प्रतिबंध का हटना अनुराग ठाकुर की वापसी का संकेत है, अच्छे प्रशासक हैं, अधिकारियों, खिलाड़ियों से बेहतर सम्बन्घ है

भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने विगत 5 फरवरी को इंडियन क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर को स्वतंत्र कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से ठाकुर का क्रिकेट गवर्नेंस से लगभग एक दशक लंबा प्रतिबंध खत्म हो गया है, जिन्हें 2017 की शुरुआत में लगाया गया था।

नई दिल्ली:  आप माने या नहीं माने, आपकी मर्जी। खेलों की राजनीतिकरण की बात अगर नहीं करें तो विगत कुछ वर्षों से, भारत खेल-कूद के क्षेत्र में ‘रेंगता’ नहीं, बल्कि ‘दौड़ने का अभ्यास कर रह है। कल तक जहाँ भारत में क्रिकेट सिर्फ़ एक खेल नहीं, बल्कि लगभग एक धर्म माना जाता रहा है (आज भी माना जाता है), आज खेल की दुनिया में क्रिकेट के अलावे अन्य खेल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो रहा, चाहे पैरा ओलंपिक ही क्यों न हो । इतना ही नहीं, राष्ट्रीय खेल नीति 2025 खेल और खिलाड़ियों को पंख देगा, यह भी तय है क्योंकि आज से दस वर्ष पहले भारत में जो खेल की स्थिति और परिस्थिति थी, आज बिलकुल अलग हो गयी है।

खेल विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय खेल नीति 2025 एक तरफ जहां भारत को वैश्विक खेल महाशक्ति बनाने की दिशा में एक रोडमैप का कार्य करने के लिए कृतसंकल्प हैं, वहीँ विगत दिनों भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुभवी खिलाड़ियों, खासकर क्रिकेट की दुनिया के, क्रिकेटिंग इंस्टीट्यूशन्स को लीड करने के लिए दी गयी सुझाव और फिर अनुराग ठाकुर पर लगे प्रतिबंध की समाप्ति – सभी खेल की दुनिया के लिए बेहतर सिद्ध होने का शुभ संकेत हैं ।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने विगत 5 फरवरी को इंडियन क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर को स्वतंत्र कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से ठाकुर का क्रिकेट गवर्नेंस से लगभग एक दशक लंबा प्रतिबंध खत्म हो गया है, जिन्हें 2017 की शुरुआत में लगाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय का इस अहम् फैसले से खेल जगत में हलचल मच गई है। कई लोग ख़ुश हैं तो कई के गाल फूल गया हैं । इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में इंडियन क्रिकेट के लीडरशिप लैंडस्केप में संभावित बदलाव हो, क्योंकि ठाकुर अब कानूनी तौर पर बोर्डरूम में लौटने के लायक हैं।

यह फैसला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने 2017 के सीज़ एंड डेसिस्ट ऑर्डर में बदलाव कर सुनाया था। 2017 में ठाकुर को BCCI के साथ किसी भी ऑफिशियल जुड़ाव से बाहर कर दिया था। कानूनी डॉक्ट्रिन ऑफ प्रोपोर्शनलिटी का इस्तेमाल करते हुए, कोर्ट ने कहा कि मूल रोक का मकसद कभी भी उम्रकैद की सजा नहीं था। बेंच ने कहा कि ठाकुर पहले ही खेल के एडमिनिस्ट्रेशन से दूर रहकर नौ साल का लंबा “कूलिंग-ऑफ” पीरियड पूरा कर चुके थे और उन्होंने पहले ही उस बर्ताव के लिए बिना शर्त माफी मांग ली थी जिसकी वजह से उन्हें हटाया गया था। यह कानूनी मामला असल में 2 जनवरी, 2017 को शुरू हुआ था, जब सुप्रीम कोर्ट, जिसकी अगुवाई तब CJI टी.एस. ठाकुर कर रहे थे।

ज्ञातव्य हो कि उन दिनों कोर्ट ने लोढ़ा कमेटी के सुधारों के उनके कथित विरोध पर कड़ा रुख अपनाया था, जिन्हें BCCI में ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी लाने के लिए बनाया गया था। सरकारी दखल के बारे में इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल को गलत फैक्ट्स बताने के आरोपों के बाद, ठाकुर को कंटेम्प्ट और झूठी गवाही की कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इस डेवलपमेंट से एक पुराने एडमिनिस्ट्रेटर के लिए उस जगह पर फिर से एंट्री करने का रास्ता साफ हो गया है जिस पर कभी उनका दबदबा था। उन दिनों ठाकुर को स्पोर्ट्स गवर्नेंस में उभरता हुआ सितारा माना जाता था, जो स्टेट-लेवल लीडरशिप से नेशनल बोर्ड के टॉप तक पहुंचे थे। उनके कार्यकाल में तेज़ी से कमर्शियल बढ़ोतरी और इंफ्रास्ट्रक्चर का मॉडर्नाइज़ेशन हुआ, हालांकि यह आखिरकार लोढ़ा सुधारों पर हाई-प्रोफाइल कानूनी लड़ाई में उलझ गया।

