प्रधानमंत्री जी 🙏 भारत का 95% से अधिक पत्रकार ‘मध्यम वर्गीय’ ही है, 60-वर्ष तक कलम घिसते-घिसते 😢 उन्हें भी ‘पेंशन’ की, ‘घर’ की जरूरत होती है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली: आज की पीढ़ी भले इस बात को स्वीकार करने में कोताही करे, आज कंप्यूटर और मोबाईल के की-बोर्ड का बटन दबाते ही भले हम अपने शौचालय में बैठे-बैठे अमेरिका, लन्दन, फ़्रांस, जर्मनी के देशों की जानकारी को क्षण भर में हस्तगत कर लें, लेकिन यह तस्वीर गवाह है कि भारत में आज जो आँकड़ों का खेल होता है, उसकी बुनियाद कहें अथवा वजूद, ईंट से बने इसी बक्से से आया है। आज कंप्यूटर के डाटाबेस की पैदाइश यहीं से हैं। हम सम्मान करते हैं ऐसे सभी कर्मियों की जो अपना-अपना बेहतर देकर राष्ट्र की नींव को मजबूत बनाये हैं। 

विगत दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की 11-साल पुरे करने के उपलक्ष्य में विभिन्न मंत्रालयों ने मोदी की नेतृत्व में देश जितना कदम आगे बढ़ा, अपने-अपने तरीकों से उद्धृत किये हैं, विशेषकर देश के मध्यम वर्गीय नागरिकों के मामले में। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन वर्षों में केंद्र सरकार की योजनाएं देश के मध्यम वर्ग के लोगों के चौखटों तक पहुंची है, लेकिन शायद प्रधानमंत्री भारत के मध्यम वर्गीय पत्रकारों के मामले में, जो देश के पत्रकारों की कुल ावादी का तक़रीबन 95 फीसदी है (पांच फीसदी को सरकारी सहायता की जरुरत नहीं होती) जो शब्दों के सहारे अपना और अपने जीवन का यापन करते हैं, उनके बारे में नहीं सोचे। प्रधानमंत्री जी भारत का 95 से अधिक % पत्रकार ‘मध्यम वर्गीय’ ही है, 60-वर्ष तक कलम घिसते-घिसते उन्हें भी पेंशन की, घर की जरूरत होती है। 

जनगणना-1951

सरकार का दावा है कि पिछले ग्यारह वर्षों में, भारत में डिजिटल गवर्नेंस मध्यम वर्ग के सशक्तिकरण का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। सुलभ, कुशल और पारदर्शी डिजिटल सेवाओं की ओर सरकार के केंद्रित प्रयास ने नागरिकों के राज्य के साथ बातचीत करने के तरीके को बदल दिया है। दस्तावेज़ों तक पहुँच से लेकर सेवा वितरण तक, वित्तीय समावेशन से लेकर कल्याण तक  पहुँच में, डिजिटल उपकरणों ने लालफीताशाही को कम किया है, समय की बचत की है और घरों को सुविधाजनक बनाया है। मध्यम वर्ग को, विशेष रूप से, जल्दी सेवाओं के मिलने, कार्यालयों के कम चक्कर लगाने और कम कागजी कार्रवाई से लाभ हुआ है। आधार, डिजिलॉकर और उमंग जैसी प्रमुख पहलों ने न केवल सार्वजनिक सेवाओं को मोबाइल और कागज़ रहित बनाया है, बल्कि सरकारी प्रणालियों में विश्वास भी बढ़ाया है। 

इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत के शहरी परिदृश्य में उल्लेखनीय बदलाव आया है। किफायती आवास उन लोगों तक पहुँच गया है जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। पहली बार घर खरीदने वालों से लेकर रोज़ाना मेट्रो से यात्रा करने वालों तक, करोड़ों नागरिकों ने अपने घरों, अपनी सड़कों और अपने आस-पड़ोस में बदलाव महसूस किया है। लेकिन भारत के उन गरीब, निरीह, संस्थानों द्वारा शोषित पत्रकारों के बारे में कभी नहीं सोचा गया कि उन्हें भी ‘अपना घर का सपना होता है।’

