अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस के पूर्व ‘बिस्कोमान’ पर ‘लालू यादव’ के ‘आरजेडी’ का प्रभुत्व ‘समाप्त’, अमित शाह के ‘भाजपा’ का ‘कब्ज़ा’

गांधी मैदान का बायां नुक्कड़ (पटना): आज पांच जुलाई है। आज शनिवार भी है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित जुलाई के महीने का पहला शनिवार अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस के नाम से अंकित है। कोई 102 वर्ष पहले पहली बार सामाजिक सरोकार रखने वाले विश्व के सहकारिता के क्षेत्र से जुड़े लोग सहकारिता दिवस मनाये थे। बाद में, कोई 30-वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ जुलाई माह के पहले शनिवार को विश्व सहकारिता दिवस के नाम से अंकित कर दिया। लेकिन आज से कुछ घंटे पहले इस नुक्कड़ पर कोई 55-वर्ष पहले साल 1971 में बिहार स्टेट कोऑपरेटिव मार्केटिंग यूनियन लिमिटेड के नाम से जिस भवन का निर्माण हुआ, उस भवन में किसी की सत्ता दो दशक बाद चली गई। 

अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस के कुछ घंटे पहले पटना में ऐतिहासिक बिहार स्टेट कोआपरेटिव मार्केटिंग यूनियन (बिस्कोमान) के प्रशासन से लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल समर्थित दो-दशक पुरानी कुर्सी हिल गयी और 21-वर्षों से अध्यक्ष की कार्यालय में बैठे सुनील कुमार सिंह का सिंहासन हिल गया है। उनकी पत्नी श्रीमती बन्दना सिंह हार गई। अब अध्यक्ष की कुर्सी पर बिस्कोमान के संस्थापकों में एक तपेश्वर सिंह के पोते विशाल सिंह, जो सहकारिता के दिग्गज नेता अजित सिंह के पुत्र हैं, बैठे। 

जिस वर्ष बिस्कोमान भवन का निर्माण हुआ था, उसके तीन साल बाद पटना के कदमकुआं इलाके में रहने वाले जयप्रकाश नारायण साल 1974 में संपूर्ण क्रांति का नारा दिए थे। इस भवन से कोई दो-सौ कदम पर तत्कालीन नेताओं ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘सिंहासन खाली करो की जनता आ रही है’, का पाठ किये थे। उस मंच पर सुनील कुमार सिंह को समर्थन देने वाले लालू प्रसाद यादव भी थे। आज जब न्यायालय के आदेश के बाद सुनील कुमार सिंह का प्रभुत्व बिस्कोमान भवन परिसर से बाहर निकला, प्रवेश द्वार पर खड़े भारतीय जनता पार्टी के कुछ कार्यकर्ता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की उसी कविता का पाठ करते दिखाई दे रहे हैं। 

सुनील कुमार सिंह को आशीष देते लालू प्रसाद यादव

सुनील कुमार सिंह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई भी हैं। सुनील सिंह 2004 से बिस्कोमान के अध्यक्ष थे और 21 सालों तक इस पद पर बने रहे। वे वर्तमान में विधान पार्षद भी हैं और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी माने जाते हैं। हाल ही में विधान परिषद की सदस्यता समाप्त होने के बाद उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, जहाँ से ‘विजयश्री’ का खिताब लेकर बिहार विधान परिषद्औ में पुनः आये। 

बिहार और झारखंड की सबसे बड़ी सहकारी संस्था बिस्कोमान में लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई का फैसला आने के बाद केंद्र सरकार के सहकारिता विभाग ने बिस्कोमान भवन के नए अध्यक्ष की आधिकारिक घोषणा करते हुए विशाल सिंह को अध्यक्ष और महेश राय को वाइस चेयरमैन घोषित कर दिया। यह फैसला झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बाद आया है, जिसने चुनाव प्रक्रिया पर से रोक हटाने का निर्णय दिया था। झारखंड के रांची हाईकोर्ट के जस्टिस आर. मुखोपाध्याय और जस्टिस अंबुज नाथ के फैसले ने ये स्पष्ट किया था कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट ही सुन सकता है क्योंकि इसमें दो राज्यों (बिहार और झारखंड) के अधिकार क्षेत्र का मुद्दा शामिल है। न्यायालय ने इसी आधार पर रोक हटाई और चुनाव को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी, जिसके बाद चुनाव की प्रक्रिया से विशाल सिंह को नया चेयरमैन चुना गया।

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विशाल सिंह, बिस्कोमान के नए अध्यक्ष

बहरहाल, नए अध्यक्ष विशाल सिंह के दादा तपेश्वर सिंह बिस्कोमान के संस्थापकों में थे और लंबे समय तक इसके अध्यक्ष रहे। तपेश्वर सिंह बिक्रमगंज से 1980 और 1984 में कांग्रेस से लोकसभा चुनाव भी जीते। तपेश्वर सिंह के बाद विशाल सिंह के पिता अजीत सिंह का बिस्कोमान अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा रहा। अजित सिंह भी 2004 में बिक्रमगंज से जेडीयू के लोकसभा सांसद बने। 2007 में एक सड़क दुर्घटना में उनके निधन के बाद पत्नी मीना सिंह ने उपचुनाव जीता और फिर परिसीमन के बाद 2009 में आरा से लोकसभा चुनाव जीतीं। 2023 में मीना बेटे विशाल के साथ जनता दल ‘यूनाइटेड’ को नमस्कार कर भारतीय जनता पार्टी के शरण में पहुँच गए । विशाल सिंह भाजपा के नेता बृजभूषण शरण सिंह के दामाद भी हैं। विशाल सिंह अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं, जो सहकारिता राजनीति में सक्रिय हुए हैं। दो साल पहले ही वो एनसीसीएफ के निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे।

