
दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : दरभंगा के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की 64-वर्षीय आत्मा मिथिला के ‘तथाकथित’ और ‘स्वयंभू’ विद्वानों, विदुषियों, विचारकों, राजनेताओं, समाज सेवकों, अध्यापकों, प्राध्यापकों, समाज सुधारकों के साथ-साथ अपने राज के परिवारों की सोच पर हँसती होगी। सोच रही होगी कि जिस मिथिला की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक विकास के लिए इतना मदद किया, इतना दान किया, इतनी अधिक धन संपत्ति छोड़ गया, सभी जीते जी अपनी आत्माओं को मार दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो मिथिला में अपार विद्वानों-विदुषियों की उपस्थिति में, हज़ारों राजनीतिक ‘धुरंधरों’ के होते हुए भी विगत दिनों बिहार विधान परिषद में एक माध्यमिक उपाधि प्राप्त सदस्य उनके लिए इतना संवेदनशील कैसे होता? महाराजाधिराज के लिए भारत रत्न अलंकरण का प्रस्ताव क्यों लाता।
आखिर महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद इन 64 वर्षों में, जिन्होंने मैथिली-मिथिला-मिथिलांचल के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेक कर ‘स्वयंभू समाज सेवक, राजनीतिक विशेषज्ञ’ होते गए, या शिक्षा जगत में ‘महारथ’ बनते गए, स्वयं को मिथिलांचल का धनुर्धर कहते गए – कभी महाराजाधिराज का नाम भी भारत के रत्नों की सूची में अंकित हो, चूं तक नहीं किये। उनकी मृत्यु के 64 वर्ष बाद बिहार विधान सभा में मार्च 17, 2021 से मार्च 16 2027 तक के कालखंड के लिए मनोनीत, उच्चतम योग्यता माध्यमिक (परिषद् के वेबसाइट पर अंकित) प्रमाणपत्र धारी, महाराजाधिराज की मृत्यु के तीन साल बाद (दिसंबर 16, 1965) जन्म लिए परिषद् के सम्मानित सदस्य घनश्याम ठाकुर महाराजाधिराज को भारत रत्न से अलंकृत किया जाय का प्रस्ताव पेश किये। यह प्रस्ताव भले राजनीतिक ही हो, राष्ट्रीय पटल पर अपना छाप छोड़ गया तभी तो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कार्यालय के बाहर एक शीर्षस्थ अधिकारी कहते हैं: “कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति ही इतिहास रचा है, शिक्षित तो लाभ के लिए राजनीति करते हैं। क्या पता कुछ अच्छा ही हो। “
आर्यावर्तइंडियननेशन कॉम से बात करते घनश्याम ठाकुर कहते हैं: महारानी की मृत्यु के बाद श्राद्ध कर्म में मैं गया था। वहाँ लोगों से मुलाक़ात हुई। मन में विचार आया कि जिस व्यक्ति ने मिथिला ही नहीं, बिहार ही नहीं, राष्ट्र के निर्माण में अपना अहम योगदान किया, उसे क्या मिला? मिथिला के लोगों ने क्या दिया? मन में इसी विचार को लेकर परिषद में यह प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव प्रस्तुत करने के बाद संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि तत्काल इस विषय पर कोई बात विचाराधीन नहीं है, इसकी एक प्रक्रिया होती है, अतः प्रस्ताव वापस ले लें। परिषद में मेरे कुछ शब्द इतना प्रभावकारी हुआ कि मिथिला के लोगों के साथ साथ प्रदेश में महाराजाधिराज का नाम पुनः जीवित होने जैसा लगा। मैं नहीं जानता कि मिथिला के विभूतिगण (छोटी मुँह बड़ी बात होगी) इस विषय को पिछले छह दशकों में क्यों नहीं उठाये। मिथिला का प्रत्येक व्यक्ति महाराजा का कर्जदार है और रहेगा। समय को कौन जानता। क्या पता कल कुछ ऐसा हो जाय और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की अगुवाई में कुछ ऐसा निर्णय हो जाय तो मिथिला के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाय।”
महाराजाधिराज बहुत ही भाग्यशाली व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी मृत्यु से महज 29 माह पहले एक अमर-इतिहास की रचना कर दिए – कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, 1960 के अनुसार दरभंगा में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ-साथ ‘लक्ष्मी-वर-विलास-प्रसाद’ को दान-देकर और इसके लिए तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह को महाराज ने धन्यवाद दिया। भवन अर्पित करने से सम्बंधित आयोजन में महाराज अपनी अश्रुपूरित आंखों से उपस्थित महानुभावों को, देवियों को, सज्जनों को यह भी कहा कि “जिस वस्तुओं को किसी ने अपने बाल्यकाल से ही न केवल प्यार किया हो, बल्कि समादर भी किया हो, उनसे अलग होना सामान्यतः दुःखद होता है।”
सन 1960 के 30 मार्च को महाराजाधिराज द्वारा पटना में स्थापित दि इण्डियन नेशन समाचार पत्र में “लक्ष्मी-वर-विलास-प्रसाद” को दान-स्वरुप देने के उपलक्ष्य में वहां उपस्थित महामानवों के सम्मुख, सर कामेश्वर सिंह अश्रुपूरित आखों से जो भाषण दिए थे, उस भाषण के शब्द कुछ ऐसे थे :
डॉ जाकिर हुसैन साहब, बिहार केसरी, महिलाओं और सज्जनों !