सरकार कहती है कि इन वर्षों में, सरकार ने मध्यम वर्ग के जीवन में वास्तविक बदलाव लाने के लिए प्रतीकात्मक उपायों से आगे बढ़कर काम किया है। सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा को मज़बूत करने के एक बड़े कदम के तौर पर, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 24 अगस्त, 2024 को एकीकृत पेंशन योजना को मंज़ूरी दी। यह योजना सेवानिवृत्ति से पहले के अंतिम 12 महीनों के दौरान प्राप्त औसत मूल वेतन के 50% के बराबर पेंशन सुनिश्चित करती है, जो कम से कम 25 साल की सेवा वाले कर्मचारियों पर लागू होती है। कम सेवा अवधि वाले लोगों के लिए, पेंशन की गणना आनुपातिक रूप से की जाएगी, जिसमें न्यूनतम योग्यता अवधि 10 वर्ष होगी। 10 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद रिटायर होने पर न्यूनतम 10,000 रुपये प्रति माह की सुनिश्चित पेंशन प्रदान की जाएगी। कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में, उनके परिवार को सुनिश्चित पेंशन के 60% के बराबर पेंशन मिलेगी। एकीकृत पेंशन योजना 1 अप्रैल, 2025 से लागू हुई और इससे लगभग 23 लाख केंद्र सरकार के कर्मचारियों को लाभ मिलने की उम्मीद है। कई राज्य सरकारों ने भी इस मॉडल को अपनाया है, जिससे वर्तमान में राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के तहत 90 लाख से अधिक व्यक्तियों तक इसका कवरेज बढ़ा है।

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लेकिन केंद्रीय पत्र सूचना कार्यालय के अतिरिक्त देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘पत्रकारिता’ से जीवन यापन करने वाले उन लाखों मध्यम वर्गीय पत्रकारों के बारे में नहीं सोचा गया जो जीवन के साठ-वसंत तक शब्दों से शासन, प्रशासन, सरकार, देश की सेवाएं करते आये हैं, सेवानिवृत्ति के बाद कैसे जियेंगे ? वैसे देश में पत्रकार संघों, संगठनों की किल्लत नहीं नहीं; लेकिन ‘मध्यम वर्गीय पत्रकारों की बात शायद प्रधानमंत्री कार्यालय तक नहीं पहुँच पाती है। अन्यथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतने हृदयहीन नहीं हैं कि वे पत्रकारों को जीवन के अंतिम सांस तक ‘सुरक्षित जीवन जीने के लिए आर्थिक रूप से मजबूत नहीं बनाते।’

वैसे, घर खरीदने वालों के हितों की रक्षा करने और आवास क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए, संसद ने 2016 में रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम पारित किया। यह रियल एस्टेट लेनदेन में जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। आरईआरए के तहत, प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ने एक नियामक प्राधिकरण स्थापित किया, जिसे पंजीकृत विकास के लिए परियोजना विवरण सूचीबद्ध करने वाले सार्वजनिक पोर्टल को बनाए रखने का काम सौंपा गया। 17 मार्च, 2025 तक, पूरे भारत में रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरणों द्वारा 1.4 लाख से अधिक उपभोक्ता शिकायतों का समाधान किया गया है। यह दर्शाता है कि कैसे कानून ने रियल एस्टेट बाजार में विश्वास बहाल करने और निष्पक्ष व्यवहार सुनिश्चित करने में मदद की है। खैर। 

आंकड़ों के अनुसार, भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त, गृह मंत्रालय के आकंड़ों के अनुसार साल 2023 तक भारत की आवादी 143.81 करोड़ थी। विगत माह के आंकड़ों के अनुसार भारत सरकार अप्रैल 2025 तक 141.88 करोड़ आधार परिचय पत्र जारी की है। अब सवाल यह है कि भारत में 2023 की आवादी की तुलना में 2 करोड़ आधार कार्ड कम निर्गत हुआ था, तो देश में औसतन प्रतिवर्ष जनसँख्या में वृद्धि दर के मद्दे नजर आज 30 जून, 2025 को कितने लोगों के पास आधार कार्ड परिचय पत्र नहीं है – एक गहन शोध का विषय है। 

आजतक टीवी चैनल के सामने पोहा बेचता पत्रकार

2009 में शुरू किया गया आधार दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पहचान कार्यक्रम बन गया है। मार्च 2014 तक 61.01 करोड़ आधार नंबर जारी किए जा चुके थे, जो अप्रैल 2025 के अंत तक बढ़कर 141.88 करोड़ से ज़्यादा हो गए। अब तक आधार ने 150 बिलियन से ज़्यादा प्रमाणीकरण लेन-देन को सक्षम बनाया है। इसका डिज़ाइन सुनिश्चित करता है कि लाभ डुप्लिकेट और धोखाधड़ी को हटाकर इच्छित प्राप्तकर्ताओं तक पहुँचें। आज डिजिलॉकर 52.51 करोड़ उपयोगकर्ताओं को सेवाएं प्रदान करता है, जिसके तहत अब तक 914.19 करोड़ से अधिक डिजिटल दस्तावेज जारी किए गए हैं। 

