-शनै सौंपते आये और अंततः स्वयं के साथ-साथ प्रदेश की सत्ता को भी जनता के विचार को पूछे बिना सौंपकर दिल्ली की ओर कूच कर गए। आने वाले दिनों में बिहार के भाजपा में और जनता दल यूनाइटेड के नेताओं के बीच क्या-क्या होगा, यह नेपथ्य में लिखा जा रहा है।  </p>
<p>सम्राट चौधरी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के दर्जनों नेताओं का गाल, मुंह सभी फुले हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बको ध्यानम लगाए रखने वाले नौजवान नेतागण कभी विधानसभा की ओर, तो कभी मंत्रालय की ओर त्यों कभी दिल्ली की ओर देखते नजर आ रहे हैं। कई नेता तो नेपथ्य में बैठे, अवकाशप्राप्त नेताओं से भी तालमेल जुटा रहे हैं। शायद यही राजनीति है। अगर आपकी पहुँच विधानसभा और मंत्रालय तक है तो साक्षात्आ देखें अन्यथा तस्वीरों का अवलोकन कर उनकी शारीरिक भाषाओँ को पढ़ें। खैर। </p>
<blockquote><p>सत्तर-अस्सी के दशक के सम्पादकों की याद आज इसलिए आ रही है कि आज से 51-वर्ष पहले 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल लगा था। आपातकाल की घोषणा के साथ ही प्रदेश की राजधानी पटना से प्रकाशित सभी अख़बारों के दफ्तरों में सरकारी मुलाजिम तैनात हो गए थे। अख़बारों में क्या प्रकाशनीय है और क्या नहीं, अपने-अपने कलम की लाल स्याही से निशान लगाने लगे थे। लोगों कह रहे थे कि अंग्रेजी हुकूमत के बाद स्वतंत्र भारत में शायद पहली बार &#8216;कलम की गिरफ़्तारी&#8217; हुयी थी। पत्रकारों के चेहरों पर &#8216;सूजन&#8217; दिखने लगा था। होठों के साथ-साथ कलम के स्याही में सूखने लगे थे। कागज पर कलम चले कोई 30 &#8211; घंटा से अधिक समय निकल गया था। </p></blockquote>
<p><strong>इंडियन नेशन के तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा, जिस सम्पादकीय को लिख कर गए थे और सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने स्थान – बाएं पृष्ठ, बायां हाथ, सबसे ऊपर – पर लगा हुआ था, तत्काल हटा दिया गया। कुछ काल बाद वे स्वयं दफ्तर पहुंच गए थे। उनके आने का अर्थ था सम्पादकीय विभाग के सभी कर्मियों की उपस्थिति, वह भी प्रेस में। मशीन के आस-पास बाएं हाथ ‘इंडियन नेशन’ और दाहिने हाथ ‘आर्यावर्त’ अख़बारों का जहाँ पृष्ठ बन रहा था, मेला जैसा दिख रहा था। उन दिनों लोगों कह रहे थे कि प्रेस के अंदर ऐसी भीड़ शायद जंगे आज़ादी के बाद पहली बार हुई थी। </strong></p>
<p>दूसरे दिन अखबार का प्रातः संस्करण प्रकाशित हुआ। कितने अखबार प्रकाशित हुए थे, कितने बिके, न मुद्रक को मालूम था और ना ही मानदाता सिंह (अखबार के एजेंट थे) को। कुछ काल दोनों अख़बारों का सम्पादकीय विभाग खाली रहा, लेकिन जैसे ही घड़ी की सूई 10 की ओर बढ़ रही थी, लोगों का आना प्रारम्भ हो गया। सम्पूर्ण दफ्तर में सुई रखने का जगह नहीं था। पटना विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं से लेकर शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के नेताओं का आना-जाना शुरू हो गया था। </p>
<p>कोई साढ़े दस बजे रिक्शा पर बैठे, कागजों का अम्बार लिए दीना नाथ झा परिसर में पधारे। मैं प्रथम द्रष्टा था। उनके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था आज कुछ होने वाला है। इसी बीच, सरकारी प्रतिनिधि में अपनी-अपनी गाड़ियों से पटना से प्रकाशित सभी समाचार पत्रों के दफ्तरों में आना-जाना शुरू कर दिए थे ‘अधिसूचना’ के साथ – कोई भी सामग्री बिना सरकारी मुलाजिमों को दिखाए अख़बार में प्रकाशित नहीं होगा। दीना बाबू, ज्वाला नंदन सिंह,गजेंद्र नारायण चौधरी, रिपूर्णानंद पांडे, दुर्गानाथ झा, मिथिलेश मैत्रा, केशव कुमार, सीता शरण झा, सुरपति झा, राजकुमार झा (आज सभी दिवंगत)और अन्य सभी सम्पादकीय विभाग के लोग कक्ष में उपस्थित थे। बीच-बीच में स्थानीय नेताओं का आना-जाना लगा था। जो आम तौर पर संध्याकाळ आते थे, जून के महीने में तपती धुप में आ रहे थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan.jpg" alt="" width="1874" height="1053" class="aligncenter size-full wp-image-7608" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan.jpg 1874w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1874px) 100vw, 1874px" /></a></p>
<p><strong>शाम में जब लाइनो विभाग के प्रमुख मोहम्मद सुभान खान को दीना बाबू का ‘पहला सम्पादकीय’ मिला तो उसे पढ़कर वह जोर से चिल्लाये, ठहाका लगाए, और सबों को अपने पास आने को कहे। अपने जीवनकाल में वे शायद पहली बार दीना बाबू लिखित ऐसे सम्पादकीय को पढ़े थे। सभी आश्चर्य चकित थे – लेकिन सभी उस सम्पादकीय में शब्दों के प्रयोग, वाक्यों के विन्यास और भाव से यह जान गए थे कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की इस हरकत के प्रति बिहार के लोगों की क्या राय है। 27 जून, 1975 का सम्पादकीय था – ‘आलू-बैगन की सब्जी कैसे बनाएं – क्योंकि लिखने के लिए कुछ था ही नहीं।  जो लिखते उसे सरकारी अधिकारी प्रकाशन में जाने ही नहीं देते। </strong></p>
<p>आज 51-वर्ष बाद जिस तरह कांग्रेस के तर्ज पर भाजपा के &#8216;आला कमान&#8217; (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह/सहकारिता मंत्री अमित शाह) के निर्णय के आधार पर बिहार में 24 वें मुख्यमंत्री के रूप में सातवीं कक्षा पास सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया, आज भी अब लिखने को कुछ बचा नहीं है। जिस तरह पूर्व-मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रदेश के मतदाताओं के साथ &#8216;स्वहित&#8217; में छल किया यह जानते हुए भी की विगत 21 वर्षों में जिस तरह बिहार का मतदाता उनके साथ खड़ा रहा और वे कुर्सी पर बैठे रहे, उसे बिना बताये, उसकी राय बिना लिए सत्ता को लालू यादव के चरवाहा विद्यालय के छात्र के हाथों सौंपकर दिल्ली सल्तनत की ओर कुछ किये &#8211; वेवजह नहीं हो सकता है। आज नीतीश कुमार भले उन तथ्यों का उजागर नहीं करें, कल समय स्वयं उसे सार्वजनिक कर देगा। </p>
<p>2005 में भाजपा के 55 और जनता दल यूनाइटेड के 88 विधायक थे बिहार विधानसभा में। 2010 में भाजपा विधायकों की संख्या 91 हुई और जनता दाल यूनाइटेड की संख्या 115 हो गयी। पांच साल बाद जनता दाल यूनाइटेड की संख्या अचानक गिरकर 71 हो गयी और भाजपा की संख्या भी 53 पर लुढ़की। 2015 के बाद, यानी जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी, नीतीश कुमार भाजपा के अधीन वशीकरण होते गए। जिसका दृष्टान्त 2020 विधानसभा चुनाव में दिखा। एक तरफ भाजपा की संख्या जहाँ 53 से 74 हो गयी, वहीं जनता दल यूनाइटेड की संख्या 53 से 43 हो गयी। विगत 2025 के चुनाव में भाजपा 74 से 89, जनता दल यूनाइटेड 43 से 85 और राष्ट्रीय जनता दल 75 से 25 पर आ गयी। वैसे राजनीतिक विशेषज्ञ यह कि नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण आंदोलन के सहकर्मी रहे लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक मन्त्र को &#8211; मुस्लिम यादव समीकरण, जिसके बल पर राष्ट्रीय जनता दल कई वर्षों तक शासन में रहा &#8211; नष्ट कर आगरा-पिछड़ा एक ऐसा समीकरण बनाए जिसके दम पर वह 21 वर्षों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish.jpg" alt="" width="1920" height="1079" class="aligncenter size-full wp-image-7609" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a></p>
<p><strong>बिहार के राजनीतिक विशेषज्ञ इस बात को मानते हैं कि प्रदेश में राजनीतिक सियासत में सामाजिक और जातीय समीकरण अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दो वर्ष पूर्व 2 अक्टूबर, 2023 को बिहार में कराई गई जाति आधारित गणना के आंकड़े सार्वजनिक किये थे।बिहार विधानमंडल ने 18 फरवरी 2019 को राज्य में जाति आधारित जनगणना (सर्वे) कराने का प्रस्ताव पारित किया था। रिपोर्ट के मुताबिक अति पिछड़ा वर्ग 27.12 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग 36.01 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 19.65 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 1.68 प्रतिशत और अनारक्षित यानी सवर्ण 15.52 प्रतिशत हैं। इस जातिगत सर्वे से बिहार में आबादी का धार्मिक आधार भी पता चला। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में हिंदू 107192958 (कुल आबादी का 81.9%) है, जबकि मुसलमानों 23149925 (कुल आबादी 17.7%), ईसाई 0.05 प्रतिशत, बौद्ध 0.08 प्रतिशत, जैन 0.009 प्रतिशत है। </strong></p>
<p>जिस कालखंड में जेपी अंतिम सांस लिए, प्रदेश की आवादी करीब साढ़े पांच करोड़ के आस-पास थी। प्रदेश में शैक्षिक दर करीब 34-36 फीसदी तक आयी थी, जिसमें पुरुषों का शैक्षिक दर तक़रीबन 45 फीसदी आँका गया था और महिलाओं की शैक्षिक दर 22 फीसदी। आज जयप्रकाश नारायण की मृत्यु के साढ़े चार दशक बाद प्रदेश में शैक्षिक दर कागज पर भले 74+ फीसदी लिखा हो, पुरुषों (82+%) की तुलना में महिलाएं (66+%) आज भी 20 फीसदी पीछे हैं। और 20 फीसदी अशिक्षित महिला मतदाताओं को  को चुनाबी मैदान में ठगना कोई बड़ी बात नहीं है। खासकर जब प्रदेश का नेतृत्व देने वाला स्वयं सातवां पास हो। आज भी भाजपा का विधानमंडल में इतनी संख्या नहीं है कि वह अपने दम पर सरकार बना सके। वैसे आज किसी भी राजनीतिक पार्टी प्रदेश में अकेले सरकार बनाने के काबिल नहीं हैं। इस दृष्टि आला-कमान ने यह निर्णय लिया कि राजनीतिक तालमेल को बनाये रखने के लिए, प्रदेश की सभी जातियों को कमोवेश राजनीतिक गलियारे में स्थान बरकरार रखने के लिए जनता दल यूनाइटेड के कोटे से विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र यादव को डिप्टी सीएम बनाया जाय। </p>
<blockquote><p>डॉ. भीमराव आंबेडकर के 135 वे जन्मदिवस पर भारतीय जनता पार्टी के &#8216;कल के उप-मुख्यमंत्री&#8217;, सम्राट चौधरी, आज के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। वह इस पद पर बैठने वाले भाजपा के पहले नेता हैं। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) ने चौधरी को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन में भाजपा, जनता दल (यूनाइटेड) और अन्य तीन पार्टियां शामिल हैं। चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार में जनता दल यूनाइटेड की तरफ से दो उपमुख्यमंत्रियों ने शपथ ली। उल्लेखनीय है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में भाजपा के दो उप-मुख्यमंत्री थे, चौधरी की सरकार में जनता दल यूनाइटेड के दो उपमुख्यमंत्री हैं। संसदीय बोर्ड ने शिवराज सिंह चौहान को इस बदलाव के लिए &#8220;केंद्रीय पर्यवेक्षक&#8221; नियुक्त किया था। </p></blockquote>
<p>आपको याद हो अथवा नहीं, लेकिन भारत सरकार के दस्तावेजों के साथ-साथ इंटरनेट और विभिन्न टीवी चैनलों, सोशल मीडिया पर आज भी उपस्थित है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार को सार्वजनिक मंच से बिहार में उनके राज में भ्रष्टाचार के घोटाले उजागर किये थे। जिस दिन मंच से प्रधानमंत्री यह बोल रहे थे, बिहार के लोगों में, खासकर मतदाताओं में एक आशा की किरण जगी – शायद प्रदेश का कुछ अच्छा होने वाला है। लेकिन समय बदलते गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक होते गए। इतना ही नहीं, आने वाले दिनों में भी शायद उन घोटालों से पर्दा कभी नहीं उठ पायेगा। </p>
<p><strong>ग्यारह साल पहले 30 अक्टूबर, 2015 को चुनाव प्रचार-प्रसार के दौरान लालू प्रसाद यादव के जन्मस्थान गोपालगंज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सार्वजनिक रूप से कहे थे : “नीतीश बाबू …. अरे चुनाव में तो हार जीत होती रहती है, ऐसा क्यों कर रहे हो? नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा था कि “दिल्ली में भी रोजाना भ्रष्टाचार के मामले आते थे। टूजी हो या कोयला, सब में पैसा खाया। लेकिन 16 महीनों से मुझ पर भ्रष्टाचार को कोई आरोप नहीं है।  नीतीश पर हमला करते हुए मोदी ने कहा, “हालत तो देखिए, नीतीश के मंत्री कैमरे के सामने पैसे लेते पकड़े गए, ये कम बड़ा अपराध है क्या? लेकिन उन्हें कोई शर्म है क्या? नीतीश ने कहा था जो भ्रष्टाचार में पकड़ा जाएगा उसके घर में गरीबों के लिए स्कूल खोला जाएगा। लालू को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल हुई, उनके घर को जब्त किया क्या? किसे पागल बना रहे हो नीतीश बाबू? इतना ही नहीं उनके मंत्री बिहार को बेच रहे हैं। नीतीश बाबू आपने अपने मंत्रियों के घर जब्त किए क्या? कोई कार्रवाई की क्या? अभी तो आपकी सरकार है। इन 25 सालों में इन्होंने जो किया है उसकी सूची है।” गोपालगंज की सभा में 84 सेकेंड तक महागठबंधन के नेताओं के समय की घोटालों की सूची लगातार 80 सेकेंड में उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार के समय के 25 और लालू यादव के समय के 7 घोटाले गिनाए। फिर 4 सेकेंड में बोले- मैं महागठबंधन के महाशय के चारा घोटाले को तो गिन ही नहीं रहा हूं। उसके बाद वे प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार और जंगलराज पर बोले।</strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="aligncenter size-full wp-image-7610" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>नितीश कुमार के कालखंड में हुए घोटालों को गिनाते, मसलन दवा खरीद घोटाला, ट्रांसफाॅर्मर खरीद घोटाला, एस्टीमेट घोटाला, फर्टिलाइजर सब्सिडी घोटाला, मस्टर रोल घोटाला, राशन-किरासन घोटाला, शराब घोटाला, इंदिरा आवास घोटाला, मनरेगा घोटाला, शौचालय घोटाला, कोसी केनाल निर्माण घोटाला, मिड डे मील घोटाला, आंगनबाड़ी घोटाला, कुलपति घोटाला, पथ निर्माण घोटाला, पुल निर्माण घोटाला, शिक्षा अभियान घोटाला, टेक्स्टबुक छपाई घोटाला, परिवहन घोटाला, वायरलेस बैटरी खरीद घोटाला, बियाडा जमीन घोटाला, बुद्ध स्मृति पार्क घोटाला और चावल घोटाला, प्रधानमंत्री सांस भी नहीं लिए। लेकिन दुर्भाग्य है कि इन विगत वर्षों में कौन किसकी आलोचना क्यों किये यह तो वे भी जानते हैं और नितीश कुमार – लालू यादव एंड कंपनी तो जानते ही हैं।  </p>
<p>बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक। </p>
<p><strong>जहाँ तक प्रदेश में भाजपा का नेतृत्व और लोगों पर उसकी पकड़ का प्रश्न है, वह अभी 20 फीसदी से अभी अधिक नहीं है। अगर इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं होता तो औसतन 60 फीसदी से अधिक अभ्यर्थी मुंह के बल गिरते। कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24), दिलीप कुमार जायसवाल (2024 -दिसंबर 2025 तक)  और संजय सराओगी (दिसंबर 2025 से अब तक) ये सभी पिछले 46 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। लेकिन बिहार में अब तक बने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष में शायद सम्राट चौधरी का कालखंड सबसे कम है (24 मार्च, 2023 को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बने और 26 जुलाई, 2024 को दिलीप कुमार जायसवाल को कुर्सी पद देकर हटे) &#8211; कुल 489 दिन। अब इन दिनों को आधार मानकर अगर भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री के काबिल समझ लिया, तो इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि आने वाले दिनों में राजनीति शास्त्र के देशज और विदेशज छात्र-छात्राएं इन विषय पर शोध अवश्य करेंगे। यह भी शोध का विषय मानेंगे की आखिर ऐसा क्या हुआ कि बिहार में भाजपा को पहचान देने वाला सुशील कुमार मोदी को भाजपा का  केंद्रीय आला कमान कभी आए आने नहीं दिया?</strong> </p>
<p>बिहार के लोग जब नरेंद्र मोदी का नाम नहीं सुने थे, बिहार में सुशील मोदी का नाम घरेलू हो गया था। अगर राजनीति नहीं हो और राज नेता के अनुयायी ‘निष्पक्ष निर्णय लेने लायक हो, तो आज ही नहीं, आने वाले काल खंडों में भी आधुनिक बिहार (जय प्रकाश नारायण आंदोलन के बाद) में अगर किसी भी ‘शिक्षित’, ‘तथ्यगत जानकारी रखने वाला’, ‘स्पष्टवक्ता’ राजनेताओं का नाम लिया जाएगा तो वह नाम ‘एक वचन” से बहुवचन नहीं हो पाएगा और सुशील मोदी के नाम पर पूर्ण विराम भी लग जाएगा। आज बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गुलबंद बांधकर भले भारतीय जनता पार्टी के आला नेता के संग बैठकर कुर्सी का मज़ा लें, ठहाका-पर-ठहाका लगाएं, आला नेता भले यह स्वीकार नहीं करें, लेकिन हक़ीक़त यही है कि बिहार में सन् सत्तर के दशक के बाद पहले ‘दीपक’ को ‘बुझने’ से बचाये रखने, जलाये रखने और फिर कमल को खिलने-खिलाने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया तो वह पटना के राजेंद्र नगर रोड नंबर 8 के निवासी सुशील कुमार मोदी के अलावे कोई नहीं था। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा भी सुशील मोदी के सामने बौने हैं। भले वे गोल-मटोल होकर, गोल-मटोल बातें कर सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हों।</p>
<p>हम सभी प्रथम द्रष्टा हैं। सुशील मोदी जेपी आंदोलन की उपज माने जाते थे। जयप्रकाश आंदोलन से रामजनम सिन्हा, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, नरेंद्र सिंह, सुशील मोदी, शिवानंद तिवारी जैसा राजनीतिक नेताओं का जन्म हुआ। सुशील मोदी की छात्र राजनीति की शुरुआत साल 1971 में हुई जब वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ की पांच सदस्यीय कैबिनेट के सदस्य निर्वाचित हुए। 1973 में वो महामंत्री चुने गए। उस वक़्त पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और संयुक्त सचिव रविशंकर प्रसाद चुने गए थे। भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांतकार और संघ विचारक रहे केएन गोविंदाचार्य को सुशील कुमार मोदी का राजनीतिक गुरु माना जाता है।</p>
<p>तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल के दौरान मोदी बिहार की राजनीतिक वातावरण में उभर कर आए। अपनी वाक्पटुता, स्पष्ट विचार के कारण वे पटना के मजदूरों से लेकर शिक्षाविदों तक सभी के पसंदीदा रहे। आपातकाल के दौरान वे 19 महीने जेल में रहे। सन 1977 से 1986 तक वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। बिहार की राजनीति में सुशील मोदी अपना नाम अपने दम पर लिखा। सन 1968 में वे राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और आजीवन आरएसएस के कार्यकर्त्ता बने रहे। सन 1974 आंदोलन के दौरान वे बिहार प्रदेश छात्र संघर्ष समिति के सदस्य बने। सन 1983 आते-आते वे विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय महासचिव के पद पर आसीन हुए। 1990 में सुशील कुमार मोदी ने पटना केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े और विधानसभा पहुंचे। 1995 और 2000 का भी चुनाव वो इसी सीट से जीते। साल 2004 में उन्होंने भागलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीता था। साल 2005 में उन्होंने संसद सदस्यता से इस्तीफा दिया और विधान परिषद के लिए निर्वाचित होकर उपमुख्यमंत्री बने। साल 2005 से 2013 और फिर 2017 से 2020 के दौरान वो बतौर उपमुख्यमंत्री अपनी भूमिका निभाते रहे। इस दौरान वो पार्टी में भी अलग-अलग दायित्व संभालते रहे। दिसंबर, 2020 में उन्हें पार्टी ने राज्यसभा भेजा। </p>
<p>नब्बे में जिस पटना केंद्रीय विधानसभा क्षेत्र (अब कुम्हरार विधानसभा क्षेत्र) से सुशील मोदी चुनाव जीते थे, कोई साढ़े तीन दशक बाद आज तक उस विधानसभा क्षेत्र में ‘मोदी के पग के निशान’ दीखते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस स्थान से भारतीय जनता पार्टी का कोई भी अभ्यर्थी चुनावी मैदान में अपनी टोपी उछालेगा, वह सुशील मोदी के नाम से विजय हो जायेगा। राजनीतिक विचारधाराओं में विविधता के वावजूद इस विधानसभा क्षेत्र के सभी लोग सुशील मोदी का बहुत सम्मान करते हैं। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जन्म लिए किसी भी राजनेताओं को, यहाँ तक की वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या अन्य केंद्रीय मंत्रियों को वह सम्मान नहीं प्राप्त हुआ।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="aligncenter size-full wp-image-7611" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<blockquote><p>लेकिन सम्राट चौधरी का तो दूर-दूर तक कभी न तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ सम्बन्ध रहा, न देश के किसी शाखा में वे कसरत किये, न भाजपा के लिए झंडा उठाया, फिर ऐसी क्या बात हुयी कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह (क्योंकि इन दोनों के अलावे भाजपा में आज कोई है ही नहीं जो निर्णय ले सके, चाहे पार्टी की हो या सरकार  की) के इतने प्रियपात्र हो गए, विश्वासी हो गए कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गयी। </p></blockquote>
<p>वैसे <strong>पटना के वरिष्ठ पत्रकार कमलाकांत पांडे</strong> कहते हैं: &#8220;बिहार की राजनीति में इस बदलाव के संकेत पिछले वर्ष नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान ही मिल गए थे, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तारापुर के चुनावी सभा में कहा था कि उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को &#8220;बड़ा आदमी&#8221; बनाया जायेगा। सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी एक पूर्व सैनिक हैं। शकुनी चौधरी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी और बाद में अलग-अलग समय में लालू प्रसाद तथा नीतीश कुमार के साथ जुड़े। जबकि सम्राट चौधरी ने साल 2017 में भाजपा का दामन थामा। इससे पहले वह एक दशक से अधिक समय तक लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल में थे फिर दो वर्ष तक नीतीश कुमार के पार्टी जदयू में भी रहे। साथ ही, लोजपा और हम के भी राही रहे। सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राबड़ी देवी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री भी रहे। राजद के वर्ष 2005 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी वह लंबे समय तक इस पार्टी के साथ बने रहे, लेकिन 2014 में एक बागी धड़े के साथ जद(यू) में शामिल हो गए, जब जीतन राम मांझी राज्य के मुख्यमंत्री थे। तीन वर्ष बाद उन्होंने जद(यू) छोड़कर भाजपा का रुख किया। </p>
<blockquote><p>बिहार के एक वरिष्ठ नेता (अपना नाम नहीं लिखना चाहते हैं) कहते हैं: &#8220;आज के राजनीतिक माहौल में चाहे किसी भी पार्टी का हो, सत्तारूढ़ हो या विपक्ष, सभी पार्टियों में कांग्रेस के तर्ज पर &#8216;आला कमान हो गया है। आला कमान शब्द की शुरुआत इंदिरा गाँधी के कालखंड से हुआ। उन दिनों भी जो मैडम के विरुद्ध गया, वह कभी फिर से राजनीती की मुख्यधारा में नहीं आ सका। सीताराम केसरी जी से बड़ा दृष्टान्त और क्या हो सकता हैं। उसी तरह, जयप्रकाश नारायण आंदोलन के बाद प्रदेश में जितने भी नेता जन्म लिए, वे सभी पारम्परिक राजनेता या खानदानी राजनेता नहीं हुए, थे या हैं; बल्कि अर्थ, सामर्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय, दबंगता, व्यापार, व्यवसाय का राजनीतिकरण कर राजनेता बने। </p></blockquote>
<p><strong>वे कहते हैं: &#8220;किसी अन्य का दृष्टान्त देने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही लीजिये। सत्तर के दशक में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पहले अंशकालीन, बाद में पूर्णकालिक प्रचारक बने। करीब सत्रह-अट्ठारह साल बाद 1985 में भाजपा में कार्य कार्य करने का जवाबदेही मिला। सन 1987 में वे गुजरात यूनिट के महासचिव बने। महासचिव बनने के कोई 15-साल बाद 7 अक्टूबर, 2001 को वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने। करीब 12 साल 227 दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में रहने के बाद 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिए। अब सवाल यह है कि पहले राबड़ी-लालू के साथ, फिर नितीश के साथ और फिर भाजपा में, आखिर नरेंद्र मोदी-अमित शाह को इनमें कुछ तो दिखा होगा जो भाजपा में 9-वर्ष होते-होते भारत के दूसरे सबसे बड़े जनसँख्या बाहुल्य, जाति-बाहुल्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिए। इस दृष्टि से सम्राट चौधरी महज एक रबर-स्टाम्प होंगे। केंद्र के इशारे पर कार्य करेंगे। कल आप लालू यादव की आलोचना करते थे, आज लालू यादव के चरवाहा विद्यालय का छात्र ही प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया। आज न भाजपा और ना ही जनता दल यूनाइटेड के किसी भी नेता अथवा विधायक में इतनी क्षमता है कि वे कुछ बोल सकें। सभी अंदर से भयभीत हैं। अगर मुंह खोले तो मंत्रालय से बाहर। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर इस बात की चर्चा आम है कि भाजपा का केंद्रीय आला कमान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसा कर्मठ, जुझारू मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं बिहार में। बिहार में भाजपा का एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो सिर्फ उनकी बात सुने और वही करे जो वे चाहते हैं। यह कि सुशील मोदी बिहार के लिए सबसे सबल व्यक्ति थे जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते, लेकिन आज वे नहीं हैं, और उनके बाद भाजपा में जो भी व्यक्ति हैं शायद केंद्रीय आला कमाल की बातों को प्रदेश में पूर्णतः लागू नहीं भी करते, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक बात की चर्चा और है कि नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार में जो भी हुए हैं, उन बातों पर कल अगर जांच-पड़ताल करने की बात आये, या फिर, जनतादल यूनाइटेड को &#8216;डिवाइडेड&#8217; कर विधजायकों को भाजपा के छतरी तले लाने की बात हो, या फिर लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार तथा परिजनों पर शिकंजा कसने की बात आये तो सम्राट चौधरी ही एक मात्र मुख्यमंत्री होंगे हो पीछे नहीं हटेंगे। यह भी तय है। </p>
<figure id="attachment_7612" aria-describedby="caption-attachment-7612" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh.jpg" alt="" width="2048" height="1151" class="size-full wp-image-7612" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7612" class="wp-caption-text">पूर्व डिप्टी सीएम विजय सिन्हा का राधामोहन सिंह से मिलना बीजेपी के अंदर की राजनीति के अलग हवा दे रहा है।</figcaption></figure>
<p><strong>बीबीसी के पूर्व पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते </strong>हैं: &#8220;नीतीश कुमार डरपोक हैं। बीस साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने वाला व्यक्ति इतना कमजोर हो जायेगा, इतना डरपोक हो जायेगा, यह बिहार का मतदाता कभी सोचा नहीं होगा। अगर नीतीश कुमार अपने कार्यकाल में सच में विकास पुरुष थे, तो उन्हें केंद्र को चैलेंज करना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया उन्होंने। वे धीरे-धीरे बिना किसी पदचाप के सत्ता का बागडोर भाजपा के हाथों सौंपते गए। वे प्रदेश के उन मतदाताओं के साथ न्याय नहीं किये जिन्होंने पिछले 21 वर्षों से उन्हें देखकर, उनकी पार्टी या उनके पार्टी के लोगों के पक्ष में मतदान किया था। प्रदेश का मुख्यमंत्री को छोड़कर कोई राज्यसभा की कुर्सी पकड़ता है। उन्हें तो चाहिए था मंत्रिमंडल को भंग कर जनमत की बात करते। जनता अगर चाहती उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक लाती। इतना ही नहीं, समाजवाद के पक्ष में, परिवारवाद के विरुद्ध बोलने वाला व्यक्ति अपने राजनीतिक जीवन के अंत में धृतराष्ट्र बन गया। पुत्र मोह में जकड़ गया। पुत्र को उप-मुख्यमंत्री बनाने की बात करने लगा। फिर तो वे लालू यादव, आनंद मोहन सिंह, जीतन राम मांझी, शकुनि चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा, राम विलास पासवान, जगन्नाथ मिश्र, प्रभुनाथ सिंह जैसे नेताओं के साथ पंक्तिबद्ध हो गए। </p>
<p><strong>आज भी बिहार में सभी जातियों के लोगों को चाहे अगारी हो &#8211; भूमिहार हो, ब्राह्मण हो, राजपूत हो, कायस्थ हो, शेख हो, पठान हो, या पिछड़ी ओबीसी/ईबीसी) में यादव हो, कोइरी हो, कुशवाहा हो, कुर्मी हो, बनिया हो, कुम्हार हो, तेली हो, धानुक हो, मल्लाह हो, ततवा हो, कनु हो या फिर अनुसूचित जाति में चमार हो, रविदास हो, दुसाध हो, पासवान हो, मुसहर हो, धोबी हो, डोम हो, पासी हो, भुईंया हो या फिर अनुसूचित जनजाति में संथाल हो, गोंड हो, मुंडा हो, अपवाद छोड़कर जो आज से तीस-साल पहले थे, आज भी वहीँ हैं, जहाँ तक उनका या उनके परिवार का विकास का सवाल है। क्या आज कोई चमार, या दुसाध, या डोम या पासी, यहाँ तक की सवर्ण में भी चाहे राजपूत या भूमिहार समाज के निर्धन, अशिक्षित व्यक्ति अपने-अपने समुदायों के तथाकथित रूप से &#8216;नेता&#8217; कहलाने वाले लोग उन्हें अपने साथ, अपनी कुर्सी पर बैठाकर बात करेंगे, खाना खिलाएंगे ? सब कागज पर है या चुनाव के समय होता है। </strong></p>
<figure id="attachment_7613" aria-describedby="caption-attachment-7613" style="width: 1920px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit.jpg" alt="" width="1920" height="1079" class="size-full wp-image-7613" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7613" class="wp-caption-text">सातवां पास वनाम प्रदेश का मुख्य सचिव ​: इस दृश्य को देखकर लालू प्रसाद यादव की याद आना स्वाभाविक है। कुछ भी हो लालू यादव पटना विश्वविद्यालय से विधि स्नातक थे।</figcaption></figure>
<p>एक राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि सम्राट चौधरी का यह सफर भाजपा के पारंपरिक ढांचे से थोड़ा अलग नजर आता है। महज कुछ वर्षों पहले पार्टी में आए इस नेता का अचानक शीर्ष पर पहुंचना कई लोगों के लिए आश्चर्य है, तो कई के लिए असहजता भी। पार्टी के भीतर ही कई वरिष्ठ चेहरे इस उभार से सहज नहीं हैं। कहा जाता है कि शीर्ष नेतृत्व की पसंद कोई और थी, संघ की अपनी सोच थी, लेकिन अंततः राजनीति वही करवाती है, जो जमीन तय करती है। और जमीन ने इस बार सम्राट चौधरी के नाम पर मुहर लगा दी। मुझे तो लगता है कि जाते जाते नीतीश जी ने भाजपा की नहीं चलने दी, और लव कुश समीकरण को ध्यान में रखते हुए साथ ही साथ कुर्मी कोयरी वोट बैंक को बनाए रखने के लिए सम्राट का चयन किया गया, निजी विश्वसनीयता भी पैमाना हो सकती है। कुल मिलाकर सम्राट भाजपा के मुख्यमंत्री तो है मगर मात्र नाममात्र के।</p>
