लाल किला (पुरानी दिल्ली) : लाल किला के प्राचीर के नीचे खड़ा हूँ। कोई पच्चीस कदम आगे ऊपर देश के प्रधानमंत्री जश्ने आज़ादी के दिन देश के आवाम को, राष्ट्र को संवोधित करते हैं। आगामी 15 अगस्त को जश्न आज़ादी का ७९ वां वर्ष मनाया जाएगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बारहवीं बार तिरंगा को लहरायेंगे, फहराएँगे। यह फ़क्र की बात है। लाल किला के इस प्राचीर से नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत के सभी प्रधानमंत्रियों से सबसे लम्बा भाषण (समय के अनुसार) देने का रिकार्ड इस प्राचीर पर विगत वर्ष बना चुके हैं, जो उनके पहले प्रधानमंत्री के रूप में दिए गए भाषण से कोई 33 मिनट अधिक था।
लाल किले के अंदर उस प्राचीर के नीचे सैकड़ों पर्यटक, कुछ देशी, कुछ विदेशी, कई त्यौहारनुमा सजधजकर, कई साधारण पहनावे में, कभी प्राचीर को देखते दिखाई दे रहे थे, तो कई सेल्फी लेने का अवसर का लाभ उठा रहे थे। बड़े-बुजुर्ग उस प्राचीर से कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरागांधी, राजीव गाँधी, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह आदि नेताओं ने राष्ट्र को सम्वोधित किया था, अपने साथ आये सगे-सम्बन्धियों को बता रहे थे। पिछले वर्ष जब नरेंद्र मोदी राष्ट्र को संबोधित कर रहे थे, वे उनके संबोधन को सुनने आये थे।
विगत वर्ष नरेन्द्र मोदी स्वतंत्रता दिवस पर अपना सबसे लंबा भाषण 98 मिनट का दिए थे, जोकि 2016 में उनके 96 मिनट के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ा था। मोदी का स्वतंत्रता दिवस पर औसतन 82 मिनट का भाषण किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए भाषणों से सबसे लंबा हुआ है। साल 2016 में उनका भाषण 96 मिनट का था, जबकि साल 2017 में वे सबसे छोटा भाषण 56 मिनट का दिए थे। मोदी जी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने, यानी साल 2014 में वे 65 मिनट तक बोले थे। उसके अगले वर्ष, यानी 2015 में उनका भाषण करीब 88 मिनट तक चला था। साल 2018 में प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से 83 मिनट तक भाषण दिए थे। इसके बाद 2019 में उन्होंने करीब 92 मिनट तक भाषण दिया, जो अब तक का उनका दूसरा सबसे लंबा भाषण था। इसी तरह, 2020 में मोदी का स्वतंत्रता दिवस संबोधन 90 मिनट का था।2021 में उनका स्वतंत्रता दिवस भाषण 88 मिनट का रहा और 2022 में उन्होंने करीब 74 मिनट तक भाषण दिया। पिछले वर्ष वे 90 मिनट तक राष्ट्र को संबोधित किये थे।

