भाजपा को नया अध्यक्ष’ मिल गया है, ‘स्थायी’ नहीं, ‘तत्काल के लिए’, क्योंकि ‘जग घूमेया थारे जैसा ना कोई 👁 ‘नड्डा’

दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (नई दिल्ली) : साल 2014 में नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण के दो साल बाद अली अब्बास की कथा और निर्देशन में एक फिल्म बनी थी ‘सुलतान’, जिसे आदित्य चोपड़ा ने बनाया था। इस फिल्म में सलमान खान, अनुष्का शर्मा, रणदीप हुडा, अमित साध जैसे कलाकार काम किये थे। इस फिल्म में सलमान खान और अनुष्का शर्मा पर एक रूमानी गीत फिल्माया गया था जिसके शब्द थे इरशाद कामिल की, संगीत दिया था विशाल-शेखर का और गाये थे रहत फ़तेह अली खान साहब ने। गीत के बोल थे :

ओ.. ना वो अखियाँ रूहानी कहीं
ना वो चेहरा नूरानी कहीं
कहीं दिल वाली बातें भी ना
ना वो सजरी जवानी कहीं
जग घूमेया थारे जैसा ना कोई
जग घूमेया थारे जैसा ना कोई

ना तो हंसना रूमानी कहीं
ना तो खुशबू सुहानी कहीं
ना वो रंगली अदाएं देखीं
ना वो प्यारी सी नादानी कहीं
जैसी तू है वैसी रहना

जगत प्रकाश नड्डा

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह को जब देखता हूँ तो कहीं न कहीं वर्तमान भाजपा के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के प्रति उनके मन में इस गीत का स्वर गुनगुनाते पाता हूँ। क्योंकि न तो मोदी जी को और ना ही अमित शाह को अभी तक जगत प्रकाश नड्डा के बराबर, या फिर कुछ हद तक ही सही’, समरूप गुणों वाले व्यक्ति, विश्वासपात्र, भाजपा के प्रति समर्पित अभ्यर्थी नहीं मिल पाये हैं, जिनके नाम भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष का मुहर लगा दें। आप इस बात को स्वीकार करें अथवा नहीं। 

जगत प्रकाश नड्डा के बाद भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर कौन बैठेंगे? कोई कह रहे हैं ‘पुरुष’ बैठेंगे, कोई महिला सशक्तिकरण का दृष्टान्त देकर कह रहे हैं ‘महिला’ बैठेंगी। लेकिन भाजपा में सत्ता के गलियारे में ‘गोपनीयता’ अटल बिहार वाजपेयी के ज़माने में भी थी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में तो है ही, वह भी ‘उत्कर्ष’ पर। बहरहाल, गिनती शुरू कर दें क्योंकि भाजपा को “तत्कालीन अध्यक्ष” मिल गया है और जगत प्रकाश नड्डा के समतुल्य अभ्यर्थी की खोज जारी है। 

आज भी याद है जब 1998 में प्रधानमंत्री कार्यालय से दिल्ली के अख़बारों के दफ्तर में फोन की घंटी टनटनाया और कहा गया कि ‘वाजपेयी जी अख़बार वालों से तुरंत मिलना चाहते हैं’, दिल्ली दरबार के पत्रकार अपने-अपने कार्यालयों से निकल कर गंतव्य तक पहुँचने में ‘क्या-क्या नहीं सोचे’, कहानियां भी गढ़े, इंट्रो भी बनाये। लेकिन किसी को भी पता नहीं वाजपेयी जी किस विषय पर बोलने वाले हैं। पोखरण-II परमाणु परीक्षण  में सोचना तो नामुमकिन था। 

अटल बिहारी वाजपेयी

मई 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पोखरण-II परमाणु परीक्षण किए गए थे। आधिकारिक तौर पर ऑपरेशन शक्ति के रूप में जाने जाने वाले इन परीक्षणों में राजस्थान के पोखरण परीक्षण रेंज में पाँच परमाणु विस्फोट शामिल थे। पहले तीन परीक्षण 11 मई, 1998 को और शेष दो 13 मई, 1998 को किए गए थे। इन परीक्षणों को करने का निर्णय एक महत्वपूर्ण निर्णय था। तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने परीक्षणों का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जब वाजपेयी जी सैकड़ों संवाददाताओं और छायाकारों के बीच पोखरण परीक्षण के बारे में बताये, अखबार वाले, टीवी वाले सभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। उधर दफ्तर में संपादक महोदय भाजपा और प्रधानमंत्री कार्यालय को कवर करने वालों को भृकुटि तान कर देख रहे थे। 

