इंटैक-बिहार चैप्टर द्वारा छठ महापर्व को यूनेस्को के सांस्कृतिक धरोहर सूची में अंकित करने के लिए एक प्रयास, चार-दिवसीय प्रदर्शनी का उद्घाटन दिल्ली में

'अर्घ्य' प्रदर्शनी का उद्घाटन के अवसर पर राज्य सभा के उप-सभापति हरिवंश जी के साथ बिहार के कलाकार

* द्वार के छेकाई देके – पहिले चुकइयौ हे दुलरुआ भैया – तब जहियौ कोहबर अपन, हे दुलरुआ भैया

* खेलs चलली भौजी संग सहेली भैय्या जीवsहो / चुगला-चुगली

* पहिले पहिल हम कईनी, छठी मईया व्रत तोहार – करिहा क्षमा छठी मईया, भूल-चूक गलती हमार / सकल जगतारिणी हे छठि मैय्या – सभक शुभकारिणी हे छठि मैया / दुखवा मिटाईं छठी मईया

लोधी एस्टेट (नई दिल्ली) : इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार की गली-कूचियों से, पोखरों-तालाबों के रास्ते गंगा के किनारे करोड़ों व्रती द्वारा डूबते और उगते सूर्य को अर्ध्य देने की अनंत कालीन परंपरा आज अगर नई दिल्ली स्थित भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत ट्रस्ट कार्यालय में प्रदर्शनी के रूप में आया है, तो उसके पीछे दिवंगत शारदा सिन्हा का हाथ अवश्य है। अगर शारदा सिन्हा छठ के गीतों को गाकर गाँव से अंतर्राष्ट्रीय मंच तक नहीं लाती, तो शायद आज यूनेस्को के सांस्कृतिक धरोहर सूची में अंकित होने के लिए यह प्रयास नहीं होता। आप माने या नहीं माने आपकी मर्जी।

लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि अगर बिहार के गीतकार, चाहे कपिल देव ठाकुर ‘स्नेहलता’ हों, या डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’ हों या हृदय नारायण झा हों, छठ महापर्व और सूर्यदेव की उपासना को शब्द बद्ध नहीं करते, तो न शारदा सिन्हा ‘लोकगायिका’ बन पाती, न छठ ‘महापर्व’ से ‘मानवीय’ पर्व बन पाता और ना ही आज यूनेस्को सूची में अंकित होने के लिए नई दिल्ली आ पाता। आप माने या नहीं माने आपकी मर्जी।

उससे से बड़ी बात यह है कि अगर भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत ट्रस्ट के बिहार चैप्टर के दो महारथियों – बिहार प्रदेश संयोजक भैरव लाल दास और प्रदेश के सह-संयोजक डॉ शिव कुमार मिश्र – का योगदान नहीं होता तो शायद आज आज दिल्ली में इस निमित्त कार्यक्रम भी नहीं होता। कलाकार तो सर्वोपरि हैं ही। आप स्वीकार करें या नहीं करें आपकी मर्जी।

क्योंकि बिहार सरकार, सरकार का कला और संस्कृति मंत्रालय, मंत्रालय में बैठे नेताजी, मंत्री और अधिकारी-पदाधिकारी छठ पर्व के मामले में, यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में अंकित करने के लिए कितने आतुर थे, यह सरकार के द्वारा कभी बिहार भ्रमण सम्मेलन नहीं करने वाली मोहतरमा को सरकारी कमिटी का अध्यक्ष बनाकर स्पष्ट हो गया था पिछले साल। आप स्वीकार करें या नहीं करें, आपकी मर्जी । यह कार्य पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में हुआ था। इसलिए ‘छठ महापर्व’ को राजनीति में न घसीटें, छठ के डाला पर राजनीतिक रोटियां नहीं सकें। कला और कलाकार को अपने हल पर छोड़ दें – अन्यथा सब ठेकुआ और भुसबा बन जायेगा। खैर।

