माधवेश्वर ​शमशान में ​भी दरभंगा राज की महिलाओं को​ वह सम्मान नहीं मिला​, जिसका वे भी हकदार थीं​ (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-2)

दरभंगा की तीनों दिवंगत महारानियाँ और बड़े दिवंगत राजकुमार जीवेश्वर सिंह की दिवंगत पत्नी

दरभंगा : दरभंगा राज के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी महारानी काम सुंदरी देवी की मृत्यु के बाद उनकी चिता स्थल पर मंदिर बनाने की चर्चा उत्कर्ष पर है। दरभंगा लाल किला (रामबाग किला) से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है माधवेश्वर शमशान स्थल। इसी स्थान पर दरभंगा राज परिवार के लोगों के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया है। महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह के अनुज राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह चिता भूमि सामने दिख रहा है। एक विशालकाय वृक्ष और उसके चतुर्दिक चबूतरा। बरगद के इस वृक्ष के चारो तरफ दरभंगा की महिलाओं का वट सावित्री पूजन का गवाह – लाल रंग का घागा – दिख रहा है। चबूतरे के ऊपर स्थानीय लोग, जो इस चबूतरे का इस्तेमान ‘बैठकी’ के लिए भी करते हैं, का जूता भी अपने स्वामी के पैर की प्रतीक्षा में है। इस स्थान का देखरेख करने वाले हाथ में फूलझाड़ू लिए वृक्ष से अलग हुए सूखे पत्तों की सफाई कर रहे हैं।

इसके अलावे इस चबूतरे का निर्माणकर्ताओं का नाम एक शिलालेख पर भी अंकित है ताकि इस शमशान में आने वाले भ्रमणकारी लोग देख सकें। पार्थिव शरीर तो पढ़ नहीं सकता। काले रंग के पत्थर पर राजा बहादुर के दो पोतों का नाम – राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह – अंकित है। दरभंगा के महाराजा अथवा उनके अनुज राजा बहादुर अपनी मृत्यु के बाद दरभंगा के लोगों के लिए सामाजिक कार्य हेतु जितनी सम्पतियाँ छोड़ गए, वे कभी नहीं सोचे होंगे कि जहाँ उनके मृत्यु के बाद चिता सजेगी, समयांतराल उस स्थान पर कुछ मिट्टी और कुछ ईंटों से चबूतरा बनाने के बाद उनका पोता अपना नाम गुदवायेगा।

दरभंगा ही नहीं देश के किसी कोने में रहने वाला कोई भी व्यक्ति अपने पूर्वज की चिता स्थल पर अपना नाम नहीं गुदवायेगा। अपने जीवन में अब तक ऐसा दृश्य नहीं देखा था। मन दुःखी हो गया। ईश्वर न करें किसी जीवित व्यक्ति का नाम शमशान भूमि में अंकित दिखे। इस दृश्य को देखकर सोचने को विवश हो गया कि कभी दरभंगा राज में विद्वान सिपा सलाहकार होते थे जो ‘मानवीय मूल्यों को बरकरार रखने का सलाह देते थे। आज चाटुकार, चापलूसों का साम्राज्य हो गया है।अच्छे,बुरे,शुभ,अशुभ में फ़र्क़ नहीं दिखता।

वैसे राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह के पिता, यानी दिवंगत राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र दिवंगत कुमार शुभेश्वर सिंह अथवा उनकी दिवंगत पत्नी का अपने दिवंगत पूर्वजों के आँगन में कहीं नामोनिशान नहीं दिखा। राजा बहादुर के अन्य दो पुत्रों – जीवेश्वर सिंह और यज्ञेश्वर सिंह का चिता स्थल भी सुना-सुना दिखा। इतना ही नहीं, इस स्थान को शमशान भूमि में अंकित होने के बाद दरभंगा राज के अनेकानेक महिलाओं – रानियों, बहुओं – की भी मृत्यु हुई है, उन्हें भी इसी प्रांगण में अग्नि को सुपुर्द किया गया था। महाराजा रमेश्वर सिंह की बड़ी पत्नी ‘राजमाता’ के चिता स्थल पर ‘अन्नपूर्णा मंदिर’ भले स्थापित हो; श्यामा काली और अन्नपूर्णा मंदिर के बीच उनकी दूसरी पत्नी के चिता स्थल पर आज तक मंदिर कर कार्य पूरा नहीं हो सका। यह भी दुःख की ही बात है।

