कविवर रवींद्रनाथ टैगोर की आत्मा आज दिल्ली के ‘वन्देमातरम मार्ग’ पर बिलख रही है माननीय प्रधानमंत्री महोदय, रविन्द्र रंगशाला में अब कुत्ते भौंकते हैं, गाय, भैंस, बकरी का साम्राज्य है

वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 

वन्देमातरम मार्ग, नई दिल्ली, 13 जुलाई : आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन सच तो ऐसा प्रतीत होता है कि मंडी हाउस इलाके में स्थित जितनी भी सांस्कृतिक, कला, अभिनय आदि से सम्बंधित संस्थाएं हैं, वे सभी वंदे मातरम मार्ग पर स्थित रविंद्र रंगशाला के एक-चौथाई हिस्से में समा जाएँगी और दो तिहाई हिस्सा फिर भी खाली रह जायेगा। अगर सरकारी सांख्यिकी सही है तो नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, श्री राम सेंटर फॉर परफार्मिंग आर्ट, कमानी ऑडिटोरियम, लिटल थियेटर ग्रुप मिलकर भी 10 एकड़ जमीन में स्थित नहीं है, जबकि रविंद्र रंगशाला का क्षेत्रफल आज भी 36 एकड़ में फैला है। 

अब सवाल यह है कि आखिर कोई तो रहा होगा, या आज भी होगा, जो रविंद्र रंगशाला इसके विनाश के लिए पहला ईंट रखा होगा? कोई तो रहा होगा जो कविवर रवींद्रनाथ टैगोर के नाम को दिल्ली में पनपने देना नहीं चाहता होगा? कोई तो होगा जिसे रवींद्र संगीत नहीं पसंद होगा? यह एक गहन शोध का विषय है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सुन रहे हैं? कविवर की आत्मा आज वन्देमातरम मार्ग पर रविंद्र रंगशाला के प्रवेश द्वार पर बिलख रही है। 

रविंद्र रंगशाला की स्थापना 1964 में हुई, जबकि नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा की स्थापना भले 1959 में हुआ हो, मंडी हॉउस परिसर स्थित बहलपुर हॉउस में मई 1975 में आया। नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का परिसर क्षेत्रफल करीब 8.5 एकड़ में फैला है। जबकि शिवनाथ प्रसाद द्वारा अभिकल्पित प्रतिष्ठित ईमारत वाला श्रीराम सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट का निर्माण 1976 में हुआ और इसका क्षेत्रफल 0.25 हेक्टर में है। इसी तरह, श्रीराम भारतीय कला केंद्र, जहाँ 632-कुर्सी वाला कमानी सेंटर स्थित है, या फिर त्रिवेणी कला संगम का क्षेत्रफल उसके भवनों से तनिक अधिक है। 

वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला

दी इंडियन नेशनल थिएटर ट्रस्ट द्वारा भले ही श्रीराम सेंटर फॉर परफोर्मिंग आर्ट्स का निर्माण 1960 के दशक में हुआ हो (जैसा कहा जाता है), आधिकारिक तौर पर यह 1972 में पूरा हुआ था। इसी तरह, श्रीराम भारतीय कला केंद्र की आधिकारिक रूप से स्थापना 1947 माना जाता है। पांच वर्ष बाद, सं 1952 में इसका निबंधन हुआ। प्रदर्शन को देखने के लिए साल 1971 में कमानी ऑडिटोरियम बना और अंततः 1977 में कोपरनिकस मार्ग पर स्थित केंद्र बना और कार्य करना शुरू किया। 