प्राचीर के नीचे मीना बाजार के तरफ मुखकर आवक-जावक को देखते सोच रहा था कि स्वाधीन भारत में पहली बार, यानी 15 अगस्त 1947 को जब पंडित जवाहरलाल नेहरू राष्ट्र को संबोधित किये होंगे कैसा दृश्य रहा होगा। जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में और इंद्र कुमार गुजराल ने 1997 में क्रमशः 72 और 71 मिनट का सबसे लंबा भाषण दिए थे। नेहरू और इंदिरा ने भी क्रमशः 1954 और 1966 में 14 मिनट का सबसे छोटा भाषण दिए थे। इसी तरह, पूर्व प्रधानमंत्रियों डॉ. मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी ने भी लाल किले से स्वतंत्रता दिवस पर सबसे छोटे भाषण दिए थे। सिंह के 2012 और 2013 में भाषण क्रमशः केवल 32 और 35 मिनट तक चले। 2002 और 2003 में वाजपेयी के भाषण और भी छोटे थे, जो 25 और 30 मिनट के थे।
बहरहाल, ईंट के रंग जैसा गहरा रंग में रंगा कोई 387-वर्ष पहले सन 1638 में निर्मित और साल 2007 में यूनेस्को द्वारा इसके उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य के लिए यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अलंकृत लाल किला के लाहौरी प्रवेश द्वार से अंदर प्रवेश कर इस प्राचीर तक आया था। सोच रहा था यह तीन मंजिला, जिसमें चौकोर, आयताकार और नुकीले मेहराबदार नक्काशी वाली बनावट है, लाल किला का यह क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के कितने इतिहास को अपने अंदर संजोये होगा। लाहौरी गेट से अंदर की ओर जाने वाले रास्ते पर जब चल रहा था जो आगे बाएं हाथ मीनाबाज़ार के रास्ते छत्ता चौक होते लाल किला परिसर में प्रवेश लेता है । यहाँ आने-जाने वाले सैकड़े नब्बे फीसदी पर्यटक, खासकर देशी, लाल किले के इतिहास के बारे में नहीं जानते हैं। वैसे सरकार के तरफ से पत्थर पर इतिहास को संक्षिप्त में अंकित कर अवश्य रखा गया है।
यहाँ चलते-चलते मन ही मन सत्तर के दशक में शहर के दीवारों पर चिपका एक पोस्टर याद आ गया था जिसमें शशि कपूर के हाथ में एक हथौड़ा था और सामने पत्थर पर शर्मीला टैगोर बैठी थी। वह विज्ञापन ‘सुहाना सफर’ फिल्म का था। उस सिनेमन का निर्देशन किया था विजय साहब और इस सिनेमा में अन्य कलाकारों, मसलन ओम प्रकाश, ललिता पवार, डेविड, मनमोहन, मास्टर भगवन, लीला मिश्रा, केएन सिंह, रामायण तिवारी, केश्टो मुखर्जी, मुकरी के अलावे शशि कपूर और शर्मीला टैगोर मुख्य भूमिका में थे।