“जिस वस्तुओं को किसी ने अपने बाल्यकाल से ही न केवल प्यार किया हो बल्कि समादर भी किया हो, उससे अलग होना सामान्यतः दुःखद होता है, किन्तु राज्यपाल जी ने और मुख्यमंत्री महोदय ने जो संस्कृत विश्वविद्यालय का केंद्र बनाने के लिए उसे ग्रहण करने की कृपा कर, स्वयं यहां पधारने का कष्ट किया है, इससे मुझे प्रसन्नता है।
डॉ जाकिर हुसैन साहब, मैं आपका अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जो स्वयं आपने कृपापूर्वक आज के अपरान्ह में यहाँ पधारने का कष्ट किया। मैं अपने मुख्यमंत्री महोदय का भी आभारी हूँ, जिन्होंने न केवल मेरे अनुरोध को स्वीकार ही किया, बल्कि मिथिला में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना में गहरी दिलचस्पी ली। यदि हमारे शिक्षा मंत्री महोदय का उनके पदभार ग्रहण करने के समय से ही लगातार समर्थन और सहयोग नहीं प्राप्त होता, तो शायद यह स्वप्न साकार नहीं हो पाता। संस्कृत की विद्वता के सम्मान में आज से चार सौ वर्ष पहले हमारे पूर्वज महामहोपाध्याय महाराज महेश ठाकुर को बादशाह अकबर ने तिरहुत का राज्य दिया था। इसलिए यह बिलकुल उचित है कि हमारा संस्कृत पुस्तकालय, जिसको हमारे पूर्वजों ने वंश परंपरा से विगत शताब्दी में संघटित किया है, वह संस्कृत विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का केंद्र बने।
यह भी उचित है कि लक्ष्मेश्वर विलास प्रसाद जो कि केवल हमलोगों का घर ही नहीं था, बल्कि वह स्थान था, जहाँ अनेक वर्षों तक राज के अनेक प्रकार के उत्सव होते रहे, वह संस्कृत विश्वविद्यालय का स्थान बने। मुझे पूर्ण विश्वास है कि संस्कृत विश्वविद्यालय केवल जीवित ही नहीं रहेगा बल्कि इस प्राचीन भूमि में जो कुछ भी उत्तम तत्व है, उसको प्रोत्साहित करेगा और उसका उद्धार करेगा। इसी विश्वास के साथ मैं आपके हाथों में वह बहुमूल्य खजाना सौंप रहा हूँ, जो मैंने पैतृक संपत्ति के रूप में पाया है, और विश्वास करता हूँ कि आपके छत्र-छाया में संस्कृत शिक्षा की श्री-वृद्धि होगी। संस्कृत सदा मर रहे।”
इस भाषण को पढ़ने के पश्चयात कोई भी व्यक्ति, जिसके ह्रदय में अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान होगा, उनके द्वारा अर्जित सम्पत्तियों, संरक्षित धरोहरों के प्रति आदर होगा, जरूर अश्रुपूरित होगा। परन्तु, यह भाषण उन लोगों के लिए कतई नहीं है, चाहे महाराजाधिराज की पीढ़ियां ही क्यों न हों, क्योंकि अगर उनमें अपने पूर्वजों की सम्पत्तियों के प्रति, उनके सम्मान के प्रति ‘सम्मान’ होता तो शायद दरभंगा राज की आज जो स्थिति हैं, नहीं होता। वैसे मिथिला के लिए यह नई बात नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता तो महाराजाधिराज अपने जीवनकाल में चुनाव नहीं हारते। खैर।
अपनी मृत्यु से 52-दिन पहले दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपने कलकत्ता निवास से 9 अगस्त, 1962 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री सत्येंद्र नारायण सिंह को एक पत्र लिखे थे । पत्र में महाराजाधिराज सत्येंद्र नारायण सिंह से अनुरोध किये थे कि इस पत्र की कृपया अपने पत्रांक 1945, दिनांक 11 जुलाई, 1962 का निर्देश करें। महाराजाधिराज लिखते हैं: “यह बात अपने कानों तक पहुंची है कि कुछ ऐसे कॉलेजों को जो संस्कृतेतर विषयों के अध्यापन करते हैं और राज्य में कार्य करने वाले क्षेत्रीय विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में उचित रूप से हैं, संस्कृत विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में लाकर इसके रूप में परिवर्तन करने की चेष्टा की जा रही है। मेरी समझ से संस्कृत विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य, पाली और प्राकृत के साथ संस्कृत का विशिष्ट ज्ञान देना होना चाहिए जिससे की प्राचीन विद्वता की रक्षा हो और यथा-संभावदयातन बनाया जा सकते। इस विश्वविद्यालय की विशिष्ट स्वरूप में रक्षा अवश्य ही होनी चाहिए। मैंने इस विश्वविद्यालय के लिए जो दान दिया है वह इसलिए दिया कि मेरे पूज्य पिताजी की इक्षा को इससे पूर्ति होती थी। “यदि इस विश्वविद्यालय को क्षेत्रीय सामान्य विश्वविद्यालय का रूप दिया जाएगा तो मैं समझूंगा कि मेरा दिया हुआ दान बर्बाद हो गया। ”

महाराजाधिराज आगे लिखते हैं: यदि सरकार मिथिला में एक क्षेत्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करे तो मैं इसकव स्वागत करूँगा किन्तु उसे संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ किसी भी रूप में मिलाना नहीं चाहिए जो कि एक निश्चित उद्देश्य और निश्चित विचार से स्थापित किया गया है। वह विश्वविद्यालय इससे सर्वथा पृथक रहना चाहिए। इतना ही नहीं, सम्भवतः जिस लिफ़ाफ़े में महाराजाधिराज को पत्र-प्रेषित किया गया था, अथवा पत्र में सावधान किया गया था, उसमें “श्व” के स्थान पर “स्व” लिखा था। यह महाराजाधिराज को अच्छा नहीं लगा। इसलिए शिक्षा मंत्री के जवाबी पत्र में उन्होंने बहुत ही “शालीनता” के साथ लिखे: “मेरे नाम का शुद्ध विवरण ‘कामेश्वर सिंह’ है न कि ‘कामेस्वर सिंह।” मेरे पास भेजे गए विधेयक के प्रारूप पर मुझे सामान्यतः कोई टिप्पणी नहीं करनी है। किन्तु यदि इसमें कोई परिवर्तन हुआ तो स्थिति भिन्न हो जाएंगी –
