
लोधी एस्टेट (नई दिल्ली): राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश के आगमन के अलावे कोई भी वाहन मैक्स मूलर मार्ग से दाहिने हाथ के.के.बिरला के नाम से अंकित सड़क और उस सड़क के बाएं हाथ स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) मुख्यालय की ओर नहीं मुड़ी। किसी भी वाहनों का ‘हूटर’ नहीं बजा। प्रदेश की सांस्कृतिक गरिमा पर व्याख्यान देने वाले, तथाकथित रूप से स्वयं को ‘गरिमा बचाने का रक्षक’ कहे जाने वालों के लिए इससे ‘दुखद’ दृष्टान्त और कुछ नहीं हो सकता है।
चाहिए तो यह था कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड राज्यों – जहाँ ‘छठ महापर्व’ के रूप में मनाया जाता है – से निर्वाचित और चयनित होकर लोकसभा और राज्य सभा में बैठने वाले सांसदों के अलावे दिल्ली विधानसभा में ‘पूर्वांचल और छठ की राजनीति’ कर कुर्सी से चिपकने वाले विधायकगण, बिहार के कलाकारों द्वारा आयोजित चार-दिवसीय ‘अर्घ्य’ प्रदर्शनी अपनी उपस्थिति देकर कलाकारों के साथ-साथ इन्टैक के प्रयास का मनोबल बढ़ाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

लोकसभा में बिहार के 40 और राज्य सभा में 16 सांसदों (कुल: 56) का प्रतिनिधित्व है। जबकि उत्तर प्रदेश से लोकसभा में 80 और राज्य सभा में 31 सांसद (कुल: 111 सांसद) हैं। और झारखण्ड से 14 लोकसभा और 6 राज्य सभा (कुल: 20) सांसदों का प्रतिनिधित्व हैं। दिल्ली विधानसभा में कुल 70 स्थानों में कोई 30 स्थानों पर वैसे लोग बैठे हैं जो पूर्वांचल और छठ को आधार मानकर अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र में राजनीति करते हैं, मतदाताओं की मानसिकता पर हावी होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि 187 सांसदों और 30 विधायकों (कुल: 217 सांसदों/विधायकों) में एक फीसदी, यानी 2.17 फीसदी नेताओं की हूटर बजती गाड़ियां इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज मुख्यालय की ओर नहीं मुड़ी।

वैसे दिल्ली का यह इलाका यमुना पार के इलाके की चलता में, क़ुतुब मीनार से भी ऊँची ऊंचाई रखता है, लेकिन शायद लोगों ने छठ महापर्व की सांस्कृतिक गरिमा को नहीं समझ सके। यह अलग बात है कि बंगाल के दुर्गापूजा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी तौर पर यह चाहते हैं कि ‘छठ महापर्व यूनेस्को के सांस्कृतिक धरोहर सूची में अंकित हो।

घनश्याम दास बिरला के पुत्र कृष्ण कुमार बिरला (के.के.बिरला) के नाम अंकित 71-लोधी एस्टेट में विगत 28 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक चार दिवसीय ‘अर्घ्य’ प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। भारत में विरासत के प्रति जागरूकता और उसके संरक्षण को बढ़ावा देने को लेकर से 27 जनवरी 1984 में नई दिल्ली में ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ के नाम से एक सोसाइटी की स्थापना की गई थी। श्रीमती पुपुल जयकर ने 1984 में राजीव गांधी के साथ मिलकर इस संस्था को बनाने का विचार रखा और इसकी शुरुआत की। राजीव गांधी इस ट्रस्ट के पहले चेयरमैन बने। हालांकि इस पहल के पीछे पुपुल जयकर मुख्य सूत्रधार थीं, लेकिन ट्रस्ट को औपचारिक रूप से भारत की प्रमुख सांस्कृतिक हस्तियों, नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों के एक मुख्य संस्थापक समूह के साथ स्थापित किया गया था। इंटैक की पहली गवर्निंग काउंसिल में राजीव गांधी (पहले चेयरमैन), पुपुल जयकर, कपिला वात्स्यायन, एल. के. झा, एम. जी. के. मेनन, मार्तंड सिंह, राजीव सेठी, बी. के. थापर आदि शामिल थे।