वन्देमातरम मार्ग पर बिलख रही है रविंद्र रंगशाला माननीय प्रधानमंत्री महोदय

अब एक सवाल का होना भी लाजमी है। मंडी हाउस इलाके में स्थित जितने भी कला, संगीत, अभिनय, मंच से संबंधित संस्थाएं हैं, उनकी उत्पत्ति सत्तर के दशक के मध्य और उत्तरार्ध में हुई है, जबकि रविंद्र रंगशाला साठ के दशक के पूर्वार्ध में स्थापित हो गया था। यह भी कहा जाता है कि कलकत्ता से दिल्ली भारत की राजधानी स्थानांतरित होने के बाद बंगाल के साथ-साथ दक्षिण भारत के लोग सरकारी-अधिकारी महकमे में अधिक आये थे। जब देश आज़ाद हुआ तो दिल्ली में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए, कला और संस्कृति के विकास के लिए शायद वन्देमातरम मार्ग पर स्थित इस स्थान को चुना गया होगा जहाँ कविवर रविंद्रनाथ टैगोर के सम्मान में, उनके नाम पर ऐतिहासिक रविंद्र रंगशाला का निर्माण हुआ होगा।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की का जन्म तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के कलकत्ता में जोड़ासांको ठाकुर बाड़ी में 7 मई, 1861 को हुआ था और 80-वर्ष की आयु में, आज़ादी के छह वर्ष पहले 7 अगस्त, 1941 को उसी ठाकुरबाड़ी में वे अंतिम सांस लिए। अपने जीवन काल में उन्होंने भारतीय शिक्षा, संस्कृति, कला, संगीत आदि के क्षेत्र में क्या योगदान किया, देश का राष्ट्रगान “जनगणमन अधिनायक जय हे” गवाह है। समयांतराल, जिस तरह देश की राजनीति में स्वहित-समर्थित लोगों का वर्चस्व स्थापित होने लगा, कला और संस्कृति का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। और इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि मंडी हाउस परिसर का विकास शायद इसी उद्देश्य से हुआ हो कि कैसे रविंद्र रंगशाला के अस्तित्व को समाप्त किया जाए? यह एक शोध का विषय है।  

कविवर

वैसे केंद्रीय सत्ता में बैठे राजनेताओं से लेकर देश को चलाने वाले नौकरशाहों तक, कलाकारों से लेकर अदाकारों तक, लेखकों से लेकर विश्लेषकों तक, आलोचकों से लेकर प्रशंसकों तक, दर्शकों से लेकर वाचकों तक सभी कविवर रविंद्रनाथ टैगोर के अनन्य भक्त मानते हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कविवर के भक्तों में सबसे आगे हैं, तभी तो बंगाल में लाल झंडा ‘केसरी’ में बदला; लेकिन दिल्ली की लगभग तीन करोड़ की आबादी में कितने लोग मृत रविंद्र रंगशाला को देखे होंगे, यह भी शोध का ही विषय है। बहरहाल, गुरुदेव की आत्मा अपने नाम पर बने गाय, भैंस, बकरी, कुत्ते से बाहुल्य दुर्गन्धित, विदीर्ण रंगशाला को देखकर रोते-बिलखते जरूर।

भारत के संसद के सेन्ट्रल हॉल में, जहाँ उनके द्वारा लिखित शब्दों – जन गण मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता – को “राष्ट्रगान” के रूप में स्वीकार किया गया था, जहाँ ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित शब्दों  – सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्, शस्यश्यामलाम् मातरम्। वन्दे मातरम् – को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया था; उसी संसद भवन से कोई साढ़े पांच किलोमीटर दूर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित राष्ट्रगीत के नाम से अंकित ‘वन्देमातरम मार्ग’ पर स्थित गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के नाम पर अंकित रविंद्र रंगशाला की स्थिति दर्दनाक है। कलेजा मुंह को आता है। विश्वास नहीं होता तो एक बार रविंद्र रंगशाला का भ्रमण जरूर कर लें। 

वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला

कल की ही तो बात है। कल झंडेवाला मेट्रो स्टेशन से उतरकर बाएं हाथ जाने वाली सड़क के सामने खड़ा था। सामने लिखा था ‘वन्देमातरम मार्ग।’ इस नाम पट्टिका को देखते ही पहले बंगाल के निवासी बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी याद आ गए, उनकी दूसरी बेटी नीलाब्ज कुमारी की पौत्री श्रीमती स्वाति गांगुली जी याद आ गयी, भारतीय नेवी के तत्कालीन अधिकारी कैप्टन एम.एम. चोपड़ा और उनके बच्चे गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा याद आ गए, रुस्तम सोहराब नागरवाला याद आ गए। इन सभी लोगों का नाम और उनके साथ हुई घटनाएं ‘वन्देमातरम मार्ग’ से ही जुड़ा है – जो कष्टकारक है और भारतीय इतिहास में एक काला अध्याय भी है। 