अर्घ्य’ प्रदर्शनी का उद्घाटन करते राज्य सभा के उप-सभापति हरिवंश जी

1915 के काल खंड में भारत में तीन प्रमुख घटनाएं घटी थी जो आज ही नहीं, आने वाले सैकड़ों-वर्षों तक भारत के इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगी – चाहे केंद्रीय सत्ता के सिंहासन पर किसी भी राजनीतिक पार्टी का कब्ज़ा हो। सन 1915 के 9 जनवरी को, मोहनदास करम चंद गांधी और कस्तूरबा दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आये थे। उनका भारत वापस आने के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक नए दौर में प्रवेश किया। गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर, गांधी ने सक्रिय क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संघर्षों में शामिल होने से पहले, देश की ज़मीनी हकीकत को समझने के लिए अपना पहला साल पूरे भारत की यात्रा में बिताया।

इसी 1915 के काल खंड में ब्रिटिश सरकार ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों को रोकने के लिए यह आपातकालीन कानून पारित किया जो डिफेंस ऑफ़ इंडिया एक्ट 1915 के नाम से कुख्यात हुआ। 1915 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बॉम्बे अधिवेशन हुआ था जिसमें पार्टी के नियमों में बदलाव किया गया ताकि बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व वाले चरमपंथी गुट को फिर से शामिल किया जा सके। तिलक का आना न केवल पार्टी के आतंरिक मतभेदों को दूर किया, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन का संगठनात्मक ढांचा भी मजबूत हुआ।

‘अर्घ्य’ प्रदर्शनी में इंटैक का अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर दीप प्रज्वलित करते

और 1915 में ही तत्कालीन भारतीय सिविल सर्विस के वरिष्ठ अधिकारी विनायक मेहता और श्रीमती इरावती मेहता के कल के यूनाइटेड प्रोविंस और आज के उत्तर प्रदेश के इटावा शहर के घर एक बेटी – पुपुल मेहता – का भी जन्म हुआ था। सुश्री पुपुल एक भाई – कुमारिल मेहता – और चार बहनें – पूर्णिमा, प्रेमलता, अमरगंगा और नंदनी – थी। वैसे यूनाइटेड प्रोविंस का इटावा अपने वाइल्डलाइफ़ कंजर्वेशन साइट्स – इटावा सफ़ारी पार्क- 1857 के विद्रोह में उसकी ऐतिहासिक भूमिका और यमुना तथा चंबल नदियों के प्राकृतिक संगम के लिए मशहूर है। लेकिन लोग माने अथवा नहीं, इटावा आज भी विनायक मेहता-श्रीमती इरावती मेहता की बेटी पुपुल मेहता के कारण भी जाना जाता है।

‘अर्घ्य’ प्रदर्शनी में इंटैक के क्यूरेटर मनीषा झा और सुश्री बिंदु मनचंदा दीप प्रज्वलित करती

कल दिल्ली सल्तनत के लोधी वंश, खासकर सिकंदर लोधी के नाम से अंकित लोधी एस्टेट में स्थित भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत ट्रस्ट के राष्ट्रीय कार्यालय में राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश को ‘अर्घ्य’ के नाम से अंकित चार-दिवसीय प्रदर्शनी में अपना जूता खोलकर शुभारम्भ का दीप प्रज्वलित करते, फिर बाद में मंच से छठ की सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक महत्व को शब्दार्थ करते सुना, तो श्रीमती पुपुल जयकर याद आ रही थी। वैसे बिना किसी राजनीतिक भेदभाव को बीच में लाये हरिवंश ने भी पुपुल जयकर, राजीव गाँधी, एल.के.झा, जी.के मेनन, मार्तण्ड सिंह आदि का नाम लेने में तनिक भी संकुचित नहीं हुए; लेकिन उसी क्षण इसे भी शब्दार्थ करने में कोताही नहीं किये कि “इंटैक के इस प्रयास से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहर सूची में दर्ज करने सम्बन्धी प्रयास को मदद मिलेगा।”

‘अर्घ्य’ प्रदर्शनी में इंटैक के अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर, बिहार इंटैक के प्रमुख बी.एल.दास, दस क्यूरेटर मनीषा झा और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी

इंटैक द्वारा नई दिल्ली में आयोजित “अर्घ्य” प्रदर्शनी का शुभारंभ करते हुए राज्यसभा के सभापति हरिवंश ने कहा कि छठ हमारी महत्वपूर्ण अमूर्त सांस्कृतिक विरासत है और अब उसका वैश्विक प्रसार हो चुका है। उन्होंने छठ के साथ अपनी व्यक्तिगत यादों को भी ताजा किया और कहा कि बचपन में उन्होंने छठ के लिए भिक्षाटन भी किया है। छठ महापर्व में भारत की सांस्कृतिक और सनातन परम्परा की स्पष्टत परिलक्षित होती है। 53 कलाकारों के समूह द्वारा लगभग 78 कलाकृतियों का इस तीन दिवसीय प्रदर्शनी में प्रदर्शित हैं। इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज की ओर से 28 सितंबर से 01 अक्टूबर तक चार दिवसीय भव्य प्रदर्शनी पूरी तरह से बिहार के लोक जीवन, रीति-रिवाजों और पवित्र छठ पूजा के आध्यात्मिक दर्शन पर केंद्रित है।

कहते हैं कि आज़ादी के कोई 12 वर्ष पहले, सन 1936 के काल खंड में ब्रितानिया हुकुमतानों ने तत्कालीन वायसराय के आवास से कुछ किलोमीटर दूर एक पार्क बनाया। करीब 90-एकड़ भूखंड में फैले इस पार्क में अपने पिता सिकंदर लोधी के सम्मानार्थ उनका पुत्र इब्राहिम लोदी 1517-1518 में एक बेहतरीन मकबरा बनाया था। उस मकबरे के आस -पास पहले से ही शीश गुम्बद और बड़ा गुम्बद विराजमान था जो लोधी वंश के ही लोगों का मकबरा है। सन 1936 में जब यहाँ पार्क बना तो उसका नाम ‘लेडी विलिंग्डन पार्क’ रखा गया। आज़ादी के 80-वर्ष बाद आज भी इस पार्क के प्रवेश द्वार पर लेडी विलिंग्डन का नाम अंकित है। जब देश आज़ाद हुआ तब लोधी वंश के मकबरों का ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इस पार्क का नाम लोधी गार्डन और पूरे इलाके का नाम लोधी एस्टेट पड़ा।

एक कलाकार के साथ कलाकार के साथ हरिवंश जी

आज़ादी के बाद 1948 में जब यूनेस्को का क्षेत्रीय कार्यालय खुलने की बात हुई, लोधी एस्टेट में ही खोला गया। इसके दस साल बाद 1958 में तत्कालीन उप-राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन और जॉन डी.रॉकफेलर III के विचार से यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय के सामने ही इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का शिलान्यास जापान के तत्कालीन प्रिंस अकिहितो द्वारा किया गया। आर्किटेक्ट जोसेफ एलन स्टीन द्वारा डिज़ाइन किया गया आईआईसी बिल्डिंग कॉम्प्लेक्स 1962 में बनकर तैयार हुआ और आधिकारिक तौर पर उसका उद्घाटन किया गया। इसे देश के प्रमुख सांस्कृतिक संस्थानों में से एक माना जाता है ।

कहते हैं कि यह दुनिया के अलग-अलग समुदायों और संस्कृतियों के बीच आपसी समझ और भाईचारे को बढ़ावा देने के मकसद से बौद्धिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए एक जीवंत मंच के तौर पर काम करता है। वैसे आप माने या नहीं, यह विषय एक गहन शोध का विषय है। इसके अलावे लोधी एस्टेट में दर्जनों संस्थाओं का कार्यालय, मुख्यालय है। साथ ही, इस सम्पूर्ण क्षेत्र में देश की राजनेताओं का, नौकरशाहों का, व्यवसायिओं का कई सौ आवास है। यह इलाका देश के “आम लोगों के लिए” चाहे वे कला, संस्कृति, पुरातत्व, गीत-संगीत में महारथ ही क्यों न हों, कागज पर भले आवागमन का रास्ता दीखता हो, व्यावहारिक रूप से यह पहुँच से बहार है। यदि पहुँच है भी तो ‘हिंदी दिवस’, ‘हिंदी सप्ताह’ अथवा ‘हिंदी पखवाड़ा ‘ जैसा ही। खैर।

एक कलाकार के साथ कलाकार के साथ हरिवंश जी

अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। सूत्रों के अनुसार इस सत्र में भारत का महान धार्मिक परंपरागत पर्व छठ यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज हो, इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘प्रयत्नशील’ हैं और उनकी उसी प्रयत्नशीलता को मजबूत बनाने के लिए इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज बिहार चैप्टर से लेकर दिल्ली मुख्यालय तक प्रयत्नशील है।