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अनुराग ठाकुर

वरिष्ठ खेल संपादक और विशेषज्ञ श्रीनिवासन कनन कहते हैं : क्रिकेट में स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन (BCCI) में बदलाव देखने को मिल सकता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा  ठाकुर की वापसी का रास्ता बनाने के साथ, वह मिथुन मन्हास की जगह ले सकते हैं, जो प्रेसिडेंट के तौर पर सबसे अच्छे चॉइस नहीं थे। अनुराग ठाकुर एक अनुभवी एडमिनिस्ट्रेटर हैं और हिमाचल प्रदेश के लिए क्रिकेट खेल चुके हैं। अधिकारियों और क्रिकेटरों के साथ उनके रिश्ते बहुत अच्छे हैं।”

अपने पूरे करियर में, अनुराग ठाकुर ने कई ऊंचे पदों पर काम किया है, जिसने भारतीय खेलों में उनके असर को परिभाषित किया है । वह सबसे पहले 2000 में हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (HPCA) के प्रेसिडेंट के तौर पर मशहूर हुए, जहाँ उन्होंने मशहूर धर्मशाला स्टेडियम के कंस्ट्रक्शन को लीड किया। बाद में उन्होंने 2016 में BCCI के सबसे कम उम्र के प्रेसिडेंट बनने से पहले जॉइंट सेक्रेटरी (2011–2015) और सेक्रेटरी (2015–2016) के तौर पर BCCI में काम किया। क्रिकेट से दूर रहने के दौरान भी, उनका एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोफ़ाइल बढ़ता रहा क्योंकि उन्होंने 2021 से 2024 तक केंद्रीय सूचना और प्रसारण और युवा मामले और खेल मंत्री के तौर पर काम किया, और टोक्यो ओलंपिक्स और एशियन गेम्स में भारत के रिकॉर्ड तोड़ने वाले प्रदर्शन की देखरेख की।

ज्ञातव्य हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने ज़ोर देकर सलाह दिया है कि क्रिकेट एसोसिएशन और बोर्ड को ऐसे एडमिनिस्ट्रेटर के बजाय पुराने क्रिकेटरों को लीड करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जो लोग “बल्ला पकड़ना नहीं जानते” उन्हें क्रिकेट बॉडी नहीं चलानी चाहिए। कोर्ट ने पॉलिटिकल असर से मुक्त, एडमिनिस्ट्रेशन को प्रोफेशनल बनाने पर ज़ोर दिया है। न्यायालय क्रिकेट एसोसिएशन लीडरशिप को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि खेल को एक्स-क्रिकेटर्स द्वारा चलाया जाना चाहिए, न कि बाहरी लोगों द्वारा जिन्हें क्रिकेट की बेसिक जानकारी नहीं है। यह टिप्पणी महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव और मेंबरशिप बढ़ाने से जुड़ी कार्यवाही के दौरान आई, जहाँ चीफ जस्टिस ने बॉम्बे हाई कोर्ट का स्टे हटाने से इनकार कर दिया। स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन में क्रेडिबिलिटी और इंटीग्रिटी की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बेहतर गवर्नेंस और क्रिकेट के खेल के लिए असली सम्मान पक्का करने के लिए रिटायर्ड खिलाड़ियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने 22 जनवरी को एक अहम फैसले में कहा कि भारत में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) पब्लिक लॉ की सख्ती से बंधा है। हाल के सालों में, BCCI की साख को बहुत नुकसान हुआ है। इसके मैनेजमेंट में कई बड़े हितों के टकराव के मामले सामने आए हैं। और बोर्ड की देखरेख में होने वाला इंडियन प्रीमियर लीग अपनी मनमानी ज्यादतियों के लिए मशहूर हो गया है। नतीजतन, पिछले एक दशक में जनता का बोर्ड पर जो भी भरोसा था, वह पूरी तरह खत्म हो गया है। आसानी से देखा जाए तो, क्रिकेट के मैनेजमेंट में “इंस्टीट्यूशनल इंटीग्रिटी” वापस लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दखल ज़रूर ज़रूरी लगा।

