पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ‘जनता दल (यूनाइटेड) भारत का संबसे बड़ा ‘अवसरवादी’ पार्टी है, जो ‘मंडल’ और ‘मंदिर’ जैसे दो स्तम्भों पर खड़ा है। यह हम नहीं, दिल्ली और पटना के राजनीतिक समीक्षक से लेकर पर्यवेक्षक तक कह रहे हैं। राजनीति में कब क्या होगा, कोई नहीं जानता, खासकर जब दिल्ली के रायसीना पहाड़ पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री के रूप में अमित शाह जैसे राजनीतिक दक्षता से परिपूर्ण पुरुषद्वय बैठे हों।
इसलिए, सन 1974 कालखंड में जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के दौरान पटना के गांधी मैदान से दिल्ली के रामलीला मैदान तक, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जिस कविता – सिंहासन खाली करो की जनता आ रही है – का पाठ कांग्रेस को शक्तिहीन करने के लिए किया गया था, आज तत्कालीन ‘जनसंघ’ और आज का भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्त्ता से लेकर राष्ट्रीय कार्यालय में बैठे पदाधिकारीगण पाठ कर रहे हैं – सिंहासन खाली करो नीतीश कुमार कि भारतीय ‘जनता’ की पार्टी आ रही है।”
नीतीश कुमार आज जिसके ‘सहारे’ ‘सत्ता’ के सिंहासन पर कब्ज़ा बनाये रखना चाहते हैं, कल जब उनके पीठ से ‘वह हाथ’ हट जायेगा, यानी उनकी सत्ता कमजोर हो जाएगी, जनता दल ‘यूनाइटेड’ को ‘दो-फांक होने में क्षण भी नहीं लगेगा। और शोले फिल्म के तरह ‘आधे लोग जो ‘मंदिर के पुजारी’ है, भारतीय जनता पार्टी की ओर और आधे लोग, जो ‘मंडल के तथाकथित मशीहा’ मानते हैं, राष्ट्रीय जनता दल के रास्ते निकल जायेंगे। आपको सुनकर, पढ़कर अपच हो रहा होगा, लेकिन इस कहानी का कतरन काटकर रख लें। इतना ही नहीं, दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर इस बात पर भी मंत्रणा जारी है कि जनता दल (यूनाइटेड) में तीन युवा नेता ‘फ्रोजेन हॉर्स’ हैं नीतीश कुमार के पार्टी में और नीतीश कुमार को कमजोर होते कब भाजपा का राह पकड़ लेंगे, नीतीश कुमार क्या, बिहार का मतदाता भी सोच भी नहीं सकता। सनद रहे – राजनीति में कुछ भी हो सकता है।
दूसरी ओर, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो ‘साख’ थी, या जिन ‘राजनीतिक कारणों’ से वे नीतीश कुमार के पीठ पर हाथ रखना पड़ा था, तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद न केवल उनकी साख ‘बढ़ी’ है, बल्कि राजनीतिक ‘दावपेंच’, खासकर बिहार में, से वे भली भांति भिज्ञ हो गए हैं। बाहरी मन से भले लोग समझते हों की ‘अबकी बार भी नीतीशे कुमार’, नीतीश कुमार भी समझते हैं कि कल क्या होने वाला है। वैसे भी, नरेंद्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी किसी भी राज्य में ‘सह-पार्टी’ बनकर ‘सत्ता’ में क्यों रहना चाहेगी, एकाधिकार की इच्छा तो होगी है। तभी तो दीनदयाल मार्ग, नई दिल्ली स्थित भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में लोग बाग़ राष्ट्रकवी रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता पाठ कर रहे – ‘सिंहासन खाली करो नीतीश कुमार कि भाजपा आ रही है।’
अबकी बार ‘ना’ नीतीश कुमार
चलिए पीछे चलते हैं। वर्ष 1990 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कुल 324 में से 122 सीटें लाकर जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा था । विभिन्न पार्टियों को जोड़कर अक्टूबर 1988 में गठित जनता दल ने वर्ष 1990 के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया और गठबंधन की सरकार बनी। लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री बने। विधायक दल का नेता कौन होगा, इसको लेकर लालू प्रसाद और पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास के बीच कड़ी टक्कर हुई। र्वोंटग के जरिये लालू प्रसाद विधायक दल के नेता चुने गए। इस तरह दोबारा मुख्यमंत्री बनने से राम सुंदर दास चूक गए।
राजनीतिक मानचित्र पर आज भी स्वर्णाक्षरों में उद्धृत है: “उस समय जैसा कि केंद्र में हुआ था, ठीक वैसी ही स्थिति बिहार में दसवें विधानसभा की थी। कांग्रेस पार्टी के 125 सीटों का नुकसान हुआ और पार्टी 71 सीटों पर सिमट गई। जनता दल को 122 सीटों पर विजय हासिल हुई, बीजेपी को 23 सीटों का फायदा हुआ और अब पार्टी के 39 विधायक थे। और वाम मोर्चा के 42 विधायक चुने गए। तीन-सौ चौबीस सदस्यों वाली विधानसभा में जनता दल के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन था। पर अब सवाल था कि कौन बनेगा बिहार का मुख्यमंत्री?
