इसमें इतना शोरगुल क्यों? वित्त मंत्री बजट में ₹214.82 लाख करोड़ कर्ज बताई थी, मोदी जी की ‘विदेश यात्रा खर्च’ उसी खाते में जोड़ दिया जाय

कर्तव्य पथ (नई दिल्ली) : कर्तव्य पथ पर दो मतदाता इस बात पर जिरह कर रहे थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत में अब तक बने और रायसीना पहाड़ी वाले कार्यालय में बैठे सभी प्रधान मंत्रियों में सबसे अधिक विदेश भ्रमण किये हैं और पैसा खर्च किये हैं। दोनों जिरह करने वाले महानुभाव में एक दरभंगा महाराजा के राज के निवासी थे और दूसरा बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार के राज्य जी नहीं, उनके जिला और गाँव के भी थे। वे बख्तियारपुर स्टेशन उतरकर ही घर पहुँचते हैं।

दोनों कहते हैं कि नरेंद्र मोदी भारत के 14वें प्रधानमंत्री के रूप में 26 मई, 2014 को शपथ लिए। इनके साथ 45 अन्य मंत्री ने भी पहली पारी में सरकार चलाने में शरीक हुए। कोई 20 दिन बाद, यानी 14 जून, 2014 को पहली बार यात्रा शुरू किये, गंतव्य देशज ‘गोआ’ था और विगत 1 फरवरी, 2026 को देशज ‘पंजाब’ गए थे। इन दो तारीखों के बीच इस बीच देश-विदेशज यात्रायें कितनी हुई, यह तो आने वाले दिनों में गहन शोध का विषय होगा। खैर, विदेश मंत्रालय ने जो आंकड़े भारत के सदन के पटल पर रखे हैं उसके अनुसार, 2015 से 2025 के बीच पिछले दस वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर कुल ₹762.47 करोड़ खर्च किए गए। सरकार ने यह भी बताया कि इतने व्यापक स्तर पर विदेश यात्राएं करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री हैं।

तभी दरभंगा वाले एक मतदाता कहते हैं: “अरे !! यह कौन सी नई बात हो गयी। पिछले दिनों ही तो भारत सरकार के वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश की और बजट में भारत पर देशज-विदेशज कर्ज का बोझ बताई थी। उनके अनुसार कुल कर्ज़ का अनुमान (2026-27) ₹214.82 लाख करोड़, जिसमें ₹207.7 लाख करोड़ का अंदरूनी कर्ज़ और ₹7.11 लाख करोड़ का बाहरी कर्ज़ शामिल है। क्या होगा? इतना कर्ज है ही, तो मोदीजी की विदेश यात्रा का खर्च भी उसी खाते में जोड़ दिया जाय। इसमें इतना शोरगुल क्यों? कर्जा तो घर-परिवार को चलने के लिए की ही जाती है। मोदी जी का तो पूरा भारतवर्ष अपना घर ही तो है। 

उधर, विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान आवास और आतिथ्य खर्च मेजबान देश वहन करता है। भारत सरकार केवल सुरक्षा व्यवस्था, आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल, मीडिया और तकनीकी आवश्यकताओं पर खर्च करती है। आमतौर पर प्रधानमंत्री के साथ 27 से 72 सदस्य जाते हैं, जबकि पिछले वर्ष पांच देशों के दौरे के दौरान यह संख्या 95 तक पहुंच गई। सरकार का कहना है कि खर्च में वृद्धि का कारण महंगाई, रुपये की कमजोरी, यात्राओं की संख्या और लंबी दूरी की यात्राएं हैं। वर्ष 2015 में विदेश यात्राओं पर ₹91.5 करोड़ खर्च हुए थे, जो 2024 तक बढ़कर ₹109 करोड़ से अधिक हो गए। वर्ष 2025 में सबसे अधिक ₹175.19 करोड़ खर्च हुए, क्योंकि उस वर्ष प्रधानमंत्री ने यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के कई देशों का दौरा किया। 