<p>उनका कहना है कि यह वही बिहार है, जहाँ भाजपा दो दशकों तक सत्ता में साझेदार रही, लेकिन अपना एक सर्वमान्य मुख्यमंत्री चेहरा खड़ा नहीं कर पाई। यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है—इतना बड़ा संगठन, इतनी मजबूत विचारधारा, फिर भी नेतृत्व “आयातित” क्यों? भाजपा को बिहार में स्थापित करने वाले स्वर्गीय कैलाशपति मिश्र ओर माननीय गोविंदाचार्य आज क्या सोच रहे होंगे ये तो वही जान रहे होंगे ? क्या बिहार में राजनीति अब भी व्यक्ति आधारित है, न कि विचार आधारित? या फिर यह मान लिया जाए कि यहाँ जीत उसी की होती है, जो पहले से तैयार खिलाड़ी हो—चाहे वह किसी भी पाठशाला से आया हो। विडंबना देखिए, जिस लालू यादव की “पॉलिटिकल पाठशाला” को खत्म करने की कसमें कभी भाजपा नेताओं ने खाई थीं, आज उसी पाठशाला का एक “छात्र” भाजपा के सबसे बड़े चेहरे के रूप में सामने खड़ा है। यह बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा ट्विस्ट है—यहाँ लड़ाई भले विचारों की होती हो, लेकिन जीत अक्सर व्यक्तियों की होती है। </p>
<p><strong>कमलाकांत पांडे</strong> कहते हैं कि &#8220;सम्राट चौधरी कोइरी समुदाय से आने वाले बिहार के दूसरे मुख्यमंत्री है। इससे पहले 1968 में सतीश प्रसाद सिंह इस समुदाय से मुख्यमंत्री बने थे, जिनका कार्यकाल मात्र पांच दिन का रहा था। अब शीर्ष पद पर पहुंचने के बाद सम्राट चौधरी के सामने बिहार में भाजपा को एक मजबूत राजनीतिक आधार के रूप में स्थापित करने की चुनौती होगी।&#8221; कभी नित्यानंद राय के संरक्षण में भाजपा में आए सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक कौशल और पार्टी के &#8216;कास्ट कार्ड&#8217; के सटीक समीकरण से न केवल विपक्षी दलों को, बल्कि अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं नित्यानंद राय, मंगल पांडेय, प्रेम कुमार, राजीव प्रताप रूडी और विजय सिन्हा जैसे चेहरों को भी रेस में काफी पीछे छोड़ कर मुख्यमंत्री बन गए। कहते हैं एक समय सम्राट चौधरी मुरेठा (साफा) बांधकर, दाढ़ी-बाल बढाकर प्रतिज्ञा लिए कि इसे तब तक नहीं हटाऊँगा जब तक नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर नहीं कर दूंगा। समय का खेल देखिये अयोध्या में प्रतिज्ञा तोड़ दिए जब नीतीश कुमार की सरकार में उप-मुख्यमंत्री बने। एक समय था जब नित्यानंद राय को बिहार भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता था और वे मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। नित्यानंद राय के प्रयासों से चौधरी भाजपा में शामिल हुए थे। उस समय शायद राय भी नहीं सोचे कि आने वाले दिनों में यह खुद नित्यानंद राय और अन्य वरिष्ठ नेताओं के लिए ही बड़ी चुनौती बन जायेंगे। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/a-student-of-lalu-yadavs-charwaha-vidyalaya-become-the-chief-minister-of-bihar">लालू यादव के &#8216;चरवाहा विद्यालय&#8217; के छात्र को &#8216;भाजपा&#8217; बिहार का &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; बनाया, &#8216;पैरवी&#8217; नीतीश कुमार किये, भाजपा में &#8216;कलह&#8217; शुरू (नीतीश के बाद बिहार-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>जो खिल सके न वो फूल हम हैं &#8211; तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं &#8211; दया की दृष्टि सदा ही रखना 🙏</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 03 Aug 2025 12:58:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
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		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना पहाड़ / अशोक रोड (नई दिल्ली) : दिल्ली के कर्तव्य पथ इण्डिया गेट से रायसीना पहाड़ की ओर जाते भारतीय जनता पार्टी के दो शीर्षस्थ नेताओं के बीच वार्तालाप जारी है। दोनों का मानना है कि यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना पहाड़ / अशोक रोड (नई दिल्ली) : दिल्ली के कर्तव्य पथ इण्डिया गेट से रायसीना पहाड़ की ओर जाते भारतीय जनता पार्टी के दो शीर्षस्थ नेताओं के बीच वार्तालाप जारी है। दोनों का मानना है कि यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार किसी भी तथ्य को कितना &#8216;गोपनीय&#8217; रख सकते हैं, यह कहना कठिन है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिवेश के मद्दे नजर उन्होंने कोई 13-करोड़ के प्रश्न पर चर्चाएं छेड़े कि आगामी 2 नवम्बर को देवोत्थान एकदशी और तीन दिन बाद 5 नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा के बाद बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा? नीतीश कुमार रहेंगे या नीतीश कुमार पूर्व-मुख्यमंत्री की कतार में पंक्तिबद्ध होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं का नाम बिना अपने होठों पर लाये दोनों एक स्वर में कहते हैं: &#8216;कुछ ऐसा ही होने वाला है।&#8217;</strong></p>
<p>दोनों नेता आपस में इस बात पर चर्चा करते हैं कि कल के जिस किंग्सवे और राजपथ को हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कर्तव्य पथ का नाम देकर भारत के लोगों को अपने-अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने का आह्वान किया, विगत कुछ महीनों में प्रधानमंत्री का तीन-तीन बार बिहार का भ्रमण-सम्मेलन के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्रियों का बिहार का दौरा करना इस बात का सूचक है कि श्री मोदी जी अब अधिक संख्या होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी को &#8216;सहायक&#8217; के रूप में और उसके नेताओं को &#8216;जनता दल यूनाइटेड&#8217; के नीचे नहीं रहने देना चाहते हैं। कर्तव्यपथ के दोनों तरफ की हरियाली को देखते, उस पर सकारात्मक टिपण्णी करते पहले कहते हैं कि &#8216;आज भारत का शायद ही कोई व्यक्ति होगा तो पैदल इस चमचमाते सड़क पर नहीं चलना चाहेगा। आज अगर राज कपूर जीवित होते, या फिर सत्यजीत रे जीवित होते, बिमल राय जीवित होते, गुरु दत्त जीवित होते, यश चोपड़ा जीवित होते, बीआर चोपड़ा जीवित होते तो मोदी जी की इस महानतम उपहार को देखकर कर्तव्यपथ को अपने किसी न किसी सिनेमा में स्थान अवश्य देते। </p>
<p><strong>तभी एक नेता कहते हैं, आज भी बिहार में प्रदेश के मुख्यमंत्री जो भी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने प्रदेश के विकास में चार चाँद लगा दिया है, यह कहने में हिचकी लेने लगते हैं कि विगत 11-वर्षों में अगर प्रधानमंत्री का सहयोग नहीं रहता उन्हें तो कुर्सी पर भी विराजमान नहीं होते। अब आप ही सोचिये, वर्तमान विधानसभा में भाजपा की जितनी संख्या (80) है, उसकी आधी संख्या (45) है जनता दल यूनाइटेड है। वैसी स्थिति में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना नीतीश कुमार के लिए तो सपना ही होता न। वह तो प्रधानमंत्री की उदारता है कि उन्हें बैठा दिए। लेकिन अगर यह प्रक्रिया इस बार भी दोहराते हैं तो भाजपा के प्रादेशिक नेताओं का अपमान होगा। यह बात मोदी जी जानते हैं।</strong> </p>
<p>अब तक दोनों नेता मौलाना आज़ाद रोड और सेना भवन की ओर से आने वाली सड़क जो कर्तव्य पथ से मिलती आगे निकल जाती है, पहुँच गए थे। तभी दूसरे नेता कहते हैं, नवम्बर 22 को बिहार का वर्तमान विधानसभा का काल समाप्त होने जा रहा है। स्वाभाविक है चुनाव के मद्दे नजर, खासकर आचार संहिता लगने से पूर्व, दिल्ली से पटना तक, प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री तक सबकी निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय में लगी कुर्सी पर टिकी है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मन में मनभर का लड्डू फूटना स्वाभाविक है &#8211; फिर एक बार मुख्यमंत्री बनने के लिए। लेकिन दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर नवनिर्मित कॉर्पोरेट कार्यालय नुमा भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में एक ओर जहाँ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर टिकी हैं, वहीं दूसरी ओर मंथन जारी है कि बिहार में राजनीतिक किला फतह के लिए बिहार से ही उपराष्ट्रपति लाना होगा, वह भी ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं, अपितु वैश्य या शूद्र। गणना आप सभी ज्ञानी महात्मा करें।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg" alt="" width="2032" height="1268" class="aligncenter size-full wp-image-7044" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2.jpg 2032w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-768x479.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-2-1536x958.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2032px) 100vw, 2032px" /></a></p>
<p>इस बात को सुनते है पहले नेता कहते हैं आपको याद होगा ही कि 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद बिहार के तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद जिन्हे राष्ट्र का गोविन्द बनाया गया था, दलित समुदाय से थे। परिणाम यह हुआ कि 2019 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के 30 से अधिक स्थानों को प्रधानमंत्री के चरणों में अर्पित कर दिए। इसका फल उन्हें 42 संख्या आने के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। आप माने अथवा नहीं, साल 2019 से अभी तक, सैद्धांतिक रूप से भले नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं, व्यावहारिक रूप से नियंत्रण भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय से ही है। वैसी स्थिति में आगामी चुनाव में जनता दल यूनाइटेड 42 से 20 पर आएंगे या 2 पर, यह तो नीतीश कुमार की आत्मा ही जानती है; लेकिन दीनदयाल उपाध्याय मार्ग की हवाएं यह बता रही है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी के आला कमान इस बात से आश्वस्त हैं कि उन्हें प्रदेश में सरकार बनाने में &#8216;बैसाखी&#8217; की जरूरत नहीं होनी चाहिए। </p>
<p><strong>वैसे रायसीना पहाड़ी पर आते आते दोनों नेता दो दिशाओं में हो गए, लेकिन जाने से पहले दोनों इस बात पर जोर से ठहाका लगाए कि सन 1990 से पहले बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली की ओर टकटकी निगाहों से देखते रहते थे। कई मर्तबा तो एक ही विधानसभा काल में चार-पांच मुख्य मंत्री कुर्सी पर बैठे। आया-राम-गया-राम का मुहाबरा बिहार से ही चला। राष्ट्रीय जनता दल की सरकार तो प्रदेश को सत्यानाश कर ही दिया। लेकिन जब से नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने उनकी भी रीढ़ की हड्डी उतनी मजबूत नहीं रही। कभी इधर, कभी उधर देखते, नाप-जोख करते कुर्सी पर विराजमान रहे। जब से मोदी जी प्रधानमंत्री बने, तबसे नीतीश कुमार भी उन्हें उसी तरह देखते आ रहे हैं &#8216;अपेक्षा की नज़रों&#8217; से जैसे कांग्रेस के कालखंड में मुख्यमंत्री दिल्ली की ओर इंदिरा गांधी को देखते थे। वह तो मोदी जी सब कुछ जानकार भी अनजान बने हैं। </strong></p>
<p>बहरहाल, भारत के 17वां उपराष्ट्रपति के निर्वाचन हेतु निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की अधिसूचना 7 अगस्त, 2025 को जारी की जाएगी। नाम-निर्देशन करने की अंतिम तारीख 21 अगस्त, 2025 और नाम-निर्देशनों की संवीक्षा की तारीख 22 अगस्त, 2025 होगी। अभ्यर्थिताएं वापस लेने की अंतिम तारीख  25 अगस्त, 2025, मतदान की तारीख 9 सितंबर, 2025 और मतदान की और गणना 9  सितम्बर को ही होगी।  राष्ट्रपतीय और उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन नियम, 1974 के नियम 8 के अनुसार, निर्वाचन के लिए मतदान संसद भवन में आयोजित किया जाएगा। मतदान, यदि आवश्यक हुआ तो, कमरा सं. एफ-101, वसुधा, प्रथम तल, संसद भवन, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।</p>
<p>निर्वाचन आयोग ने केंद्र सरकार के परामर्श से, 25 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से भारत के उपराष्ट्रपति के पद के वर्तमान निर्वाचन के लिए रिटर्निंग अधिकारी के रूप में राज्य सभा के महासचिव को नियुक्त किया है। आयोग ने 25 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से संसद भवन (राज्य सभा) में रिटर्निंग अधिकारी की सहायता करने के लिए दो सहायक रिटर्निंग अधिकारियों की भी नियुक्ति की है। 17वें उपराष्ट्रपति निर्वाचन, 2025 के लिए निर्वाचक-मंडल में निम्न शामिल हैं:  राज्य सभा के 233 निर्वाचित सदस्य (वर्तमान में 05 सीटें रिक्त हैं), राज्य सभा के 12 मनोनीत सदस्य, और लोक सभा के 543 निर्वाचित सदस्य (वर्तमान में 01 सीट रिक्त है) निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के कुल 788 सदस्य (वर्तमान में 782 सदस्य) शामिल हैं। चूंकि, सभी निर्वाचक संसद के दोनों सदनों के सदस्य हैं, इसलिए संसद के प्रत्येक सदस्य के मत का मान एक समान अर्थात 1 (एक) होगा। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg" alt="" width="2032" height="1268" class="aligncenter size-full wp-image-7045" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4.jpg 2032w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-768x479.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/08/Nitish-4-1536x958.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2032px) 100vw, 2032px" /></a></p>
<p><strong>बहरहाल, चुनाव आयोग द्वारा नए उप-राष्ट्रपति के चुनाव की घोषणा के साथ ही, इस संवैधानिक पद पर अगला पदभार ग्रहण करने वाले व्यक्ति को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। कहा जा रहा था कि चूंकि इस चुनाव के लिए कोई समय सीमा नहीं है, इसलिए इसमें देरी हो सकती है, क्योंकि राज्यसभा के उपसभापति उच्च सदन के मुख्य पीठासीन अधिकारी होंगे। हालांकि, चुनाव की घोषणा से संकेत मिलता है कि भाजपा इस मुद्दे पर किसी भी तरह की अटकलों को खत्म करने के लिए जल्द ही नए उपराष्ट्रपति का चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है।</strong></p>
<p>पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पर अपने कार्यकाल के दौरान हर मुद्दे पर बोलने और पक्ष लेने के कारण सदन की मर्यादाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था। इस संदर्भ में, यह याद रखना होगा कि जब 2022 में धनखड़ उपराष्ट्रपति चुने गए थे, तब भाजपा के पास पूर्ण बहुमत था, इसलिए उन्हें उपराष्ट्रपति पद दिलाने में कोई समस्या नहीं थी। 2024 के चुनावों के बाद कम संख्या बल के साथ, भाजपा, अपने उम्मीदवार को निर्वाचित कराने की स्पष्ट स्थिति में है, लेकिन उसे अपने गठबंधन सहयोगियों की संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना होगा। आज की स्थिति में, सहयोगी दल पूरी तरह से भाजपा नेतृत्व के साथ हैं, और अगर विपक्ष अपना उम्मीदवार खड़ा करके कोई औपचारिक लड़ाई नहीं लड़ने का फैसला करता है, तो अगला उप-राष्ट्रपति सर्वसम्मति से चुना जाएगा। ऐसी खबरें भी हैं कि इस मामले में आरएसएस की भूमिका हो सकती है, इसलिए उसकी स्वीकृति भी आवश्यक होगी।</p>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक पंकज वोहरा का मानना है कि &#8216;कई राजनीतिक विश्लेषक नए उप-राष्ट्रपति के चयन को अगले भाजपा अध्यक्ष के फैसले से भी जोड़ रहे हैं। यह सर्वविदित है कि वर्तमान भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का विस्तारित कार्यकाल जल्द ही समाप्त होने वाला है, और यदि उनके उत्तराधिकारी का चयन नहीं हो पाया है, तो इसका मुख्य कारण पार्टी नेतृत्व और आरएसएस के बीच किसी एक नाम पर सहमति न बन पाना है। कई नाम सार्वजनिक रूप से सामने आए, लेकिन एक-एक करके, आम सहमति के अभाव में वे गायब हो गए। भाजपा के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह अगले उपराष्ट्रपति के रूप में अपना उम्मीदवार चुने, ताकि राजनीतिक हलकों में इस मामले में उसकी पूर्ण भागीदारी का स्पष्ट संदेश जाए। उपराष्ट्रपति की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वह राज्यसभा के सभापति भी हैं।&#8217;</strong></p>
<p>उनका कहना है कि जो लोग भाजपा-आरएसएस संबंधों पर, खास कर पिछले एक साल से, नज़र रखे हुए हैं, उनके लिए आरएसएस केवल उसी व्यक्ति को हाँ कहेगा जिसका संघ के संबंध में एक सिद्ध ट्रैक रिकॉर्ड हो। इससे धनखड़ जैसे किसी भी व्यक्ति का चयन संभव नहीं है, जिन्हें चुना गया, हालांकि उनके करियर के अलग-अलग दौर में जनता दल और कांग्रेस, दोनों के साथ रहने का अनुभव रहा है। दूसरे शब्दों में, अगला उप-राष्ट्रपति संघ परिवार से ही होना चाहिए, जब तक कि भाजपा मोहन भागवत और उनके साथियों को ऐसे चुनाव में आने वाले राजनीतिक लाभ के बारे में समझाने में सफल न हो जाए।</p>
<p>हालाँकि, संघ के भीतर के माहौल को देखते हुए, यह करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। एक तरीका यह हो सकता है कि अगर भाजपा का वर्तमान नेतृत्व और संघ, पार्टी के अगले अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, दोनों पर एक साथ सहमति बना लें, तो आरएसएस इस पर सहमत हो सकता है। अगर अगले पार्टी प्रमुख के लिए आरएसएस की बात मान ली जाती है, तो वह अगले उपराष्ट्रपति के लिए भाजपा की पसंद को स्वीकार कर सकता है। यह एक तरह से लेन-देन जैसा हो सकता है। इस बात की भी ज़ोरदार अटकलें हैं कि मानसून सत्र के तुरंत बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है। यह निश्चित रूप से प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है, लेकिन इस प्रक्रिया का उपयोग सभी हितधारकों को संतुष्ट करने और आगे आने वाली किसी भी नई चुनौती का सामना करने के लिए किया जा सकता है।</p>
<p>मंत्रिमंडल में फेरबदल और पार्टी का पुनर्गठन, दोनों ही शायद यह सुनिश्चित करने की कुंजी होंगे कि भाजपा और संघ के बीच सौहार्द किसी भी तरह से न बिगड़े। अगले उपाध्यक्ष पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। यह चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगला उपाध्यक्ष वर्तमान राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने पर भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के लिए भी योग्य होगा। कई उपराष्ट्रपति आगे चलकर राष्ट्रपति बने हैं, लेकिन ऐसे भी कई उदाहरण हैं जो राष्ट्रपति नहीं बन पाए। उपराष्ट्रपति पद के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नाम भी चर्चा में है, जिन्हें संघ के कुछ प्रमुख पदाधिकारियों का समर्थन प्राप्त है और वे अपने विरोधियों को भी स्वीकार्य हैं।</p>
<p>सवाल यह उठेगा कि क्या प्रधानमंत्री उन्हें उनके वर्तमान पद से मुक्त करना चाहेंगे, क्योंकि सरकार के अनुसार &#8220;ऑपरेशन सिंदूर&#8221; अभी भी &#8220;जारी&#8221; है। कुछ हलकों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि जम्मू-कश्मीर के वर्तमान उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, जो प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों के करीबी हैं, के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। उनका चयन संघ की स्वीकृति पर निर्भर करेगा। आरिफ मोहम्मद खान, गुलाम नबी आज़ाद और नीतीश कुमार जैसे अन्य नाम भी चर्चा में हैं।</p>
<p>हालांकि, मुख्य मुद्दा यह है कि अगला भाजपा अध्यक्ष कौन होगा, क्योंकि दोनों मामलों पर एक साथ निर्णय लिया जाएगा और वे किसी न किसी तरह आपस में जुड़े हुए हैं। आरएसएस ने भाजपा के शीर्ष पद के लिए अपनी प्राथमिकताएँ पहले ही बता दी हैं और अब भाजपा की प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहा है। यह भविष्य के भाजपा-आरएसएस संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/who-will-be-the-next-cm-of-bihar">जो खिल सके न वो फूल हम हैं &#8211; तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं &#8211; दया की दृष्टि सदा ही रखना 🙏</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>अधिक खुश नहीं हों, &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन &#8216;आपके लिए नहीं&#8217;, बल्कि &#8216;विधायकों को समायोजित करने, खुश करने के लिए&#8217; किया गया है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jul 2025 03:21:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अन्ने मार्ग (पटना) / कर्तव्य पथ (नई दिल्ली) : &#8216;शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं।&#8217; एग्यारह शब्दों की हिदायत वाली कविता को बिहार ही नहीं, भारत के लोग, मतदाता, चाहे वे किसी भी उम्र के हों, किसी भी जाति और समुदाय के हों, अवश्य पढ़े होंगे। लेकिन चुनाव का समय आते [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-youth-commission-has-been-formed-not-for-you-but-for-mlas">अधिक खुश नहीं हों, &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन &#8216;आपके लिए नहीं&#8217;, बल्कि &#8216;विधायकों को समायोजित करने, खुश करने के लिए&#8217; किया गया है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अन्ने मार्ग (पटना) / कर्तव्य पथ (नई दिल्ली) : &#8216;शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं।&#8217; एग्यारह शब्दों की हिदायत वाली कविता को बिहार ही नहीं, भारत के लोग, मतदाता, चाहे वे किसी भी उम्र के हों, किसी भी जाति और समुदाय के हों, अवश्य पढ़े होंगे। लेकिन चुनाव का समय आते ही राजनेताओं द्वारा &#8216;वशीकरण मन्त्र&#8217; से ओत-प्रोत आकर्षक योजनाओं को चुनावी मैदान में फेंका जाता है कि मतदाता मतदान केंद्र पर पहुँचते-पहुँचते जाल में फंस ही जाते हैं और फिर अगले पांच साल तक सरकार, शासन, व्यवस्था की आलोचना करते नहीं थकते।  </strong></p>
<p>बिहार में 18 वीं विधानसभा चुनाव की घोषणा अभी हुई भी नहीं कि नेताओं और राजनीतिक पार्टियों द्वारा जाल बिछाये जाने लगा है। आज फिर से भांति भांति के आकर्षक दाने और रंग बिरंगी जाल बिछाकर एक बार फिर से मतदाताओं को फांसने की तमन्ना मे कमर कस कर निकल रहे हैं। देखना है अब कि समाज सुधारकों, समाज को तथाकथित रूप से जागृत करने वालों, मार्गदर्शकों की बात को मतदाता रूपी तोता कितना अमल करता है । विगत चार दशक में कितने आयोग यह बिहार सरकार के सचिवालय से जानकारी प्राप्त कर लें। यह भी देखें की उन आयोगों की सिफारिशों पर कितने मन मिट्टी जमी है। </p>
<p><strong>जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति वर्ष (1974) के चार साल बाद 1978 में प्रमोद चक्रवर्ती अपने निर्देशन में &#8216;आज़ाद&#8217; सिनेमा का निर्माण किये थे। इस फिल्म में मुख्य भूमिका में थे धर्मेंद्र, मालिनी, अजित, प्रेम चोपड़ा और केश्टो मुखर्जी। इस इस ऐक्शन थ्रिलर में सिनेमा में एक गीत था, जिसके गीतकार थे आनंद बक्शी, संगीतकार राहुलदेव वर्मन और गाये थे किशोर कुमार-लता मंगेशकर।</strong> </p>
<p>गीत का मुखरा था:</p>
<p><em>अरे जान की कसम,<br />
सच कहते हैं हम, <br />
खुशी हो या ग़म, <br />
बाँट लेंगे हम आधा आधा, <br />
ये वादा… हाँ वादा…<br />
ये वादा रहा… &#8230; ये वादा रहा।</em> </p>
<blockquote><p>कल जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 18 वीं विधानसभा चुनाव के पूर्व &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; के नाम से एक और आयोग गठन करने की घोषणा किये, अचानक साल 1978 का &#8216;आज़ाद&#8217; सिनेमा का वह गीत याद आ गया। पता हैं क्यों? आप को भले इस बात का वादा किया गया हो कि युवकों के कल्याणार्थ प्रदेश में बिहार युवा आयोग गठन करने का फैसला ली है सरकार; हकीकत यह है कि नीतीश कुमार अपने और सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के विधायकों को समायोजित करने के लिए आयोगों का गठन हैं। सभी विधायकों को मंत्रिमंडल में तो कुर्सी नहीं दी जा सकती है, स्वाभाविक है इन आयोगों में समायोजित कर उन्हें कैबिनेट या स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों को मिलने वाली सुविधाओं से सज्ज देंगे। </p></blockquote>
<p>इतना ही नहीं, अब तक बने सभी आयोगों और संगठनों में कौन भारतीय जनता पार्टी के &#8216;अतृप्त&#8217; विधायकों के हिस्से आएगा और कौन जनता दल यूनाइटेड के विधायकों को मिलेगा, इसका दस्तावेज भी तैयार कर लिया गया है। अध्यक्ष से लेकर सदस्य तक, औसतन एक आयोग में आठ से दस विधायक तो समायोजित हो ही जायेंगे। बिहार में वर्तमान में नवगठित &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; के अलावे किसान आयोग, सवर्ण आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, बाल श्रमिक आयोग, सुन्नी वक्फ बोर्ड, पिछड़ा वर्ग आयोग, युवा आयोग, व्यापार आयोग एवं संस्कृत शिक्षा बोर्ड, महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, अति पिछड़ा आयोग, महादलित आयोग, खाद्य संरक्षण आयोग, शिया वक्फ बोर्ड, बाल संरक्षण आयोग, मदरसा शिक्षा बोर्ड एवं नागरिक परिषद हैं। </p>
<p><strong>आंतरिक सूत्रों का यह भी मानना है कि अगर विधायकों को समायोजित करने में तकलीफ होगी तो वर्तमान के आयोग और परिषदों में भी विभाजन संभव है और इसके लिए सरकारी बोर्ड और आयोगों का पुनर्गठन होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह-सह-सहकारिता मंत्री अमित शाह ने प्रदेश के नीतीश कुमार से सम्पूर्ण आयोगों सूची मांगे हैं। साथ ही, भाजपा इस बात पर भी विशेष पहल कर रही है कि प्रदेश ही नहीं, केंद्र में भी जिन-जिन राजनीतिक पार्टियों का उसे सहयोग मिल रहा है, उसे अपने-अपने राज्यों में (बिहार सहित) बराबर का और संतोषजनक हिस्सा मिले। इन आयोगों और परिषदों के माध्यम से सत्तारूढ़ दलों के करीब डेढ़ सौ नेताओं-कार्यकर्ताओं को राज्य मंत्री, उप मंत्री का दर्जा, वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं मिलेंगी। </strong></p>
<p>यह कहा जा रहा है कि युवा आयोग के साथ-साथ किसान आयोग, सवर्ण आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, बाल श्रमिक आयोग, सुन्नी वक्फ बोर्ड, पिछड़ा वर्ग आयोग, युवा आयोग, व्यापार आयोग एवं संस्कृत शिक्षा बोर्ड भाजपा के हिस्से में अंकित किया गया है, जबकि महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, अति पिछड़ा आयोग, महादलित आयोग, खाद्य संरक्षण आयोग, शिया वक्फ बोर्ड, बाल संरक्षण आयोग, मदरसा शिक्षा बोर्ड एवं नागरिक परिषद आदि जनता दल यूनाइटेड के हिस्से में गया है। ज्ञातव्य हो कि आयोग और बोर्ड के अध्यक्ष को बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को उसके सदस्य के समकक्ष वेतन, भत्ता एवं अन्य सुविधाएं दी जाती हैं। राज्य सरकार अपने विवेक से मंत्री, राज्यमंत्री और उप मंत्री का दर्जा भी देती है।</p>
<p>वर्षों पहले <strong>प्रोफ़ेसर डी एम दिवाकर</strong> ने कहा था कि बिहार सरकार की ओर से 1971 में मुंगेरी लाल आयोग का गठन और लोकतंत्र को बचाने के लिए 1974 का जेपी आंदोलन भी उनमें से एक था, जिसमें महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी दूर करने के साथ सामाजिक परिवर्तन का नारा दिया गया। नेतृत्व का सामाजिक समीकरण बदला। 1977 की जनता पार्टी की सरकार में कर्पूरी ठाकुर इस धारा के सर्वमान्य नेता थे। यह इस बात का भी प्रमाण था कि सर्वमान्य नेता बनने के लिए विचार और आचरण का मूल्य महत्वपूर्ण था, संख्या बल नहीं। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1977 में दी थी। जनता पार्टी की सरकार ने 1978 में उन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए लागू कर दिया जिसमें 127 पिछड़ी जातियों की पहचान करके सामाजिक न्याय का व्यावहारिक शास्त्र गढ़ा गया था। हालांकि उच्च जाति के लोग इसके बाद कल तक के सर्वमान्य नेता कर्पूरी ठाकुर को पिछड़ी जाति का नेता समझने लगे और जाति की राजनीति खत्म होने के बजाय संगठित होने लगी। </p>
<p>उसी दौरान केंद्र में जनता पार्टी ने भी देश में सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए मोरारजी देसाई की सरकार की अगुवाई में 1979 में मंडल आयोग का गठन किया। वीपी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की कोशिश की और आखिरकार सभी सिफारिशों को तो नहीं लेकिन 1993 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने आरक्षण की सिफारिशों को लागू कर दिया। सामाजिक न्याय और हिंदुत्व के टकराव में सामाजिक ताना-बाना चरमराया। लालू प्रसाद की सरकार ने आडवाणी का रथ बिहार में रोका।मुसलमानों का विश्वास सामाजिक न्याय की सरकार पर बढ़ा। बिहार की राजनीति में यादव और मुसलमान की संयुक्त ताकत परवान चढ़ी। पटना का गांधी मैदान विभिन्न जातियों की रैलियों का गवाह बना। </p>
<p>पिछड़ी जातियों में भी नेतृत्व की महत्वाकांक्षा का जगना और असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक था। हालांकि उसे रोकने के लिए सामाजिक न्याय को मजबूत कदम उठाने के बजाय लालू प्रसाद ने अगड़ी जातियों के विरुद्ध कथित तौर पर &#8216;भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ करो&#8217; का नारा दिया। मंझोली जातियों की असंतुष्ट धारा ने उच्च जाति के साथ संगठित होकर नया विकल्प उभारा और जिन्होंने राजद को सत्ता से बाहर रखने के लिए नीतीश कुमार में संभावना तलाश की और उनका साथ दिया। केंद्र में एनडीए की सरकार ने राज्य में लालू-राबड़ी के सरकार के प्रति गुस्से को आधार बनाया।बिहार में भी राजग की सरकार बनी। एक नए सामाजिक समीकरण जिसमें मंझोली जातियों के नेतृत्व के साथ सरकार में प्रमुखता भी रही और अगड़ी जाति की सत्ता में भागीदारी भी।बिहार की एनडीए सरकार ने इस नए सामाजिक समीकरण में जाति के ऊपर विकास के मुद्दे को रखा। </p>