उस घटना के 27-साल बाद विगत मई, 2025 को जब वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ किया गया, इस बात का गंध लोगों को, खासकर प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय या सत्ता के गलियारे में चहलकदमी करने वाले किसी भी पत्रकार बंधू-बांधवों को गंध’ तक नहीं लगा। सत्ता के गलियारे में ‘गोपनीयता’ अपने उत्कर्ष पर होता है। इस घटना के बाद लेखक, विश्लेषक, आलोचक जो भी लिखें। आजकल दिल्ली सल्तनत में भारतीय जनता पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा चर्चाएं आम है। कोई पुरुष नेताओं को आगे बढ़ा रहे हैं तो कोई महिला नेताओं को। लेकिन दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय से लेकर झंडेवालान स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय तक, सभी चुप हैं। 

ज्ञातव्य हो कि 1980 में भाजपा के गठन के बाद अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में भाजपा ने खुद को एक मध्यमार्गी पार्टी के रूप में पेश किया जो भारतीय जनसंघ की कटु राजनीति से अलग हटकर थी। वाजपेयी, जिन्हें अक्सर भाजपा के उदारवादी चेहरे के रूप में देखा जाता था। बाद में वाजपेयी देश का प्रधानमंत्री भी बने और अपना कार्यकाल भी पूरा किया। 

लाल कृष्ण आडवाणी

1986 में अटल बिहारी वाजपेयी के बाद लाल कृष्ण आडवाणी भाजपा के अध्यक्ष बने। कहते हैं यह घटना आमतौर पर भाजपा की विचारधारा में कट्टर हिंदुत्व की ओर बदलाव से जुड़ी है, जिसका उदाहरण 1990 में आडवाणी द्वारा हिंदू राष्ट्रवाद की अपील करके चुनावी समर्थन जुटाने के प्रयास के तहत निकाली गई राम रथ यात्रा है। उन्होंने 1973 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था। भाजपा के विचारक मुरली मनोहर जोशी 1991 में भाजपा अध्यक्ष बने। वे कई दशक से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। अपने पूर्ववर्ती लालकृष्ण आडवाणी की तरह, उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल के दौरान, भाजपा पहली बार मुख्य विपक्षी दल बनी।

मुरली मनोहर जोशी

आडवाणी के आक्रामक प्रचार अभियान ने 1996 के चुनावों के बाद भारतीय संसद के निचले सदन में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनने में मदद की। हालांकि वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, लेकिन आडवाणी को पार्टी के भीतर ताकत के रूप में देखा गया और बाद में उन्होंने उप प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया।

कुषा भाऊ ठाकरे

कुषा भाऊ ठाकरे 1942 से ही आरएसएस से जुड़े हुए थे। 1998 में जब वे भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद अध्यक्ष बने, तब वे भाजपा के बाहर ज़्यादा मशहूर नहीं थे। कहते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान भाजपा ने हिंदुत्व पर अपना ज़ोर कम कर दिया, जैसे कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग, ताकि एक बड़े गठबंधन के विचारों को समायोजित किया जा सके।

बंगारू लक्ष्मण

लंबे समय से आरएसएस के सदस्य रहे बंगारू लक्ष्मण 2000 में भाजपा के पहले दलित अध्यक्ष बने। एक साल बाद तहलका पत्रिका के स्टिंग ऑपरेशन में उन्हें रिश्वत लेते हुए दिखाया गया, जिसके बाद लक्ष्मण ने तुरंत इस्तीफा दे दिया। वे 2012 तक पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रहे, जब उन्हें भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहराया गया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लक्ष्मण के इस्तीफे के बाद जाना कृष्णमूर्ति कार्यवाहक अध्यक्ष बने और कुछ ही समय बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने उन्हें अध्यक्ष के रूप में पुष्टि कर दी। एक साल बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया जब वे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में कैबिनेट फेरबदल के तहत मंत्री बन गए।