आज इंटैक को दुनिया के सबसे बड़े विरासत संगठनों में से एक माना जाता है, जिसके देश भर में 228 से ज़्यादा चैप्टर हैं। यह सच है कि पिछले 42 सालों में, इंटैक ने न केवल हमारी प्राकृतिक और निर्मित विरासत, बल्कि अमूर्त विरासत के संरक्षण और बचाव में भी अहम भूमिका निभाई है।
और यह भी उतना ही सच है कि इन 42-वर्षों में शायद पहली बार इंटैक के राष्ट्रीय पदाधिकारियों के साथ-साथ बिहार चैप्टर के राज्य संयोजक श्री भैरव लाल दास, सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र, सुश्री मनीषा झा, सुश्री अलका दास और सैकड़ों महिला-पुरुष कलाकारों द्वारा एक सकारात्मक प्रयास किया गया जिससे न केवल सांस्कृतिक घरोहर के रूप में छठा महापर्व को यूनेस्को सूचि में अंकित करने की बात की गयी, बल्कि राष्ट्र के लिए एक गौरवशाली प्रयास की शुरुआत भी की गयी। दुर्भाग्य यह रहा कि एक दर्शक के रूप में भी इन नेताओं, अथवा केंद्र और राज्य सरकार में ऊँचे-ऊँचे सिंहासनों पर बैठे अधिकारी भी अपनी उपस्थिति दर्ज किये।

ज्ञातव्य है कि अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बिहार के कलाकार और इंटैक के लोग चाहते हैं कि इस सत्र में भारत का महान धार्मिक परंपरागत पर्व छठ यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज हो जाये। परन्तु नेताओं और अधिकारियों का क्या? वे तो मतदाताओं को ‘ज्ञान को बुटी’ पिलाने में पीछे नहीं रहते, खासकर चुनाव के समय। भारत में औसतन 15 करोड़ लोग, महिला-पुरुष इस पर्व को मानते हैं, शामिल होते हैं।

बिहार अथवा पूर्वांचल के नेताओं पर, जो छठ महापर्व को राजनीतिक बाजार में बेचकर, मतदाताओं की मानसिकता के साथ कबड्डी खेलकर दिल्ली विधानसभा में बैठते हैं, बैठे हैं – आप तनिक भी भरोसा नहीं कर सकते हैं। दिल्ली के सिकंदर लोधी के नाम से अंकित लोधी एस्टेट परिसर में स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज मुख्यालय में संपन्न चार-दिवसीय ‘अर्घ्य’ प्रदर्शनी समारोह गवाह है।

दिल्ली में पूर्वांचली वोटरों की संख्या लगभग 40 से 43 लाख से ज़्यादा है, जो दिल्ली के कुल वोटरों का लगभग 25% से 33% (और अनुमानों के अनुसार 40% तक) हिस्सा हैं। विगत विधानसभा के चुनाव में, जिसमें करीब दो-दशक बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, पूर्वांचल के कई उम्मीदवार जीते हैं। चंदन कुमार चौधरी संगम विहार से 344 वोटों से जीते हैं। सतीश उपाध्याय मालवीय नगर से 2131 वोटों से जीते हैं। कपिल मिश्रा करावल नगर से 23355 वोटों से जीते हैं। बीजेपी के अभय वर्मा लक्ष्मी नगर से 11542 वोटों से जीते हैं। बीजेपी उम्मीदवार पंकज सिंह विकासपुरी से 12876 वोटों से जीते हैं। संजीव झा बुराड़ी से 20,601 वोटों से जीते हैं। अनिल झा किराड़ी से 21,871 वोटों से जीते हैं। गोपाल राय बाबरपुर से 18,994 वोटों से जीते हैं।

इन 70 सीटों में से लगभग 20 सीटों पर पूर्वांचल के मतदाताओं के कारण ही जीते। यही वजह है कि सभी राजनीतिक पार्टियां शुरू से ही पूर्वांचल-बहुल सीटों पर पूर्वांचल के उम्मीदवारों को मैदान में उतारती रही हैं। दिल्ली विधानसभा में ऐसी कई सीटें हैं जहां पूर्वांचल के वोटर नतीजों पर बड़ा असर डालते हैं। बुराड़ी, बादली, किराड़ी, नांगलोई, मॉडल टाउन, जनकपुरी, विकासपुरी, उत्तम नगर, द्वारका, मटियाला, पालम, राजेंद्र नगर, देवली, संगम विहार, बदरपुर, पटपड़गंज, लक्ष्मी नगर, सीमापुरी, गोकुलपुरी और करावल नगर ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां पूर्वांचल के लोग राजनीतिक पार्टियों की जीत-हार तय करते हैं।