ये भी पढ़े   आज रात 8.30 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी​ 'संभवतः' राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे, यह पिछले 12 साल में '13 वां' संबोधन होगा 

नगरवाला काण्ड 

1971 का चर्चित ‘नगरवाला बैंक फ्रॉड केस’ ‘वंदे मातरम मार्ग’ से ही जुड़ा हुआ था। नगरवाला स्कैंडल एक धोखाधड़ी का मामला था जिसमें रुस्तम सोहराब नगरवाला ने कथित तौर पर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज की नकल की और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की पार्लियामेंट स्ट्रीट शाखा से 60 लाख रुपये निकालने के लिए हेड कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा को मना लिया। नगरवाला ने 24 मई 1971 को मल्होत्रा को फोन किया और प्रधानमंत्री की आवाज़ में बात की। फोन पर श्रीमती गांधी बनकर बात करते हुए, नगरवाला ने दावा किया कि उन्हें तुरंत पैसों की ज़रूरत है। नगरवाला ने मल्होत्रा से यह भी कहा कि रसीद लेने के लिए वे बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क करें। मल्होत्रा ने एक टैक्सी में नगरवाला (जिसने खुद को प्रधानमंत्री के लिए काम करने वाला कूरियर बताया था) को पैसे सौंप दिए। 

बाद में, मल्होत्रा रसीद लेने के लिए प्रधानमंत्री के आवास पर गए, लेकिन उन्हें बताया गया कि प्रधानमंत्री की ओर से पैसे की ऐसी कोई मांग नहीं की गई थी।मल्होत्रा ने पुलिस को धोखाधड़ी की जानकारी दी। एक दिन के भीतर ही नगरवाला को ढूंढकर गिरफ्तार कर लिया गया और ‘वंदे मातरम मार्ग’ पर एक जगह से पैसे बरामद कर लिए गए।

गीता चोपड़ा-संजय चोपड़ा कांड 

सन 1978 में इसी वंदे मातरम मार्ग पर बाएं हाथ कैप्टन एमएम चोपड़ा के बच्चे, गीता और संजय चोपड़ा की बेरहमी से हत्या कर सड़क के किनारे घनी झाड़ियों में उनके शव मिले थे। वंदे मातरम मार्ग पर ही जन गण मन के रचयिता रविंद्रनाथ टैगोर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला भी है। इसी सड़क पर ‘बुद्ध’ के नाम से अंकित ‘बुद्धा जयंती पार्क’ भी स्थित है, जहाँ भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा 25 अक्टूबर 1964 और आपके द्वारा 5 जून 2024 को लगाए गए पीपल का वृक्ष भी है। लेकिन किसी की भी स्थिति बेहतर नहीं है। 

ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और श्रीमती स्वाति गांगुली

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रविंद्रनाथ टैगोर के बंगाल में भाजपा 

पहली बार मै 2026 में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 294 वाली विधानसभा में 206 स्थान जीतकर ऐतिहासिक विजय पर हस्ताक्षर किया हैं। लेकिन विगत दिनों जब ‘वंदेमातरम’ के रचयिता ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की चौथी पीढ़ी की बेटी श्रीमती स्वाति गांगुली से बात कर रहा था तो वे दुःखी थी। जब उनसे पूछा कि इन वर्षों में कभी भी, अन्य आधिकारिक कार्यक्रमों को छोड़ भी दें तो आप गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस पर आधिकारिक रूप से आमंत्रित नहीं हुयी या नहीं?

श्रीमती गांगुली हँसते कहती हैं: “गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित होना या न होना मेरे लिए कोई मुद्दा नहीं है। मैं अपनी मातृभूमि का सम्मान करती हूँ। वैसे किसको जरूरत है? आज़ादी के बाद आज तक कभी कोई यह जानने की जरुरत नहीं किये कि आखिर ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के परिवार में, उनके अपने खून के वंशज कहीं है अथवा नहीं? जीवित है अथवा नहीं ? देश आज़ाद हो गया। नेता बदलते गए। हमारा परिवार भारत माँ के लिए समर्पित है। हमने उस कालखंड में वंदे मातरम गीत-गाते मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करते क्रांतिकारियों को देखी हूँ। मुझे नाज है, गर्व है अपने पूर्वजों द्वारा शब्दबद्ध किये उस गीत पर।”