रामविलास पासवान के मुख्यमंत्री बनने पर सभी सहमत थे और पासवान का सपना था डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बाद दलितों के सबसे बड़ा नेता बनने का। बिहार के मुख्यमंत्री का पद उस सपने को पूरा करने के लिए काफी छोटा रंगमंच था, लिहाजा उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने रहने का फैसला किया। बात अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा की भी चली पर विश्वनाथ प्रताप सिंह का सिन्हा के प्रति रुख नकारात्मक रहा। सिंह पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास के पक्ष में थे और चंद्रशेखर रघुनाथ झा को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। विवाद पहुंचा उप-प्रधानमंत्री देवीलाल के पास। देवीलाल ने दूसरी बार सांसद बने लालू प्रसाद यादव के नाम का प्रस्ताव रखा। फिर विधायक दल का चुनाव हुआ और लालू प्रसाद यादव जीत कर मुख्यमंत्री बन गए।
1995 का विधानसभा चुनाव के कालखंड में बिहार में ना ही राष्ट्रीय जनता दल थी और ना ही जनता दल(यूनाइटेड) का अस्तित्व था। यह अलग बात है कि इस चुनाव के एक वर्ष पूर्व नीतीश कुमार जॉर्ज फर्नांडिस के सहयोग से 1994 में समता पार्टी बनाकर लालू यादव से अलग हो गए थे। 1995 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल ने 264 सीटों पर बिहार चुनाव लड़ा और वो 167 सीटें जीतने में सफल हुई। भाजपा ने 315 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए लेकिन सिर्फ़ 41 सीटें ही जीत पाई, जबकि कांग्रेस 320 सीटों पर चुनाव लड़कर 29 सीटें ही जीत पाई। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 63 में से 10 सीटें मिली थी और नीतीश कुमार जके समता पार्टी को 310 में से सात सीटें मिली थी। इस चुनाव के बाद लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। यह सभी जानते हैं।
मार्च 2000 में विधानसभा चुनाव हुए। यह वो समय जब बिहार से अलग करके झारखंड राज्य नहीं बनाया गया था। साल 2000 के नवंबर में झारखंड का गठन हुआ था। तब बिहार में 324 सीटें हुआ करती थीं और जीतने के लिए 162 सीटों की जरूरत होती थी। इन चुनावों में राजद ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 124 सीटें मिली थी। वहीं, भाजपा को 168 में से 67 सीटें हासिल हुई थी। इसके अलावा समता पार्टी को 120 में से 34 और कांग्रेस को 324 में से 23 सीटें हासिल हुई थी। 2000 के चुनाव में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी।
साल 2005 में ऐसा पहली बार हुआ था जब बिहार में एक ही साल के अंदर दो बार विधानसभा चुनाव हुए। फरवरी 2005 में राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से उसे 75 सीटें मिल पाई। वहीं, जदयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ 55 सीटें जीतीं और भाजपा 103 में से 37 सीटें मिली। कांग्रेस इन चुनावों में 84 में से 10 सीटें ही मिली थी / इन चुनावों में 122 सीटों को स्पष्ट बहुमत न मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई और कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता दल (यूनाइटेड) 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर आई। जनता दल 139 सीटों पर चुनाव लड़ा जबकि भाजपा ने 102 में से 55 सीटें हासिल की। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल ने 175 सीटों पर चुनाव लड़कर 54 सीटें जीती, लोजपा को 203 में से 10 सीटें मिली और कांग्रेस 51 में से नौ सीटें ही जीत पाई। यहाँ भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री कार्यालय में राखी कुर्सी पर बैठे।
