​विशेष कहानी: ‘यह अच्छा है या बुरा, तुम्हें कुछ समय बाद समझ आएगा, हो सकता है तब मैं ज़िंदा न रहूँ, तुम रह सकते हो’ : बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय 

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म स्थान कांटालपारा, नैहाटी (24 परगना, पश्चिम बंगाल)

कांटालपारा, नैहाटी (24 परगना, पश्चिम बंगाल) / कोलकाता / नई दिल्ली : आज 2026 साल का 23 जनवरी है। आज से 152 साल पहले अविभाजित भारत में लार्ड नार्थब्रुक पांचवें वायसराय के रूप में अंग्रेजी हुकूमत का प्रतिनिधि कर रहे थे। उन्हें भी शायद इस बात का ज्ञात नहीं था कि उनके कार्यकाल में 28 पंक्तियों में रचित गीत आने वाले दिनों में भारत का राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया जायेगा।

उस तारीख के 76 वर्ष बाद 24 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान सभा काँटालपाड़ा, नैहाटी, 24 परगना, बंगाल के निवासी बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय लिखित ‘वंदे मातरम’ गीत को आधिकारिक तौर पर भारत का राष्ट्रीय गीत अपनाया गया। साथ ही, ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया। कल, यानी 24 जनवरी, 2026 को ‘राष्ट्रगान’ तथा ‘राष्ट्रगीत’ 76 वर्ष का हो जायेगा। लेकिन आज भी आधी आबादी से अधिक लोग ‘राष्ट्रगान’ और ‘राष्ट्रगीत’ में फर्क नहीं समझते। साथ ही, अपवाद छोड़कर, एक विशाल प्रतिशत लोग ‘स्वतंत्रता दिवस’ और ‘गणतंत्र दिवस’ में ‘झंडोत्तोलन’ कैसे होता है, नहीं जानते हैं। विश्वास नहीं हो तो आजमा कर, पूछकर देखिये।

वैसे बिना किसी राजनीति और निहित स्वार्थ सिद्धि के यह एक गहन शोध का विषय है ‘बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय आखिर बंगदर्शन के एक कर्मचारी राम चंद्र बंद्योपाध्याय को अपने लिखित गीत को उस दिन बंगदर्शन में प्रकाशित करने पर रोक क्यों दिया और यह क्यों कहा कि ‘तुम अभी यह नहीं समझ सकते कि यह अच्छा है या बुरा, तुम्हें कुछ समय बाद समझ आएगा, हो सकता है तब मैं ज़िंदा न रहूँ, तुम रह सकते हो।’ क्या बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को इस बात का एहसास था कि उनके द्वारा रचित गीत एक दिन भारत के निर्माण में, देश की स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों की ताकत बनेगा और वह ताकत स्वतंत्र भारत का एक सम्मानित गीत बन जायेगा।

तस्वीर: संजय शर्मा

वैसे ‘वन्दे मातरम’ और ‘जन गण मन’ के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रविंद्रनाथ टैगोर को लेकर (जहाँ तक प्राथमिकता का सवाल है) आज भी ‘विवाद’ है और आज भी 19वीं, 20 वीं शताब्दी के उपन्यासकार, कवि, लेखक, निबंधकार, गीतकार, संगीतकार ‘प्रसन्न’ नहीं तो ‘दुखी’ अवश्य हैं। कई लोगों का कहना है कि वर्तमान सरकार द्वारा जन गण मन और उसके रचयिता का सम्मान नहीं हो पाया जिसका वह हकदार था। उनका यह भी आक्षेप है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर सत्ता के गलियारे में लोग राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। लेकिन कुछ वर्गों का यह भी कहना है कि ‘चाहे जो भी हो, मुद्दत बात पूरा राष्ट्र राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान की अहमियत को समझ रहा है।  

