रायसीना पहाड़ / अशोक रोड (नई दिल्ली) : दिल्ली के कर्तव्य पथ इण्डिया गेट से रायसीना पहाड़ की ओर जाते भारतीय जनता पार्टी के दो शीर्षस्थ नेताओं के बीच वार्तालाप जारी है। दोनों का मानना है कि यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार किसी भी तथ्य को कितना ‘गोपनीय’ रख सकते हैं, यह कहना कठिन है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिवेश के मद्दे नजर उन्होंने कोई 13-करोड़ के प्रश्न पर चर्चाएं छेड़े कि आगामी 2 नवम्बर को देवोत्थान एकदशी और तीन दिन बाद 5 नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा के बाद बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा? नीतीश कुमार रहेंगे या नीतीश कुमार पूर्व-मुख्यमंत्री की कतार में पंक्तिबद्ध होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं का नाम बिना अपने होठों पर लाये दोनों एक स्वर में कहते हैं: ‘कुछ ऐसा ही होने वाला है।’
दोनों नेता आपस में इस बात पर चर्चा करते हैं कि कल के जिस किंग्सवे और राजपथ को हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कर्तव्य पथ का नाम देकर भारत के लोगों को अपने-अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने का आह्वान किया, विगत कुछ महीनों में प्रधानमंत्री का तीन-तीन बार बिहार का भ्रमण-सम्मेलन के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्रियों का बिहार का दौरा करना इस बात का सूचक है कि श्री मोदी जी अब अधिक संख्या होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी को ‘सहायक’ के रूप में और उसके नेताओं को ‘जनता दल यूनाइटेड’ के नीचे नहीं रहने देना चाहते हैं। कर्तव्यपथ के दोनों तरफ की हरियाली को देखते, उस पर सकारात्मक टिपण्णी करते पहले कहते हैं कि ‘आज भारत का शायद ही कोई व्यक्ति होगा तो पैदल इस चमचमाते सड़क पर नहीं चलना चाहेगा। आज अगर राज कपूर जीवित होते, या फिर सत्यजीत रे जीवित होते, बिमल राय जीवित होते, गुरु दत्त जीवित होते, यश चोपड़ा जीवित होते, बीआर चोपड़ा जीवित होते तो मोदी जी की इस महानतम उपहार को देखकर कर्तव्यपथ को अपने किसी न किसी सिनेमा में स्थान अवश्य देते।
तभी एक नेता कहते हैं, आज भी बिहार में प्रदेश के मुख्यमंत्री जो भी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने प्रदेश के विकास में चार चाँद लगा दिया है, यह कहने में हिचकी लेने लगते हैं कि विगत 11-वर्षों में अगर प्रधानमंत्री का सहयोग नहीं रहता उन्हें तो कुर्सी पर भी विराजमान नहीं होते। अब आप ही सोचिये, वर्तमान विधानसभा में भाजपा की जितनी संख्या (80) है, उसकी आधी संख्या (45) है जनता दल यूनाइटेड है। वैसी स्थिति में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना नीतीश कुमार के लिए तो सपना ही होता न। वह तो प्रधानमंत्री की उदारता है कि उन्हें बैठा दिए। लेकिन अगर यह प्रक्रिया इस बार भी दोहराते हैं तो भाजपा के प्रादेशिक नेताओं का अपमान होगा। यह बात मोदी जी जानते हैं।
अब तक दोनों नेता मौलाना आज़ाद रोड और सेना भवन की ओर से आने वाली सड़क जो कर्तव्य पथ से मिलती आगे निकल जाती है, पहुँच गए थे। तभी दूसरे नेता कहते हैं, नवम्बर 22 को बिहार का वर्तमान विधानसभा का काल समाप्त होने जा रहा है। स्वाभाविक है चुनाव के मद्दे नजर, खासकर आचार संहिता लगने से पूर्व, दिल्ली से पटना तक, प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री तक सबकी निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय में लगी कुर्सी पर टिकी है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मन