<figure id="attachment_6941" aria-describedby="caption-attachment-6941" style="width: 2326px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4.jpg" alt="" width="2326" height="1297" class="size-full wp-image-6941" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4.jpg 2326w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-300x167.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-1024x571.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-768x428.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-1536x856.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-4-2048x1142.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2326px) 100vw, 2326px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6941" class="wp-caption-text">पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न प्रणब मुखर्जी और पूर्व भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी श्री मुचकुंद दुबे (दोनों दिवंगत: श्रद्धांजलि)<br /></figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, नीतीश कुमार ने 2005 में जब सत्ता संभाली थी तब शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने के लिए 2006 में पूर्व विदेश सचिव मुचकुन्द दुबे की अध्यक्षता में कॉमन स्कूल सिस्टम कमीशन बनाया था। शिक्षा विभाग के सचिव भी उसमें शामिल थे। आयोग ने 1 साल के अंदर ही रिपोर्ट नीतीश सरकार को सौंप दी। आज मुचकुन्द दुबे नहीं हैं और उनकी रिपोर्ट 19 वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी है।उस रिपोर्ट को कौन बाहर निकलेगा एक बड़ा सवाल है, क्योंकि उस रिपोर्ट को तो सभी सही बता रहे हैं लागू होने पर क्रांतिकारी बदलाव होने की बात कह रहे हैं, लेकिन रिपोर्ट को लागू करने में जितनी बड़ी राशि खर्च होगी वह बिहार जैसे राज्य के लिए आसान नहीं है, कहकर बात को दरकिनार कर रहे हैं। भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी पद पर रहने के बावजूद दुबे देश में शिक्षा को लेकर सबसे सजग माने जाते हैं</strong>। </p>
<p>अपने जीवन काल में एक अन्तर्वीक्षा में दुबे ने कहा था कि वैश्वीकरण के बाद पूरे विश्व की शिक्षा में बदलाव आया है। इसकी कई सीमाएं हैं। लेकिन भारत के संदर्भ में मैं यह अवश्य कहूंगा कि यहां शिक्षा के नाम पर वंचितों के साथ हकमारी की जा रही है। पूरे विश्व में एजुकेशन का यूनिवर्सलाइजेशन किया जा रहा है। यूनिवर्सलाइजेशन मतलब शिक्षा का समानीकरण। विकास के मामले में भारत से अपेक्षाकृत कम विकासशील देशों में भी समान स्कूली शिक्षा को महत्व दिया जा रहा है। लेकिन अपने भारत में इसके प्रति कोई गंभीर नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। </p>
<p>दुबे कहे थे कि  &#8216;मुझे एक संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था और इसके मूल में शिक्षा थी। श्रोताओं में नीतीश कुमार स्वयं बैठे थे। मैंने अपने संबोधन में समान स्कूली शिक्षा को लेकर बातें कही थी। संगोष्ठी समाप्त हुई और मैं दिल्ली वापस चला आया। करीब एक महीने के बाद मुख्यमंत्री के सचिव का फ़ोन आया। बात हुई तो कहने लगे कि वे भी बिहार में समान स्कूली शिक्षा लागू करना चाहते हैं। यह कैसे हो और उसकी रूपरेखा कैसी हो, इसके लिए एक आयोग का गठन किया जाय। इसकी जिम्मेदारी उन्होंने मुझे दे दी। मैंने तय समयसीमा के अंदर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंप दी। मुझे विश्वास था कि मुख्यमंत्री ने जिस उच्च स्तर की संवेदनशीलता के साथ मुझे महती जिम्मेवारी सौंपी थी, वे उससे अधिक संवेदनशीलता के साथ मेरी अनुशंसाओं को लागू करेंगे। लेकिन मुझे निराशा मिली।&#8217; लेकिन आज दुबे नहीं नहीं है और उनकी रिपोर्ट मिट्टी फांक रही है।  </p>
<blockquote><p>पूर्व विदेश सचिव ने कहा भी था एक अन्तर्वीक्षा में: &#8220;मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह सब एक साजिश के तहत किया जा रहा है। एक ऐसी साजिश, जिसका शिकार देश के मासूम बच्चे हो रहे हैं। हालांकि मुझे अभी भी विश्वास है कि कोई न कोई राह जरुर निकलेगी। मुझे तो लगता है कि शिक्षा का सवाल राजनीतिक सवाल नहीं बन पाया है। जब तक राजनेताओं को यह महसूस नहीं होगा कि इसके जरिए वे सत्ता प्राप्ति कर सकते हैं तब तक कुछ भी होना मुश्किल है।  जब तक वंचित वर्ग अपना राजनीतिक महत्व नहीं समझेगा तब तक उसके अधिकारों का हनन होता रहेगा। जिन वर्गों व जाति-समुदायों की बात आप कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि समान स्कूली शिक्षा लागू नहीं कर सरकारें उनके साथ कितना अहित कर रही हैं।&#8221; </p></blockquote>
<p>ज्ञातव्य हो कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री वृषिण पटेल का कहना है कि &#8220;रिपोर्ट को लेकर वे लोग बहुत गंभीर थे। हम लोग तो चाहते थे कि रिपोर्ट पर चर्चा हो और पूरे देश में एक माहौल बने लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यदि वह रिपोर्ट लागू हो जाती तो बिहार की शिक्षा में मूलचूल सुधार होता और बिहार पूरे देश के लिए एक नजर बन जाता। रिपोर्ट के आधार पर जब हम लोगों ने अध्ययन करवाया कि कितनी राशि खर्च होगी तो वह राशि काफी बड़ी थी। बिहार की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। शिक्षकों की भी कमी थी, स्कूल भवन भी नहीं था तो कई मोर्चे पर काम करना था आदि आदि।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3.jpg" alt="" width="2326" height="1297" class="aligncenter size-full wp-image-6943" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3.jpg 2326w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-300x167.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-1024x571.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-768x428.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-1536x856.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-3-2048x1142.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2326px) 100vw, 2326px" /></a></p>
<p><strong>विगत कई वर्षों में बिहार को बदलने के लिए कई महत्वकांशी आयोगों का गठन किया गया। लेकिन उन आयोगों ने जो भी अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, आज भी सरकारी आलमीरा का शोभा बढ़ा रही है। 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने भी भूमि सुधार को चुनावी मुद्दा बनाया, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्होंने भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। डेढ़ दशक बाद वर्ष 2005 में नीतीश कुमार जब पहली बार मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए, तो उन्होंने भूमि सुधार के लिए डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग का गठन किया। तारीख 16 जून 2006 था। आयोग ने अगस्त 2006 से काम करना शुरू किया था। आठ कार्यक्षेत्र दिए गए थे जिनमें मुख्य थे भूमि हदबंदी के प्रभावी उपाय, जमीन का सर्वेक्षण, मालिकाना और बटाईदारी के अधिकार तथा जमीन से जुड़े सामान्य सवाल।</strong></p>
<p>आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 1990 के दशक के दौरान भूमिहीनता का आंकड़ा रखा जो चिंताजनक था। आयोग के अनुसार 67 प्रतिशत ग्रामीण गरीब 1993-1994 में भूमिहीन या करीब-करीब भूमिहीन थे। यह आंकड़ा 1999-2000 तक 75 प्रतिशत हो गया। इस दौरान भूमि संपन्न समूहों में गरीबी घटी जबकि भूमिहीन समूहों की गरीबी 51 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गई। सनद रहे कि सन 1977 में पश्चिम बंगाल में जब वाममोर्चा की सरकार बनी थी, तो वहां के वर्गादार (बटाईदार) किसानों को समुचित अधिकार देने के लिए ‘ऑपरेशन वर्गा’ चलाकर भूमि सुधार किया था, जिसे अब तक का सबसे सफलतम भूमि सुधार माना जाता है। </p>
<p><strong>इस ऑपरेशन का नेतृत्व डी. बंद्योपाध्याय ने ही किया था। दो वर्षों तक माथापच्ची करने के बाद डी. बंद्योपाध्याय ने अप्रैल 2008 में नीतीश सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट में बटाईदारों को अधिकार देने की बात कही गई थी और इसके लिए एक क़ानून बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। जगजाहिर है कि जन संगठन एकता परिषद के संस्थापक पी व्ही राजगोपाल ने राष्ट्रीय स्तर पर और प्रदेश स्तर पर एकता परिषद के प्रांतीय संयोजक प्रदीप प्रियदर्शी ने मिलकर डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता वाली भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के लिए अहिंसात्मक आंदोलन चलाया। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5.jpg" alt="" width="2326" height="1297" class="aligncenter size-full wp-image-6944" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5.jpg 2326w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-300x167.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-1024x571.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-768x428.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-1536x856.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Aayog-5-2048x1142.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2326px) 100vw, 2326px" /></a></p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया था कि : लैंड सीलिंग को 15 एकड़ तक सीमित किया जाए। भूमि के सभी 6 तरह के वर्गीकरण को खत्म किया जाए। सभी भूमि को एक समझा जाये अर्थात कृषि योग्य और कृषि अयोग्य भूमि जैसे वर्गीकरण को खत्म किया जाए।16.68 लाख भूमिहीन कृषक परिवारों को 0.66 एकड़ से 1 एकड़ तक भूमि दी जाए; 5.48 गैर कृषि मजदूर जिनके पास घर नहीं है, प्रत्येक को 10 डिसमिल भूमि घर बनाने के लिये दिया जाए। बिहार बटाईदारी क़ानून लाया जाए और ये प्रावधान किया जाए, यदि भूमि का मालिक कृषि उत्पादन का खर्च उठा रहा तो बटाईदार को उत्पाद में 60% हिस्सा मिले। यदि बटाईदार उत्पादन में अपनी लागत लगाता है तो तो बटाईदार को उत्पाद का 70-75% शेयर मिले। </p>
<p>आयोग के अनुसार कृषि और गैर कृषि भूमि के बीच अंतर को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। भूमि को उसके सरल अर्थ में परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि किसी को सीलिंग प्रावधानों से किसी जमीन को कृषि योग्य और किसी को अन्य प्रकार का बनाकर, बच निकलने का अवसर न मिले। सीलिंग के दायरे से प्लांटेशन, बगीचा, आम-लीची के बगीचे, मत्स्य पालन तथा अन्य विशिष्ट श्रेणियों के भूमि उपयोग को दी गई छूट समाप्त कर दी जाए। पांच या अधिक सदस्यों वाले परिवार के लिए 15 एकड़ भूमि की सीमा होनी चाहिए। यदि परिवार का कोई प्लान्टेशन, बाग-बगीचा आदि हो तो उसे यह चुनाव का अधिकार रहे कि वह या तो उन्हें 15 एकड़ तक रखें अथवा 15 एकड़ तक धान/गेहूँ की ज़मीन रखें। </p>
<p>बिहार में कुल 18 लाख एकड़ तक फैली अतिरिक्त ज़मीनें हैं। ये ज़मीनें या तो सरकारी नियंत्रण में है या भूदान समिति के नियंत्रण में, जिसे बांटा नहीं जा सका है या सामुदायिक नियंत्रण में या कुछ अन्य लोगों के कब्जे में है। आयोग ने इन ज़मीनों को भूमिहीनों में बांटने की अनुशंसा की थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि हर बटाईदार को उस जमीन का पर्चा देना चाहिए, जिस जमीन पर वह खेती कर रहा है। इस पर्चे में भू-स्वामी का नाम व खेत का नंबर रहेगा। पर्चे की एक प्रमाणित प्रति जमीन मालिक को भी देने की भी बात कही गई थी। इन सबके अलावा भी कई तरह की सिफारिशें थीं, लेकिन, ज़मींदार वोट बैंक को बचाने की राजनीति मजबूरियों के चलते नीतीश कुमार ने भी पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की लीक पर ही चलने का फैसला लिया और सिफारिशों को धूल फांकने के लिए छोड़ दिया। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-youth-commission-has-been-formed-not-for-you-but-for-mlas">अधिक खुश नहीं हों, &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन &#8216;आपके लिए नहीं&#8217;, बल्कि &#8216;विधायकों को समायोजित करने, खुश करने के लिए&#8217; किया गया है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; 2.70+करोड़ 18-45 वर्ष के मतदाताओं के लिए &#8216;चुनावी लॉलीपॉप&#8217; बा !!😢विधानसभा चुनाव में 56+नए चेहरे दिखेंगे👁</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/politics/nitish-kumar-threw-the-election-bomb-of-bihar-youth-commission</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Jul 2025 05:03:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[assembly]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[commission]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[jd-u]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 74-वर्ष की आयु में, वह भी दो दशक से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद और 18 वीं विधानसभा चुनाव से पूर्व, प्रदेश के युवाओं के बारे में &#8216;सोच&#8217; आयी है। &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन कर दिए। बिहार में 15 से 44 वर्ष की [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/nitish-kumar-threw-the-election-bomb-of-bihar-youth-commission">&#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; 2.70+करोड़ 18-45 वर्ष के मतदाताओं के लिए &#8216;चुनावी लॉलीपॉप&#8217; बा !!😢विधानसभा चुनाव में 56+नए चेहरे दिखेंगे👁</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 74-वर्ष की आयु में, वह भी दो दशक से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद और 18 वीं विधानसभा चुनाव से पूर्व, प्रदेश के युवाओं के बारे में &#8216;सोच&#8217; आयी है। &#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; का गठन कर दिए। बिहार में 15 से 44 वर्ष की आयु के युवाओं की संख्या आज 27012426+ है। राजनीति में चाहे जितनी तालियाँ बजा लें, बिहार के लोग, खासकर मतदाता, आज गांठ बांध लें कि &#8216;इस आयोग का भी हश्र वही होगा, जैसे प्रदेश में अब तक बने कमेटी और कमीशन का होता आया है।&#8217; या फिर, यह आयोग “अपने लोगों को अंतः मन से आभार व्यक्त करने के लिए विश्रामगृह बन जायेगा &#8211; चुनवोपरांत। </strong></p>
<blockquote><p>वैसे वर्तमान सत्ताधारियों को &#8216;इंदिरा गांधी का नाम आज भी हजम नहीं होगा,&#8217; लेकिन इस आयोग के गठन को देखकर देश की पूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी याद आ गई। उस जमाने में किसी हादसा होने के बाद शासन प्रशासन के विरुद्ध उठती आवाज को बंद करने के लिए कमेटी या कमीशन का गठन हो जाता था। केंद्र में स्वयं श्रीमती गांधी अथवा प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा होता था, और राज्यों में उनके &#8216;पसंदीदा मुख्यमंत्रियों&#8217; द्वारा। कमेटी/कमीशन के प्रमुख की, सदस्यों की नियुक्ति हो जाती थी, सरकारी कोष से पैसे निकल जाते थे। समयांतराल लोग उस घटना को भी भूल जाते थे और सरकार तो भुलाने के लिए ही इनका गठन करती ही थी। यकीन मानिए अंतिम मतदान की तारीख के बाद युवा आयोग वृद्धावस्था तक याद नहीं किए जाएंगे, क्योंकि बिहार के लोगों को भूलने की आदत प्रबल हैं । </p></blockquote>
<p><strong>दिल्ली में यमुना पार और नई दिल्ली को जोड़ने वाला  &#8216;विकास मार्ग&#8217;, जिसका आईटीओ चौराहे पर आकर “विकास” का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और आगे दीनदयाल उपाध्याय मार्ग के नाम से जाना जाता है; चर्चाएं आम हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव के बाद एक बार मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे नीतीश कुमार और रायसीना पहाड़ पर बैठे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की उठती-झुकती निगाहों को देख रहे हैं &#8216;नतमस्तक&#8217; होकर। </strong></p>
<p>वजह यह है कि नीतीश कुमार या उनकी जनता दल युनाइटेड पार्टी की &#8216;अपनी&#8217;, &#8216;स्वयं की&#8217; इतनी क्षमता नहीं रही कि वे अकेले सरकार का गठन कर लेंगे। विगत वर्षों की राजनीतिक घटनाएं, सरकार बनने, बिखरने की परम्परा गवाह हैं। नीतीश कुमार को किसी न किसी राजनीतिक पार्टी का, चाहे राष्ट्रीय जनता दल ही क्यों न हो, बैशाखी जैसा सहारा लेना ही पड़ा है और पड़ेगा। वैसी स्थिति में न्यूनतम संख्या के बाद भी मुख्यमंत्री बनना &#8216;राजनीतिक बर्चस्वता&#8217; नहीं, अपितु, &#8216;करुणामय&#8217; आधार पर सरकार बनाना है। रायसीना पहाड़ पर लोग कहते भी हैं कि प्रधानमंत्री अपने किसी &#8216;उपासक&#8217; को &#8216;अतृप्त&#8217; नहीं छोड़े हैं, संभव है अगर उनकी कृपा रही तो नीतीश कुमार का यह भी मनोरथ पूरा हो सकता है, बन भी सकते हैं, इतिहास का सवाल है। बिहार को अब तक 22 मुख्यमंत्री मिला चुका है। </p>
<p><strong>लेकिन असली बात यह है कि प्रदेश के सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों से प्राप्त सांख्यिकी के आधार पर प्रदेश के सभी राजनीतिक पार्टियों के करीब 23 फीसदी प्रतिनिधि, जो वर्तमान में विधानसभा के सदस्य हैं, “पूर्व सदस्य” की श्रेणी में पंक्तिबद्ध हो जाएँगे। &#8220;पूर्व विधायक&#8221; बनने वालों में नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड के भी विधायक सम्मिलित है। सांख्यिकी के अनुसार, आज के 243  विधानसभा सदस्यों में से कोई 56 विधायकों का चेहरा &#8216;नवीन&#8217; होगा और वर्तमान में विधानसभा के “कौन क्या है” डायरी में आज के चेहरे बदल जाएँगे। </strong></p>
<p>रायसीना पहाड़ के एक विश्वस्त सूत्र का कहना है कि &#8216;इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कालखंड में जिस तरह कांग्रेस का मुख्यालय दिल्ली से देश के सभी राज्यों के कांग्रेस मुख्यालयों पर अपना आधिपत्य रखता था, आज के इस बदलते समय में दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भारतीय जनता पार्टी का मुख्यालय देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ही नहीं, जिला मुख्यालयों के साथ-साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सभी पार्टियों के मुख्यालयों को अपने सीसीटीवी के अधीन रखती है। विश्वास नहीं है तो पूछ लें नितीश कुमार जी से या उनके मंत्रिमंडल से लेकर दिल्ली के लोकसभा सभा और राज्यसभा में &#8216;जनता दल युनाइटेड के रूप में&#8217; बैठे &#8216;भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधियों&#8217; से। </p>
<p>बिहार में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भी उस सीसीटीवी के अधीन ही हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि आज नीतीश कुमार 80 फीसदी से अधिक भाजपा के, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह के हो चुके हैं। शेष जो दिख रहे हैं, वे प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करने और अभी तक बचे 45 विधायकों को संतुष्ट करने के लिए है। आगामी विधानसभा चुनाव में यह संख्या न केवल आधी भी हो सकती है, बल्कि किन महाशयों और किन माननीया को चुनाव में टिकट दिया जाएगा, इसका निर्णय नीतीश कुमार या प्रदेश के जनता दल यूनाइटेड के लोग नहीं करेंगे, बल्कि दीनदयाल उपाध्याय मार्ग करेगा, खासकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह। क्योंकि नीतीश कुमार महज एक डगरा पर रखा बैगन&#8217; हो गए हैं।&#8221;  </p>
<p><strong>सूत्रों की बात सुनकर &#8216;आश्चर्य&#8217; नहीं लग रहा था। विगत 25 वर्षों में, देश ने नीतीश कुमार का जो राजनीतिक चरित्र देखा है &#8211; अधोगति की ओर उन्मुख &#8211; इस बात का गवाह है कि वे उत्तरोत्तर पार्टी की मुख्यधारा पर अपना प्रभुत्व खोते ही नहीं जा रहे हैं, बल्कि अपनी सत्ता को शनै-शनै भाजपा को सुपुर्द भी करते जा रहे हैं। आज के परिपेक्ष में भले नीतीश कुमार स्वयंभू &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; या &#8216;प्रदेश का &#8216;लौह पुरुष&#8217; भले समझते हैं, हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे चरण में आगमन के बाद वे नीतीश कुमार को उनकी वास्तविक स्थिति और छवि से अवगत कराते आ रहे हैं। </strong></p>
<figure id="attachment_6931" aria-describedby="caption-attachment-6931" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6931" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6931" class="wp-caption-text">बिहार में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भी उस सीसीटीवी के अधीन ही हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि आज नीतीश कुमार 80 फीसदी से अधिक भाजपा के, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह के हो चुके हैं।</figcaption></figure>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि बिहार में आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भी ‘शेर-ए-बिहार’ और बिहार का ‘लौह पुरुष’ की चर्चा होगी, चाहे किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय के लोग होंगे, चाहकर भी रामलखन सिंह यादव को नजर अंदाज नहीं कर सकते। रामलखन सिंह यादव की मृत्यु के बाद उस स्थान को लालू प्रसाद यादव अधिपत्य ज़माने की कोशिश किये, लेकिन महज यादव उपनाम&#8217; से कोई शेर-ए-बिहार नहीं हो सकता है। लालू के जेल जाने के बाद, या यूँ कहें कि सत्ता से पदच्युत होने के बाद नीतीश कुमार स्वयंभू ‘शेर-ए-बिहार’ बनने, दलितों का, प्रदेश के गरीब-गुरबों का ‘स्वयंभू’ नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं।  लेकिन बन नहीं पाए। रामलखन सिंह यादव सं 1952 से 1991 तक बिहार विधान सभा में मुस्तैद रहे। जिसका हुए, उसका कभी हाथ नहीं छोड़े और जिसका नहीं हुए, उसका कभी ऊँगली भी नहीं पकड़े। लेकिन न तो लालू किसी का हुए और ना ही नीतीश कुमार किसी का हो सके।</strong> </p>
<p>दहशत’ था ‘शेर-ए-बिहार’ का ‘सम्मान’ के साथ। ‘लोग’ दूर से डरते अवश्य थे, लेकिन पास आते ही पिघल जाते थे। लोग घबराते जरूर थे, लेकिन ‘थरथराते’ नहीं थे। आज के नेता इस सम्मान के बारे में सोच नहीं सकते, चाहे ‘ब्राह्मण’ हों, ‘क्षत्रिय’ हो, ‘वैश्य’ हो, ‘शूद्र’ हो, ‘यादव’ हों, ‘कुर्मी’ हो, ‘कायस्थ’ हो, ‘पासवान’ हो, ‘कुशवाहा’ हो; क्योंकि ‘सम्मान’ ‘अर्जित’ किया जाता है बहुत मसक्कत से, और वर्तमान राजनीतिक गलियारे में, चाहे पटना का सरपेंटाइन रोड हो या दिल्ली का संसद मार्ग औसतन 90 फीसदी से अधिक नेतागण उस सम्मान से कोसों दूर हैं । विगत 35-वर्षों में बिहार में जितने भी नेता जन्म लिए, मंत्री से मुख्यमंत्री तक, वह सम्मान नहीं पा सके, जो शेर-ए-बिहार के नाम से अंकित था। </p>
<p>बहरहाल, आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम को प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक नीतीश कुमार पटना को गंगा के उस पार के लोगों से जोड़ने के लिए, आवागमन की सुविधा को बेहतर बनाने के लिए अपने कालखंड में भले बेहतर कार्य करने का दावा करते हों, हकीकत यह है कि मिथिला राज्य के निर्माण के लिए प्रस्तावित जिलों के करीब 60 फीसदी मतदाता अपने अपने वर्तमान विधायकों से खुश नहीं हैं और वे परिवर्तन को औचित्य बताते हैं। इन विधायकों में जनता दल यूनाइटेफ़ के अलावे राष्ट्रीय जनता दल के भी हैं, भारतीय जनता पार्टी के भी हैं और कुछ अन्य भी हैं। सीतामढ़ी के एक मतदाता का कहना है कि “राजनीतिक पार्टियों ने अपने अपने पार्टियों के नामकरण में जनता शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल किए हैं, लेकिन वे और उनके विधायकगण जनता के कभी नहीं हुए। </p>
<p>आजादी के बाद अब तक के मंत्रिमंडल में भले तथाकथित रूप से सामाजिक सरोकार रखने का दावा करने वाले सफेदपोश या रंग बिरंगे वस्त्रों को धारण करने वाले जनहित की बात करें, अखबारों, पत्रिकाओं में  उनका नाम प्रकाशित हों; लेकिन प्रदेश के 324 विधानसभा, 40 लोक सभा, 16 राज्य सभा और 75 विधान परिषद क्षेत्र (63 निर्वाचित और 12 मनोनीत) के रोते, बिलखते, पेट-पीठ एक किए, अशिक्षित, बेरोजगार, बीमार, पीड़ित मतदाता से बड़ा दूसरा कोई उद्धरण नहीं हो सकता है। आने वाले समय में भारत के शोधकर्ता ही नहीं, विश्व के प्रतिष्ठित शोध संस्थाओं के दिग्गज आज़ादी के बाद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लड़ी गयी दूसरी जंगे आज़ादी और उस आंदोलन से जन्म लिए तथाकथित नेताओं पर गहन शोध अवश्य करेंगे। और 18 वीं विधानसभा हेतु होने वाली चुनाव से पूर्व नीतीश कुमार द्वारा &#8216;युवा आयोग&#8217; का गठन भी एक मुख्य विषय होगा। </p>
<p>जय प्रकाश नारायण के सिद्धांतों को, उनके विचारों को उनके ही अनुयायियों द्वारा धज्जी उड़ाते देखना हो तो बिहार का भ्रमण सम्मेलन कर लें। अपने को जयप्रकाश नारायण-कर्पूरी ठाकुर का शिष्य कहने वाले लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार जैसे अनुयायी अगर करोड़पति हो सकते हैं, तो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के बाद बिहार की धरती पर जन्म लेने वाले, राज्यसभा, लोकसभा, विधान सभा या विधान परिषद में बैठने वाले &#8216;सम्मानित&#8217; नेतागण अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं।  वैसे आज 74 वर्ष के हैं नीतीश कुमार। 25 वर्ष पहले 2000 में बिहार की सत्ता में आये थे। यानी उस समय उनकी आयु 49 वर्ष की थी। उस समय प्रदेश के युवाओं के बारे में ज्ञान नहीं हुआ उन्हें। आज 74 वर्ष की आयु में, वह भी जब प्रदेश 18 वीं विधानसभा चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है, और यह भी देख रहे हैं कि मोदी जी कृपा रही तो फिर एक बाद बैठिये जायेंगे कुर्सी पर, युवा आयोग बनाने का लॉलीपॉप फेके &#8211; वैसे उनका जनता दल युनाइटेड का आकर भी संकुचित होगा। </p>
<p>बिहार सरकार ने युवाओं को आत्मनिर्भर और रोजगारोन्मुखी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ‘बिहार युवा आयोग’ के गठन को मंजूरी दी है। यह फैसला मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया, जिसमें कुल 43 प्रस्तावों को स्वीकृति दी गई। इनमें विकास योजनाएं, नियुक्तियों की प्रक्रिया और आर्थिक प्रस्ताव भी शामिल हैं। आयोग में एक अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष और सात सदस्य होंगे, जिनकी अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष तय की गई है। यह आयोग राज्य के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दिलाने वाली नीतियों के पालन की निगरानी भी करेगा।</p>
<figure id="attachment_6932" aria-describedby="caption-attachment-6932" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6932" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Raisina-1-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6932" class="wp-caption-text">इस बार चुनाव के बाद मुख्यमंत्री आवास में कौन रहेंगे?</figcaption></figure>
<p><strong>मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म ‘एक्स’ पर जानकारी देते हुए कहा कि बिहार के युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने, उन्हें प्रशिक्षित करने तथा सशक्त और सक्षम बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने बिहार युवा आयोग के गठन का निर्णय लिया है। यह आयोग इस बात की निगरानी करेगा कि राज्य के स्थानीय युवाओं को राज्य के भीतर निजी क्षेत्र के रोजगारों में प्राथमिकता मिले। साथ ही राज्य के बाहर अध्ययन करने वाले और काम करने वाले युवाओं के हितों की भी रक्षा हो। सामाजिक बुराईयों को बढ़ावा देने वाले शराब एवं अन्य मादक पदार्थों की रोकथाम के लिए कार्यक्रम तैयार कर और ऐसे मामलों में सरकार को अनुशंसा भेजना भी इसका महत्वपूर्ण कार्य होगा। राज्य सरकार की दूरदर्शी पहल का उद्देश्य है कि इस आयोग के माध्यम से युवा आत्मनिर्भर, दक्ष और रोजजगारोन्मुखी बनें, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो।</strong></p>
<p>आयोग के सदस्यों की अधिकतम उम्र सीमा 45 वर्ष होगी। यह आयोग राज्य सरकार को युवाओं के कल्याण, शिक्षा, रोजगार और उनके सर्वांगीण विकास से जुड़े मुद्दों पर सलाह देगा। आयोग विभिन्न सरकारी विभागों के साथ समन्वय करेगा ताकि युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर मिल सकें। राज्य के बाहर जो युवा काम करने जाते हैं, उनके हितों की रक्षा करना भी इस आयोग का कार्य होगा। इनमें से सबसे बड़ा ऐलान मूल निवासी महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण और युवा आयोग के गठन को लेकर किया गया है।</p>
<p>24 साल पहले तीन मार्च, 2000 को नीतीश कुमार ने पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. हालांकि, उनकी यह सरकार सात दिनों तक ही चल पायी. बहुमत का जुगाड़ नहीं हो पाने के कारण उन्होंने 10 मार्च, 2000 को इस्तीफा दे दिया। दूसरी बार वे पूरे बहुमत के साथ नवंबर 2005 में एनडीए सरकार के मुखिया बने। तीसरी बार पांच साल बाद हुए 2010 में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए एक बार फिर भारी बहुमत से सत्ता में आया और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। जदयू ने वर्ष 2013 में भाजपा से नाता तोड़ लिया था। लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, नीतीश कुमार भाजपा के खिलाफ लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए। लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी के खराब प्रदर्शन की जिम्मेवारी लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने थे। जीतन राम मांझी करीब एक साल तक मुख्यमंत्री रहे। </p>
<p>वर्ष 2015 में आरजेडी और कांग्रेस के साथ जदयू ने गठबंधन किया और महागठबंधन की सरकार बिहार में बानी और उस सरकार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री तो लालू यादव के पुत्र तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि 2015 में बनी महागठबंधन सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं सर सकी। 2017 में तेजस्वी यादव पर सीबीआई की ओर से लगे आरोपों के बाद नीतीश कुमार ने महागठबंधन से रिश्ता तोड़ लिया। महागठबंधन से अलग होकर नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई और खुद छठवीं बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में जनता दल युनाइटेड और बीजेपी साथ मैदान में उतरी। इसमें लोकसभा की 39 सीटों पर एनडीए को जीत मिली। लोकसभा चुनाव के ठीक एक साल बाद बिहार में हुए विधानसभा चुनाव 2020 में भी जेडीयू ने एनडीए साथ रही। इस गठबंधन को जनता का भरपूर साथ मिला और सूबे में एनडीए की फिर से सरकार बनी। 2020 में जेडीयू को कम सीटें मिली, लेकिन बीजेपी ने नीतीश कुमार को सातवीं बार सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया।</p>