अस्सी+ वर्षीय श्रीमती स्वाति गांगुली ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की दूसरी बेटी नीलाब्ज कुमारी के पुत्र नीलांद्री नाथ मुखोपाध्याय और उनके पुत्र समीर कुमार मुखर्जी की बेटी हैं। वे तत्कालीन बंगाल के उत्तरपाड़ा के विख्यात वकील और जमींदार थे। श्रीमती गांगुली तीन भाइयों में अकेली बहन हैं। दो भाइयों का निधन हो गया है। तीसरे भाई डॉ. प्रदीप मुखर्जी अमेरिका की एक जानी-मानी फार्मास्युटिकल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद से अवकाश प्राप्त किये हैं।

श्री नीलाद्री नाथ मुखोपाध्याय बाबू का छोटा पुत्र समीर कुमार मुखर्जी बंगाल के डिप्टी कमिश्नर थे। नीलाद्री नाथ करीब 12-14 वर्ष बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के साथ रहे थे। वे लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज कोलकाता, कोलकाता यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनोइस, अर्बाना शैम्पेन, USA में पढ़ाई की। कोलकाता यूनिवर्सिटी से संस्कृत में D.Phil किया। UGC सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट के पद से रिटायर हुई। उनके कई रिसर्च पेपर भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेन-त्सांग, जो 627 ईस्वी में भारत आए थे, जिनके दो संस्कृत बौद्ध ग्रंथ जो मूल रूप में खो गए थे और जिन्हें ह्वेन त्सांग ने चीनी भाषा में संरक्षित किया था, उनका इन्होंने विस्तृत संस्कृत-चीनी-अंग्रेजी शब्दावली के साथ अंग्रेजी में अनुवाद कर इतिहास रची हैं।

वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला

श्रीमती गांगुली कहती हैं: “जब मैं नवमीं कक्षा में थी तब मुझे यह कहा गया कि आगे की पढाई में जो भी विषय लो, गणित, इतिहास के अलावे संस्कृत अवश्य पढ़ना है। जब चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेन-त्सांग की पुस्तक को संस्कृत में अनुवाद की तो अपने वे सभी पूर्वज बहुत याद आये जिन्होंने संस्कृत पढ़ने को कहे थे। यह किताब उन्हें एक श्रद्धांजलि भी है। मैं अस्सी वर्ष से अधिक आयु की हो गयी हूँ। देश को आज़ाद होते मैं देखी हूँ। मैं अपने पिता के मुख से, दादा के मुख से ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की गौरव गाथा को सुनती आयी हूँ। आज भी उनके शब्द हृदय में विराजमान हैं। मैं ऋषि बंकिम बाबू रचित वंदे मातरम को संविधान सभा में राष्ट्रगीत स्वीकारते भी देखी हूँ। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ।” विगत दिनों श्रीमती स्वाति जी फंगल निमोनिया से ग्रसित हो गयी थी। 

ये भी पढ़े   #भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (14) ✍ दिल्ली का 174 पुरातत्व Vs फ़िरोजशाह कोटला, 'लवर्स' स्पॉट 😢

वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी (1838–1894), 19वीं सदी के बंगाल की सबसे जानी-मानी हस्तियों में से एक थे। 19वीं सदी के दौरान बंगाल के बौद्धिक और साहित्यिक इतिहास में उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। एक जाने-माने उपन्यासकार, कवि और निबंधकार के तौर पर उनके योगदान ने आधुनिक बंगाली गद्य के विकास और उभरते भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। उनके विशेष कार्यों में आनंदमठ (1882), दुर्गेश नंदिनी (1865), कपालकुंडला (1866), और देवी चौधरानी (1884) शामिल हैं, जो अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे  गुलाम समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चिंताओं को दिखाते हैं। 

वंदे मातरम की रचना को राष्ट्रवादी चिंतन में मील का पत्थर माना जाता है, जो मातृभूमि के प्रति भक्ति और आध्यात्मिक आदर्शवाद के मेल का प्रतीक है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी लेखनी के ज़रिए, न केवल बंगाली साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारत के शुरुआती राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए बुनियादी वैचारिक सिद्धांत भी रखे। वंदे मातरम में उन्होंने देश को मातृभूमि को माँ के रूप में देखने का नज़रिया दिया।

वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला

जब श्रीमती गांगुली से पूछा कि इन सात दशकों में कभी भी आप राष्ट्रीय मानचित्र पर क्यों नहीं आयी, जहाँ तक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन का सवाल है? श्रीमती गांगुली कहती हैं: “मैं जिस चीज के लिए जन्म ली, शायद माँ वह कार्य मुझसे करा ली, करा रही है। मैं किसी भी राजनीति पार्टी या ग्रुप में नहीं आयी। मेरा स्वभाव नहीं था, आज भी नहीं है। मैं दस वर्षों तक बंगाल के एशियाटिक सोसाइटी में थी। मैं अपने कार्य में लगातार व्यस्त रही, आज भी हूँ। मैं जो कार्य कर रही हूँ, उम्मीद है आने वाली पीढ़ी के लिए वह लाभायक ही होगा।”

वन्देमातरम के बाद जनगणमन 

वंदे मातरम के बाद जन गण मन की बात करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के अन्य भक्त हैं। उनका आशीष है उन पर। यही कारण है कि बंगाल में उनके नेतृत्व में भाजपा किला फतह कर पायी। यह अलग बात है कि  जन गण मन के रचयिता आज़ाद भारत में राष्ट्रध्वज को लहराते, फहराते नहीं देख सके और आज़ादी के छह वर्ष पूर्व मृत्यु को प्राप्त किये। लेकिन इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि उनकी मृत्यु अगस्त के महीने में ही हुई वह भी 7 अगस्त को, जहाँ से स्वतंत्र देश के लोग जश्ने आजादी का सप्ताह मनाने लगते हैं। 

लेकिन ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की कीर्ति ‘वंदे मातरम’ नाम से अंकित इस सड़क पर जनगणमन के रचयिता के नाम से अंकित और उनके ट्रस्ट द्वारा निर्मित भारत ही नहीं, विश्व का एकलौता रंगशाला – रविंद्र रंगशाला – का जो हश्र आज है, वह भी केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार और दिल्ली में उनके द्वारा अनुशंसित श्रीमती रेखा गुप्ता की सरकार के कालखंड में  – यह मोदी प्रशासन पर काला धब्बा लगता है। खासकर कर जब भारत की संस्कृति, गरिमा, कला की बात करते हैं। 

वैसे सन 2015 में दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी। अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार थी और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की। नेतृत्व नरेंद्र मोदी ही कर रहे थे। उस कालखंड में आम आदमी पार्टी की सरकार ने केंद्र के उस प्रस्ताव को ठुकराने का फैसला किया है जिसमें सेंट्रल रिज में खंडहर हो चुकी ऐतिहासिक रवींद्र रंगशाला को ठीक करके फिर से शुरू करने की बात कही गई थी। 1990 के दशक के बीच में सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद सरकार ने रिज को रिज़र्व फ़ॉरेस्ट (संरक्षित वन) घोषित कर दिया था।

वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला

दिल्ली में रिज 

बहरहाल, दिल्ली ने ‘रिज’ का उतना ध्यान नहीं रखा है, जितना उसे मिलना चाहिए था। रिज का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो चुका है। इसकी शुरुआत 19वीं सदी के दूसरे हिस्से में हुई थी, जब पहाड़गंज और पहाड़िपुर जैसे इलाकों को समतल कर दिया गया था। दिल्ली की ‘रिज’ प्राचीन अरावली पहाड़ियों का आखिरी सिरा है। अरावली पहाड़ियाँ गुजरात से राजस्थान और हरियाणा होते हुए 800 किलोमीटर तक फैली हैं और दक्षिण-पश्चिम में गुड़गाँव से दिल्ली में प्रवेश करती हैं।

