79 वर्ष की आज़ादी, 34 करोड़ से 147 करोड़ की आबादी, 13% से 79% शैक्षिक-दर और सरस्वती पूजा यानी ‘हाते खोड़ी’ अनुष्ठान

माँ सरस्वती - तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से

कोलकाता / पटना / नई दिल्ली : विगत दिनों दिल्ली मेट्रो के द्वारका-नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी मार्ग पर चलने वाली ब्लू लाइन मेट्रो से यमुना लिंक के रास्ते बोटानिकल गार्डन जा रहा था। यमुना लिंक से अक्षरधाम के रास्ते जब आगे बढ़ा, गाजियाबाद से दिल्ली की ओर आती सड़क के किनारे खानाबदोशों द्वारा बनायीं गयी मूर्तियों पर आखें टिक गयी। रंग-बिरंगी जीवंत मूर्तियां। सड़क के किनारे अपने जीवन का अहम् हिस्सा जीने वाले ये खानाबदोश हिन्दू पर्व-त्योहारों के अनुसार देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाकर अपनी जिंदगी की अगली साँसों को सुरक्षित रहते हैं। प्रत्येक दो-दो मिनट के अंतराल पर हम मयूर विहार, अशोक नगर और नोएडा के विभिन्न सेक्टरों को पार करते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। शरीर से तो दिल्ली मेट्रो में था लेकिन मन से कभी कोलकाता के कुम्हारटोली तो कभी पटना के बंगाली अखाड़ा में आ-जा रहा था। दो-तीन दिन बाद सरस्वती पूजा का दिवस आने वाला था। 

पहले चलते हैं कलकत्ता। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध जब आनंद बाजार पत्रिका समूह के दी टेलीग्राफ / संडे पत्रिका के लिए कार्य करना शुरू किया था तो कलकत्ता शहर जैसे रोजमर्रे की जिंदगी में आ गया था। इंटरनेट का जमाना नहीं था और समाचार प्रेषित करने के दो ही साधन थे। हस्तलिखित समाचार या फ़ीचर आम तौर पर स्वीकार नहीं होता था। टंकित कॉपी ही दिया जाता था। या फिर दूरदरस्त होने पर टेलीफोन / ट्रंक काल से कहानियां लिखा दिया जाता था या फिर स्थानीय डाकघरों से टेलीप्रिंटर के माध्यम से कहानियां तत्काल भेजा जाता था। इसके अलावे कोई दूसरा रास्ता नहीं था। उन दिनों मैं दक्षिण बिहार के धनबाद में पदस्थापित था, लेकिन तत्कालीन सम्पादकों – एम जे अकबर और शेखर भाटिया (दी टेलीग्राफ) और वीर सांघवी, राजीव बागची, उमेश आनंद (संडे) – के आदेश से कहीं भी, कभी भी विचरण कर कहानियों को करने, प्रेषित करने की छूट थी। भ्रमण करने का खर्च का वहन दफ्तर कर लिया करता था। उन दिनों मेरे पास यासिका कैमरा था और उसके साथ 42-75 एमएम का लेंस था। यह कमरा धनबाद के बैंक मोड़ स्थित एक मित्र दिए थे। 

तत्कालीन दक्षिण बिहार का शायद ही कोई हिस्सा – रांची, जमशेदपुर, बोकारो, देवघर, दुमका, गुमला, पलामू, गिरिडीह, गोड्डा, पाकुर, खूंटी, रामगढ, घनबाद, कोडरमा, चाईबासा, पुरुलिया, वर्धमान, बीरभूम, आसनसोल, दुर्गापुर आदि –   बचा था जहाँ इस अदना सा संवाददाता का कदम नहीं पड़ा था जहाँ की कहानियां टेलीग्राफ और सन्डे पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुआ था चाहे लुप्त प्राय बिरहोर जनजाति हो या धधकते भूमिगत कोयला माइंस, या तत्कालीन कोयला सरगनों का लहू लहुआन वर्चस्व चाहे तत्कालीन प्रशासनों का उन माफियाओं और पटना से दिल्ली तक विधान सभा और संसद में बैठे कुर्सी तोड़ते राजनेताओं का मिलीभगत, सभी कभी न कभी अख़बारों के, पत्रिका के पन्नों पर अवतरित जरूर हुए थे। काफी लिखने और नाम के साथ समाचार, फीचर प्रकाशित होने के कारण बिहार-बंगाल सीमा क्षेत्रों के बहुत पाठक पहचानते थे, कुछ नाम से, कुछ चेहरे से। जब कभी भी उनके मोहल्ले में, जिलों में जाते थे, बहुत सम्मान के साथ, आदर-सत्कार के साथ बैठते थे, बात करते थे, खाना भी खिलाते थे – बिना किसी राजनीति के, बिना यह सोचे कि कल अख़बार में नाम प्रकाशित होगा। कई लोगों से सम्बन्ध आज भी बरकरार है। 