<p>हालांकि दो साल बाद ही 2022 में नीतीश कुमार और बीजेपी के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू एनडीए से अलग हो गई। राज्य में एनडीए की सरकार गिर गई। नीतीश कुमार ने फिर एक बार राजद के साथ मिलकर बिहार में महागठबंधन की सरकार बना ली। इस बार भी सीएम नीतीश कुमार ही रहे। यह आठवीं बार था जब नीतीश कुमार राज्य के मुख्यमंत्री बने। यह सरकार भी करीब डेढ़ साल ही टिक सकी। फिर नीतीश कुमार बीजेपी के संग मिलकर नौंवी बार सीएम बन रहे हैं। अब दसवीं की तैयार है बिहार के युवाओं को &#8216;युवा आयोग&#8217; और कर्पूरी ठाकुर के नाम पर मतदाताओं को आकर्षित कर। शेष कार्य तो मतदाता करेंगे। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/nitish-kumar-threw-the-election-bomb-of-bihar-youth-commission">&#8216;बिहार युवा आयोग&#8217; 2.70+करोड़ 18-45 वर्ष के मतदाताओं के लिए &#8216;चुनावी लॉलीपॉप&#8217; बा !!😢विधानसभा चुनाव में 56+नए चेहरे दिखेंगे👁</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>भाजपा को नया अध्यक्ष&#8217; मिल गया है, &#8216;स्थायी&#8217; नहीं, &#8216;तत्काल के लिए&#8217;, क्योंकि &#8216;जग घूमेया थारे जैसा ना कोई 👁 &#8216;नड्डा&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Jul 2025 03:53:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[advani]]></category>
		<category><![CDATA[amit shah]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
		<category><![CDATA[national president]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (नई दिल्ली) : साल 2014 में नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण के दो साल बाद अली अब्बास की कथा और निर्देशन में एक फिल्म बनी थी &#8216;सुलतान&#8217;, जिसे आदित्य चोपड़ा ने बनाया था। इस फिल्म में सलमान खान, अनुष्का शर्मा, रणदीप हुडा, अमित साध जैसे कलाकार काम किये थे। इस [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/bjp-has-got-a-new-president-not-a-permanent-one-but-an-immediate-one">भाजपा को नया अध्यक्ष&#8217; मिल गया है, &#8216;स्थायी&#8217; नहीं, &#8216;तत्काल के लिए&#8217;, क्योंकि &#8216;जग घूमेया थारे जैसा ना कोई 👁 &#8216;नड्डा&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (नई दिल्ली) : साल 2014 में नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण के दो साल बाद अली अब्बास की कथा और निर्देशन में एक फिल्म बनी थी &#8216;सुलतान&#8217;, जिसे आदित्य चोपड़ा ने बनाया था। इस फिल्म में सलमान खान, अनुष्का शर्मा, रणदीप हुडा, अमित साध जैसे कलाकार काम किये थे। इस फिल्म में सलमान खान और अनुष्का शर्मा पर एक रूमानी गीत फिल्माया गया था जिसके शब्द थे इरशाद कामिल की, संगीत दिया था विशाल-शेखर का और गाये थे रहत फ़तेह अली खान साहब ने। गीत के बोल थे :</strong></p>
<p><em>ओ.. ना वो अखियाँ रूहानी कहीं<br />
ना वो चेहरा नूरानी कहीं<br />
कहीं दिल वाली बातें भी ना<br />
ना वो सजरी जवानी कहीं<br />
जग घूमेया थारे जैसा ना कोई<br />
जग घूमेया थारे जैसा ना कोई</p>
<p>ना तो हंसना रूमानी कहीं<br />
ना तो खुशबू सुहानी कहीं<br />
ना वो रंगली अदाएं देखीं<br />
ना वो प्यारी सी नादानी कहीं<br />
जैसी तू है वैसी रहना</em></p>
<figure id="attachment_6910" aria-describedby="caption-attachment-6910" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1.jpg" alt="" width="1600" height="900" class="size-full wp-image-6910" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/nadda-1-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6910" class="wp-caption-text">जगत प्रकाश नड्डा</figcaption></figure>
<p><strong>आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह को जब देखता हूँ तो कहीं न कहीं वर्तमान भाजपा के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के प्रति उनके मन में इस गीत का स्वर गुनगुनाते पाता हूँ। क्योंकि न तो मोदी जी को और ना ही अमित शाह को अभी तक जगत प्रकाश नड्डा के बराबर, या फिर कुछ हद तक ही सही&#8217;, समरूप गुणों वाले व्यक्ति, विश्वासपात्र, भाजपा के प्रति समर्पित अभ्यर्थी नहीं मिल पाये हैं, जिनके नाम भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष का मुहर लगा दें। आप इस बात को स्वीकार करें अथवा नहीं। </strong></p>
<p>जगत प्रकाश नड्डा के बाद भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर कौन बैठेंगे? कोई कह रहे हैं &#8216;पुरुष&#8217; बैठेंगे, कोई महिला सशक्तिकरण का दृष्टान्त देकर कह रहे हैं &#8216;महिला&#8217; बैठेंगी। लेकिन भाजपा में सत्ता के गलियारे में &#8216;गोपनीयता&#8217; अटल बिहार वाजपेयी के ज़माने में भी थी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में तो है ही, वह भी &#8216;उत्कर्ष&#8217; पर। बहरहाल, गिनती शुरू कर दें क्योंकि भाजपा को &#8220;तत्कालीन अध्यक्ष&#8221; मिल गया है और जगत प्रकाश नड्डा के समतुल्य अभ्यर्थी की खोज जारी है। </p>
<p><strong>आज भी याद है जब 1998 में प्रधानमंत्री कार्यालय से दिल्ली के अख़बारों के दफ्तर में फोन की घंटी टनटनाया और कहा गया कि &#8216;वाजपेयी जी अख़बार वालों से तुरंत मिलना चाहते हैं&#8217;, दिल्ली दरबार के पत्रकार अपने-अपने कार्यालयों से निकल कर गंतव्य तक पहुँचने में &#8216;क्या-क्या नहीं सोचे&#8217;, कहानियां भी गढ़े, इंट्रो भी बनाये। लेकिन किसी को भी पता नहीं वाजपेयी जी किस विषय पर बोलने वाले हैं। पोखरण-II परमाणु परीक्षण  में सोचना तो नामुमकिन था। </strong></p>
<figure id="attachment_6911" aria-describedby="caption-attachment-6911" style="width: 894px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM.png" alt="" width="894" height="588" class="size-full wp-image-6911" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM.png 894w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM-300x197.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.08.01-AM-768x505.png 768w" sizes="auto, (max-width: 894px) 100vw, 894px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6911" class="wp-caption-text">अटल बिहारी वाजपेयी</figcaption></figure>
<p>मई 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पोखरण-II परमाणु परीक्षण किए गए थे। आधिकारिक तौर पर ऑपरेशन शक्ति के रूप में जाने जाने वाले इन परीक्षणों में राजस्थान के पोखरण परीक्षण रेंज में पाँच परमाणु विस्फोट शामिल थे। पहले तीन परीक्षण 11 मई, 1998 को और शेष दो 13 मई, 1998 को किए गए थे। इन परीक्षणों को करने का निर्णय एक महत्वपूर्ण निर्णय था। तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने परीक्षणों का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जब वाजपेयी जी सैकड़ों संवाददाताओं और छायाकारों के बीच पोखरण परीक्षण के बारे में बताये, अखबार वाले, टीवी वाले सभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। उधर दफ्तर में संपादक महोदय भाजपा और प्रधानमंत्री कार्यालय को कवर करने वालों को भृकुटि तान कर देख रहे थे। </p>
<p>उस घटना के 27-साल बाद विगत मई, 2025 को जब वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में &#8216;ऑपरेशन सिंदूर&#8217; किया गया, इस बात का गंध लोगों को, खासकर प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय या सत्ता के गलियारे में चहलकदमी करने वाले किसी भी पत्रकार बंधू-बांधवों को गंध&#8217; तक नहीं लगा। सत्ता के गलियारे में &#8216;गोपनीयता&#8217; अपने उत्कर्ष पर होता है। इस घटना के बाद लेखक, विश्लेषक, आलोचक जो भी लिखें। आजकल दिल्ली सल्तनत में भारतीय जनता पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा चर्चाएं आम है। कोई पुरुष नेताओं को आगे बढ़ा रहे हैं तो कोई महिला नेताओं को। लेकिन दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय से लेकर झंडेवालान स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय तक, सभी चुप हैं। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि 1980 में भाजपा के गठन के बाद <strong>अटल बिहारी वाजपेयी</strong> इसके पहले अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में भाजपा ने खुद को एक मध्यमार्गी पार्टी के रूप में पेश किया जो भारतीय जनसंघ की कटु राजनीति से अलग हटकर थी। वाजपेयी, जिन्हें अक्सर भाजपा के उदारवादी चेहरे के रूप में देखा जाता था। बाद में वाजपेयी देश का प्रधानमंत्री भी बने और अपना कार्यकाल भी पूरा किया। </p>
<figure id="attachment_6912" aria-describedby="caption-attachment-6912" style="width: 966px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM.png" alt="" width="966" height="580" class="size-full wp-image-6912" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM.png 966w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM-300x180.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-7.59.01-AM-768x461.png 768w" sizes="auto, (max-width: 966px) 100vw, 966px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6912" class="wp-caption-text">लाल कृष्ण आडवाणी</figcaption></figure>
<p>1986 में अटल बिहारी वाजपेयी के बाद <strong>लाल कृष्ण आडवाणी</strong> भाजपा के अध्यक्ष बने। कहते हैं यह घटना आमतौर पर भाजपा की विचारधारा में कट्टर हिंदुत्व की ओर बदलाव से जुड़ी है, जिसका उदाहरण 1990 में आडवाणी द्वारा हिंदू राष्ट्रवाद की अपील करके चुनावी समर्थन जुटाने के प्रयास के तहत निकाली गई राम रथ यात्रा है। उन्होंने 1973 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था। भाजपा के विचारक मुरली मनोहर जोशी 1991 में भाजपा अध्यक्ष बने। वे कई दशक से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। अपने पूर्ववर्ती लालकृष्ण आडवाणी की तरह, उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल के दौरान, भाजपा पहली बार मुख्य विपक्षी दल बनी।</p>
<figure id="attachment_6918" aria-describedby="caption-attachment-6918" style="width: 1024px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6918" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-6-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6918" class="wp-caption-text">मुरली मनोहर जोशी</figcaption></figure>
<p>आडवाणी के आक्रामक प्रचार अभियान ने 1996 के चुनावों के बाद भारतीय संसद के निचले सदन में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनने में मदद की। हालांकि वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, लेकिन आडवाणी को पार्टी के भीतर ताकत के रूप में देखा गया और बाद में उन्होंने उप प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। </p>
<figure id="attachment_6919" aria-describedby="caption-attachment-6919" style="width: 1024px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6919" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-3-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6919" class="wp-caption-text">कुषा भाऊ ठाकरे</figcaption></figure>
<p>कुषा भाऊ ठाकरे 1942 से ही आरएसएस से जुड़े हुए थे। 1998 में जब वे भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद अध्यक्ष बने, तब वे भाजपा के बाहर ज़्यादा मशहूर नहीं थे। कहते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान भाजपा ने हिंदुत्व पर अपना ज़ोर कम कर दिया, जैसे कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग, ताकि एक बड़े गठबंधन के विचारों को समायोजित किया जा सके।</p>
<figure id="attachment_6913" aria-describedby="caption-attachment-6913" style="width: 1024px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6913" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-4-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6913" class="wp-caption-text">बंगारू लक्ष्मण</figcaption></figure>
<p>लंबे समय से आरएसएस के सदस्य रहे <strong>बंगारू लक्ष्मण</strong> 2000 में भाजपा के पहले दलित अध्यक्ष बने। एक साल बाद तहलका पत्रिका के स्टिंग ऑपरेशन में उन्हें रिश्वत लेते हुए दिखाया गया, जिसके बाद लक्ष्मण ने तुरंत इस्तीफा दे दिया। वे 2012 तक पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रहे, जब उन्हें भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहराया गया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लक्ष्मण के इस्तीफे के बाद <strong>जाना कृष्णमूर्ति</strong> कार्यवाहक अध्यक्ष बने और कुछ ही समय बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने उन्हें अध्यक्ष के रूप में पुष्टि कर दी। एक साल बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया जब वे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में कैबिनेट फेरबदल के तहत मंत्री बन गए।</p>
<figure id="attachment_6914" aria-describedby="caption-attachment-6914" style="width: 1024px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6914" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-5-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6914" class="wp-caption-text">जाना कृष्णमूर्ति</figcaption></figure>
<p>जाना कृष्णमूर्ति को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के बाद <strong>वेंकैया नायडू</strong> भाजपा अध्यक्ष चुने गए। टिप्पणीकारों ने उनके चुनाव को लालकृष्ण आडवाणी और पार्टी के रूढ़िवादी हिंदू-राष्ट्रवादी विंग द्वारा फिर से नियंत्रण स्थापित करने के उदाहरण के रूप में देखा। हालांकि नायडू को पूर्ण कार्यकाल के लिए चुना गया, लेकिन एनडीए द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से 2004 के भारतीय आम चुनाव हारने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उस समय लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में कार्यरत आडवाणी, 2004 के भारतीय आम चुनाव के बाद वेंकैया नायडू के इस्तीफा देने के बाद तीसरी बार भाजपा अध्यक्ष बने। आडवाणी विपक्ष के नेता के रूप में अपने पद पर बने रहे। 2005 में आडवाणी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, जब उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में वर्णित किया, जिससे विवाद पैदा हो गया।</p>
<figure id="attachment_6915" aria-describedby="caption-attachment-6915" style="width: 942px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM.png" alt="" width="942" height="602" class="size-full wp-image-6915" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM.png 942w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM-300x192.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Screenshot-2025-07-08-at-9.12.54-AM-768x491.png 768w" sizes="auto, (max-width: 942px) 100vw, 942px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6915" class="wp-caption-text">वेंकैया नायडू</figcaption></figure>
<p>दिसंबर 2005 में <strong>राजनाथ सिंह सिंह</strong> ने आडवाणी के कार्यकाल के शेष समय के लिए भाजपा अध्यक्ष का पद संभाला। उन्हें 2006 में पूर्ण कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त किया गया। सिंह ने आरएसएस और भाजपा के लिए कई पदों पर कार्य किया, जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा की युवा शाखा के अध्यक्ष के रूप में कार्य करना शामिल है। उन्होंने हिंदुत्व मंच पर वापसी की वकालत की। एनडीए के 2009 के भारतीय आम चुनाव हारने के बाद सिंह ने इस्तीफा दे दिया। साल 2009 में <strong>नितिन गडकरी</strong> भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष बने। लंबे समय से आरएसएस के सदस्य रहे गडकरी महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार में मंत्री और भाजपा युवा शाखा के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें आरएसएस नेतृत्व का भरपूर समर्थन प्राप्त था। गडकरी ने मंत्री रहते हुए घोटाले और वित्तीय अनियमितताओं के अन्य आरोपों के बाद 2013 में इस्तीफा दे दिया था।</p>
<figure id="attachment_6916" aria-describedby="caption-attachment-6916" style="width: 1024px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6916" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-10-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6916" class="wp-caption-text">राजनाथ सिंह</figcaption></figure>
<p>2013 में गडकरी के पद छोड़ने के बाद राजनाथ सिंह को दूसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष चुना गया। सिंह ने 2014 के भारतीय आम चुनाव के लिए भाजपा के अभियान में बड़ी भूमिका निभाई, जिसमें भाजपा के भीतर विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना भी शामिल था। पार्टी की शानदार जीत के बाद, सिंह ने गृह मंत्री का पद संभालने के लिए पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। वर्तमान प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी विश्वासपात्र <strong>अमित शाह</strong>, राजनाथ सिंह के पहले मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद उनके कार्यकाल के शेष समय के लिए भाजपा अध्यक्ष बने। टिप्पणीकारों ने शाह की नियुक्ति को भाजपा पर मोदी के नियंत्रण का प्रदर्शन बताया। शाह को 2016 में पूरे तीन साल के कार्यकाल के लिए फिर से चुना गया।</p>
<figure id="attachment_6917" aria-describedby="caption-attachment-6917" style="width: 1024px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6917" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6917" class="wp-caption-text">नितिन गडकरी</figcaption></figure>
<p>इसके बाद,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लंबे समय से जुड़े जगत प्रकाश नड्डाको 2019 में भाजपा का &#8220;कार्यकारी अध्यक्ष&#8221; चुना गया और अध्यक्ष चुने जाने से पहले उन्होंने एक साल तक अमित शाह के साथ पार्टी चलाने की जिम्मेदारी साझा की और आज तक बने हैं । <br />
<strong>भाजपा के स्थापना काल से अब तक 11 अध्यक्ष बने हैं और बारहवें की खोज जारी है। लेकिन यह आश्चर्यजनक है, अगर चौंकाने वाला नहीं है, तो यह है कि मोदी और शाह पिछले एक साल में नड्डा का विकल्प नहीं ढूंढ पाए। ऐसा नहीं है कि मोदी-शाह ने कोशिश नहीं की, लेकिन ऐसा लगता है कि वे सफल नहीं हुए। नड्डा को पहले ही दो बार सेवा विस्तार मिल चुका है। नड्डा को मोदी का करीबी माना जाता है। नड्डा, जो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हैं, 2020 से पार्टी अध्यक्ष पद पर हैं। उनका कार्यकाल 2023 में समाप्त हो रहा था, लेकिन भाजपा ने इसे 2024 तक बढ़ा दिया ताकि वह लोकसभा चुनावों में पार्टी का नेतृत्व कर सकें।</strong></p>
<p>अख़बारों में, टीवी के स्क्रीन पर आजकल मनोहर लाल खट्टर, भूपेंद्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान के नाम कभी आते हैं, कभी गायब हो जाते हैं। ऐसी अटकलें भी लोग लगा रहे हैं कि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए महिला चेहरे की तलाश कर रही है, क्योंकि पार्टी ने हाल के दिनों में महिला मतदाताओं को प्रभावित करने में सफलता देखी है। इसके अलावा, भाजपा ने 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पर भी जोर दिया, जिसे संसद के दोनों सदनों ने मंजूरी दे दी। विधेयक में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग की गई है। पार्टी के लिए एक महिला अध्यक्ष की नियुक्ति से यह स्पष्ट संदेश भी जाएगा कि भाजपा इस विधेयक के साथ है।</p>
<p><strong>लोगबाग यह भी लिख रहे हैं कि निर्मला सीतारमण को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता हैं क्योंकि वह पार्टी की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में से एक हैं। उल्लेखनीय है कि वह 2019 से वित्त मंत्री का पद संभाल रही हैं, जब भाजपा दूसरी बार सत्ता में आई थी। इसके अलावा, तमिलनाडु में उनकी जड़ें भी भाजपा के लिए एक फायदा हो सकती हैं, क्योंकि पार्टी दक्षिण में आगे बढ़ रही है। अगर सीतारमण को चुना जाता है, तो यह भाजपा के दक्षिणी क्षेत्र में पहुंच बनाने में मदद कर सकता है और परिसीमन के बाद लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के साथ तालमेल का संकेत दे सकता है।</strong></p>
<p>इसी तरह, <strong>दग्गुबाती पुरंदेश्वरी</strong> के नाम पर भी लोग लिख रहे हैं  जो भाजपा की पूर्व आंध्र प्रदेश इकाई की प्रमुख थीं। वह सरकार के ऑपरेशन सिंदूर प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थीं, जिसने यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, यूरोपीय संघ, इटली और डेनमार्क में देश के आतंकवाद विरोधी रुख का प्रतिनिधित्व किया था। कई भाषाओं में पारंगत पुरंदेश्वरी ने मंत्री पद और संसदीय अनुभव के साथ एक बहुपक्षीय राजनीतिक करियर बनाया है। वनथी श्रीनिवासन  उछाल रहे हैं जो भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी हैं। 2021 में उन्होंने अभिनेता और मक्कल निधि मैयम (एमएनएम) के संस्थापक कमल हासन को हराकर तमिलनाडु की कोयंबटूर (दक्षिण) सीट जीती थी। वह 1993 से भाजपा से जुड़ी हैं और 2022 में भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्य बनीं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6920" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-7-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे उम्मीद है कि आगामी दस दिनों में भारत को भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल जायेगा। अपवाद छोड़कर, अधिकांश राज्यों में संगठनात्मक चुनाव पूरे हो चुके हैं और पदाधिकारियों का चुनाव हो चुका है, और शेष कुछ राज्यों में जल्द ही चुनाव पूरे हो जाएंगे। भाजपा की 36 संगठनात्मक इकाइयों में से 32 में राज्य इकाई के चुनाव महीनों पहले शुरू हो चुके थे, जिनमें राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं।</p>
<p><strong>वैसे आरएसएस ने साफ कर दिया है कि वह दूसरे दलों से आए नेताओं के बजाय घरेलू नेताओं को प्राथमिकता देता है। सांसदों को राज्य प्रमुख नियुक्त करने से हतोत्साहित किया गया। इसके बजाय, राज्य स्तर के विधायकों, एमएलसी और अनुभवी संगठनात्मक कार्यकर्ताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। जो लोग अपने राज्यों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया है और संगठन के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। दलबदलुओं की नियुक्ति अपवाद होगी, नियम नहीं। तरीके में यह बदलाव चुने गए नामों में स्पष्ट है। </strong></p>
<p>मध्य प्रदेश में विष्णु दत्त शर्मा की जगह गोपाल खंडेलवाल को चुना गया। पश्चिम बंगाल में भाजपा के राज्यसभा सांसद समिक भट्टाचार्य को पार्टी का नेतृत्व करने के लिए चुना गया। महाराष्ट्र में पुराने नेताओं में से एक भरोसेमंद नेता रवींद्र चव्हाण को नियुक्त किया गया। मिजोरम को डॉ. के. बेचुआ मिले, जो एक अनुभवी राजनेता हैं और 2023 में भाजपा में शामिल हो गए थे। आंध्र प्रदेश ने पी.वी.एन. माधव को लाया, जबकि तेलंगाना में एन. रामचंदर राव की वापसी हुई। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में क्रमशः राजीव बिंदल और महेंद्र भट्ट की फिर से नियुक्ति हुई &#8211; दोनों को ही आरएसएस से मजबूत जुड़ाव वाले स्थिर व्यक्तित्व के रूप में देखा गया। पुडुचेरी में वी.पी. रामलिंगम को चुना गया और अंडमान और निकोबार में अनिल तिवारी ने कार्यभार संभाला।</p>
<p>हालांकि, पार्टी के तीन सबसे महत्वपूर्ण गढ़ों- उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में भाजपा अभी तक नए राज्य प्रमुखों पर आम सहमति नहीं बना पाई है। ये देरी आकस्मिक नहीं है। तीनों राज्यों में आंतरिक गुटबाजी और रणनीतिक दांव अधिक हैं। संघ कथित तौर पर गहरी वैचारिक नींव वाले उम्मीदवारों पर जोर दे रहा है, जबकि राज्य के नेता राजनीतिक रूप से सुविधाजनक नामों की पैरवी कर रहे हैं। पुरानी प्रवृत्ति और नए अनुशासन के बीच संघर्ष के कारण इन राज्यों में अभी भी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। जाहिर है, भाजपा ने आरएसएस से विभिन्न राज्य इकाइयों में संगठन मंत्री (महासचिव-संगठन) के रूप में 14 पूर्णकालिक प्रचारकों को नियुक्त करने के लिए कहा है। संगठन मंत्रियों के लिए इस नए प्रयास को व्यापक संगठनात्मक कसावट के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6921" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>आंतरिक सूत्रों का कहना है कि एकीकरण का यह चरण इस बात को रेखांकित करता है कि भाजपा अब संघ की प्राथमिकताओं के साथ कितनी निकटता से जुड़ी हुई है। भले ही मोदी और शाह का प्रभाव अभी भी बहुत ज्यादा है, लेकिन राज्य स्तर की नियुक्तियों में उनकी भूमिका स्पष्ट रूप से कम हो गई है। सूत्रों के अनुसार नया अध्यक्ष कोई स्थायी व्यक्ति नहीं हो सकता। मोदी पहले ही अपने तीसरे कार्यकाल में हैं और भाजपा अपने चरमोत्कर्ष के बाद के चरण में प्रवेश कर रही है, इसलिए अगला पार्टी प्रमुख वह व्यक्ति हो सकता है जिसे 2029 में संगठन का नेतृत्व करने का काम सौंपा गया हो।</strong></p>
<p>अटकलें यह भी बढ़ रही हैं कि यह संगठनात्मक फेरबदल केंद्र में कैबिनेट फेरबदल के साथ हो सकता है। इस विषय पर <strong>वरिष्ठ पत्रकार अभिनन्दन मिश्र</strong> लिखते हैं कि 15 जुलाई या उससे पहले भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ ही बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी के केंद्रीय संगठन में बड़े पैमाने पर फेरबदल होने की संभावना है। </p>
<figure id="attachment_6922" aria-describedby="caption-attachment-6922" style="width: 783px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi.jpg" alt="" width="783" height="605" class="size-full wp-image-6922" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi.jpg 783w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi-300x232.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_abhi-768x593.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 783px) 100vw, 783px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6922" class="wp-caption-text">अभिनन्दन मिश्र</figcaption></figure>
<p>अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पार्टी स्तर पर ये बदलाव दिखावटी नहीं बल्कि महत्वपूर्ण होने की संभावना है। छह राष्ट्रीय महासचिवों में से कम से कम दो को बदले जाने की संभावना है और ग्यारह राष्ट्रीय सचिवों में से कई को भी हटाया जा सकता है या फिर उनकी जगह नई जिम्मेदारी दी जा सकती है। यह व्यवस्था के भीतर गतिरोध को दूर करने, नए चेहरों के लिए जगह बनाने और उच्च-दांव वाले चुनावों से पहले दिशा-निर्देशों को सही करने के लिए किया जा रहा है। जिन लोगों पर इसका असर पड़ने की संभावना है, उनमें वे नेता भी शामिल हैं जो अपने-अपने राज्यों में प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में थे और जिनके नाम मीडिया में मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के संभावित प्रतिस्थापन के रूप में सामने आ रहे थे।</p>
<p><strong>अभिनन्दन मिश्र</strong> का कहना है कि इसके साथ ही, मंत्रिस्तरीय प्रदर्शन के आंतरिक आकलन के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की भी संभावना है। पिछले कई महीनों से शासन का मुख्य काम मुख्य रूप से प्रधानमंत्री मोदी, पीएमओ और कुछ प्रमुख मंत्रालयों के पास रहा है। कई अन्य कमज़ोर पड़ गए हैं &#8211; ख़ास तौर पर काम के निष्पादन के मामले में। सूत्रों ने बताया कि उनके पदों की समीक्षा की गई है और उन्हें कमज़ोर पाया गया है। हटाए गए कुछ मंत्रियों को संगठनात्मक भूमिकाओं में भेजा जाएगा, जबकि कुछ &#8211; ख़ास तौर पर बिहार से &#8211; को आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कहा जा सकता है, जैसा कि मध्य प्रदेश में किया गया था। बिहार में, राजनीतिक संदर्भ इन बदलावों को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर के अंत के करीब होने के साथ, भाजपा राज्य में प्रमुख ताकत के रूप में उभरने के लिए काम कर रही है।</p>
<p>हालांकि, पार्टी मुख्यमंत्री पद का चेहरा पेश किए बिना चुनाव में उतरेगी। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, भाजपा के पास वर्तमान में राज्य में कोई ऐसा नेता नहीं है जिसकी पूरे बिहार में मौजूदगी हो या जिसे व्यापक स्वीकार्यता हो और जिसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा सके। दूसरा, और उतना ही महत्वपूर्ण, नीतीश कुमार चुनाव परिणाम घोषित होने तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे और भाजपा चुनाव से पहले इस नाजुक व्यवस्था को &#8211; थोड़ा भी &#8211; बदलने के लिए इच्छुक नहीं है। बिहार भाजपा के भीतर भी मंथन चल रहा है। पिछले कुछ सालों में दरकिनार किए गए कई वरिष्ठ नेता आगामी फेरबदल को एक संभावित अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनके समर्थकों को उम्मीद है कि नए पार्टी अध्यक्ष के तहत, पहले हाशिए पर धकेले गए कुछ लोगों को फिर से प्रमुखता दी जा सकती है। हालांकि, केंद्रीय पार्टी पदाधिकारियों ने संकेत दिया है कि राज्य में वर्तमान में प्रमुख लोगों में से कुछ को हटाया भी जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो उन्हें हटाया जाना मौजूदा निर्णयों के पैटर्न के अनुरूप होगा।</p>
<figure id="attachment_6923" aria-describedby="caption-attachment-6923" style="width: 1024px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2.jpg" alt="" width="1024" height="683" class="size-full wp-image-6923" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BJP-2-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6923" class="wp-caption-text">भाजपा मुख्यालय</figcaption></figure>