साल 2010 में 243 सीटों पर हुए इन चुनावों में नीतीश कुमार की जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इन चुनावों में एनडीए गठबंधन में जदयू और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था और उनके सामने राजद और लोक जनशक्ति पार्टी का गठबंधन था। इन चुनावों में जनता दल यूनाइटेड ने 141 में से 115 सीटें और बीजेपी ने 102 में से 91 सीटें जीती। वहीं, राजद ने 168 सीटों पर चुनाव लड़कर 22 सीटें ला पायी। लोजपा 75 सीटों में से तीन सीटें लेकर आई थी। कांग्रेस ने पूरी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन उसे सिर्फ़ चार सीटें ही मिली। इसके बाद से कांग्रेस ने महागठबंधन में ही चुनाव लड़ा। इन चुनाव में बिहार की बड़ी पार्टी माने जाने वाली राजद का प्रदर्शन बहुत खराब रहा था जो फरवरी 2005 के चुनावों की 75 सीटों के मुक़ाबले सिमटकर 22 सीटों पर आ गई थी। 2010 में एनडीए की सरकार बनी और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने।
2015 का चुनाव कुल 243 सीटों पर हुआ था जिसमें जीतने के लिए 122 सीटों की ज़रूरत थी। इन चुनावों में लालू यादव की राजद और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल यूनाइटेड ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था। कांग्रेस ने 41 और भाजपा ने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। चुनाव के नतीजे आने पर राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इसके बाद जदयू को 71 सीटें और भाजपा को 53 सीटें मिली थी। इन चुनावों में कांग्रेस को 27 सीटें मिली। इन चुनाव में महागठबंधन की सरकार बनी और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, 2017 में जेडीयू महागठबंधन से अलग हो गई और नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। अब तक नीतीश कुमार भले नवमी बार प्रदेश का मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए हैं, हकीकत यह है कि स्थापना काल से अब तक जनता दल यूनाइटेड अपने बल पर नहीं, अपितु सांठ-गाँठ से ही प्रदेश सरकार बना पाई है। वैसे 2010 के विधानसभा चुनाव परिणाम में भाजपा को 91 स्थान मिले थे, फिर 74 स्थान हैं।
चुनाव आयोग की चिठ्ठी और नेताओं में हलचल
बहरहाल, पटना के सरदार पटेल मार्ग और दिल्ली के अशोका रोड पर स्थित राज्य और केंद्रीय चुनाव आयोग के कार्यालयों में अधिकारी, पदाधिकारी सभी बेहाल है। कहते हैं उनकी स्थिति वैसी हो गयी है जैसे ‘विवाह से कुछ समय पूर्व दूल्हा या दुल्हन में दुर्गुण निकलना ताकि विवाह के समय बवाल हो और फिर चक्रव्यूह का रचनाकार को फायदा ही फायदा। बिहार में 18वीं विधान सभा के गठन के पूर्व होने वाली चुनाव के चार महीना पहले निर्वाचन आयोग द्वारा यह निर्णय लेना कि प्रदेश की मतदाता सूची का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ आवश्यक है और इसी तर्ज पर राज्य के कुल 7.89 करोड़ मतदाताओं में से, 4.96 करोड़, जो 1 जनवरी, 2003 तक मतदाता सूची में थे, उन्हें केवल नया गणना फार्म भरकर जमा करना है। निर्वाचन आयोग चाहे जो भी कह ले, ज्ञान-विज्ञान की बातें करें, मत के लिए मतदाताओं को समझाए, हकीकत यह है कि शेष 2.93 करोड़ या लगभग 37 प्रतिशत मतदाताओं को 24 जून को जारी चुनाव आयोग के आदेश के अनुसार, मतपत्र पर बने रहने के लिए फॉर्म के अलावा नागरिकता स्थापित करने वाले दस्तावेज भी जमा करने होंगे।
चुनाव आयोग के अनुसार, “मौजूदा 7,89,69,844 मतदाताओं में से 4.96 करोड़ मतदाता, जिनके नाम पहले से ही 01.01.2003 को मतदाता सूची के अंतिम गहन पुनरीक्षण में हैं, उन्हें बस सत्यापन करना है, गणना फॉर्म भरना है और इसे जमा करना है।” प्रदेश के वर्तमान मतदाताओं को ड्राफ्ट रोल में शामिल होने के लिए 25 जुलाई तक फॉर्म जमा करने होंगे। जिन लोगों के नाम 2003 में नहीं थे – पिछली बार बिहार में गहन पुनरीक्षण किया गया था – और नए आवेदकों के लिए, चुनाव आयोग ने जन्म तिथि और/या स्थान का प्रमाण मांगा है। आयोग के अनुसार, यदि उनका जन्म 1 जुलाई 1987 से पहले हुआ है तो स्वयं का प्रमाण; यदि उनका जन्म 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच हुआ है तो स्वयं और एक माता या पिता की जन्म तिथि और/या स्थान का प्रमाण; और यदि 2 दिसंबर, 2004 के बाद पैदा हुए हैं तो स्वयं और दोनों माता-पिता की जन्म तिथि और/या स्थान का प्रमाण।
