रणधीर वर्मा चौक (हीरापुर), धनबाद : आप विश्वास करें या नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन 2006 में जब धनबाद नगर निगम अपने अस्तित्व में आया, उस कालखंड से लेकर विगत वर्ष 2025 तक अन्य आपराधिक घटनाओं को छोड़कर जिले में कुल 1500 से 1800+ तक मनुष्यों की हत्यायें हुई हैं। यह मैं नहीं कह रहा हूँ, यह आंकड़ा धनबाद जिला पुलिस और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो का आंकड़ा है। स्वाभाविक है रांची सचिवालय में सत्ता के गलियारे में बैठे आला अधिकारियों के साथ-साथ धनबाद के जिला अधिकारियों का मानना है कि 23 फरवरी, 2026 को धनबाद नगर निगम के मेयर पद के लिए संपन्न होने वाले चुनाव में शांति-व्यवस्था तो बनी ही रहे, साथ ही, जिला के मतदाता ‘साफ़-सुथरे छवि वाले अभ्यर्थी का चुनाव कर जिला प्रशासन को मदद करें।
वैसे धनबाद लोकसभा क्षेत्र में पड़ने वाले छह विधान सभा सीटों पर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का एक ही विधायक टुंडी विधानसभा से जीतकर कर विधानसभा पहुंचे थे, शेष पांच में क्रमशः दो-दो पर भारतीय जनता पार्टी और सीपीआई – एमएल(एल) का आधिपत्य है, तथापि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मानना है कि धनबाद के विकास के लिए धनबाद नगरपालिका क्षेत्र के मतदाता जेएमएम-सीपीआई (एमएल-एल) समर्थित उम्मीदवार चन्द्रशेहर अग्रवाल को मत देकर विजय बनायें। अग्रवाल जिले के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, यकीन कीजिये।
23 फरवरी, 2026 को होने वाले 2026 धनबाद नगर निगम चुनावों में मेयर पद के लिए 29 उम्मीदवारों के बीच बहु-कोना मुकाबला है और इस मुकाबले में मतदाताओं को जिले के बहुमुखी विकास के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग सूझबूझ से करना होगा। जिले के विकास के लिए मतदाताओं को आपराधिक छवि वाले लोगों को निरस्त करना होगा। साथ ही, यह भी ध्यान रखना होगा कि कौन से अभ्यर्थी जिले के विकास के लिए चुनावी मैदान में हैं और कौन अपनी राजनीतिक प्रभुत्व को और मजबूत करने के लिए।
धनबाद के समाहरणालय में इस बात की चर्चा है कि जब सभी जिले के विकास के लिए ही चुनावी मैदान में अपनी टोपियों को उछालें हैं, फिर सबों की नज़रों में प्रदेश की समस्या अलग-अलग कैसे हो सकती है? कोई पानी के लिए लड़ रहा है तो कोई बिजली के लिए, कोई अस्पताल के लिए तो कोई अपराध पर नियंत्रण के लिए और किसी को आधिकारिक रूप से पार्टी का समर्थन नहीं मिला तो वह बागी बनकर चुनाव में उतर गया। इन तमाम बातों पर मतदाताओं को मतदान करने के पहले सोचना होगा – गुटबंदी से अलग उठकर, अपने और अपने परिवार, बाल-बच्चों के भविष्य के लिए। नगर निगम का चुनाव भले सबसे छोटा राजनीतिक चुनाव हो, लेकिन इस चुनाव में जीतने वाले मतदाताओं के ह्रदय के समीप होते हैं, जबकि विधायक और सांसद कोसों दूर।
मेयर के इस इस चुनाव में भाजपा समर्थित संजीव कुमार अग्रवाल, झरिया के पूर्व विधायक दिवंगत सूर्यदेव सिंह के पुत्र संजीव सिंह भाजपा के बागी उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। संजीव सिंह के पत्नी श्रीमती रागिनी सिंह झरिया के विधायक हैं। जेएमएम – सीपीआई-एमएल समर्थित पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल मैदान में हैं। इसी तरह एक और पूर्व मेयर और दिवंगत रामाधीर सिंह की पत्नी इंदु सिंह भी मैदान में हैं। इसके अलावे अभियंता और शिक्षक समूह के रवि चौधरी, रेस्टोरेंट उद्यमी शांतनु चंद्रा, रवि बुंदेला (बिल्डर), मुकेश पांडे, भृगुनाथ भगत आदि भी पानी-अपनी टोपियां उछाले हैं।
लेकिन यदि देखा जाय तो 23 फरवरी को होने वाला यह चुनाव मुख्य रूप से झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और सहस्त्र खण्डों में बंटी भाजपा के बीच है। स्थानीय मतदाताओं का कहना है कि धनबाद सहित कोयलांचल में समस्त स्थानों पर सिंह परिवार ही कब्ज़ा रखना चाहता है। लेकिन अब समय बदल गया है। प्रत्याशियों की भीड़ में एक प्रत्याशी हैं प्रकाश कुमार । वे विश्व के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल इंपीरियल कॉलेज, लंदन से शिक्षित हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे धनबाद नगर निगम में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं, यह भी गहन शोध का विषय है। वे स्थानीय मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।
चुनाव परिणाम 27 फरवरी को आएगा। उधर, कांग्रेस की ओर से मंत्री इरफान अंसारी चुनावी मैदान में सक्रिय हैं और अपने प्रत्याशी के पक्ष में वोट की अपील कर रहे हैं। जेएमएम कोटे से मंत्री हफीजुल हसन अंसारी लगातार जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। दूसरी ओर, राजद के पूर्व राज्यसभा सांसद सुभाष यादव भी अपने समर्थित उम्मीदवार शमशेर आलम के लिए समर्थन जुटा रहे हैं। परन्तु अपने-अपने उम्मीदवारों के लिए प्रचार-प्रसार करने के बाद भी सभी इस बात को स्वीकारते हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल की छवि काफी अच्छी है। अग्रवाल विकास कार्यों को गति देने में सक्षम भी हैं।
चंद्रशेखर अग्रवाल के समर्थन में झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाकपा (माले) ने प्रचार अभियान तेज कर दिया है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक व पूर्व मंत्री मथुरा प्रसाद महतो और भाकपा माले के निरसा से विधायक अरूप चटर्जी ने पीसी कर चंद्रशेखर अग्रवाल को जिताने की अपील की। झामुमो समर्थित धनबाद नगर निगम के मेयर पद प्रत्याशी चंद्रशेखर अग्रवाल को भाकपा माले ने अपना समर्थन दिया, वहीं चिरकुंडा नगर परिषद के अध्यक्ष पद पर माले समर्थित उम्मीदवार शुक्ला राय को झामुमो ने अपना समर्थन दे दिया है। सोमवार को झामुमो की ओर से सचेतक सह टुंडी विधायक और भाकपा मामले के निरसा विधायक अरूप चटर्जी ने संयुक्त रूप से घोषणा की।