इसी सिनेमा में एक बेहद कर्णप्रिय गीत था – चूड़ियां बाजार से मंगवा से दे रे पहले सैंय्या..पकड़ फिर बहियां … पकड़ फिर बहियां।’ इस गीत के गीतकार थे आनंद बक्षी, संगीतकार थे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और गायक आशा भोसले तथा मोहम्मद रफ़ी। लाल किले के कोई 387 साल पुराने रास्ते में पहले ऊपर बनी झरोखों में मुग़ल बादशाह के घर की महिलाएं नीचे लगने वाले बाजार का लुफ्त उठती थी। आज झरोखे तो बंद हैं, लेकिन नीचे दुकानें आज भी सजी है, खासकर चूड़ियों की।
मीना बाजार के रास्ते छत्ता चौक की ओर बढ़ रहा था। बाएं कंधे पर झोला और दाहिने कंधे पर निकोन750 डीएसएलआर लटकाये, जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, युवा महिलाओं (स्कूली छात्राएं) की एक टोली मुझे रोकी। दिल्ली सल्तनत में महिलाएं तभी किसी पुरुष को रोकती हैं, टोकती हैं, जब उन्हें उनपर विश्वास उत्कर्ष पर हो। स्वाभाविक भी है और होना भी चाहिए। दिल्ली की महिलाएं ही नहीं, देश की महिलाएं पुरुष प्रधान समाज में अपने ऊपर बहुत तरह की अत्याचार झेल चुकी हैं, झेल रही हैं। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का 2022 का रिपोर्ट गवाह है। वे सभी महिलाएं बहुत सम्मान के साथ कहती हैं कि क्या आप हम लोगों के साथ लाल किले का परिसर घूमते, हम सबों की तस्वीर खिंच देंगे? हम सभी एक-दूसरे के साथ पैसे इकठ्ठे कर आपको एक हज़ार दे सकती हूँ, ख़ुशी-ख़ुशी। मैं ना नहीं कहा। खैर।
इन सब बातों को सोचते आगे बढ़ रहा था तो मन में ख्याल आया कि इन 15 प्रधानमंत्रियों की तुलना अगर वर्त्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करते हैं तो मोदी जी तो सबसे प्रवल दावेदार हैं भारत रत्न के लिए। वैसे भी भाजपा के 240 सांसद, कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री, साथ राज्य सभा के एनडीए के सदस्य एकजुट हो जाएँ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में वह सभी गुण है जो भारतरत्न की उपाधि के लिए आवश्यक है।
स्वतंत्र भारत में साल 1947 से 2025 तक, यानी 79 वें जश्ने आज़ादी तक 15 राजनेतागण प्रधानमंत्री के कार्यालय में लगी कुर्सी पर बैठे। पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू (15 अगस्त 1947 से 27 मई, 1964), फिर गुलजारीलाल नंदा (अंतरिम) 27 मई 1964 – 9 जून 1964 और 11 जनवरी 1966 – 24 जनवरी 1966), फिर लाल बहादुर शास्त्री (9 जून 1964 -11 जनवरी 1966), इंदिरा गांधी (24 जनवरी 1966 – 24 मार्च 1977 और 14 जनवरी 1980 – 31 अक्तूबर 1984), मोरारजी देसाई (24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979), चौधरी चरण सिंह (28 जुलाई 1979 – 14 जनवरी 1980), राजीव गांधी (31 अक्तूबर 1984 – 2 दिसंबर 1989), विश्व प्रताप सिंह (2 दिसंबर 1989 – 10 नवंबर 1990), चन्द्रशेखर (10 नवंबर 1990-21 जून 1991), पी वी नरसिम्हा राव (21 जून 1991 – 16 मई 1996), अटल बिहारी वाजपेयी (16 मई 1996-1 जून 1996 और 18 मार्च 1998 – 22 मई 2004), एच. डी देवेगौड़ा (1 जून 1996 – 21 अप्रैल 1997), इंद्र कुमार गुजराल (21 अप्रैल 1997 – 18 मार्च 1998), डॉ.मनमोहन सिंह (22 मई 2004 -17 मई 2014) और नरेंद्र मोदी (26 मई 2014 से लगातार) ।
इन 15 प्रधानमंत्रियों में नौ प्रधानमंत्री “भारत रत्न” से अलंकृत हुए। पंडित जवाहर लाल नेहरू को 1955 में मिला। लाल बहादुर शास्त्री को 1966 में, इंदिरा गांधी को 1971 में, राजीव गांधी को 1991 में, मोरारजी देसाई को 1991 में ही। जबकि गुलजारीलाल नंदा को 1997 में, अटल बिहारी बाजपेयी को 2015 में, चौधरी चरण सिंह, पीवी नरसिम्हा राव को 2024 में। शेष बचे विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, एच डी देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, डॉ. मनमोहन सिंह। समय दूर नहीं है जब डॉ. मनमोहन सिंह को भी पीवी नरसिम्हा राव के तर्ज पर (कांग्रेस में उनकी स्थिति के मद्दे नजर, साथ ही, पंजाब की राजनीति और सत्ता पर कब्ज़ा को ध्यान में रखकर) भी मरणोपरांत भारत रत्न से अलंकृत किया जाए। क्योंकि वीपी सिंह, चंद्रशेखर, गुजराल और देवेगौड़ा का आज के राजनीतिक माहौल में ‘भारत रत्न’ जैसा मोल नहीं है।

