जयप्रकाश नारायण के ‘तथाकथित अनुयायीगण करोड़ों-करोड़ के ‘मालिक’ हो गए 50 वर्षों में, जेपी का ‘समाजवाद’ 5000 किलोमीटर पीछे छूट गया (भाग-2)

बिहार के नेता और जयप्रकाश नारायण का सिद्धांत - हे परमात्मा

जगत नारायण लाल रोड/डाक बंगला चौराहा (पटना) : आगामी चुनाव के समय अगर कोई नेता यह कहते हैं कि वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सिद्धांतों में विश्वास करते हैं, उनके अधूरे सपने को पूरा करना चाहते हैं, प्रदेश के गरीब-गुरबा को सत्ता के गलियारे में उनका हक़ दिलाना चाहते हैं, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एकजुट होकर लड़ना चाहते हैं, तो समझ लें कि वे झूठ बोल रहे हैं। क्योंकि जयप्रकाश नारायण के साथ लड़ने वाले लोगों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है जो उनके सिद्धातों को, उनके विचारों को बहती गंगा की धारा में बहा दिए ‘स्वहित’ के लिए। जो शेष हैं, उनकी आयु सम्पूर्ण क्रांति की आयु से बहुत कम है। साथ ही, जयप्रकाश नारायण के देहावसान के बाद भी बिहार के शैक्षिक स्तर में इतना बदलाव नहीं हुआ कि वे जेपी के सिद्धांतों, विचारों को समझ पाएंगे, जमीनी सतह पर उतार पाएंगे। क्योंकि जो जेपी के साथ थे उनका आचार-विचार जब ‘भ्रष्टाचार’ में बदल गया, तो शेष तो शेष ही हैं।

सत्ता के गलियारे में बैठे बिहार के जनप्रतिनिधि अगर यह कह रहे हैं कि वे जनता की भलाई करने को वचनवद्ध हैं और अपने राजनीतिक मार्गदर्शन जयप्रकाश नारायण-कर्पूरी ठाकुर के सिद्धांतों को आगे ले जा रहे हैं – आप समझ लें वे ​भी आपको बरगला रहे हैं । सच यही है, शेष सब मिथ्या है क्योंकि जय प्रकाश नारायण के कल के पिछलग्गू और प्रदेश के मतदाताओं को रसातल में भेजकर आज के तथाकथित अनुयायियों का राजनीति में आने के बाद करोड़पति, अरबपति, खरबपति बनने से बड़ा दृष्टांत क्या हो सकता है।

आजादी के बाद अब तक के मंत्रिमंडल में भले तथाकथित रूप से सामाजिक सरोकार रखने का दावा करने वाले सफेदपोश या रंग बिरंगे वस्त्रों को धारण करने वाले जनहित की बात करें, अखबारों, पत्रिकाओं में ​ उनका नाम प्रकाशित हों; लेकिन प्रदेश के 324 विधानसभा, 40 लोक सभा, 16 राज्य सभा और 75 विधान परिषद क्षेत्र (63 निर्वाचित और 12 मनोनीत) के रोते, बिलखते, पेट-पीठ एक किए, अशिक्षित, बेरोजगार, बीमार, पीड़ित मतदाता से बड़ा दूसरा कोई उद्धरण नहीं हो सकता है। चिंतित नहीं हों। आने वाले समय में भारत के शोधकर्ता ही नहीं, विश्व के प्रतिष्ठित शोध संस्थाओं के दिग्गज आज़ादी के बाद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लड़ी गयी दूसरी जंगे आज़ादी और उस आंदोलन से जन्म लिए तथाकथित नेताओं पर गहन शोध अवश्य करेंगे। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कदमकुआं स्थित जयप्रकाश नारायण के घर पर भी राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भूमि माफिया की नजर टिकी हो।