आइये, सिंह मैंशन को समझें
धनबाद जिला पुलिस और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर, 2006 से 2025 के बीच धनबाद ज़िले में कुल 1,500 से 1,800 के करीब हत्याएं होने का अनुमान है। इन्हीं हत्याओं में कोयलांचल के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन चहेते नेता और धनबाद नगर निगम के पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह क भी नाम है और उनके साथ उनका ड्राइवर घोल्टू महतो, बॉडीगार्ड मुन्ना तिवारी और पर्सनल स्टाफ अशोक यादव का पार्थिव शरीर भी अंकित है। नीरज सिंह और उनके साथ अन्य तीन लोगों की 21 मार्च 2017 को धनबाद के सरायढेला पुलिस स्टेशन के तहत स्टील गेट के पास राष्ट्रीय राजमार्ग-32 पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने AK-47 से नीरज सिंह की गाड़ी पर हमला किया था।नीरज सिंह को लगभग 25 गोलियां लगीं थीं। नीरज सिंह की गाड़ी जैसे ही स्टील गेट पहुंच कर ब्रेकर पर धीमी हुई, हमलावरों ने तीन तरफ से उन्हें घेर लिया। जब तक नीरज सिंह कुछ समझ पाते हमलावरों ने उन पर गोलियों की बरसात कर दी। एक के बाद एक 100 राउंड फायरिंग की।
सन 2017 में नीरज सिंह की मृत्यु के बाद उनकी विधवा पूर्णिमा नीरज सिंह को कांग्रेस पार्टी झरिया से विधानसभा चुनाव में टिकट दी थी और वे 2019-2024 कालखंड में झारखंड विधानसभा में झरिया से प्रतिनिधित्व भी की। लेकिन 2024–2029 कालखंड के लिए संपन्न विधानसभा चुनाव में वे अपनी ही गोतनी, जिसके पति संजीव सिंह अपने चचेरे भाई नीरज सिंह हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त थे, और वर्तमान में मेयर पद के लिए चुनावी मैदान में भी हैं, की पत्नी रागिनी सिंह भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर पूर्णिमा नीरज सिंह को परास्त कर झारखणड विधान सभा पहुंची। इससे पहले 2014–2019 के कालखंड में संजीव सिंह झरिया से भाजपा के विधायक थे। 2014 में, संजीव सिंह और उनके चचेरे भाई नीरज सिंह ने चुनावी लड़ाई लड़ी थी। संजीव 30,000 वोटों के अंतर से नीरज को हराया था। जबकि 2009–2014 और 2005-2009 कालखंड में उनकी माँ, यानी सूर्यदेव सिंह की पत्नी श्रीमती कुंती देवी (भाजपा) और 2000–2005 में समता पार्टी के बच्चा सिंह (सूर्यदेव सिंह के अपने छोटे भाई) झरिया क नेतृत्व किये थे। आज न तो सूर्यदेव सिंह हैं और ना ही बच्चा सिंह।
बहरहाल, 27 अगस्त, 2025 को, एक स्पेशल कोर्ट ने नीरज की हत्या से जुड़े आठ साल पुराने केस में सबूतों की कमी के कारण संजीव सिंह और दूसरों को बरी कर दिया। कोयला माफिया से बिहार विधानसभा तक पहुंचने वाले सूर्यदेव सिंह 1977 से 1991 तक झरिया का नेतृत्व किये थे। उनकी मृत्यु के साथ ही, सिंह मैंशन सहस्त्र खण्डों में बंट गया – सत्ता के लिए।
कहाँ से आया नगर निगम की प्रथा
भारत में म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन सिस्टम ब्रिटिश राज के दौरान 1688 में मद्रास (चेन्नई) में म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाने के साथ शुरू हुआ था, जिसके बाद 1762 तक बॉम्बे (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) में म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाए गए। धनबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन भी उसी कड़ी का एक हिस्सा है जिसका स्थापना 2006 में हुआ था। धनबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन 2006 में पहले की धनबाद म्युनिसिपैलिटी, झरिया नोटिफाइड एरिया, सिंदरी नोटिफाइड एरिया, कतरास नोटिफाइड एरिया, चट्टनडीह नोटिफाइड एरिया, 27 सेंसस टाउन और 258 गांवों को मिलाकर बनाया गया था। इसका क्षेत्रफल 355.77 वर्ग किलोमीटर था और आबादी 1,333,719 (2001 जनगणना) थी।
ब्रिटिश काल में, धनबाद मानभूम जिले का एक सबडिवीजन था। गोविंदपुर से 4 मील पूरब में मौजूद बागसुमा, सब डिवीजन का पहला हेडक्वार्टर था। बाद में हेडक्वार्टर को गोविंदपुर और आखिर में 1908 में धनबाद के हीरापुर मौजा में शिफ्ट कर दिया गया। 1956 में मानभूम जिले से अलग करके धनबाद को एक अलग जिला बनाया गया। धनबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को शहर के मेयर नेतृत्व करते हैं और कमिश्नर इसे चलाते हैं। धनबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के कामों के साथ बनाया गया है।
कहानी वासेपुर की
आइये पहले वासेपुर चलते हैं जहाँ कल रात गोलियां चली थी। धनबाद के वासेपुर में शुक्रवार देर रात गोलीबारी में गैंगस्टर फहीम खान के बेटे इकबाल खान के ड्राइवर बबली खान उर्फ हैदर अंसारी को दो अज्ञात अपराधियों ने गोली मार दी।वारदात के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई। घायल ड्राइवर की स्थिति गंभीर है। उसे बेहतर उपचार के लिए दुर्गापुर रेफर कर दिया गया है। गैंगस्टर फहीम खान एवं प्रिंस खान के बीच एक लंबे समय से विवाद चल रहा है। रमजान के पहले जुमा को रात करीब 11 बजे तरावीह के दौरान आसपास के लोग जुटे थे। इसी दौरान सामने की दुकान के पास दो अज्ञात युवक खड़े दिखे। लोगों ने संदेह के आधार पर उनसे पूछताछ शुरू की। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इसी दौरान बबली खान और एक युवक के बीच कहासुनी व हाथापाई हो गयी।इसके बाद एक युवक ने कमर से पिस्तौल निकालकर बबली को गोली मार दी। गोली लगते ही भगदड़ मच गयी और दोनों हमलावर पैदल ही कलाली बागान की ओर भाग निकले। घटना के बाद वासेपुर इलाका को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया।
