अपनी ‘उंगलियों को क्रॉस करके’ रखें, ‘छठ महापर्व’ यूनेस्को के ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की सूची में अंकित होने वाला है

भगवान् सूर्य को अर्घ्य देती एक महिला 

पटना​ / नई दिल्ली : अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। संभव है इस सत्र में भारत का महान धार्मिक परंपरागत पर्व छठ यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज हो जाये। अपनी-अपनी उंगलियां क्रॉस करके रखें।
 
इसी तैयारी के क्रम में यानी “छठ” को यूनेस्को के अमूर्त्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने के उद्देश्य से इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज अपने कार्यालय में प्रदर्शनी करने जा रहा है। भारत में औसतन 15 करोड़ लोग, महिला-पुरुष इस पर्व को मानते हैं, शामिल होते हैं। जानकारी के अनुसार बिहार की सभी लोक कलाओं में छठ महापर्व को आधार बनाकर ‘अर्घ्य ’ प्रदर्शनी का आयोजन 28 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक होगा। 

स्थान : इंटेक मुख्यालय, 
71 लोधी इस्टे्ट,
के.के.बिड़ला लेन, नई दिल्ली 

UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में किसी विरासत को शामिल करने के लिए, देशों को मूल्यांकन के लिए एक नॉमिनेशन डॉसियर (नामांकन दस्तावेज) जमा करना होता है। हर देश हर दो साल में एक विरासत को नामांकित कर सकता है। 
इंटैक बिहार राज्य  के संयोजक भैरव लाल दास के अनुसार ‘अर्घ्य‘ का शुभारंभ राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश द्वारा 28 सितम्बर को 11 बजे करेंगे। इंटैक के अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर, सदस्य सचिव रविन्द्र  सिंह एवं क्राफ्ट डिविजन की प्रमुख बिन्दु वन्दना मनचन्‍दा भी उपस्थित रहेंगी। छठ महापर्व को यूनेस्को के अमूर्त्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने के उद्देश्य से आयोजित इस प्रदर्शनी की क्युरेटर मिथिला चित्रकला की विदुषी चितेरी मनीषा झा एवं अलका दास हैं। 

नीषा झा एवं अलका दास के अनुसार 30 सितम्बर को 2.00 बजे से इस प्रदर्शनी में ही छठ की ऐतिहासिकता पर एक विद्वत संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया है जिसमें कैलाश कुमार मिश्र, दक्षेस विश्वविद्यालय के प्रो. देवनाथ पाठक, सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद दरभंगा के प्रो. विद्यानाथ झा, दिल्ली  विश्वविद्यालय के प्रो. राधा माधव भारद्वाज एवं रिपुंजय ठाकुर, पटना के डा मनोज कुमार अम्बष्ठ आदि शामिल होंगे। 

भारत की अन्य यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासतें हैं – कुटियाट्टम (संस्कृत थिएटर) (2008), वैदिक मंत्रोच्चार की परंपरा (2008), रामलीला (रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन) (2008), रम्माण, भारत के गढ़वाल हिमालय के धार्मिक उत्सव और परंपरा का मंचन (2009, छऊ नृत्य (2010), कालबेलिया लोक गीत और नृत्य (राजस्थान) (2010),मुडियेट्टू (केरल) का अनुष्ठान थियेटर और नृत्य नाटक  (2010), लद्दाख का बौद्ध जप: हिमालयी लद्दाख क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर, भारत में पवित्र बौद्ध ग्रंथों का पाठ ((2012), मणिपुर का संकीर्तन, अनुष्ठान गायन, ढोलक बजाना और नृत्य करना (2013), जंडियाला गुरु, पंजाब, भारत के ठठेरों के बीच पारंपरिक तौर पर पीतल और ताँबे के बर्तन बनाने का शिल्प (2014), नवरोज (2016), योग (2016), कुंभ मेला (2017), कोलकाता की दुर्गा पूजा (2021), गुजरात का गरबा (2023), और रोशनी का त्योहार, दीपावली (2024)। 

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इंटैक बिहार के सह-संयोजक डा शिव कुमार मिश्र के अनुसार बिहार के 35 लोक कलाकारों को इस प्रदर्शनी में स्थान दिया गया है। ये कलाकार छठ व सूर्य पूजा से जुड़ी परंपराओं पर आधारित कलाकृतियाँ प्रदर्शित करेंगे। इन कलाकृतियों और शिल्प के जरिए, यह प्रदर्शनी छठ से जुड़े प्रतीकों, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को उजागर करेगी। इसमें यह दिखाने की कोशिश की जाएगी कि कैसे लोक कलात्मक परंपराएँ छठ महापर्व के सांस्कृतिक महत्व को पीढ़ियों तक संजोकर रखती हैं और आगे बढ़ाती हैं। 

​पटना के गंगा घाट पर छठ

अर्घ्य की खास बात यह है कि यहां आने वालों को न सिर्फ़ तैयार कलाकृतियाँ देखने को मिलेंगी बल्कि उन्हें कलाकारों को काम करते हुए देखने, इन परंपराओं से जुड़े लोगों से मिलने, उनकी कार्य-प्रक्रिया को समझने और कला, रीति-रिवाज व समुदाय के बीच के रिश्ते को महसूस करने का मौका भी मिलेगा। यह प्रदर्शनी छठ पर्व के कलात्मक और सांस्कृतिक महत्व पर आधारित है। आयोजकों के अनुसार ‘’अर्घ्य’’ सिर्फ़ एक प्रदर्शनी नहीं है, यह एक अर्पण है। यह कला एवं परंपराओं का मिलन, रीति-रिवाजों और कलात्मक अभिव्यक्तियों का संगम भी है।

