अधिक खुश नहीं हों, ‘बिहार युवा आयोग’ का गठन ‘आपके लिए नहीं’, बल्कि ‘विधायकों को समायोजित करने, खुश करने के लिए’ किया गया है

सच कहते हैं हम, खुशी हो या ग़म, बाँट लेंगे हम आधा आधा, ये वादा… हाँ वादा… ये वादा रहा… ... ये वादा रहा।

अन्ने मार्ग (पटना) / कर्तव्य पथ (नई दिल्ली) : ‘शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं।’ एग्यारह शब्दों की हिदायत वाली कविता को बिहार ही नहीं, भारत के लोग, मतदाता, चाहे वे किसी भी उम्र के हों, किसी भी जाति और समुदाय के हों, अवश्य पढ़े होंगे। लेकिन चुनाव का समय आते ही राजनेताओं द्वारा ‘वशीकरण मन्त्र’ से ओत-प्रोत आकर्षक योजनाओं को चुनावी मैदान में फेंका जाता है कि मतदाता मतदान केंद्र पर पहुँचते-पहुँचते जाल में फंस ही जाते हैं और फिर अगले पांच साल तक सरकार, शासन, व्यवस्था की आलोचना करते नहीं थकते।  

बिहार में 18 वीं विधानसभा चुनाव की घोषणा अभी हुई भी नहीं कि नेताओं और राजनीतिक पार्टियों द्वारा जाल बिछाये जाने लगा है। आज फिर से भांति भांति के आकर्षक दाने और रंग बिरंगी जाल बिछाकर एक बार फिर से मतदाताओं को फांसने की तमन्ना मे कमर कस कर निकल रहे हैं। देखना है अब कि समाज सुधारकों, समाज को तथाकथित रूप से जागृत करने वालों, मार्गदर्शकों की बात को मतदाता रूपी तोता कितना अमल करता है । विगत चार दशक में कितने आयोग यह बिहार सरकार के सचिवालय से जानकारी प्राप्त कर लें। यह भी देखें की उन आयोगों की सिफारिशों पर कितने मन मिट्टी जमी है। 

जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति वर्ष (1974) के चार साल बाद 1978 में प्रमोद चक्रवर्ती अपने निर्देशन में ‘आज़ाद’ सिनेमा का निर्माण किये थे। इस फिल्म में मुख्य भूमिका में थे धर्मेंद्र, मालिनी, अजित, प्रेम चोपड़ा और केश्टो मुखर्जी। इस इस ऐक्शन थ्रिलर में सिनेमा में एक गीत था, जिसके गीतकार थे आनंद बक्शी, संगीतकार राहुलदेव वर्मन और गाये थे किशोर कुमार-लता मंगेशकर।

गीत का मुखरा था:

अरे जान की कसम,
सच कहते हैं हम, 
खुशी हो या ग़म, 
बाँट लेंगे हम आधा आधा, 
ये वादा… हाँ वादा…
ये वादा रहा… … ये वादा रहा।
 

कल जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 18 वीं विधानसभा चुनाव के पूर्व ‘बिहार युवा आयोग’ के नाम से एक और आयोग गठन करने की घोषणा किये, अचानक साल 1978 का ‘आज़ाद’ सिनेमा का वह गीत याद आ गया। पता हैं क्यों? आप को भले इस बात का वादा किया गया हो कि युवकों के कल्याणार्थ प्रदेश में बिहार युवा आयोग गठन करने का फैसला ली है सरकार; हकीकत यह है कि नीतीश कुमार अपने और सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के विधायकों को समायोजित करने के लिए आयोगों का गठन हैं। सभी विधायकों को मंत्रिमंडल में तो कुर्सी नहीं दी जा सकती है, स्वाभाविक है इन आयोगों में समायोजित कर उन्हें कैबिनेट या स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों को मिलने वाली सुविधाओं से सज्ज देंगे। 

इतना ही नहीं, अब तक बने सभी आयोगों और संगठनों में कौन भारतीय जनता पार्टी के ‘अतृप्त’ विधायकों के हिस्से आएगा और कौन जनता दल यूनाइटेड के विधायकों को मिलेगा, इसका दस्तावेज भी तैयार कर लिया गया है। अध्यक्ष से लेकर सदस्य तक, औसतन एक आयोग में आठ से दस विधायक तो समायोजित हो ही जायेंगे। बिहार में वर्तमान में नवगठित ‘बिहार युवा आयोग’ के अलावे किसान आयोग, सवर्ण आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, बाल श्रमिक आयोग, सुन्नी वक्फ बोर्ड, पिछड़ा वर्ग आयोग, युवा आयोग, व्यापार आयोग एवं संस्कृत शिक्षा बोर्ड, महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, अति पिछड़ा आयोग, महादलित आयोग, खाद्य संरक्षण आयोग, शिया वक्फ बोर्ड, बाल संरक्षण आयोग, मदरसा शिक्षा बोर्ड एवं नागरिक परिषद हैं। 