वासेपुर का इतिहास कहता है की वर्ष 1983 मे फहीम खान के पिता शफीक खान की हत्या से शुरू हुआ वासेपुर का गैंगवार। सत्तर के कालखंड में वासेपुर सहित अन्य क्षेत्रों में शफीक खान का दबदबा प्रारम्भ हो गया था। पुलिस फाइल में आज भी यह बात उल्लिखित है कि वर्ष 1980 में शफीक खान के बड़े बेटे शमीम खान का झगडा नया बाजार के बाबला उर्फ अरशद से हुआ जो कालांतर में विकराल रूप ले लिए। इसका परिणाम यह हुआ कि लिया 1983 में शफीक खान की बारबाड्डा में गोली मारकर कर दी गई। इस हत्या का आरोप नया बाजार के सुल्तान पर लगा। शफीक खान की हत्या के बदले के रूप मे सुल्तान के भाई असगर की हत्या 1986 में बैंक मोड मे कर दी गई।
हमलाकांड के आरोपी बने अंजार की हत्या भूली मोड के समीप कर दी गयी। इसी बीच एक मामले में पेशी के दौरान शमीम खान की हत्या हीरापुर स्थित जिला न्यायालय परिसर में सिपाहियों के सुरज्ञा व्यवस्था को धत्ता बताते हुए गोली मारकर हत्या कर दी गई।शमीम खान के हत्या के बाद फहीम खान ने मोर्चा संभाला लेकिन वर्ष 1995 के छोटे भाई छोटन खान की हत्या कर दी गई और लाश को लाइन किनारे फेक दिया गया। इस हत्या का आरोप सुल्तान पर लगा।
इसके बाद 12 जनवरी 1996 में सुल्तान की हत्या उसके घर में घुसकर कर दी गई और इस हत्या का आरोपी फहीम खान को बताया गया। सुल्तान की हत्या के बाद नया बाजार गुट का कमान नजीर उर्फ नजीरउद्दीन ने संभाला परन्तु 1998 को धनबाद रेलवे स्टेशन के समीप स्थित एक मजार मे घुसकर कर नजीर को मौत के घाट उतार दिया गया। इस घटना मे नजीक का अंगरज्ञक महबूब भी मारा गया हत्या का आरोप फहीम खान पर आया।
परन्तु नजीर के हत्या के बाद ही फहीम खान को उनके घर वासेपुर से ही चुनौती मिलनी शुरू हो गई फहीम खान के करीबी मुन्ना प्रेस वाला और साबिर आलम ने ही व्यवसाय मे लेनदेन के विवाद पर अलग मोर्चा खोल दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि 2001 को साबिर आलम पर जानलेवा हमला हुआ जिसमें साबिर बाल बाल बच गया और फहीम के घर पर हमला बोलकर मरहूम शमीम खान की वेवा शमा परवीन को गोली मार दी गयी। हालांकि शमा परवीन बच गई।
उसके बाद साबिर गूट के प्रमुख जफर की हत्या उसके घर पर ही कर दी गई इसमे भी फहीम खान को षड्यंत्रकारी बताया गया क्योंकि फहीम खान उस समय जेल मे था। जफर की हत्या के बाद 2001 को फहीम की मॉ नजमा खातुन और उसकी मौसी की हत्या पुराना बाजार डायमंड क्रासिंग समीप कर दी गई। इस हत्या का आरोप साबिर आलम पर लगा।
पुलिस रिकार्ड यह भी कहता है कि कुछ दिन मामला शांत रहा लेकिन 29 जनवरी 2004 रात के साढ़े दस बजे एके 47 से अपराधियों ने फहीम के ऊपर जानलेवा हमला किया। लेकिन फहीम बाल बाल बच गया। इस घटना मे फहीम का एक अंगरक्षक जहानाबाद के विनोद मारा गया जबकि लगभग आधा दर्जन लोग घायल हो गये। भागने के क्रम टोली से बेकारबांध के समीप पुलिस गश्ती दल की मुठभेड़ हो गई जिसमे एक अपराधी मारा गया और मौके पर पुलिस ने मोहम्मद अशफाक ओर मोहम्मद तनवीर को रंगे हाथ पकड़ लिया। फहीम खान के बयान के आधार पर बैंक मोड़ थाना मे वासेपुर गैंगवार के एक गुट के प्रमुख साबिर आलम पर आरोप लगाया गया।
वासेपुर-नया बाजार का खुनी इतिहास
वासेपुर और नया बाजार गैंग में खूनी संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। धनबाद के वासेपुर के कुख्यात शफीक खान की एक जमाने में बादशाहत थी। उसकी हत्या के बाद पुत्र फहीम और शमीम उसी अपराध के मार्ग पर चला। शमीम की भी हत्या हो गयी।फहीम हत्या के एक मामले में जमशेदपुर के घाघीडीह जेल में उम्र कैद काट रहा है। फहीम की बहन नासरीन वासेपुर में ही नासीर खान से ब्याही है। उसके चार बेटे हैं – प्रिंस, गोपी, गॉडविन और बंटी। इधर फहीम के भी तीन बेटे हैं – इकबाल, रज्जन और साहेबजादे । हाल के वर्षों मे फहीम के परिवार और नासीर के परिवार में काली कमाई में वर्चस्व को लेकर विवाद शुरू हुआ। फहीम और नासीर के बेटे एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।
यहां हत्यायों के प्रतिशोध में कई हत्याएं हुई हैं। वर्ष 1990 और 2000 के दशक में फहीम खान पर कई हत्याओं के आरोप लगे। इन्हीं में से एक सागिर की हत्या के मामले में फहीम खान को जून 2011 में सजा हो गई।इसके बाद से वह जेल में ही है। उसे उम्रकैद की सजा सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखी है। फहीम खान के जेल जाते ही उनकी सल्तनत को बेटे इकबाल और प्रिंस के हाथों मे आ गई। दोनों ने डॉन की उसी सल्तनत को बरकरार रखा पर पैसे और रंगदारी के हिस्से को लेकर करीब ग्यारह सालों से फहीम खान और उसकी बहन तथा भांजे आमने-सामने हो गए। अब फहीम खान के लिए भांजा प्रिंस खान सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा है। भांजे प्रिंस ने कई बार वीडियो जारी कर फहीम खान को ललकारा है। मामा-भांजों की दुश्मनी में कई कारोबारियों को कोपभाजन का शिकार बनना पड़ रहा है। फहीम खान जमशेदपुर के घाघीडीह जेल में उम्रकैद काट रहा है। वासेपुर कमर मकदुमी रोड में उसका आवास है।