संविधान सभा में ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ दोनों को राष्ट्रीय प्रतीकों के रूप में अपनाने पर पूर्ण सहमति थी और इस मुद्दे पर कोई बहस नहीं हुई। 24 जनवरी 1950 को, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण, ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा दिया जाना चाहिए और समान रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “एक मामला है जिस पर चर्चा होनी बाकी है, वह है राष्‍ट्र गान का सवाल। एक समय सोचा गया था कि यह मामला सदन के सामने लाया जाए और सदन एक प्रस्ताव पास करके इस पर फैसला ले। लेकिन ऐसा महसूस हुआ कि प्रस्ताव के जरिए औपचारिक फैसला लेने के बजाय, बेहतर होगा कि मैं राष्‍ट्र गान के बारे में एक बयान दूं। इसलिए मैं यह बयान दे रहा हूं।’

‘जन गण मन नाम के शब्दों और संगीत से बनी रचना भारत का राष्ट्रगान है, जिसमें सरकार ज़रूरत पड़ने पर शब्दों में बदलाव कर सकती है; और वंदे मातरम गीत, जिसने भारत के स्वाधीनता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा और उसका दर्जा भी उसके बराबर होगा। (तालियां)। मुझे आशा है कि इससे सदस्य संतुष्ट होंगे।” उनके बयान को अपनाया गया और रवींद्रनाथ टैगोर के जन-गण-मन को स्‍वतंत्र भारत का राष्ट्रगान और बंकिम के वंदे मातरम को जन-गण-मन के बराबर दर्जा देते हुए राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया।’

कांटालपारा, नैहाटी (24 परगना, पश्चिम बंगाल)

बहरहाल, ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्‍सव देश भर के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर सामूहिक गायन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मिलिट्री बैंड प्रदर्शन के माध्यम से मना रहा है। इस उत्सव का उद्देश्य राष्ट्रीय गौरव और एकता को बढ़ावा देना है। इन समारोहों के एक अंग के रूप में भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के 31 संगीतकारों से युक्त बैंड ने 21 जनवरी 2026 को नई दिल्ली के राजीव चौक स्थित एम्फीथिएटर में प्रदर्शन किया। 45 मिनट की इस प्रस्तुति में ब्रास, बांसुरी, स्ट्रिंग और इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों से ग्यारह मनमोहक धुनें प्रस्तुत की गईं।

संगीत सदियों से भारतीय संस्कृति का एक अनमोल रत्न रहा है। यह भारत की समृद्ध सैन्य विरासत का भी अभिन्न अंग है, जो एकता को सुदृढ़ करता है और वीरता की प्रेरणा देता है। 1944 में अपनी स्थापना के बाद से भारतीय वायु सेना बैंड, भारतीय और पश्चिमी संगीत की विविधतापूर्ण प्रस्तुतियों के साथ, देश की सैन्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। भारतीय वायु सेना बैंड का उद्देश्य अपने मनमोहक प्रदर्शनों के माध्यम से देशभक्ति की भावना को प्रेरित करना और एकता का प्रसार करना है।

विगत साल, 7 नवंबर 2025 को वंदे मातरम का 150वीं वर्षगांठ मनाया गया था । यह रचना, अमर गीत के रूप में स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र निर्माताओं की अनगिनत पीढ़ियों को प्रेरित करती रही है और यह भारत की राष्ट्रीय पहचान और सामूहिक भावना का चिरस्थायी प्रतीक है। कहते हैं कि ‘वंदे मातरम’ पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित हुई थी । बाद में, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे अपने अमर उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुई ।

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कांटालपारा, नैहाटी (24 परगना, पश्चिम बंगाल)