कहते हैं महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी को काशी लाभ हुआ। श्यामा मंदिर के सामने ‘तारा माय’ को समर्पित करते ‘तारा मंदिर’ का निर्माण कर और उसमें एक छोटा सा शिवलिंग स्थापित कर उसे स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। इसे अपवाद ही माना जा सकता है। अन्नपूर्णा मंदिर​ छोटी राजमाता की चिता स्थान पर है। इस अपवाद छोड़कर दरभंगा राज की किसी भी महिला, रानी को, पुत्र बधुओं को माधवेश्वर शमशान प्रांगण में भले अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ हो, उन्हें अब तक वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वे सभी हकदार थीं, जहाँ तक मंदिर निर्माण का सवाल है। विद्वान और विदुषी दरभंगा राज के बारे में जो भी शब्द का विन्यास करें, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि दरभंगा राज में न जीते जी और ना ही मरने के बाद, महिलाओं को जो शिक्षा और सम्मान मिलना चाहिए था, जिसके वे हकदार थीं, नहीं मिला।

वैसे राज परिसर से महिला सशक्तिकरण की बात करते लोग थकते नहीं। यथार्थ तो यह है कि इस शमशान भूमि में भी ‘पुरुषों’ का बाहुल्य आज भी कायम है। पुरुषों में भी जो ‘अर्थ से संपन्न’ थे, या महाराजा के ‘मन के लोग’ थे। राजा माधव सिंह, जिनका देहावसान दरभंगा में नहीं हुआ था, उनके द्वारा निर्मित ‘माधवेश्वर महादेव मंदिर’ प्रांगण में उनका अस्थि कलश अवस्थित है। इतना ही नहीं, लोगों का कहना है कि, परंपरा के अनुसार, इस प्रांगण में जितने भी पार्थिव शरीर लाये जाते हैं, सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से उस पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द करने के पूर्व यहाँ रखना आवश्यक है।

‘अन्नपूर्णा’ और ‘श्याम तारा’ मंदिर के अलावे दरभंगा राज की किसी भी महिलाओं को इस परिसर में वह सम्मान नहीं मिला, जिसका एक महारानी अथवा उनकी पुत्र वधु होने के कारण उनके पार्थिव शरीर को भी वह सम्मान मिलता। यह भी उतना ही सत्य है कि राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह और उनकी पत्नी का देहांत दरभंगा में नहीं हुआ, लेकिन उनके सम्मानार्थ उनके अस्थि कलश को इस धार्मिक भूमि में अर्पित किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

विद्वज्जनों का कहना है कि संकर्षण ठाकुर के वंश में दसवें पीढ़ी पर थे चंद्रपति ठाकुर, जो चान ठाकुर के भी नाम से जाने जाते थे। ये दुबे ठाकुर के नाम से प्रसिद्द श्रीपति ठाकुर के पुत्र थे। तीन भाई थे ये – हरपति ठाकुर, नरपति ठाकुर और चंद्रपति ठाकुर। ये तीनों सोनकारियां-कर्माहा मूल के गंगेश्वर सूत श्रीधर के दोभित्र थे। इनके ही बालक थे महामहोपाध्याय महेश ठाकुर, जिन्हे अकबर से मिथिला राज्य के सनद प्राप्त हुआ था। कहते हैं इनके शिष्य रघुनन्दन झा को सनद मिला था जो गुरुदक्षिणा में अपने गुरु महेश ठाकुर को दे दिए। यहीं से प्रारम्भ होता है दरभंगा राज और उसका इतिहास।