प्रिंस खान पर रंगदारी, हत्या और अपहरण के 91 मामले दर्ज हैं। इंटरपोल ने उसके खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस जारी किया है। इतना ही नहीं कई कारोबारी तो डर के मारे पलायन कर चुके हैं। कहते हैं प्रिंस दुबई से बैठ कर अभी भी झारखंड के व्यवसाईयों से रंगदारी वसूली अपने गुर्गो से करवा रहा है। छोटे सरकार उर्फ़ प्रिंस के आने के बाद वासेपुर में जंग का रंग थोड़ा बदल गया है। कोयला, लोहा और जमीन के लिए शुरू हुई जंग अब रंगदारी वसूली की जंग में तब्दील हो गई है।
वासेपुर को जानने वाले बताते हैं कि 80 के दशक में वासेपुर में रेलवे का लोहा और स्क्रैप के धंधे के लिए खून बहते थे।फहीम के फाइनेंसर माने जाने वालों से प्रिंस ने सबसे पहले रंगदारी मांगनी शुरू की है। मछली कारोबारी, ईस्ट बसुरिया के एक आउटसोर्सिंग संचालक के अलावा कई बड़े जमीन कारोबारी इस लिस्ट में शामिल हैं, जो फहीम खान के राजदार है।आलम यह है कि प्रिंस खान के दहशत के कारण धनबाद से कई बड़े व्यवसाई से लेकर उद्योगपति अपने कारोबार बंद कर पलायन कर चुके हैं। प्रिंस के जुबान पर बस एक ही शब्द गूंजता है “एक ही जान है अल्लाह ले ले या मोहल्ला.”80 के दशक के समय धनबाद के गैंग्स ऑफ वासेपुर में खौफ का दूसरा नाम बाबला था। उसके नाम से उस समय धनबाद में तूती बोलती थी। बाबला का नाम उस समय चर्चा में आया था
जब 1983 में बरवाअड्डा स्थित पेट्रोल पंप के पास वासेपुर के डॉन और गैंगस्टर फहीम खान के पिता शफीक खान की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में आरोप बाबला पर लगा था। जिसके बाद बाबला का नाम सुर्खियों में रहा था। लेकिन हाल के समय में बाबला अपराध की दुनिया से किनारा कर लिया था। वह वाहनों की एजेंटी और जमीन कारोबार कर अपना परिवार चला रहा है। विगत चुनाव के समय बैंक मोड़ थाना क्षेत्र के नया बाजार में सोमवार की देर रात अपराधियों ने बाबला खान को गोली मार दी। स्थानीय लोगों ने बताया कि बाबला ने पैथ लैब परिसर में अपनी गाड़ी पार्क करने गया था। इस दौरान तीन अपराधी मौके पर पहुंचे। इनमें से एक अपराधी ने अन्य दो साथियों से बाबला की पहचान करायी। दोनों अपराधियों ने उसके ऊपर पिस्टल से हमला करना चाहा लेकिन बाबला और अपराधियों के बीच पिस्टल की छीना झपटी होने लगी। इसके बाद अपराधियों ने बबला के सिर पर पिस्तौल के बट से जोरदार हमला कर दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गए और अपराधियों ने उन्हें गोली मार दी। गोली मारे जाने की घटना को लेकर बताया जाता है कि बाबला के घर के पास एक अपार्टमेंट बन रहा हैं। जिसमें उसकी भी कुछ जमीन है। इसी को लेकर दोनों ओर से मतभेद चल रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जिस समय अपराधी बाबला को गोली मारी, उसके साथ लोगों की अपराधी से धक्का मुक्की भी हुई।
धनबाद का आपराधिक इतिहास
आज से पचास वर्ष पहले के कालखंड में जो सत्ता और आधिपत्य के लिए रक्तपात किये थे, आज दुनिया में नहीं हैं, मृत्यु को प्राप्त कर लिए, या फिर प्रशासन द्वारा निर्मित कारावास के अधीन हैं, लेकिन सत्ता और पैसे के प्रति भूख आज भी कमी नहीं आयी है, जबकि तीसरी पीढ़ी का आगमन हो चूका है । सरायढ़ेला स्थित सन 1980 में निर्मित सिंह मैंशन, जो सूर्यदेव सिंह की निशानी थी, और है भी, आज उस मैंशन की तत्कालीन एकता खंड-खंड में विभाजित हो गया है। सूर्यदेव सिंह अपने जीवन काल में जहाँ अपने भाइयों, परिवारों की एकता को सूत्रबद्ध किये रहे; उनके अंतिम सांस के साथ ही एकता छिन्न-भिन्न हो गया। आज कौन अपना है, कौन पराया है, कौन रक्त का प्यासा है – एक गहन शोध का विषय हो गया हैं। वैसे, विगत दिनों कहने के लिए अगली पीढ़ियां रक्तपात की परंपरा को विराम देने के लिए शांति पथ का अख्तियार करने की बात करना प्रारम्भ की हैं, युद्ध नहीं बुद्धम् शरणम् गच्छामि का पाठ गुनगुनाते हैं; लेकिन वहीँ आयुधों की भी पूजा अर्चना करते हैं। बन्दुक और पिस्तौल की सफाई भी करते हैं। जहाँ तक व्यावहारिकता का प्रश्न है कई सौ करोड़ सालाना अवैध आय के स्रोत पर इतनी आसानी से कोई अपना कब्ज़ा कैसे त्याग सकता हैं। खैर।
धनबाद का आपराधिक इतिहास इस बात का गवाह है कि फॉरवर्ड ब्लॉक के संतोष सेनगुप्ता, आरजेडी के मुकुल देव, मजदूर नेता एस.के. राय इसी वासेपुर की धूल भरी गलियों में मृत पाए गए थे। गैंगस्टर समीन खान को धनबाद अदालत की देहरी पर गोली मार दी गई थी। सकल देव सिंह को बाइपास रोड पर मारा गया था जबकि उसके भाई की हत्या शक्ति चौक पर हुई थी। रेलवे ठेकव्दार इरफान और वार्ड कमिशनर नजीर अहमद भी इस खूनी खेल की भेंट चढ़े। 14 अप्रैल, 2000 को एमसीसी के विधायक गुरुदास चटर्जी को देवली के पास मार दिया गया।
कोयलांचल की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी आज भी पिछले छह दशकों का खुनी इतिहास याद रखे है। झरिया विधान सभा की मिट्टी आज भी कहती है कि सन 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। सं 1978 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद सन 1983 में शफी खान, फिर 1984 में मो असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था। इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव को मौत के घाट उतारा गया। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी।
25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
कोयलांचल में खून की होली के लिए ‘होली पर्व’ का होना आवश्यक नहीं है। यहाँ वर्चस्व स्थापित करने के लिए, वर्चस्व बनाये रखने के लिए कभी भी, कहीं भी खून की होली हो जाती है। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। सन 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या हुई। सन 2003 प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई।
आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इतना ही नहीं, अनेकों बार एस के राय जो इंटक के नेता भी थे, पर हमला हुआ। कोयलांचल की इसी खुनी होली और कोयले से कमाई के कारण ही बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन आदि नेता भी बने। इसी कमाई के कारण अविभाजित बिहार और बाद में झारखण्ड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के नेताओं की नजर, केंद्र में बैठे मंत्रियों की पैनी नजर इस काले सोने की ओर लगी होती है। काला होने के बाद भी सभी इसे प्यार करते हैं।
पिछले दिनों सूर्यदेव सिंह के भाई को बाहुबली रामधीर सिंह को धनबाद की एक अदालत ने विनोद सिंह हत्याकांड के मामले में कोई रियायत नहीं दी। रामधीर सिंह बाहुबली सकलदेव सिंह और उनके भाई बिनोद सिंह की हत्या का अपराधी थे। वैसे 25 जनवरी 1999 को भूली मोड़ के पास सकलदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। 25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
उस मुकदमें में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रिजवान अहमद की अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उनकी रिहाई का फैसला सुनाया था, लेकिन आज वे बिनोद सिंह हत्या कांड के अपराध में कारावास में ही रहे। उन्हें उम्र कैद की सजा है। विनोद सिंह बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह के भाई थे। उनकी हत्या 15 जुलाई, 1998 को की गई। कहते हैं सकलदेव सिंह – विनोद सिंह के पिता मुखराम सिंह अविभाजित बिहार के छपरा ज़िले के उरहर पुर गांव से धनबाद के सिजुआ आये थे रोजी-रोटी की तलाश में।
15 जुलाई, 1998 को कतरास हटिया शहीद भगत सिंह चौक के पास ताबड़तोड़ गोलियों से हमला कर विनोद सिंह और उनके चालक मन्नु अंसारी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उस समय सुबह का कोई 8.40 बजा था। विनोद सिंह कोल डंप जाने के लिए अपनी नई एम्बेसडर कार से निकले थे। उस कार को मन्नु अंसारी चला रहा था। पंचगढी बाजार में गाडियां जाम में थोडी देर फंसी रही। सुबह-सवेरे जैसे ही कतरास हटिया भगत सिंह चौक के पास जैसे ही पहुंचे, एक सादे रंग की मारुति कार दोनों गाडियों को ओवरटेक कर आगे रुकी, मारुति से तीन लोग उतरे और विनोद सिंह की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। विनोद सिंह और मन्नु खून से लथपथ गिरे हुए थे। कहते हैं उस हमलावरों में रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह शामिल थे। रामधीर सिंह झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है। रामधीर सिंह को ‘सिंह मेन्शन’ के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है।
कहते हैं वे सूर्य देव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के वह अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। डेढ़ साल से अधिक समय तक फरार रहने के बाद उन्होंने धनबाद कोर्ट में सरेंडर किया था। विधि का विधान देखिये उनकी पत्नी इंदू देवी धनबाद नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। विनोद सिंह हत्याकांड में विगत 25 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन-बेंच ने रामधीर सिंह की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। इतना ही नहीं, रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे।
21 मार्च 2017 की शाम को स्टीलगेट इलाके में हुई अंधाधुंध गोलीबारी करके पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह, चंद्रप्रकाश महतो, अशोक यादव और मुन्ना तिवारी की हत्या कर दी गई थी. इस मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई थी। परन्तु विगत दिनों सभी आरोपी न्यायालय से बाइज्जत बरी हो गए।
धनबाद की काली, रक्तरंजित मिट्टी और बीपी सिन्हा
कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि 1950 में बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा @बीपी सिन्हा ने डाली थी। उन दिनों सम्पूर्ण कोयलांचल में सिन्हा साहब का एकछत्र राज था। सिन्हा साहेब बरौनी के रहने वाले थे और राजनीति में उनकी विशेष पकड़ थी। वे सर्वप्रथम सं 1950 में धनबाद पदार्पित हुए। उनमें बहुत बातें ईश्वरीय थी। लिखना, बोलना जैसा सरस्वती की देन थी। उनका वही आकर्षण तत्कालीन कोलियरी मालिकों को आकर्षित किया। वे इंटक से जुड़े और ताकतवर मजबूत नेता के रूप में उदित हुए।
उन्होंने कोयलांचल में युवा पहलवानों की फौज बनाई, जिसमें सूर्यदेव सिंह इनके सबसे विश्वासपात्र थे। उनका इतना दबदबा था कि उन्हीं की मर्जी से कोयला खदान चलती थी। सिन्हा का आवास व्हाईट हाउस के रूप में मशहूर हुआ करता था और पूरे इलाके में माफिया स्टाइल में उनकी तूती बोलती थी। लाठी हमारी तो मिल्कियत भी हमारी ” चरितार्थ हो रही थी। घटनाओं की गूंज बिहार और दिल्ली की सत्ता के गलियारों से लेकर पार्लियामेंट तक सुनाई पड़ रहीं थी। ए+बी+सी=डी काफी प्रचलित हो चुका था उन दिनों यानी ए-आरा + बी-बलिया + सी-छपरा =डी धनबाद का नारा बुलंद हो चुका था।
कोल माइनिंग पर वर्चस्व के लिए मजदूर संघ का मजबूत होना बहुत ही आवश्यक था, बीपी सिन्हा इस बात को बखूबी जानते थे। जब 17 अक्टूबर 1971 को कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है तब राष्ट्रीयकरण होते ही बीपी सिन्हा का कोल नगरी पर पकड़ और अधिक मजबूत हो जाता है, पूरे कोल माइनिंग में उनकी तूती बोलने लगती है, उनका अब कोयले की खदानों पर एकछत्र राज्य चलने लगता है। कहा जाता है कि मजदूरों को काबू में रखने के लिए उन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बनाये थे। इसमें बलिया के रहने वाले सूर्यदेव सिंह और स्थानीय वासेपुर के शफी खान आदि शामिल थे।उसी समय से उनकी दुश्मनी वासेपुर के शफी खान गैंग्स से शुरू हुई। सिन्हा साहेब की हत्या में सूर्यदेव सिंह का नाम आया था, लेकिन कुछ समय बाद वे इस काण्ड से बरी हो गए।