पूर्वांचल के वोटरों में बिहार, बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों और झारखंड के लोगों का एक बड़ा समूह दिल्ली की राजनीति को प्रभावित करता है। एक अनुमान के मुताबिक, पूर्वांचल के वोटरों की आबादी 43 लाख से ज़्यादा है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में 25 फ़ीसदी से ज़्यादा वोटर पूर्वांचल से हैं।

दुर्भाग्यवश, पूर्वांचल के नेता अथवा मतदाता, जो छठ के समय मतों की राजनीति करने में कोई कोताही नहीं करते। विश्वास नहीं हो तो आगामी महीने में संपन्न होने वाले छठ पूजा में देख का गवाह बन जाएँ। क्योंकि यमुना नदी खराब हो चुके बहते पानी वाले इकोसिस्टम का एक आम उदाहरण है। इंसानी गतिविधियों और बढ़ते प्रदूषण के कारण दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यह नदी एक सीवेज नाले में बदल गई है। इस नदी में होने वाले कुल प्रदूषण के लिए अकेले दिल्ली 79% ज़िम्मेदार है। नालों से रोज़ाना सैकड़ों टन बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड वाला कचरा नदी में गिरता है।

प्रदूषण कम नहीं हो पाता क्योंकि मॉनसून के अलावा बाकी महीनों में नदी में पानी का बहाव बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता। पानी की गुणवत्ता इंडेक्स से पता चलता है कि दिल्ली में घुसने से पहले नदी के पानी की क्वालिटी ठीक-ठाक होती है, लेकिन दिल्ली में यह बहुत ज़्यादा प्रदूषित हो जाती है और इसकी क्वालिटी बहुत खराब हो जाती है, जो आगरा नहर तक ऐसी ही बनी रहती है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की गलत जगह और ट्रीटमेंट क्षमता और असल में पैदा होने वाले सीवेज के बीच तालमेल न होने की वजह से लगभग 60% बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी यमुना नदी में मिल जाता है।

परन्तु इतना होने के बाद भी प्रदेश के नेतागण, चाहे मंत्रिमंडल में बैठे हों अथवा नहीं, छठ महापर्व के आगमन के पूर्व से ही छठ के डाले और कोनिया पर राजनीतिक खेला शुरू कर देते हैं। मतदाताओं की मानसिकता को अपने वश में करने के उद्देश्य से इस प्रदूषित यमुना में छलांग लगाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते, ताकि अख़बारों के पन्नों पर, टीवी के स्क्रीनों पर उनका चेहरा चकमकाते रहे। दिल्ली में लगभग 40 लाख पूर्वांचली वोटर हैं, जो राजधानी क्षेत्र के कुल वोटरों का 25 प्रतिशत हैं। गौरतलब है कि बीजेपी का दिल्ली में एक अलग विंग के तौर पर ‘पूर्वांचल मोर्चा’ भी है। दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले पूर्वांचली वोटरों की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी हालिया चुनावी रैली में उनके मुद्दों का ज़िक्र किया था।

बहरहाल, पूर्वांचल और छठ की राजनीति का गवाह है 1993 में लाल बिहारी तिवारी, कीर्ति आज़ाद और परवेज़ हाशमी विधायक बने। 1998 के विधानसभा चुनावों में परवेज़ हाशमी, मीरा भारद्वाज और महाबल मिश्रा जीते। 2009 के लोकसभा चुनावों में महाबल मिश्रा पश्चिमी दिल्ली से लोकसभा पहुँचे। 2014 से 2024 के लोकसभा चुनावों के बीच, मनोज तिवारी ने बीजेपी की ओर से तीन बार संसदीय चुनाव जीता। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 2022 के एक लेख में बताया गया है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग (जिन्हें पूर्वांचली कहा जाता है) शहर की 70 विधानसभा सीटों में से 16 पर संख्या के हिसाब से अन्य समुदायों से ज़्यादा हैं और शहर की कुल आबादी का 30% हिस्सा हैं। कई दशकों तक दिल्ली की राजनीति में जाटों, पंजाबी खत्रियों और ब्राह्मणों का दबदबा रहा। संख्या के हिसाब से, सभी जातियों के पंजाबी मूल के लोग दिल्ली की कुल आबादी का कम से कम 35% से 40% हिस्सा माने जाते हैं। इनमें ज़्यादातर हिंदी बोलने वाले पंजाबी हिंदू हैं, जबकि एक बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग पंजाबी बोलने वाले सिखों का है।