में मनभर का लड्डू फूटना स्वाभाविक है – फिर एक बार मुख्यमंत्री बनने के लिए। लेकिन दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर नवनिर्मित कॉर्पोरेट कार्यालय नुमा भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में एक ओर जहाँ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर टिकी हैं, वहीं दूसरी ओर मंथन जारी है कि बिहार में राजनीतिक किला फतह के लिए बिहार से ही उपराष्ट्रपति लाना होगा, वह भी ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं, अपितु वैश्य या शूद्र। गणना आप सभी ज्ञानी महात्मा करें।
इस बात को सुनते है पहले नेता कहते हैं आपको याद होगा ही कि 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद बिहार के तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद जिन्हे राष्ट्र का गोविन्द बनाया गया था, दलित समुदाय से थे। परिणाम यह हुआ कि 2019 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के 30 से अधिक स्थानों को प्रधानमंत्री के चरणों में अर्पित कर दिए। इसका फल उन्हें 42 संख्या आने के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। आप माने अथवा नहीं, साल 2019 से अभी तक, सैद्धांतिक रूप से भले नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं, व्यावहारिक रूप से नियंत्रण भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय से ही है। वैसी स्थिति में आगामी चुनाव में जनता दल यूनाइटेड 42 से 20 पर आएंगे या 2 पर, यह तो नीतीश कुमार की आत्मा ही जानती है; लेकिन दीनदयाल उपाध्याय मार्ग की हवाएं यह बता रही है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी के आला कमान इस बात से आश्वस्त हैं कि उन्हें प्रदेश में सरकार बनाने में ‘बैसाखी’ की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
वैसे रायसीना पहाड़ी पर आते आते दोनों नेता दो दिशाओं में हो गए, लेकिन जाने से पहले दोनों इस बात पर जोर से ठहाका लगाए कि सन 1990 से पहले बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली की ओर टकटकी निगाहों से देखते रहते थे। कई मर्तबा तो एक ही विधानसभा काल में चार-पांच मुख्य मंत्री कुर्सी पर बैठे। आया-राम-गया-राम का मुहाबरा बिहार से ही चला। राष्ट्रीय जनता दल की सरकार तो प्रदेश को सत्यानाश कर ही दिया। लेकिन जब से नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने उनकी भी रीढ़ की हड्डी उतनी मजबूत नहीं रही। कभी इधर, कभी उधर देखते, नाप-जोख करते कुर्सी पर विराजमान रहे। जब से मोदी जी प्रधानमंत्री बने, तबसे नीतीश कुमार भी उन्हें उसी तरह देखते आ रहे हैं ‘अपेक्षा की नज़रों’ से जैसे कांग्रेस के कालखंड में मुख्यमंत्री दिल्ली की ओर इंदिरा गांधी को देखते थे। वह तो मोदी जी सब कुछ जानकार भी अनजान बने हैं।
बहरहाल, भारत के 17वां उपराष्ट्रपति के निर्वाचन हेतु निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की अधिसूचना 7 अगस्त, 2025 को जारी की जाएगी। नाम-निर्देशन करने की अंतिम तारीख 21 अगस्त, 2025 और नाम-निर्देशनों की संवीक्षा की तारीख 22 अगस्त, 2025 होगी। अभ्यर्थिताएं वापस लेने की अंतिम तारीख 25 अगस्त, 2025, मतदान की तारीख 9 सितंबर, 2025 और मतदान की और गणना 9 सितम्बर को ही होगी। राष्ट्रपतीय और उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन नियम, 1974 के नियम 8 के अनुसार, निर्वाचन के लिए मतदान संसद भवन में आयोजित किया जाएगा। मतदान, यदि आवश्यक हुआ तो, कमरा सं. एफ-101, वसुधा, प्रथम तल, संसद भवन, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।