आंतरिक सूत्रों का यह भी मानना है कि अगर विधायकों को समायोजित करने में तकलीफ होगी तो वर्तमान के आयोग और परिषदों में भी विभाजन संभव है और इसके लिए सरकारी बोर्ड और आयोगों का पुनर्गठन होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह-सह-सहकारिता मंत्री अमित शाह ने प्रदेश के नीतीश कुमार से सम्पूर्ण आयोगों सूची मांगे हैं। साथ ही, भाजपा इस बात पर भी विशेष पहल कर रही है कि प्रदेश ही नहीं, केंद्र में भी जिन-जिन राजनीतिक पार्टियों का उसे सहयोग मिल रहा है, उसे अपने-अपने राज्यों में (बिहार सहित) बराबर का और संतोषजनक हिस्सा मिले। इन आयोगों और परिषदों के माध्यम से सत्तारूढ़ दलों के करीब डेढ़ सौ नेताओं-कार्यकर्ताओं को राज्य मंत्री, उप मंत्री का दर्जा, वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं मिलेंगी। 

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यह कहा जा रहा है कि युवा आयोग के साथ-साथ किसान आयोग, सवर्ण आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, बाल श्रमिक आयोग, सुन्नी वक्फ बोर्ड, पिछड़ा वर्ग आयोग, युवा आयोग, व्यापार आयोग एवं संस्कृत शिक्षा बोर्ड भाजपा के हिस्से में अंकित किया गया है, जबकि महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, अति पिछड़ा आयोग, महादलित आयोग, खाद्य संरक्षण आयोग, शिया वक्फ बोर्ड, बाल संरक्षण आयोग, मदरसा शिक्षा बोर्ड एवं नागरिक परिषद आदि जनता दल यूनाइटेड के हिस्से में गया है। ज्ञातव्य हो कि आयोग और बोर्ड के अध्यक्ष को बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को उसके सदस्य के समकक्ष वेतन, भत्ता एवं अन्य सुविधाएं दी जाती हैं। राज्य सरकार अपने विवेक से मंत्री, राज्यमंत्री और उप मंत्री का दर्जा भी देती है।

वर्षों पहले प्रोफ़ेसर डी एम दिवाकर ने कहा था कि बिहार सरकार की ओर से 1971 में मुंगेरी लाल आयोग का गठन और लोकतंत्र को बचाने के लिए 1974 का जेपी आंदोलन भी उनमें से एक था, जिसमें महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी दूर करने के साथ सामाजिक परिवर्तन का नारा दिया गया। नेतृत्व का सामाजिक समीकरण बदला। 1977 की जनता पार्टी की सरकार में कर्पूरी ठाकुर इस धारा के सर्वमान्य नेता थे। यह इस बात का भी प्रमाण था कि सर्वमान्य नेता बनने के लिए विचार और आचरण का मूल्य महत्वपूर्ण था, संख्या बल नहीं। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1977 में दी थी। जनता पार्टी की सरकार ने 1978 में उन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए लागू कर दिया जिसमें 127 पिछड़ी जातियों की पहचान करके सामाजिक न्याय का व्यावहारिक शास्त्र गढ़ा गया था। हालांकि उच्च जाति के लोग इसके बाद कल तक के सर्वमान्य नेता कर्पूरी ठाकुर को पिछड़ी जाति का नेता समझने लगे और जाति की राजनीति खत्म होने के बजाय संगठित होने लगी। 

उसी दौरान केंद्र में जनता पार्टी ने भी देश में सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए मोरारजी देसाई की सरकार की अगुवाई में 1979 में मंडल आयोग का गठन किया। वीपी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की कोशिश की और आखिरकार सभी सिफारिशों को तो नहीं लेकिन 1993 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने आरक्षण की सिफारिशों को लागू कर दिया। सामाजिक न्याय और हिंदुत्व के टकराव में सामाजिक ताना-बाना चरमराया। लालू प्रसाद की सरकार ने आडवाणी का रथ बिहार में रोका।मुसलमानों का विश्वास सामाजिक न्याय की सरकार पर बढ़ा। बिहार की राजनीति में यादव और मुसलमान की संयुक्त ताकत परवान चढ़ी। पटना का गांधी मैदान विभिन्न जातियों की रैलियों का गवाह बना। 