रिज के इलाके को चार अलग-अलग क्षेत्र में बांटा गया है। दक्षिणी रिज का लगभग 6,200 हेक्टेयर हिस्सा, जो शहर की सीमा से आगे हरियाणा की ओर फैला है, उसमें हाल ही में घोषित असोला वन्यजीव अभयारण्य का 1,900 हेक्टेयर हिस्सा शामिल है। सेंट्रल रिज शहर के बीचों-बीच स्थित है और लगभग 869 हेक्टेयर में फैला है। 626 हेक्टेयर में फैली दक्षिण-मध्य रिज में किशनगढ़ जंगल या संजय वन शामिल है, जो दिल्ली में सबसे अच्छी तरह से संरक्षित जंगलों में से एक है। सबसे छोटा हिस्सा, 87 हेक्टेयर की उत्तरी रिज, उत्तरी दिल्ली में सिविल लाइंस और यूनिवर्सिटी कैंपस के बीच एक पन्ने जैसी तलवार की तरह स्थित है।

‘पुरानी दिल्ली’ या ‘उत्तरी रिज’ दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास के पहाड़ी रिज का सबसे छोटा हिस्सा है। 1915 में लगभग 170 हेक्टेयर ज़मीन को ‘रिजर्व फॉरेस्ट’ घोषित किया गया था, लेकिन आज 87 हेक्टेयर से भी कम ज़मीन बची है। ‘नई दिल्ली’ या ‘केंद्रीय रिज’ को 1914 में ‘रिजर्व फॉरेस्ट’ बनाया गया था और यह सदर बाज़ार के ठीक दक्षिण से धौला कुआं तक फैला है। यह 864 हेक्टेयर में फैला है, लेकिन इसके कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया गया है। ‘मेहरौली’ या ‘दक्षिण-केंद्रीय रिज’ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पास संजय वन के आसपास है और 633 हेक्टेयर में फैला है। इसके बड़े हिस्सों पर अतिक्रमण करके निर्माण कार्य कर लिया गया है। ‘तुगलकाबाद’ या ‘दक्षिणी रिज’ 6200 हेक्टेयर में फैला है और इसमें असोला और भट्टी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी शामिल हैं। रिज के ‘वन’ होने की बात पर लोवराज कमेटी, वन विभाग, एनवायरनमेंट इम्पैक्ट अथॉरिटी, एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन कंट्रोल अथॉरिटी और सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने ज़ोर दिया है।

ये भी पढ़े   ​दरभंगा के लोग कहते हैं: ​'दादी एक गिलास पानी के लिए जीवन पर्यन्त प्रतीक्षा करते परलोक सिधारी, पौत्र 'राजसी ठाठ से मृत्योपरांत कर्म करेंगे' (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-1)
वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के अनुसार, इसे 1996 से संरक्षण का दर्जा मिला हुआ है। ‘फ़ॉरेस्ट’ (वन) का दर्जा होने का मतलब है कि यहाँ जंगल से जुड़ी गतिविधियों के अलावा कोई और गतिविधि नहीं हो सकती, और ‘रिज’ (पहाड़ी श्रृंखला) का दर्जा होने का मतलब है कि इसे छेड़ा नहीं जा सकता। यहाँ कई तरह के पेड़ पाए जाते हैं, जिनमें किरार, औषधीय गुणों वाला नीम, बबूल, बेर, अमलतास, धोक और शानदार गुलमोहर जैसे पेड़ शामिल हैं।

रिज पर गृह मंत्रालय फैसले से लगभग 17 एकड़ जमीन पर एक वायरलेस स्टेशन स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके तुरंत बाद, रवींद्र रंगशाला – एक ओपन-एयर थिएटर जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम होने थे – को 36 एकड़ की एक और बेहतरीन जमीन पर बनाया गया। 1975 और 1977 के बीच, न्यू राजिंदर नगर के पास रिज के पश्चिमी हिस्से में चार स्कूलों के लिए जगह तय की गई थी। 1982 में NDMC ने एशियाई खेलों के दौरान बढ़े हुए ट्रैफिक को संभालने के बहाने शंकर रोड को चौड़ा करने के लिए बेरहमी से सैकड़ों पेड़ काट दिए। दिल्ली पोलो एसोसिएशन द्वारा PBG पोलो ग्राउंड पर एक पैविलियन बनाने पर कड़ी आपत्ति जताई गई थी, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया और कोई कार्रवाई नहीं की गई। जब 1962 में दिल्ली के लिए मास्टर प्लान तैयार किया गया था, तो योजनाकारों की इच्छा थी कि रिज पर बुद्ध जयंती पार्क से धौला कुआं और उससे आगे तक, पूरे दक्षिणी इलाके को कवर करते हुए एक रीजनल पार्क बनाया जाए।

वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला

रविंद्र रंगशाला

रवींद्र रंगशाला को 1960 के दशक की शुरुआत में भारत के पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली ‘रवींद्रनाथ टैगोर जन्मशती समिति’ की सिफारिशों पर एक बड़े ओपन-एयर थिएटर के तौर पर बनाया गया था। रवींद्रनाथ टैगोर शताब्दी समिति’ द्वारा परिकल्पित और निर्मित यह ढांचा तीन दशकों तक दिल्ली का सांस्कृतिक केंद्र रहा था। आज इसकी स्थिति देखकर रोना आता है। 1990 के दशक के मध्य में केंद्र सरकार द्वारा इस इलाके को ‘रिजर्व फॉरेस्ट’ (संरक्षित वन) घोषित किए जाने के बाद से यह ओपन-एयर थिएटर वीरान पड़ा है। अपनी तरह का इकलौता, दो मंज़िला ओपन-एयर थिएटर, जिसमें 8,000 लोगों के बैठने की जगह है। हालांकि इसे दिल्ली के लोगों और रिज के बीच मेल-जोल बढ़ाने के लिए बनाया गया था, लेकिन यह अपने मकसद को पूरा करने में विफल रही। 1993 में संस्कृति मंत्रालय ने रवींद्र रंगशाला का प्रबंधन संगीत नाटक अकादमी को सौंप दिया। CRPF की एक यूनिट भी परिसर में रही थी ।

केंद्र सरकार और संस्कृति मंत्रालय ने इस विशाल सांस्कृतिक स्थल को फिर से शुरू करने की कई सालों से कोशिश करती रही है। रवींद्र रंगशाला में आखिरी कार्यक्रम 1993-94 के दौरान हुआ था और उसके बाद वहां कोई गतिविधि नहीं हो सकी। सन 2016 में सरकार एम्फीथिएटर को फिर से शुरू करना चाहती है। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को कई ऐसे उपाय सुझाए हैं जिनसे ‘रवींद्र रंगशाला’ को ठीक करके फिर से शुरू किया जा सके। हालांकि, पर्यावरणविद् और रिज प्रबंधन बोर्ड इसका कड़ा विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि भारी भीड़ और ट्रैफिक से संरक्षित जंगल को नुकसान पहुंचेगा। सुप्रीम कोर्ट ने शहर के हरे-भरे “फेफड़ों” (ग्रीन लंग्स) के लिए बड़े पर्यावरणीय खतरे का हवाला देते हुए इन पुनर्निर्माण योजनाओं को बार-बार रोका है।

वन्देमातरम मार्ग पर कविवर के नाम से अंकित रविंद्र रंगशाला

कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने उस याचिका पर आगे सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसमें केंद्र सरकार ने सेंट्रल रिज में खंडहर हो चुकी रवींद्र रंगशाला एम्फीथिएटर को फिर से बनाने और शुरू करने की मांग की थी। उस समय बेंच की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस जे.एस. खेहर (जिनके साथ जस्टिस सी. नागप्पन भी थे) ने मामले को आगे के आवंटन के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजते हुए कहा, “हम वहां जा चुके हैं। अगर हम आपको इसकी इजाज़त देते हैं, तो मुझे जीवन भर इसका दुख रहेगा। कोई दूसरी बेंच इस पर सुनवाई करे और फैसला ले।”

संस्कृति मंत्रालय ने कोर्ट से रवींद्र रंगशाला के जीर्णोद्धार के लिए मंज़ूरी मांगी थी । मंत्रालय का तर्क है कि वहां कोई पक्का ढांचा नहीं बनाया जाएगा, बल्कि मौजूद एम्फीथिएटर को फिर से शुरू करने की कोशिश है। इसी इलाके में कोर्ट की मंज़ूरी से कई स्कूल और गंगा राम अस्पताल चल रहे हैं। भारत के 14 वें अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि जो जगह एक बार जंगल बन गई, वह हमेशा जंगल ही रहे, ऐसा ज़रूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी से वहां अस्पताल, स्कूल और दूसरी संस्थाएं चल रही हैं और अलग-अलग जगहों से लोग वहां मॉर्निंग वॉक के लिए आते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here