मतदाता सूची का पुनरीक्षण को लेकर प्रदेश में चतुर्दिक चर्चाएं हो रही है। विपक्षी दल चुनाव आयोग के इस कदम का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि गहन पुनरीक्षण से राज्य मशीनरी का इस्तेमाल करके मतदाताओं को जानबूझकर बाहर करने का खतरा है। जबकि चुनाव आयोग कहता है कि भारत का संविधान सर्वोच्च है। सभी नागरिक, राजनीतिक दल और भारत का चुनाव आयोग संविधान का पालन करते हैं। अनुच्छेद 326 एक मतदाता बनने की पात्रता निर्दिष्ट करता है। केवल भारतीय नागरिक, 18 वर्ष से अधिक और उस निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य निवासी, पात्र हैं।” चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण बेहद जरूरी है क्योंकि यह एक गतिशील सूची है, जो मौत, प्रवास की वजह से लोगों की शिफ्टिंग और 18 साल की उम्र पूरी कर चुके नए मतदाताओं के जुड़ने की वजह से बदलती रहती है।

चुनाव आयोग के, बिहार में करीब 4.96 करोड़ मतदाताओं को राज्य में चुनाव आयोग द्वारा जारी विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में कोई दस्तावेज जमा कराने की जरूरत नहीं है। उनके बच्चों को भी अपने माता-पिता से संबंधित कोई अन्य दस्तावेज जमा कराने की जरूरत नहीं है। ये मतदाता बिहार की 2003 की मतदाता सूची में हैं, जिसे आयोग ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। 2003 की मतदाता सूची की उपलब्धता की आसानी से राज्य में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में काफी सुविधा होगी, क्योंकि बिहार के कुल मतदाताओं में से करीब 60 फीसदी को कोई दस्तावेज जमा कराने की जरूरत नहीं होगी। आयोग ने सत्यापन व पुनरीक्षण का यह अभियान तब शुरू किया है, जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर उस पर गंभीर आरोप लग रहे थे। सूत्रों की मानें तो कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में प्रवासियों की संख्या वहां जीत के अंतर से अधिक हो गई है, जिससे लोकतांत्रिक अखंडता प्रभावित हो सकती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जहां 2001 में भारत में 31 करोड़ प्रवासी मतदाता थे, वहीं 2021 में इनके करीब 45 करोड़ होने का अनुमान है।
ज्ञातव्य हो कि विपक्षी दलों द्वारा राज्य विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान पर सवाल उठाए जाने के कुछ दिनों बाद उठाया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र मतदाता छूट न जाए और साथ ही कोई भी अपात्र मतदाता मतदाता सूची में शामिल न हो। आयोग के अनुसार, 77,895 बीएलओ पहले से ही मौजूद थे, और नए मतदान केंद्रों के लिए 20,603 और नियुक्त किए जा रहे हैं। गहन पुनरीक्षण के दौरान 1 लाख से अधिक स्वयंसेवक सहायता करेंगे। सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य राजनीतिक दल जो ईसीआई के साथ पंजीकृत हैं, उन्होंने पहले ही 1,54,977 बूथ स्तरीय एजेंट (बीएलए) नियुक्त किए हैं बिहार के 7,89,69,844 मतदाताओं के लिए बिहार के 243 विधानसभा क्षेत्रों में से प्रत्येक में मतदान शुरू हो चुका है।

कई लोग एक जगह के सामान्य निवासी होते हैं और उन्होंने अपना EPIC वहीं से प्राप्त किया है, लेकिन वे किसी तरह से जानबूझकर या अनजाने में माइग्रेशन करके अपना पुराना EPIC बनाए रखने में कामयाब हो गए हैं, जो एक आपराधिक अपराध है। मतदाता पहचान पत्र में मतदाताओं की तस्वीरें इतनी पुरानी हैं कि तस्वीरों का मिलान करना मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति में मतदाताओं की नई तस्वीरें पहचान में मदद करेंगी।कई अपात्र लोगों ने EPIC प्राप्त कर लिया है, क्योंकि 2003 के बाद सत्यापन नहीं हुआ है। उनके पात्रता संबंधी दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं हैं। इससे ऐसे लोगों की पहचान करना आसान हो जाएगा। शिकायतें भी खत्म होंगी। 1952 से 2004 तक 52 वर्षों में पूरे देश या भागों में नौ बार विभिन्न गहन पुनरीक्षणों के माध्यम से मतदाता सूची को नए सिरे से तैयार किया गया है। यानी औसतन हर छह साल में एक बार। हालांकि, बिहार में पिछले 22 वर्षों में गहन पुनरीक्षण नहीं किया गया है।