बख्तियारपुर वाले महाशय दरभंगा वाले की बात को गंभीरता से सुन रहे थे। तभी वे कहते हैं: जब मोदी जी पहली बार 2014 में चुनाव लड़ रहे थे तो भारत के मतदाता को गछे थे कि अगर भारतीय जनता पार्टी को आप सभी मिलकर जिताए, हम प्रधानमंत्री बन गए, आप सभी बना दिए तो आप सभी लोगों के बैंक एकाउंट में 15-15 लाख रुपये, जो विदेश में कालाधन के रूप में विपक्षी पार्टी और पार्टी के लोग, व्यापारी रखे हैं; उसे भारत वापस लेकर आप लोगों को बाँट देंगे। अब तक तो 11-साल ही बिता है, उस बात को।’ 

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‘अब अगर वे 15-15 लाख रुपये भारत के लोगों के, मतदाताओं के बैंक अकाउंट में नहीं जमा कर सके तो प्रति व्यक्ति पर 4.8 लाख का कर्जा तो लिखवा ही सकते हैं न। इस कर्ज में वृद्धि पिछले वर्ष की तुलना में 25.7 फीसदी अधिक है। आखिर विदेश जाने, आने, रहने, वहां के लोगों से बतियाने में खर्चा तो होगा ही न। यह बात विदेश मंत्रालय भी सदन में कहा है। आखिर महंगाई तो इन 11-वर्षों में बढ़ी ही है, यह बात देश के लोग कितना भी चिचियाकर कहेगा, अधिकारी-पदाधिकारी झड़प देंगे; लेकिन विदेश मंत्रालय तो मान ही लिया मंहगाई के कारण खर्च बढ़ा है। 

तभी दरभंगा वाले महाशय कहते हैं: “फकरा समझते हैं ‘लोकोक्ति’, बूढ़-पुरनियां गाँव-घर में कहते हैं। वैसे यह संस्कृत का श्लोक है जो चार्वाक दर्शन से उद्धृत हैं। उनके अनुसार “यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः” यानी ‘जब तक जियो (रिलायंस वाले का जियो नहीं समझियेगा) सुख से जियो, चाहे कर्ज लेकर ही सही, धी, मलाई, रसगुल्ला खाना-पीना पड़े, कोई बात नहीं। क्योंकि मरने के बाद शरीर जलकर राख हो जाता है और जो भी यह कहता है कि आत्मा अमर है, पुनर्जन्म होता है, सब बकवास है, गलत है। 

वैसी स्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी देश को कर्ज में डुबोकर ही सही, विदेश भ्रमण पर खर्चा पर खर्चा किये जा रहे हैं तो क्या गलत है? आखिर 2015 में देश की आबादी 1,328,024,498 थी, 11-वर्ष बाद 2025 में 1,463,865,525 हो गयी है। अब अकेले मोदी जी क्या-क्या संभालेंगे? कभी सोचे, विचार किये?

बहरहाल, संसद के पटल पर प्रस्तुत आंकड़े के अनुसार, 2021 और 2025 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों पर सरकार का लगभग 362 करोड़ रुपये खर्च हुआ। अकेले 2025 में, अमेरिका और फ्रांस की हाई-प्रोफाइल यात्राओं सहित पांच देशों की उनकी यात्राओं पर 67 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हुए। खर्च की जानकारी विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने तृणमूल सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के एक सवाल के जवाब में दे रहे थे । आंकड़ों के अनुसार, 2025 में सबसे महंगी यात्रा फ्रांस की थी, जिस पर 25 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हुए, इसके बाद अमेरिका का नंबर आता है, जहां इस यात्रा पर 16 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हुए।

विगत 13 फरवरी, 2026 को एक लिखित जवाब में, केंद्रीय विदेश मंत्रालय ने बताया कि 2015 और 2025 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी दौरों पर सरकारी खजाने पर 762 करोड़ रुपये खर्च हुए। ये आंकड़े हाल के वर्षों में सालाना खर्च में तेज़ी से बढ़ोतरी दिखाते हैं। जहाँ 2024 में इन दौरों पर खर्च 100 करोड़ रुपये को पार कर गया, वहीं 2025 में यह 175 करोड़ रुपये से ज़्यादा हो गया, यह साल यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और पूर्वी एशिया में लंबी दूरी और कई देशों के टूर सहित बड़े पैमाने पर यात्राओं के लिए जाना जाता है।