<p><strong>केंद्रीय नेतृत्व ने हाल के महीनों में वरिष्ठता या दृश्यता के बजाय प्रदर्शन और राजनीतिक उपयोगिता को स्पष्ट प्राथमिकता दी है। संगठन/मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पद की प्रबल उम्मीद रखने वालों में कुछ ऐसे चेहरे भी हैं, जिन्हें मोदी सरकार के पहले दो कार्यकाल में जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन बाद में उन्हें हटा दिया गया। समग्र राजनीतिक कैलेंडर समयसीमा को और भी तंग कर देता है। प्रधानमंत्री मोदी के 10 जुलाई तक अपने पांच दिवसीय विदेश दौरे से लौटने की उम्मीद है। संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक निर्धारित है। अधिकांश अपेक्षित निर्णय &#8211; नए पार्टी अध्यक्ष की नियुक्ति, संगठनात्मक बदलाव और कैबिनेट फेरबदल &#8211; इस तीन सप्ताह की अवधि के भीतर होने की संभावना है। अगस्त के बाद बहुत कम समय बचा है। </strong></p>
<p>यदि बिहार चुनाव अक्टूबर में होते हैं, जैसा कि व्यापक रूप से अनुमान लगाया जा रहा है, तो पार्टी के पास इन बदलावों को लागू करने और उन्हें व्यवस्थित करने के लिए एक संकीर्ण समय होगा। यह उल्लेख करना उचित है कि एक अत्यधिक देरी के बाद, तेजी से आगे बढ़ते हुए, भाजपा ने दस दिनों में अपने संगठनात्मक अभियान के हिस्से के रूप में आठ नए राज्य/इकाई अध्यक्षों की नियुक्ति की है। इनमें महाराष्ट्र शामिल है, जहां मराठा नेता रवींद्र चव्हाण ने कार्यभार संभाला है; पश्चिम बंगाल, जहां अब समिक भट्टाचार्य शीर्ष पर हैं; आंध्र प्रदेश, जहां पी.वी.एन. माधव ने डी. पुरंदेश्वरी का स्थान लिया है; और तेलंगाना, जहां एन. रामचंदर राव ने जी. किशन रेड्डी का स्थान लिया है। मध्य प्रदेश में, वी.डी. शर्मा की जगह हेमंत खंडेलवाल को नया प्रमुख नियुक्त किया गया। पार्टी ने डॉ. के. बेचुआ को मिजोरम का अध्यक्ष और वी.पी. रामलिंगम को पुडुचेरी का अध्यक्ष नियुक्त किया। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में, अनिल तिवारी को नए पार्टी अध्यक्ष के रूप में प्रभार दिया गया। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम को अंतिम रूप देने से पहले उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, ओडिशा और गुजरात में नए प्रमुखों की नियुक्ति करेगी।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/bjp-has-got-a-new-president-not-a-permanent-one-but-an-immediate-one">भाजपा को नया अध्यक्ष&#8217; मिल गया है, &#8216;स्थायी&#8217; नहीं, &#8216;तत्काल के लिए&#8217;, क्योंकि &#8216;जग घूमेया थारे जैसा ना कोई 👁 &#8216;नड्डा&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​बिहार चुनाव : सिंहासन खाली करो नीतीश कुमार कि भारतीय &#8216;जनता&#8217; की पार्टी आ रही है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 02 Jul 2025 12:08:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[defection]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[janta dal (united)]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का &#8216;जनता दल (यूनाइटेड) भारत का संबसे बड़ा &#8216;अवसरवादी&#8217; पार्टी है, जो &#8216;मंडल&#8217; और &#8216;मंदिर&#8217; जैसे दो स्तम्भों पर खड़ा है।​ यह हम नहीं, दिल्ली और पटना के राजनीतिक समीक्षक से लेकर पर्यवेक्षक तक कह रहे हैं। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/nitish-kumar-vacate-the-throne-the-bharatiya-janata-party-is-coming">​बिहार चुनाव : सिंहासन खाली करो नीतीश कुमार कि भारतीय &#8216;जनता&#8217; की पार्टी आ रही है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का &#8216;जनता दल (यूनाइटेड) भारत का संबसे बड़ा &#8216;अवसरवादी&#8217; पार्टी है, जो &#8216;मंडल&#8217; और &#8216;मंदिर&#8217; जैसे दो स्तम्भों पर खड़ा है।​ यह हम नहीं, दिल्ली और पटना के राजनीतिक समीक्षक से लेकर पर्यवेक्षक तक कह रहे हैं। राजनीति में कब क्या होगा, कोई नहीं जानता, खासकर जब दिल्ली के रायसीना पहाड़ पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री के रूप में अमित शाह जैसे राजनीतिक दक्षता से परिपूर्ण पुरुषद्वय बैठे हों।​ </strong></p>
<blockquote><p>इसलिए, सन 1974 कालखंड में जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के दौरान पटना के गांधी मैदान से दिल्ली के रामलीला मैदान तक, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; की जिस कविता &#8211; सिंहासन खाली करो की जनता आ रही है &#8211; का पाठ कांग्रेस को शक्तिहीन करने के लिए किया गया था, आज तत्कालीन &#8216;जनसंघ&#8217; और आज का भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्त्ता से लेकर राष्ट्रीय कार्यालय में बैठे पदाधिकारीगण पाठ कर रहे हैं  &#8211; सिंहासन खाली करो नीतीश कुमार कि भारतीय &#8216;जनता&#8217; की पार्टी आ रही है।&#8221;</p></blockquote>
<p>नीतीश कुमार आज ​जिसके &#8216;सहारे&#8217; &#8216;सत्ता&#8217; के सिंहासन पर कब्ज़ा बनाये रखना चाहते हैं, कल जब उनके पीठ से &#8216;वह हाथ&#8217; हट जायेगा, यानी उनकी सत्ता कमजोर हो जाएगी, जनता दल &#8216;यूनाइटेड&#8217; को &#8216;दो-फांक होने में क्षण भी नहीं लगेगा। और शोले फिल्म के तरह &#8216;आधे लोग जो &#8216;मंदिर के पुजारी&#8217; है, भारतीय जनता पार्टी की ओर और आधे लोग, जो &#8216;मंडल के तथाकथित मशीहा&#8217; मानते हैं, राष्ट्रीय जनता दल के रास्ते निकल जायेंगे। आपको सुनकर, पढ़कर अपच हो रहा होगा, लेकिन इस कहानी का कतरन काटकर रख लें। इतना ही नहीं, ​दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर इस बात पर भी मंत्रणा जारी है कि जनता दल (यूनाइटेड) में तीन युवा नेता &#8216;फ्रोजेन हॉर्स&#8217; हैं ​नीतीश कुमार के पार्टी में और नीतीश कुमार को कमजोर होते कब भाजपा का राह पकड़ लेंगे, नीतीश कुमार क्या, बिहार का मतदाता भी सोच भी नहीं सकता। सनद रहे &#8211; राजनीति में कुछ भी हो सकता है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-5-cover.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-5-cover.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6874" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-5-cover.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-5-cover-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-5-cover-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-5-cover-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-5-cover-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>दूसरी ओर, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो &#8216;साख&#8217; थी, या जिन &#8216;राजनीतिक कारणों&#8217; से वे नीतीश कुमार के पीठ पर हाथ रखना पड़ा था, तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद न केवल उनकी साख &#8216;बढ़ी&#8217; है, बल्कि राजनीतिक &#8216;दावपेंच&#8217;, खासकर बिहार में, से वे भली भांति भिज्ञ हो गए हैं। बाहरी मन से भले लोग समझते हों की &#8216;अबकी बार भी नीतीशे कुमार&#8217;, नीतीश कुमार भी समझते हैं कि कल क्या होने वाला है। वैसे भी, नरेंद्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी किसी भी राज्य में &#8216;सह-पार्टी&#8217; बनकर &#8216;सत्ता&#8217; में क्यों रहना चाहेगी, एकाधिकार की इच्छा तो होगी है। तभी तो दीनदयाल मार्ग, नई दिल्ली स्थित भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में लोग बाग़ राष्ट्रकवी रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; की कविता पाठ कर रहे &#8211; &#8216;सिंहासन खाली करो नीतीश कुमार कि भाजपा आ रही है।&#8217;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6883" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>​अबकी बार &#8216;ना&#8217; नीतीश कुमार</strong> </p>
<p>चलिए पीछे चलते हैं। वर्ष 1990 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कुल 324 में से 122 सीटें लाकर जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा था । विभिन्न पार्टियों को जोड़कर अक्टूबर 1988 में गठित जनता दल ने वर्ष 1990 के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया और गठबंधन की सरकार बनी। लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री बने। विधायक दल का नेता कौन होगा, इसको लेकर लालू प्रसाद और पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास के बीच कड़ी टक्कर हुई। र्वोंटग के जरिये लालू प्रसाद विधायक दल के नेता चुने गए। इस तरह दोबारा मुख्यमंत्री बनने से राम सुंदर दास चूक गए। </p>
<p>राजनीतिक मानचित्र पर आज भी स्वर्णाक्षरों में उद्धृत है: “उस समय जैसा कि केंद्र में हुआ था, ठीक वैसी ही स्थिति बिहार में दसवें विधानसभा की थी। कांग्रेस पार्टी के 125 सीटों का नुकसान हुआ और पार्टी 71 सीटों पर सिमट गई। जनता दल को 122 सीटों पर विजय हासिल हुई, बीजेपी को 23 सीटों का फायदा हुआ और अब पार्टी के 39 विधायक थे। और वाम मोर्चा के 42 विधायक चुने गए। तीन-सौ चौबीस सदस्यों वाली विधानसभा में जनता दल के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन था। पर अब सवाल था कि कौन बनेगा बिहार का मुख्यमंत्री? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-11.jpg" alt="" width="2006" height="1312" class="aligncenter size-full wp-image-6876" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-11.jpg 2006w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-11-300x196.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-11-1024x670.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-11-768x502.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-11-1536x1005.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2006px) 100vw, 2006px" /></a></p>
<p>रामविलास पासवान के मुख्यमंत्री बनने पर सभी सहमत थे और पासवान का सपना था डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बाद दलितों के सबसे बड़ा नेता बनने का। बिहार के मुख्यमंत्री का पद उस सपने को पूरा करने के लिए काफी छोटा रंगमंच था, लिहाजा उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने रहने का फैसला किया। बात अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा की भी चली पर विश्वनाथ प्रताप सिंह का सिन्हा के प्रति रुख नकारात्मक रहा। सिंह पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास के पक्ष में थे और चंद्रशेखर रघुनाथ झा को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। विवाद पहुंचा उप-प्रधानमंत्री देवीलाल के पास। देवीलाल ने दूसरी बार सांसद बने लालू प्रसाद यादव के नाम का प्रस्ताव रखा।  फिर विधायक दल का चुनाव हुआ और लालू प्रसाद यादव जीत कर मुख्यमंत्री बन गए। </p>
<p>1995 का विधानसभा चुनाव के कालखंड में बिहार में ना ही राष्ट्रीय जनता दल थी और ना ही जनता दल(यूनाइटेड) का अस्तित्व था। यह अलग बात है कि इस चुनाव के एक वर्ष पूर्व नीतीश कुमार जॉर्ज फर्नांडिस के सहयोग से 1994 में समता पार्टी बनाकर लालू यादव से अलग हो गए थे। 1995 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल ने 264 सीटों पर बिहार चुनाव लड़ा और वो 167 सीटें जीतने में सफल हुई। भाजपा ने 315 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए लेकिन सिर्फ़ 41 सीटें ही जीत पाई, जबकि कांग्रेस 320 सीटों पर चुनाव लड़कर 29 सीटें ही जीत पाई। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 63 में से 10 सीटें मिली थी और नीतीश कुमार जके समता पार्टी को 310 में से सात सीटें मिली थी। इस चुनाव के बाद लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। यह सभी जानते हैं। </p>
<p><strong>मार्च 2000 में विधानसभा चुनाव हुए। यह वो समय जब बिहार से अलग करके झारखंड राज्य नहीं बनाया गया था। साल 2000 के नवंबर में झारखंड का गठन हुआ था। तब बिहार में 324 सीटें हुआ करती थीं और जीतने के लिए 162 सीटों की जरूरत होती थी। इन चुनावों में राजद ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 124 सीटें मिली थी। वहीं, भाजपा को 168 में से 67 सीटें हासिल हुई थी। इसके अलावा समता पार्टी को 120 में से 34 और कांग्रेस को 324 में से 23 सीटें हासिल हुई थी। 2000 के चुनाव में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी। </strong></p>
<p>साल 2005 में ऐसा पहली बार हुआ था जब बिहार में एक ही साल के अंदर दो बार विधानसभा चुनाव हुए। फरवरी 2005 में राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से उसे 75 सीटें मिल पाई। वहीं, जदयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ 55 सीटें जीतीं और भाजपा 103 में से 37 सीटें मिली। कांग्रेस इन चुनावों में 84 में से 10 सीटें ही मिली थी / इन चुनावों में 122 सीटों को स्पष्ट बहुमत न मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई और कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर आई। जनता दल 139 सीटों पर चुनाव लड़ा जबकि भाजपा ने 102 में से 55 सीटें हासिल की। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल ने 175 सीटों पर चुनाव लड़कर 54 सीटें जीती, लोजपा को 203 में से 10 सीटें मिली और कांग्रेस 51 में से नौ सीटें ही जीत पाई। यहाँ भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री कार्यालय में राखी कुर्सी पर बैठे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6877" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>साल 2010 में 243 सीटों पर हुए इन चुनावों में नीतीश कुमार की जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इन चुनावों में एनडीए गठबंधन में जदयू और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था और उनके सामने राजद और लोक जनशक्ति पार्टी का गठबंधन था। इन चुनावों में जनता दल यूनाइटेड ने 141 में से 115 सीटें और बीजेपी ने 102 में से 91 सीटें जीती। वहीं, राजद ने 168 सीटों पर चुनाव लड़कर 22 सीटें ला पायी। लोजपा 75 सीटों में से तीन सीटें लेकर आई थी। कांग्रेस ने पूरी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन उसे सिर्फ़ चार सीटें ही मिली। इसके बाद से कांग्रेस ने महागठबंधन में ही चुनाव लड़ा। इन चुनाव में बिहार की बड़ी पार्टी माने जाने वाली राजद का प्रदर्शन बहुत खराब रहा था जो फरवरी 2005 के चुनावों की 75 सीटों के मुक़ाबले सिमटकर 22 सीटों पर आ गई थी। 2010 में एनडीए की सरकार बनी और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। </p>
<p>2015 का चुनाव कुल 243 सीटों पर हुआ था जिसमें जीतने के लिए 122 सीटों की ज़रूरत थी। इन चुनावों में लालू यादव की राजद और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल यूनाइटेड ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था। कांग्रेस ने 41 और भाजपा ने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। चुनाव के नतीजे आने पर राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इसके बाद जदयू को 71 सीटें और भाजपा को 53 सीटें मिली थी। इन चुनावों में कांग्रेस को 27 सीटें मिली। इन चुनाव में महागठबंधन की सरकार बनी और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, 2017 में जेडीयू ​महागठबंधन से अलग हो गई और नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। अब तक नीतीश कुमार भले नवमी बार प्रदेश का मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए हैं, हकीकत यह है कि स्थापना काल से अब तक जनता दल यूनाइटेड अपने बल पर नहीं, अपितु सांठ-गाँठ से ही प्रदेश सरकार बना पाई है। वैसे 2010 के विधानसभा चुनाव परिणाम में भाजपा को 91 स्थान मिले थे, फिर 74 स्थान हैं। </p>
<p>​<strong>चुनाव आयोग की चिठ्ठी और नेताओं में हलचल</strong> </p>
<p>​बहरहाल, पटना के सरदार पटेल मार्ग और दिल्ली के अशोका रोड पर स्थित राज्य और केंद्रीय चुनाव आयोग के कार्यालयों में अधिकारी, पदाधिकारी सभी बेहाल है। कहते हैं उनकी स्थिति वैसी हो गयी है जैसे &#8216;विवाह से कुछ समय पूर्व दूल्हा या दुल्हन में दुर्गुण निकलना ताकि विवाह के समय बवाल हो और फिर चक्रव्यूह का रचनाकार को फायदा ही फायदा। बिहार में 18वीं विधान सभा के गठन के पूर्व होने वाली चुनाव के चार महीना पहले निर्वाचन आयोग द्वारा यह निर्णय लेना कि प्रदेश की मतदाता सूची का &#8216;विशेष गहन पुनरीक्षण&#8217; आवश्यक है और इसी तर्ज पर राज्य के कुल 7.89 करोड़ मतदाताओं में से, 4.96 करोड़, जो 1 जनवरी, 2003 तक मतदाता सूची में थे, उन्हें केवल नया गणना फार्म भरकर जमा करना है। ​निर्वाचन आयोग चाहे जो भी कह ले, ज्ञान-विज्ञान की बातें करें, मत के लिए मतदाताओं को समझाए, हकीकत यह है कि शेष 2.93 करोड़ या लगभग 37 प्रतिशत मतदाताओं को 24 जून को जारी चुनाव आयोग के आदेश के अनुसार, ​मतपत्र पर बने रहने के लिए फॉर्म के अलावा नागरिकता स्थापित करने वाले दस्तावेज भी जमा करने होंगे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Letter.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Letter.jpg" alt="" width="1931" height="1348" class="aligncenter size-full wp-image-6878" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Letter.jpg 1931w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Letter-300x209.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Letter-1024x715.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Letter-768x536.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Letter-1536x1072.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Letter-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 1931px) 100vw, 1931px" /></a></p>
<p><strong>चुनाव आयोग ​के अनुसार, &#8220;मौजूदा 7,89,69,844 मतदाताओं में से 4.96 करोड़ मतदाता, जिनके नाम पहले से ही 01.01.2003 को मतदाता सूची के अंतिम गहन पुनरीक्षण में हैं, उन्हें बस सत्यापन करना है, गणना फॉर्म भरना है और इसे जमा करना है।&#8221; ​प्रदेश के वर्तमान मतदाताओं को ड्राफ्ट रोल में शामिल होने के लिए 25 जुलाई तक फॉर्म जमा करने होंगे। जिन लोगों के नाम 2003 में नहीं थे &#8211; पिछली बार बिहार में गहन पुनरीक्षण किया गया था &#8211; और नए आवेदकों के लिए, चुनाव आयोग ने जन्म तिथि और/या स्थान का प्रमाण मांगा ​है। आयोग के अनुसार, यदि उनका जन्म 1 जुलाई 1987 से पहले हुआ है तो स्वयं का प्रमाण; यदि उनका जन्म 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच हुआ है तो स्वयं और एक माता या पिता की जन्म तिथि और/या स्थान का प्रमाण; और यदि 2 दिसंबर, 2004 के बाद पैदा हुए हैं तो स्वयं और दोनों माता-पिता की जन्म तिथि और/या स्थान का प्रमाण।</strong> </p>
<p>​मतदाता सूची का पुनरीक्षण को लेकर प्रदेश में चतुर्दिक चर्चाएं हो रही है। विपक्षी दल चुनाव आयोग के इस कदम का विरोध कर रहे हैं। ​उनका कहना है कि गहन पुनरीक्षण से राज्य मशीनरी का इस्तेमाल करके मतदाताओं को जानबूझकर बाहर करने का खतरा है। ​जबकि चुनाव आयोग कहता है कि भारत का संविधान सर्वोच्च है। सभी नागरिक, राजनीतिक दल और भारत का चुनाव आयोग संविधान का पालन करते हैं। अनुच्छेद 326 एक मतदाता बनने की पात्रता निर्दिष्ट करता है। केवल भारतीय नागरिक, 18 वर्ष से अधिक और उस निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य निवासी, पात्र हैं।&#8221; चुनाव आयोग ​का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण बेहद जरूरी है क्योंकि यह एक गतिशील सूची है, जो मौत, प्रवास की वजह से लोगों की शिफ्टिंग और 18 साल की उम्र पूरी कर चुके नए मतदाताओं के जुड़ने की वजह से बदलती रहती है।​</p>
<figure id="attachment_6880" aria-describedby="caption-attachment-6880" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/AAAA.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/AAAA.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6880" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/AAAA.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/AAAA-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/AAAA-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/AAAA-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/AAAA-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6880" class="wp-caption-text">मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार<br /></figcaption></figure>
<p>चुनाव आयोग के, बिहार में करीब 4.96 करोड़ मतदाताओं को राज्य में चुनाव आयोग द्वारा जारी विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में कोई दस्तावेज जमा कराने की जरूरत नहीं है। उनके बच्चों को भी अपने माता-पिता से संबंधित कोई अन्य दस्तावेज जमा कराने की जरूरत नहीं है। ये मतदाता बिहार की 2003 की मतदाता सूची में हैं, जिसे आयोग ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। 2003 की मतदाता सूची की उपलब्धता की आसानी से राज्य में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में काफी सुविधा होगी, क्योंकि बिहार के कुल मतदाताओं में से करीब 60 फीसदी को कोई दस्तावेज जमा कराने की जरूरत नहीं होगी। आयोग ने सत्यापन व पुनरीक्षण का यह अभियान तब शुरू किया है, जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर उस पर गंभीर आरोप लग रहे थे।​ सूत्रों की मानें तो कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में प्रवासियों की संख्या वहां जीत के अंतर से अधिक हो गई है, जिससे लोकतांत्रिक अखंडता प्रभावित हो सकती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जहां 2001 में भारत में 31 करोड़ प्रवासी मतदाता थे, वहीं 2021 में इनके करीब 45 करोड़ होने का अनुमान है।​</p>
<p>ज्ञातव्य हो कि विपक्षी दलों द्वारा राज्य विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान पर सवाल उठाए जाने के कुछ दिनों बाद उठाया गया है।​ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र मतदाता छूट न जाए और साथ ही कोई भी अपात्र मतदाता मतदाता सूची में शामिल न हो।​ आयोग के अनुसार, 77,895 बीएलओ पहले से ही मौजूद थे, और नए मतदान केंद्रों के लिए 20,603 और नियुक्त किए जा रहे हैं।​ गहन पुनरीक्षण के दौरान 1 लाख से अधिक स्वयंसेवक सहायता करेंगे। सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य राजनीतिक दल जो ईसीआई के साथ पंजीकृत हैं, उन्होंने पहले ही 1,54,977 बूथ स्तरीय एजेंट (बीएलए) नियुक्त किए हैं बिहार के 7,89,69,844 मतदाताओं के लिए बिहार के 243 विधानसभा क्षेत्रों में से प्रत्येक में मतदान शुरू हो चुका ​है। </p>
<figure id="attachment_6881" aria-describedby="caption-attachment-6881" style="width: 2006px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-12.jpg" alt="" width="2006" height="1312" class="size-full wp-image-6881" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-12.jpg 2006w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-12-300x196.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-12-1024x670.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-12-768x502.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-12-1536x1005.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2006px) 100vw, 2006px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6881" class="wp-caption-text">कब तक पीछे-पीछे चलूँगा नीतीश कुमार ?</figcaption></figure>
<p>कई लोग एक जगह के सामान्य निवासी होते हैं और उन्होंने अपना EPIC वहीं से प्राप्त किया है, लेकिन वे किसी तरह से जानबूझकर या अनजाने में माइग्रेशन करके अपना पुराना EPIC बनाए रखने में कामयाब हो गए हैं, जो एक आपराधिक अपराध है।​ मतदाता पहचान पत्र में मतदाताओं की तस्वीरें इतनी पुरानी हैं कि तस्वीरों का मिलान करना मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति में मतदाताओं की नई तस्वीरें पहचान में मदद करेंगी।कई अपात्र लोगों ने EPIC प्राप्त कर लिया है, क्योंकि 2003 के बाद सत्यापन नहीं हुआ है। उनके पात्रता संबंधी दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं हैं। इससे ऐसे लोगों की पहचान करना आसान हो जाएगा। शिकायतें भी खत्म होंगी।​ 1952 से 2004 तक 52 वर्षों में पूरे देश या भागों में नौ बार विभिन्न गहन पुनरीक्षणों के माध्यम से मतदाता सूची को नए सिरे से तैयार किया गया है। यानी औसतन हर छह साल में एक बार। हालांकि, बिहार में पिछले 22 वर्षों में गहन पुनरीक्षण नहीं किया गया है।​</p>
<p>​<strong>क्या लिखते हैं अखबार वाले </strong></p>
<p><strong>श्रावस्ती दासगुप्ता ​ने &#8216;द वायर​&#8217;</strong> में लिखती हैं कि भारत के चुनाव आयोग (ईसी) द्वारा चुनावी राज्य बिहार में मतदाता सूचियों का “विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)” करने के कदम &#8211; जिसमें 2003 में मतदाता सूची में शामिल नहीं होने वाले सभी मौजूदा मतदाताओं को अपनी और अपने माता-पिता की नागरिकता का प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है &#8211; ने चुनाव से कुछ महीने पहले इस अभ्यास की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए हैं। इसने बड़े पैमाने पर वंचितता, बहिष्कार और क्या चुनाव निकाय का इस्तेमाल राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लाने के लिए किया जा रहा है, के बारे में भी चिंताएँ पैदा की हैं।​</p>
<p>घर-घर सत्यापन की घोषणा करते हुए आयोग ने कहा कि विभिन्न कारणों से यह जरूरी हो गया था, जिनमें से एक मतदाता सूची में “विदेशी अवैध अप्रवासियों” का शामिल होना था। चुनाव आयोग ने 24 जून को अपने बयान में कहा, “तेजी से शहरीकरण, लगातार पलायन, युवा नागरिकों का वोट देने के योग्य होना, मौतों की सूचना न देना और विदेशी अवैध अप्रवासियों के नाम शामिल होने जैसे विभिन्न कारणों से गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता पड़ी है ताकि मतदाता सूची की अखंडता और त्रुटि रहित तैयारी सुनिश्चित की जा सके।” </p>
<p>बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) को लिखे 19 पन्नों के पत्र के अनुसार, 01.07.2025 को अर्हक तिथि के रूप में स्वीकार किया गया है’ – मतदाताओं के लिए फॉर्म से पता चलता है कि 1 जुलाई 1987 से पहले पैदा हुए लोगों को अपनी जन्म तिथि और/या जन्म स्थान साबित करना होगा। 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच पैदा हुए लोगों को अपनी जन्म तिथि और अपने माता-पिता में से किसी एक की जन्म तिथि/स्थान साबित करना होगा। वहीं दूसरी ओर 2 दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुए लोगों को अपनी जन्म तिथि/स्थान के साथ-साथ अपने माता-पिता दोनों की जन्म तिथि/स्थान साबित करना होगा।​ बिहार में करीब 7.73 करोड़ मतदाता हैं। खास बात यह है कि बुधवार (25 जून) को शुरू हुई यह प्रक्रिया &#8211; इसकी घोषणा के एक दिन बाद &#8211; दो महीने में पूरी होगी।​</p>
<figure id="attachment_6882" aria-describedby="caption-attachment-6882" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6882" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Bihar-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6882" class="wp-caption-text">नीतीश कुमार और अमित शाह</figcaption></figure>
<p>मतदाता सूची का मसौदा 1 अगस्त को प्रकाशित किया जाएगा। मतदाताओं के पास दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 1 सितंबर तक का समय होगा और अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर को प्रकाशित की जाएगी।​ कहते हैं कि आयोग का यह कदम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उन आरोपों के बीच आया है, जिसमें कहा गया है कि अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों ने खुद को मतदाता के रूप में पंजीकृत कराया है। कांग्रेस ने भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मतदाताओं के साथ छेड़छाड़ के आरोप लगाए हैं।​ 24 जून के आदेश के पैराग्राफ 11 के अनुसार, चुनाव आयोग ने कहा: &#8220;चूंकि बिहार में अंतिम गहन संशोधन 2003 में किया गया था, इसलिए ईआरओ 2003 की मतदाता सूची को 01.01.2003 की योग्यता तिथि के साथ पात्रता के प्रमाण के रूप में मानेंगे, जिसमें नागरिकता की धारणा भी शामिल है, जब तक कि उन्हें कोई अन्य इनपुट प्राप्त न हो।&#8221; </p>
<p><strong>​श्रीपर्णा चक्रवर्ती &#8216;द हिंदू​&#8217;</strong> में लिखती हैं कि &#8216;बिहार में लगभग 2.93 करोड़ मतदाताओं को अपने स्वयं के जन्म की तारीख और स्थान के साथ-साथ 1987 के बाद पैदा हुए लोगों के मामले में अपने माता-पिता के जन्म की तारीख और स्थान को स्थापित करने वाले दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे, क्योंकि राज्य की मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) शनिवार (28 जून, 2025) से शुरू हुआ है।​ भारत के चुनाव आयोग बिहार से शुरुआत करते हुए पूरे देश में एसआईआर अभ्यास शुरू करने का फैसला किया है, इसके लिए कार्यक्रम अलग से जारी किए जाएंगे।​ बिहार में आखिरी बार इस तरह का गहन पुनरीक्षण 2003 में 1 जनवरी, 2003 को अर्हता तिथि के रूप में किया गया था। </p>
<p>बिहार में 7,89,69,844 मतदाता हैं, जिनमें से 4.96 करोड़ के नाम पहले से ही मतदाता सूची में मौजूद थे जब अंतिम एसआईआर 2003 में की गई थी। इन मतदाताओं को केवल गणना फॉर्म भरकर और उन्हें जमा करके खुद को सत्यापित करना है। हालांकि, ईसीआई के दिशानिर्देश कहते हैं कि जिस किसी का नाम 2003 की मतदाता सूची में दर्ज नहीं था, उसे मतदाता होने की अपनी पात्रता स्थापित करनी चाहिए और पात्र सरकारी दस्तावेजों की एक विस्तृत श्रृंखला का उपयोग करके प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिए। 1 जुलाई 1987 से पहले पैदा हुए लोगों के लिए, उनकी अपनी जन्मतिथि और जन्म स्थान को स्थापित करने वाला कोई भी दस्तावेज जमा करना होगा। 2 दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुए लोगों को अपने और अपने माता-पिता दोनों के लिए जन्म स्थान और जन्म तिथि का प्रमाण देना होगा।</p>