क्या लिखते हैं अखबार वाले
श्रावस्ती दासगुप्ता ने ‘द वायर’ में लिखती हैं कि भारत के चुनाव आयोग (ईसी) द्वारा चुनावी राज्य बिहार में मतदाता सूचियों का “विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)” करने के कदम – जिसमें 2003 में मतदाता सूची में शामिल नहीं होने वाले सभी मौजूदा मतदाताओं को अपनी और अपने माता-पिता की नागरिकता का प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है – ने चुनाव से कुछ महीने पहले इस अभ्यास की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए हैं। इसने बड़े पैमाने पर वंचितता, बहिष्कार और क्या चुनाव निकाय का इस्तेमाल राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लाने के लिए किया जा रहा है, के बारे में भी चिंताएँ पैदा की हैं।
घर-घर सत्यापन की घोषणा करते हुए आयोग ने कहा कि विभिन्न कारणों से यह जरूरी हो गया था, जिनमें से एक मतदाता सूची में “विदेशी अवैध अप्रवासियों” का शामिल होना था। चुनाव आयोग ने 24 जून को अपने बयान में कहा, “तेजी से शहरीकरण, लगातार पलायन, युवा नागरिकों का वोट देने के योग्य होना, मौतों की सूचना न देना और विदेशी अवैध अप्रवासियों के नाम शामिल होने जैसे विभिन्न कारणों से गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता पड़ी है ताकि मतदाता सूची की अखंडता और त्रुटि रहित तैयारी सुनिश्चित की जा सके।”
बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) को लिखे 19 पन्नों के पत्र के अनुसार, 01.07.2025 को अर्हक तिथि के रूप में स्वीकार किया गया है’ – मतदाताओं के लिए फॉर्म से पता चलता है कि 1 जुलाई 1987 से पहले पैदा हुए लोगों को अपनी जन्म तिथि और/या जन्म स्थान साबित करना होगा। 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच पैदा हुए लोगों को अपनी जन्म तिथि और अपने माता-पिता में से किसी एक की जन्म तिथि/स्थान साबित करना होगा। वहीं दूसरी ओर 2 दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुए लोगों को अपनी जन्म तिथि/स्थान के साथ-साथ अपने माता-पिता दोनों की जन्म तिथि/स्थान साबित करना होगा। बिहार में करीब 7.73 करोड़ मतदाता हैं। खास बात यह है कि बुधवार (25 जून) को शुरू हुई यह प्रक्रिया – इसकी घोषणा के एक दिन बाद – दो महीने में पूरी होगी।

मतदाता सूची का मसौदा 1 अगस्त को प्रकाशित किया जाएगा। मतदाताओं के पास दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 1 सितंबर तक का समय होगा और अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर को प्रकाशित की जाएगी। कहते हैं कि आयोग का यह कदम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उन आरोपों के बीच आया है, जिसमें कहा गया है कि अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों ने खुद को मतदाता के रूप में पंजीकृत कराया है। कांग्रेस ने भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मतदाताओं के साथ छेड़छाड़ के आरोप लगाए हैं। 24 जून के आदेश के पैराग्राफ 11 के अनुसार, चुनाव आयोग ने कहा: “चूंकि बिहार में अंतिम गहन संशोधन 2003 में किया गया था, इसलिए ईआरओ 2003 की मतदाता सूची को 01.01.2003 की योग्यता तिथि के साथ पात्रता के प्रमाण के रूप में मानेंगे, जिसमें नागरिकता की धारणा भी शामिल है, जब तक कि उन्हें कोई अन्य इनपुट प्राप्त न हो।”
श्रीपर्णा चक्रवर्ती ‘द हिंदू’ में लिखती हैं कि ‘बिहार में लगभग 2.93 करोड़ मतदाताओं को अपने स्वयं के जन्म की तारीख और स्थान के साथ-साथ 1987 के बाद पैदा हुए लोगों के मामले में अपने माता-पिता के जन्म की तारीख और स्थान को स्थापित करने वाले दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे, क्योंकि राज्य की मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) शनिवार (28 जून, 2025) से शुरू हुआ है। भारत के चुनाव आयोग बिहार से शुरुआत करते हुए पूरे देश में एसआईआर अभ्यास शुरू करने का फैसला किया है, इसके लिए कार्यक्रम अलग से जारी किए जाएंगे। बिहार में आखिरी बार इस तरह का गहन पुनरीक्षण 2003 में 1 जनवरी, 2003 को अर्हता तिथि के रूप में किया गया था।