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इसी तरह, 2017 में लॉन्च किए गए उमंग ऐप ने शासन को वास्तव में मोबाइल बना दिया है। यह केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों की सेवाओं तक पहुँचने के लिए एक एकीकृत प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करता है। बिलों का भुगतान करने से लेकर वैक्सीन अपॉइंटमेंट बुक करने तक, उमंग सरकार को नागरिकों के करीब लाता है। 2017 में सिर्फ़ 0.25 लाख उपयोगकर्ताओं और 166 सेवाओं से शुरू हुआ यह ऐप अब मई 2025 तक 8.13 करोड़ से ज़्यादा उपयोगकर्ताओं और 209 विभागों में 2,297 सेवाओं तक पहुँच गया है।  

1 जुलाई, 2015 को लॉन्च किया गया डिजिलॉकर डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत एक प्रमुख पहल है। यह एक डिजिटल दस्तावेज़ वॉलेट प्रदान करता है जो नागरिकों को अपने फ़ोन या डेस्कटॉप से प्रामाणिक दस्तावेज़ों तक पहुँचने, संग्रहित करने और साझा करने की अनुमति देता है। फरवरी 2017 से कानूनी रूप से मूल कागजात के बराबर माने जाने वाले डिजिलॉकर ने भौतिक प्रतियों को साथ रखने या जमा करने की आवश्यकता को कम कर दिया है। 20 मई, 2025 तक, 52.19 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं ने साइन अप किया था, जिसमें 1,936 संस्थानों द्वारा 914.19 करोड़ से अधिक दस्तावेज जारी किए गए थे। मध्यम वर्ग के लिए, इसका मतलब है स्कूल प्रमाणपत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड और बहुत कुछ तक आसान पहुँच – कभी भी, कहीं भी।

सरकार ने सार्थक तरीकों से मध्यम वर्ग के उत्थान के लिए अटूट प्रतिबद्धता दिखाई है। शुरू की गई नीतियों और सुधारों ने न केवल रोज़मर्रा की चुनौतियों को कम किया है, बल्कि वित्तीय सुरक्षा, आवास, स्वास्थ्य सेवा और कौशल विकास को भी मज़बूत किया है। ये बदलाव भारत की विकास कहानी में मध्यम वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका की स्पष्ट समझ को दर्शाते हैं। निष्पक्षता, सरलता और पहुँच पर ध्यान केंद्रित करके, सरकार ने सुनिश्चित किया है कि लाखों मध्यम आय वाले परिवार भविष्य का सामना आत्मविश्वास के साथ करने के लिए बेहतर ढंग से सुसज्जित हों। इस निरंतर और विचारशील दृष्टिकोण ने जीवन को बदल दिया है और निरंतर प्रगति के लिए एक मजबूत नींव रखी है। सरकार का कहना है कि इन 11 वर्षों में रिटर्न दाखिल करने  वालों की संख्या 3.91 करोड़ से बढ़कर 9.19 करोड़ हो गई है। 

भारत के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान लंबे समय से व्यावसायिक शिक्षा का एक स्तंभ रहे हैं। पिछले एक दशक में, इन संस्थानों में एक बड़ा विस्तार और उन्नयन हुआ। 2014 में आईटीआई की संख्या लगभग 9,977 से बढ़कर 2024 में 14,615 से अधिक हो गई। इसमें देश भर में 4,638 नए संस्थानों को शामिल करना शामिल है, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में तकनीकी प्रशिक्षण तक पहुँच में सुधार हुआ है। इसी अवधि के दौरान नामांकन 9.5 लाख से बढ़कर 14 लाख से अधिक हो गया, जो युवाओं और उनके परिवारों के बीच व्यावसायिक शिक्षा में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है। व्यावसायिक प्रशिक्षण को और मज़बूत करने के एक और बड़े कदम में, मई 2025 में, सरकार ने औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान उन्नयन के लिए राष्ट्रीय योजना और कौशल विकास के लिए पाँच राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना को मंज़ूरी दी। यह केन्द्र प्रायोजित योजना 60,000 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ कार्यान्वित की जाएगी, जिसमें केन्द्र, राज्य और उद्योग का योगदान शामिल होगा।