ज्ञातव्य हो कि पी. वी. नरसिंह राव को भारत रत्न देकर नरेंद्र मोदी की सरकार ने कांग्रेस की एक और विरासत को अपने पाले में करने की बड़ी कवायद की है। मोदी कई मौकों पर कांग्रेस और गांधी परिवार पर नरसिंह राव की उपेक्षा करने का आरोप लगा चुके हैं। यह भी सही है कि नरसिंह राव और सोनिया गांधी के बीच बेहतर संबंध नहीं तब थे। जिस तरह मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद सरदार पटेल के बाद एक-एक विरासत को अपने पाले में किया, नरसिंह राव को भारत रत्न देना भी उसी मुहिम का एक बड़ा हिस्सा है। इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने ही कांग्रेस के एक और पूर्व नेता और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिया था। बाद के सालों में प्रणब मुखर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच बेहद मधुर संबंध हो गए थे।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक पंकज वोहरा कहते हैं कि “मोदी ने दो पूर्व प्रधानमंत्रियों चौधरी चरण सिंह और पीवी नरसिंह राव को मरणोपरांत पुरस्कार देकर कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। जबकि हरित क्रांति के जनक डॉ. एमएस स्वामीनाथन को भी यह सम्मान दिया गया था। भाजपा के आलोचक हर जगह हैं और उन्होंने कहा है कि भारत रत्न का इस्तेमाल राजनीतिक साधन के रूप में किया जा रहा है। चौधरी चरण सिंह जाट समुदाय के सबसे सम्मानित नेताओं में से एक थे और पूरे देश में उनका सम्मान किया जाता था। दूसरी ओर, राव उदारीकरण के जनक थे और उनके पांच साल के शासन ने भारत को आर्थिक सुधारों के रास्ते पर डाल दिया, जो उनके वित्त मंत्री और बाद में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के समग्र मार्गदर्शन में कुशलतापूर्वक संचालित किया गया।”

एम. एस. स्वामीनाथन और चौधरी चरण सिंह को ऐसे समय में भारत रत्न दिया गया जब एक बार फिर किसानों का मुद्दा गरम था । किसान एक बार फिर आम चुनाव से पहले किसान आंदोलन के पक्षधर हो गए थे। कहते हैं किसानों के अब तक के सबसे बड़े वैज्ञानिक और दूसरी ओर से किसानों के अब तक के सबसे नेता को भारत रत्न देकर मोदी सरकार ने बड़ा संदेश दे दिया। दरअसल, 2020 में जब दिल्ली में किसानों का आंदोलन हुआ तब सरकार की हालत ख़राब हो गयी थी।कुछ हद तक खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा। वोहरा कहते हैं: “डॉ. स्वामीनाथन इस सम्मान के सच्चे हकदार हैं और उन्हें यह सम्मान बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था, जब वे जीवित थे। वास्तव में, डॉ. स्वामीनाथन और डॉ. वर्गीस कुरियन ने हरित और श्वेत क्रांति की शुरुआत करके भारतीय लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिससे देश अपने-अपने क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन गया है। वे दो सबसे प्रतिष्ठित भारतीय थे।”

आपको याद भी होगा जब लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न दिया गया वह इस बात का संकेत था कि मोदी जी देश में विरासत और हिंदुत्व के प्रतीक रहे जनप्रतिनिधियों और शख्सियतों को भी सम्मान देते रहे हैं। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के तुरंत बाद लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देना एक खास संकेत और संदेश दोनों था। दरअसल, नरेंद्र मोदी ने पिछले 11 -वर्षों में प्रतीकों की राजनीति को बेहद प्रभावी तरीके से अंजाम दिया है। आडवाणी को भारत रत्न का अलंकरण की घोषणा के बाद, प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा था : “मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा। मैंने भी उनसे बात की और भारत रत्न से सम्मानित होने पर उन्हें बधाई दी। अपने समय के सबसे सम्मानित राजनेताओं में से एक श्री लालकृष्ण आडवाणी का भारत के विकास में योगदान अविस्मरणीय है। उनका जीवन जमीनी स्तर पर काम करने से शुरू होकर हमारे उप-प्रधानमंत्री के रूप में देश की सेवा करने तक का है। उन्होंने गृह मंत्री और सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। उनका संसदीय योगदान हमेशा अनुकरणीय और समृद्ध अंतर्दृष्टि से भरा रहा है।”