एक बार जोर से बोलें जयप्रकाश नारायण की जय

जय प्रकाश नारायण के सिद्धांतों को, उनके विचारों को उनके ही अनुयायियों द्वारा धज्जी उड़ाते देखना हो तो बिहार का भ्रमण सम्मेलन कर लें। अपने को ​जयप्रकाश नारायण-कर्पूरी ठाकुर का शिष्य कहने वाले लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार जैसे अनुयायी अगर करोड़पति हो सकते हैं, तो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के बाद बिहार की धरती पर जन्म लेने वाले, राज्यसभा, लोकसभा, विधान सभा या विधान परिषद में बैठने वाले ​’सम्मानित’ नेतागण अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं।

आज स्थिति यह है की मताधिकार का प्रयोग करते समय भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा निर्देशित किस उंगली में स्थायी स्याही का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, ज्ञान नहीं रखने वाले भी प्रदेश में जयप्रकाश नारायण की विचारधारा, उनके सिद्धांतों की बात करते ​नहीं थकते। आज जो भी स्वयंभू नेता जयप्रकाश नारायण का अनुयायी होने का दावा करते हैं​, वे तो कभी जयप्रकाश के हुए ही नहीं थे। काश ​!! जयप्रकाश नारायण उन दिनों यह जान पाते कि आने वाले समय में उनके आंदोलन में कदमताल करने वाले कल प्रदेश के आर्थिक, राजनीतिक लुटेरों में गिने जाएँगे और प्रदेश का मतदाता विचारहीन बना रहेगा।

कदमकुआं स्थित जयप्रकाश नारायण के घर के प्रवेश द्वार पर सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र विद्यालय के तरफ अपना चेहरा कर सोच रहा हूँ कि सांख्यिकी के मुताबिक नीतीश कुमार की वर्तमान सरकार में औसतन ​विधायकों और मंत्रियों की आयु 52 वर्ष की है। ​जिस दिन पटना की सड़कों पर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में मौन ​जुलूस के साथ-साथ सम्पूर्ण क्रांति की लड़ाई लड़ी गई, आज 51-वर्ष का अध्याय लिख रहा है।​ उस दिन इस प्रवेश द्वार पर जनसैलाब रहता था, आज विरानीयत है। उस दिन विद्वान-विदुषी से लेकर देश के दिग्गजों का शीष यहाँ झुका होता था, आज जयप्रकाश नारायण के सिद्धांत पैरों तले रौंदे जा रहे हैं। विगत दिनों सत्तर-अस्सी के कालखंड के हमारे फोटो-जर्नलिस्ट मित्र अशोक कर्ण, जो सम्पूर्ण क्रांति के जन्म का प्रथम द्रष्टा हैं, पटना के कदमकुआं स्थित जयप्रकाश नारायण के आवास आये थे लेकिन दशा देखकर ख़ुशी नहीं हुई।

स्वाभाविक है नीतीश कुमार ​और उनके ही नहीं, अन्य राजनीतिक पार्टियों का छाता ढँके सभी विधायक और मंत्री महोदय/महोदया ​जयप्रकाश नारायण के बारे में किताबों में पढ़े होंगे, गूगल पर पढ़े होंगे। जय प्रकाश नारायण से रूबरू होने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि या तो वे एक वर्ष के थे अथवा जन्म नहीं लिए थे। वैसी स्थिति में जयप्रकाश नारायण के सिद्धांतों को पढ़ना, समझना और अमल करने के बारे में सोचना मूर्खता का पराकाष्ठा होगा। क्योंकि जो जयप्रकाश के साथ थे​ उन दिनों जब वे जयप्रकाश नारायण के नहीं हुए, उनके सिंद्धान्तों का नहीं हुए तो इन लोगों से अपेक्षा करना व्यर्थ है। ​शब्द कटु है लेकिन सत्य तो यही है।