हालांकि, BCCI के साफ तौर पर खराब एडमिनिस्ट्रेशन के बावजूद, कई लोग कोर्ट के फैसले को, जो बोर्ड में ज़्यादा भारी पब्लिक ज़िम्मेदारी डालने की कोशिश करता है, ज्यूडिशियल रिव्यू की शक्तियों का गलत इस्तेमाल मानते हैं। आलोचक कहते हैं, जैसा कि BCCI ने अपने लिए तर्क दिया, बोर्ड सिर्फ़ एक खास सोसाइटी है जो पूरी तरह से कुछ नियमों से चलती है, जो कुछ खास सदस्यों के बीच एक प्राइवेट कॉन्ट्रैक्ट की तरह हैं। BCCI के अनुसार, यह सिर्फ़ उन सदस्यों के प्रति ज़िम्मेदार है जो इसके नियमों को मानते हैं; और ये नियम भी उनमें दी गई जिम्मेदारी के कारण सीमित हैं।

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वर्ष 1951 में भारत ने पहले एशियाई खेलों की मेज़बानी की, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर उसकी महत्वाकांक्षाओं का संकेत मिला। वर्ष 1954 में अखिल भारतीय खेल परिषद (AICS) का गठन किया गया, जो सरकार को सलाह देने और उत्कृष्ट खिलाड़ियों को समर्थन देने के लिये बनाई गई थी। हालांकि, सीमित वित्तीय सहायता के कारण भारतीय खिलाड़ी प्रायः अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग नहीं ले पाते थे। सीमित सरकारी समर्थन के बावजूद मिल्खा सिंह, गुरबचन सिंह, प्रवीण कुमार सोबती, और कमलजीत संधू जैसे खिलाड़ियों ने एथलेटिक्स में भारत को गौरव दिलाया। वहीं, 1920 से 1980 के दशक तक भारतीय पुरुष हॉकी टीम ओलंपिक में पूरी तरह से हावी रही।

वरिष्ठ खेल संपादक और विशेषज्ञ श्रीनिवासन कनन

श्रीनिवासन कनन का कहना है कि राष्ट्रीय खेल नीति 2025 जिसे खेल की दुनिया में बहुत जोड़ों से लागु किया जा रहा है, ज़मीनी स्तर से लेकर उच्चतम स्तर तक खेलों को सशक्त बनाने पर केंद्रित है। इसमें प्रतिभा की प्रारंभिक पहचान, प्रतिस्पर्द्धी लीगों और बुनियादी ढाँचे का विकास तथा विश्व-स्तरीय प्रशिक्षण और कोचिंग व्यवस्था की स्थापना शामिल है। यह राष्ट्रीय खेल महासंघों की सुशासन प्रणाली को मज़बूत करने, खेल विज्ञान व प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने तथा कोचों, अधिकारियों और सहयोगी स्टाफ को प्रशिक्षित करने का भी लक्ष्य रखती है। इतना ही नहीं, यह नीति खेलों के माध्यम से सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने पर बल देती है — विशेष रूप से हाशिये पर मौजूद समूहों की भागीदारी को प्रोत्साहित करके, पारंपरिक और स्थानीय खेलों को पुनर्जीवित करके, प्रवासी भारतीयों की सहभागिता तथा स्वैच्छिक सेवा को बढ़ावा देकर। खेलों को राष्ट्रीय आंदोलन बनाने के लिये नीति का उद्देश्य अभियानों के माध्यम से जन भागीदारी और फिटनेस संस्कृति को बढ़ावा देना, संस्थानों के लिये फिटनेस सूचकांक शुरू करना तथा पूरे देश में खेल सुविधाओं तक पहुँच में सुधार करना है।”

वर्तमान युवा मामले एवं खेल मंत्रालय की शुरुआत वर्ष 1982 में नई दिल्ली में IX एशियाई खेलों के दौरान खेल विभाग के रूप में हुई थी। वर्ष 1985 में अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष के दौरान इसका नाम बदलकर युवा मामले एवं खेल विभाग कर दिया गया। वर्ष 2000 में इसे एक पूर्ण मंत्रालय का दर्जा दिया गया और बाद में इसे युवा मामले एवं खेल के रूप में दो विभागों में विभाजित कर दिया गया। वर्ष 1984 में भारत ने पहली बार राष्ट्रीय खेल नीति (NSP) लागू की, जिसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे का विकास, जन भागीदारी और प्रशिक्षण स्तर पर उत्कृष्टता को बढ़ावा देना था। इसमें शिक्षा के साथ खेलों के एकीकरण की बात की गई, जिसे बाद में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में औपचारिक रूप दिया गया। वर्ष 1986 में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) की स्थापना नीति के क्रियान्वयन हेतु की गई। वर्ष 1986 से 2000 के बीच खेल एक राज्य सूची का विषय होने के कारण असमान रूप से लागू हुए; बजट सीमित था और सार्वजनिक या निजी भागीदारी बहुत कम थी। लेकिन नई राष्ट्रीय खेल नीति में खेल को अत्यधिक बढ़ावा देने का प्रस्ताव है। 