भवदीय, कामेश्वर सिंह।
आइये, बिहार विधान परिषद् चलते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ अधिक बताएँगे, लेकिन 16 फरवरी 1950 से 11 फरवरी 2026 तक बिहार विधान परिषद इस बात का गवाह है कि इन वर्षों में परिषद के कोई सदस्य किसी व्यक्ति विशेष को भारत रत्न की उपाधि अलंकरण सम्बन्धी प्रस्ताव नहीं लाया गया। विगत दिनों विधान परिषद में परिषद के सदस्य घनश्याम ठाकुर गैर-सरकारी संकल्प के माध्यम से केंद्र सरकार से इस आशय का प्रस्ताव भेजने सम्बन्धी मांग सदन के पटल पर पढ़े ।
भारतीय जनता पार्टी के सदस्य के रूप में विधान परिषद् में 2021 में ‘मनोनीत’ सदस्य के रूप में दाखिला लिए धनश्याम ठाकुर दरभंगा के महाराजाधिराज को भारत रत्न सम्मान से अलंकृत करने सम्बन्धी प्रस्ताव गैर-सरकारी संकल्प के माध्यम से लाये थे। आज़ादी और गणतंत्र घोषित होने के बाद 16 फरवरी, 1950 को बिहार विधान परिषद् अपना पहला कार्य प्रारम्भ किया था। जबकि महाराजाधिराज की मृत्यु 1 अक्टूबर, 1962 को हुई। संतानहीन महाराजा की मृत्यु के बाद पहले उनकी बड़ी पत्नी (बड़ी महारानी) और पिछले माह 12 जनवरी को महारानी कामसुन्दरी देवी (छोटी महारानी) का 94 वर्ष की आयु में देहावसान हो गया।
घनश्याम ठाकुर कहते हैं: “बिहार विधान परिषद् में गैर-सरकारी संकल्प के माध्यम से मैंने सरकार से मांग किया कि मिथिला के महान दानी, राष्ट्रनिर्माता और संविधान सभा के सदस्य महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान करने की अनुशंसा केंद्र सरकार से की जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य, राष्ट्रीय रक्षा, संविधान निर्माण और संस्कृति के क्षेत्र में उनका योगदान केवल मिथिला ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणास्रोत है। मिथिला के महापुरुषों को उनका उचित राष्ट्रीय सम्मान दिलाना हमारा कर्तव्य है। मिथिला के स्वाभिमान और इतिहास की यह लड़ाई लगातार जारी रहेगी।” ऐसी घटना 16 फरवरी 1950 से अब तक कभी नहीं हुई थी। महाराधिराज के जीवनकाल अथवा मृत्यु के बाद कभी भी इस तरह का प्रस्ताव क्यों नहीं लाया यह गहन शोध का विषय है। आप माने अथवा नहीं।
इन विगत वर्षों में देश के अन्य राज्य के विधान सभाओं में जिन जिन व्यक्तियों के लिए भारत रत्न अलंकरण का प्रस्ताव लाया गया, वह प्रस्ताव या तो पारित हो गया, चाहे राजनीतिक दृष्टि से ही सही, या उसे बिना वापस लिए छोड़ दिया गया जो स्वतः समाप्त हो गया।

ज्ञातव्य है कि 2025 में राष्ट्रीय जनता दल के विधायक मुकेश रोशन ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को भारत रत्न देने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा था। इस पर संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा था कि, ‘प्रत्येक वर्ष पद पुरस्कार के साथ भारत रत्न के लिए भी नाम अनुशंसा करने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। जिसकी प्रक्रिया सितंबर महीने में शुरू होती है। लेकिन अभी जो माननीय सदस्य द्वारा प्रस्ताव पेश किया गया है, उनको भारत रत्न देने की अनुशंसा करने का कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है। ऐसे में विधायक से आग्रह है की वे अपना प्रस्ताव वापस लें।’ हालांकि, विधायक मुकेश रोशन ने अपना प्रस्ताव वापस नहीं लिया। परिणाम यह हुआ कि प्रस्ताव के वापस न लेने पर सदन में वॉइस वोट हुआ और यह गिर गया।
आज से आठ वर्ष पूर्व 2018 में आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से भारत रत्न वापस लेने की मांग से सम्बंधित प्रस्ताव रखा था, जो पारित हो गया। विधानसभा में प्रस्ताव में कहा गया है कि राजीव गांधी 1984 सिख दंगे में जिम्मेदार थे इसलिए उनसे भारत रत्न वापस लिया जाना चाहिए।
यह प्रस्ताव, दरअसल 1984 सिख दंगे के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए एक संकल्प बहुमत से पास किया गया था। उस प्रस्ताव संकल्प में तीन महत्वपूर्ण बिंदु थे। यह कहा गया था कि 1984 में सिक्कों को खोज खोज कर टायर डालकर जलाया गया, उनका कत्लेआम किया गया। ऐसे में दंगे शब्द का इस्तेमाल इस पूरी घटना को छोटा बनाता है। ऐसे में अब से ‘दंगे’ की जगह ‘नरसंहार’ शब्द का इस्तेमाल किया जाए। दिल्ली सरकार दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए गृह मंत्रालय पर दबाव डाले और तीसरा: उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है और उनके इस बयान के बाद सिखों पर जिस तरीके से अत्याचार हुआ इसको देखते हुए हम यह मानते हैं कि राजीव गांधी इस पूरे घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार थे, इसलिए दिल्ली विधानसभा दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी से भारत रत्न वापस लेने की मांग भारत सरकार से करती है और इसके लिए संकल्प पास करते है।’’