भारत के एकमात्र एंग्लो-इंडियन गाँव की कहानी जिसे लन्दन के हॉउस ऑफ़ कॉमन्स में कथा यूके के सामान से सम्मानित किया गया था के लेखक वरिष्ठ पत्रकार विकास कुमार झा कहते हैं “जेपी के विचारों की दुर्गति तो हुई ही, जेपी के तथाकथित अनुयायियों ने जेपी को उनके जीवन काल में ही उनकी दुर्गति शुरू कर दी। उनकी मृत्यु भी उनकी उपेक्षा का गवाह देता है। आज जेपी के स्वप्न को उनके अनुयायी ही नेश्तोनाबूद कर दिए।​ “सत्ता के सूत्रधार”, “बिहार: ​राजनीति का अपराधीकरण” जैसे दर्जनों पुस्तकों के लेखक, राजनीतिक समीक्षक विकास कुमार झा कहते हैं : “जेपी संत थे। इस बात में कोई दो राय नहीं है। लेकिन उस संत का जिस कदर उनके तथाकथित अनुयायियों ने अपने-अपने हितों के लिए शोषण किया, वह दुर्भाग्यपूर्ण रहा।​”

​विकास झा कहते हैं: “मैं तो सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र विद्यालय का छात्र रहा हूँ। अपने छात्र जीवन में शायद ही कोई दिन ऐसा होता था जिस दिन जेपी का शारीरिक दर्शन नहीं होता था। उन दिनों जब भी ​जेपी पटना में होते थे, अपने घर के प्रथम मंजिल के बरामदे पर सुबह-सवेरे अखबार पढ़ते दीखते थे। हम सभी बच्चे मैदान से जोड़-जोड़ से चिल्लाते थे। आवाज स्वाभाविक था, उनकी कानों तक पहुँचती थी जो उनके पठन-पाठन में व्यवधान उत्पन्न करती थी। अक्सर​ हां वे उठकर अपने दोनों हाथों को उठाकर, हाथ जोड़कर हम बच्चों का अभिवादन करते थे। कभी कभी तो विद्यालय के शिक्षक, प्राचार्य भी हम बच्चों को डांटते थे। लेकिन जेपी तो जेपी थे। बच्चों के साथ उनका जो भावनात्मक सम्बन्ध था, खासकर हमारे विद्यालय के छात्रों के साथ, शायद कहीं नहीं रहा होगा।”

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​विकास जी का कहना है कि “उन दिनों देखते भी थे की उनके घर पर देश के दिग्गज से दिग्गज नेता उनके दर्शनार्थ आते थे। उन दिनों में उनके घर तक पहुँचने का मार्ग बहुत अच्छा नहीं था, चौड़ा नहीं था, परन्तु साफ़-सुथरा था। आज जिस कदर लोगों की मानसिकता संकीर्ण हो गयी है, समाज के प्रति, जेपी के प्रति, उनके विचारों के प्रति, गली-मोहल्ला भी संकीर्ण होता चला गया। जयप्रकाश नारायण की मृत्यु के बाद उनके आवास पर, चरखा समिति पर एक विशेष जाती के लोग कब्ज़ा करने की कोशिश भी किये (शायद कर भी रहे हैं) । बिहार में बिडंबना का आप अंदाजा यही लगाएं कि जयप्रकाश नारायण की पत्नी श्रीमती प्रभा जी तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू जी के सम्मानार्थ शांतिनिकेतन के तर्ज पर एक कमला नेहरू स्मृति स्कूल खोली। आज भी है। सदाकत आश्रम को बेहतरीन बनाया गया। राजेंद्र ​प्रसाद संग्रहालय आदि है। सवाल यह ही कि जयप्रकाश नारायण के तथाकथित अनुयायी लोग, चाहे कोई भी हों, किसी भी पद पर हों; प्रदेश को लूटने में ही लग गए, फिर जेपी के विचार, सिद्धांत को कौन पूछता हैं।