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जहाँ तक शिक्षा और कौशल विकासका सवाल है, सरकार ने भारत के महत्वाकांक्षी मध्यम वर्ग के लिए कौशल और सीखने के परिदृश्य को फिर से परिभाषित किया है। रोजगार, समावेशिता और उद्योग संरेखण पर स्पष्ट ध्यान देने के साथ, कार्यक्रमों के एक विस्तृत नेटवर्क ने लाखों भारतीयों को नौकरी के लिए कौशल हासिल करने में मदद की है। 2014 में स्थापित कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने इस यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक महत्वपूर्ण जरूरत के जवाब के रूप में जो शुरू हुआ वह आज दुनिया में सबसे बड़े मानव पूंजी विकास प्रयासों में से एक बन गया है। अल्पकालिक पाठ्यक्रमों से लेकर प्रशिक्षुता, सामुदायिक शिक्षा से लेकर उद्यमिता तक, सरकार के दृष्टिकोण ने शहरी केंद्रों और ग्रामीण परिवारों को समान रूप से छुआ है, जिससे अवसर, स्थिरता और आशा मिली है। 

प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) ने ज़रूरी दवाओं को आम नागरिक की पहुँच में ला दिया है। 20 मई, 2025 तक जन औषधि केंद्रों की संख्या 2014 में सिर्फ़ 80 से बढ़कर 16,469 हो गई थी। ये आउटलेट ब्रांडेड विकल्पों की तुलना में 50 से 80 प्रतिशत कम कीमत पर दवाइयाँ देते हैं, साथ ही डब्ल्यूएचओ प्रमाणित आपूर्तिकर्ताओं के ज़रिए सख्त गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित किया जाता है। यह योजना प्रतिदिन लगभग 10 से 12 लाख लोगों को सेवा प्रदान करती है, और पिछले ग्यारह वर्षों में संचयी बचत 38,000 करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है। मधुमेह या हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों का इलाज करने वाले मध्यम वर्ग के लिए, इसने वास्तविक और स्थायी राहत दी है। उत्पाद श्रेणी में अब 2,110 दवाइयाँ और 315 सर्जिकल उत्पाद शामिल हैं, जो सभी प्रमुख उपचारों को कवर करते हैं। लाखों परिवारों, विशेष रूप से मध्यम वर्ग के लिए, इस योजना का मतलब कम वित्तीय तनाव और अधिक मानसिक शांति है। 

स्वास्थ्य सेवा के मामले में, सरकार ने लाखों लोगों, खासकर मध्यम वर्ग के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा को किफायती और सुलभ बनाया है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए मुफ़्त अस्पताल में भर्ती से लेकर देश भर में उपलब्ध कम कीमत वाली दवाओं तक, आज लोगों के पास अपने स्वास्थ्य खर्चों पर बेहतर नियंत्रण है। इन योजनाओं का समर्थन करने वाली डिजिटल रीढ़ ने नामांकन, पहुँच और ट्रैकिंग को पहले से कहीं ज़्यादा आसान बना दिया है। इस बदलाव ने मध्यम वर्ग को नौकरशाही की बाधाओं के बिना दवाओं पर बचत, समय पर उपचार और चिकित्सा सुरक्षा का लाभ उठाने का अवसर दिया है। आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य आश्वासन योजनाओं में से एक बनकर उभरी है। 3 मई, 2025 तक, 33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 40.84 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड बनाए जा चुके हैं। इस योजना ने 1,19,858 करोड़ रुपये मूल्य के 8.59 करोड़ लोगों को अस्पताल में भर्ती होने में सक्षम बनाया है, जिससे परिवारों को कर्ज में डाले बिना माध्यमिक और तृतीयक देखभाल तक पहुँच सुनिश्चित हुई है।

1 COMMENT

  1. Bahut sundar jankari is lekh se mila hai. Aapne ye baat bilkul sahi likha hai ki Madhyam barga ke patrakaar Bandhuwon ko bhi Pension ke liye tension ho.

    Mai kmna karta hun ki Jan Ausadhi kendra ko Panchayat astar tak hona chahiye jisse sabhi is yojna ka labh mile. Asha karta hun ki apke madhyam se ye maang sarkaar poora kar den.

    Dhanyabaad Sir 💐🙏

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