पिछले वर्ष अगस्त महीने में झारखंड विधानसभा ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित करते हुए केंद्र सरकार से पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता शिबू सोरेन को भारत रत्न से सम्मानित करने की सिफारिश की। परिवहन मंत्री दीपक बिरुआ द्वारा प्रस्तुत इस संकल्प प्रस्ताव को सदन में ध्वनिमत से मंजूरी दी गई। यह प्रस्ताव सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सहमति से पारित हुआ, जो सोरेन के प्रति सम्मान को दर्शाया। प्रस्ताव पेश करते हुए मंत्री दीपक बिरुआ ने कहा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपना पूरा जीवन आदिवासियों, किसानों, मजदूरों और शोषितों के अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने झारखंड जैसे अलग राज्य के निर्माण के लिए अथक संघर्ष किया। बिरुआ ने सोरेन को केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी व्यक्ति बताया, उनका योगदान सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में ऐतिहासिक महत्व रखता है। उन्होंने कहा कि ऐसे महान नेता को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
11 जनवरी 1944 को बिहार (अब झारखंड) के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन को ‘दिशोम गुरु’ (भूमि के नेता) और झामुमो के पितामह के रूप में जाना जाता था। अपने राजनीतिक जीवन में सोरेन ने मार्क्सवादी नेता ए.के. रॉय और बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर 1973 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की। वह दुमका से कई बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और जून 2020 में राज्यसभा के सदस्य बने. संप्रग सरकार में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में, उन्होंने 2004 से 2006 के बीच कई बार केंद्रीय कोयला मंत्री के रूप में भी कार्य किया। भारतीय जनता पार्टी ने नेता विपक्ष बाबूलाल मरांडी उस फैसले का पूरा समर्थन किये। उनका कहना था कि चूंकि हम एक ऐतिहासिक फैसला ले रहे हैं, इसलिए प्रस्ताव में दो और नामों को जोड़ने का सुझाव दिया – मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा और बिनोद बिहारी महतो। शिबू सोरेन का 4 अगस्त को दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया था।
इसी तरह, महाराष्ट्र विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न देने की मांग की गई थी। प्रस्ताव में कहा गया कि 19वीं सदी में फुले दंपत्ति ने महिलाओं की शिक्षा के लिए जो ऐतिहासिक योगदान दिया, वह एक क्रांतिकारी कदम था। आज महिलाओं का हर क्षेत्र में योगदान उसी का फल है।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा में भी सर्वसम्मति से सत्ता पक्ष और विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए हिमाचल निर्माता व प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार को भारत रत्न सम्मान देने का प्रस्ताव एक स्वर में पारित किया था । नाहन के विधायक अजय सोलंकी ने डॉ. परमार को भारत रत्न सम्मान दिए जाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था।
दिसम्बर 2024 में तेलंगाना विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भारत रत्न से सम्मानित करने का केंद्र सरकार से आग्रह किया है। मनमोहन सिंह को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने के लिए मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी द्वारा पेश प्रस्ताव को विधानसभा ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया है। विधानसभा के विशेष सत्र में राष्ट्र की प्रगति और तेलंगाना के गठन में उनके अमूल्य योगदान को स्वीकार किया गया। विधानसभा ने तेलंगाना के लोगों की 60 साल की आकांक्षाओं को पूरा करने वाले एक महान नेता के रूप में उनकी स्मृति में हैदराबाद में डॉ मनमोहन सिंह की एक प्रतिमा स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। मुख्य विपक्षी दल बीआरएस ने भी उस प्रस्ताव क समर्थन दिया।
इतना ही नहीं, डॉ. मनमोहन सिंह को भारत रत्न देने की सिफारिश के लिए पंजाब विधानसभा में एक संयुक्त प्रस्ताव लाने की मांग की थी। सदन में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने पंजाब के सीएम, विधानसभा स्पीकर, बीजेपी और अकाली दल के नेता को एक पत्र लिखकर इसकी मांग की। पंजाब विधानसभा में एक प्रस्ताव पास करने की मांग की।