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इस राज्य के पुरुष तो शुरू से ही शिक्षित, विद्वान, महामहोपाध्याय रहे थे, लेकिन स्त्री शिक्षा का सदैव अभाव रहा। दूसरे वंश से भी जो महिलाएं विवाहोपरांत इस वंश में आयीं, उन्हें भी शिक्षा में मामले में कोई प्रोत्साहन नहीं मिला। इसका ज्वलंत दृष्टान्त है राजा राघव सिंह की दो पत्नियों में बड़ी महारानी राघव कान्ता, जो अपने समय में अपने भाइयों को तो शिक्षित कर पायी, लेकिन अपनी प्रतिभा को दिखने से वंचित रह गयी।

शिक्षा के मामले में यह भी कहा जाता है कि ओईनिवार मूल के राजा कंसनरायण लक्ष्मी नाथ के वंश में स्त्री शिक्षा को बहुत बढ़ावा मिला। कहा जाता है कि कंस नारायण का विवाह भी मनु झा की बेटी सूरमा से तभी हुआ जब वे शास्त्रार्थ में हिस्सा लिए। बाद में कविकोविद जैसे कई दरवारी विद्वानों ने अपने अपने गीतों में विदुषी सोरमा की योग्यता का उल्लेख किये हैं। इसी राज में दूसरी विदुषी थी ‘बहुला’ जिनका श्लोक संस्कृत साहित्य में प्रसिद्द है।

विहस्य यस्य षष्ट्यन्ते चतुर्थ्यन्त विहाय च
द्वितीयंतमह: तस्य द्वितीया स्यामहं कथं

दरभंगा के विद्वानों का कहना है कि दरभंगा राज के पिछले राजवंश में स्त्री शिक्षा को बहुत प्रश्रय मिला, लेकिन समयांतराल स्त्री शिक्षा की परंपरा कोई भी बचा कर नहीं रख सके। दरभंगा राज में 1557 से 1962 तक कायम रहा। इस बीच दरभंगा राज परिवार में 22 व्यक्ति राजा हुए, जिसमें 10 व्यक्ति अपने बड़े भाई से सत्ता हासिल किये। अनेकों राजा अपने-अपन नामों पर नगर बसाने के साथ-साथ पोखर बनबाये, दान दक्षिणा दिए, अपने भाई और भतीजे को राज्य सौंपते गए। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दरभंगा राज में अधिकांश राज ‘नावल्द’ रहे। यह भी कहा जाता है कि जब मिथिला राज्य का अकबर से प्राप्त सनद को रघुनन्दन राय अपने गुरु को सौंप दिए, तब उनकी पत्नी महेश ठाकुर को श्राप दिए थे।

बहरहाल, राजा राघव सिंह की पहली पत्नी की मृत्यु के बाद इनकी छोटी (सौतन) राघवप्रिया के पुत्र राजा विष्णु सिंह इनके सारा पर, जहाँ इनका अंतिम संस्कार हुआ था, भौड़ागढ़ी (मधुबनी) में मंदिर बनाये। दरभंगा राज में ‘सारा’ पर परिवार के सदस्य के सारा पर यह दूसरा मंदिर है। पहला मंदिर था अपने भाई महिनाथ ठाकुर से राज भार लेने वाले नरपति ठाकुर की धर्मपत्नी उर्वशी देवी के सारा पर रहिका (मधुबनी) में निर्माण। दरभंगा में सारा पर मंदिर बनाने का इसके बाद शुरू हुआ। माधवेश्वर मंदिर वैसे सारा पर नहीं है, लेकिन इस मंदिर के समक्ष माधव सिंह सिंह का अस्थि कलश रखा हुआ है। महाराज रामेश्वर सिंह के सारा पर श्यामा मंदिर है।