वजह भी है। भारत में औसतन 15 करोड़ लोग, महिला-पुरुष इस पर्व को मानते हैं, शामिल होते हैं। बिहार के कल के दरभंगा जिला और आज के मधुबनी जिला में 1970 को जन्म लीं क्यूरेटर मनीषा झा के अनुसार छठ पूजा भारत के सबसे पुराने और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है, जिसे गहरी श्रद्धा और सांस्कृतिक समृद्धि के साथ मनाया जाता है। मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाने वाला यह त्योहार सूर्य देव और छठी मैया (बच्चों की रक्षा करने और परिवारों को आशीर्वाद देने वाली देवी) को समर्पित है। समय के साथ, छठ क्षेत्रीय सीमाओं से आगे बढ़ गया है और अब पूरे भारत और दुनिया भर में बसे भारतीय समुदायों द्वारा समान उत्साह के साथ मनाया जाता है।

भारत की अन्य यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासतें हैं – कुटियाट्टम (संस्कृत थिएटर) (2008), वैदिक मंत्रोच्चार की परंपरा (2008), रामलीला (रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन) (2008), रम्माण, भारत के गढ़वाल हिमालय के धार्मिक उत्सव और परंपरा का मंचन (2009, छऊ नृत्य (2010), कालबेलिया लोक गीत और नृत्य (राजस्थान) (2010),मुडियेट्टू (केरल) का अनुष्ठान थियेटर और नृत्य नाटक (2010), लद्दाख का बौद्ध जप: हिमालयी लद्दाख क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर, भारत में पवित्र बौद्ध ग्रंथों का पाठ ((2012), मणिपुर का संकीर्तन, अनुष्ठान गायन, ढोलक बजाना और नृत्य करना (2013), जंडियाला गुरु, पंजाब, भारत के ठठेरों के बीच पारंपरिक तौर पर पीतल और ताँबे के बर्तन बनाने का शिल्प (2014), नवरोज (2016), योग (2016), कुंभ मेला (2017), कोलकाता की दुर्गा पूजा (2021), गुजरात का गरबा (2023), और रोशनी का त्योहार, दीपावली (2024)।

पारंपरिक रूप से मिथिला पेंटर और साथ ही आर्किटेक्ट, प्लानर, इंटीरियर डिज़ाइनर, बुक इलस्ट्रेटर और लेखिका मनीषा झा, जो ‘मधुबनी आर्ट सेंटर’ की संस्थापक भी है, का कहना है कि छठ पूजा अपनी सादगी और पवित्रता में अनोखी है, जो पूरी तरह से प्रकृति पूजा, अनुशासन और कृतज्ञता पर केंद्रित है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, इसकी जड़ें वैदिक काल से जुड़ी हैं जब प्राकृतिक शक्तियों की पूजा दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। ऋग्वेद में सूर्य को समर्पित मंत्र हैं, और महाभारत में कुंती और द्रौपदी द्वारा सूर्य पूजा का उल्लेख है, जो यह बताता है कि छठ हिंदू संस्कृति की सबसे पुरानी निरंतर चलने वाली परंपराओं में से एक है। यह लंबा ऐतिहासिक अतीत त्योहार को कालातीत और पवित्र प्रमाणिकता का एहसास दिलाता है।

महिलाओं की आर्थिक आजीविका के लिए जागरूकता पैदा करके और बेहतरीन कलाकृतियाँ बनाकर समृद्ध लोक कला परंपराओं को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य करने वाली मनीषा झा, जिससे कला और कलाकार दोनों जीवित और जीवंत रह सके, कहती है: “यह त्योहार चार दिनों तक चलता है, जिसमें हर दिन कड़े रीति-रिवाज और गहरे प्रतीकात्मक अर्थ होते हैं। पहला दिन, “नहाय-खाय,” पवित्र स्नान के साथ शुरू होता है, जिसके बाद शुद्ध, सात्विक भोजन तैयार किया जाता है। दूसरे दिन, “खरना,” भक्त शाम तक बिना पानी के उपवास रखते हैं और फिर गुड़ की खीर और फलों का भोग लगाकर व्रत खोलते हैं। इसके बाद अटूट निष्ठा के साथ 36 घंटे का निर्जला उपवास (बिना पानी के व्रत) शुरू होता है, जो भक्ति की असली परीक्षा होती है। तीसरा दिन, “संध्या अर्घ्य,” समुदायों को नदी के किनारों और तालाबों पर एक साथ लाता है ताकि वे डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दे सकें; यह विनम्रता और जीवन के बदलावों को स्वीकार करने का प्रतीक है। अंतिम दिन, “ऊषा अर्घ्य,” में उगते सूर्य की पूजा की जाती है, जो आशा, नई शुरुआत और जीवन के चक्र का प्रतीक है। सुबह के अर्घ्य के बाद, ठेकुआ, फल और गन्ना जैसे प्रसाद के साथ व्रत खोला जाता है।