<p><strong>डिमॉक्रेसी स्क्वायर्ड इनसाइट्स</strong> लिखता है कि  क्या ECI अपनी सीमाएं लांघ रहा है? ECI का यह आदेश संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है। किसी नागरिक को सिर्फ उसकी उम्र के आधार पर संदिग्ध नागरिक मानना, लोकतंत्र के हर उस मूल्य का उल्लंघन है जिसके लिए इस देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने लड़ाई लड़ी। चुनाव आयोग का दावा है कि जिनके नाम 2003 की मतदाता सूची में हैं, उन्हें दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं। लेकिन 2003 में बिहार की मतदाता सूची में करीब 4.96 करोड़ नाम थे। आज की तारीख में उनमें से करीब 1.1 करोड़ लोग मृत हो चुके हैं (Sample Registration System के अनुसार)। यानी अब केवल 3.86 करोड़ ही बचे हैं। बाकी 4.22 करोड़ से अधिक युवाओं से कहा जा रहा है कि वो साबित करें कि वे भारत के नागरिक हैं। पर सवाल यह है — 2003 के बाद जन्मे व्यक्ति क्या विदेशी हो गए?</p>
<p>​डीएसआइ के अनुसार, बिहार के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो सकती है। देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था — भारत निर्वाचन आयोग — ने एक आदेश जारी कर 1 जुलाई से 31 जुलाई के बीच बिहार के 40 वर्ष या उससे कम उम्र के 4.76 करोड़ लोगों से नागरिकता सिद्ध करने को कहा है। यह न केवल प्रशासनिक दृष्टि से असंवेदनशील है, बल्कि एक गहरे राजनीतिक एजेंडे की आहट भी प्रतीत होती है। यह निर्णय सवाल उठाता है कि क्या भारत अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है जहाँ एक नागरिक को अपने ही देश में अपने अस्तित्व को साबित करना होगा? ​</p>
<p>2020 में भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार की कुल वयस्क (वोटिंग आयु) आबादी 8.08 करोड़ आंकी गई थी। इनमें से लगभग 59% आबादी यानी 4.76 करोड़ लोग 40 वर्ष से कम आयु के हैं। और अब चुनाव आयोग इनसे कहता है — &#8220;अपनी नागरिकता प्रमाणित करें, वरना वोटर लिस्ट से नाम हट सकता है।&#8221; यह आदेश अचानक आया, बिना किसी पूर्व सूचना, पारदर्शिता या चरणबद्ध योजना के। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ आज भी लाखों लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र, नागरिकता दस्तावेज या स्थायी निवास प्रमाण पत्र नहीं हैं, वहाँ ये आदेश सीधे-सीधे जनता को मानसिक उत्पीड़न देने के समान है।​ इस आदेश से सबसे अधिक प्रभावित होंगी गांव की महिलाएं, जिनके पास दस्तावेजों की भारी कमी है। बिहार में आज भी लाखों महिलाएं ऐसी हैं जो कभी स्कूल नहीं गईं, उनके पास न आधार है, न वोटर कार्ड, न बैंक खाता — वे अपने पति या पिता के नाम पर ही सरकारी योजनाओं से जुड़ती रही हैं। अब उनसे अपनी नागरिकता सिद्ध करने को कहा जा रहा है — यह एक अन्याय का चरम है।</p>
<p>​<strong>फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार अभिनन्दन मिश्र लिखते हैं </strong></p>
<p>यह एक दुर्भाग्यपूर्ण कहानी है कि भाजपा ने — चाहे यह उनकी रणनीतिक पसंद रही हो या फिर सत्ता में बने रहने और सहयोगियों को नाराज़ न करने की मजबूरी — बिहार राज्य में नेतृत्व को न तो पोषित किया और न ही विकसित किया। जो नेता आज बिहार भाजपा के शीर्ष चेहरे माने जाते हैं, उनमें से किसी के पास ऐसा अनुभव या प्रभाव नहीं है कि वे तेजस्वी यादव को अकेले चुनौती दे सकें।</p>
<p>असल में, भाजपा के पास ऐसे लोग थे — और हैं — जिनमें नेता बनने की पूरी क्षमता थी। उनके पास अनुभव था, संगठनात्मक पकड़ थी, और जनाधार भी। लेकिन या तो उन्हें समय रहते प्रोत्साहित नहीं किया गया, या फिर उन्हें जानबूझकर उभरने नहीं दिया गया। जिनमें सामर्थ्य था, उन्हें बड़ा बनने की जगह नहीं दी गई। यही वह गहरी कमी है जो भाजपा की नेतृत्व निर्माण प्रक्रिया को उजागर करती है — वर्षों सत्ता में रहने के बावजूद एक भी सशक्त और विश्वसनीय विकल्प खड़ा नहीं किया गया। समय के साथ पुराने नेताओं का धीरे-धीरे किनारे होना स्वाभाविक और आवश्यक प्रक्रिया है, लेकिन जब उनके स्थान पर कोई विश्वसनीय चेहरा न हो, तो उसका नुकसान होता है। ऐसी स्थिति में आपको दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है — कई बार उन पर भी, जो न तो आपकी विचारधारा से जुड़े हैं, न ही आपकी संरचना से।</p>
<figure id="attachment_6884" aria-describedby="caption-attachment-6884" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/abhinandan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/abhinandan.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6884" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/abhinandan.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/abhinandan-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/abhinandan-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/abhinandan-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/abhinandan-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6884" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार अभिनन्दन मिश्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी</figcaption></figure>
<p>हर बीतते हफ्ते के साथ यह और स्पष्ट होता जा रहा है कि मौजूदा मुख्यमंत्री अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम चरण में हैं — एक ऐसी यात्रा जो चार दशकों से भी लंबी रही है, जिसमें दो दशक मुख्यमंत्री के रूप में शामिल हैं। ऐसे में कई महत्वाकांक्षी चेहरे इस खाली होती जगह को भरने की तैयारी में जुट गए हैं। चिराग पासवान से लेकर प्रशांत किशोर तक — हर कोई इसे अपने लिए बड़ा अवसर मान रहा है। हर कोई अपना एजेंडा पेश कर रहा है — एक ऐसी भाषा में, एक ऐसे लहजे में, जो कविता की तरह लगे और बिहार के मतदाताओं को आकर्षित करे। इसी बीच, जो पुराने नेता वर्षों के ज़मीनी अनुभव और समाज के विविध वर्गों से संवाद के दम पर उभरे थे, वे अब हाशिये पर डाल दिए गए हैं। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को अब ज़मीनी सच्चाई की एक संकीर्ण और छँटी हुई तस्वीर ही मिलती है। वे स्थानीय नेता, जिनकी बात ऊपर तक पहुंचती है, वही कहते हैं जो उनके अपने राजनीतिक हितों के अनुकूल होता है। इससे पार्टी के पास ज़मीनी हालात की कोई वस्तुनिष्ठ समझ नहीं बचती।</p>
<p>फिर भी, अगर बिहार में एनडीए सत्ता में आती है, तो मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा। लेकिन उसका चयन शायद उन्हीं तर्ज़ों पर होगा, जैसे मध्यप्रदेश में मोहन यादव या राजस्थान में भजनलाल शर्मा — यानी ऐसे चेहरे जो दौड़ में कभी नज़र ही नहीं आए।<br />
वर्तमान स्थिति यह है कि बिहार भाजपा के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो स्वर्गीय सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, अश्विनी चौबे या उस पीढ़ी के अन्य दिग्गजों की जगह ले सके।</p>
<p><strong>​और क्या कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल कादिर </strong></p>
<p>​उधर, <strong>टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के पूर्व संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल कादिर </strong>एक प्रश्न उठाये हैं क्या क्या भाजपा बिहार चुनाव से दूर भाग रही है? उनका कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में बहुत कम समय में गहन संशोधन करने के अत्यधिक विवादास्पद निर्णय, बिहार में एनडीए के सहयोगियों के बीच विवाद, नीतीश कुमार से छुटकारा पाने और उनके समर्थन आधार को हड़पने की इच्छा, भाजपा की राज्य इकाई की आंतरिक गतिशीलता आदि को देखते हुए उत्तर सकारात्मक प्रतीत होते हैं। सत्तारूढ़ पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में स्वयंभू बनिया ने बिहार में स्थगित चुनाव के लाभ और हानि का ध्यान रखा होगा और यह निष्कर्ष निकाला होगा कि विलंबित चुनाव पार्टी की चुनावी रणनीति के लिए बेहतर हैं और आसन्न जन आक्रोश और मुकदमेबाजी भाजपा को पार्टी के दृष्टिकोण से बेहतर समय में चुनाव कराने का बहाना प्रदान कर सकते हैं।</p>
<figure id="attachment_6879" aria-describedby="caption-attachment-6879" style="width: 1931px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Abdul-Qadir.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Abdul-Qadir.jpg" alt="" width="1931" height="1348" class="size-full wp-image-6879" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Abdul-Qadir.jpg 1931w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Abdul-Qadir-300x209.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Abdul-Qadir-1024x715.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Abdul-Qadir-768x536.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Abdul-Qadir-1536x1072.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Abdul-Qadir-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 1931px) 100vw, 1931px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6879" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल कादिर</figcaption></figure>
<p>आइए देखते हैं कि स्थगित चुनाव भाजपा के एजेंडे के लिए किस तरह अनुकूल होंगे।​ यदि संशोधन के मुद्दे पर जन आक्रोश कानून और व्यवस्था की स्थिति पैदा करता है, तो पार्टी किसी तरह नीतीश को लंगड़ा मुख्यमंत्री बनाकर चीजों को संभाल सकती है और इस साल के अंत में नीतीश का कार्यकाल समाप्त होने पर राष्ट्रपति शासन लगा सकती है। प्लान बी के तहत, अगले कुछ हफ्तों में राज्य के बड़े हिस्से में हर साल आने वाली बाढ़ के कारण संशोधन की प्रक्रिया पर रोक लग जाएगी और चुनाव आयोग व्यापक संशोधन की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए और समय मांग सकता है। व्यापक संशोधन योजना को पूरा किए बिना चुनाव आयोग के बिहार में चुनाव कराने की संभावना नहीं है।</p>
<p>इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा नीतीश कुमार के समर्थन आधार पर नजर रख रही है। सीएम की गिरती सेहत और कथित विश्वसनीयता में कमी उनके गठबंधन सहयोगी के लिए वरदान साबित हुई है।​ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा ने जेडी(यू) खेमे में बहुत सारे ट्रोजन हॉर्स लगा दिए हैं। आप उन्हें भाजपा के स्लीपर सेल भी कह सकते हैं, जिन्हें कभी भी सक्रिय किया जा सकता है। एक बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाने के बाद, नीतीश से निपटना बहुत आसान हो जाएगा और भाजपा ‘मेरे रास्ते या राजमार्ग’ की स्थिति में होगी। गठबंधन का दिखावा तो होगा, लेकिन ज्यादातर फैसले भाजपा ही लेगी।​ अगर राष्ट्रपति शासन की स्थिति सच साबित होती है, तो भाजपा राज्य मशीनरी पर पूरी तरह नियंत्रण कर लेगी और पिछले ग्यारह वर्षों में इसने सत्ता के लीवर को नियंत्रित करने की कला, विज्ञान और वाणिज्य में महारत हासिल कर ली है। नौकरशाही के एक बड़े हिस्से में दासता का विज्ञान दिखने के कारण भाजपा के लिए चुनाव प्रबंधन में अपनी पैठ बनाना मुश्किल नहीं होना चाहिए। </p>
<p><strong>याद कीजिए कि लोकप्रिय धारणा के अनुसार, तत्कालीन चुनाव आयोग के सलाहकार केवी राव के साथ मिलकर काम करने वाले बिहार के कुछ नौकरशाहों ने वर्ष 2005 में एनडीए के लाभ के लिए चुनाव मशीनरी में हेरफेर किया था। प्रतिबद्ध नौकरशाहों की नई नस्ल हमेशा सत्तारूढ़ पार्टी के लिए विकेटों के बीच दौड़ लगा सकती है। हाल ही में, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा भी बिहार में एनडीए के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाले नेता बनकर उभरे हैं। राष्ट्रपति शासन के तहत उनसे निपटना सबसे कमजोर लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत ऐसा करने से कहीं अधिक आसान होगा। भाजपा के एक बहुत वरिष्ठ नेता पटना के 1 अणे मार्ग में भगवा पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष के स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के सपने को पूरा करना चाहते हैं। वाजपेयी के सपने को साकार करने में नीतीश कुमार सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरे हैं।</strong></p>
<p>बीजेपी के साथ समस्या यह है कि सुशील मोदी के बाद, पार्टी ने बिहार की राजनीति में एक ऐसा चेहरा नहीं गढ़ा है जो देखने लायक हो और स्वीकार्य भी हो। मंडल के बाद की बिहार की राजनीति की वास्तविकताओं के कारण उसके पास विकल्प सीमित हो गए हैं, जहां शीर्ष पद के लिए किसी भी गैर-ओबीसी उम्मीदवार की उम्मीदवारी खारिज कर दी गई है।​ऐसा लगता है कि नित्यानंद राय पहले ही हार चुके हैं। सम्राट चौधरी राजनीतिक रूप से उदार माहौल में पले-बढ़े हैं, क्योंकि उनके पिता कांग्रेस में रहे हैं और चौधरी खुद राबड़ी देवी के नेतृत्व में मंत्री थे। बीजेपी को अपनी चालबाजियों से मोहन यादव, भजन लाल शर्मा या मोहन चरण मांझी को बाहर निकालने के लिए समय चाहिए।​ और फिर राजनीति, खासकर बिहार की राजनीति अब संभव की कला नहीं रह गई है। राजनीति के नए व्याकरण में असंभव एक संभावना बन गई है।​ </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/nitish-kumar-vacate-the-throne-the-bharatiya-janata-party-is-coming">​बिहार चुनाव : सिंहासन खाली करो नीतीश कुमार कि भारतीय &#8216;जनता&#8217; की पार्टी आ रही है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>अब तक 15 &#8216;प्रधान मंत्रियों&#8217; में 10 &#8216;भारतरत्न&#8217; से &#8216;अलंकृत&#8217;, फिर 11वां अलंकरण प्रधानमंत्री &#8216;नरेंद्र मोदी&#8217; को क्यों नहीं ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Jul 2025 07:17:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लाल किला (पुरानी दिल्ली) : लाल किला के प्राचीर के नीचे खड़ा हूँ। कोई पच्चीस कदम आगे ऊपर देश के प्रधानमंत्री जश्ने आज़ादी के दिन देश के आवाम को, राष्ट्र को संवोधित करते हैं। आगामी 15 अगस्त को जश्न आज़ादी का ७९ वां वर्ष मनाया जाएगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बारहवीं बार तिरंगा को लहरायेंगे, फहराएँगे। [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लाल किला (पुरानी दिल्ली) : लाल किला के प्राचीर के नीचे खड़ा हूँ। कोई पच्चीस कदम आगे ऊपर देश के प्रधानमंत्री जश्ने आज़ादी के दिन देश के आवाम को, राष्ट्र को संवोधित करते हैं। आगामी 15 अगस्त को जश्न आज़ादी का ७९ वां वर्ष मनाया जाएगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बारहवीं बार तिरंगा को लहरायेंगे, फहराएँगे। यह फ़क्र की बात है। लाल किला के इस प्राचीर से नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत के सभी प्रधानमंत्रियों से सबसे लम्बा भाषण (समय के अनुसार) देने का रिकार्ड इस प्राचीर पर विगत वर्ष बना चुके हैं, जो उनके पहले प्रधानमंत्री के रूप में दिए गए भाषण से कोई 33 मिनट अधिक था।</strong> </p>
<p>लाल किले के अंदर उस प्राचीर के नीचे सैकड़ों पर्यटक, कुछ देशी, कुछ विदेशी, कई त्यौहारनुमा सजधजकर, कई साधारण पहनावे में, कभी प्राचीर को देखते दिखाई दे रहे थे, तो कई सेल्फी लेने का अवसर का लाभ उठा रहे थे। बड़े-बुजुर्ग उस प्राचीर से कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरागांधी, राजीव गाँधी, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह आदि नेताओं ने राष्ट्र को सम्वोधित किया था, अपने साथ आये सगे-सम्बन्धियों को बता रहे थे। पिछले वर्ष जब नरेंद्र मोदी राष्ट्र को संबोधित कर रहे थे, वे उनके संबोधन को सुनने आये थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-21.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-21.jpg" alt="" width="2039" height="1161" class="aligncenter size-full wp-image-6870" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-21.jpg 2039w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-21-300x171.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-21-1024x583.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-21-768x437.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-21-1536x875.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2039px) 100vw, 2039px" /></a></p>
<p><strong>विगत वर्ष नरेन्द्र मोदी स्वतंत्रता दिवस पर अपना सबसे लंबा भाषण 98 मिनट का दिए थे, जोकि 2016 में उनके 96 मिनट के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ा था। मोदी का स्वतंत्रता दिवस पर औसतन 82 मिनट का भाषण किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए भाषणों से सबसे लंबा हुआ है। साल 2016 में उनका भाषण 96 मिनट का था, जबकि साल 2017 में वे सबसे छोटा भाषण 56 मिनट का दिए थे। मोदी जी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने, यानी साल 2014 में वे 65 मिनट तक बोले थे। उसके अगले वर्ष, यानी 2015 में उनका भाषण करीब 88 मिनट तक चला था। साल 2018 में प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से 83 मिनट तक भाषण दिए थे। इसके बाद 2019 में उन्होंने करीब 92 मिनट तक भाषण दिया, जो अब तक का उनका दूसरा सबसे लंबा भाषण था। इसी तरह, 2020 में मोदी का स्वतंत्रता दिवस संबोधन 90 मिनट का था।2021 में उनका स्वतंत्रता दिवस भाषण 88 मिनट का रहा और 2022 में उन्होंने करीब 74 मिनट तक भाषण दिया। पिछले वर्ष वे 90 मिनट तक राष्ट्र को संबोधित किये थे। </strong></p>
<figure id="attachment_6855" aria-describedby="caption-attachment-6855" style="width: 2039px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-1.jpg" alt="" width="2039" height="1161" class="size-full wp-image-6855" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-1.jpg 2039w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-1-300x171.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-1-1024x583.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-1-768x437.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-1-1536x875.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2039px) 100vw, 2039px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6855" class="wp-caption-text">लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी</figcaption></figure>
<p>प्राचीर के नीचे मीना बाजार के तरफ मुखकर आवक-जावक को देखते सोच रहा था कि स्वाधीन भारत में पहली बार, यानी 15 अगस्त 1947 को जब पंडित जवाहरलाल नेहरू राष्ट्र को संबोधित किये होंगे कैसा दृश्य रहा होगा। जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में और इंद्र कुमार गुजराल ने 1997 में क्रमशः 72 और 71 मिनट का सबसे लंबा भाषण दिए थे। नेहरू और इंदिरा ने भी क्रमशः 1954 और 1966 में 14 मिनट का सबसे छोटा भाषण दिए थे। इसी तरह, पूर्व प्रधानमंत्रियों डॉ. मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी ने भी लाल किले से स्वतंत्रता दिवस पर सबसे छोटे भाषण दिए थे। सिंह के 2012 और 2013 में भाषण क्रमशः केवल 32 और 35 मिनट तक चले। 2002 और 2003 में वाजपेयी के भाषण और भी छोटे थे, जो 25 और 30 मिनट के थे।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6871" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>बहरहाल, ईंट के रंग जैसा गहरा रंग में रंगा कोई 387-वर्ष पहले सन 1638 में निर्मित और साल 2007 में यूनेस्को द्वारा इसके उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य के लिए यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अलंकृत लाल किला के लाहौरी प्रवेश द्वार से अंदर प्रवेश कर इस प्राचीर तक आया था। सोच रहा था यह तीन मंजिला, जिसमें चौकोर, आयताकार और नुकीले मेहराबदार नक्काशी वाली बनावट है, लाल किला का यह क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के कितने इतिहास को अपने अंदर संजोये होगा। लाहौरी गेट से अंदर की ओर जाने वाले रास्ते पर जब चल रहा था जो आगे बाएं हाथ मीनाबाज़ार के रास्ते छत्ता चौक होते लाल किला परिसर में प्रवेश लेता है । यहाँ आने-जाने वाले सैकड़े नब्बे फीसदी पर्यटक, खासकर देशी, लाल किले के इतिहास के बारे में नहीं जानते हैं। वैसे सरकार के तरफ से पत्थर पर इतिहास को संक्षिप्त में अंकित कर अवश्य रखा गया है। </p>
<p>यहाँ चलते-चलते मन ही मन सत्तर के दशक में शहर के दीवारों पर चिपका एक पोस्टर याद आ गया था जिसमें शशि कपूर के हाथ में एक हथौड़ा था और सामने पत्थर पर शर्मीला टैगोर बैठी थी। वह विज्ञापन <strong>&#8216;सुहाना सफर&#8217;</strong> फिल्म का था। उस सिनेमन का निर्देशन किया था विजय साहब और इस सिनेमा में अन्य कलाकारों, मसलन ओम प्रकाश, ललिता पवार, डेविड, मनमोहन, मास्टर भगवन, लीला मिश्रा, केएन सिंह, रामायण तिवारी, केश्टो मुखर्जी, मुकरी के अलावे शशि कपूर और शर्मीला टैगोर मुख्य भूमिका में थे। </p>
<figure id="attachment_6856" aria-describedby="caption-attachment-6856" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-19.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-19.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6856" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-19.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-19-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-19-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-19-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-19-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6856" class="wp-caption-text">​मीना बाजार से लाल किले पर तिरंगा का दृश्य</figcaption></figure>
<blockquote><p>इसी सिनेमा में एक बेहद कर्णप्रिय गीत था &#8211; चूड़ियां बाजार से मंगवा से दे रे पहले सैंय्या..पकड़ फिर बहियां &#8230; पकड़ फिर बहियां।&#8217; इस गीत के गीतकार थे आनंद बक्षी, संगीतकार थे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और गायक आशा भोसले तथा मोहम्मद रफ़ी। लाल किले के कोई 387 साल पुराने रास्ते में पहले ऊपर बनी झरोखों में मुग़ल बादशाह के घर की महिलाएं नीचे लगने वाले बाजार का लुफ्त उठती थी। आज झरोखे तो बंद हैं, लेकिन नीचे दुकानें आज भी सजी है, खासकर चूड़ियों की।</p></blockquote>
<p>मीना बाजार के रास्ते छत्ता चौक की ओर बढ़ रहा था। बाएं कंधे पर झोला और दाहिने कंधे पर निकोन750 डीएसएलआर लटकाये, जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, युवा महिलाओं (स्कूली छात्राएं) की एक टोली मुझे रोकी। दिल्ली सल्तनत में महिलाएं तभी किसी पुरुष को रोकती हैं, टोकती हैं, जब उन्हें उनपर विश्वास उत्कर्ष पर हो। स्वाभाविक भी है और होना भी चाहिए। दिल्ली की महिलाएं ही नहीं, देश की महिलाएं पुरुष प्रधान समाज में अपने ऊपर बहुत तरह की अत्याचार झेल चुकी हैं, झेल रही हैं। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का 2022 का रिपोर्ट गवाह है। वे सभी महिलाएं बहुत सम्मान के साथ कहती हैं कि क्या आप हम लोगों के साथ लाल किले का परिसर घूमते, हम सबों की तस्वीर खिंच देंगे? हम सभी एक-दूसरे के साथ पैसे इकठ्ठे कर आपको एक हज़ार दे सकती हूँ, ख़ुशी-ख़ुशी। मैं ना नहीं कहा। खैर। </p>
<p>इन सब बातों को सोचते आगे बढ़ रहा था तो मन में ख्याल आया कि इन 15 प्रधानमंत्रियों की तुलना अगर वर्त्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करते हैं तो मोदी जी तो सबसे प्रवल दावेदार हैं भारत रत्न के लिए। वैसे भी भाजपा के 240 सांसद, कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री, साथ राज्य सभा के एनडीए के सदस्य एकजुट हो जाएँ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में वह सभी गुण है जो भारतरत्न की उपाधि के लिए आवश्यक है। </p>
<p>स्वतंत्र भारत में साल 1947 से 2025 तक, यानी 79 वें जश्ने आज़ादी तक 15 राजनेतागण प्रधानमंत्री के कार्यालय में लगी कुर्सी पर बैठे। पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू (15 अगस्त 1947 से 27 मई, 1964), फिर गुलजारीलाल नंदा (अंतरिम) 27 मई 1964 &#8211; 9 जून 1964 और 11 जनवरी 1966 &#8211; 24 जनवरी 1966), फिर लाल बहादुर शास्त्री (9 जून 1964 -11 जनवरी 1966), इंदिरा गांधी (24 जनवरी 1966 &#8211; 24 मार्च 1977 और 14 जनवरी 1980 &#8211; 31 अक्तूबर 1984), मोरारजी देसाई (24 मार्च 1977 &#8211; 28 जुलाई 1979), चौधरी चरण सिंह (28 जुलाई 1979 &#8211; 14 जनवरी 1980), राजीव गांधी (31 अक्तूबर 1984 &#8211; 2 दिसंबर 1989), विश्व प्रताप सिंह (2 दिसंबर 1989 &#8211; 10 नवंबर 1990), चन्द्रशेखर (10 नवंबर 1990-21 जून 1991), पी वी नरसिम्हा राव (21 जून 1991 &#8211; 16 मई 1996),  अटल बिहारी वाजपेयी (16 मई 1996-1 जून 1996 और 18 मार्च 1998 &#8211; 22 मई 2004), एच. डी देवेगौड़ा (1 जून 1996 &#8211; 21 अप्रैल 1997), इंद्र कुमार गुजराल (21 अप्रैल 1997 &#8211; 18 मार्च 1998), डॉ.मनमोहन सिंह (22 मई 2004 -17 मई 2014) और नरेंद्र मोदी (26 मई 2014 से लगातार) । </p>
<p><strong>इन 15 प्रधानमंत्रियों में नौ प्रधानमंत्री &#8220;भारत रत्न&#8221; से अलंकृत हुए। पंडित जवाहर लाल नेहरू को 1955 में मिला। लाल बहादुर शास्त्री को 1966 में, इंदिरा गांधी को 1971 में, राजीव गांधी को 1991 में, मोरारजी देसाई को 1991 में ही। जबकि गुलजारीलाल नंदा को 1997 में, अटल बिहारी बाजपेयी को 2015 में, चौधरी चरण सिंह, पीवी नरसिम्हा राव को 2024 में। शेष बचे विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, एच डी देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, डॉ. मनमोहन सिंह। समय दूर नहीं है जब डॉ. मनमोहन सिंह को भी पीवी नरसिम्हा राव के तर्ज पर (कांग्रेस में उनकी स्थिति के मद्दे नजर, साथ ही, पंजाब की राजनीति और सत्ता पर कब्ज़ा को ध्यान में रखकर) भी मरणोपरांत भारत रत्न से अलंकृत किया जाए।  क्योंकि वीपी सिंह, चंद्रशेखर, गुजराल और देवेगौड़ा का आज के राजनीतिक माहौल में &#8216;भारत रत्न&#8217; जैसा मोल नहीं है।</strong> </p>
<figure id="attachment_6857" aria-describedby="caption-attachment-6857" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-9.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6857" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-9.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-9-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-9-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-9-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6857" class="wp-caption-text">​भारत रत्न पंडित जवाहरलाल नेहरू</figcaption></figure>
<p>ज्ञातव्य हो कि पी. वी. नरसिंह राव को भारत रत्न देकर नरेंद्र मोदी की सरकार ने कांग्रेस की एक और विरासत को अपने पाले में करने की बड़ी कवायद की है। मोदी कई मौकों पर कांग्रेस और गांधी परिवार पर नरसिंह राव की उपेक्षा करने का आरोप लगा चुके हैं। यह भी सही है कि नरसिंह राव और सोनिया गांधी के बीच बेहतर संबंध नहीं तब थे। जिस तरह मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद सरदार पटेल के बाद एक-एक विरासत को अपने पाले में किया, नरसिंह राव को भारत रत्न देना भी उसी मुहिम का एक बड़ा हिस्सा है। इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने ही कांग्रेस के एक और पूर्व नेता और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिया था। बाद के सालों में प्रणब मुखर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच बेहद मधुर संबंध हो गए थे।</p>
<figure id="attachment_6866" aria-describedby="caption-attachment-6866" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PVR.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PVR.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6866" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PVR.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PVR-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PVR-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PVR-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PVR-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6866" class="wp-caption-text">भारत रत्न पीवी नरसिम्हा राव</figcaption></figure>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक पंकज वोहरा कहते हैं कि &#8220;मोदी ने दो पूर्व प्रधानमंत्रियों चौधरी चरण सिंह और पीवी नरसिंह राव को मरणोपरांत पुरस्कार देकर कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। जबकि हरित क्रांति के जनक डॉ. एमएस स्वामीनाथन को भी यह सम्मान दिया गया था। भाजपा के आलोचक हर जगह हैं और उन्होंने कहा है कि भारत रत्न का इस्तेमाल राजनीतिक साधन के रूप में किया जा रहा है। चौधरी चरण सिंह जाट समुदाय के सबसे सम्मानित नेताओं में से एक थे और पूरे देश में उनका सम्मान किया जाता था। दूसरी ओर, राव उदारीकरण के जनक थे और उनके पांच साल के शासन ने भारत को आर्थिक सुधारों के रास्ते पर डाल दिया, जो उनके वित्त मंत्री और बाद में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के समग्र मार्गदर्शन में कुशलतापूर्वक संचालित किया गया।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_6858" aria-describedby="caption-attachment-6858" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-7.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6858" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-7.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-7-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-7-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-7-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6858" class="wp-caption-text">​भारत रत्न गुलजारीलाल नंदा</figcaption></figure>