बिहार में 7,89,69,844 मतदाता हैं, जिनमें से 4.96 करोड़ के नाम पहले से ही मतदाता सूची में मौजूद थे जब अंतिम एसआईआर 2003 में की गई थी। इन मतदाताओं को केवल गणना फॉर्म भरकर और उन्हें जमा करके खुद को सत्यापित करना है। हालांकि, ईसीआई के दिशानिर्देश कहते हैं कि जिस किसी का नाम 2003 की मतदाता सूची में दर्ज नहीं था, उसे मतदाता होने की अपनी पात्रता स्थापित करनी चाहिए और पात्र सरकारी दस्तावेजों की एक विस्तृत श्रृंखला का उपयोग करके प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिए। 1 जुलाई 1987 से पहले पैदा हुए लोगों के लिए, उनकी अपनी जन्मतिथि और जन्म स्थान को स्थापित करने वाला कोई भी दस्तावेज जमा करना होगा। 2 दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुए लोगों को अपने और अपने माता-पिता दोनों के लिए जन्म स्थान और जन्म तिथि का प्रमाण देना होगा।
डिमॉक्रेसी स्क्वायर्ड इनसाइट्स लिखता है कि क्या ECI अपनी सीमाएं लांघ रहा है? ECI का यह आदेश संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है। किसी नागरिक को सिर्फ उसकी उम्र के आधार पर संदिग्ध नागरिक मानना, लोकतंत्र के हर उस मूल्य का उल्लंघन है जिसके लिए इस देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने लड़ाई लड़ी। चुनाव आयोग का दावा है कि जिनके नाम 2003 की मतदाता सूची में हैं, उन्हें दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं। लेकिन 2003 में बिहार की मतदाता सूची में करीब 4.96 करोड़ नाम थे। आज की तारीख में उनमें से करीब 1.1 करोड़ लोग मृत हो चुके हैं (Sample Registration System के अनुसार)। यानी अब केवल 3.86 करोड़ ही बचे हैं। बाकी 4.22 करोड़ से अधिक युवाओं से कहा जा रहा है कि वो साबित करें कि वे भारत के नागरिक हैं। पर सवाल यह है — 2003 के बाद जन्मे व्यक्ति क्या विदेशी हो गए?
डीएसआइ के अनुसार, बिहार के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो सकती है। देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था — भारत निर्वाचन आयोग — ने एक आदेश जारी कर 1 जुलाई से 31 जुलाई के बीच बिहार के 40 वर्ष या उससे कम उम्र के 4.76 करोड़ लोगों से नागरिकता सिद्ध करने को कहा है। यह न केवल प्रशासनिक दृष्टि से असंवेदनशील है, बल्कि एक गहरे राजनीतिक एजेंडे की आहट भी प्रतीत होती है। यह निर्णय सवाल उठाता है कि क्या भारत अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है जहाँ एक नागरिक को अपने ही देश में अपने अस्तित्व को साबित करना होगा?
2020 में भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार की कुल वयस्क (वोटिंग आयु) आबादी 8.08 करोड़ आंकी गई थी। इनमें से लगभग 59% आबादी यानी 4.76 करोड़ लोग 40 वर्ष से कम आयु के हैं। और अब चुनाव आयोग इनसे कहता है — “अपनी नागरिकता प्रमाणित करें, वरना वोटर लिस्ट से नाम हट सकता है।” यह आदेश अचानक आया, बिना किसी पूर्व सूचना, पारदर्शिता या चरणबद्ध योजना के। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ आज भी लाखों लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र, नागरिकता दस्तावेज या स्थायी निवास प्रमाण पत्र नहीं हैं, वहाँ ये आदेश सीधे-सीधे जनता को मानसिक उत्पीड़न देने के समान है। इस आदेश से सबसे अधिक प्रभावित होंगी गांव की महिलाएं, जिनके पास दस्तावेजों की भारी कमी है। बिहार में आज भी लाखों महिलाएं ऐसी हैं जो कभी स्कूल नहीं गईं, उनके पास न आधार है, न वोटर कार्ड, न बैंक खाता — वे अपने पति या पिता के नाम पर ही सरकारी योजनाओं से जुड़ती रही हैं। अब उनसे अपनी नागरिकता सिद्ध करने को कहा जा रहा है — यह एक अन्याय का चरम है।
फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार अभिनन्दन मिश्र लिखते हैं