दरभंगा के लोगों का कहना है कि यह पूरा माधवेश्वर शमशान परिसर पचास एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ है। प्रवेश द्वार पर महादेव की प्रतिमा है। स्वाभाविक भी है। मृत्योपरांत प्रत्येक शमशान में महादेव और उनके गनों का ही वास होता है। प्रवेश के साथ दाहिने हाथ माधवेश्वर मंदिर है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण महाराजा माधव सिंह आज से कोई 220 वर्ष पूर्व किये थे। इस परिसर का यह सबसे पुराना मंदिर हैं और यही कारण है कि इस पुरे परिसर को इस मंदिर के नाम से अलंकृत किया गया।

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राजा माधव सिंह की मृत्यु दरभंगा में नहीं हुयी थी। इसलिए इस परिसर में उनकी चिता स्थान पर कोई मंदिर नहीं है। अलबत्ता, जिस मंदिर का निर्माण उनके काल खंड में हुआ था, उस मंदिर के आगे उनका अस्थि कलश रखा है। लोग यह भी कहते हैं कि इस परिसर में माधवेश्वर महादेव मंदिर के अलावे जितने भी मंदिर हैं उन सभी मंदिरों में देवी की प्रतिमा स्थापित है और तंत्र विद्या के साधक, चाहे वे मिथिला के किसी भी क्षेत्र में रहते हों, यहाँ अपनी साधना करने अवश्य आते हैं। अधिकांश साधकों के लिए देवी ही उनका इष्ट होती हैं। परिसर के लोगों का कहना है कि माधवेश्वर में महाराजा माधव सिंह के पुत्र महाराजा छत्र सिंह का भी चिता स्थल नहीं है, इसलिए मंदिर भी नहीं है। छत्र सिंह अपनी अंतिम सांस बनारस में लिए थे। हाँ, महाराजा छत्र सिंह के पुत्र महाराजा रूद्र सिंह की चिता भूमि पर एक मंदिर अवश्य है जो माँ रुद्रेश्वरी काली के नाम से जाना जाता है।

रामेश्वर सिंह महान तंत्र साधक थे, अतः उनके चिता पर श्यामा मंदिर का निर्माण कई। देवी श्यामा की इतनी बड़ी प्रतिमा महाराजा रामेश्वर सिंह जो कामाख्या से वापस आये थे, मधुबनी के राजनगर किला में स्थापित किया था। राजनगर में काली की जो प्रतिमा है वह उनका बात्सल्य रूप है जबकि दरभंगा के माधवेशत में देवी काली का रौद्र रूप हैं। इसका निर्माण 1933 में हुआ था जहाँ देवी काली भगवान् शिव के छाती पर अवस्थित हैं। इस मंदिर परिसर में प्रवेश के साथ ही नहीं, आस-पास भी एक अदृश्य आकर्षण का अनुभव होता है।

मेरे पिता स्वयं तांत्रिक थे, और महाराजा रमेश्वर सिंह की तांत्रिक विद्या के साथ-साथ कामाख्या में उस सिद्ध पीठ के उपासक रहे थे। वे कहते थे कि पुरुषों के चिता स्थान की अपेक्षा महिलाओं कि चिता स्थान पर बने देवी की मंदिर अधिक शक्तिशाली होती है। वे यह भी कहते थे कि किसी भी शमशान में, जलते चिताओं के बीच एक अदृश्य शक्ति की उपस्थिति होती है। इस मंदिर में काल भैरव भी हैं, वटुक भैरव की भी उपस्थिति है और गणेश की प्रतिमा तो है ही। यह अलग बात है कि कालांतर में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के पिता रमेश्वर सिंह के सारा पर जब जब श्यामा मंदिर का निर्माण हुआ, परिसर उनके नाम से विख्यात हो गया। रमेश्वरी श्यामा मंदिर में तांत्रिक और वैदिक दोनों रीतियों से पूजा होती है, जबकि अन्य मदिरों में पूजा पद्धति तांत्रिक विधि पर आधारित है। यहाँ प्रत्येक मंदिर में ‘बलि प्रदान’ होता है।