ज्ञातव्य हो कि पद्म सम्मानों की शुरुआत नेहरू सरकार ने 1955 में की थी, जिस पर सदैव विवाद होते रहे हैं। आचार्य जेबी कृपलानी ने पद्म सम्मानों को खत्म करने के लिए 1969 में लोकसभा में बिल पेश किया, जिसे इंदिरा सरकार ने नहीं स्वीकारा। कृपलानी के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 18 से अंग्रेज़ी शासनकाल के दौर के सम्मान ख़त्म हो गए थे, जिन्हें नेहरू ने पद्म सम्मान के तौर पर पिछली खिड़की से लागू कर दिया। केंद्र में विपक्ष की पहली सरकार जनता पार्टी ने 8 अगस्त, 1977 को नोटिफिकेशन जारी कर पद्म सम्मानों को खत्म करने का निर्णय लिया था, परंतु इंदिरा गांधी ने सरकार बनाने पर पद्म पुरस्कारों को 25 जनवरी, 1980 पुनर्जीवित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार पद्म सम्मान और ‘भारत रत्न’ को संकीर्ण राजनीतिक दायरे में नहीं बांधना चाहिए। संविधान पीठ में तत्कालीन चीफ जस्टिस अहमदी समेत जस्टिस कुलदीप सिंह, जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी, जस्टिस एनपी सिंह और जस्टिस सगीर अहमद शामिल थे। पांच जजों की संविधान पीठ में जस्टिस कुलदीप सिंह के अनुसार उपयुक्त और योग्य व्यक्तियों को ही यह सम्मान मिले, इसके लिए केंद्र और राज्यों में चयन समिति का गठन होना चाहिए। समिति में लोकसभा स्पीकर, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा राज्यों में विधानसभा के सभापति, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और विधानसभा में विपक्ष के नेता को शामिल करने का सुझाव दिया था। लेकिन क्या हुआ यह सर्वविदित है।
भारत रत्न देने की शुरुआत 2 जनवरी, 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की थी। सबसे पहला सम्मान स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन और वैज्ञानिक डॉक्टर चंद्रशेखर वेंकट रमन को 1954 में दिया गया। 1954 में ये सम्मान केवल जीवित रहते दिया जाता था, लेकिन 1955 में मरणोपरांत भी भारत रत्न दिये जाने का प्रावधान जोड़ा गया। 2013 में पहली बार खेल के क्षेत्र में सर्वोच्च योगदान/प्रदर्शन करने के लिए भी भारत रत्न देने का निर्णय लिया गया। इसके बाद 2014 में क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को इस सम्मान से नवाज़ा गया था। यह पुरस्कार गैर भारतीयों को भी दिया जा सकता है – मदर टेरेसा को 1980 में भारत रत्न दिया गया था। स्वतंत्रता सेनानी ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान (स्वतंत्रता से पहले भारत में जन्मे और बाद में पाकिस्तान गए) और दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला भी इस सम्मान से नवाज़े जा चुके हैं।
इतिहास में दो बार इस पुरस्कार को कुछ समय के लिए निलंबित किया गया था। पहली घटना 1977 में चौथे प्रधानमंत्री के रूप में मोरारजी देसाई के शपथ ग्रहण के ठीक बाद हुई थी। 13 जुलाई 1977 को उनकी सरकार ने सभी व्यक्तिगत नागरिक सम्मान वापस ले लिए। 25 जनवरी 1980 को इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद निलंबन वापस ले लिया गया। दूसरी घटना 1992 के मध्य में फिर हुई जब केरल उच्च न्यायालय और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसके खिलाफ दो जनहित याचिकाएं दायर कीं, जिसमें पुरस्कार की “संवैधानिक वैधता” को चुनौती दी गई। दिसंबर 1995 में, मुकदमे के समापन के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से पुरस्कारों को फिर से पेश किया।
स्वतंत्र भारत में साल 1947 से 2025 तक, यानी 79 वें जश्ने आज़ादी तक 15 राजनेतागण प्रधानमंत्री के कार्यालय में लगी कुर्सी पर बैठे। पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू (15 अगस्त 1947 से 27 मई, 1964), फिर गुलजारीलाल नंदा (अंतरिम) 27 मई 1964 – 9 जून 1964 और 11 जनवरी 1966 – 24 जनवरी 1966), फिर लाल बहादुर शास्त्री (9 जून 1964 -11 जनवरी 1966), इंदिरा गांधी (24 जनवरी 1966 – 24 मार्च 1977 और 14 जनवरी 1980 – 31 अक्तूबर 1984), मोरारजी देसाई (24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979), चौधरी चरण सिंह (28 जुलाई 1979 – 14 जनवरी 1980), राजीव गांधी (31 अक्तूबर 1984 – 2 दिसंबर 1989), विश्व प्रताप सिंह (2 दिसंबर 1989 – 10 नवंबर 1990), चन्द्रशेखर (10 नवंबर 1990-21 जून 1991), पी वी नरसिम्हा राव (21 जून 1991 – 16 मई 1996), अटल बिहारी वाजपेयी (16 मई 1996-1 जून 1996 और 18 मार्च 1998 – 22 मई 2004), एच. डी देवेगौड़ा (1 जून 1996 – 21 अप्रैल 1997), इंद्र कुमार गुजराल (21 अप्रैल 1997 – 18 मार्च 1998), डॉ.मनमोहन सिंह (22 मई 2004 -17 मई 2014) और नरेंद्र मोदी (26 मई 2014 से लगातार) ।
इन 15 प्रधानमंत्रियों में नौ प्रधानमंत्री “भारत रत्न” से अलंकृत हुए। पंडित जवाहर लाल नेहरू को 1955 में मिला। लाल बहादुर शास्त्री को 1966 में, इंदिरा गांधी को 1971 में, राजीव गांधी को 1991 में, मोरारजी देसाई को 1991 में ही। जबकि गुलजारीलाल नंदा को 1997 में, अटल बिहारी बाजपेयी को 2015 में, चौधरी चरण सिंह, पीवी नरसिम्हा राव को 2024 में। शेष बचे विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, एच डी देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, डॉ. मनमोहन सिंह। समय दूर नहीं है जब डॉ. मनमोहन सिंह को भी पीवी नरसिम्हा राव के तर्ज पर (कांग्रेस में उनकी स्थिति के मद्दे नजर, साथ ही, पंजाब की राजनीति और सत्ता पर कब्ज़ा को ध्यान में रखकर) भी मरणोपरांत भारत रत्न से अलंकृत किया जाए। क्योंकि वीपी सिंह, चंद्रशेखर, गुजराल और देवेगौड़ा का आज के राजनीतिक माहौल में ‘भारत रत्न’ जैसा मोल नहीं है।