माँ सरस्वती – तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से

इसी क्रम में कई मर्तबा कलकत्ता के कुम्हार टोली (कुमार टोली) भी गया था। यहाँ मूर्तियां बनती है। आज का भूगोल अवश्य बदल गया होगा, लेकिन उन दिनों हावड़ा स्टेशन पर उतरकर स्टेशन के बाहर हाबड़ा ब्रिज से आती सड़क अपने बाएं हाथ मुड़कर जब स्टेशन की दीवार तक पहुँचती थी, तो एक रास्ता दाहिना स्टेशन की ओर जाती थी और दूसरा सामने से निकलती शिवपुर होते आगे निकल जाती थी। उन दिनों नया पुल का निर्माण नहीं हुआ था। शिवपुर की ओर जाने वाली सड़क पार कर हुगली नदी के तट पर बांस-फुस आदि से बने दर्जनों होटलों में से एक होटल, जो इस रास्ते हाबड़ा स्टेशन प्रवेश के ठीक सामने था, माँछ – भात – दही और दो सफ़ेद रोसगुल्ला खाकर फेरी के रास्ते निकल जाता था। 

फेरी पर पैर रखते ही जैसे अपने जन्म के दो साल बाद (1961) भारत के सिनेमाघरों में टंगी फिल्म ‘काबुलीवाला’ का गीत जिसके गीतकार थे गुलजार, संगीतकार सलिल चौधरी और गायक हेमंत कुमार थे – गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे, लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे – गुनगुनाते कभी बाग़ बाजार तो कभी शोवा बाज़ार अहीर टोला फेरी घाट पर उतरकर पैदल कुमार टोली पहुँच जाते थे। वैसे यहाँ आने के लिए लोकल ट्रेन भी थी, लेकिन फेरी से चलने का मजा ही कुछ और होता था। यह अलग बात थी कि उन दिनों पानी में तैरना नहीं आता था, लेकिन जीवन में तैरना शुरू कर दिए थे तभी तो अपने जन्म स्थान दरभंगा के एक गाँव से पटना के रास्ते कलकत्ता में पत्रकारिता सिखने के लिए तैर रहे थे। कभी कभी बस से भी यात्रा कर लेते थे। 

तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से

हकीकत में यह ‘कुम्हार टोली’ है, लेकिन बोल चाल की भाषा में यह ‘कुमार टोली’ हो गया। ऐतिहासिक दृष्टि से 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी ने फोर्ट विलियम की एक नई बस्ती बनाने का फैसला किया। इसकी आबादी सुतानाती की ओर चली गई, जबकि जोरासांको और उसके आस-पास के इलाके अमीर लोगों के इलाके बन गया  कंपनी के सीधे आदेशों के तहत शहर के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग कारीगरों के लिए बांटा गया था। जगहों के नाम काम से जुड़े रखे गए, जैसे शराब बेचने वालों के लिए सूरीपारा, तेल बेचने वालों के लिए कोल्लोटोला, बढ़ई के लिए छुत्तरपारा, गाय चराने वालों के लिए अहीरीटोला और कुम्हारों के लिए कुमारटोली। 