इस मंदिर से आगे पश्चिमी दिशा में दरभंगा राज की दो महारानियों महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की बड़ी और मझली पत्नियों के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया जाया था। यहाँ कोई भी मंदिर अथवा सम्मानीय स्थान नहीं है। महारानियों के इस चिता स्थल से आगे ऐतिहासिक तालाब के दक्षिण भाग पर राजा बहादुर विश्वेशर सिंह के बड़े पुत्र राज कुमार जीवेश्वर सिंह के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया था। जीवेश्वर सिंह के चिता स्थल के पास ही उनके अनुज का अंतिम संस्कार किया गया था।

पोखर के आगे पश्चिम-दक्षिण भाग में दरभंगा के अंतिम संतानहीन राजा कामेश्वर सिंह के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया गया था। उनकी चिटा भूमि पर ही कामेश्वरी श्यामा मंदिर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी ने अपने सुहाग के गहने बेच कर कराया था। कामेश्वरी श्यामा मंदिर के पास ही महाराजा कामेश्वर सिंह के पहली पत्नी, यानी बड़ी महारानी राजलक्ष्मी का अंतिम संस्कार किया गया था। दुर्भाग्य यह है कि उनके सम्मान में भी यहाँ कोई घार्मिक मंदिर का निर्माण नहीं हो सका अब तक।

बहरहाल, कहते हैं दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपनी मृत्यु से छः साल पहले महज 21,274/- रुपये के लिए पटना उच्च न्यायालय से भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक एक कर दिये थे। यह पैसे महाराजा द्वारा बनाए गए धार्मिक न्यास को प्रदत्त भूमि से मिलने वाली कमाई का हिस्सा था। सरकार के नियमानुसार यह राशि “आयकर” नियमों के अधीन था, जबकि महाराजाधिराज के लोगों का कहना था कि चूँकि यह राशि महाराजाधिराज द्वारा धार्मिक न्यास को दी गयी कृषि-भूमि की कमाई का हिस्सा है, और न्यास को आयकर अधिनियम से छूट है; अतः यह राशि आयकर विभाग को भुगतान नहीं करनी चाहिए। आश्चर्य तो यह है कि उन दिनों भी महाराज के आस-पास रहने वाले मिथिला के विद्वान और विदुषी यह नहीं कह सके कि “एक ही राशि ‘दो व्यक्ति’ अथवा ‘दो संस्था’ के लिए अलग-अलग नियमों के अधीन होती है। जो राशि धार्मिक न्यास के लिए आयकर नियमों के अधीन नहीं है, वह राशि महाराजाधिराज के लिए आयकर अधिनियम के अधीन है।” परन्तु ‘बात तो दरभंगा राज की थी’, और उस दिन भी दरभंगा राज में राग-दरबारियों की किल्लत नहीं थी, आज तो पूछिए ही नहीं।

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जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में आया तो सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे सी शाह और न्यायमूर्ति एस के दास “Income Tax- Exemption from taxation Agricultural income from trust properties-Trustee’s remuneration a Percentage of such income and resting on trust deed-Remuneration, whether agricultural income-Indian Income-tax Act, 1922 (11 of 1922), SS. 2(1),4(3)(viii) के मद्दे नजर महाराजाधिराज के याचिका की सुनवाई किए। महाराजा ने दलील दिये कि वे एक ट्रस्टी के हैसियत से ट्रस्ट को प्रदान की गई भूमि से मिलने वाली आय का 15 फीसदी अपनी सेवा के लिए लेते थे, एक रेम्युनेरेशन के रूप में। उन्होंने आयकर विभाग को कहा कि उक्त भूमि के इस्तेमाल से एक ट्रस्टी के रूप में जो भी आमदनी उन्हें प्राप्त होती है वह कृषक सम्पत्तियों के इस्तेमाल से होने वाली कृषक आय है जो की भारतीय आयकर अधिनियम 1922 के धारा s. 4 (3) (viii) के अधीन आयकर से मुक्त है, साथ ही, कृषि आय से उन्हें तो रेम्युनेरेशन दिया जाता है, वह भी आयकर से मुक्त है क्योंकि उस आय का स्रोत कृषि है जो मंदिरों, ठाकुरबाड़ियों को दी गयी है उसके सफल सञ्चालन के लिए।