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वैसे विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि विदेशी दौरों के दौरान प्रधानमंत्री को मेहमान देश के मेहमान की तरह माना जाता है, जो मेहमाननवाज़ी का काफी खर्च उठाता है। भारत के खर्च में ऑफिशियल डेलीगेशन, सुरक्षा इंतज़ाम, मीडिया दल और लॉजिस्टिक सपोर्ट से जुड़े खर्च शामिल हैं। जवाब के मुताबिक, मई 2014 से प्रधानमंत्री के डेलीगेशन में आम तौर पर काम की जरूरतों के हिसाब से 27 से 72 सदस्य होते थे, और 2025 में पांच देशों के दौरे में 95 अधिकारी शामिल होंगे। महामारी के तुरंत बाद के समय में खर्च काफी कम रहा, लेकिन जैसे-जैसे दो-तरफ़ा बातचीत और मल्टीलेटरल समिट तेज़ हुए, खर्च लगातार बढ़ता गया। जवाब में दिए गए डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि सबसे कम खर्च Covid-19 की रुकावटों के बाद के समय में हुआ, लेकिन जैसे-जैसे इंटरनेशनल ट्रैवल और डिप्लोमैटिक बातचीत बड़े पैमाने पर फिर से शुरू हुई, खर्च फिर से बढ़ गया।

सरकार ने रेफरेंस के लिए पहले के प्रधानमंत्रियों के दौरों का भी जिक्र किया, जिसमें बताया गया कि 2011 में अमेरिका के लिए 10.74 करोड़ रुपये, 2013 में रूस के लिए 9.95 करोड़ रुपये, 2011 में फ्रांस के लिए 8.33 करोड़ रुपये और 2013 में जर्मनी के लिए 6.02 करोड़ रुपये खर्च हुए, जिसमें महंगाई या करेंसी में उतार-चढ़ाव को एडजस्ट नहीं किया गया। विदेश मंत्रालय के जवाब से यह भी पता चला कि मनमोहन सिंह सरकार ने इन यात्राओं पर बहुत कम खर्च किया – 2011 में अमेरिका के लिए 10.74 करोड़ रुपये, 2013 में रूस के लिए 9.95 करोड़ रुपये, 2011 में फ्रांस के लिए 8.33 करोड़ रुपये और 2013 में जर्मनी के लिए 6.02 करोड़ रुपये – लेकिन यह भी कहा कि खर्च में बढ़ोतरी महंगाई, करेंसी के उतार-चढ़ाव, और कवर किए गए देशों की संख्या, यात्रा की दूरी, सुरक्षा ज़रूरतें और डेलीगेशन के आकार जैसे कारणों से हुई। अधिकारियों ने कहा कि खर्च मुख्य रूप से कवर किए गए देशों की संख्या, यात्रा की दूरी, सुरक्षा ज़रूरतें और डेलीगेशन के आकार के कारण अलग-अलग होता है। खैर। 

पिछले सालों की बात करें तो, सांख्यिकी से पता चलता है कि 2024 में रूस और यूक्रेन समेत 16 देशों में 109 करोड़ रुपये खर्च हुए। 2023 में, लगभग Rs 93 करोड़ खर्च हुए, जबकि 2022 और 2021 के लिए यह आंकड़ा Rs 55.82 करोड़ और Rs 36 करोड़ था। 2023 में प्रधानमंत्री के अमेरिका दौरे पर, जिसमें वे उस समय के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप से मिले थे,  22 करोड़ से ज़्यादा खर्च हुए। इन मुलाकातों में अक्सर ट्रेड, इन्वेस्टमेंट और सिक्योरिटी पर बातचीत होती है, जो भारत की ग्रोथ और स्टेबिलिटी के लिए ज़रूरी हैं। 