वंदे मातरम महज एक गीत नहीं बल्कि एक ऐसा मार्ग है, जो साहित्य, राष्ट्रवाद और भारत के स्वाधीनता संग्राम को जोड़ता है। इस स्तुति गान का एक कविता से राष्ट्रीय गीत बनने तक का सफ़र, औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत की सामूहिक जागृति का उदाहरण है। उपन्‍यास ‘आनंद मठ’ का मूल कथानक संन्यासियों के एक समूह के इर्द-गिर्द घूमता है, जिन्हें संतान कहा जाता है, जिसका आशय बच्चे होता है, जो अपनी मातृभूमि के लिए अपनी ज़िंदगी समर्पित कर देते हैं। वे मातृभूमि को देवी माँ के रूप में पूजते हैं; उनकी भक्ति सिर्फ़ अपनी जन्मभूमि के लिए है। यह “राष्‍ट्रभक्ति के धर्म” का प्रतीक था, जो आनंद मठ का मुख्य विषय था। अपने मंदिर में, उन्होंने मातृभूमि को दर्शाने वाली माँ की तीन मूर्तियाँ रखीं: माँ जो अपनी भव्य महिमा में महान और गौरवशाली; माँ जो अभी दुखी और धूल में पड़ी है; माँ जो भविष्य में अपनी पुरानी महिमा में पुन: प्रतिष्ठित होगी। श्री अरबिंदो के शब्दों में, “उनकी कल्पना की माँ के 14 करोड़ हाथों में भिक्षा पात्र नहीं, बल्कि तेज़ धार वाली तलवार थीं।”

वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी (1838–1894), 19वीं सदी के बंगाल की सबसे जानी-मानी हस्तियों में से एक थे। 19वीं सदी के दौरान बंगाल के बौद्धिक और साहित्यिक इतिहास में उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। एक जाने-माने उपन्यासकार, कवि और निबंधकार के तौर पर उनके योगदान ने आधुनिक बंगाली गद्य के विकास और उभरते भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। उनके विशेष कार्यों में आनंदमठ (1882), दुर्गेश नंदिनी (1865), कपालकुंडला (1866), और देवी चौधरानी (1884) शामिल हैं, जो अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे  गुलाम समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चिंताओं को दिखाते हैं । वंदे मातरम की रचना को राष्ट्रवादी चिंतन में मील का पत्थर माना जाता है, जो मातृभूमि के प्रति भक्ति और आध्यात्मिक आदर्शवाद के मेल का प्रतीक है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी लेखनी के ज़रिए, न केवल बंगाली साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारत के शुरुआती राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए बुनियादी वैचारिक सिद्धांत भी रखे। वंदे मातरम में उन्होंने देश को मातृभूमि को माँ के रूप में देखने का नज़रिया दिया।

कांटालपारा, नैहाटी (24 परगना, पश्चिम बंगाल)

अक्टूबर 1905 में, उत्‍तरी कलकत्ता में मातृभूमि को एक मिशन और धार्मिक जुनून के तौर पर बढ़ावा देने के लिए एक ‘बंदे मातरम संप्रदाय की स्थापना की गई थी। इस संप्रदाय के सदस्य हर रविवार को “वंदे मातरम” गाते हुए प्रभात फेरियाँ निकालते थे और मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्‍वैच्छिक दान भी लेते थे। इस संप्रदाय की प्रभात फेरियों  में कभी-कभी रवींद्रनाथ टैगोर भी शामिल होते थे। 20 मई 1906 को, बारीसाल (जो अब बांग्लादेश में है) में एक अभूतपूर्व वंदे मातरम जुलूस निकाला गया,जिसमें दस हज़ार से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। हिंदू और मुसलमान दोनों ही शहर की मुख्य सड़कों पर वंदे मातरम के झंडे लेकर मार्च कर रहे थे।

अगस्त 1906 में, बिपिन चंद्र पाल के संपादन में ‘बंदे मातरम’ नाम का एक अंग्रेजी दैनिक  शुरू हुआ, जिसमें बाद में श्री अरबिंदो संयुक्त संपादक के रूप में शामिल हुए। अपने तेज और प्रभावशाली संपादकीय लेखों  के जरिए, यह अखबार भारत को जगाने का एक सशक्त माध्यम बन गया, जिसने स्वावलंबन, एकता और राजनीतिक चेतना का संदेश पूरे भारत के लोगों तक फैलाया। निडरता से राष्ट्रवाद का प्रचार करते हुए, युवा भारतीयों को औपनिवेशिक गुलामी से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करते हुए, ‘बंदे मातरम’ दैनिक  राष्ट्रवादी चिंतन को जाहिर करने और लोगों की राय जुटाने का एक बड़ा मंच बन गया।