यह एक दुर्भाग्यपूर्ण कहानी है कि भाजपा ने — चाहे यह उनकी रणनीतिक पसंद रही हो या फिर सत्ता में बने रहने और सहयोगियों को नाराज़ न करने की मजबूरी — बिहार राज्य में नेतृत्व को न तो पोषित किया और न ही विकसित किया। जो नेता आज बिहार भाजपा के शीर्ष चेहरे माने जाते हैं, उनमें से किसी के पास ऐसा अनुभव या प्रभाव नहीं है कि वे तेजस्वी यादव को अकेले चुनौती दे सकें।
असल में, भाजपा के पास ऐसे लोग थे — और हैं — जिनमें नेता बनने की पूरी क्षमता थी। उनके पास अनुभव था, संगठनात्मक पकड़ थी, और जनाधार भी। लेकिन या तो उन्हें समय रहते प्रोत्साहित नहीं किया गया, या फिर उन्हें जानबूझकर उभरने नहीं दिया गया। जिनमें सामर्थ्य था, उन्हें बड़ा बनने की जगह नहीं दी गई। यही वह गहरी कमी है जो भाजपा की नेतृत्व निर्माण प्रक्रिया को उजागर करती है — वर्षों सत्ता में रहने के बावजूद एक भी सशक्त और विश्वसनीय विकल्प खड़ा नहीं किया गया। समय के साथ पुराने नेताओं का धीरे-धीरे किनारे होना स्वाभाविक और आवश्यक प्रक्रिया है, लेकिन जब उनके स्थान पर कोई विश्वसनीय चेहरा न हो, तो उसका नुकसान होता है। ऐसी स्थिति में आपको दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है — कई बार उन पर भी, जो न तो आपकी विचारधारा से जुड़े हैं, न ही आपकी संरचना से।

हर बीतते हफ्ते के साथ यह और स्पष्ट होता जा रहा है कि मौजूदा मुख्यमंत्री अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम चरण में हैं — एक ऐसी यात्रा जो चार दशकों से भी लंबी रही है, जिसमें दो दशक मुख्यमंत्री के रूप में शामिल हैं। ऐसे में कई महत्वाकांक्षी चेहरे इस खाली होती जगह को भरने की तैयारी में जुट गए हैं। चिराग पासवान से लेकर प्रशांत किशोर तक — हर कोई इसे अपने लिए बड़ा अवसर मान रहा है। हर कोई अपना एजेंडा पेश कर रहा है — एक ऐसी भाषा में, एक ऐसे लहजे में, जो कविता की तरह लगे और बिहार के मतदाताओं को आकर्षित करे। इसी बीच, जो पुराने नेता वर्षों के ज़मीनी अनुभव और समाज के विविध वर्गों से संवाद के दम पर उभरे थे, वे अब हाशिये पर डाल दिए गए हैं। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को अब ज़मीनी सच्चाई की एक संकीर्ण और छँटी हुई तस्वीर ही मिलती है। वे स्थानीय नेता, जिनकी बात ऊपर तक पहुंचती है, वही कहते हैं जो उनके अपने राजनीतिक हितों के अनुकूल होता है। इससे पार्टी के पास ज़मीनी हालात की कोई वस्तुनिष्ठ समझ नहीं बचती।
फिर भी, अगर बिहार में एनडीए सत्ता में आती है, तो मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा। लेकिन उसका चयन शायद उन्हीं तर्ज़ों पर होगा, जैसे मध्यप्रदेश में मोहन यादव या राजस्थान में भजनलाल शर्मा — यानी ऐसे चेहरे जो दौड़ में कभी नज़र ही नहीं आए।
वर्तमान स्थिति यह है कि बिहार भाजपा के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो स्वर्गीय सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, अश्विनी चौबे या उस पीढ़ी के अन्य दिग्गजों की जगह ले सके।
और क्या कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल कादिर
उधर, टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के पूर्व संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल कादिर एक प्रश्न उठाये हैं क्या क्या भाजपा बिहार चुनाव से दूर भाग रही है? उनका कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में बहुत कम समय में गहन संशोधन करने के अत्यधिक विवादास्पद निर्णय, बिहार में एनडीए के सहयोगियों के बीच विवाद, नीतीश कुमार से छुटकारा पाने और उनके समर्थन आधार को हड़पने की इच्छा, भाजपा की राज्य इकाई की आंतरिक गतिशीलता आदि को देखते हुए उत्तर सकारात्मक प्रतीत होते हैं। सत्तारूढ़ पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में स्वयंभू बनिया ने बिहार में स्थगित चुनाव के लाभ और हानि का ध्यान रखा होगा और यह निष्कर्ष निकाला होगा कि विलंबित चुनाव पार्टी की चुनावी रणनीति के लिए बेहतर हैं और आसन्न जन आक्रोश और मुकदमेबाजी भाजपा को पार्टी के दृष्टिकोण से बेहतर समय में चुनाव कराने का बहाना प्रदान कर सकते हैं।