जब शहर का विकास हुआ और बढ़ा, तो बहुत से लोग इन इलाकों में आकर बस गए, जिससे ये इलाके सिर्फ अपने नामों तक ही सीमित रह गया। हालांकि, उत्तरी कोलकाता के कुमारटोली इलाके के कारीगर बड़ी संख्या में बसे रहे। ये कुम्हार जो नदी के किनारे बर्तन बनाते थे और बाद में उन्हें बाज़ार में बेचते थे, जल्द ही देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने लगे, जिनकी पूजा शहर के आस-पास की हवेलियों और महलों में बहुत लोकप्रिय हो गई। उत्तरी कोलकाता में वैसे यह एक छोटी सी जगह है जहाँ कुम्हारों का बाहुल्य है। लेकिन यह इलाका विश्व पटल पर प्रसिद्ध है। यह जगह पूरे साल पश्चिम बंगाल में अलग-अलग त्योहारों के लिए मिट्टी से भारतीय देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने में अपनी महारत के लिए मशहूर है। वे अपनी मूर्तियां दूसरे देशों और समुदायों को भी निर्यात करते हैं। मूर्ति बेचने वालों की मशहूर सड़क का नाम बनमाली सरकार स्ट्रीट है।

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तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से

कुमारटोली के बहुत सारे महिला, पुरुष अपने जीवन को इन्हीं मूर्तियों को बनाने में समर्पित कर दिए । दुर्गा पूजा के कई माह पहले से देवी दुर्गा की, सरस्वती पूजा से कई माह पहले से देवी सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां को जीवंत रूप देते आ रहे ते हैं। ईश्वर भी इन्हें जीवित रहने का मार्ग बताते आ रहे हैं।इन मूर्तियों को बनाने की प्रक्रिया बहुत कठिन और जटिल है। यह इस इलाके की गलियों में होती है। कभी कलकत्ता आएं तो बनमाली स्ट्रीट का चक्कर अवश्य लगाएं। कारीगरों को मिटी से मूर्ति और फिर उसका जीवंत स्वरुप देखकर आपका जीवन सफल हो जायेगा। कुमारटुली के काफी पास स्थित बाग बाजार घाट और शारदा देवी घाट का इस्तेमाल दुर्गा पूजा के त्योहार के मौसम में मूर्ति विसर्जन समारोहों के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। कुमारटुली श्यामपुकुर, बरताला, जोरासांको, जोराबगान और हुगली से घिरा हुआ है। 

इंदिरापुरम (गाजियाबाद) स्थित शिप्रा रिवेरा में आयोजित सरस्वती पूजा के अवसर पर प्रसन्नचित महिलाएं।  कहते हैं इस वर्ष महिलाओं की भागीदारी विशेष थी और सबों ने महिला शक्तियों का बेहतर प्रदर्शन की 

बीते दिन सरस्वती पूजा मनाया गया। पंचमी हिंदू पंचांग के अनुसार वसंत ऋतु के आरंभ का प्रतीक है। हिंदू पंचम के अनुसार यह माघ मास के पांचवें दिन मनाई जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, विद्या, संगीत और कला की देवी सरस्वती का जन्म इसी दिन हुआ था। इसलिए, उनसे ज्ञान और कला की प्राप्ति के लिए लोग बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं। दिल्ली शहर में भले दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए यह तारीख महत्वपूर्ण नहीं हो, जितना महत्वपूर्ण उनके लिए दिवाली, लेकिन राष्ट्र की राजधानी में कोलकाता, ओड़िसा या बिहार से प्रवासित लोगों के लिए (अपवाद छोड़कर) सरस्वती पूजा उनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह एकजुटता और सद्भाव को दर्शाता है। उनके लिए सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक उत्सव भी है। बसंत पंचमी के दिन पूरा बुहार, बंगाल ओड़िसा पिले रंग की आभा में डूब जाता है और हर गली में पंडालों की रौनक होती है। यह दिन युवाओं कलाओं और विद्या के प्रति एक अलग ही माहौल बनता है। कहते हैं पीला रंग शांति, समृद्धि और ऊर्जा का प्रतीक है। यह सभी को आशावाद से भर देता है। 