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वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों और केबल टेलीविज़न के आगमन ने खेलों की दृश्यता तथा लोकप्रियता में भारी वृद्धि की, विशेष रूप से शहरी मध्यम वर्ग के बीच, जिसने अब खेलों को केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं रखा। वर्ष 1997 की ड्राफ्ट खेल नीति में प्रस्ताव दिया गया कि राज्य सामूहिक खेलों पर तथा केंद्र श्रेष्ठ एथलीटों पर ध्यान केंद्रित करे, लेकिन इसे कभी लागू नहीं किया गया। वर्ष 2001 में एक संशोधित राष्ट्रीय खेल नीति लाई गई, जिसका उद्देश्य जन भागीदारी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन में सुधार था। जबकि खेलों को बजटीय सहायता प्राप्त हुई, ओलंपिक पदक सीमित रहे – राठौर (2004), बिंद्रा (2008), विजेंदर तथा मुक्केबाजी में विजेंदर सिंह (2008) और मैरी कॉम (2012) से कांस्य पदक। बाद में, राष्ट्रीय खेल विकास संहिता (2011) लागू की गई, जिसका उद्देश्य खेल महासंघों में सुधार लाना और डोपिंग व प्रशासन से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना था, लेकिन इसे लागू करने में कई बाधाएं आईं।

अनुराग ठाकुर और विराट कोहली

श्रीनिवासन कनन कहते है कि नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन, खासकर एक्सपर्ट्स को कौन लीड करेगा, इस पर सर्वोच्च न्यायालय का ऑब्ज़र्वेशन सही और सटीक है। कनन का कहना है कि ‘इंडियन स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन ने खानदानी राज देखा है, जो अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। अब, पार्लियामेंट द्वारा स्पोर्ट्स लॉ लागू होने के बाद, यह सही है कि अच्छा गवर्नेंस होगा। इंडिया 2036 ओलंपिक होस्ट करना चाहता है। इसकी शुरुआत के तौर पर, अहमदाबाद 20230 सेंटेनियल कॉमनवेल्थ गेम्स होस्ट करेगा। क्रिकेट में स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन (BCCI) में बदलाव देखने को मिल सकता है। न्यायालय द्वारा अनुराग ठाकुर की वापसी का रास्ता बनाने के साथ, वह मिथुन मन्हास की जगह ले सकते हैं, जो प्रेसिडेंट के तौर पर सबसे अच्छे चॉइस नहीं थे। अनुराग ठाकुर एक अनुभवी एडमिनिस्ट्रेटर हैं और हिमाचल प्रदेश के लिए क्रिकेट खेल चुके हैं। अधिकारियों और क्रिकेटरों के साथ उनके रिश्ते बहुत अच्छे हैं।”

कनन का कहना है कि “महत्वपूर्ण इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के मामले में, इस बॉडी को लेजेंड पीटी उषा हेड कर रही हैं। उषा एथलेटिक्स की क्वीन थीं और अब अच्छे कंट्रोल के साथ नेशनल ओलंपिक कमेटी (IOA) को लीड कर रही हैं और उन्होंने ग्लोबल स्पोर्ट्स के दिग्गजों, खासकर इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी के साथ अच्छे रिश्ते बनाए हैं। इसके अलावा, ऊषा IOA में गगन नारंग और मैरी कॉम जैसे कई पुराने एथलीट भी हैं, जो अलग-अलग रोल में हैं। अगर इंडियन हॉकी को देखें, तो प्रेसिडेंट के तौर पर दिलीप टिर्की एक अच्छा ऑप्शन हैं। उन्होंने सबसे ऊंचे लेवल पर खेला है और इंडिया के लिए एक मिसाल कायम की है।”

कनन यह भी स्वीकारते हैं कि “कई नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन हैं जहां पुराने एथलीटों का शामिल होना फायदेमंद माना जाता है। यह उन प्रेसिडेंट और सेक्रेटरी से कहीं बेहतर है जिन्हें स्पोर्ट्स के बारे में कुछ नहीं पता और जो सिर्फ विदेश यात्राएं करना चाहते हैं। बेशक, एक बहुत बुरा उदाहरण इंडियन फुटबॉल भी है। कल्याण चौबे, जो पहले गोलकीपर और BJP के मेंबर थे, ने ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के प्रेसिडेंट के तौर पर अच्छा काम नहीं किया है। भारत में यह खेल, ISL समेत, मुश्किल में है।”

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