लालू यादव से बड़ा अपने आपको जेपी का अनुयायी कहने वाला कोई नहीं हुआ। ​2009 के चुनाव में लालू यादव के पास 3.20 करोड़ की संपत्ति है। ​यह मैं नहीं, निर्वाचन आयोग का दस्तावेज कहता है। साल 2020 में राबड़ी देवी ने अपनी संपत्ति 17.92 करोड़ रुपये बताई थी। लालू यादव के छोटे बेटे ​पूर्व-उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने चुनावी हलफनामे में 5.88 करोड़ की चल-अचल संपत्ति होने का खुलासा किया था। तेजस्वी यादव के पास 1.11 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 3 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति भी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र से ​राष्ट्रीय जनता दल उम्मीदवार रहीं ​लालू यादव की बड़ी बेटी मीसा भारती के पास बिहार और दिल्ली में 6.72 करोड़ की ​संपत्ति थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने 2.83 करोड़ की ​संपत्ति की जानकारी दी थी। ​आज तो उन सम्पत्तियों में कई गुना का इजाफा हो गया होगा। लेकिन जेपी का विचारधारा और सिद्धांत – ओह !! दुखद है।

लालू प्रसाद यादव कहते हैं इन्हें

इससे अलग 2017 में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने लालू परिवार की 9.32 करोड़ रुपये बेनामी संपत्ति जब्त की थी। ​जबकि उन सम्पत्तियों का बाजार में 175 करोड़ रुपये ​मोल आंकी गई। ​इसके अलावे जुलाई 2023 में भी ​प्रवर्तन निदेशालय ने भी लैंड फॉर जॉब घोटाले में ​उनके परिवार की 6 करोड़ की ​संपत्ति की कुर्की की थी।​ इससे बड़ा जयप्रकाश नारायण का अनुयायी कौन हो सकता है। आकंड़ों के हिसाब से साल 1994 में पटना वेटनरी कालेज के चपरासी आवास से यात्रा शुरू करने वाले ​लालू यादव एंड कंपनी (उस समय इतना बड़ा परिवार नहीं था) के पास (चुनावी दस्तावेजों के मुताविक) कुछ साल पहले तक 333751143 /+ करोड़ रुपये की संपत्ति थी है। कदमकुआं स्थित जयप्रकाश नारायण के प्रवेश द्वार पर खड़े-खड़े सोच रहा हूँ अपनी मृत्यु से पहले शायद सम्मानित जयप्रकाश नारायण इतने अंकों की राशि उनके ‘अनुयायी’ एक के पास होंगे, सोचे भी नहीं होंगे।

​सम्पूर्ण क्रांति के शुरूआती दिनों में जब ‘कोर कमेटी’ बनी थी, नीतीश कुमार उस कमेटी में थे। स्वाभाविक है जयप्रकाश नारायण उन्हें सामाजिक सरोकार वाले व्यक्ति समझे होंगे। लालू यादव की तुलना में नीतीश कुमार अधिक शांत थे, अख़बारों के दफ्तरों में चक्कर कम लगते थे, लालू और सुशील मोदी की तुलना में। उस कालखंड के जो भी लोग आज हैं, शायद इस बात को मानेंगे। अख़बार में छपते रहने के लिए लालू एक दिन अपना ही अपहरण करा लिए, यह भी उन दिनों के लोग जानते होंगे। आज जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के ‘आत्मीय शिष्य या अनुयायी कहे जाने वाले, उनके सिद्धांतों को तथाकथित रूप से आगे ले जाने वाले नीतीश कुमार पिछले 23 साल से ​प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान है। स्वयं अभियंत्रण की उपाधि से अलंकृत नीतीश कुमार के प्रदेश में शिक्षा का क्या महत्व है यह तो वे खुद भी अधिक जानते होंगे।

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क्योंकि सन 1974 से 1979 तक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अनुयायी रहे नीतीश कुमार के प्रदेश में जब जयप्रकाश नारायण अंतिम सांस लिए (सन 1979​) बिहार का शैक्षिक दर भी 30 फीसदी पार नहीं किया था। आंकड़े यही कहे थे कि 29.76 फीसदी शैक्षिक दर था जिसमें पुरुषों की साक्षरता 36.00% और महिलाओं की 21. 70 % थी। पचास वर्ष बाद आज प्रदेश की सरकार साक्षरता दर के ग्राफ को भले 61.8 फीसदी, जिसमें पुरुषों की साक्षरता 71.2 % और महिलाओं की साक्षरता 51.5 फीसदी (राष्ट्रीय साक्षरता दर 74.04% से भी नीचे) दिखाए, कदमकुआं के जगत नारायण लाल रोड की गलियों में रहने वाले जयप्रकाश नारायण के घरों के दीवार, ईंट, पत्थर गवाह है कि आज भी हम उनके लिए शिक्षित नहीं हुए हैं।