<p>एम. एस. स्वामीनाथन और चौधरी चरण सिंह को ऐसे समय में भारत रत्न दिया गया जब एक बार फिर किसानों का मुद्दा गरम था । किसान एक बार फिर आम चुनाव से पहले किसान आंदोलन के पक्षधर हो गए थे। कहते हैं किसानों के अब तक के सबसे बड़े वैज्ञानिक और दूसरी ओर से किसानों के अब तक के सबसे नेता को भारत रत्न देकर मोदी सरकार ने बड़ा संदेश दे दिया। दरअसल, 2020 में जब दिल्ली में किसानों का आंदोलन हुआ तब सरकार की हालत ख़राब हो गयी थी।कुछ हद तक खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा। वोहरा कहते हैं: &#8220;डॉ. स्वामीनाथन इस सम्मान के सच्चे हकदार हैं और उन्हें यह सम्मान बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था, जब वे जीवित थे। वास्तव में, डॉ. स्वामीनाथन और डॉ. वर्गीस कुरियन ने हरित और श्वेत क्रांति की शुरुआत करके भारतीय लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिससे देश अपने-अपने क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन गया है। वे दो सबसे प्रतिष्ठित भारतीय थे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6859" aria-describedby="caption-attachment-6859" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-8.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6859" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-8.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-8-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-8-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-8-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6859" class="wp-caption-text">भारत रत्न  श्रीमती इंदिरा गांधी</figcaption></figure>
<p>आपको याद भी होगा जब लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न दिया गया वह इस बात का संकेत था कि मोदी जी देश में विरासत और हिंदुत्व के प्रतीक रहे जनप्रतिनिधियों और शख्सियतों को भी सम्मान देते रहे हैं। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के तुरंत बाद लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देना एक खास संकेत और संदेश दोनों था। दरअसल, नरेंद्र मोदी ने पिछले 11 -वर्षों में प्रतीकों की राजनीति को बेहद प्रभावी तरीके से अंजाम दिया है। आडवाणी को भारत रत्न का अलंकरण की घोषणा के बाद, प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा था : “मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा। मैंने भी उनसे बात की और भारत रत्न से सम्मानित होने पर उन्हें बधाई दी। अपने समय के सबसे सम्मानित राजनेताओं में से एक श्री लालकृष्ण आडवाणी का भारत के विकास में योगदान अविस्मरणीय है। उनका जीवन जमीनी स्तर पर काम करने से शुरू होकर हमारे उप-प्रधानमंत्री के रूप में देश की सेवा करने तक का है। उन्होंने गृह मंत्री और सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। उनका संसदीय योगदान हमेशा अनुकरणीय और समृद्ध अंतर्दृष्टि से भरा रहा है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6860" aria-describedby="caption-attachment-6860" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-10.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6860" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-10.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-10-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-10-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-10-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6860" class="wp-caption-text">भारत रत्न मोरारजी देसाई</figcaption></figure>
<p>उन्होंने यह भी कहा था कि &#8220;आडवाणी जी की सार्वजनिक जीवन में दशकों पुरानी सेवा को पारदर्शिता और अखंडता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता द्वारा चिह्नित किया गया है, जिसने राजनीतिक नैतिकता में एक अनुकरणीय मानक स्थापित किया है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान को आगे बढ़ाने की दिशा में अद्वितीय प्रयास किए हैं। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना मेरे लिए बहुत भावुक क्षण है। मैं इसे हमेशा अपना सौभाग्य मानूंगा कि मुझे उनके साथ बातचीत करने और उनसे सीखने के अनगिनत अवसर मिले।&#8221;</p>
<p><strong>फिर आये कर्पूरी ठाकुर। यह सामाजिक अभियंत्रण का एक मिशाल था। लोगबाग इसे राजनीति तो कहते ही हैं क्योंकि भाजपा बहुत दिनों तक जनता दल (यूनाइटेड) के साथ नहीं चल सकती हैं बिहार में। उसे अगर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान और साख है, तो बिहार में भी बनाना होगा। कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर बिहार में पिछड़ों और अब चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर जाट समुदाय को अपने छाते में ले आये । दिलचस्प बात है कि दोनों समुदाय अपने-अपने इस नायक को भारत रत्न देने की मांग सालों से कर रहे थे और दोनों से जुड़े समुदाय पिछले कुछ दिनों तक बीजेपी से दूर थे। आप माने अथवा नहीं, मोदी नीतीश कुमार को शीघ्रातिशीघ्र &#8216;सत्ता के सिंहासन&#8217; से जाते हुए देखना चाहते हैं ताकि भाजपा अपना झंडा गाड़ सके। वैसे बिहार में सुशील मोदी के बाद भाजपा को मजबूत करने वाला कोई नहीं है, नेतृत्व की किल्लत है, आतंरिक मन-मुटाव तो है ही; तथापि नरेंद्र मोदी अपनी साख के आधार पर बिहार को भाजपा के लिए जितना चाहते हैं। </strong></p>
<figure id="attachment_6861" aria-describedby="caption-attachment-6861" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6861" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-15-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6861" class="wp-caption-text">भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री</figcaption></figure>
<p>लेकिन विगत बजट सत्र में संसद में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को शिवहर लोकसभा की सांसद श्रीमती लवली आनंद ने दोनों को एक ही तराजू पर तौलते &#8216;इतिहास पुरुष&#8217; कहकर अलंकृत कर दीं &#8211; चमचागिरी का पराकाष्ठा देखने को मिला। संसद के बाहर तो विद्वान-विदुषी यह भी चर्चा करते सुने गए कि &#8216;यह एक गहन राजनीतिक ही नहीं, &#8216;गहन&#8217; सामाजिक शोध का विषय है।&#8217; नरेंद्र मोदी की तुलना नितीश कुमार से करना, वही भी जो जीवन पर्यन्त राजनीतिक बैशाखी&#8217; पर चले। ओह !! इतना ही नहीं, हद तो तब पार कर दी जब नीतीश कुमार को भारत रत्न से अलंकृत करने के लिए भी मांग की । सत्र के चौथे दिन संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी भारत रत्न की मांग की। उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भारत रत्न दिए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले भी ऐसा हो चुका है। लवली आनंद ने कहा कि नीतीश कुमार के 2005 में बिहार का मुख्यमंत्री बनने से पहले क्या स्थिति थी अगर कोई घर से निकलता था तो वापस लौटकर आएगा या या नहीं, ये भी नहीं पता होता था।</p>
<blockquote><p>बहरहाल,पंकज वोहरा का कहना है कि &#8216;आश्चर्य की बात यह है कि सरकार ने अभी तक यह घोषणा क्यों नहीं की है कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाना चाहिए। वे इसके सच्चे हकदार हैं और उन्हें यह सम्मान दिया जाना उन परंपराओं के अनुसार होगा, जहां पिछले दो प्रधानमंत्रियों को इसी तरह सम्मानित किया गया था, जबकि वे अभी भी इस प्रतिष्ठित पद पर थे।&#8221;</p></blockquote>
<figure id="attachment_6862" aria-describedby="caption-attachment-6862" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-11.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6862" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-11.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-11-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-11-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-11-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6862" class="wp-caption-text">​भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी</figcaption></figure>
<p>वोहरा के अनुसार, संदर्भ पंडित जवाहरलाल नेहरू का है, जिन्हें 1955 में इस सम्मान के लिए चुना गया था, और इंदिरा गांधी का, जिन्हें 1971 में भारत द्वारा निर्णायक युद्ध में पाकिस्तान को हराने के तुरंत बाद बांग्लादेश के निर्माण के बाद यह सम्मान दिया गया था। दोनों ही इस सम्मान के लिए उपयुक्त विकल्प थे, और इसलिए इस मुद्दे पर कभी कोई बहस नहीं हो सकती। इसी तरह, अगर मोदी को भी यह पुरस्कार दिया जाता है तो कभी कोई सवाल नहीं उठेगा। वे एक मजबूत और निर्णायक नेता रहे हैं, जिन्होंने देश में स्थिरता लाई है, और उनकी कई योजनाओं के परिणामस्वरूप आम नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। मोदी अकेले ही भारत को विश्व मानचित्र पर उस तरह से स्थापित करने के लिए जिम्मेदार हैं, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। प्रवासी भारतीयों में उनके असंख्य प्रशंसक हैं और दुनिया भर के कई शासनाध्यक्षों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों के कारण मोदी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए नई उपलब्धियां हासिल की हैं। </p>
<p>नेहरू और इंदिरा गांधी दोनों को ही उस समय के राष्ट्रपतियों ने भारत रत्न से सम्मानित किया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को भारत रत्न देने का बीड़ा उठाया था और 16 साल बाद वी.वी. गिरि ने इंदिरा गांधी को भारत रत्न देने का बीड़ा उठाया था। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि केंद्रीय मंत्रिपरिषद की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति एकतरफा फैसला नहीं कर सकते। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी मंजूरी पहले नहीं ली गई थी और अब भी इसकी जरूरत नहीं है। इस घोषणा को कोई चुनौती नहीं दे सकता, क्योंकि मौजूदा नेताओं में कोई ऐसा नहीं है, जिसे प्रधानमंत्री से आगे माना जा सके। </p>
<figure id="attachment_6863" aria-describedby="caption-attachment-6863" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-14.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6863" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-14.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-14-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-14-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-14-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6863" class="wp-caption-text">भारत रत्न राजीव गांधी</figcaption></figure>
<p>मोदी ने अपने दस साल के कार्यकाल में भारत को बदल दिया है, और उनके सबसे कटु आलोचक भी यह स्वीकार करेंगे कि हाल के दिनों में ऐसा कोई नेता नहीं हुआ, जिसका नीति निर्माण और निर्णयों पर इतना पूर्ण नियंत्रण रहा है, जिसका उद्देश्य समग्र भलाई हो। हां, कुछ विवादास्पद मुद्दे भी उठे हैं, लेकिन सरकार के पास पिछले चुनावों से पहले पार्टी के घोषणापत्र में किए गए वादों के कारण उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अच्छे तर्क हैं। मोदी के लिए भारत रत्न की सिफारिश करने वाला प्रस्ताव भी दोनों सदनों में पारित होना चाहिए, हालांकि राष्ट्रपति का निर्णय ही पर्याप्त होगा। यह सम्मान विदेशों में भारत की छवि को और निखारेगा क्योंकि सरकार के मुखिया को यह पुरस्कार एक मजबूत और स्पष्ट संदेश देगा कि देश अपने सर्वोच्च नेता का बहुत सम्मान करता है।</p>
<figure id="attachment_6867" aria-describedby="caption-attachment-6867" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-6.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6867" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-6.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-6-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-6-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-6-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6867" class="wp-caption-text">भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी</figcaption></figure>
<p><strong>वोहरा का कहना है कि पुरस्कारों की यह आलोचना भी होती है कि वे अपने समय को देखते हुए राजनीतिक उद्देश्यों के लिए दिए गए थे। यह सही नहीं है क्योंकि भारत रत्न चुनाव जीतने में मदद नहीं कर सकते। चुनावी मैदान में मुकाबला केवल बेहतर रणनीति और जमीनी स्तर पर पार्टी के काम के आधार पर बेहतर कार्यक्रमों के जरिए ही जीता जा सकता है। कांग्रेस के पिछड़ने का कारण यह है कि वह अपने संगठन को मजबूत करने और अपने मूल वोट आधार को वापस पाने में विफल रही है। यह अतीत की अपनी कई उपलब्धियों को उजागर करने में भी विफल रही है और एक दोषपूर्ण नेतृत्व मॉडल के कारण, लगभग अप्रासंगिक हो गई है। यह वापसी कर सकती है लेकिन इसके लिए उसे काम करना होगा। </strong></p>
<figure id="attachment_6864" aria-describedby="caption-attachment-6864" style="width: 275px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/pankaj.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/pankaj.jpg" alt="" width="275" height="275" class="size-full wp-image-6864" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/pankaj.jpg 275w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/pankaj-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/pankaj-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/pankaj-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/pankaj-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 275px) 100vw, 275px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6864" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक पंकज वोहरा</figcaption></figure>
<p>मोदी को भारत रत्न देना चुनावों में कोई मुद्दा नहीं होगा क्योंकि प्रधानमंत्री ने वह सब कुछ कर दिखाया है जो उनके कई पूर्ववर्ती नहीं कर पाए। इससे दुनिया भर में उनके चाहने वाले खुश होंगे। ऐसे कई लोग हो सकते हैं जो उनके तरीकों से सहमत न हों लेकिन कोई भी इस बात पर विवाद नहीं कर सकता कि उनका उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों को लाभ पहुंचाना था। राजनीति व्यवस्था का एक अनिवार्य घटक है लेकिन भारत रत्न उनके द्वारा किए गए सभी कार्यों को स्वीकार करने का एक उचित संकेत होगा। हम दोनों के बीच। </p>
<p>बहरहाल, भारत रत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है जो किसी क्षेत्र में असाधारण और सर्वोच्च सेवा को मान्यता देने के लिये दिया जाता है. यह सम्मान राजनीति, कला, साहित्य, विज्ञान के क्षेत्र में किसी विचारक, वैज्ञानिक, उद्योगपति, लेखक और समाजसेवी को दिया जाता है। भारत  रत्न सम्मान के लिए चुने जाने की प्रक्रिया पद्म पुरस्कारों से अलग होती है। इसमें भारत के प्रधानमंत्री भारत रत्न के लिए किसी व्यक्ति के नाम की सिफारिश राष्ट्रपति को करते हैं। कोई भी व्यक्ति जाति, पेशा, पद या लिंग के आधार पर अंतर किए बिना इस पुरस्कार के लिए योग्य माना जा सकता है।  एक साल में सिर्फ़ तीन भारत रत्न ही दिए जाते हैं। साथ ही ये भी ज़रूरी नहीं कि हर साल भारत रत्न सम्मान दिया ही जाए। </p>
<figure id="attachment_6865" aria-describedby="caption-attachment-6865" style="width: 1429px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-12.jpg" alt="" width="1429" height="1161" class="size-full wp-image-6865" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-12.jpg 1429w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-12-300x244.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-12-1024x832.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-12-768x624.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1429px) 100vw, 1429px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6865" class="wp-caption-text">भारत रत्न चौधरी चरण सिंह</figcaption></figure>
<p><strong>भारत रत्न देने की शुरुआत 2 जनवरी, 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की थी। सबसे पहला सम्मान स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन और वैज्ञानिक डॉक्टर चंद्रशेखर वेंकट रमन को 1954 में दिया गया। 1954 में ये सम्मान केवल जीवित रहते दिया जाता था, लेकिन 1955 में मरणोपरांत भी भारत रत्न दिये जाने का प्रावधान जोड़ा गया। 2013 में पहली बार खेल के क्षेत्र में सर्वोच्च योगदान/प्रदर्शन करने के लिए भी भारत रत्न देने का निर्णय लिया गया।  इसके बाद 2014 में क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को इस सम्मान से नवाज़ा गया था।  यह पुरस्कार गैर भारतीयों को भी दिया जा सकता है &#8211; मदर टेरेसा को 1980 में भारत रत्न दिया गया था।  स्वतंत्रता सेनानी ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान (स्वतंत्रता से पहले भारत में जन्मे और बाद में पाकिस्तान गए) और दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला भी इस सम्मान से नवाज़े जा चुके हैं।</strong> </p>
<figure id="attachment_6868" aria-describedby="caption-attachment-6868" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-16.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-16.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6868" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-16.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-16-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-16-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-16-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/BR-16-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6868" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी</figcaption></figure>
<p>इतिहास में दो बार इस पुरस्कार को कुछ समय के लिए निलंबित किया गया था। पहली घटना 1977 में चौथे प्रधानमंत्री के रूप में मोरारजी देसाई के शपथ ग्रहण के ठीक बाद हुई थी। 13 जुलाई 1977 को उनकी सरकार ने सभी व्यक्तिगत नागरिक सम्मान वापस ले लिए। 25 जनवरी 1980 को इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद निलंबन वापस ले लिया गया। दूसरी घटना 1992 के मध्य में फिर हुई जब केरल उच्च न्यायालय और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसके खिलाफ दो जनहित याचिकाएं दायर कीं, जिसमें पुरस्कार की &#8220;संवैधानिक वैधता&#8221; को चुनौती दी गई। दिसंबर 1995 में, मुकदमे के समापन के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से पुरस्कारों को फिर से पेश किया। </p>
<figure id="attachment_6869" aria-describedby="caption-attachment-6869" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_amit_shah.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_amit_shah.jpg" alt="" width="2200" height="1629" class="size-full wp-image-6869" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_amit_shah.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_amit_shah-300x222.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_amit_shah-1024x758.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_amit_shah-768x569.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_amit_shah-1536x1137.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/rsz_amit_shah-2048x1516.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6869" class="wp-caption-text">गृहमंत्री अमित शाह</figcaption></figure>
<blockquote><p>चाहिए तो यह की मंत्रिमंडल के सभी लोग, भाजपा शासित और भाजपा समर्थित राज्य, लोक सभा राज्य सभा के सांसद, विधायक एक आवाज से इस बात का समर्थन करें की मोदी जी भारत रत्न मिले। वैसे मोदी जी के 11-साल पर उनके नेतृत्व वाली सरकार और मंत्रालय मंत्री द्वारा जो भी शब्द लिखे जाते हैं, बोले जाते हैं, शब्दों की शुरुआत और अंत मोदी जी के बिना हो ही नहीं सकता। आज मोदी जी भारत ही नहीं, वैश्विक स्तर पर इकलौता पहचान बन गए हैं भारत का &#8211; फिर भारत रत्न अलंकरण की घोषणा में विलंब क्यों? वैसे भी को नौ पूर्व प्रधान मंत्रियों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत किया गया है, उनमें से मोदी की छवि और उनकी ऊंचाई किसी से कम तो नहीं है। चाहिए तो यह भी गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह की अगुवाई में संसद में मोदी जी को भारत रत्न अलंकरण से संबंधित प्रस्ताव लाया जाए या फिर राष्ट्रपति स्वयं इस दिशा में पहल कर भारत रत्न ताज को प्रधानमंत्री के माथे पर रख दें।</p></blockquote>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/10-out-of-15-prime-ministers-have-been-decorated-with-bharat-ratna-then-not-narendra-modi">अब तक 15 &#8216;प्रधान मंत्रियों&#8217; में 10 &#8216;भारतरत्न&#8217; से &#8216;अलंकृत&#8217;, फिर 11वां अलंकरण प्रधानमंत्री &#8216;नरेंद्र मोदी&#8217; को क्यों नहीं ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ​का &#8216;एकात्म मानववाद दर्शन​&#8217;​, शिवराज चौहान की प्रस्तुति, भाजपा के 240 सांसदों में 95 % सहित लोकसभा में 504 ​सांसदों का करोड़पति होना</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Jun 2025 12:33:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[cropati]]></category>
		<category><![CDATA[deenadayal upadhyay]]></category>
		<category><![CDATA[member of parliament]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अजमेर (राजस्थान) / नई दिल्ली : विगत दिनों राजस्थान के अजमेर शहर में था। बजरंग नाथ सर्किल के पास पहाड़ी पर स्थित अंग्रेजों द्वारा बनाये गए सर्किट हॉउस के रास्ते के दाहिने हाथ जनसंघ के सह-संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की प्रतिमा को देखकर शरीर स्वयं स्थिर हो गया। मन और आत्मा से नमन हेतु [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अजमेर (राजस्थान) / नई दिल्ली : विगत दिनों राजस्थान के अजमेर शहर में था। बजरंग नाथ सर्किल के पास पहाड़ी पर स्थित अंग्रेजों द्वारा बनाये गए सर्किट हॉउस के रास्ते के दाहिने हाथ जनसंघ के सह-संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की प्रतिमा को देखकर शरीर स्वयं स्थिर हो गया। मन और आत्मा से नमन हेतु आँखें स्वतः बंद हो गयी। कुछ क्षण रुका। चतुर्दिक देखा। राजस्थान से दिल्ली सल्तनत तक सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोगों को भी एक बार देखा और उसी नजर से जब पंडित दीनदयाल जी की प्रतिमा को, आस-पास के परिवेश को देखा तो आँखें अश्रुपूरित हो गयी, क्योंकि जो स्थिति देखा उसके हकदार नहीं थे पंडित दीनदयाल जी। राजाओं का राज्य कहा जाने वाला राजस्थान 30 मार्च, 1949 को एक राज्य के रूप में अपने अस्तित्व में आया। आज प्रदेश की सरकार 16वीं विधानसभा के रूप में गठित है। खैर। </strong></p>
<p>विगत दिनों केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान नई दिल्ली स्थित कन्वेंशन सेंटर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के “एकात्म मानववाद” दर्शन पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि आज दुनिया के सामने जितनी समस्याएं हैं, उसका समाधान अगर कहीं है तो एकात्म मानव दर्शन में है। एकात्म मानव दर्शन बहुत क्लिष्ट दर्शन नहीं है, भारतीय चिंतन का निचोड़ है। अवसर था उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद का 60 वीं वर्षगांठ। इस अवसर शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि &#8220;पंडित जी ने अर्थ की आवश्यकता पर भी बल दिया था। जीवन जीने के लिए व बुनियादी सुविधाओं की पूर्ति के लिए अर्थ का भी महत्व है। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी जरूरतों की पूर्ति के लिए भी धन की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन अर्थ एक ऐसी जरूरत है, जिसका ना तो ज्यादा अभाव ही सही है और ना ही इसका ज्यादा प्रभाव उचित है। </p>
<p><strong>उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2004 लोकसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान अपनी कुल संपत्ति 58 लाख घोषित किये थे जो 2008 के चुनाव में बढ़कर 1.23 करोड़ हो गया। 2013 में यह राशि 6. 27 करोड़, 2018 में 7. 66 करोड़ और विगत 2024 के चुनाव में यह घोषित राशि 8. 98 करोड़ बताया गया। चौहान साहब के अलावे अगर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की एक रिपोर्ट को देखते हैं तो 18वीं लोकसभा में निर्वाचित 543 प्रतिनिधियों में से आश्चर्यजनक रूप से 504 करोड़पति हैं। 2024 के चुनावों में लड़ने वाले हर तीन उम्मीदवारों में से एक करोड़पति थे, और विजेताओं में, यह संख्या दस में से नौ से थोड़ी अधिक थी। 2009 के चुनावों में, चुने गए प्रतिनिधियों में से 58 प्रतिशत करोड़पति थे; 2014 में, यह संख्या बढ़कर 82 प्रतिशत हो गई। 2019 में यह 88 प्रतिशत था, और इस बार 93 प्रतिशत। </strong></p>
<figure id="attachment_6692" aria-describedby="caption-attachment-6692" style="width: 1312px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-111.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-111.jpg" alt="" width="1312" height="945" class="size-full wp-image-6692" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-111.jpg 1312w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-111-300x216.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-111-1024x738.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-111-768x553.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1312px) 100vw, 1312px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6692" class="wp-caption-text">दीनदयाल उपाध्याय जी के “एकात्म मानववाद” दर्शन पर बोलते चौहान साहब</figcaption></figure>
<p>सैद्धांतिक रूप में दीनदयाल उपाध्याय जी के “एकात्म मानववाद” दर्शन पर बोलते चौहान साहब कहते हैं कि दुनिया में पहले राजतंत्र था, फिर लोगों ने कहा कि एक राजा ही क्यों रहे और स्वतंत्रता, समानता, विश्वबंधुत्व के मंत्र पर राजतंत्र या तो समाप्त कर दिए गए या उनके अधिकार बहुत सीमित कर दिए गए। पं. दीनदयाल उपाध्याय जी ने कहा, पश्चिम की नकल मत करो, क्या हमारे देश के पास कोई ऐसा दर्शन है, जिसके आधार पर हम समाज और राज्य जीवन की रचना कर सकें। तभी पंडित दीनदयाल जी ने प्रस्तुत किया एकात्म मानव दर्शन! मानववाद के विभिन्न स्वरूपों की विवेचना करते हुए चौहान ने कहा कि न्यूटन ने खोज की थी कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति होती है, जिसकी वजह से ऊपर की चीज़ें जमीन पर गिरती है। इस खोज के बाद न्यूटन को जो सुख मिला, उसे ही बुद्धि का सुख कहा जाता है। यह सिद्धांत की बात हुयी। </p>
<p>व्यवहार में, भारतीय जनता पार्टी के 240 विजेताओं में से 95 प्रतिशत करोड़ पति है। कांग्रेस पार्टी, जिसने 99 सीटें जीतीं, 92 विजेता करोड़पति हैं। तेलुगु देशम पार्टी के सभी 16 विजेता और जनता दल (यूनाइटेड) के 12 विजेता करोड़पति हैं। तेलगु देशम पार्टी और जनतादल (यूनाइटेड) डॉन भाजपा के साथ सरकार में है। वर्तमान केंद्र सरकार में करोड़पतियों की संख्या 90 प्रतिशत से अधिक है। सांसदों की औसत संपत्ति पिछले 15 वर्षों में उनकी औसत संपत्ति में सात गुना से अधिक की वृद्धि हुई है, जो 2009 में 5.35 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024 में 46.34 करोड़ रुपये हो गई है। 2024 में टीडीपी के लोकसभा विजेता की औसत संपत्ति 442 करोड़ रुपये थी। भाजपा के सांसदों की औसत संपत्ति 50 करोड़ रुपये और कांग्रेस के सांसदों की 23 करोड़ रुपये थी। खैर ,यह तो व्यवहार की बात है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-1.jpg" alt="" width="1401" height="1781" class="aligncenter size-full wp-image-6691" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-1.jpg 1401w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-1-236x300.jpg 236w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-1-806x1024.jpg 806w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-1-768x976.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-1-1208x1536.jpg 1208w" sizes="auto, (max-width: 1401px) 100vw, 1401px" /></a></p>
<p><strong>TDP के चंद्रशेखर पेम्मासानी 2024 के लोकसभा चुनावों में चुने गए सबसे अमीर सांसद हैं, जिनकी कुल संपत्ति 5,705 करोड़ रुपये से अधिक है। भारतीय जनता पार्टी के कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी 4,568 करोड़ रुपये से अधिक की घोषित संपत्ति के साथ दूसरे सबसे अमीर सांसद हैं। कल के कांग्रेसी और आज के भाजपा के नवीन जिंदल की कुल संपत्ति 1,241 करोड़ रुपये से अधिक है। टीडीपी के प्रभाकर रेड्डी 716 करोड़ रुपये से अधिक की कुल संपत्ति के मालिक हैं। भाजपा के ही सीएम रमेश अपने चुनावी हलफनामे में कुल 497 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति घोषित की। कल के कांग्रेसी और आज के भाजपा के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कुल 424 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति घोषित की थी। कांग्रेस के छत्रपति शाहू महाराज अपनी कुल संपत्ति 342 करोड़ रुपये से अधिक घोषित की थी। टीडीपी के श्री भारत मथुकुमिली की कुल संपत्ति 298 करोड़ रुपये से अधिक है। भाजपा की हेमा मालिनी की कुल संपत्ति 278 करोड़ रुपये से अधिक है। कांग्रेस की प्रभा मल्लिकार्जुन के पास कुल 241 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है।</strong> </p>