धार्मिक आस्था के अलावा, छठ पूजा का गहरा सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी है। यह त्योहार साफ़-सफ़ाई, पवित्रता और पर्यावरण के अनुकूल होने पर ज़ोर देने के लिए जाना जाता है। सभी प्रसाद घर पर प्राकृतिक चीज़ों से तैयार किए जाते हैं, और रीति-रिवाजों में बांस की टोकरियाँ, मिट्टी के बर्तन, मिट्टी के दीये और पारंपरिक सूप जैसी पर्यावरण के अनुकूल चीज़ों का इस्तेमाल होता है। छठ का सामुदायिक पहलू भी बहुत खास है; अलग-अलग जातियों, बैकग्राउंड और आर्थिक वर्गों के लोग घाटों पर एक साथ आते हैं, जिससे एकता और सामूहिक भावना का पता चलता है। पारंपरिक लोक गीत, स्थानीय पकवान और हज़ारों दीयों की शांत रोशनी एक ऐसा आध्यात्मिक माहौल बनाती है जो लोगों, परिवारों और पूरे समुदायों को जोड़ता है।

दिलचस्प बात यह है कि छठ के रीति-रिवाजों का वैज्ञानिक महत्व भी है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पानी में खड़े होने से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, और धूप में रहने से विटामिन डी और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। व्रत रखने और गहरी साँस लेने के अभ्यास से शरीर से ज़हरीले तत्व बाहर निकलते हैं, जिससे यह त्योहार आध्यात्मिकता और स्वास्थ्य का एक बेहतरीन मेल बन जाता है। आज की दुनिया में भी छठ पूजा पूरी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। भारत भर के शहरों में सुरक्षित, कृत्रिम घाट बनाए जाते हैं, और सरकारी एजेंसियाँ साफ़-सफ़ाई और सुरक्षा का ध्यान रखती हैं। आधुनिक बदलावों के बावजूद, यह त्योहार अपने मूल रूप में सरल बना हुआ है। चाहे इसे गंगा के किनारे मनाया जाए या विदेशों की दूर-दराज़ नदियों के किनारे, छठ पवित्रता, कृतज्ञता और प्रकृति के साथ तालमेल का अपना मूल संदेश बनाए रखता है।

श्रीमती झा कहती है कि ‘अर्घ्य’ बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और उसकी जीवंत कलात्मक परंपराओं का उत्सव है। पूरे राज्य से 53 कलाकारों को एक साथ लाने वाली यह प्रदर्शनी एक खास घटना है – अपनी तरह की पहली ऐसी प्रदर्शनी जहाँ लोक कला और समकालीन कला के कलाकार एक ही विषय पर मिलकर काम कर रहे हैं। इस मेल-मिलाप के ज़रिए, ‘अर्घ्य’ विरासत और आधुनिकता, निरंतरता और नवाचार के बीच चल रही जीवंत बातचीत को उजागर करता है।

उनका मानना है कि बिहार की कला सदियों पुरानी दृश्य-भाषाओं पर आधारित है, जो स्थानीय मान्यताओं, रीति-रिवाजों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से आकार लेती रही हैं। यह प्रदर्शनी इन परंपराओं की एक अद्भुत विविधता पेश करती है, जिसमें मिथिला पेंटिंग, मंजूषा कला, टिकुली कला, गोदना कला, पटना कलम, सुजनी कढ़ाई, जशोदा कला, सिक्की कला, पेपर-मैशे, भोजपुरी कला, टेराकोटा मूर्तियां और कई तरह की समकालीन कला शैलियां शामिल हैं। इस प्रदर्शनी में पेंटिंग, क्रोशिया का काम और फोटोग्राफी भी शामिल है, जो इस क्षेत्र के बढ़ते रचनात्मक दायरे को दिखाती है।