जाना कृष्णमूर्ति

जाना कृष्णमूर्ति को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के बाद वेंकैया नायडू भाजपा अध्यक्ष चुने गए। टिप्पणीकारों ने उनके चुनाव को लालकृष्ण आडवाणी और पार्टी के रूढ़िवादी हिंदू-राष्ट्रवादी विंग द्वारा फिर से नियंत्रण स्थापित करने के उदाहरण के रूप में देखा। हालांकि नायडू को पूर्ण कार्यकाल के लिए चुना गया, लेकिन एनडीए द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से 2004 के भारतीय आम चुनाव हारने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उस समय लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में कार्यरत आडवाणी, 2004 के भारतीय आम चुनाव के बाद वेंकैया नायडू के इस्तीफा देने के बाद तीसरी बार भाजपा अध्यक्ष बने। आडवाणी विपक्ष के नेता के रूप में अपने पद पर बने रहे। 2005 में आडवाणी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, जब उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में वर्णित किया, जिससे विवाद पैदा हो गया।

वेंकैया नायडू

दिसंबर 2005 में राजनाथ सिंह सिंह ने आडवाणी के कार्यकाल के शेष समय के लिए भाजपा अध्यक्ष का पद संभाला। उन्हें 2006 में पूर्ण कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त किया गया। सिंह ने आरएसएस और भाजपा के लिए कई पदों पर कार्य किया, जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा की युवा शाखा के अध्यक्ष के रूप में कार्य करना शामिल है। उन्होंने हिंदुत्व मंच पर वापसी की वकालत की। एनडीए के 2009 के भारतीय आम चुनाव हारने के बाद सिंह ने इस्तीफा दे दिया। साल 2009 में नितिन गडकरी भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष बने। लंबे समय से आरएसएस के सदस्य रहे गडकरी महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार में मंत्री और भाजपा युवा शाखा के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें आरएसएस नेतृत्व का भरपूर समर्थन प्राप्त था। गडकरी ने मंत्री रहते हुए घोटाले और वित्तीय अनियमितताओं के अन्य आरोपों के बाद 2013 में इस्तीफा दे दिया था।

राजनाथ सिंह

2013 में गडकरी के पद छोड़ने के बाद राजनाथ सिंह को दूसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष चुना गया। सिंह ने 2014 के भारतीय आम चुनाव के लिए भाजपा के अभियान में बड़ी भूमिका निभाई, जिसमें भाजपा के भीतर विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना भी शामिल था। पार्टी की शानदार जीत के बाद, सिंह ने गृह मंत्री का पद संभालने के लिए पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। वर्तमान प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी विश्वासपात्र अमित शाह, राजनाथ सिंह के पहले मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद उनके कार्यकाल के शेष समय के लिए भाजपा अध्यक्ष बने। टिप्पणीकारों ने शाह की नियुक्ति को भाजपा पर मोदी के नियंत्रण का प्रदर्शन बताया। शाह को 2016 में पूरे तीन साल के कार्यकाल के लिए फिर से चुना गया।

नितिन गडकरी

इसके बाद,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लंबे समय से जुड़े जगत प्रकाश नड्डाको 2019 में भाजपा का “कार्यकारी अध्यक्ष” चुना गया और अध्यक्ष चुने जाने से पहले उन्होंने एक साल तक अमित शाह के साथ पार्टी चलाने की जिम्मेदारी साझा की और आज तक बने हैं । 
भाजपा के स्थापना काल से अब तक 11 अध्यक्ष बने हैं और बारहवें की खोज जारी है। लेकिन यह आश्चर्यजनक है, अगर चौंकाने वाला नहीं है, तो यह है कि मोदी और शाह पिछले एक साल में नड्डा का विकल्प नहीं ढूंढ पाए। ऐसा नहीं है कि मोदी-शाह ने कोशिश नहीं की, लेकिन ऐसा लगता है कि वे सफल नहीं हुए। नड्डा को पहले ही दो बार सेवा विस्तार मिल चुका है। नड्डा को मोदी का करीबी माना जाता है। नड्डा, जो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हैं, 2020 से पार्टी अध्यक्ष पद पर हैं। उनका कार्यकाल 2023 में समाप्त हो रहा था, लेकिन भाजपा ने इसे 2024 तक बढ़ा दिया ताकि वह लोकसभा चुनावों में पार्टी का नेतृत्व कर सकें।