उन्होंने यह भी कहा था कि “आडवाणी जी की सार्वजनिक जीवन में दशकों पुरानी सेवा को पारदर्शिता और अखंडता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता द्वारा चिह्नित किया गया है, जिसने राजनीतिक नैतिकता में एक अनुकरणीय मानक स्थापित किया है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान को आगे बढ़ाने की दिशा में अद्वितीय प्रयास किए हैं। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना मेरे लिए बहुत भावुक क्षण है। मैं इसे हमेशा अपना सौभाग्य मानूंगा कि मुझे उनके साथ बातचीत करने और उनसे सीखने के अनगिनत अवसर मिले।”
फिर आये कर्पूरी ठाकुर। यह सामाजिक अभियंत्रण का एक मिशाल था। लोगबाग इसे राजनीति तो कहते ही हैं क्योंकि भाजपा बहुत दिनों तक जनता दल (यूनाइटेड) के साथ नहीं चल सकती हैं बिहार में। उसे अगर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान और साख है, तो बिहार में भी बनाना होगा। कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर बिहार में पिछड़ों और अब चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर जाट समुदाय को अपने छाते में ले आये । दिलचस्प बात है कि दोनों समुदाय अपने-अपने इस नायक को भारत रत्न देने की मांग सालों से कर रहे थे और दोनों से जुड़े समुदाय पिछले कुछ दिनों तक बीजेपी से दूर थे। आप माने अथवा नहीं, मोदी नीतीश कुमार को शीघ्रातिशीघ्र ‘सत्ता के सिंहासन’ से जाते हुए देखना चाहते हैं ताकि भाजपा अपना झंडा गाड़ सके। वैसे बिहार में सुशील मोदी के बाद भाजपा को मजबूत करने वाला कोई नहीं है, नेतृत्व की किल्लत है, आतंरिक मन-मुटाव तो है ही; तथापि नरेंद्र मोदी अपनी साख के आधार पर बिहार को भाजपा के लिए जितना चाहते हैं।

लेकिन विगत बजट सत्र में संसद में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को शिवहर लोकसभा की सांसद श्रीमती लवली आनंद ने दोनों को एक ही तराजू पर तौलते ‘इतिहास पुरुष’ कहकर अलंकृत कर दीं – चमचागिरी का पराकाष्ठा देखने को मिला। संसद के बाहर तो विद्वान-विदुषी यह भी चर्चा करते सुने गए कि ‘यह एक गहन राजनीतिक ही नहीं, ‘गहन’ सामाजिक शोध का विषय है।’ नरेंद्र मोदी की तुलना नितीश कुमार से करना, वही भी जो जीवन पर्यन्त राजनीतिक बैशाखी’ पर चले। ओह !! इतना ही नहीं, हद तो तब पार कर दी जब नीतीश कुमार को भारत रत्न से अलंकृत करने के लिए भी मांग की । सत्र के चौथे दिन संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी भारत रत्न की मांग की। उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भारत रत्न दिए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले भी ऐसा हो चुका है। लवली आनंद ने कहा कि नीतीश कुमार के 2005 में बिहार का मुख्यमंत्री बनने से पहले क्या स्थिति थी अगर कोई घर से निकलता था तो वापस लौटकर आएगा या या नहीं, ये भी नहीं पता होता था।
बहरहाल,पंकज वोहरा का कहना है कि ‘आश्चर्य की बात यह है कि सरकार ने अभी तक यह घोषणा क्यों नहीं की है कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाना चाहिए। वे इसके सच्चे हकदार हैं और उन्हें यह सम्मान दिया जाना उन परंपराओं के अनुसार होगा, जहां पिछले दो प्रधानमंत्रियों को इसी तरह सम्मानित किया गया था, जबकि वे अभी भी इस प्रतिष्ठित पद पर थे।”