गाने और नारे दोनों के तौर पर ‘वंदे मातरम’ के बढ़ते प्रभाव से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने इसके प्रसार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए। नए बने पूर्वी बंगाल प्रांत की सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में वंदे मातरम गाने या बोलने पर रोक लगाने वाले परिपत्र जारी किए। शैक्षणिक संस्‍थानों को मान्यता रद्द करने की चेतावनी दी गई, और राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा लेने वाले छात्रों को सरकारी नौकरी से निकालने की धमकी दी गई। कहते हैं कि नवंबर 1905 में, बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों में से हर एक पर 5-5 रुपये का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि वे वंदे मातरम गाने के दोषी थे। रंगपुर में, बँटवारे का विरोध करने वाले जाने-माने नेताओं को स्पेशल कांस्टेबल के तौर पर काम करने और वंदे मातरम गाने से रोकने का निर्देश दिया गया। नवंबर 1906 में, धुलिया (महाराष्ट्र) में हुई एक विशाल सभा में वंदे मातरम के नारे लगाए गए। 1908 में, बेलगाम (कर्नाटक) में, जिस दिन लोकमान्य तिलक को बर्मा के मांडले भेजा जा रहा था, वंदे मातरम गाने के खिलाफ एक मौखिक आदेश के बावजूद ऐसा करने के लिए पुलिस ने कई लड़कों को पीटा और कई लोगों को गिरफ्तार किया।

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“वंदे मातरम” भारत के स्वाधीनता संग्राम का प्रतीक बन गया, जो स्वशासन की सामूहिक इच्छा तथा लोगों और उनकी मातृभूमि के बीच भावनात्मक जुड़ाव को समाहित करता है। यह गीत शुरू में स्वदेशी और विभाजन विरोधी आंदोलनों के दौरान लोकप्रिय हुआ और जल्द ही क्षेत्रीय सीमाओं को पार करके राष्ट्रीय जागरण का गान बन गया। बंगाल की सड़कों से लेकर बॉम्बे के दिल और पंजाब के मैदानों तक, “वंदे मातरम” की गूंज औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में सुनाई देने लगी। इसे गाने पर रोक लगाने की ब्रिटिश कोशिशों ने इसके देशभक्ति से जुड़े महत्व को और बढ़ा दिया, और इसे एक ऐसी नैतिक शक्ति में बदल दिया जिसने जाति, धर्म और भाषा की परवाह किए बिना लोगों को एकजुट किया। नेताओं, छात्रों और क्रांतिकारियों ने इसके छंदों से प्रेरणा ली, और इसे राजनीतिक सभाओं, प्रदर्शनों और जेल जाने से पहले गाया जाने लगा। इस रचना ने न केवल विरोध के कामों को प्रेरित किया, बल्कि आंदोलन में सांस्कृतिक गौरव और आध्यात्मिक जोश भी भरा, जिससे भारत के स्वाधीनता संग्राम की राह के लिए भावनात्मक आधार तैयार हुआ। उन्नीसवीं सदी के आखिर और बीसवीं सदी की शुरुआत में “वंदे मातरम”  बढ़ते भारतीय राष्ट्रवाद का नारा बन गया। 

अप्रैल 1906 में, नए बने पूर्वी बंगाल प्रांत के बारीसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन के दौरान, ब्रिटिश हुक्मरानों  ने वंदे मातरम के सार्वजनिक नारे लगाने पर रोक लगा दी और आखिरकार सम्मेलन पर ही रोक लगा दी। आदेश की अवहेलना करते हुए, प्रतिनिधियों ने नारा लगाना जारी रखा और उन्हें पुलिस के भारी दमन का सामना करना पड़ा। मई 1907 में, लाहौर में, युवा प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने औपनिवेशिक आदेशों की अवहेलना करते हुए जुलूस निकाला और रावलपिंडी में स्वदेशी नेताओं की गिरफ्तारी की निंदा करने के लिए वंदे मातरम का नारा लगाया। इस प्रदर्शन को पुलिस के क्रूर दमन का सामना करना पड़ा, फिर भी युवाओं द्वारा निडरता से नारे लगाना देश भर में फैल रही प्रतिरोध की बढ़ती भावना को दर्शाता है।