इन अलग-अलग कला रूपों को एक साथ लाकर, ‘अर्घ्य’ दर्शकों को यह देखने के लिए आमंत्रित करता है कि कैसे पारंपरिक कला-रूप समकालीन कलाकारों के हाथों में नए अर्थ पाते हैं, और कैसे आधुनिक सौंदर्यबोध गहरी जड़ों वाली लोक कलाओं के साथ मिलकर उन्हें समृद्ध कर सकता है। पुरानी और नई कला के बीच का यह संवाद बिहार की बदलती भावना को दर्शाता है – जो अपनी विरासत से गहराई से जुड़ी है, फिर भी लगातार नए विचारों को अपना रही है। यह प्रदर्शनी न केवल बिहार की कलात्मक गहराई का सम्मान करती है, बल्कि सहयोग, समुदाय और साझा सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की भावना का भी जश्न मनाती है। ‘अर्घ्य’ यहाँ के कलाकारों की रचनात्मक जीवंतता और इस क्षेत्र की सदाबहार सांस्कृतिक समृद्धि को एक श्रद्धांजलि है।

अंत में श्रीमती झा कहती हैं: “छठ पूजा सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है; यह एक गहरा आध्यात्मिक अनुशासन और मानवता का उत्सव है। इसके रीति-रिवाज सदाबहार मूल्यों, आस्था, समर्पण, आत्म-नियंत्रण और पर्यावरण के प्रति सम्मान को दर्शाते हैं। छठ भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक शानदार उदाहरण है, जो हमें याद दिलाता है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, बल्कि सादगी, ईमानदारी और कृतज्ञता में होती है। इसलिए हम सभी मिलकर एक कोशिश कर रहे हैं कि छठ महापर्व को यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहर सूची में स्थान मिले।”

ज्ञातव्य हो कि बिहार सरकार का कला और संस्कृति विभाग पिछले वर्ष छठ पूजा को यूनेस्को की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ सूची में शामिल करने की कोशिशों में तेज़ी देने के लिए, राज्य के कला और संस्कृति विभाग ने ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ को अपना नॉलेज पार्टनर बनाया है। इससे दुखद बात और क्या हो सकती है। बिहार सर्कार का यह निर्णय इस बात का परिचायक है कि कला और संस्कृति विभाग और विभाग के लोग इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ और उसके लोगों को अपने से नीचे समझा।

सरकारी आदेशानुसार इस प्रस्ताव से ज़रूरी विस्तृत दस्तावेज़ तैयार करने में मदद मिलेगा। सूत्रों के मुताबिक, कोलकाता की दुर्गा पूजा की तरह ही छठ को भी यूनेस्को की सूची में देखना चाहती है बिहार सरकार। लेकिन जब सरकारी आदेश में नई दिल्ली स्थित ‘इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स’ के शिक्षाविदों की एक कमेटी बनाई गयी और कमेटी की अध्यक्षता करने का जिम्मा इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कल केंद्र की क्षेत्रीय निदेशक ऋचा नेगी को दिया गया, तो ‘सोच में सुखाड़ वहीँ दिखा गया। बिहार सरकार द्वारा प्रदेश के बाहर के लोगों को प्रदेश के अंदर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक विरासतों के बारे में पड़ताल करने की जबाबदेही देना ‘डंडे से घास काटने जैसा ही है।’ यह सरकारी स्तर पर प्रदेश के नेताओं और अधिकारियों का, कला और संस्कृति विभाग के लोगों की मानसिकता को भी दिखता है। खैर।

डॉ. नेगी की इस दिशा में नकारात्मक पहल के मद्दे नजर इंटेक का बिहार चैप्टर विगत साल पहले पटना में 11 अक्टूबर को इस विषय पर एक अन्तराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जिसमें करीब 15 से 20 विभिन्न देशों के विद्वान और श्रद्धालु शामिल उपस्थित हुए। इसमें शिकागो की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और जाने-माने मूर्तिकला विशेषज्ञ रॉब लिनरोथ के भी शामिल हुए थे। इतना ही नहीं, इंटेक ने छठ पूजा के दौरान शानदार तस्वीरें लेने के लिए ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन फोटोग्राफर्स’ की ओर से एक इंटरनेशनल फोटोग्राफी कार्यक्रम का भी आयोजित किया था।