<p>हमारा विश्वास है कि ये सभी करोड़पति राजनेता शायद दीनदयाल उपाध्याय जी के “एकात्म मानववाद” दर्शन का शब्दार्थ समझ पाएंगे अथवा नहीं, यह भी एक गहन शोध का विषय है। खैर। व्याख्यान में मंत्री जी कहा कि &#8216;एकात्म मानववाद का एक ही सूत्र है और वह है एक चेतना। प्रकृति में भी यही चेतना विराजमान है। इसी के अंतर्गत वृक्षारोपण के महाभियान से सभी को जुड़ते हुए एक पेड़ मां के नाम जरूर लगाना चाहिए। प्रकृति का शोषण नहीं, दोहन करें। पेड़ पूजनीय है। धरती केवल मनुष्य मात्र के लिए नहीं हैं, धरती पर सभी प्राणियों का बराबर हक है, जिसकी हमें चिंता करनी है।&#8217; और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में जितने भी कार्य हुए हैं, हो रहे हैं उसकी गिनती शुरू कर दिए। और अंत में कहते हैं कि &#8216;सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता के सामंजस्य के साथ हम आगे बढ़ेंगे तथा पुरानी नींव को ही आधार बनाते हुए नए भारत का निर्माण करेंगे और विश्व का मार्गदर्शन करेंगे।&#8217;</p>
<p><strong>वैसे भारतीय जनता पार्टी संविधान की धारा तीन के अन्तर्गत ‘एकात्मक मानववाद’ भाजपा का मूल दर्शन है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने सुदीर्घ चिन्तन, अध्ययन एवं मनन के बाद सन् 1964-65 में विचारधारा के नाते इसका प्रणयन किया। पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन ने मानव को ‘सेक्यूलरवाद, व्यक्तिवाद (पूंजीवाद) समाजवाद एवं साम्यवाद की विचार धाराएं दी थीं। स्वतंत्र भारत का नेतृत्व भी इन्हीं वादों में भारत का भविष्य खोज रहा था। दीनदयाल जी ने इस खोज में हस्तक्षेप करते हुए यह सवाल खड़ा किया कि जब हमने पाश्चात्य साम्राज्यवाद को नकार दिया, तब अब हमारी क्या मजबूरी है कि हम पाश्चात्य वादों का अनुगमन करें। सामान्यतः भारत के राजनैतिक क्षेत्र में स्थापित सभी दल यह सोचते थे कि हमें कुछ संशोधनों के साथ इन पाश्चात्य वादों को ही स्वीकारना पडे़गा क्योंकि हमारे पास कोई अन्य चिंतन नहीं है। हम तो राष्ट्र थे ही नहीं। पाश्चात्यों ने ही आकर हमको राष्ट्र बनने के लिए तैयार किया है। उनका विचार है हम राष्ट्र बनने जा रहे हैं या हम नवोदित राष्ट्र है, आदि आदि।</strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-5.jpg" alt="" width="1397" height="948" class="aligncenter size-full wp-image-6693" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-5.jpg 1397w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-5-300x204.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-5-1024x695.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-5-768x521.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1397px) 100vw, 1397px" /></a></p>
<p>भारतीय जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी भारत को प्राचीन एवं सनातन राष्ट्र मानती है। पश्चिम की राष्ट्र-राज्य परिकल्पना से पुरानी कल्पना भारत के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की है। भारतीय संस्कृति की एक गौरव सम्पन्न ज्ञान-परम्परा हैं हमें इसी ज्ञान-परम्परा में भारत का भविष्य खोजना चाहिए। मानव की तरफ देखने की पाश्चात्य दृष्टि खण्डित हैं उनका व्यक्तिवाद, समाजवाद का दुश्मन है तथा समाजवाद, व्यक्तिवाद का शत्रु है। वे प्रकृति पर मानव की विजय चाहते हैं, इस प्रकार यहां भी प्रकृति बनाम मानव उनका समीकरण है। एकात्मता, समग्रता में निहित रहती है। समग्रता के अभाव में खण्ड दृष्टि से मानव आक्रांत होता है। जैसे ब्रह्माण्ड की समग्रता है, वैसे ही व्यक्ति की भी समग्रता है। व्यक्ति अर्थात केवल शरीर नहीं, उसके पास मन है, बुद्धि है और आत्मा भी है। यदि इन चारों में से एक की भी उपेक्षा हो जाये तो व्यक्ति का सुख विकलांग हो जायेगा। इन चारों के पृथक पृथक सुख से व्यक्ति सुखी नहीं होता, उसे तो एकात्म एवं धनीभूत सुख चाहिये। जिसे आनंद कहते है। वैसे ही समाज केवल सरकार नहीं है, उसकी अपनी संस्कृति है, जन एवं देश है। बहुत सी अच्छी बातें लिखी है।</p>
<blockquote><p>एक दूसरे पक्ष पर चलते हैं। भारतीय राजनीति में ऐसे कई नेता हुए हैं जिन्होंने बहुत ऊँचे मुकाम और लोकप्रियता हासिल की। हालांकि, उनकी सफलता ज्यादा दिन नहीं टिक पाई क्योंकि वे अचानक दुनिया से चले गए। दीनदयाल उपाध्याय सहित संजय गांधी, लाल बहादुर शास्त्री या श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं की मौत के बाद कई सवाल अनुत्तरित रह गए। कुछ लोगों ने इसे आकस्मिक बताया जबकि कुछ ने राजनीतिक। </p></blockquote>
<p>भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक दीन दयाल उपाध्याय ने 1953 में <strong>श्यामा प्रसाद मुखर्जी</strong> की रहस्यमयी मौत के बाद उनका स्थान लिया। एक ज्योतिषी के बेटे, वे जनसंघ में प्रवेश करने से पहले एक सक्रिय आरएसएस कार्यकर्ता थे। उपाध्याय ने 1953 से 1968 में अपनी रहस्यमयी मौत तक जनसंघ का नेतृत्व किया। वे उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन की रेल पटरियों पर मृत पाए गए थे। धीमी पुलिस जांच के कारण भारी आक्रोश के बाद, मामला सीबीआई को सौंप दिया गया, जिसने दावा किया कि उपाध्याय की हत्या पटना जाने वाली ट्रेनों में ट्रेन लुटेरों या सामान उठाने वालों ने की थी। हालांकि, उनकी मौत के इर्द-गिर्द कई षड्यंत्र सिद्धांत हैं। जब जनता पार्टी सत्ता में थी, तो सुब्रमण्यम स्वामी ने तत्कालीन गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह से मौत की जांच के लिए एक पैनल गठित करने का आग्रह किया था। हालांकि एक आयोग का गठन किया गया था, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। हालांकि, अनुभवी नेता बलराज मधोक ने दावा किया कि उनके प्रतिद्वंद्वियों अटल बिहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख ने उपाध्याय की मौत की जांच को बार-बार विफल किया था। </p>
<figure id="attachment_6694" aria-describedby="caption-attachment-6694" style="width: 885px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Shyama-Prasad-Mukherjee_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Shyama-Prasad-Mukherjee_1.jpg" alt="" width="885" height="497" class="size-full wp-image-6694" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Shyama-Prasad-Mukherjee_1.jpg 885w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Shyama-Prasad-Mukherjee_1-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Shyama-Prasad-Mukherjee_1-768x431.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 885px) 100vw, 885px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6694" class="wp-caption-text">श्यामा प्रसाद मुखर्जी</figcaption></figure>
<p>अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की “मृत्यु” से सम्बंधित “दस्तावेज” विभिन्न कारणों से “पुनः खुल सकते” हैं, लाल-कपडे में बँधे फाईलों के ऊपर जमी मिट्टी की परतों को झाड़ा-पोछा जा सकता है, सत्य और सत्यता की खोज के लिए; तो फिर दीनदयाल उपाध्याय जी की “मृत्यु” से सम्बन्धित दस्तावेजों को, फाईलों को, कमिटी, कमीशन के निर्णयों को, न्यायालय के अन्तिम शब्दों को “पुनः” क्यों नहीं “जाँचा” जा सकता हैं? कहीं श्री दीनदयाल उपाध्याय की “मृत्यु” “राजनीतिक हत्या” तो नहीं थी ? इसकी जांच का आदेश आधुनिक भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में सिर्फ और सिर्फ प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर मोदी ही दे सकते हैं क्योंकि मोदी जी पर पार्टी सहित भारत के लोगों का अटूट विश्वास है। स्टेशन का नाम बदलने से, गाँव का नामकरण करने से सच तो नहीं सामने आएगा !! </p>
<p>क्योंकि, सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के दूर-दरस्त इलाकों में भी स्थापित दीनदयाल उपाध्याय जी की प्रतिमाओं को सम्मानित होने का उतना ही अधिकार है, जितना दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में उनकी प्रतिमा पर लोगों के विशालकाय श्रृंखला द्वारा पुष्पांजलि प्राप्त करने का। परन्तु ऐसा होता नहीं – यह दुखद है। भारत के लोगों को राजनीति से अलग एक मानवीय सोच भी रखना होगा राष्ट्र के उन तमाम सुधारकों के प्रति, चाहे उनका योगदान सामाजिक उत्थान में हो, आर्थिक रूप से राष्ट्र की नींव को मजबूत करने के लिए हो, न्यायिक व्यवस्था को देश के प्रत्येक नागरिकों के दरवाजे तक बिना किसी भेदभाव के पहुँचाने में हो।</p>
<figure id="attachment_6695" aria-describedby="caption-attachment-6695" style="width: 900px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/lalit.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/lalit.png" alt="" width="900" height="630" class="size-full wp-image-6695" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/lalit.png 900w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/lalit-300x210.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/lalit-768x538.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/lalit-100x70.png 100w" sizes="auto, (max-width: 900px) 100vw, 900px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6695" class="wp-caption-text">ललित नारायण मिश्र</figcaption></figure>
<p>इसी तरह, इंदिरा गांधी की कैबिनेट में रेल मंत्री रहे <strong>ललित नारायण मिश्र</strong> की 2 जनवरी, 1975 को बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट में मारे गए । आज 50 साल से भी ज़्यादा समय बीत गया। दिल्ली की एक अदालत ने हत्या के लिए चार लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। लेकिन मिश्र की हत्या ने विवाद को जन्म दिया। भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध के दौरान भारत का नेतृत्व किया। 10 जनवरी, 1966 को, उन्होंने रूसी (तब सोवियत संघ) के प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन द्वारा आयोजित एक शिखर सम्मेलन के लिए ताशकंद में पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल अयूब खान से मुलाकात की। दोनों देशों के बीच एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गए और दोनों सेनाएं युद्ध के बाद अपनी मूल स्थिति में वापस जाने के लिए सहमत हुईं। हालांकि, 10-11 जनवरी की रात को शास्त्री की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री की मौत कई दिल के दौरे से हुई। हालांकि, उनकी पत्नी ने दावा किया कि उनका शरीर नीला पड़ गया था और जगह-जगह कट के निशान थे। </p>
<figure id="attachment_6697" aria-describedby="caption-attachment-6697" style="width: 1312px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-10Shastri.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-10Shastri.jpg" alt="" width="1312" height="945" class="size-full wp-image-6697" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-10Shastri.jpg 1312w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-10Shastri-300x216.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-10Shastri-1024x738.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-10Shastri-768x553.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1312px) 100vw, 1312px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6697" class="wp-caption-text">लाल बहादुर शास्त्री का पार्थिव शरीर</figcaption></figure>
<p>उसी &#8216;आकस्मिक मृत्यु&#8217; की कड़ी में <strong>संजय गांधी</strong> का भी नाम है। 33 वर्ष की छोटी उम्र में, संजय गांधी का निधन 23 जून, 1980 को राष्ट्रीय राजधानी में एक भयानक हवाई दुर्घटना में हुआ था। उन्हें इंदिरा गांधी का उत्तराधिकारी माना जाता था, जो छह महीने पहले लोकसभा चुनावों में शानदार जीत के बाद सत्ता में लौटी थीं। कई लोगों ने दुर्घटना की प्रकृति पर सवाल उठाए थे, क्योंकि विमान ने जमीन पर गिरने से पहले एक अप्राकृतिक मोड़ लिया था। </p>
<p>1951 में, <strong>श्यामा प्रसाद मुखर्जी</strong> ने जवाहर लाल नेहरू सरकार से उद्योग और नागरिक आपूर्ति मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े प्रचारकों (स्वयंसेवकों) की मदद से अपनी नई पार्टी, भारतीय जनसंघ (बीजेएस) की शुरुआत की। कहते हैं मुखर्जी चाहते थे कि नेहरू पाकिस्तान से ज़मीन की मांग करें ताकि पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल में पलायन करने वाले लगभग 10 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास किया जा सके। उन दिनों, भारत के अन्य हिस्सों से लोगों को जम्मू और कश्मीर में प्रवेश करने के लिए परमिट की आवश्यकता होती थी। जनसंघ के संस्थापक ने जम्मू और कश्मीर के भारत के साथ पूर्ण एकीकरण का आह्वान किया और परमिट नियम को चुनौती देने का फैसला किया। उन्होंने कुछ स्वयंसेवकों के साथ 1953 में कश्मीर में प्रवेश किया, जहाँ उन्हें राज्य पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। 23 जून, 1953 को, मुखर्जी की रहस्यमय परिस्थितियों में पुलिस हिरासत में मृत्यु हो गई। </p>
<p>गुजरात के पूर्व गृह मंत्री <strong>हरेन पंड्या</strong> की 26 मार्च, 2003 की सुबह उनकी कार में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वे अहमदाबाद के लॉ गार्डन इलाके में टहलने निकले थे। गुजरात उच्च न्यायालय ने 2011 में हत्या के मामले में मुख्य आरोपी सहित 12 लोगों को बरी कर दिया था। कभी मन करे जो श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम से अलंकृत दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में स्थित बत्रा सिनेमा परिसर के पास मुखर्जी साहब की प्रतिमा की दशा को देख लें। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-4.jpg" alt="" width="1397" height="948" class="aligncenter size-full wp-image-6696" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-4.jpg 1397w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-4-300x204.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-4-1024x695.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-4-768x521.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1397px) 100vw, 1397px" /></a></p>
<p>अजमेर में दीनदयाल उपाध्याय जी की प्रतिमा को देखकर प्रतिमा का इतिहास याद आ गया। कहते हैं &#8216;भारत में प्रतिमा विज्ञान एवं प्रतिमा कला या मूर्तिकला का जन्म तथा विकास एवं प्रोल्लास देवार्चा से पनपा। सभी ध्यानी, योगी, ज्ञानी नहीं हो सकते थे, अत: ‘भावना’ के लिये प्रतिमा की कल्पना हुई। कालांतर पाकर पौराणिक पूर्तधर्म (देवताय निर्माण, देव प्रतिष्ठा एवं देवार्चन) ने प्रतिमा निर्माण की परंपरा में महान योगदान दिया। देवी मंदिरों के निर्माण में न केवल गर्भगृह के प्रधान देवता के निर्माण की आवश्यकता हुई वरन् देवगृह के सभी अंगों, भित्तियों, शिखरों आदि पर भी प्रतिमाओं के चित्रणों का एक अनिवार्य अंग प्रस्फुटित हुआ। इस प्रकार प्रधान देवों के साथ साथ परिवार देवों तथा भित्ति देवताओं की भी प्रतिमाएं बनने लगीं। मंदिर की भित्तियाँ पौराणिक आख्यानों के चित्रणों से भी विभूषित होने लगीं। नाना उप लक्षणों, प्रतीकों की पूर्ति के लिये यक्ष, गंधर्व, किन्नर, कूष्माण्ड, ऋषिगण, वसुगण, शार्दूल, मिथुन, सुर, सुंदरी, वाहन, आयुध आदि भी चित्रित होने लगे जिनकी प्रतिमा भारतीय मूर्तिकला के समुज्ज्वल निदर्शन हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-8.jpg" alt="" width="1397" height="948" class="aligncenter size-full wp-image-6698" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-8.jpg 1397w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-8-300x204.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-8-1024x695.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-8-768x521.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1397px) 100vw, 1397px" /></a></p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि कुछ दिन पूर्व एक संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा था कि “हमारे शास्त्रों में कहा गया है- “स्वदेशो भुवनम् त्रयम्” अर्थात, अपना देश ही हमारे लिए सब कुछ है, तीनों लोकों के बराबर है। जब हमारा देश समर्थ होगा, तभी तो हम दुनिया की सेवा कर पाएंगे। एकात्म मानव दर्शन को सार्थक कर पाएंगे। दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी यही लिखा था-‘एक सबल राष्ट्र ही विश्व को योगदान दे सकता है।’ यही संकल्प आज आत्मनिर्भर भारत की मूल अवधारणा है। इसी आदर्श को लेकर ही देश आत्मनिर्भरता के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।”  प्रधानमंत्री ने कहा कि सामाजिक जीवन में एक नेता को कैसा होना चाहिए, भारत के लोकतंत्र और मूल्यों को कैसे जीना चाहिए, दीनदयाल जी इसके भी बहुत बड़ा उदाहरण हैं। एक ओर वो भारतीय राजनीति में एक नए विचार को लेकर आगे बढ़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर, वो हर एक पार्टी, हर एक विचारधारा के नेताओं के साथ भी उतने ही सहज रहते थे। हर किसी से उनके आत्मीय संबंध थे।&#8221; </strong></p>
<p>दीन दयाल जी मथुरा जिला के नागला चन्द्रवं गाँव में जन्म लिए। पिता एक ज्योतिषी थे और माँ एक कुशल द्रष्टा, खासकर हिन्दू प्रथा की। शिक्षा पिलानी (राजस्थान), कानपूर-आगरा (उत्तर प्रदेश) से प्राप्त किये। सं 1937 के करीब वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक के बी हेडगेवार जी से मिले। मुलाकात इनके जीवन-रेखा को कुछ अलग, कुछ करने की ओर मोड़ दी। बाद में ये पूर्णकालीन रूप से संघ से जुड़ गए और जीवन-पर्यन्त प्रचारक बन गए। जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी सन 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना किये, दीन दयाल जी कानपूर के महासचिव बने, फिर अखिल भारतीय महासचिव बनाये गए। लगभग 15 लगातार वर्षों तक वे महासचिव रहे। सं 1963 में वे जौनपुर लोक सभा क्षेत्र से चुनाव लड़े। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। सन 1967 के आम चुनाव में जनसंघ को कुल 35 सीट प्राप्त हुए और संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। समय बदलता गया।  श्री दीन दयाल जी जनसंघ के अध्यक्ष बने, साल 1967 था। ये पांचजन्य के संपादक भी रहे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-7.jpg" alt="" width="1397" height="948" class="aligncenter size-full wp-image-6689" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-7.jpg 1397w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-7-300x204.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-7-1024x695.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Deen-7-768x521.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1397px) 100vw, 1397px" /></a></p>
<p>राजनीतिक हवाएं बदल रही थी। श्री दीन दयाल जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बनने के महज दो महीने के अंदर ही 10 फरवरी, 1968 को सियालदह एक्सप्रेस ट्रेन से लखनऊ से पटना यात्रा हेतु ट्रेन पर सवार हुए। ट्रेन देर रात कोई 2.10 बजे मुगलसराय स्टेशन पहुँची। लेकिन दीनदयालजी उस ट्रेन में नहीं थे, अलबत्ता, उनका पार्थिव शरीर स्टेशन के ट्रेक्शन पोल संख्या 748 के पास पड़ी मिली। जीवन का समय यहाँ पूर्ण-विराम लगा दिया था। कहा जाता है वे अंतिम बार जीवित, सांस लेते जौनपुर स्टेशन पर देर रात देखे गए थे। मृत्युपरांत अनेकानेक अन्वेषण हुए, कमिटी बानी, कमीशन बनी, कुछ संदिग्ध पकड़ाए, कुछ संदिग्ध छोड़े गए, और अंततः क्या हुआ यह प्रश्न अनुत्तर रहा, आज तक। </p>
<p><strong>सन 1967 में जब दीनदयाल उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे, तत्कालीन आम चुनाव में कुल 35 सीट जीतकर भारतीय संसद में तीसरा नाम दर्ज किये । साल विगत लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत के संसद (लोकसभा) में भाजपा की संख्या 303 थी, आज लोकसभा में 240 और राज्यसभा में 90 सदस्य हैं &#8211; लेकिन दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांत और विचार &#8216;वास्तविक व्यवहारों से मीलों दूर है,&#8217; हम चाहे कुछ भी कह लें। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/95-of-the-240-bjp-mps-are-crorepati">पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ​का &#8216;एकात्म मानववाद दर्शन​&#8217;​, शिवराज चौहान की प्रस्तुति, भाजपा के 240 सांसदों में 95 % सहित लोकसभा में 504 ​सांसदों का करोड़पति होना</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>हरियाणा के युवा का आह्वान : &#8220;हमें अपनी गलतियों को सुधार कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ मजबूत करना होगा&#8221;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[रेणु जी]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 May 2025 12:55:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[hands]]></category>
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		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गोहना (हरियाणा) : हरियाणा के गोहाना विधानसभा क्षेत्र के युवा नेता पंडित परशुराम गौड़ अपने विधानसभा क्षेत्र के साथ-साथ सम्पूर्ण सोनीपत और हरियाणा के युवाओं को आह्वान किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने हेतु सभी क्षेत्रों के युवाओं को एक साथ मिलाकर आगे आना चाहिए। उनका कहाँ है कि युवा राष्ट्र [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गोहना (हरियाणा) : हरियाणा के गोहाना विधानसभा क्षेत्र के युवा नेता पंडित परशुराम गौड़ अपने विधानसभा क्षेत्र के साथ-साथ सम्पूर्ण सोनीपत और हरियाणा के युवाओं को आह्वान किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने हेतु सभी क्षेत्रों के युवाओं को एक साथ मिलाकर आगे आना चाहिए। उनका कहाँ है कि युवा राष्ट्र के निर्माता है और आज प्रधानमंत्री युवाओं का अग्रणीं है, इसलिए उन्हें मजबूत बनाना हमारा नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक धर्म है। </strong></p>
<p>इस संवादताता से बात करते गौड़ ने कहाँ कि हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि कुछ कमजोरी हम में भी रही है, लेकिन हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम स्वयं को आंककर, अपनी कमजोरी को दूर कर अपने क्षेत्र के साथ साथ प्रदेश के पार्टी नेतृत्व के साथ-साथ केंद्र के नेतृत्व को मजबूत बनायें। उन्होंने कहा कि हरियाणा में आज जहाँ भी गैर भाजपा क्षेत्र हैं, चाहे विधान सभा का हो अथवा लोक सभा का, स्थानीय लोगों को, खासकर युवाओं को, युवतियों को, पुरुषों को, महिलाओं को संकल्प लेना होगा ताकि कमल खिलता रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ मजबूत होता रहे। गौड़ का कहना है कि युवाओं की एक जुटता के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। </p>
<p>गोहना विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास कहता है कि 1967 में कांग्रेस के रामधारी गौड़ चुनाब जीते जो अगले दो चुनाब 1968 और 1972 चुनाब में भी अपनी जीत बरकरार रखे। साल 1977 के चुनाब में कांग्रेस के ही गंगाराम चुनाब जीते, जबकि 1982 चुनाब में लोकदल के किताब सिंह मलिक विजय हुए। अगले 1987 चुनाब में लोकदल के ही किशन सिंह सांगवान विजय हासिल किये जबकि 1991 में किताब सिंह मालिक निर्दलीय एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल किये। साल 1996 के चुनाव में हरियाणा विकास पार्टी के जगबीर सिंह मलिक, 2000 में इंडियन नेशनल लोकदल के डॉ. रामकुमार सैनी विजय हुए थे। 2005 में कांग्रेस ने अपना खाता खोला और  धर्मपाल सिंह मलिक विजय हुए। 2008 से लगातार 2019 तक कांग्रेस के जगबीर सिंह मलिक चुनाव जीतते गए। परंतु 2024 में इस सीट पर डॉ. अरविंद शर्मा ने अपना नाम दर्ज किया।  </p>
<p>दर्जन से अधिक राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संस्थाओं नेतृत्व कर रहे परशुराम गौड़ का परिवार अपने क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय, धर्म, संस्कृति आदि की स्थापना, प्रचार-प्रसार और विस्तार में बहुमूल्य योगदान। ज्ञातव्य हो कि  भगवान्भ रशुराम महाविद्यालय के निर्माण में 27 एकड़ भूमि दान में देकर कराया था। इसके अतिरिक्त 52 गावों की गौशाला (बाली ब्राह्मणान) के संरक्षक के साथ-साथ धर्मशाला और मंदिरों के निर्माण के महत्वपूर्ण भूमिका अदा किये। पंडित परशुराम गौड़ के दादा महात्मा हरफूल जी करीब 120-वर्ष पहले अपने खेतों में गौशालाओं की स्थापना कर आजीवन सचेतक रहे। साथ ही, इनके दादा पंडित रामधारी गौड़ 1967, 1968 और 1972 में गोहाना हलके से विधायक भी रहे और मंत्री पद भी संभाले। </p>
<figure id="attachment_6664" aria-describedby="caption-attachment-6664" style="width: 232px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Screenshot-2025-05-29-at-5.45.06-PM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Screenshot-2025-05-29-at-5.45.06-PM.png" alt="" width="232" height="310" class="size-full wp-image-6664" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Screenshot-2025-05-29-at-5.45.06-PM.png 232w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Screenshot-2025-05-29-at-5.45.06-PM-225x300.png 225w" sizes="auto, (max-width: 232px) 100vw, 232px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6664" class="wp-caption-text">युवा नेता पंडित परशुराम गौड़</figcaption></figure>
<p><strong>पंडित परशुराम गौड़ का कहना है कि हम अपने क्षेत्र में शिक्षा के प्रचार, प्रसार में सबसे अधिक योगदान दे रहे हैं। यहाँ की शिक्षा का प्रतिशत राष्ट्रीय शिक्षा फीसदी (78 फीसदी) के बराबर है। हरियाणा 1966 में अस्तित्व में आया था, जिसके साथ ही गोहाना विधानसभा क्षेत्र भी अस्तित्व में आया। यहां पर 1967 से 2019 तक एक उप चुनाव समेत 14 बार विधानसभा चुनाव हुए। </strong></p>
<p>गोहाना  विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र हरियाणा राज्य के 90 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। यह एक सामान्य श्रेणी की विधानसभा सीट है। यह सोनीपत जिले में स्थित है और सोनीपत संसदीय सीट के 9 विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। यहाँ अनुसूचित जाति मतदाताओं की संख्या लगभग 33,739 है जो 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 19.6% है। यहाँ अनुसूचित जनजाति की संख्या नगण्य हैं। 2019 तक इस क्षेत्र में सामान्य, विदेशी, प्रॉक्सी, डाक को मिला कर मतदाताओं की कुल संख्या 1,18,506 थी। गोहाना की राजनीति ज्यादातर जाति की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती है। सैनीपुरा, गढ़ी उजाले खान, गढ़ी सराय खान और मुख्य बाजार जैसे अधिकांश गांवों में सैनी आबादी है.2011 की जनगणना के अनुसार गोहाना की जनसंख्या 3,00000 थी जिसमें पुरुष जनसंख्या का 53% और महिलाएं 47% थी। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6666" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>राष्ट्र हित मंच, देव चेरिटेबल ट्रस्ट, हरियाणा कबीरा मंच, युवा हरियाणा विकास मंच, ब्राह्मण महासभा आदि संस्थाओं के अध्यक्ष के साथ-साथ भगवान् परशुराम इंजीनियरिंग कॉलेज, सोनीपत के सदस्य और माँ मोक्षदायिनी गंगा धाम ट्रस्ट (ऋषिकेशं हरिद्वार) के व्यवस्थापक  परशुराम गौड़ का कहना है कि 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा का गोहाना में प्रभाव जरूर बढ़ा था लेकिन जीत नसीब नहीं हुई थी। ऐसी ही स्थिति 2019 में भी रही। इन दोनों चुनावों में भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी। गोहाना में भाजपा ने 2014 में पिछड़े वर्ग से रामचंद्र जांगड़ा और 2019 से जाट समुदाय से तीर्थ राणा को मौका दिया था। 2024 में भाजपा ने यहां पर ब्राह्मणों के मजबूत और बड़े चेहरे डॉ. अरविंद शर्मा को मैदान में उतारा गया। वे गोहाना से विधायक बने और भाजपा का कमल खिलाने में कामयाब रहे। उन्होंने कांग्रेस के जगबीर सिंह मलिक को हराया। डॉ. अरविंद शर्मा कहा जाता है कि वे ब्राह्मण समाज का बड़ा और मजबूत चेहरा तो थे ही, साथ ही, गैर जाट वर्ग ने एकजुट होकर उनका साथ दिया था और इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच थी। </strong></p>
<figure id="attachment_6663" aria-describedby="caption-attachment-6663" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6663" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Parshuram-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6663" class="wp-caption-text">पूर्व सांसद श्रीमती सुनीता दुग्गल के साथ हरियाणा के युवा नेता और अन्य सामाजिक कार्यकर्ता</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, कल 30 मई को रोहतक के पहरवार में मनाई जा रही भगवान  परशुराम जयंती मनाया जा रहा है। इस जयंती का निमंत्रण  <strong>पूर्व सांसद श्रीमती सुनीता दुग्गल</strong> भी स्वीकार की। पूर्व सांसद ने कहा कि भगवान ओर संत तो सभी के बराबर होते है सभी को एक दूसरे के सनातनी पंथों का आदर सत्कार करना चाहिए और भगवान परशुराम जी के जन्मोत्सव को भारी उत्साह के साथ मनाना चाहिए। श्रीमती सुनीता दुग्गल ने कहा कि भगवान परशुराम जयंती राज्य स्तरीय ना होकर राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जा रही है इसलिए इस अवसर पर सभी 36 बिरादरी के लोग लाखों की संख्या में पहुंच रहे है।  इस अवसर पर पंडित परशुराम गौड़ ने पूर्व सांसद सुनीता जी को 30 मई भगवान परशुराम जयंती एवं 11 जून संत कबीर जयंती की अग्रिम  शुभकामनाएं दी। इस अवसर पर जगदीश चहल, सरपंच राजेश बागड़ी, अनिल, श्यामसुंदर, मोनू गामड़ी, श्री भगवान लठवाल आदि गणमान्य लोग मौजूद थे। </p>
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