निर्वाचन आयोग ने केंद्र सरकार के परामर्श से, 25 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से भारत के उपराष्ट्रपति के पद के वर्तमान निर्वाचन के लिए रिटर्निंग अधिकारी के रूप में राज्य सभा के महासचिव को नियुक्त किया है। आयोग ने 25 जुलाई, 2025 की अधिसूचना के माध्यम से संसद भवन (राज्य सभा) में रिटर्निंग अधिकारी की सहायता करने के लिए दो सहायक रिटर्निंग अधिकारियों की भी नियुक्ति की है। 17वें उपराष्ट्रपति निर्वाचन, 2025 के लिए निर्वाचक-मंडल में निम्न शामिल हैं: राज्य सभा के 233 निर्वाचित सदस्य (वर्तमान में 05 सीटें रिक्त हैं), राज्य सभा के 12 मनोनीत सदस्य, और लोक सभा के 543 निर्वाचित सदस्य (वर्तमान में 01 सीट रिक्त है) निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के कुल 788 सदस्य (वर्तमान में 782 सदस्य) शामिल हैं। चूंकि, सभी निर्वाचक संसद के दोनों सदनों के सदस्य हैं, इसलिए संसद के प्रत्येक सदस्य के मत का मान एक समान अर्थात 1 (एक) होगा।
बहरहाल, चुनाव आयोग द्वारा नए उप-राष्ट्रपति के चुनाव की घोषणा के साथ ही, इस संवैधानिक पद पर अगला पदभार ग्रहण करने वाले व्यक्ति को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। कहा जा रहा था कि चूंकि इस चुनाव के लिए कोई समय सीमा नहीं है, इसलिए इसमें देरी हो सकती है, क्योंकि राज्यसभा के उपसभापति उच्च सदन के मुख्य पीठासीन अधिकारी होंगे। हालांकि, चुनाव की घोषणा से संकेत मिलता है कि भाजपा इस मुद्दे पर किसी भी तरह की अटकलों को खत्म करने के लिए जल्द ही नए उपराष्ट्रपति का चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पर अपने कार्यकाल के दौरान हर मुद्दे पर बोलने और पक्ष लेने के कारण सदन की मर्यादाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था। इस संदर्भ में, यह याद रखना होगा कि जब 2022 में धनखड़ उपराष्ट्रपति चुने गए थे, तब भाजपा के पास पूर्ण बहुमत था, इसलिए उन्हें उपराष्ट्रपति पद दिलाने में कोई समस्या नहीं थी। 2024 के चुनावों के बाद कम संख्या बल के साथ, भाजपा, अपने उम्मीदवार को निर्वाचित कराने की स्पष्ट स्थिति में है, लेकिन उसे अपने गठबंधन सहयोगियों की संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना होगा। आज की स्थिति में, सहयोगी दल पूरी तरह से भाजपा नेतृत्व के साथ हैं, और अगर विपक्ष अपना उम्मीदवार खड़ा करके कोई औपचारिक लड़ाई नहीं लड़ने का फैसला करता है, तो अगला उप-राष्ट्रपति सर्वसम्मति से चुना जाएगा। ऐसी खबरें भी हैं कि इस मामले में आरएसएस की भूमिका हो सकती है, इसलिए उसकी स्वीकृति भी आवश्यक होगी।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक पंकज वोहरा का मानना है कि ‘कई राजनीतिक विश्लेषक नए उप-राष्ट्रपति के चयन को अगले भाजपा अध्यक्ष के फैसले से भी जोड़ रहे हैं। यह सर्वविदित है कि वर्तमान भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का विस्तारित कार्यकाल जल्द ही समाप्त होने वाला है, और यदि उनके उत्तराधिकारी का चयन नहीं हो पाया है, तो इसका मुख्य कारण पार्टी नेतृत्व और आरएसएस के बीच किसी एक नाम पर सहमति न बन पाना है। कई नाम सार्वजनिक रूप से सामने आए, लेकिन एक-एक करके, आम सहमति के अभाव में वे गायब हो गए। भाजपा के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह अगले उपराष्ट्रपति के रूप में अपना उम्मीदवार चुने, ताकि राजनीतिक हलकों में इस मामले में उसकी पूर्ण भागीदारी का स्पष्ट संदेश जाए। उपराष्ट्रपति की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वह राज्यसभा के सभापति भी हैं।’