पिछड़ी जातियों में भी नेतृत्व की महत्वाकांक्षा का जगना और असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक था। हालांकि उसे रोकने के लिए सामाजिक न्याय को मजबूत कदम उठाने के बजाय लालू प्रसाद ने अगड़ी जातियों के विरुद्ध कथित तौर पर ‘भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ करो’ का नारा दिया। मंझोली जातियों की असंतुष्ट धारा ने उच्च जाति के साथ संगठित होकर नया विकल्प उभारा और जिन्होंने राजद को सत्ता से बाहर रखने के लिए नीतीश कुमार में संभावना तलाश की और उनका साथ दिया। केंद्र में एनडीए की सरकार ने राज्य में लालू-राबड़ी के सरकार के प्रति गुस्से को आधार बनाया।बिहार में भी राजग की सरकार बनी। एक नए सामाजिक समीकरण जिसमें मंझोली जातियों के नेतृत्व के साथ सरकार में प्रमुखता भी रही और अगड़ी जाति की सत्ता में भागीदारी भी।बिहार की एनडीए सरकार ने इस नए सामाजिक समीकरण में जाति के ऊपर विकास के मुद्दे को रखा। 

पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न प्रणब मुखर्जी और पूर्व भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी श्री मुचकुंद दुबे (दोनों दिवंगत: श्रद्धांजलि)

बहरहाल, नीतीश कुमार ने 2005 में जब सत्ता संभाली थी तब शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने के लिए 2006 में पूर्व विदेश सचिव मुचकुन्द दुबे की अध्यक्षता में कॉमन स्कूल सिस्टम कमीशन बनाया था। शिक्षा विभाग के सचिव भी उसमें शामिल थे। आयोग ने 1 साल के अंदर ही रिपोर्ट नीतीश सरकार को सौंप दी। आज मुचकुन्द दुबे नहीं हैं और उनकी रिपोर्ट 19 वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी है।उस रिपोर्ट को कौन बाहर निकलेगा एक बड़ा सवाल है, क्योंकि उस रिपोर्ट को तो सभी सही बता रहे हैं लागू होने पर क्रांतिकारी बदलाव होने की बात कह रहे हैं, लेकिन रिपोर्ट को लागू करने में जितनी बड़ी राशि खर्च होगी वह बिहार जैसे राज्य के लिए आसान नहीं है, कहकर बात को दरकिनार कर रहे हैं। भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी पद पर रहने के बावजूद दुबे देश में शिक्षा को लेकर सबसे सजग माने जाते हैं। 

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अपने जीवन काल में एक अन्तर्वीक्षा में दुबे ने कहा था कि वैश्वीकरण के बाद पूरे विश्व की शिक्षा में बदलाव आया है। इसकी कई सीमाएं हैं। लेकिन भारत के संदर्भ में मैं यह अवश्य कहूंगा कि यहां शिक्षा के नाम पर वंचितों के साथ हकमारी की जा रही है। पूरे विश्व में एजुकेशन का यूनिवर्सलाइजेशन किया जा रहा है। यूनिवर्सलाइजेशन मतलब शिक्षा का समानीकरण। विकास के मामले में भारत से अपेक्षाकृत कम विकासशील देशों में भी समान स्कूली शिक्षा को महत्व दिया जा रहा है। लेकिन अपने भारत में इसके प्रति कोई गंभीर नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। 

दुबे कहे थे कि  ‘मुझे एक संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था और इसके मूल में शिक्षा थी। श्रोताओं में नीतीश कुमार स्वयं बैठे थे। मैंने अपने संबोधन में समान स्कूली शिक्षा को लेकर बातें कही थी। संगोष्ठी समाप्त हुई और मैं दिल्ली वापस चला आया। करीब एक महीने के बाद मुख्यमंत्री के सचिव का फ़ोन आया। बात हुई तो कहने लगे कि वे भी बिहार में समान स्कूली शिक्षा लागू करना चाहते हैं। यह कैसे हो और उसकी रूपरेखा कैसी हो, इसके लिए एक आयोग का गठन किया जाय। इसकी जिम्मेदारी उन्होंने मुझे दे दी। मैंने तय समयसीमा के अंदर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंप दी। मुझे विश्वास था कि मुख्यमंत्री ने जिस उच्च स्तर की संवेदनशीलता के साथ मुझे महती जिम्मेवारी सौंपी थी, वे उससे अधिक संवेदनशीलता के साथ मेरी अनुशंसाओं को लागू करेंगे। लेकिन मुझे निराशा मिली।’ लेकिन आज दुबे नहीं नहीं है और उनकी रिपोर्ट मिट्टी फांक रही है।  