​1 मार्च, 1951 को जन्म लिए नीतीश कुमार भी वी पी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे। ​मुख्यमंत्री बनने के बाद से वह कैबिनेट सचिवालय विभाग की वेबसाइट पर हर साल अपनी संपत्ति का खुलासा करते हैं। 2024 में घोषित विवरण के अनुसार, उनके पास 1.64 करोड़ रुपये की संपत्ति है। ​तीन साल पहले, यानी 2022 में उनकी संपत्ति कुल 75.53 लाख रुपये थी। उनके पास फोर्ड इकोस्पोर्ट कार है,​ जिसकी कीमत 11.32 लाख रुपये है। उनके पास नई दिल्ली के द्वारका में 1.48 करोड़ रुपये कीमत का एक अपार्टमेंट फ्लैट है, जिसे उन्होंने किराये पर दे रखा है। इसके अलावा नीतीश कुमार के पास 13 गायें और 10 बछड़े भी हैं। उनके बेटे निशांत के पास कुल 3.61 करोड़ की ​संपत्ति है। नीतीश कुमार की पैतृक ​संपत्ति और खेती वाली जमीन भी निशांत के नाम पर है। उनके बेटे के पास नालंदा के हकीकतपुर और कल्याण बीघा में मकान है। इसके अलावा पटना के कंकड़बाग में भी निशांत का घर है।​

16 नवम्बर, 1968 को जन्म लिए ​नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री हैं सम्राट चौधरी। जिस वर्ष जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति पटना की सड़कों पर अंगड़ाई ली थी, उस समय सम्राट चौधरी की आयु लगभग छः वर्ष की थी। इस आयु में सिद्धांत और विचार को समझना, वह भी जयप्रकाश नारायण का, सोच से परे था । स्वाभाविक है ये भी जेपी के बारे में किताबों में पढ़े होंगे। वह तो गनीमत है कि जेपी कांग्रेस (इंदिरा गांधी) के विरोधी थे, अन्यथा आज किताबों में से उनका नाम भी प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की तरह साफ़ हो गया होता। खैर।

56–वर्षीय सम्राट चौधरी की अचल संपत्ति में 4.87 करोड़ रुपये की गैर-कृषि भूमि और 3.41 करोड़ रुपये की कृषि भूमि शामिल है। उनके परिवार के पास 1.3 किलोग्राम सोना और 3.25 किलोग्राम चांदी भी है, जिसकी कीमत 78 लाख रुपये है। शेयर, म्यूचुअल फंड और पीपीएफ में कुल 24 लाख रुपये का निवेश है। उन्होंने 6.7 लाख रुपये घोषित किए हैं, जबकि उनकी पत्नी के पास 5.7 लाख रुपये हैं। दोनों की कुल संपत्ति 11.48 करोड़ रुपये है – जो 2022 की तुलना में 56.68 लाख रुपये अधिक है। इतना ही नहीं, सम्मानित चौधरी के पास 4 लाख रुपये की राइफल भी है, जो कुछ मंत्रियों के परिवारों में हथियार रखने के चलन को दर्शाता है।

