‘राधाकृष्णन’ उपनाम के दूसरे उप-राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, लेकिन ‘प्रथम नाम’ अलग है

नई दिल्ली / पटना : उन दिनों हमारे विद्यालय के पुस्तकालय में उत्तर दीवार पर चार आदम आकार की तस्वीरें तस्वीर लगी थी। सबसे पहले डॉ. राजेंद्र प्रसाद, उनके बाद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डॉ. विधान चंद्र रॉय और डॉ. जाकिर हुसैन। पुस्तकालय के दक्षिण दीवार पर भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और कुछ अन्य क्रांतिकारियों तथा शहीदों की तस्वीर लगी थी। महात्मा गांधी की तस्वीर एक अन्य दीवार पर अकेली थी । उत्तर दीवार के कोने में एक लोहे के अलमारी के ऊपर एक दीपक, अगरबत्ती और माचिस रखा होता था। तत्कालीन प्रधानाचार्य श्री राम निवास पांडे और फिर बाद में श्री रामयश शुक्ल साहब का आदेश था कि पुस्तकालय में जो भी पहले आएगा, चाहे छात्र हों या शिक्षक, दीपक और अगरबत्ती अवश्य जलाएंगे उन महापुरुषों के सम्मानार्थ। साल 1968 था और मैं छठी कक्षा में प्रवेश किया था। 

विद्यालय – टीके घोष अकादमी – आज भी है। लेकिन यह नहीं कह सकता कि आज उन महान लोगों की तस्वीर विद्यालय में है अथवा नहीं। उन महापुरुषों के सम्मानार्थ आज दीप प्रज्वलित होता है अथवा नहीं। अगरबत्ती छात्र अथवा शिक्षक जलाते हैं अथवा नहीं। इस विद्यालय में डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ. विधान चंद्र रॉय, डॉ सच्चिदानंद सिन्हा आदि छात्र रह चुके हैं। 

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की तस्वीर के सामने प्रत्येक वर्ष के सितम्बर महीने में पांच तारीख को विद्यालय के तत्कालीन छात्र, शिक्षण समर्पण भाव से खड़े होकर उनका नमन करते थे। डॉ. राधाकृष्णन स्वतंत्र भारत में दो बार उपराष्ट्रपति (13 मई 1952 से 1962 तक) रहे, फिर डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बाद राष्ट्रपति बने। दीवार पर तीसरी तस्वीर डॉ. जाकिर हुसैन की थी, जो डॉ. राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बनने के बाद भारत के तीसरे उप-राष्ट्रपति बने। डॉ. राधाकृष्णन की विद्वता इतनी ही थी कि वे 1939 से 1948 तक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और 1949 से 1952 तक सोवियत रूस के राजदूत रहे। 

आज जब उसी ‘उपनाम’ के चन्द्रपुरम पोन्नुसामी ‘राधाकृष्णन’ का नाम राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने भारत के उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया तो सर्वपल्ली राधाकृष्णन याद आ गए। सोचने लगा उसी ‘उपनाम’ का दूसरा व्यक्ति भारत में पहली बार उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार बने।  लेकिन फिर सोचा ‘उसी उपनाम का होने से सर्वपल्ली कोई थोड़े ही हो जायेगा, चाहे दोनों दक्षिण भारत से ही क्यों न हों। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा कल इसकी घोषणा किये। कहते हैं राधाकृष्णन चार दशक से अधिक समय से राजनीति और सामाजिक जीवन में सक्रिय रहे हैं और उन्हें तमिलनाडु की राजनीति का सम्मानित चेहरा माना जाता है।

कल के डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी के चित्तूर जिले के तिरूतनी ग्राम के एक तेगलुभाषी ब्राह्मण परिवार में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। तिरुत्तनी ग्राम चेन्नई से लगभग 84 कि॰ मी॰ की दूरी पर स्थित है और 1960 तक आंध्र प्रदेश में था और वर्तमान मेंतमिलनाडु के तिरुवल्लुर जिले में आता है। आज के सीपी राधाकृष्णन का जन्म 20 अक्टूबर बर 1957 को तमिलनाडु के तिरुपुर जिले में हुआ। 

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने थिरु सी.पी. राधाकृष्णन जी को भारत के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में नामित किए जाने के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) निर्णय का स्वागत किया। प्रधानमंत्री ने एक्स पर पोस्ट में लिखा: “अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में, थिरु सी.पी. राधाकृष्णन जी ने अपने समर्पण, विनम्रता और बुद्धिमत्ता से विशिष्ट पहचान बनाई है। विभिन्न पदों पर रहते हुए, उन्होंने हमेशा सामुदायिक सेवा और हाशिए पर पड़े लोगों को सशक्त बनाने पर ध्यान दिया किया है। उन्होंने तमिलनाडु में जमीनी स्तर पर व्यापक कार्य किया है। मुझे प्रसन्नता है कि एनडीए परिवार ने उपराष्ट्रपति पद के लिए उन्हें हमारे गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में नामित करने का निर्णय लिया है।””थिरु सी.पी. राधाकृष्णन जी को सांसद और विभिन्न राज्यों के राज्यपाल के रूप में समृद्ध अनुभव प्राप्त है। संसदीय मामलों में उनके हस्तक्षेप हमेशा प्रभावशाली रहे। राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने आम नागरिकों के समक्ष आने वाली चुनौतियों के समाधान पर ध्यान दिया। इन अनुभवों ने सुनिश्चित किया कि उन्हें विधायी और संवैधानिक मामलों का व्यापक ज्ञान है। मुझे विश्वास है कि वे प्रेरक उपराष्ट्रपति साबित होंगे।”