27 फरवरी 1908 को, तूतीकोरिन (तमिलनाडु) में कोरल मिल्स के लगभग हज़ार मज़दूर स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी के साथ एकजुटता दिखाते हुए और अधिकारियों की दमनकारी कार्रवाइयों के खिलाफ हड़ताल पर चले गए। वे देर रात तक सड़कों पर मार्च करते रहे, विरोध और देशभक्ति के प्रतीक के तौर पर वंदे मातरम के नारे लगाते रहे। जून 1908 में, लोकमान्य तिलक के मुकदमे की सुनवाई के दौरान हज़ारों लोग बॉम्बे पुलिस कोर्ट के बाहर जमा हुए और वंदे मातरम का गान करते हुए एकजुटता प्रदर्शित की। बाद में, 21 जून 1914 को, तिलक के रिहा होने पर पुणे में उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ, और उनके स्थान ग्रहण करने के काफी देर बाद तक भीड़ वंदे मातरम के नारे लगाती रही।

पार्थो प्रतिन चट्टोपाध्याय, बंकिम भवन गवेषणा केंद्र के सहायक शोधकर्ता

बहरहाल,  कल कांटालपारा, नैहाटी (24 परगना, पश्चिम बंगाल के एक शोधकर्ता से बात कर रहे थे।पार्थो प्रतिन चट्टोपाध्याय, बंकिम भवन गवेषणा केंद्र के सहायक शोधकर्ता हैं। पार्थो साहब वंदे मातरम के रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय पर गहरा शोध कर रहे हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से अगर देखें तो पार्थो साहब को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के बारे में जितनी जानकारी है, उनके सम्पूर्ण वंश को जिस तरह कंठस्त किये हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाले समय में भारत सरकार के साथ साथ पश्चिम बंगाल सरकार के लिए ये एक स्तम्भ के रूप में अवतरित हों, जहाँ तक ऐतिहासिक शोध का सवाल है।  

पार्थो प्रतिन का कहना है कि ‘बंकिम चंद्र के छोटे भाई पूर्ण चंद्र चट्टोपाध्याय और दीनबंधु मित्रा के बेटे ललित चंद्र मित्रा के लेखों से पता चलता है कि बंकिम चंद्र ने ‘आनंदमठ’ में छपने से बहुत पहले ही ‘वंदे मातरम’ गीत लिखा गया था।’
उनका कहना है: ‘उन दोनों ने बताया है कि एक दिन, जब बंकिम चंद्र ‘बंगदर्शन’ के संपादक थे, तो ‘बंगदर्शन पत्रिका’ के एक कर्मचारी राम चंद्र बंद्योपाध्याय आए और कहा कि लगभग एक पेज का मैटर कम है। इसलिए आपको कुछ लिखना होगा। ‘वंदे मातरम’ की पांडुलिपि बंकिम चंद्र के सामने मेज पर रखी थी। जब राम चंद्र ने उस पर नज़र डाली, तो उन्होंने कहा, ‘अगर देर हुई तो काम रुक जाएगा, यह गाना लिखा हुआ है, यह बुरा नहीं है, तो आप मुझे यह क्यों नहीं दे देते?’ संपादक बंकिम चंद्र नाराज़ हो गए और कागज़ को मेज की दराज में रख दिया और कहा, ‘तुम अभी यह नहीं समझ सकते कि यह अच्छा है या बुरा, तुम्हें कुछ समय बाद समझ आएगा, हो सकता है तब मैं ज़िंदा न रहूँ, तुम रह सकते हो।’ यानी, यह साफ़ है कि बंकिम चंद्र ने ‘वंदे मातरम’ गीत तब रचा था जब वे ‘बंगदर्शन’ के संपादक थे।’