संयुक्त राष्ट्र ने 2025 को अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया है। आज (शनिवार, 5 जुलाई) को पूरा विश्व  अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस मन रहा है। सांख्यिकी के अनुसार, दुनिया भर में 30 लाख सहकारी समितियाँ हैं, जिनमें से 300 सबसे बड़ी सहकारी समितियां 2,409.41 बिलियन अमरीकी डॉलर का कारोबार करती हैं। इस साल के अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस और वर्ष की थीम है सहकारिता: बेहतर दुनिया के लिए समावेशी और सतत समाधान लाना। इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे सहकारिताएं सतत विकास को आगे बढ़ाती हैं, लचीले समुदायों का निर्माण करती हैं और विकास को अंतिम छोर तक ले जाती हैं। आज का यह दिन व्यावहारिक समाधान और वास्तविक प्रभाव पर केंद्रित है। 

“सहकारिता एक बेहतर दुनिया का निर्माण करती हैं” थीम आज की वैश्विक चुनौतियों से निपटने और 2030 तक संयुक्त राष्ट्र एसडीजी (सतत विकास लक्ष्य) को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका पर प्रकाश डालती है। सहकारिता अब दुनिया भर में 3 मिलियन सहकारी समितियों के माध्यम से 12% से अधिक मानवता को जोड़ती है, साथ ही, 280 मिलियन लोगों को गुणवत्तापूर्ण नौकरियाँ और काम के अवसर प्रदान करके सतत आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देते हैं, जो दुनिया की नियोजित आबादी का 10% है। 

केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह

भारत एक ऐसा देश है जहाँ विकास की गूंज खेतों, गाँवों और शहरों में सुनाई देती है, यहाँ सहकारी समितियों में एक खामोश लेकिन शक्तिशाली शक्ति है। किसानों को उचित मूल्य दिलाने से लेकर महिलाओं और छोटे उद्यमियों को सशक्त बनाने तक, सहकारी समितियों ने समावेशी विकास का ताना-बाना बुनने और “सहकार से समृद्धि” की भावना का जश्न मनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता-पूर्व युग में एक छोटी सी यात्रा के रूप में शुरू हुई यह संस्था आज पूरे भारत में 8.42 लाख सहकारी समितियों के नेटवर्क में विकसित हो गई है। अमूल जैसे प्रसिद्ध नामों से लेकर नाबार्ड, कृभको और इफको जैसे प्रमुख खिलाड़ियों और ज़मीन पर चुपचाप काम करने वाली अनगिनत छोटी संस्थाओं तक, सहकारी समितियाँ पूरे देश में लोगों को सशक्त बना रही हैं। 

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सहकारी दिवस या अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस पहली बार 1923 में मनाया गया था और 1995 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई थी। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे सहकारी समितियां लोगों को एक साथ काम करने, मजबूत और आत्मनिर्भर समुदायों का निर्माण करने और लोकतंत्र, एकजुटता और स्थिरता के मूल्यों को बढ़ावा देने में मदद करती हैं। भारत में सहकारी समितियाँ कृषि, ऋण और बैंकिंग, आवास और महिला कल्याण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में काम करती हैं। वे किसानों और छोटे उद्यमियों को ऋण प्रदान करके वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने में सहायक हैं, जिन्हें पारंपरिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुँचने में कठिनाई हो सकती है। ये समितियाँ ग्रामीण विकास, स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सहकारिताएं केवल संस्थाएं नहीं हैं; वे जमीनी स्तर से भारत के भविष्य को आकार देने वाला जन आंदोलन हैं। किसानों, महिलाओं और छोटे उद्यमियों को सशक्त बनाकर, वे समावेशी विकास और लचीले समुदायों को बढ़ावा देते हैं। जैसा कि भारत अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस 2025 मनाता है, यह “सहकार से समृद्धि” के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सहकारी समितियां सतत विकास को आगे बढ़ाती रहें और देश के हर कोने में समृद्धि लेकर जाएं।

ज्ञातव्य हो कि विगत वर्ष सितम्बर में भारत सरकार का सहकारिता मंत्रालय श्वेत क्रांति 2.0 का शुभारंभ किया , जिसके तहत पशुपालन एवं डेयरी विभाग (डीएएचडी) देशी नस्लों के विकास एवं संरक्षण तथा गोजातीय आबादी के आनुवंशिक उन्नयन के लिए राष्ट्रीय गोकुल मिशन को क्रियान्वित कर रहा है, ताकि गोजातीय पशुओं का दूध उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाई जा सके। इसके अतिरिक्त डीएएचडी खरीद और दूध प्रसंस्करण अवसंरचना के निर्माण/सुदृढ़ीकरण के प्रयासों को पूरक बनाने और पूरक बनाने के लिए देश में डेयरी विकास योजनाओं को भी क्रियान्वित कर रहा है। कहते हैं कि 2028-29 तक सहकारी क्षेत्र की दूध खरीद को 1,007 लाख किलोग्राम/दिन तक बढ़ाने के उद्देश्य को भी प्राप्त करना है। आज देश भर में 2.35 लाख डेयरी सहकारी समितियाँ स्थापित/सुदृढ़ीकृत की जा चुकी हैं। वर्ष 2023-24 में दूध का उत्पादन 239.30 मिलियन मीट्रिक टन होगा, जो पिछले 10 वर्षों की तुलना में 63.56% रहा है ।

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