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने महाराष्ट्र के राज्यपाल श्री सी. पी. राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए के उम्मीदवार के रूप में नामित किए जाने पर बधाई दी। X पर अपने एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि एक सांसद और विभिन्न राज्यों के राज्यपाल के रूप में श्री सी. पी. राधाकृष्णन की भूमिकाओं ने संवैधानिक कर्तव्यों को प्रभावी ढंग से पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मुझे विश्वास है कि उनका विशाल अनुभव और ज्ञान उच्च सदन की गरिमा बढ़ाएगा और नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और भाजपा संसदीय बोर्ड के सभी सदस्यों का इस निर्णय के लिए आभार।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन जहाँ भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे, जिसके कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था।  आज के राधाकृष्णन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक की पढ़ाई की। उनका राजनीतिक सफर आरएसएस से शुरू हुआ। 1974 में वे भारतीय जनसंघ की राज्य कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने। ये ओबीसी समुदाय कोंगु वेल्लार (गाउंडर) से आते हैं। 

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कहते हैं सर्वपल्ली राधाकृष्णन का बाल्यकाल तिरूतनी एवं तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही व्यतीत हुआ। उन्होंने प्रथम आठ वर्ष तिरूतनी में ही गुजारे। यद्यपि उनके पिता पुराने विचारों के थे और उनमें धार्मिक भावनाएँ भी थीं, इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन को क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरूपति में 1896-1900 के मध्य विद्याध्ययन के लिए भेजा। फिर अगले 4 वर्ष (1900 से 1904) की उनकी शिक्षा वेल्लूर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास में शिक्षा प्राप्त की। 

वह बचपन से ही मेधावी थे। उन्होंने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने 1905 में कला संकाय परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली। इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने उन्हें छात्रवृत्ति भी दी। दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के पश्चात् 1918 में वे मैसुर महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। बाद में उसी कॉलेज में वे प्राध्यापक भी रहे। डॉ॰ राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया। सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गयी।

वहीँ, सीपी राधाकृष्णन साल 1996 में इनको भाजपा तमिलनाडु का सचिव बनाया गया। इसके बाद 1998 में कोयंबटूर से ये पहली बार लोकसभा सांसद चुने गए और 1999 में फिर से जीत का परचम लहराया। साथ ही संसद में उन्होंने टेक्सटाइल पर स्थायी समिति के अध्यक्ष के तौर पर भी काम किया है। ये पीएसयू समिति, वित्त पर परामर्श समिति और शेयर बाजार घोटाले की जांच करने वाली विशेष समिति के सदस्य भी रहे हैं। साल 2004 में इन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा को भारतीय संसदीय दल के हिस्से के रूप में संबोधित भी किया है। ये ताइवान जाने वाले पहले संसदीय प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थे।

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जब डॉ॰ राधाकृष्णन यूरोप और अमेरिका प्रवास से पुनः भारत लौटे तो यहाँ के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियाँ प्रदान कर उनकी विद्वत्ता का सम्मान किया।1929 में इन्हें व्याख्यान देने हेतु ‘मानचेस्टर विश्वविद्यालय’ द्वारा आमंत्रित किया गया। सन् 1931 से 36 तक आंध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे। वे जॉर्ज पंचम कालेज कलकत्ता में भी पढ़ाये। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालत में चांसलर भी रहे। 

वहीँ वर्तमान ‘राधाकृष्णन’ 2004 से 2007 तक वे भाजपा तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने 19,000 किलोमीटर लंबी रथयात्रा निकाली, जो 93 दिनों तक चली। इस यात्रा में उन्होंने नदियों को जोड़ने, आतंकवाद खत्म करने, समान नागरिक संहिता लागू करने, छुआछूत समाप्त करने और मादक पदार्थों के खिलाफ अभियान जैसे मुद्दे उठाए। माना जाता है इस यात्रा से इनका राजनीतिक कद और बढ़ गया था। इसके अलावा उन्होंने दो पदयात्राएं  भी कीं। 2016 से 2020 तक वे कोचीन स्थित कोयर बोर्ड के अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में कोयर निर्यात 2532 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंचा। 2020 से 2022 तक वे भाजपा के ऑल इंडिया प्रभारी रहे और उन्हें केरल का जिम्मा सौंपा गया। खैर। 

18 फरवरी 2023 को उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्होंने मात्र चार महीनों में राज्य के सभी 24 जिलों का दौरा किया और जनता व प्रशासन से सीधे संवाद किया। 31 जुलाई 2024 को उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल बनाया गया।इसी बीच साल 2024 में इन्हें तेलंगाना का भी राज्यपाल बनाया गया था। इतना ही नहीं, ये पुड्डुचेरी के उपराज्यपाल भी बनाए जा चुके हैं। 

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