यह विरासत को सिर्फ़ अतीत से मिली चीज़ के तौर पर नहीं, बल्कि आज भी रची, अपनाई और आगे बढ़ाई जा रही चीज़ के तौर पर देखने का अवसर प्रदान करती है। प्रदर्शनी में मिथिला पेंटिंग, पटना कलम, मंजुषा कला, भोजपुरी, सिक्की , पेपरमेशी, टेराकोटा, सुजनी, बैद्यनाथ सहित बिहार की सभी क्षेत्रों की प्रचलित एवं लोकप्रिय कला विधाओं को स्थान दिया गया है। इस प्रदर्शनी में अर्चना सिन्हा, मृणाल सिंह, मनु मीनाक्षी, साधना देवी, मिंकी दास, सविता कुमारी, प्रो. दिनेश कुमार, तृप्ति रानी, संजु दास, निभा लाभ, ममता भारती, संतोष कुमार, रामू कुमार, जितेन्द्र मोहन, अर्चना चौधरी, विनीता, प्रतीक प्रभाकर, ज्ञानती देवी, चारू वर्मा,  सोमा आनंद, मनोज चौधरी, संजय कुमार जायसवाल, अर्चना कुमारी, कंचन, नूतन लाभ, अमृता शांभवी, अन्नु झा सहित 35 से अधिक कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित होंगी। 

छठ चार दिनों का त्योहार है और इसमें साफ-सफाई का खास ध्यान रखा जाता है। इस त्योहार में गलती की कोई जगह नहीं होती। इस व्रत को करने के नियम इतने कठिन हैं, इस वजह से इसे महापर्व और महाव्रत के नाम से संबोधित किया जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है।  मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है। इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृदेवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं। वो बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है। 

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कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। दोनों की कोई संतान नहीं थी। इस बात से राजा और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गईं। नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ। इस बात का पता चलने पर राजा को बहुत दुख हुआ।  संतान शोक में वह आत्महत्या का मन बना लिया। लेकिन जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।  

देवी ने राजा को कहा कि मैं षष्ठी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया। राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा। छठ व्रत के संदर्भ में एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। 

हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार, छठ पूजा कार्तिक महीने के छठे दिन मनाई जाती है। लोग विशेष प्रसाद और अनुष्ठान करने के लिए गंगा के पानी को अपने घरों में भी ले जाते हैं। इस दिन घरों को अच्छी तरह से साफ किया जाता है। छठ के दूसरे दिन, जिसे खारना के नाम से भी जाना जाता है, में भक्तों को एक दिन का उपवास करना शामिल है, जो देर शाम को पृथ्वी माता की पूजा करने के बाद टूट जाता है। भगवान को चढ़ावे में चावल पुडिंग (खीर) और फल शामिल हैं, जो परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच वितरित किए जाते हैं। छठ का तीसरा दिन शाम के प्रसाद के लिए प्रसाद (प्रसाद) की तैयारी में जाता है, जिसे संझिया अर्घ्य भी कहा जाता है। चौथे और अंतिम दिन, परिवार के सदस्य और दोस्त सूर्योदय से पहले नदियों के तट पर जाते हैं और उगते सूरज को प्रसाद अर्घ्य देते हैं। इस अनुष्ठान के बाद, भक्त अपना उपवास तोड़ते हैं और पड़ोसियों और रिश्तेदारों को प्रसाद वितरित करते हैं।

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ज्ञातव्य हो की विगत वर्ष रोशनी का त्योहार, दीपावली को UNESCO की ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था। इसकी घोषणा 8-13 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली के लाल किले में आयोजित UNESCO की अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र में की गई। यह इस सूची में शामिल होने वाली 16वीं भारतीय विरासत है। इसे 194 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और UNESCO के वैश्विक नेटवर्क के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में अपनाया गया। रोशनी का यह त्योहार समुदायों द्वारा आगे बढ़ाई जाने वाली एक जीवंत परंपरा है, जिसे पीढ़ियों से लगातार नया रूप दिया जाता रहा है। यह सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है और विकास में योगदान देता है।

भारत के लिए दीपावली सिर्फ़ एक सालाना त्योहार नहीं है; यह करोड़ों लोगों की भावनाओं और संस्कृति से गहराई से जुड़ी एक जीवंत परंपरा है। हर साल, जब शहरों, गांवों और विदेशों में बसे भारतीयों के घरों में दीये जगमगाते हैं, तो दीपावली खुशी, नई शुरुआत और जुड़ाव की जानी-पहचानी भावना को फिर से जगाती है। यह लोगों को रुकने, याद करने और एक साथ आने के लिए प्रेरित करती है ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि क्यों यह त्योहार मानवता की अनमोल सांस्कृतिक परंपराओं में जगह पाने का हकदार है।

दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है, जो आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में आती है। दीपावली का मूल दर्शन सभी लोगों के लिए समृद्धि, नई शुरुआत और खुशहाली का जश्न मनाना है। इसका समावेशी स्वरूप अलग-अलग लोगों और समुदायों के बीच आपसी सम्मान और विविधता में एकता को बढ़ावा देता है; नतीजतन, इस त्योहार का कोई भी पहलू सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है। घरों, सड़कों और मंदिरों को ढेरों दीयों से रोशन किया जाता है, जिनसे निकलने वाली सुनहरी रोशनी अंधेरे पर उजाले और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होती है। बाज़ार रंग-बिरंगे कपड़ों और बारीक कारीगरी वाली हस्तशिल्प की चीज़ों से भरे होते हैं जो रोशनी में चमकते हुए त्योहार के माहौल को और भी शानदार बनाते हैं। शाम होते ही आसमान आतिशबाजी की शानदार रोशनी से जगमगा उठता है।

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