अब तक इंटक का बिहार चैप्टर मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, आदि भाषाओँ में गाये गए 77 लोक गीतों का संकलन तैयार किया है। साथ ही, चुकी छठ और छठ का अर्घ्य सूर्य से सम्बंधित है, इसलिए इंटैक के तत्वावधान में अब तक प्रदेश के 145 सूर्य की मूर्तियों डाक्यूमेंटेशन भी किया है जो संभवतः यूनेस्को की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ सूची में शामिल करने के प्रयास में अहम् भूमिका अदा करेगा। इसके अतिरिक्त यूनेस्को को सौंपे जाने वाले डॉज़ियर में शामिल करने के लिए छठ से जुड़ी चीज़ें — जैसे मूर्तियां, पेंटिंग, लेख, लोक गीत और तस्वीरें — भी एकत्रित की जा रही है।

बहरहाल, कल इंटैक के अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर ने स्वागत संबोधन में कहा कि 1984 ई. में स्थापित इंटैक का मुख्य उद्देश्य भारत के मूर्त एवं अमूर्त विरासतों का संरक्षण है। इंटैक के हेरिटेज क्राफ्ट एंड कम्युनिटी डिवीज़न के प्रमुख सुश्री बिंदु मनचंदा का कहना है कि हमारा काम हमारी विशाल और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत को बचाना, उसकी रक्षा करना और उसे बढ़ावा देना है। इसी खास वजह से मेरा विभाग – ‘हेरिटेज क्राफ्ट एंड कम्युनिटी डिवीज़न’ – लगातार काम कर रहा है। हमने ‘छठ प्रदर्शनी’ का आयोजन इसलिए किया क्योंकि हमें लगा कि यह अनोखा त्योहार – जो सदियों से पूरी दुनिया को सबको साथ लेकर चलने, विरासत को बचाने और प्रकृति का सम्मान करने का संदेश देता है – उससे जुड़ी कला और शिल्प के ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचना चाहिए।

पीले वस्त्र में छठ के गीतकार ह्रदय नारायण झा और इंटैक के अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर के साथ गायिका

उनका कहना है: “व्यक्तिगत रूप से मुझे यह भी लगता है कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान को उतना महत्व नहीं मिला है जितना मिलना चाहिए; और यह राज्य, जिसकी गहरी दार्शनिक जड़ें और समृद्ध विरासत है, उसे सबके सामने लाया जाना चाहिए। यह प्रदर्शनी इंटैक की ओर से उसी दिशा में उठाया गया एक कदम है। हम अपने बिहार चैप्टर और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर इस अनोखे त्योहार को यूनेस्को की धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए काम करेंगे।”

ज्ञातव्य हो कि थियोसोफिस्ट एनी बेसेंट द्वारा वाराणसी में स्थापित स्कूल से शिक्षा की शुरुआत करने वाली पुपुल मेहता, जो बाद में तत्कालीन बैरिस्टर मनमोहन जयकर से विवाहोपरांत पुपुल जयकर बनीं, 1936 में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से स्नातक की थी। उनके पिता का इलाहाबाद में स्थानान्तरण होने के कारण वे अल्पायु में ही नेहरू परिवार के संपर्क में आयी। उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के मित्र थे।

देश को आज़ाद होने के कोई तीन वर्ष बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, सं 1950 में, पुपुल जयकर को भारत के हथकरघा क्षेत्र का अध्ययन करने और इसके पुनरुद्धार की योजनाएँ बनाने के लिए आमंत्रित किया। बाद में, उन्होंने ‘ऑल-इंडिया हैंडलूम बोर्ड’ और ‘हैंडीक्राफ्ट्स एंड हैंडलूम एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन’ की अध्यक्ष के रूप में काम किया और मधुबनी पेंटिंग को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत की ‘संस्कृति की ज़रीना'” कही जाने वाली पुपुल जयकर 1956 में ‘नेशनल क्राफ्ट्स म्यूज़ियम’ और 1984 में ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ की स्थापना की, ताकि स्मारकों को बहाल और प्रबंधित किया जा सके और विरासत संपत्तियों के संरक्षण की वकालत की जा सके। वह 1985 में स्थापित ‘इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स’ की संस्थापक और ट्रस्टी थीं, और 1990 में उन्होंने नई दिल्ली में ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी’ की स्थापना की।