अख़बारों में, टीवी के स्क्रीन पर आजकल मनोहर लाल खट्टर, भूपेंद्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान के नाम कभी आते हैं, कभी गायब हो जाते हैं। ऐसी अटकलें भी लोग लगा रहे हैं कि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए महिला चेहरे की तलाश कर रही है, क्योंकि पार्टी ने हाल के दिनों में महिला मतदाताओं को प्रभावित करने में सफलता देखी है। इसके अलावा, भाजपा ने 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पर भी जोर दिया, जिसे संसद के दोनों सदनों ने मंजूरी दे दी। विधेयक में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग की गई है। पार्टी के लिए एक महिला अध्यक्ष की नियुक्ति से यह स्पष्ट संदेश भी जाएगा कि भाजपा इस विधेयक के साथ है।

लोगबाग यह भी लिख रहे हैं कि निर्मला सीतारमण को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता हैं क्योंकि वह पार्टी की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में से एक हैं। उल्लेखनीय है कि वह 2019 से वित्त मंत्री का पद संभाल रही हैं, जब भाजपा दूसरी बार सत्ता में आई थी। इसके अलावा, तमिलनाडु में उनकी जड़ें भी भाजपा के लिए एक फायदा हो सकती हैं, क्योंकि पार्टी दक्षिण में आगे बढ़ रही है। अगर सीतारमण को चुना जाता है, तो यह भाजपा के दक्षिणी क्षेत्र में पहुंच बनाने में मदद कर सकता है और परिसीमन के बाद लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के साथ तालमेल का संकेत दे सकता है।

इसी तरह, दग्गुबाती पुरंदेश्वरी के नाम पर भी लोग लिख रहे हैं  जो भाजपा की पूर्व आंध्र प्रदेश इकाई की प्रमुख थीं। वह सरकार के ऑपरेशन सिंदूर प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थीं, जिसने यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, यूरोपीय संघ, इटली और डेनमार्क में देश के आतंकवाद विरोधी रुख का प्रतिनिधित्व किया था। कई भाषाओं में पारंगत पुरंदेश्वरी ने मंत्री पद और संसदीय अनुभव के साथ एक बहुपक्षीय राजनीतिक करियर बनाया है। वनथी श्रीनिवासन  उछाल रहे हैं जो भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी हैं। 2021 में उन्होंने अभिनेता और मक्कल निधि मैयम (एमएनएम) के संस्थापक कमल हासन को हराकर तमिलनाडु की कोयंबटूर (दक्षिण) सीट जीती थी। वह 1993 से भाजपा से जुड़ी हैं और 2022 में भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्य बनीं।

वैसे उम्मीद है कि आगामी दस दिनों में भारत को भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल जायेगा। अपवाद छोड़कर, अधिकांश राज्यों में संगठनात्मक चुनाव पूरे हो चुके हैं और पदाधिकारियों का चुनाव हो चुका है, और शेष कुछ राज्यों में जल्द ही चुनाव पूरे हो जाएंगे। भाजपा की 36 संगठनात्मक इकाइयों में से 32 में राज्य इकाई के चुनाव महीनों पहले शुरू हो चुके थे, जिनमें राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं।

वैसे आरएसएस ने साफ कर दिया है कि वह दूसरे दलों से आए नेताओं के बजाय घरेलू नेताओं को प्राथमिकता देता है। सांसदों को राज्य प्रमुख नियुक्त करने से हतोत्साहित किया गया। इसके बजाय, राज्य स्तर के विधायकों, एमएलसी और अनुभवी संगठनात्मक कार्यकर्ताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। जो लोग अपने राज्यों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया है और संगठन के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। दलबदलुओं की नियुक्ति अपवाद होगी, नियम नहीं। तरीके में यह बदलाव चुने गए नामों में स्पष्ट है। 

मध्य प्रदेश में विष्णु दत्त शर्मा की जगह गोपाल खंडेलवाल को चुना गया। पश्चिम बंगाल में भाजपा के राज्यसभा सांसद समिक भट्टाचार्य को पार्टी का नेतृत्व करने के लिए चुना गया। महाराष्ट्र में पुराने नेताओं में से एक भरोसेमंद नेता रवींद्र चव्हाण को नियुक्त किया गया। मिजोरम को डॉ. के. बेचुआ मिले, जो एक अनुभवी राजनेता हैं और 2023 में भाजपा में शामिल हो गए थे। आंध्र प्रदेश ने पी.वी.एन. माधव को लाया, जबकि तेलंगाना में एन. रामचंदर राव की वापसी हुई। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में क्रमशः राजीव बिंदल और महेंद्र भट्ट की फिर से नियुक्ति हुई – दोनों को ही आरएसएस से मजबूत जुड़ाव वाले स्थिर व्यक्तित्व के रूप में देखा गया। पुडुचेरी में वी.पी. रामलिंगम को चुना गया और अंडमान और निकोबार में अनिल तिवारी ने कार्यभार संभाला।