अब आते हैं पटना। आज के ही दिन कोई 55-साल पहले, पहली बार पूर्णिया (गढ़बनैली) से पटना आया था बाबूजी के पास। बाबूजी श्री गोपाल दत्त झा (श्री गोपाल जी) उन दिनों पटना कालेज के सामने बुक सेन्टर किताब की दूकान को छोड़कर श्री तारा बाबू (श्री तारानन्द झा) के पास नोवेल्टी एण्ड कंपनी, प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता दूकान में अपनी नौकरी की शुरुआत किये थे। उन दिनों नोवेल्टी एक मंजिला मकान था। नोवेल्टी के दाहिने तरफ त्रिवेदी स्टूडियो और बाएं सरदारजी की एक बिजली की छोटी सी दूकान कृष्णा स्टोर्स थी। इसी नाम से अब यह दूकान फ़्रेज़र रोड स्थित चांदनी चौक मार्केट (तत्कालीन आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्र के दफ्तर के बगल में) ‌है। कृष्णा स्टोर्स के ठीक बगल में नेशनल बुक डिपो था (जो अब पटना कालेज के सामने है), एक फल वाले की दूकान थी और उसके बाद रीगल होटल।

माँ​ और महिलाएं

रीगल के बाद एक किताब की दूकान पुस्तक महल थी, पुस्तक महल के बगल में नालन्दा के रस्तोगी का पुस्तक जगत था ‌(जो अब बीएन कॉलेज के सामने है)। फिर एक दवाई की दूकान। इन दो दुकानों के बीच बीरबल पान वाला था। इस दूकान से चार कदम पर एक रास्ता नीचे लुढ़कती थी, खजान्ची रोड और खजान्ची रोड के ठीक सामने अशोक राज पथ पर दाहिने तरफ था ऐतिहासिक खुदाबख्श पुस्तकालय। नोवेल्टी के दाहिने तरफ तत्कालीन पटना के एक सम्भ्रान्त फोटो स्टूडियो था – त्रिवेदी स्टूडियो। इस स्टूडियो में पटना के सम्भ्रान्त, सुन्दर लोग ही फोटो खिंचवाते थे। फिर थी उषा सिलाई मशीन का प्रशिक्षण केंद्र। इस प्रशिक्षण केंद्र के दाहिने दीवार से लगी कोई चार-फिट की एक छोटी सी किताब की दूकान थी, जो इस भवन के पीछे बेगम साहिबा के आवासीय कालोनी में रहने वाले कोई सज्जन चलाते थे। उनकी एक आँख खराब थी। सिलाई मशीन और इस किताब की दूकान के सामने फुटपाथ पर साईकिल बनाने वाले एक मिस्त्री देवकी जी कार्य करते थे। इस किताब की दूकान से कोई दस फिट दाहिने हरिहर पान वाले की एक दूकान थी और उन्हीं के दूकान से लगी थी एक चश्मे की दूकान । मुझे इस दो-सौ कदम तक ही चहलकदमी करने की इजाजत थी। इससे अधिक नहीं। मैं कोई पांच-छः साल का था। 

हमारे नोवेल्टी भवन में बाएँ तरफ लोहे का खींचने वाला गेट था, जो एक गली-नुमा रास्ते से 25-कदम चलने के बाद छोटा सा आँगन में निकलता था। आँगन के दाहिने कोने पर एक सीढ़ी थी। आँगन से सड़क की ओर दूकान में प्रवेश का रास्ता था। आम तौर पर आँगन में किताबों के बण्डल, रस्सी, सुतली, गत्ता, क़ैंची, चाकू, सुराही,  रखा होता था। ग्राहकों का किताब तक्षण इस आँगन में बांधा जाता था। यह आँगन और बरामदा हमारे पिता-रूपी ब्रह्माण्ड की दुनिया थी। यहीं रहते थे मेरे बाबूजी, इस दूकान के अंदर ही वे अपना आशियाना बना रखे थे। 