बहुत विश्वास के साथ परतों कहते हैं कि ‘हम सभी जानते हैं कि भावनात्मक समानता के मामले में, ‘वंदे मातरम’ गीत को ‘कमलाकान्तेर दफ्तर’ में शामिल ‘अमर दुर्गात्सव’ का लयबद्ध रूप कहा जाता है। ‘अमर दुर्गात्सव’ 1281 के कार्तिक अंक में ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ था। बंगाल लाइब्रेरी कैटलॉग के अनुसार, इस अंक के प्रकाशन की तारीख 12 अक्टूबर 1874 है। उस साल सप्तमी 18 अक्टूबर को थी। पूर्ण चंद्र चट्टोपाध्याय के लेखों से पता चलता है कि उस साल महाष्टमी की रात, 19 अक्टूबर को, बंकिम चंद्र अपने घर के पूजा कक्ष में रेनेटी घराना के गायक बलहारी दास द्वारा गाए गए गीत ‘एसो एसो बंधु एसो, आधो आंचरे बसो’ सुनकर भावुक हो गए थे। और उस गीत के बारे में, बंकिम चंद्र ने उसी साल ‘बंगदर्शन’ के चैत्र अंक में ‘एकटी गीत’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। वहाँ उन्होंने यह भी लिखा था ‘मेरी देशलक्ष्मी कहाँ चली गई?’ नतीजतन, यह साफ़ है कि उस समय बंकिम चंद्र मातृभूमि के बारे में सोच रहे थे। तो, स्वाभाविक रूप से, यह बात मन में आती है कि वंदे मातरम जैसा महान मंत्र उस रात ब्रह्म मुहूर्त में एक भावनात्मक स्थिति में रचा गया था?’

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उनका कहना है कि ‘लेकिन अनुमानों से कुछ भी साबित नहीं किया जा सकता। हमें सबूत चाहिए, हमें तर्क चाहिए। ‘अमर दुर्गात्सव’ कार्तिक 1281 के अंक में प्रकाशित हुआ था। अगर हम अगले अंक को देखें, यानी अग्रहायण 1281, तो हम देखेंगे कि उनका आखिरी लेख ईशान चंद्र बोस के चित्तविनोद काव्य की आलोचना है। जिसके लिए संपादक बंकिम चंद्र ने 29 पंक्तियाँ लीं। और वंदे मातरम गीत में 28 पंक्तियाँ हैं। इसलिए, अगर संपादक बंकिम चंद्र उस दिन राम चंद्र बंद्योपाध्याय की बातों से सहमत होते, तो उस एक पन्ने की सामग्री 28 पंक्तियों के वंदे मातरम गीत से भरी जा सकती थी। 25 सितंबर 1874 को, बंकिम चंद्र ने मालदा में काम शुरू किया। लेकिन इस बात का सबूत कि वह दुर्गा पूजा के दौरान कांतलपारा में घर पर थे, पूर्ण चंद्र के लेख हैं।’

पार्थो प्रतिन के अनुसार, ‘उस साल, कोजागरी लक्ष्मी पूजा 24 अक्टूबर, रविवार को थी। तो, पूजा की छुट्टियों के बाद, बंकिम चंद्र शायद 25 अक्टूबर को मालदा लौटे। यह जानकारी साफ़ तौर पर दिखाती है कि बंकिम चंद्र ने महामंत्र वंदे मातरम 19 और 24 अक्टूबर 1874 के बीच कभी रचा था। आसपास की जानकारी के अनुसार, तारीख शायद महाष्टमी की रात, 19 अक्टूबर 1874 है।’

बहरहाल, विद्वानों और विदुषियों का कहना है कि जैसे ही भारत राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं सालगिरह मना रहा है, राजनीतिक पार्टियां क्रेडिट लेने की होड़ में लगी हैं, यहाँ तक कि इसके कवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को बंगाल के दूसरे साहित्यिक दिग्गज रवींद्रनाथ टैगोर के मुकाबले खड़ा कर दिया है। लेकिन पश्चिम बंगाल के कांतलपारा में ‘बैठकखाना’ में, जहाँ चट्टोपाध्याय ने यह गीत लिखा था, एक अलग तरह की सैद्धांतिक लड़ाई चल रही है । एक रिपोर्ट के अनुसार, कोलकाता में 5, प्रताप चटर्जी स्ट्रीट पर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का घर, जिसे पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने कब्ज़े में ले लिया था, उपेक्षा की हालत में है।