पूर्व विदेश सचिव ने कहा भी था एक अन्तर्वीक्षा में: “मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह सब एक साजिश के तहत किया जा रहा है। एक ऐसी साजिश, जिसका शिकार देश के मासूम बच्चे हो रहे हैं। हालांकि मुझे अभी भी विश्वास है कि कोई न कोई राह जरुर निकलेगी। मुझे तो लगता है कि शिक्षा का सवाल राजनीतिक सवाल नहीं बन पाया है। जब तक राजनेताओं को यह महसूस नहीं होगा कि इसके जरिए वे सत्ता प्राप्ति कर सकते हैं तब तक कुछ भी होना मुश्किल है।  जब तक वंचित वर्ग अपना राजनीतिक महत्व नहीं समझेगा तब तक उसके अधिकारों का हनन होता रहेगा। जिन वर्गों व जाति-समुदायों की बात आप कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि समान स्कूली शिक्षा लागू नहीं कर सरकारें उनके साथ कितना अहित कर रही हैं।” 

ज्ञातव्य हो कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री वृषिण पटेल का कहना है कि “रिपोर्ट को लेकर वे लोग बहुत गंभीर थे। हम लोग तो चाहते थे कि रिपोर्ट पर चर्चा हो और पूरे देश में एक माहौल बने लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यदि वह रिपोर्ट लागू हो जाती तो बिहार की शिक्षा में मूलचूल सुधार होता और बिहार पूरे देश के लिए एक नजर बन जाता। रिपोर्ट के आधार पर जब हम लोगों ने अध्ययन करवाया कि कितनी राशि खर्च होगी तो वह राशि काफी बड़ी थी। बिहार की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। शिक्षकों की भी कमी थी, स्कूल भवन भी नहीं था तो कई मोर्चे पर काम करना था आदि आदि।”

विगत कई वर्षों में बिहार को बदलने के लिए कई महत्वकांशी आयोगों का गठन किया गया। लेकिन उन आयोगों ने जो भी अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, आज भी सरकारी आलमीरा का शोभा बढ़ा रही है। 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने भी भूमि सुधार को चुनावी मुद्दा बनाया, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्होंने भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। डेढ़ दशक बाद वर्ष 2005 में नीतीश कुमार जब पहली बार मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए, तो उन्होंने भूमि सुधार के लिए डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग का गठन किया। तारीख 16 जून 2006 था। आयोग ने अगस्त 2006 से काम करना शुरू किया था। आठ कार्यक्षेत्र दिए गए थे जिनमें मुख्य थे भूमि हदबंदी के प्रभावी उपाय, जमीन का सर्वेक्षण, मालिकाना और बटाईदारी के अधिकार तथा जमीन से जुड़े सामान्य सवाल।

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आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 1990 के दशक के दौरान भूमिहीनता का आंकड़ा रखा जो चिंताजनक था। आयोग के अनुसार 67 प्रतिशत ग्रामीण गरीब 1993-1994 में भूमिहीन या करीब-करीब भूमिहीन थे। यह आंकड़ा 1999-2000 तक 75 प्रतिशत हो गया। इस दौरान भूमि संपन्न समूहों में गरीबी घटी जबकि भूमिहीन समूहों की गरीबी 51 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गई। सनद रहे कि सन 1977 में पश्चिम बंगाल में जब वाममोर्चा की सरकार बनी थी, तो वहां के वर्गादार (बटाईदार) किसानों को समुचित अधिकार देने के लिए ‘ऑपरेशन वर्गा’ चलाकर भूमि सुधार किया था, जिसे अब तक का सबसे सफलतम भूमि सुधार माना जाता है। 