उपमुख्यमंत्री द्वय – सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा

​इसी तरह, जब जयप्रकाश नारायण की क्रांति शुरू हुई थी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के परिवार के विजय कुमार सिन्हा सात वर्ष के थे। 6 जून, 1967 को जन्म लिए सिन्हा साहब नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में दूसरे उप-मुख्यमंत्री हैं और कुल 8,93,71,448 करोड़ के मालिक हैं। उनके पास 90 ग्राम सोने के गहने हैं, जबकि उनकी पत्नी के पास 450 ग्राम सोने के गहने हैं। एक रिवॉल्वर और एक राइफल भी है। उन्होंने पावर ग्रिड, शिवा वायोजेनेटिक और त्रिभुवन देव एंड कंस्ट्रक्शन कंपनी समेत कई कंपनियों के शेयरों में निवेश किया है। उनके कैनरा बैंक और SBI में कुल छह खाते हैं। उनकी पत्नी के नाम कैनरा बैंक की कदमकुआं शाखा में सबसे अधिक 15 लाख रुपये जमा हैं। उनके पास लखीसराय और मरांची में कृषि भूमि है। उनके पास पुणे में तीन, पटना के रानीपुर और बाढ़ में आवासीय भूखंड हैं। पटना के बहादुरपुर और संदलपुर में उनके व्यावसायिक परिसर और भूखंड हैं। उनके पास पुनाईचक बोर्ड कॉलोनी में भी जमीन है, जो उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली है। एग्जीबिशन रोड और कदमकुआं में उनके आवासीय और व्यावसायिक परिसर हैं। पहाड़ी पर भी उनकी जमीन है। और क्या चाहिए जयप्रकाश नारायण के अनुयायी को।

​इसी तरह 2 फरवरी, 1969 यानी सम्पूर्ण क्रांति की शुरुआत से पांच वर्ष पहले जन्म लिए नीरज कुमार सिंह, जो नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में भी हैं, के पास कुल 13.98 करोड़ रुपये की संपत्ति है। इसमें 3.26 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 10.72 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति शामिल है। चल संपत्ति में नकदी, बैंक बैलेंस, गहने और निवेश जैसी चीजें आती हैं। अचल संपत्ति में जमीन, मकान, दुकान जैसी चीजें शामिल होती हैं।​

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दस्तावेजों के अनुसार, ​8 जनवरी, 1957 को जन्म लिए, यानी नीतीश कुमार से सात वर्ष छोटे, विजय चौधरी के पास केवल 40 हजार रुपये नकद हैं, जबकि उनकी पत्नी के पास 1.70 लाख रुपये नकद हैं। उन्होंने वित्तीय वर्ष 2023-24 में 11,45,736 रुपये का आयकर जमा किया है, जबकि उनकी पत्नी ने 2,28,610 रुपये का आयकर जमा किया है। वर्ष 2022-23 में उन्होंने 7,81,788 रुपये का आयकर दिया था। उन्हें सोने-चांदी का शौक नहीं है। समस्तीपुर में उनके पास छह बीघा 12 कट्ठा 13 धुर कृषि भूमि है, जिसकी कीमत 55 लाख रुपये आंकी गई है। उनकी पत्नी के नाम पर गोला रोड पर 50 लाख रुपये कीमत की 2.75 कट्ठा आवासीय भूमि और बेली रोड पर 1200 वर्ग फीट का एक फ्लैट है, जिसकी कीमत 45 लाख रुपये आंकी गई है। विजय चौधरी के नाम समस्तीपुर के केवटा में डेढ़ कट्ठा में उनका पुश्तैनी घर भी है।​ ये भी लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अनन्य अनुयायी है।

जयप्रकाश नारायण की क्रांति से चार महीने पहले यानी 5 दिसंबर, 1973 को जन्म लिए जनक राम के पास 1.62 करोड़ रुपये की संपत्ति है, जबकि उनकी पत्नी के पास 1.75 करोड़ रुपये की संपत्ति है। जनक राम के पास चल संपत्ति अधिक है, जबकि उनकी पत्नी के पास अचल संपत्ति ज्यादा है। उनके पास एक राइफल, एक पिस्तौल, दो स्कॉर्पियो और एक इनोवा है। इसी तरह, 2 मार्च, 1964 को जन्म लिए हरि सहनी के पास कुल 1 करोड़ रुपये की संपत्ति है, जिसमें 22.63 लाख रुपये की चल संपत्ति और 78 लाख रुपये की अचल संपत्ति शामिल है।