जिस सपने – भारत में विरासत के प्रति जागरूकता और उसके संरक्षण को बढ़ावा देने – को लेकर से 27 जनवरी 1984 में नई दिल्ली में ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ के नाम से एक सोसाइटी की स्थापना की गई थी, आज इंटैक को दुनिया के सबसे बड़े विरासत संगठनों में से एक माना जाता है, जिसके देश भर में 228 से ज़्यादा चैप्टर हैं। पिछले 40 सालों में, इंटैक ने न केवल हमारी प्राकृतिक और निर्मित विरासत, बल्कि अमूर्त विरासत के संरक्षण और बचाव में भी अहम भूमिका निभाई है।

जयकर ने 1984 में राजीव गांधी के साथ मिलकर इस संस्था को बनाने का विचार रखा और इसकी शुरुआत की। राजीव गांधी इस ट्रस्ट के पहले चेयरमैन बने। हालांकि इस पहल के पीछे पुपुल जयकर मुख्य सूत्रधार थीं, लेकिन ट्रस्ट को औपचारिक रूप से भारत की प्रमुख सांस्कृतिक हस्तियों, नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों के एक मुख्य संस्थापक समूह के साथ स्थापित किया गया था। इंटैक की पहली गवर्निंग काउंसिल में राजीव गांधी (पहले चेयरमैन), पुपुल जयकर, कपिला वात्स्यायन, एल. के. झा, एम. जी. के. मेनन, मार्तंड सिंह, राजीव सेठी, बी. के. थापर शामिल थे।

इसके अलावे ए.जी. कृष्ण मेनन, साइरस जे. गुज़डर, डॉ. करण सिंह, डॉ.राधिका हर्ज़बर्गर, डॉ सरयू दोशी, ए. पार्थसारथी, महाराजा गज सिंह, गिरा साराभाई, श्रीमती हेमिंदर कुमारी, जगदीश मित्तल, ब्रिगेडियर. के. पी. सिंह देव, कृष्ण खन्ना, लोकेश चन्द्र, सुश्री मालविका सिंह, नवीन पटनायक, ओ पी जैन, राम शर्मा, रोमेश चोपड़ा, एस के मिश्रा, सुहृद साराभाई, सुश्री तारा भट्टाचार्जी, विवेक भरत राम, डॉ. यामिनी कृष्णमूर्ति, अमन नाथ, कैप्टन अमरिन्दर सिंह, अरुण पुरी, अरुण भरत राम, अरुण सिंह, सुश्री आशा वसंत शेठ, सुश्री बिमला नंदा बिसेल और सुश्री कैमेलिया पंजाबी भी सक्रिय सदस्य रहे।

बहरहाल, कला संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए इनटेक का यह प्रयास बिहार की लोक कलाओं और स्थानीय कलाकारों के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा। इस अभियान का कुशल नेतृत्व बिहार की ओर से मनीषा झा और अलका दास कर रही हैं। जब कैनवास पर भगवान सूर्य देव को अर्घ्य देते श्रद्धालु, सूप, दउरा, ठेकुआ और गंगा घाटों के पावन दृश्यों को इन पारंपरिक शैलियों को देखकर दर्शकों को बिहार की अलौकिक लोक संस्कृति के प्रत्यक्ष दर्शन मिल रहा हैं। यदि इस पावन पर्व और इससे जुड़ी लोक कलाओं को यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहर में स्थान मिलता है, तो इससे न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिहार की छवि और मजबूत होगी, बल्कि राज्य के पारंपरिक लोक कलाकारों को वैश्विक पहचान और रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे।

कलाकार संजय कुमार जायसवाल के साथ राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश जी
ये भी पढ़े   बिहार का सत्यानाश (भाग-2) विशेष कहानी : इतिहास दोहराता है: जार्ज फर्नांडिस 'लंगड़ी' मारे बाबू दिग्विजय नारायण सिंह को, नीतीश कुमार पैर खींचे जॉर्ज फर्नांडिस का, अब नीतीश कुमार की बारी है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here