वोहरा के अनुसार, संदर्भ पंडित जवाहरलाल नेहरू का है, जिन्हें 1955 में इस सम्मान के लिए चुना गया था, और इंदिरा गांधी का, जिन्हें 1971 में भारत द्वारा निर्णायक युद्ध में पाकिस्तान को हराने के तुरंत बाद बांग्लादेश के निर्माण के बाद यह सम्मान दिया गया था। दोनों ही इस सम्मान के लिए उपयुक्त विकल्प थे, और इसलिए इस मुद्दे पर कभी कोई बहस नहीं हो सकती। इसी तरह, अगर मोदी को भी यह पुरस्कार दिया जाता है तो कभी कोई सवाल नहीं उठेगा। वे एक मजबूत और निर्णायक नेता रहे हैं, जिन्होंने देश में स्थिरता लाई है, और उनकी कई योजनाओं के परिणामस्वरूप आम नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। मोदी अकेले ही भारत को विश्व मानचित्र पर उस तरह से स्थापित करने के लिए जिम्मेदार हैं, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। प्रवासी भारतीयों में उनके असंख्य प्रशंसक हैं और दुनिया भर के कई शासनाध्यक्षों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों के कारण मोदी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए नई उपलब्धियां हासिल की हैं।
नेहरू और इंदिरा गांधी दोनों को ही उस समय के राष्ट्रपतियों ने भारत रत्न से सम्मानित किया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को भारत रत्न देने का बीड़ा उठाया था और 16 साल बाद वी.वी. गिरि ने इंदिरा गांधी को भारत रत्न देने का बीड़ा उठाया था। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि केंद्रीय मंत्रिपरिषद की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति एकतरफा फैसला नहीं कर सकते। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी मंजूरी पहले नहीं ली गई थी और अब भी इसकी जरूरत नहीं है। इस घोषणा को कोई चुनौती नहीं दे सकता, क्योंकि मौजूदा नेताओं में कोई ऐसा नहीं है, जिसे प्रधानमंत्री से आगे माना जा सके।

मोदी ने अपने दस साल के कार्यकाल में भारत को बदल दिया है, और उनके सबसे कटु आलोचक भी यह स्वीकार करेंगे कि हाल के दिनों में ऐसा कोई नेता नहीं हुआ, जिसका नीति निर्माण और निर्णयों पर इतना पूर्ण नियंत्रण रहा है, जिसका उद्देश्य समग्र भलाई हो। हां, कुछ विवादास्पद मुद्दे भी उठे हैं, लेकिन सरकार के पास पिछले चुनावों से पहले पार्टी के घोषणापत्र में किए गए वादों के कारण उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अच्छे तर्क हैं। मोदी के लिए भारत रत्न की सिफारिश करने वाला प्रस्ताव भी दोनों सदनों में पारित होना चाहिए, हालांकि राष्ट्रपति का निर्णय ही पर्याप्त होगा। यह सम्मान विदेशों में भारत की छवि को और निखारेगा क्योंकि सरकार के मुखिया को यह पुरस्कार एक मजबूत और स्पष्ट संदेश देगा कि देश अपने सर्वोच्च नेता का बहुत सम्मान करता है।

वोहरा का कहना है कि पुरस्कारों की यह आलोचना भी होती है कि वे अपने समय को देखते हुए राजनीतिक उद्देश्यों के लिए दिए गए थे। यह सही नहीं है क्योंकि भारत रत्न चुनाव जीतने में मदद नहीं कर सकते। चुनावी मैदान में मुकाबला केवल बेहतर रणनीति और जमीनी स्तर पर पार्टी के काम के आधार पर बेहतर कार्यक्रमों के जरिए ही जीता जा सकता है। कांग्रेस के पिछड़ने का कारण यह है कि वह अपने संगठन को मजबूत करने और अपने मूल वोट आधार को वापस पाने में विफल रही है। यह अतीत की अपनी कई उपलब्धियों को उजागर करने में भी विफल रही है और एक दोषपूर्ण नेतृत्व मॉडल के कारण, लगभग अप्रासंगिक हो गई है। यह वापसी कर सकती है लेकिन इसके लिए उसे काम करना होगा।

मोदी को भारत रत्न देना चुनावों में कोई मुद्दा नहीं होगा क्योंकि प्रधानमंत्री ने वह सब कुछ कर दिखाया है जो उनके कई पूर्ववर्ती नहीं कर पाए। इससे दुनिया भर में उनके चाहने वाले खुश होंगे। ऐसे कई लोग हो सकते हैं जो उनके तरीकों से सहमत न हों लेकिन कोई भी इस बात पर विवाद नहीं कर सकता कि उनका उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों को लाभ पहुंचाना था। राजनीति व्यवस्था का एक अनिवार्य घटक है लेकिन भारत रत्न उनके द्वारा किए गए सभी कार्यों को स्वीकार करने का एक उचित संकेत होगा। हम दोनों के बीच।
बहरहाल, भारत रत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है जो किसी क्षेत्र में असाधारण और सर्वोच्च सेवा को मान्यता देने के लिये दिया जाता है. यह सम्मान राजनीति, कला, साहित्य, विज्ञान के क्षेत्र में किसी विचारक, वैज्ञानिक, उद्योगपति, लेखक और समाजसेवी को दिया जाता है। भारत रत्न सम्मान के लिए चुने जाने की प्रक्रिया पद्म पुरस्कारों से अलग होती है। इसमें भारत के प्रधानमंत्री भारत रत्न के लिए किसी व्यक्ति के नाम की सिफारिश राष्ट्रपति को करते हैं। कोई भी व्यक्ति जाति, पेशा, पद या लिंग के आधार पर अंतर किए बिना इस पुरस्कार के लिए योग्य माना जा सकता है। एक साल में सिर्फ़ तीन भारत रत्न ही दिए जाते हैं। साथ ही ये भी ज़रूरी नहीं कि हर साल भारत रत्न सम्मान दिया ही जाए।