महाराजाधिराज दरभंगा ही नहीं, बिहार प्रान्त और देश के अन्य हिस्सों में जिन-जिन मंदिरों, मठों और धार्मिक स्थानों की देख-रेख करने का दायित्व लिए थे, उसका समुचित संरक्षण हो; इस निमित्त अपने राज का एक बहुत बड़ा हिस्सा का कृषि जमीन कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास को दे दिए थे, ताकि आमदनी का स्रोत बना रहे । परन्तु, आज दरभंगा राज रेसिडुअरी ट्रस्ट, कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट या महाराजाधिराज द्वारा सामाजिक-धार्मिक कल्याणार्थ बनाये गए अन्य न्यासों से “अधिक स्वस्थ” कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास का भी नहीं है।

न्यास के बारे में बहुत बातें हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के पास ‘सम्पूर्णता के साथ’ ऐसी कोई सूची है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि इस न्यास को बनाते समय महाराजधिराज ने अमुक-अमुक मंदिरों / मठों के निर्माण, रख-रखाव, पंडित/पुजारी के वेतन, प्रसाद, घुपबत्ती, अगरबती, घूमन, भगवान अथवा भगवती के लिए वस्त्र आदि-आदि मदों पर प्रत्येक दिन अथवा प्रत्येक वर्ष होने वाले खर्च कहाँ से आएंगे? क्या उन मंदिरों और मठों के निमित्त सुरक्षित जमीनों की सूची है कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के पास ? क्या उन जमीनों के लिए न्यास सरकार के कोषागार में अथवा निबंधन कार्यालय में भूमि-कर का भुगतान कर रखा है? क्या कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के तहत सभी मंदिरों, मठों की स्थिति बेहतर है? क्या उन भूमियों की खरीद-बिक्री में तो हाथ नहीं लगाया गया है? कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के तहत संचालित और संरक्षित मंदिरों/मठों के पुजारियों की कोई सूची उपलब्ध है?

सूत्रों का कहना है कि कोई 108 मंदिर और ठाकुरवाड़ी हैं जो कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के अधीन माना जाता है। इतना ही नहीं, यह भी कहा जाता है कि कानपुर स्थित बाजीराव पेशवा – II के महल में स्थित मंदिर का देखभाल सहित, देश में अनेकानेक ‘ऐतिहासिक लोगों द्वारा स्थापित मंदिर है जिसका देखभाल महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने अपने जिम्मे लिय्या था और इसका दायित्व कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास को सौंपा था। बिहार के कुल 38 जिलों में तक़रीबन 534 ब्लॉक हैं और कोई 45,103 गाँव हैं। उन्हीं गाँव में दरभंगा में कुल 1251 गाँव है, और ऐसा कोई गाँव नहीं है जहाँ धार्मिक आस्था से जुड़े स्थान नहीं है। बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद ने 2007 में श्यामा माई मंदिर को अधिग्रहण किया। फिर श्यामा माई मंदिर न्यास समिति का गठन हुआ।

क्रमशः

1 COMMENT

  1. Bahut sunder jankari is lekh ko padh ke mila Sir. Us samay agar un mahilao (Rajparivar ki thin wa hai) ko tabajoh diye hote to sambhavtah jaise lekh aur anya srot se padhnke ko mila tha , bigat saalon se isthit hai wo bilkul hi nahin rahta. Khair, kamna karta hun ki agami samay sab sahi ho jaye. Hardik Mangal Kamna.

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