राकेश कपूर

पटना के राकेश कपूर कहते हैं कि “पटना सिटी के गांधी सरोवर मंगल तालाब परिसर में कभी लोक नायक जय प्रकाश नारायण उद्यान हुआ करता था। गुलाब के सुंदर फूलों से सुसज्जित इस उद्यान में तत्कालीन पटना के महापौर स्व. के.एन.सहाय जी की अध्यक्षता में अखिल भारतीय महापौर सम्मेलन का भी आयोजन किया गया था। कालांतर में लोक नायक जय प्रकाश नारायण के अनुयायी रहे स्थानीय विधायक और वर्त्तमान बिहार विधान सभा अध्यक्ष श्री नंदकिशोर यादव जी ने इस उद्यान को उजाड़ कर इसमें मुक्ताकाश मंच और कैफेटेरिया का निर्माण करवाया। मुक्ताकाश मंच को नंदकिशोर यादव जी ने अपने पिता के नाम ‘पन्ना लाल यादव मुक्ताकाश मंच’ कर दिया। हरियाली को पूरी तरह नष्ट कर सीमेंटेड कार पार्किंग भी बनवाया गया। एक कैफेटेरिया (काॅफी प्लाजा)बनवाया गया। अब स्थल वर्तमान में कूड़ा डंपिंग केंद्र के साथ सूअर का माँस बिकने की जगह बन गया है।

कपूर साहब आगे कहते हैं: “कैफेटेरिया तो आज तक पूर्ण रूप से खुला ही नहीं। इसी कैफेटेरिया की जर्जर स्थिति की मरम्मत की मांग को लेकर बिहार विधानसभा में पूछे गए एक सवाल पर सरकार के तत्कालीन पर्यटन मंत्री ने अधिकारियों की गलत सूचना के आधार पर सदन को गुमराह किया था। जबकि सच्चाई यह है कि यह कैफेटेरिया तो आज तक पूर्ण रूप से कभी खुला ही नहीं तो जर्जर कैसे हो गया कि इसके मरम्मत की जरूरत आन पड़ी। जाहिर है, कैफेटेरिया के निर्माण में जबरदस्त धांधली हुई होगी। अब पिछले कुछ महीनों से इस कैफेटेरिया को डीएसपी कार्यालय में तब्दील कर दिया गया है। माननीय नन्द किशोर यादव जी की इस नासमझी भरे निर्णय की निंदा की जानी चाहिए। एक हरे-भरे उद्यान को उन्होंने नष्ट कर पर्यायवरण और लोगों के स्वास्थय के साथ क्रूर मजाक किया है।”

बहरहाल, चुनाव सुधारों को बेहतर बनाने के लिए काम करने वाले संगठन एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल 4,092 विधायकों में से करीब आधे विधायकों ने अपने चुनावी हलफनामे में अपने खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है। एडीआर ने देशभर के 28 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के 4,123 विधायकों का विश्लेषण किया, जिनमें से 4,092 विधायकों के हलफनामे का अध्ययन किया गया। एडीआर के मुताबिक, 1,861 विधायकों ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है, जिनमें से 1,205 विधायक गंभीर मामलों में शामिल हैं, जैसे हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज हैं ।जो हमारे राज्य और देश के लिए बेहद हानिकारक है। ऐसे लोग यदि विधानसभा में बैठेंगे, तो हम उनसे बेहतरी और विकास की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यह तो देश की बात हुई।

बिहार में बिहार के 243 में से करीब 160 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें 123 विधायकों के खिलाफ संगीन अपराधों के आरोप हैं। 19 विधायकों पर IPC धारा 302 (हत्या) के तहत मामले दर्ज हैं। 31 विधायकों पर IPC धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत मामले दर्ज हैं। राष्ट्रीय जनता दल की कुल 74 में से 54 विधायक यानि (73%) विधायकों पर मामले दर्ज हैं ,वहीं भारतीय जनता पार्टी के कुल 73 में से 47 विधायक यानि (64%)आपराधिक मामले का सामना कर रहें हैं ,जबकि जनता दल यूनाइटेड के कुल 43 विधायकों में से 20 विधायक यानि (46%) वहीं कांग्रेस पार्टी की बात करें तो 19 में से 18 विधायक (94%) विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं |

क्रमशः …

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