वे कांग्रेस के प्रचारक थे और कोल माइनिंग में भारतीय राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ की तूती बोलती थी। किद्वान्ति है कि उनका माफिया राज इतना बड़ा था की एक बार जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने रैली के दौरान सभा में देर से आई थीं, इस बात को लेकर बीपी सिन्हा बहुत नाराज हुए थे, जिसको लेकर इंदिरा गाँधी को भरी सभा में जनता से क्षमा माँगनी पड़ी थी। उनकी प्रभुता के किस्से में एक अध्याय यह भी जुड़ा है की उन्होंने अपने माली बिंदेश्वरी दुबे’ को मजदूर संघ का नेता तक बना डाला था। वे कांग्रेसी थे और उनका कद इतना बड़ा था की उन दिनों भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी वार्तालाप हॉटलाइन पर हुआ करती थी। समय का चक्र यहाँ भी चल रहा था। केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई इंदिरा गांधी के विरोधी लहर के दौरान विरोधी बीपी सिन्हा के इस वर्चस्व को तोड़ने के लिए मौके की तलाश में थी।
उस दिन मार्च महीने का 28 तारीख था और साल 1979 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब हां में मिलने पर वे लोग लौट गये। इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं। इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा । करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी।
पूरे धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर कलकत्ता तक, धनबाद से लेकर पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहब का ‘अंत’, सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। व्हाइट हाउस का नामोनिशान समाप्त हो गया है।

मेयर चुनाव के बहाने भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर को श्रद्धांजलि
धनबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन मेयर चुनाव के बहाने चलिए सत्तर के दशक में चलते हैं। कर्पूरी ठाकुर पहली बार सन् 1970-1971 में दारोगा प्रसाद राय और भोला पासवान शास्त्री के बीच पांचवें विधानसभा के कालखंड में 162 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे। दूसरी बार का कालखंड था 1977-1979 और यह सातवें विधानसभा का समय काल था। पहले एक वर्ष 301 दिनों के लिए कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने फिर आ गए रामसुंदर दास 302 दिनों के लिए। यह एक ऐसा दौड़ था जब बिहार ही नहीं, देश में राजनीतिक परिस्थियाँ बदल रही थी, साथ ही, अपराधियों का राजनीतिकरण भी प्रारम्भ हो गया था। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि राजनीति का अपराधीकरण का श्रीगणेश हो गया था।
तत्कालीन अविभाजित बिहार के अपराधी, जो सत्ता की गलियारों में कमर कसने लगे थे, उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि राजनीति उनके बिना नहीं चल सकती है और राजनेता उनके सहयोग के बिना, खासकर आर्थिक सहयोग, के बिना ‘राजनीति में डकार’ नहीं ले सकते हैं । यह सोच ‘पैसे’ के कारण हो गयी थी, जिसे तत्कालीन स्वार्थी राजनेताओं ने तुल भी दिया और भुनाया भी।उन दिनों कर्पूरी ठाकुर का प्रदेश के समाज में अच्छा स्थान था। यह बात अलग थी कि शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षित व्यक्ति कर्पूरी ठाकुर के व्यवहार से खुश नहीं थे, तथापि कर भी क्या सकते थे। क्योंकि शिक्षित व्यक्ति को आरंभिक काल से मूकदर्शक रहा है। दक्षिण बिहार के ‘दर्जनों कोयला सरगना’ मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए एक साथ कमर कस कर तैयार हो गए थे। पटना की सड़कों पर, तीन-सितारा होटलों में (पांच सितारा होटल नहीं था), डाक बंगला में अपना-अपना ठिकाना बनाकर सरकार गिराने को सज्ज थे। वजह था कर्पूरी ठाकुर कोयला सरगना और उसके साथ हाथ मिलाने वाले सभी लोगों की ‘तथाकथित ताकत को चुनौती दिए थे।” यानी कर्पूरी ठाकुर और कोयला सरगनाओं के साथ इस पार और उस पार की प्रशासनिक लड़ाई छिड़ गयी थी।
इतना ही नहीं, समयांतराल, वही कोयला माफिया एक बार फिर कोयला क्षेत्र के मजदूर संघ के नेता, जो प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने थे, बिंदेश्वरी दुबे के खिलाफ भी मोर्चा गोलबंद किया था। दुबे, जो 1985-1988 में दो साल 338 दिनों के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय में थे और कोई साढ़े चार दशक तक कोयला क्षेत्र में मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन सभी गोलबंदी का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नेतृत्व डॉ जगन्नाथ मिश्र कर रहे थे।
डॉ. मिश्र 1975-1977 (दो साल 19 दिन), 1980-1983 (3 साल 67 दिन) और 1989-1990 (94 दिन) के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय में भी बैठे थे। इतना ही नहीं, उन दिनों डॉ. मिश्र की आवाज तत्कालीन अख़बारों में बहुत ही प्रमुखता के साथ प्रकाशित भी हुई थी जब उन्होंने कहा था कि ‘उनका उद्देश्य न केवल बिंदेश्वरी दुबे को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलना है, बल्कि कोयला क्षेत्र में उनके प्रभुत्व को भी नेश्तोनाबूद कर देना है।’ उन दिनों बिहार के कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव टी अन्जाइहा थे, जो बिहार के प्रभारी भी थे। दुबे ने कांग्रेस आलाकमान को पत्र लिखकर यह सूचित भी किया था कि प्रदेश में कुछ राजनीतिक नेता और कोयला माफिया एक साथ मिलकर हमारी सरकार को गिराने की कोशिश कर रहे हैं।