माँ और कलाकार – तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से 

पूर्णिया से बाद मगध की राजधानी, जहाँ चन्द्रगुप्त मौर्य राजा हुआ करते थे, चाणक्य जैसे उनके गुरु थे – मैं इस राजधानी में पहली बार अपना सर पिता-रूपी ब्रह्माण्ड के नीचे तारा बाबू की दुनिया में अपना सर छुपाया। तारा बाबू को हम सभी “मालिक” कहते थे। बहुत कड़क-मिजाज के थे। अनुशासन उनके जीवन में बहुत महत्व रखता था। समय के बहुत पाबंद थे। मेहनत उनके जीवन का मूल-मंत्र था, गायत्री मन्त्र जैसा। मुझे दूकान के अलावे मछुआ टोली स्थित उनके घर पर आने-जाने की पूरी स्वतंत्रता थी। घर पर हमारे उम्र के उनके पोते-पोतियाँ मुझे अपने घर का हिस्सा ही समझते थे। मुझे आज तक ऐसी कोई घटना याद नहीं है जिसमें हमें उन लोगों की बातों से, व्यवहारों से कोई कष्ट हुआ हो, आत्मा दुखी हुआ हो। उस दिन मैं नहीं जानता था कि नोवेल्टी की भूमि पर ही त्रिनेत्रधारी महादेव मेरे जीवन की रेखाएं खींचने का केन्द्र बिंदु बनाएंगे । लेकिन आज छः दशक बाद भी उन तमाम बातों का याद रखना इस बात का गवाह है कि महादेव को मैं कभी धोखा नहीं दिया। 

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इस दूकान और दूकान की पुस्तकों की छाया में पटना ही नहीं, अविभाजित बिहार के लाखों-करोड़ों छात्र-छात्राएं विद्यार्थी-अवस्था  से वयस्क हुए, और फिर वृद्ध भी ।  जिस तरह नए किताब के सफ़ेद पन्ने समय और उम्र के साथ अपना रंग बदलते, एक गजब की खुसबू छोड़ते सफ़ेद से सीपिया रंग का हो जाता है, जो इस बात का गवाह होता है की उसने अपने रंग यूँ ही नहीं बदले, बल्कि लोगों को जीने का सबक सीखाते बड़ा हुआ है – पटना के अशोक राज पथ पर स्थित नोवेल्टी एण्ड कम्पनी दूकान की सीढ़ियों पर बैठकर न जाने कितने लोग महज मनुष्य से इन्शान बने और इतिहास में अपना नाम हस्ताक्षरित किये। इस एक-मंजिले मकान में कुछ वर्ष दूकान चलायी गयी। 1966 जनवरी से पुराने एक मंजिला मकान तोड़ना प्रारम्भ कर 12 महीने के भीतर तारा भवन बन गया था ।

माँ​ और महिलाएं -तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से

उन दिनों पटना अशोक राज पथ के बाएं तरफ पटना विश्वविद्यालय के कालेजों, जैसे पटना कालेज, साइन्स कालेज, मेडिकल कॉलेज का पिछले बॉउंड्री गंगा के किनारे समाप्त होता था। सम्पूर्ण इलाका खुला-खुला था। अशोक राज पथ से दाहिने तरफ कोई आधे-किलोमीटर और कम की दूरी पर एक-एक सड़क दाहिने नीचे निकलती थी, अशोक राज पथ के सामानांतर बारी पथ से मिलती थी। इसी बारी पथ (अब नया टोला) पर जहाँ खजांची रोड बारी पथ से मिलती थी, बाएं हाथ पर नोवेल्टी स्टेशनर्स दूकान थी। यह दूकान, आज की काजीपुर आवासीय मोहल्ला में प्रवेश लेने वाली गली के ठीक सामने स्थित नालंदा ब्लॉक सेन्टर थी। आज की पीढ़ी शायद खजांची रोड का भारत के राजनीतिक मानचित्र पर क्या महत्व है, नहीं जानते होंगे।  इसी खजांची रोड के बीचो-बीच (आधी दूरी अशोक राज पथ और आधी दूरी बरी पथ) दाहिने तरफ एक दो मंजिला मकान पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री श्री विधान चंद्र रॉय का जन्मस्थान है। 