हालांकि, पार्टी के तीन सबसे महत्वपूर्ण गढ़ों- उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में भाजपा अभी तक नए राज्य प्रमुखों पर आम सहमति नहीं बना पाई है। ये देरी आकस्मिक नहीं है। तीनों राज्यों में आंतरिक गुटबाजी और रणनीतिक दांव अधिक हैं। संघ कथित तौर पर गहरी वैचारिक नींव वाले उम्मीदवारों पर जोर दे रहा है, जबकि राज्य के नेता राजनीतिक रूप से सुविधाजनक नामों की पैरवी कर रहे हैं। पुरानी प्रवृत्ति और नए अनुशासन के बीच संघर्ष के कारण इन राज्यों में अभी भी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। जाहिर है, भाजपा ने आरएसएस से विभिन्न राज्य इकाइयों में संगठन मंत्री (महासचिव-संगठन) के रूप में 14 पूर्णकालिक प्रचारकों को नियुक्त करने के लिए कहा है। संगठन मंत्रियों के लिए इस नए प्रयास को व्यापक संगठनात्मक कसावट के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। 

आंतरिक सूत्रों का कहना है कि एकीकरण का यह चरण इस बात को रेखांकित करता है कि भाजपा अब संघ की प्राथमिकताओं के साथ कितनी निकटता से जुड़ी हुई है। भले ही मोदी और शाह का प्रभाव अभी भी बहुत ज्यादा है, लेकिन राज्य स्तर की नियुक्तियों में उनकी भूमिका स्पष्ट रूप से कम हो गई है। सूत्रों के अनुसार नया अध्यक्ष कोई स्थायी व्यक्ति नहीं हो सकता। मोदी पहले ही अपने तीसरे कार्यकाल में हैं और भाजपा अपने चरमोत्कर्ष के बाद के चरण में प्रवेश कर रही है, इसलिए अगला पार्टी प्रमुख वह व्यक्ति हो सकता है जिसे 2029 में संगठन का नेतृत्व करने का काम सौंपा गया हो।

अटकलें यह भी बढ़ रही हैं कि यह संगठनात्मक फेरबदल केंद्र में कैबिनेट फेरबदल के साथ हो सकता है। इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार अभिनन्दन मिश्र लिखते हैं कि 15 जुलाई या उससे पहले भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ ही बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी के केंद्रीय संगठन में बड़े पैमाने पर फेरबदल होने की संभावना है। 

अभिनन्दन मिश्र

अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पार्टी स्तर पर ये बदलाव दिखावटी नहीं बल्कि महत्वपूर्ण होने की संभावना है। छह राष्ट्रीय महासचिवों में से कम से कम दो को बदले जाने की संभावना है और ग्यारह राष्ट्रीय सचिवों में से कई को भी हटाया जा सकता है या फिर उनकी जगह नई जिम्मेदारी दी जा सकती है। यह व्यवस्था के भीतर गतिरोध को दूर करने, नए चेहरों के लिए जगह बनाने और उच्च-दांव वाले चुनावों से पहले दिशा-निर्देशों को सही करने के लिए किया जा रहा है। जिन लोगों पर इसका असर पड़ने की संभावना है, उनमें वे नेता भी शामिल हैं जो अपने-अपने राज्यों में प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में थे और जिनके नाम मीडिया में मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के संभावित प्रतिस्थापन के रूप में सामने आ रहे थे।

अभिनन्दन मिश्र का कहना है कि इसके साथ ही, मंत्रिस्तरीय प्रदर्शन के आंतरिक आकलन के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की भी संभावना है। पिछले कई महीनों से शासन का मुख्य काम मुख्य रूप से प्रधानमंत्री मोदी, पीएमओ और कुछ प्रमुख मंत्रालयों के पास रहा है। कई अन्य कमज़ोर पड़ गए हैं – ख़ास तौर पर काम के निष्पादन के मामले में। सूत्रों ने बताया कि उनके पदों की समीक्षा की गई है और उन्हें कमज़ोर पाया गया है। हटाए गए कुछ मंत्रियों को संगठनात्मक भूमिकाओं में भेजा जाएगा, जबकि कुछ – ख़ास तौर पर बिहार से – को आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कहा जा सकता है, जैसा कि मध्य प्रदेश में किया गया था। बिहार में, राजनीतिक संदर्भ इन बदलावों को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर के अंत के करीब होने के साथ, भाजपा राज्य में प्रमुख ताकत के रूप में उभरने के लिए काम कर रही है।