ज्ञातव्य हो कि पी. वी. नरसिंह राव को भारत रत्न देकर नरेंद्र मोदी की सरकार ने कांग्रेस की एक और विरासत को अपने पाले में करने की बड़ी कवायद की है। मोदी कई मौकों पर कांग्रेस और गांधी परिवार पर नरसिंह राव की उपेक्षा करने का आरोप लगा चुके हैं। यह भी सही है कि नरसिंह राव और सोनिया गांधी के बीच बेहतर संबंध नहीं तब थे। जिस तरह मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद सरदार पटेल के बाद एक-एक विरासत को अपने पाले में किया, नरसिंह राव को भारत रत्न देना भी उसी मुहिम का एक बड़ा हिस्सा है। इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने ही कांग्रेस के एक और पूर्व नेता और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिया था। बाद के सालों में प्रणब मुखर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच बेहद मधुर संबंध हो गए थे।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक पंकज वोहरा कहते हैं कि “मोदी ने दो पूर्व प्रधानमंत्रियों चौधरी चरण सिंह और पीवी नरसिंह राव को मरणोपरांत पुरस्कार देकर कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। जबकि हरित क्रांति के जनक डॉ. एमएस स्वामीनाथन को भी यह सम्मान दिया गया था। भाजपा के आलोचक हर जगह हैं और उन्होंने कहा है कि भारत रत्न का इस्तेमाल राजनीतिक साधन के रूप में किया जा रहा है। चौधरी चरण सिंह जाट समुदाय के सबसे सम्मानित नेताओं में से एक थे और पूरे देश में उनका सम्मान किया जाता था। दूसरी ओर, राव उदारीकरण के जनक थे और उनके पांच साल के शासन ने भारत को आर्थिक सुधारों के रास्ते पर डाल दिया, जो उनके वित्त मंत्री और बाद में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के समग्र मार्गदर्शन में कुशलतापूर्वक संचालित किया गया।”
एम. एस. स्वामीनाथन और चौधरी चरण सिंह को ऐसे समय में भारत रत्न दिया गया जब एक बार फिर किसानों का मुद्दा गरम था । किसान एक बार फिर आम चुनाव से पहले किसान आंदोलन के पक्षधर हो गए थे। कहते हैं किसानों के अब तक के सबसे बड़े वैज्ञानिक और दूसरी ओर से किसानों के अब तक के सबसे नेता को भारत रत्न देकर मोदी सरकार ने बड़ा संदेश दे दिया। दरअसल, 2020 में जब दिल्ली में किसानों का आंदोलन हुआ तब सरकार की हालत ख़राब हो गयी थी।कुछ हद तक खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा। वोहरा कहते हैं: “डॉ. स्वामीनाथन इस सम्मान के सच्चे हकदार हैं और उन्हें यह सम्मान बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था, जब वे जीवित थे। वास्तव में, डॉ. स्वामीनाथन और डॉ. वर्गीस कुरियन ने हरित और श्वेत क्रांति की शुरुआत करके भारतीय लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिससे देश अपने-अपने क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन गया है। वे दो सबसे प्रतिष्ठित भारतीय थे।”
आपको याद भी होगा जब लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न दिया गया वह इस बात का संकेत था कि मोदी जी देश में विरासत और हिंदुत्व के प्रतीक रहे जनप्रतिनिधियों और शख्सियतों को भी सम्मान देते रहे हैं। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के तुरंत बाद लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देना एक खास संकेत और संदेश दोनों था। दरअसल, नरेंद्र मोदी ने पिछले 11 -वर्षों में प्रतीकों की राजनीति को बेहद प्रभावी तरीके से अंजाम दिया है। आडवाणी को भारत रत्न का अलंकरण की घोषणा के बाद, प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा था : “मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा। मैंने भी उनसे बात की और भारत रत्न से सम्मानित होने पर उन्हें बधाई दी। अपने समय के सबसे सम्मानित राजनेताओं में से एक श्री लालकृष्ण आडवाणी का भारत के विकास में योगदान अविस्मरणीय है। उनका जीवन जमीनी स्तर पर काम करने से शुरू होकर हमारे उप-प्रधानमंत्री के रूप में देश की सेवा करने तक का है। उन्होंने गृह मंत्री और सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। उनका संसदीय योगदान हमेशा अनुकरणीय और समृद्ध अंतर्दृष्टि से भरा रहा है।”
उन्होंने यह भी कहा था कि “आडवाणी जी की सार्वजनिक जीवन में दशकों पुरानी सेवा को पारदर्शिता और अखंडता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता द्वारा चिह्नित किया गया है, जिसने राजनीतिक नैतिकता में एक अनुकरणीय मानक स्थापित किया है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान को आगे बढ़ाने की दिशा में अद्वितीय प्रयास किए हैं। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना मेरे लिए बहुत भावुक क्षण है। मैं इसे हमेशा अपना सौभाग्य मानूंगा कि मुझे उनके साथ बातचीत करने और उनसे सीखने के अनगिनत अवसर मिले।” फिर आये कर्पूरी ठाकुर। यह सामाजिक अभियंत्रण का एक मिसाल था। लोगबाग उसे राजनीति तो कहते ही हैं क्योंकि भाजपा बहुत दिनों तक जनता दल (यूनाइटेड) के साथ नहीं चल सकती हैं बिहार में। उसे अगर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान और साख है, तो बिहार में भी बनाना होगा। कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर बिहार में पिछड़ों और अब चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर जाट समुदाय को अपने छाते में ले आये । दिलचस्प बात है कि दोनों समुदाय अपने-अपने इस नायक को भारत रत्न देने की मांग सालों से कर रहे थे और दोनों से जुड़े समुदाय पिछले कुछ दिनों तक बीजेपी से दूर थे।