विधान चंद्र रॉय का जन्म 1 जुलाई, 1882 को पिता प्रकाश चंद्र रॉय और माता अघोर कामिनी देवी के घर में हुआ था। आज भी वह स्थान बिधान चंद्र रॉय की माता “अघोर” को समर्पित है और वहां एक बच्चों का विद्यालय है – अधोर शिशु विद्या मंदिर।  विधान चंद्र रॉय की प्रारम्भिक शिक्षा पटना के अशोक राज पथ पर स्थित, या यूँ कहें कि आज के नोवेल्टी एंड कंपनी दूकान से कोई पांच सौ गज की दूरी पर स्थित टी के घोष अकादमी और पटना कॉलेजिएट स्कूल में 1897 तक हुआ था। बाद में, उन्होंने आईए प्रेसिडेंसी कालेज कलकत्ता से और बी ए (गणित में सम्मान के साथ) पटना कालेज से किये।   श्री रॉय जनबरी 1948 से जुलाई 1962 तक कोई साढ़े बारह वर्ष तक पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री रहे। 

बहरहाल, इस नोवेल्टी में तीन तल्लों में पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहते थे। उन छत्रों में पटना चिकित्सा महाविद्यालय के छात्र भी थे। जहाँ तक सरस्वती पूजा का सवाल है, पटना विश्व्वियालय का सरस्वती पूजा बहुत नाम होता था और बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता था। विश्वविद्यालय के सभी महाविद्यालयों – पटना विमेंस कॉलेज, बी एन कॉलेज, मगध महिला कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, पटना कॉलेज, साइंस कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, न्यू हॉस्टल, जीडीएस हॉस्टल – छात्रावास में पूजा अर्चना बहुत धूमधाम से होता था। सत्तर के दशक में कई वर्षों तक मेडिकल कॉलेज में सरस्वती पूजा अर्चना करने का दायित्व बाबूजी पर होता था। वजह था नोवेल्टी में मेडिकल कॉलेज के छात्रों का रहना। मैं उसी भवन में लिफ्ट चलाया करता था। बाबूजी का मेडिकल कालेज के छात्र-छात्राएं बहुत सम्मान करते थे। सरस्वती पूजा के दिन दर्जनों छात्र-छात्राएं बाबूजी के लिए धोती, कुर्ता, छाता, ओढ़ना, अन्न, द्वव्य, अन्न आदि निजी तौर पर भी देते थे। 

देवी और कलाकार – तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से 

उस साल मेडिकल कालेज में अंतिम वर्ष के छात्र एक सरदार जी थे। देखने में बेहद सुन्दर और पढ़ने में अति कुशाग्र। कभी भी उनका परीक्षा परिणाम शिथिल नहीं हुआ था। कालेज के सभी छात्र छात्राएं, चाहे सहपाठी हों या कनिष्ठ, शिक्षक हों या शिक्षकेत्तर कर्मचारी, सभी के लिए वे सम्मानित थे। उन्हें अपने की वर्ग की एक छात्र से, जो पढ़ने में बहुत अब्बल थी, विशेष लगाव था । वर्ग के छात्र-छात्राओं के अलावे परिसर के सभी व्यक्ति उनका भी बहुत सम्मान करत्ते थे। सरदार जी का मन उस महिला सहपाठी के प्रति सकारात्मक था।  मन ही मन बहुत प्रेम करते थे उसे। अभी पूजा के लिए विधि-विधान चल रहा था। बाबूजी सरस्वती की मूर्ति के सामने पूजा अर्चना के लिए सामग्रियां एकत्रित कर रहे थे। अंतिम वर्ष के छात्र होने के कारण सभी यह जानते थे कि अगले वर्ष की पूजा में कौन कहाँ रहेंगे यह मालूम नहीं। सरदार जी नोवेल्टी अक्सर आते थे। 