साल 1977 का अप्रैल महीना का अंतिम दिन था और प्रदेश राष्ट्रपति शासन के अधीन चला गया था 30 अप्रैल से 24 जून 1977 तक, जब सातवीं विधान सभा में कर्पूरी ठाकुर 24 जून, 1977 को 11 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिए थे। वे दो बार प्रदेश का नेतृत्व किये और कुल 829 दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। कर्पूरी ठाकुर कोयला माफियाओं के खिलाफ लड़े। राजनीतिक गलियारे में उन्हें ‘जननायक’ कहा जाता है। कर्पूरी ठाकुर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण का लाभ प्रदान करने में अग्रणी थे क्योंकि वे मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों को लागू किया था।
कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने के दो महीने बाद धनबाद के उपायुक्त बने देवदास छोटराय जो कर्पूरी ठाकुर द्वारा ही धनबाद से बाहर भी निकले है और उनके स्थान पर आठ महीने के लिए स्थापित हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के डी सिन्हा। छोटराय का जाना इसलिए आवश्यक हो गया कि पटना सचिवालय या प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में नीली आँख वाले अधिकारी होने के बाद भी, तत्कालीन कोयला मजदूर या फिर कोयलांचल का दबंग बी पी सिन्हा को उनके घर पर ही गोलियों से छल्ली कर दिया गया।
बी पी सिन्हा का जमीन पर ढ़ेर होना और सूर्यदेव सिंह का आसमान में उड़ने का मार्ग प्रसस्त किया और वे दर्जनों कोयला के क्षेत्र में सरगनाओं की उपस्थिति में भी कोयला माफिया के रूप में पटना ही नहीं, बिहार ही नहीं, राष्ट्र ही नहीं, विदेशी अख़बारों, पत्रिकाओं में भी सुर्खियों में आने लगे। उत्तर प्रदेश के बलिया से आकर एक साधारण कोयला मजदूर के रूप में काम शुरू करने वाले सूर्यदेव सिंह ने कोयला मजदूरों की ट्रेड यूनियन की अगुवाई कर इतनी शोहरत हासिल की कि धनबाद की धरती पर पत्ता भी उनकी इक्षा के बिना नहीं हिलता था। जितने दबंग, उतने ही सामाजिक कार्यों में रुचि दिखाने वाले सूर्यदेव सिंह की लोकप्रियता का आलम रहा।
चंद्रशेखर अब तक प्रधान मंत्री बने नहीं थे और जब प्रधानमंत्री बने तब भी सूर्यदेव सिंह को अपना परम-मित्र ही माना और कहा भी। चंद्रशेखर से नजदीकी के कारण उनका राजनीतिक रसूख परवान पर था। 1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने। उनका झरिया विधानसभा सीट पर कब्ज़ा कांग्रेस की करारी हार थी। वे तत्कालीन श्रमिक नेता एस के राय को पराजित किया था। सं 1977 के बाद 1980, 1985 व 1990 में भी जीत दर्ज की।
कहते हैं 1977 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी का टिकट मिलने के बाद भी पहली बार चुनाव लडऩे से सूर्यदेव सिंह घबरा रहे थे। उन्होंने अपने साथियों से अपनी स्थिति के बारे में साफ कहा था कि ऐसी स्थिति में हमें कोई वोट क्यों देगा। वे कोलियरी से अधिक बाहर नहीं निकले । इसके बाद हमेशा उनके साथ रहनेवाले राजनंदन सिंह, रामनाथ सिंह, बलराम सिंह मास्टरजी आदि ने आत्मविश्वास जगाया। क्योंकि सूर्यदेव सिंह के पास बाहुबल के साथ साथ पिसा भी था। परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन विरोधी नेताओं के खासमखास कई लोग एच एम लांडे, देवनंदन ग्वाला, सीताराम, जयंती प्रसाद, सुभाष ठाकुर, अवधेश राय, सुरेश राय आदि सूर्यदेव सिंह के साथ हो गए।
चंद्रशेखर ही एकमात्र राजनेता नहीं थे, जिनके क़दमों के निशान सं 1980 के दशक में निर्मित राष्ट्रीय राजमार्ग-32 पर स्थित सिंह मैंशन में पड़ते थे। स्थानीय नेताओं से लेकर पटना, कलकत्ता और दिल्ली के सैकड़ों नेता थे जो सिंह मैंशन में सर झुकाकर प्रवेश लेते थे। वजह भी था – काले कोयले की काली कमाई और सफेदपोश लोग। उस दौर में पटना के सचिवालय अथवा दिल्ली के कोयला मंत्रालय और कलकत्ता के कॉल इण्डिया में बैठे नेता और अधिकारी भले इस बात से खुश को कि वे कोयला क्षेत्र का राजा हैं, हकीकत तो यह था कि पुरे कोयलांचल में वास्तविक शासन सूर्यदेव सिंह का था। इतना ही नहीं, उस कालखंड में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र, बिंदेश्वर दुबे जैसे नेता भी तत्कालीन कोयला माफिया डॉन के यहाँ खुलान भले नहीं, लेकिन अन्तःमन से हाजरी जरूर लगते थे। वजह – पैसा और दबंगता। उन दिनों धनबाद में प्रस्थापित जिला उपायुक्त हमेशा मुख्यमंत्री के गर्म लाइन से जुड़े होते थे। आज भी स्थिति बदली नहीं है। सिर्फ स्थान बदल गया है – अपना पटना सचिवालय के स्थान पर रांची सचिवालय हो गया है।
अगर ऐसा नहीं होता तो सं 1956 से अब तक धनबाद समाहरणालय में कोई 54 उपायुक्तों का नाम पीतल के अक्षरों में गोदना के तरह नहीं गोदाया होता। अब आप ही सोचिये, कि एक उपायुक्त अपने जिले में एक साल दो महीने में क्या कर लेगा? इतना ही नहीं, सं 1985 में जब ए के उपाध्याय जी उपायुक्त थे, उस समय से लेकर कोयला क्षेत्र में आधिकारिक शब्दों से अलंकृत कोयला माफिआओं की समाप्ति तक और झारखण्ड राज्य के निर्माण तक 14 उपायुक्त की लम्बी सूची नहीं बनती। बाबू सूर्यदेव सिंह की ठेंघुने और कमर कमजोर होते देख धनबाद से पटना और दिल्ली तक सैकड़ों लोग खुश हो रहे थे।