​तस्वीर: संजय शर्मा

6 कॉलेज स्क्वायर यानी बंकिम चटर्जी स्ट्रीट पर ऐतिहासिक जगह, जहाँ शुरू में डेविड हेयर का घर था और बाद में एक बंगाली साप्ताहिक ‘संजीवनी’ का ऑफिस; एंटी-सर्कुलर सोसायटी, एक विरोधी संगठन और ग्रंथ-जगत, एक पब्लिशर और साथ ही संजीवनी के एडिटर कृष्ण कुमार मित्र का घर हुआ, जहाँ उनके भतीजे अरबिंदो मई, 1909 से फरवरी, 1910 तक रहे।  2015 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने उस घर को हेरिटेज टैग देने की प्रक्रिया शुरू कर दी। यह भी कहा जाता है कि हावड़ा म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने इसके लिए 5 करोड़ रुपये मंजूर किये। यह कहा जाता है कि दस साल पहले, घर के मालिक प्रणब मुखर्जी ने घर एक डेवलपर को बेच दिया था। तभी, स्थानीय लोगों और हावड़ा सिटिजन्स फोरम ने इसका कड़ा विरोध किया और प्रॉपर्टी को तोड़ने का काम रोक दिया। हेरिटेज कमीशन के अधिकारी कहे थे कि “हालांकि घर में ज़्यादा आर्किटेक्चरल महत्व नहीं है, लेकिन यह एक महान व्यक्ति से जुड़ा हुआ है। इसे किसी भी कीमत पर टूटने से बचाना होगा।’

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

एक जानकारी के अनुसार, चट्टोपाध्याय के हावड़ा में रहने (1881 और 1886 के बीच) को आधिकारिक तौर पर मान्यता देने और याद करने की कोशिशें जारी हैं। लेकिन 218 पंचानांनतला रोड (हावड़ा स्टेशन से लगभग 2 किमी दूर) और उसी इलाके में 212 पंचाननतला रोड पर उनके घरों को लेकर कन्फ्यूजन बना हुआ है। प्रणब मुखर्जी, जो 218 पंचाननतला रोड की पहली मंजिल पर रहते, जिन्हें कोई अंदाज़ा नहीं था कि यह भवन बंकिम चंद्र से जुड़ी हुई है। यह कहा जाता है कि 1964 में, उन्होंने इसे जलाधर मित्रा से खरीदा था, जिन्होंने इसे 1936 में खरीदा था। स्थानीय लोगों ने 218 पंचाननतला रोड पर घर के सामने 17 कट्ठा ज़मीन को पार्क में बदल दिया है और इसका नाम साहित्यकार के नाम पर रखा है।

हावड़ा सिटिज़न्स फोरम का मानना है कि 1881 में हावड़ा में एक एडमिनिस्ट्रेटर के तौर पर अपने पहले कार्यकाल के दौरान, बंकिम चंद्र कोलकाता से अपने काम की जगह तक यात्रा करते थे। बाद में वह 218 पंचाननतला रोड पर किराए के घर में रहने लगे, और 1883 में हावड़ा में अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान वहीं रहे। यह कार्यकाल उनके तीनों कार्यकालों में सबसे लंबा था। तीसरी बार, बंकिम 10 जुलाई, 1886 को ओडिशा के भद्रक से ट्रांसफर होने के बाद फर्स्ट क्लास डिप्टी मजिस्ट्रेट और डिप्टी कलेक्टर के रूप में शामिल हुए। वह हर दिन हावड़ा जाते थे लेकिन पंचाननतला में किराए का घर खाली नहीं किया था।

क्रमशः…..

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