पूजा के सामने कई मन प्रसाद, वस्त्र, मिठाइयां, बुँदिया आदि रखे थे। सम्पूर्ण वातावरण में पुष्प-धुप-दीप का सुगंध उपस्थित था। बाबूजी पूजा अर्चना में मग्न थे। जैसे ही बाबूजी अपने हाथ में आरती के लिए थाली सजाये, दीप प्रज्वलित किये, बगल से एक अंतिम वर्ष की छात्रा कहती है: “अन्नू बोल दो। पंडित जी बैठे हैं।” अचानक सभी की निगाहें ‘अन्नू जी’ की और उठ गयी और वे सामने सरदजी को देखकर जमीन की ओर देखने लगी। सरदार जी समझ गए। वे भी चाहते थे कुछ ऐसा ही माहौल बने जिससे मन की बात मुख होठों पर आ जाये। वे आगे बढ़े और बाबूजी का हाथ पकड़कर कहते हैं: “गोपाल बाबू, मेरे पिताजी तो अभी यहाँ उपस्थित नहीं हैं, लेकिन आपको, माँ सरस्वती को और यहाँ उपस्थित सभी मित्र मंडलियों को साक्षी मानकर मैं अनु जी से विवाह करने का प्रस्ताव रखता हूँ यदि वह स्वीकार करे। सम्पूर्ण वातावरण प्रेममय हो गया। अन्नू जी आगे आयीं और देवी सरस्वती की पैरों से अबीर उठाकर सरदार जी के गालों पर लगा दी।” आज भी वह दृश्य याद आता है तो मन प्रसन्नचित हो जाता है। 

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माँ, देवी और पूजा-अर्चना – तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से

आम तौर पर पटना में सरस्वती पूजा के सात दिन पहले से स्थान की साफ़ सफाई, चंदा एकत्रीकरण, प्रसाद आदि का विवरण, आगंतुकों की संख्या पर विचार विमर्श प्रारम्भ हो जाता था। शहर के जितने विद्यालय, महाविद्यालय, छात्रावास होते थे, पूजनोत्सव का माहौल बन जाता था। न्यूनतम दो दिन का अवकाश तो होता ही था। सरस्वती पूजा के दिन कोई भी पढ़ने-लिखने का नाम नहीं लेता था। इस दिवस को समयांतराल माता-पिता अपने-अपने पुत्र-पुत्रियों के लिए ‘वर’ अथवा  ‘वधु’ देखने के लिए भी करने लगे थे ।

जब 1975 में पटना से प्रकाशित आर्यावर्त और इंडियन नेशन पत्र-समूह में नौकरी शुरू किया, महज माध्यमिक कक्षा उत्तीर्ण का प्रमाण पत्र और आगे पढ़ने की भूख लिए पत्रकारिता की पहली सीढ़ी पर पैर रखा तो पटना शहर में सरस्वती की प्रतिमा को बनाने वालों के जगहों पर आना-जाना शुरू हुआ, कुछ कहानी के लिए तो कभी तस्वीरों के लिए। उस ज़माने में मैं ‘टेनिया’ के रूप में अपने वरिष्ठ संवाददाता और छायाकार की सवारी के पीछे बैठ जाया करता था। पटना सिटी के अलावे गाँधी मैदान के दक्षिणी कोने पर जहाँ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भवन के सामने और गाँधी मैदान थाना के बीच खाली स्थान में कलाकार मूर्तियां बनाते थे। यही कालिदास रंगालय भी हुआ करता था। इस स्थान के अलावे मूर्तियां इनकम टैक्स भवन से बाएं हाथ जाती सड़क, जहाँ परिवहन भवन होता था, के बाएं हाथ खुले मैदान में भी मूर्तियां बनायीं जाती थी। इसके अलावे बांस घाट से आगे राजपुर के पास, जहाँ से बाएं हाथ बोरिंग केनाल रोड के लिए लुढ़कते थे, खाली स्थानों पर मूर्तियां बनती थी। 