इस ऑपरेशन का नेतृत्व डी. बंद्योपाध्याय ने ही किया था। दो वर्षों तक माथापच्ची करने के बाद डी. बंद्योपाध्याय ने अप्रैल 2008 में नीतीश सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट में बटाईदारों को अधिकार देने की बात कही गई थी और इसके लिए एक क़ानून बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। जगजाहिर है कि जन संगठन एकता परिषद के संस्थापक पी व्ही राजगोपाल ने राष्ट्रीय स्तर पर और प्रदेश स्तर पर एकता परिषद के प्रांतीय संयोजक प्रदीप प्रियदर्शी ने मिलकर डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता वाली भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के लिए अहिंसात्मक आंदोलन चलाया। 

रिपोर्ट में कहा गया था कि : लैंड सीलिंग को 15 एकड़ तक सीमित किया जाए। भूमि के सभी 6 तरह के वर्गीकरण को खत्म किया जाए। सभी भूमि को एक समझा जाये अर्थात कृषि योग्य और कृषि अयोग्य भूमि जैसे वर्गीकरण को खत्म किया जाए।16.68 लाख भूमिहीन कृषक परिवारों को 0.66 एकड़ से 1 एकड़ तक भूमि दी जाए; 5.48 गैर कृषि मजदूर जिनके पास घर नहीं है, प्रत्येक को 10 डिसमिल भूमि घर बनाने के लिये दिया जाए। बिहार बटाईदारी क़ानून लाया जाए और ये प्रावधान किया जाए, यदि भूमि का मालिक कृषि उत्पादन का खर्च उठा रहा तो बटाईदार को उत्पाद में 60% हिस्सा मिले। यदि बटाईदार उत्पादन में अपनी लागत लगाता है तो तो बटाईदार को उत्पाद का 70-75% शेयर मिले। 

आयोग के अनुसार कृषि और गैर कृषि भूमि के बीच अंतर को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। भूमि को उसके सरल अर्थ में परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि किसी को सीलिंग प्रावधानों से किसी जमीन को कृषि योग्य और किसी को अन्य प्रकार का बनाकर, बच निकलने का अवसर न मिले। सीलिंग के दायरे से प्लांटेशन, बगीचा, आम-लीची के बगीचे, मत्स्य पालन तथा अन्य विशिष्ट श्रेणियों के भूमि उपयोग को दी गई छूट समाप्त कर दी जाए। पांच या अधिक सदस्यों वाले परिवार के लिए 15 एकड़ भूमि की सीमा होनी चाहिए। यदि परिवार का कोई प्लान्टेशन, बाग-बगीचा आदि हो तो उसे यह चुनाव का अधिकार रहे कि वह या तो उन्हें 15 एकड़ तक रखें अथवा 15 एकड़ तक धान/गेहूँ की ज़मीन रखें। 

बिहार में कुल 18 लाख एकड़ तक फैली अतिरिक्त ज़मीनें हैं। ये ज़मीनें या तो सरकारी नियंत्रण में है या भूदान समिति के नियंत्रण में, जिसे बांटा नहीं जा सका है या सामुदायिक नियंत्रण में या कुछ अन्य लोगों के कब्जे में है। आयोग ने इन ज़मीनों को भूमिहीनों में बांटने की अनुशंसा की थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि हर बटाईदार को उस जमीन का पर्चा देना चाहिए, जिस जमीन पर वह खेती कर रहा है। इस पर्चे में भू-स्वामी का नाम व खेत का नंबर रहेगा। पर्चे की एक प्रमाणित प्रति जमीन मालिक को भी देने की भी बात कही गई थी। इन सबके अलावा भी कई तरह की सिफारिशें थीं, लेकिन, ज़मींदार वोट बैंक को बचाने की राजनीति मजबूरियों के चलते नीतीश कुमार ने भी पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की लीक पर ही चलने का फैसला लिया और सिफारिशों को धूल फांकने के लिए छोड़ दिया। 

1 COMMENT

  1. Bahut sundar kahani bahut din ke baad yaad dila diye. Jab jamin bala mudda utha tha ki harek parivaar men itna jamin matra rakh sakta hai to bahut babal mach jaya tha. Bahut ko bahut kuchh jhelna para. Jinke pass jaida jamin tha wo sab jintit the kya hoga kya nahin 🙁.

    Us samay ek nara chala tha (Sambhavtah) ki Jo jamin ko jote kore wahi jin ka malik hai🤔.

    Jisko us jaldibaji ke chakkar men chhati huwa wo to hua. Sarkar socha hoga agar ham ye lagu kar diya to Vote Bank prabhit hojayega.

    Fir sab thandhe baste men daal diye

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