आइए देखते हैं कि स्थगित चुनाव भाजपा के एजेंडे के लिए किस तरह अनुकूल होंगे। यदि संशोधन के मुद्दे पर जन आक्रोश कानून और व्यवस्था की स्थिति पैदा करता है, तो पार्टी किसी तरह नीतीश को लंगड़ा मुख्यमंत्री बनाकर चीजों को संभाल सकती है और इस साल के अंत में नीतीश का कार्यकाल समाप्त होने पर राष्ट्रपति शासन लगा सकती है। प्लान बी के तहत, अगले कुछ हफ्तों में राज्य के बड़े हिस्से में हर साल आने वाली बाढ़ के कारण संशोधन की प्रक्रिया पर रोक लग जाएगी और चुनाव आयोग व्यापक संशोधन की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए और समय मांग सकता है। व्यापक संशोधन योजना को पूरा किए बिना चुनाव आयोग के बिहार में चुनाव कराने की संभावना नहीं है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा नीतीश कुमार के समर्थन आधार पर नजर रख रही है। सीएम की गिरती सेहत और कथित विश्वसनीयता में कमी उनके गठबंधन सहयोगी के लिए वरदान साबित हुई है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा ने जेडी(यू) खेमे में बहुत सारे ट्रोजन हॉर्स लगा दिए हैं। आप उन्हें भाजपा के स्लीपर सेल भी कह सकते हैं, जिन्हें कभी भी सक्रिय किया जा सकता है। एक बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाने के बाद, नीतीश से निपटना बहुत आसान हो जाएगा और भाजपा ‘मेरे रास्ते या राजमार्ग’ की स्थिति में होगी। गठबंधन का दिखावा तो होगा, लेकिन ज्यादातर फैसले भाजपा ही लेगी। अगर राष्ट्रपति शासन की स्थिति सच साबित होती है, तो भाजपा राज्य मशीनरी पर पूरी तरह नियंत्रण कर लेगी और पिछले ग्यारह वर्षों में इसने सत्ता के लीवर को नियंत्रित करने की कला, विज्ञान और वाणिज्य में महारत हासिल कर ली है। नौकरशाही के एक बड़े हिस्से में दासता का विज्ञान दिखने के कारण भाजपा के लिए चुनाव प्रबंधन में अपनी पैठ बनाना मुश्किल नहीं होना चाहिए।
याद कीजिए कि लोकप्रिय धारणा के अनुसार, तत्कालीन चुनाव आयोग के सलाहकार केवी राव के साथ मिलकर काम करने वाले बिहार के कुछ नौकरशाहों ने वर्ष 2005 में एनडीए के लाभ के लिए चुनाव मशीनरी में हेरफेर किया था। प्रतिबद्ध नौकरशाहों की नई नस्ल हमेशा सत्तारूढ़ पार्टी के लिए विकेटों के बीच दौड़ लगा सकती है। हाल ही में, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा भी बिहार में एनडीए के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाले नेता बनकर उभरे हैं। राष्ट्रपति शासन के तहत उनसे निपटना सबसे कमजोर लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत ऐसा करने से कहीं अधिक आसान होगा। भाजपा के एक बहुत वरिष्ठ नेता पटना के 1 अणे मार्ग में भगवा पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष के स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के सपने को पूरा करना चाहते हैं। वाजपेयी के सपने को साकार करने में नीतीश कुमार सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरे हैं।
बीजेपी के साथ समस्या यह है कि सुशील मोदी के बाद, पार्टी ने बिहार की राजनीति में एक ऐसा चेहरा नहीं गढ़ा है जो देखने लायक हो और स्वीकार्य भी हो। मंडल के बाद की बिहार की राजनीति की वास्तविकताओं के कारण उसके पास विकल्प सीमित हो गए हैं, जहां शीर्ष पद के लिए किसी भी गैर-ओबीसी उम्मीदवार की उम्मीदवारी खारिज कर दी गई है।ऐसा लगता है कि नित्यानंद राय पहले ही हार चुके हैं। सम्राट चौधरी राजनीतिक रूप से उदार माहौल में पले-बढ़े हैं, क्योंकि उनके पिता कांग्रेस में रहे हैं और चौधरी खुद राबड़ी देवी के नेतृत्व में मंत्री थे। बीजेपी को अपनी चालबाजियों से मोहन यादव, भजन लाल शर्मा या मोहन चरण मांझी को बाहर निकालने के लिए समय चाहिए। और फिर राजनीति, खासकर बिहार की राजनीति अब संभव की कला नहीं रह गई है। राजनीति के नए व्याकरण में असंभव एक संभावना बन गई है।




