उनका कहना है कि जो लोग भाजपा-आरएसएस संबंधों पर, खास कर पिछले एक साल से, नज़र रखे हुए हैं, उनके लिए आरएसएस केवल उसी व्यक्ति को हाँ कहेगा जिसका संघ के संबंध में एक सिद्ध ट्रैक रिकॉर्ड हो। इससे धनखड़ जैसे किसी भी व्यक्ति का चयन संभव नहीं है, जिन्हें चुना गया, हालांकि उनके करियर के अलग-अलग दौर में जनता दल और कांग्रेस, दोनों के साथ रहने का अनुभव रहा है। दूसरे शब्दों में, अगला उप-राष्ट्रपति संघ परिवार से ही होना चाहिए, जब तक कि भाजपा मोहन भागवत और उनके साथियों को ऐसे चुनाव में आने वाले राजनीतिक लाभ के बारे में समझाने में सफल न हो जाए।
हालाँकि, संघ के भीतर के माहौल को देखते हुए, यह करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। एक तरीका यह हो सकता है कि अगर भाजपा का वर्तमान नेतृत्व और संघ, पार्टी के अगले अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, दोनों पर एक साथ सहमति बना लें, तो आरएसएस इस पर सहमत हो सकता है। अगर अगले पार्टी प्रमुख के लिए आरएसएस की बात मान ली जाती है, तो वह अगले उपराष्ट्रपति के लिए भाजपा की पसंद को स्वीकार कर सकता है। यह एक तरह से लेन-देन जैसा हो सकता है। इस बात की भी ज़ोरदार अटकलें हैं कि मानसून सत्र के तुरंत बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है। यह निश्चित रूप से प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है, लेकिन इस प्रक्रिया का उपयोग सभी हितधारकों को संतुष्ट करने और आगे आने वाली किसी भी नई चुनौती का सामना करने के लिए किया जा सकता है।
मंत्रिमंडल में फेरबदल और पार्टी का पुनर्गठन, दोनों ही शायद यह सुनिश्चित करने की कुंजी होंगे कि भाजपा और संघ के बीच सौहार्द किसी भी तरह से न बिगड़े। अगले उपाध्यक्ष पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। यह चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगला उपाध्यक्ष वर्तमान राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने पर भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के लिए भी योग्य होगा। कई उपराष्ट्रपति आगे चलकर राष्ट्रपति बने हैं, लेकिन ऐसे भी कई उदाहरण हैं जो राष्ट्रपति नहीं बन पाए। उपराष्ट्रपति पद के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नाम भी चर्चा में है, जिन्हें संघ के कुछ प्रमुख पदाधिकारियों का समर्थन प्राप्त है और वे अपने विरोधियों को भी स्वीकार्य हैं।
सवाल यह उठेगा कि क्या प्रधानमंत्री उन्हें उनके वर्तमान पद से मुक्त करना चाहेंगे, क्योंकि सरकार के अनुसार “ऑपरेशन सिंदूर” अभी भी “जारी” है। कुछ हलकों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि जम्मू-कश्मीर के वर्तमान उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, जो प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों के करीबी हैं, के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। उनका चयन संघ की स्वीकृति पर निर्भर करेगा। आरिफ मोहम्मद खान, गुलाम नबी आज़ाद और नीतीश कुमार जैसे अन्य नाम भी चर्चा में हैं।
हालांकि, मुख्य मुद्दा यह है कि अगला भाजपा अध्यक्ष कौन होगा, क्योंकि दोनों मामलों पर एक साथ निर्णय लिया जाएगा और वे किसी न किसी तरह आपस में जुड़े हुए हैं। आरएसएस ने भाजपा के शीर्ष पद के लिए अपनी प्राथमिकताएँ पहले ही बता दी हैं और अब भाजपा की प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहा है। यह भविष्य के भाजपा-आरएसएस संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण चरण है।

