तस्वीर पंकज प्रसून के सौजन्य से

उस ज़माने के सर्चलाइट के संवाददाता लव कुमार मिश्र, जो बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार हुए कहते हैं: “उस जमाने में मैं गर्दनी बाग़ में रहता था। हमारे इलाके के ठाकुरबाड़ी में भी सरस्वती पूजा बहुत धूमधाम से होता था, लेकिन हम निश्चित तौर पर साईकिल उठाकर पहले अपने कालेज (पटना कालेज) पहुँचते थे, जहाँ कॉमन रूम के तरफ इसका आयोजन होता था। यहाँ से पटना कालेज परिसर के सभी छात्रावासों के रास्ते जीडीएस महिला छात्रावास, साइंस कालेज होते लॉ कालेज तक पहुँचते थे। इस बीच जहाँ जहाँ प्रसाद मिलता था साइकिल के बास्केट में रखते कहते थे। लॉ कालेज से मेरा सीधा गंतव्य मगध महिला कॉलेज होता था। उन दिनों मैं सर्चलाइट में काम करना शुरू कर दिया था, काफी इज्जत होती थी। मगध महिला कालेज में पूजा-अर्चा का भार डॉ.वीणा कर्ण पर होती थी, इसलिए वे कभी भी लड्डू, बुंदिया देने में कोताही नहीं करती थी। बैर, केला या अन्य फल-फूल को पहले ही हटा देती थी। आज समय के साथ-साथ सोच में भी परिवर्तन हो गया है।”

आज के वरिष्ठ पत्रकार और उन दिनों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र पटना सिटी मंगल तालाब के ज्ञान वर्धन मिश्र कहते हैं: “उन दिनों चुकी निजी क्षेत्र के विद्यालयों का कुकुरमुत्तों जैसा विकास नहीं हुआ था, सभी सरकारी विद्यालय थे, सरस्वती पूजा बहुत ही धूम हम से मनाया जाता था। माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मेरे पिताजी (श्री रामजी मिश्र मनोहर’) मुझे पटना सिटी के गुरु गोविंद सिंह कालेज में नामांकन करा दिए। हमारे कॉलेज में सरस्वती की मूर्ति नहीं बैठती थी। उसी वर्ष छात्र संघ का चुनाव हुआ और हम विद्यार्थी परिषद के तरफ से मंत्री के रूप में चुने गए। फिर उस वर्ष आयोजित सरस्वती पूजा में पहली बार मूर्ति की स्थापना हुयी। उस समय कॉलेज के प्राचार्य थे सरदार बलवंत सिंह, जो बाद में मेरी इस हरकत के लिए कार्रवाई करने पर आमादा थे। वे काफी डराए, धमकाए। किसी की हिम्मत नहीं थी की उस कॉलेज में मूर्ति पूजन करे। खैर उस वर्ष बहुत ही धूमधाम से पूजा संपन्न हुआ। इंटर पास होते ही मैं वहां से पटना कालेज की ओर भागा। 

तस्वीर पंकज प्रसून के सौजन्य से

बहरहाल, आज देश के विद्यालयों में, खासकर निजी क्षेत्र के विद्यालयों में सरस्वती पूजा अर्चना करने की परंपरा समाप्त ही नहीं, लुप्त हो गयी है। अपवाद छोड़कर छुट्टियां भी नहीं होती। छात्र-छात्राएं भले विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करते हों, लेकिन विद्या की देवी की पूजा अर्चना नहीं होती है। न शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुख अथवा स्थानीय प्रशासन ही इस दिशा में कोई पहल करती। हाँ, इस वर्ष दिल्ली के साथ साथ उत्तर प्रदेश, बिहार  में सरस्वती पूजा के दिन अवकाश की घोषणा की गयी – वह भी रिस्ट्रिक्टेड। इतना ही नहीं, आगामी 15 अगस्त को हम अपनी आजादी जा 79 वर्षगांठ मनाएंगे और इन 79 वर्षों में देश की आबादी में जितना इजाफा हुआ, शैक्षणिक स्तर में हम पीछे रह गए, आप माने अथवा नहीं। सं १९४७ में देश की आवादी करीब 34 करोड़ थी और आज 79 वर्षों में 147 करोड़ का अनुमान लगा रहे हैं। आंकड़ा यह बताता है कि आज़ादी के वक्त देश में शैक्षिक दर तक़रीबन 13 फीसदी थी। आज 79 वर्ष के बाद व्यावहारिक रूप से 79 फीसदी भजि नहीं पार किये हैं। सैद्धान्ति रूप से आंकड़ा जो भी लिखा जाय। 

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