2021 में बांग्लादेश, इटली और यूनाइटेड किंगडम के दौरे भी खर्च में शामिल थे, अकेले अमेरिका दौरे पर 19 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हुए। 2022 में, खास खर्चों में जर्मनी और जापान के दौरे शामिल थे, जिनमें से हर एक पर क्रम से 9 करोड़ रुपये और 8 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हुए। इतना ही नहीं, सांख्यिकी के अनुसार, इन दौरों से जुड़े पब्लिक एंगेजमेंट, एडवरटाइजिंग और ब्रॉडकास्टिंग कॉस्ट की डिटेल्स भी शामिल थीं। उदाहरण के लिए, 2023 में मिस्र के दौरे पर एडवरटाइजिंग पर 11.90 लाख रुपये खर्च हुए। क्योंकि इंटरनेशनल ट्रैवल मोदी की फॉरेन पॉलिसी का एक अहम हिस्सा बना हुआ है, इसलिए इन ट्रिप्स के फाइनेंशियल पहलू सरकारी और पब्लिक फोरम पर दिलचस्पी और जांच का मुद्दा बने हुए हैं।

ज्ञातव्य हो कि राइट टू इन्फॉर्मेशन कैंपेनर और रिटायर्ड नेवी कमोडोर लोकेश बत्रा ने अपने RTI आवेदन के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पहले के मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं का विस्तार माँगा था। प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय ने सुरक्षा की वजह से विस्तृत विवरण देने से मना कर दिया था। कमोडोर बत्रा ने दावा किया था कि वह पैसे की तंगी से जूझ रही एयरलाइन एयर इंडिया को प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा भुगतान में देरी के पीछे की वजह की अध्ययन करना चाहते हैं।

उन दिनों दिल्ली और देश के अखबार, टीवी पर प्रकाशित समाचारों के के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी पर एयरलाइन का 134 करोड़ रुपये बकाया है, क्योंकि उन्होंने जून और दिसंबर 2015 के बीच कम से कम 10 बार चार्टर्ड फ्लाइट्स लीं। कंपनी ने इन सभी ट्रिप्स के इनवॉइस बनाए हैं, लेकिन जैसा कि आम बात हो गई है, बिल अभी तक क्लियर नहीं हुए हैं। बत्रा प्रश्न उठाये थे कि “यह एक कैश की कमी वाली एयरलाइन है जो पैसा नहीं कमाती। देश के सबसे बड़े ऑफिस की तरफ से इन बिलों को चुकाने में इतनी देरी क्यों हो रही है? ब्याज का खर्च कौन उठाएगा? आम तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय को इनवॉइस मिलने के एक महीने के अंदर इनमें से हर बिल का पेमेंट कर देना चाहिए।”

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एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय खुद मोदी की हर विदेश यात्रा के खर्च का खुलासा करने में सावधान रहा है। आरटीआई आवेदन से छोटे-छोटे जवाब मिलते हैं, और अक्सर “बिल प्रोसेस में है” या “बिल नहीं मिला” जैसे कारण बताए जाते हैं। एयर इंडिया को मिलने वाली रकम के बारे में जानकारी तब सामने आई जब बत्रा ने सीधे एयर इंडिया को एक अलग आरटीईआई फाइल की। पिछले साल के आंकड़े से खर्च बढ़ा है या घटा है, जिसमें पिछले सालों के मुकाबले 80 परसेंट से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2015-16 में प्रधानमंत्री मोदी और उनके कैबिनेट साथियों की यात्राओं पर Rs 567 करोड़ खर्च हुए, जो पिछले साल के मुकाबले काफी ज़्यादा थी। 

प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों का कुल यात्रा खर्च, वित्तीय वर्ष 2015-16 की शुरुआत में बजट में अनुमानित Rs 269 करोड़ से बढ़कर, साल के आखिर में रिवाइज्ड अनुमानों के मुताबिक Rs 567 करोड़ हो गया। इसके अलावा, 2014-15 तक तीन सालों में नौकरशाहों का कुल टूर खर्च Rs 1,500 करोड़ से ज़्यादा था। पिछली सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में ट्रैवल पर Rs 1,500 करोड़ खर्च किए थे। इसकी तुलना में, रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सिर्फ़ तीन सालों (2014-15 और 2016-17 के बीच) में NDA सरकार का ट्रैवल बिल लगभग Rs 1,140 करोड़ है। 2024 में इन विदेश यात्राओं पर सालाना खर्च 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा था, जबकि 2025 में यह 175 करोड़ रुपये को पार कर गया।

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