भारत रत्न देने की शुरुआत 2 जनवरी, 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की थी। सबसे पहला सम्मान स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन और वैज्ञानिक डॉक्टर चंद्रशेखर वेंकट रमन को 1954 में दिया गया। 1954 में ये सम्मान केवल जीवित रहते दिया जाता था, लेकिन 1955 में मरणोपरांत भी भारत रत्न दिये जाने का प्रावधान जोड़ा गया। 2013 में पहली बार खेल के क्षेत्र में सर्वोच्च योगदान/प्रदर्शन करने के लिए भी भारत रत्न देने का निर्णय लिया गया। इसके बाद 2014 में क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को इस सम्मान से नवाज़ा गया था। यह पुरस्कार गैर भारतीयों को भी दिया जा सकता है – मदर टेरेसा को 1980 में भारत रत्न दिया गया था। स्वतंत्रता सेनानी ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान (स्वतंत्रता से पहले भारत में जन्मे और बाद में पाकिस्तान गए) और दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला भी इस सम्मान से नवाज़े जा चुके हैं।

इतिहास में दो बार इस पुरस्कार को कुछ समय के लिए निलंबित किया गया था। पहली घटना 1977 में चौथे प्रधानमंत्री के रूप में मोरारजी देसाई के शपथ ग्रहण के ठीक बाद हुई थी। 13 जुलाई 1977 को उनकी सरकार ने सभी व्यक्तिगत नागरिक सम्मान वापस ले लिए। 25 जनवरी 1980 को इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद निलंबन वापस ले लिया गया। दूसरी घटना 1992 के मध्य में फिर हुई जब केरल उच्च न्यायालय और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसके खिलाफ दो जनहित याचिकाएं दायर कीं, जिसमें पुरस्कार की “संवैधानिक वैधता” को चुनौती दी गई। दिसंबर 1995 में, मुकदमे के समापन के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से पुरस्कारों को फिर से पेश किया।

चाहिए तो यह की मंत्रिमंडल के सभी लोग, भाजपा शासित और भाजपा समर्थित राज्य, लोक सभा राज्य सभा के सांसद, विधायक एक आवाज से इस बात का समर्थन करें की मोदी जी भारत रत्न मिले। वैसे मोदी जी के 11-साल पर उनके नेतृत्व वाली सरकार और मंत्रालय मंत्री द्वारा जो भी शब्द लिखे जाते हैं, बोले जाते हैं, शब्दों की शुरुआत और अंत मोदी जी के बिना हो ही नहीं सकता। आज मोदी जी भारत ही नहीं, वैश्विक स्तर पर इकलौता पहचान बन गए हैं भारत का – फिर भारत रत्न अलंकरण की घोषणा में विलंब क्यों? वैसे भी को नौ पूर्व प्रधान मंत्रियों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत किया गया है, उनमें से मोदी की छवि और उनकी ऊंचाई किसी से कम तो नहीं है। चाहिए तो यह भी गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह की अगुवाई में संसद में मोदी जी को भारत रत्न अलंकरण से संबंधित प्रस्ताव लाया जाए या फिर राष्ट्रपति स्वयं इस दिशा में पहल कर भारत रत्न ताज को प्रधानमंत्री के माथे पर रख दें।

