वोहरा के अनुसार, संदर्भ पंडित जवाहरलाल नेहरू का है, जिन्हें 1955 में इस सम्मान के लिए चुना गया था, और इंदिरा गांधी का, जिन्हें 1971 में भारत द्वारा निर्णायक युद्ध में पाकिस्तान को हराने के तुरंत बाद बांग्लादेश के निर्माण के बाद यह सम्मान दिया गया था। दोनों ही इस सम्मान के लिए उपयुक्त विकल्प थे, और इसलिए इस मुद्दे पर कभी कोई बहस नहीं हो सकती। इसी तरह, अगर मोदी को भी यह पुरस्कार दिया जाता है तो कभी कोई सवाल नहीं उठेगा। वे एक मजबूत और निर्णायक नेता रहे हैं, जिन्होंने देश में स्थिरता लाई है, और उनकी कई योजनाओं के परिणामस्वरूप आम नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। मोदी अकेले ही भारत को विश्व मानचित्र पर उस तरह से स्थापित करने के लिए जिम्मेदार हैं, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। प्रवासी भारतीयों में उनके असंख्य प्रशंसक हैं और दुनिया भर के कई शासनाध्यक्षों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों के कारण मोदी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए नई उपलब्धियां हासिल की हैं। नेहरू और इंदिरा गांधी दोनों को ही उस समय के राष्ट्रपतियों ने भारत रत्न से सम्मानित किया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को भारत रत्न देने का बीड़ा उठाया था और 16 साल बाद वी.वी. गिरि ने इंदिरा गांधी को भारत रत्न देने का बीड़ा उठाया था। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि केंद्रीय मंत्रिपरिषद की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति एकतरफा फैसला नहीं कर सकते। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी मंजूरी पहले नहीं ली गई थी और अब भी इसकी जरूरत नहीं है। इस घोषणा को कोई चुनौती नहीं दे सकता, क्योंकि मौजूदा नेताओं में कोई ऐसा नहीं है, जिसे प्रधानमंत्री से आगे माना जा सके।
कानून के विशेषज्ञ स्वप्निल त्रिपाठी के अनुसार, भारत रत्न (भारत का रत्न) भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और यह जाति, व्यवसाय, पद या लिंग के भेदभाव के बिना प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार किसी भी क्षेत्र में असाधारण सेवा और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति को दिया जाता है। भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति को केंद्र सरकार की वरीयता तालिका में सातवां स्थान प्राप्त होता है , जिसका अर्थ है कि राजकीय और औपचारिक समारोहों में उन्हें मुख्यमंत्री और राज्यपाल (अपने राज्य के बाहर), सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत के अटॉर्नी जनरल, राज्य मंत्रिमंडल के मंत्रियों आदि से भी अधिक वरीयता प्राप्त होती है। यह उल्लेखनीय है कि पहले यह पुरस्कार केवल कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण योगदान और सर्वोच्च स्तर की सार्वजनिक सेवा के लिए ही किसी व्यक्ति को दिया जा सकता था। हालांकि, इस शर्त को संशोधित करके वर्तमान ‘मानव प्रयास के किसी भी क्षेत्र में सर्वोच्च स्तर का प्रदर्शन’ कर दिया गया, संभवतः क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को शामिल करने और उन्हें रत्न पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए।
राष्ट्रपति के सचिव के कार्यालय द्वारा 8 जनवरी, 1955 की अधिसूचना (16.11.2011 की अधिसूचना द्वारा संशोधित) के अनुसार , भारत रत्न राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत एक सनद, अर्थात् वारंट/प्रमाणपत्र के माध्यम से प्रदान किया जाता है। इसके बाद, प्राप्तकर्ताओं के नाम भारत के राजपत्र में प्रकाशित किए जाते हैं और ऐसे सभी प्राप्तकर्ताओं का एक रजिस्टर रखा जाता है। राष्ट्रपति को किसी भी व्यक्ति को दिए गए पुरस्कार को रद्द करने या निरस्त करने का अधिकार है। यदि वे ऐसा करना चाहें, तो प्राप्तकर्ता का नाम रजिस्टर से हटा दिया जाता है और उन्हें पुरस्कार और सनद वापस करना होता है। रद्द करने की उक्त सूचना भारत के राजपत्र में प्रकाशित की जानी चाहिए। यह ध्यान देने योग्य है कि किसी व्यक्ति को भारत रत्न तभी प्राप्त होता है जब उसका नाम भारत के राजपत्र में प्रकाशित होता है।
राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी मात्र प्रेस विज्ञप्ति जिसमें पुरस्कार दिए जाने की सूचना हो, किसी व्यक्ति को पुरस्कार का प्राप्तकर्ता नहीं बना देती।उदहारण के लिए, यूनियन ऑफ़ इण्डिया बनाम बिजन घोष (1997) 6 एससीसी 535 के प्रसिद्ध मामले में , राष्ट्रपति ने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि श्री सुभाष चंद्र बोस को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा। इस विज्ञप्ति के कारण व्यापक आक्रोश फैल गया, क्योंकि इसमें श्री बोस के लिए ‘मरणोपरांत’ शब्द का प्रयोग किया गया था। समाज के एक वर्ग का मानना था कि चूंकि भारत सरकार ने उनकी मृत्यु की कोई विशिष्ट रिपोर्ट स्वीकार नहीं की थी, इसलिए वह उन्हें ‘मरणोपरांत’ शब्द से सम्मानित नहीं कर सकती और न ही उसे ऐसा करना चाहिए। इसके बाद, पुरस्कार रद्द करने की मांग उठी और इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई। जनभावना के कारण, सरकार ने विज्ञप्ति वापस ले ली और नेताजी का नाम भारत के राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया। यदि विज्ञप्ति पुरस्कार प्रदान करने के समान थी, तो इसे रद्द करना या निरस्त करना ही एकमात्र उपाय होता, जो दोनों ही राष्ट्रीय नायक के लिए अपमानजनक होते।
हालांकि यह पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है, लेकिन पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं पर अंतिम निर्णय केवल प्रधानमंत्री द्वारा ही लिया जाता है। वास्तव में, यदि कोई अन्य मंत्रालय सिफारिश करना चाहता है या उसे कोई सिफारिश प्राप्त होती है, तो उसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजना आवश्यक है (संतोष सहाय बनाम हरिः मंत्रालय, 2013 एससीसी ऑनलाइन सीआईसी 11609)। यह मूल स्थिति नहीं थी, क्योंकि पंडित नेहरू को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के निर्णय पर यह पुरस्कार प्रदान किया गया था। निर्णय लेने में प्रधानमंत्री की सर्वोच्चता 1996 में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के जवाब में लागू हुई। मैंने इस फैसले पर आगे चर्चा की है।भारत के संविधान का अनुच्छेद 18 राज्य को भारत के किसी नागरिक को कोई उपाधि प्रदान करने से रोकता है। इस नियम का एकमात्र अपवाद सैन्य उपाधियाँ या शैक्षणिक विशिष्टताएँ हैं। संविधान सभा की मसौदा समिति द्वारा तैयार किए गए अनुच्छेद 18 के मूल पाठ में ऐसा कोई अपवाद नहीं था। हालाँकि, बाद में श्री टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा संशोधन प्रस्ताव लाकर इन्हें जोड़ा गया।विधानसभा में हुई चर्चाओं का अध्ययन करने से पता चलता है कि संविधान निर्माताओं का उद्देश्य केवल कुलीन उपाधियों, जैसे राय साहब, राजा, सर आदि को समाप्त करना था, क्योंकि इनसे नागरिकों का एक असमान वर्ग बनता था। हालांकि, राज्य द्वारा योग्यता या असाधारण कार्यों को मान्यता देने पर कोई रोक नहीं थी, जिन्हें अपवादों के अंतर्गत रखा जाता था। समानता सुनिश्चित करने के लिए, संविधान निर्माताओं ने यह अनिवार्य किया कि ऐसी उपाधियों के प्राप्तकर्ता इन्हें प्रत्यय या उपसर्ग के रूप में उपयोग नहीं कर सकते। (वर्तमान में यही कानून है) । कोई भी व्यक्ति उपाधियों को प्रत्यय या उपसर्ग के रूप में उपयोग नहीं कर सकता, लेकिन वह इनका उपयोग अपने बायोडेटा/लेटर हेड/विज़िटिंग कार्ड आदि में कर सकता है।)
बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996) 1 एससीसी 361 मामले में , संविधान के अनुच्छेद 14 और 18 में निहित समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करने के आधार पर राष्ट्रीय पुरस्कारों को चुनौती दी गई थी। न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि समानता का सिद्धांत यह अनिवार्य नहीं करता कि योग्यता को मान्यता न दी जाए। न्यायालय ने अनुच्छेद – 51 ए (जे) पर भरोसा करते हुए , अर्थात् प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह ‘ व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की ओर प्रयास करे, ताकि राष्ट्र निरंतर उच्च स्तर की प्रगति और उपलब्धियों को प्राप्त कर सके ‘, और कहा कि इन कर्तव्यों के निर्वाह में उत्कृष्टता को मान्यता देने के लिए पुरस्कारों और अलंकरणों की एक प्रणाली होनी चाहिए।
निर्णय समाप्त करने से पहले, न्यायालय ने इन पुरस्कारों को प्रदान करने की प्रक्रिया पर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। न्यायालय ने कहा कि हर वर्ष पुरस्कार प्रदान करने की अनिवार्यता पर पुनर्विचार की आवश्यकता है और इसलिए, भारत के राष्ट्रपति के परामर्श से प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त एक उच्च स्तरीय समिति को इस पर विचार करना चाहिए।
इस फैसले के अनुपालन में, सरकार ने मई 1996 में एक उच्च स्तरीय समीक्षा समिति का गठन किया। समिति के अध्यक्ष भारत के माननीय उपराष्ट्रपति थे और इसके सदस्य कैबिनेट सचिव, भारत के अटॉर्नी जनरल, गृह सचिव, विदेश सचिव, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के सचिव, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष, कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति और राष्ट्रीय अनुसंधान प्रोफेसर यश पाल थे। समिति ने यह निर्धारित किया कि भारत रत्न के लिए सिफारिश केवल प्रधानमंत्री द्वारा की जाएगी और वे अपनी इच्छानुसार किसी से भी परामर्श करने के लिए स्वतंत्र होंगे। इस सिफारिश ने पुरस्कार प्रदान करने में प्रधानमंत्री को सर्वोच्चता प्रदान की।


