हालांकि, पार्टी मुख्यमंत्री पद का चेहरा पेश किए बिना चुनाव में उतरेगी। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, भाजपा के पास वर्तमान में राज्य में कोई ऐसा नेता नहीं है जिसकी पूरे बिहार में मौजूदगी हो या जिसे व्यापक स्वीकार्यता हो और जिसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा सके। दूसरा, और उतना ही महत्वपूर्ण, नीतीश कुमार चुनाव परिणाम घोषित होने तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे और भाजपा चुनाव से पहले इस नाजुक व्यवस्था को – थोड़ा भी – बदलने के लिए इच्छुक नहीं है। बिहार भाजपा के भीतर भी मंथन चल रहा है। पिछले कुछ सालों में दरकिनार किए गए कई वरिष्ठ नेता आगामी फेरबदल को एक संभावित अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनके समर्थकों को उम्मीद है कि नए पार्टी अध्यक्ष के तहत, पहले हाशिए पर धकेले गए कुछ लोगों को फिर से प्रमुखता दी जा सकती है। हालांकि, केंद्रीय पार्टी पदाधिकारियों ने संकेत दिया है कि राज्य में वर्तमान में प्रमुख लोगों में से कुछ को हटाया भी जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो उन्हें हटाया जाना मौजूदा निर्णयों के पैटर्न के अनुरूप होगा।

भाजपा मुख्यालय

केंद्रीय नेतृत्व ने हाल के महीनों में वरिष्ठता या दृश्यता के बजाय प्रदर्शन और राजनीतिक उपयोगिता को स्पष्ट प्राथमिकता दी है। संगठन/मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पद की प्रबल उम्मीद रखने वालों में कुछ ऐसे चेहरे भी हैं, जिन्हें मोदी सरकार के पहले दो कार्यकाल में जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन बाद में उन्हें हटा दिया गया। समग्र राजनीतिक कैलेंडर समयसीमा को और भी तंग कर देता है। प्रधानमंत्री मोदी के 10 जुलाई तक अपने पांच दिवसीय विदेश दौरे से लौटने की उम्मीद है। संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक निर्धारित है। अधिकांश अपेक्षित निर्णय – नए पार्टी अध्यक्ष की नियुक्ति, संगठनात्मक बदलाव और कैबिनेट फेरबदल – इस तीन सप्ताह की अवधि के भीतर होने की संभावना है। अगस्त के बाद बहुत कम समय बचा है। 

यदि बिहार चुनाव अक्टूबर में होते हैं, जैसा कि व्यापक रूप से अनुमान लगाया जा रहा है, तो पार्टी के पास इन बदलावों को लागू करने और उन्हें व्यवस्थित करने के लिए एक संकीर्ण समय होगा। यह उल्लेख करना उचित है कि एक अत्यधिक देरी के बाद, तेजी से आगे बढ़ते हुए, भाजपा ने दस दिनों में अपने संगठनात्मक अभियान के हिस्से के रूप में आठ नए राज्य/इकाई अध्यक्षों की नियुक्ति की है। इनमें महाराष्ट्र शामिल है, जहां मराठा नेता रवींद्र चव्हाण ने कार्यभार संभाला है; पश्चिम बंगाल, जहां अब समिक भट्टाचार्य शीर्ष पर हैं; आंध्र प्रदेश, जहां पी.वी.एन. माधव ने डी. पुरंदेश्वरी का स्थान लिया है; और तेलंगाना, जहां एन. रामचंदर राव ने जी. किशन रेड्डी का स्थान लिया है। मध्य प्रदेश में, वी.डी. शर्मा की जगह हेमंत खंडेलवाल को नया प्रमुख नियुक्त किया गया। पार्टी ने डॉ. के. बेचुआ को मिजोरम का अध्यक्ष और वी.पी. रामलिंगम को पुडुचेरी का अध्यक्ष नियुक्त किया। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में, अनिल तिवारी को नए पार्टी अध्यक्ष के रूप में प्रभार दिया गया। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम को अंतिम रूप देने से पहले उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, ओडिशा और गुजरात में नए प्रमुखों की नियुक्ति करेगी।

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