झरिया स्थित बिहार भवन, बिहार टॉकीज, उस परिसर में स्थित अन्य दुकानों को खाली कराये जाने की कार्रवाई पूरी हो गई थी।सूर्यदेव सिंह कहते रहे वे सन 1976 में उक्त भवन को 35 लाख में क्रय किये थे, लेकिन तत्कालीन पायुक्त मदन मोहन झा, धनबाद और पटना में बैठे आला अधिकारी कहते नहीं थक रहे थे कि उस भवन और परिसर पर सूर्यदेव सिंह का अवैध कब्ज़ा है। सालों लम्बा न्यायिक से लेकर प्रशासनिक युद्ध लड़ा गया था।सवाल सिर्फ ‘झरिया पर कब्ज़ा’ का था।

सूर्यदेव सिंह 4 भाई थे। विक्रमा सिंह अपने पैतृक गाँव बलिया में ही रह गये। जबकि राजन सिंह (अब दिवंगत), बच्चा सिंह (अब दिवंगत) और रामधीर सिंह (आजीवन कारावास) सूर्यदेव सिंह (अब दिवंगत) के साथ रहे। उन दिनों सूर्यदेव सिंह पर प्रशासन अपनी पकड़ बना रही थी, उसी काल खंड में सूर्यदेव सिंह आरा लोक सभा से चुनाव लड़ने लगे। उधर चन्द्रमा सिंह बलिया लोक सभा से निर्दलीय चुनाव लड़ने को ठान लिए। उन दिनों बलिया में सूर्यदेव सिंह के राजनीतिक गुरु चंद्रशेखर चाहते थे कि चन्द्रमा सिंह अपनी उम्मीदवारी वापस ले ले। वजह यह था कि बलिया में चंद्रशेखर के अभ्यर्थी चुनावी मैदान में थे। चंद्रशेखर सूर्यदेव सिंह को बात-बार कहे कि चन्द्रमा सिंह को उम्मीदवारी वापस लेने को कहो। सूर्यदेव सिंह के कहने पर भी चन्द्रमा सिंह ऐसा नहीं किये। बाद में जब सूर्यदेव सिंह चंद्रशेखर से बात करना चाहे तो चंद्रशेखर बात करने से मन कर दिए और यहीं अंत हो गया सूर्यदेव सिंह का सूर्य।
उधर सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद बच्चा सिंह झरिया के विधायक बने। उसके बाद सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह और अभी उनके बेटे संजीव सिंह झरिया से विधायक बने। सन 1977 से 2014 तक के विधान सभा चुनाव में झरिया विधान सभा सीट पर हमेशा सिंह मेंशन परिवार का ही कब्ज़ा रहा। केवल 1995 में राजद के टिकट पर आबो देवी को इस सीट से जीत मिल सकी थी। सिंह मैंशन के तर्ज पर ‘सूर्योदय’ बना लिया और राजन सिंह का परिवार ने रघुकुल। रामधीर सिंह का बलिया-धनबाद आना-जाना लगा रहा, लेकिन उनकी पत्नी इंदू देवी और बेटा शशि सिंह मेंशन में ही रहती रही। सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद ‘सूर्योदय’ ‘रघुकुल’ और ‘सिंह मैंशन’ में कभी मधुर सम्बन्ध नहीं रहा, जहाँ तक नयी पीढ़ियों का सवाल है। जून 15 सन 1991 में हार्ट अटैक से हुई उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई।
कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है। पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं। कोयलांचल में 40 वैध खदाने हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन। इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं। वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है। उन दिनों हुई कई हत्याओं के बाद लाशें भी नहीं मिल पाईं। इन्हें बेदर्दी से जलती आग में फेंक दिया गया।

बहरहाल, धनबाद जिला के स्वतंत्र गठन के बाद से अब तक साढ़े चार दर्जन उपायुक्त काली कुर्सी पर बिछे सफ़ेद तौलिये पर विराजमान हुए। रामप्रकाश खन्ना, शिवराज नंदन शर्मा, सुरेन सिंह धानोबा, गुरुदेव सिंह ग्रेवाल, भगीरथ लाल दास, आरआर मेनन, आरआर प्रसाद, ए यु शर्मा, चंद्रमोहन झा, कुंवर बहादुर सक्सेना, लक्ष्मण शुक्ल, देवदास छोट राय, केडी सिन्हा, एस विजयराघवन, टी नंदकुमार, डॉ. जे एस बरारा, अशोक कुमार, एके उपाध्याय, मदनमोहन झा, रामसेवक शर्मा, अफ़ज़ल अमानुल्लाह, व्यासजी, अनिल कुमार, शिव बसंत, सुधीर कुमार, महावीर प्रसाद, इएलएसएन बाला प्रसाद, डॉ. प्रदीप कुमार, डॉ. बी राजेंद्र, मोहम्मद सनुल्लाह, विनोद किस्पोट्टा, नरसिंह उपाध्याय, डॉ. नितिन मदन कुलकर्णी, अजय कुमार सिंह, डॉ (श्रीमती) बीला राजेश, सुनील कुमार वर्णवाल, दीप्रवा लाकरा, प्रशांत कुमार, सुनील कुमार, कृपा नन्द झा, अंजनेयुलु दोड्डे, अमित कुमार, बालकिशुन मुंडा, उमाशंकर सिंह, संदीप सिंह, वरुण रंजन, सुश्री माधवी मिश्रा जैसे अधिकारी धनबाद के उपायुक्त के कार्यालय में आते गए, बैठते गए और जाते गए।
अभी आदित्य रंजन धनबाद के 54 वे उपयुक्त के रूप में सेवारत हैं। धनबाद को जिला बनने के अब विगत 69 वर्षों में 54 उपायुक्तों का आना-जाना सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टियों, नेताओं, कार्मिक विभाग और मुख्यमंत्री कार्यालय के नियत को भी उजागर करता हैं। औसतन 15 माह की सेवा अवधि में एक उपायुक्त क्या कर सकता है यह तो वही बता सकते हैं।
वैसे सरकारी आंकड़ों के मुताबिक झारखण्ड में करीब 23,56,678 वरिष्ठ नागरिक हैं, जिनकी आयु 60 वर्ष से अधिक है। जिसमें धनबाद जिले का योगदान करीब 1,64,511 है। यानी इतने लोग धनबाद जिला के स्थापना काल से यहाँ की राजनीति, चाहे समाहरणालय की राजनीति हो या कोयला खदान की, भारत कोकिंग कॉल लिमिटेड की या फिर कोयला माफियाओं की, चसगंदीद गवाह रहे हैं। धनबाद की आबादी करीब 17 लाख है और इसमें वरिष्ठ नागरिकों की संख्या नग्न है। स्वाभाविक है शहर पर, कोयला क्षेत्रों में, खदानों पर चाहे भूमिगत हो या खुले आसमान के नीचे- नई पीढ़ी के लोग कब्ज़ा जमाना चाहते हैं। कुछ प्रत्यक्ष और कुछ परोक्ष रूप से अपनी-अपनी भागीदारी दे रहे हैं।
लेकिन धनबाद के सभी 1209 गावों में, 54 वार्डों में या बाघमारा, बालिएपुर, धनबाद, गोविंदपुर, निरसा, तोपचांची, टुंडी, पूर्वी टुंडी, इगरकुंड और कलिआसोले ब्लॉकों में रहने वाले लोगों का मानना है कि आज धनबाद या कोयलांचल में वह बात नहीं रही, जो कल थी। पीढ़ियों में बदलाव है।
जयदेव गुप्ता ‘मनोज’ छायाकार और पत्रकार के सहयोग से
























