अमित शाह कहते हैं कि ‘अंग्रेजी बोलने वालों को शर्म आएगी’ और नीतीश कुमार के बिहार में अंग्रेजी सिखाने के लिए EnglishYaari स्टार्टअप के रूप में झंडा उठा लिया है (बिहार स्टार्टअप-4)

अमित शाह कहते हैं कि 'अंग्रेजी बोलने वालों को शर्म आएगी' और नीतीश कुमार के बिहार में अंग्रेजी सिखाने के लिए EnglishYaari स्टार्टअप के रूप में झंडा उठा लिया है

पटना / नई दिल्ली : खगोल शास्त्र में ‘बृहस्पति’ यानी ‘जुपिटर’ को सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में ‘बृहस्पति’ को ‘देवगुरु’ मानते हैं, जो ज्ञान, धर्म और समृद्धि का कारक भी हैं। लेकिन ‘बृहस्पति’ के ‘वास्तविक महत्व को दरकिनार करते’ विगत बृहस्पतिवार को केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री ने जब यह कहा कि भारत में अंग्रेजी बोलने वालों को ‘जल्द ही शर्म आएगी और ऐसे समाज का निर्माण दूर नहीं है,’ अचानक भारतवर्ष के सैकड़ों नहीं, हज़ारों, लाखों शैक्षिणक संस्थानों की, शिक्षाविदों की याद आ गयी जो आज़ादी के 78 साल बाद अपने देश के युवापीढ़ियों को वैश्विक स्तर पर विश्व के युवाओं और अवसरों को चुनौती देकर अपने राष्ट्र का, अपने ज्ञान का पंचम लहराने का प्रयास कर रहे हैं अंग्रेजी सिखाकर।  

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आशुतोष अग्निहोत्री द्वारा लिखित पुस्तक ‘मैं बूंद स्वयं, खुद सागर हूं’ के विमोचन के अवसर पर अमित शाह ने कहा कि “जो लोग भारतीय भाषाएं नहीं बोलते हैं, वे पूरी तरह से भारतीय नहीं रह जाते हैं और भारत को विदेशी भाषाओं के माध्यम से नहीं समझा जा सकता है। हम सब के जीवन में, इस देश में, अंग्रेजी बोलने वालों को शर्म आएगी, ऐसे समाज का निर्माण अब दूर नहीं… और मैं मानता हूं, हमारे देश की भाषाएं हमारी संस्कृति का गहना हैं। हमारे देश की भाषाओं के बारे में हम भारतीय ही नहीं रहते। हमारा देश, इसका इतिहास, इसकी संस्कृति, हमारा धर्म, इसको समझना है तो कोई विदेशी भाषा में नहीं समझ सकता। केवल भारतीयता ही इसमें हमारी मदद कर सकती है, केवल भारतीय भाषाएं ही ऐसा कर सकती हैं। मैं जानता हूं कि यह लड़ाई कठिन है, लेकिन मेरा दृढ़ विश्वास है कि भारतीय समाज इस लड़ाई को जीतेगा।” खैर। 

भारत में शैक्षिक दर, अगर आंकड़े पर विश्वास करें तो, 2025 में 77.7 फीसदी माना जा रहा है। जिसमें पुरुषों की भागीदारी 84 % और महिलाओं की 70.3%, यानी पुरुषों की तुलना में महिलाएं 14 % पीछे हैं आज़ादी के 78 साल बाद भी। बिहार की स्थिति भी बेहतर नहीं है, भले सचिवालय में बैठे आला अधिकारी से लेकर मंत्रालय में बैठे विधायक और मंत्री जी जो भी दावा करें। बिहार में पुरुषों की साक्षरता 84.9 % और महिलाओं की 79. 7 % माना जा रहा है। औसतन 79.7 % आँका जा रहा है। अंग्रेजी के मामले में आज भी बिहार के औसतन लोगों का हाथ और मुंह दोनों तंग है। जो बिहार से बाहर निकल गए (अपवाद छोड़कर) और अपनी देशी-विदेशी भाषाओँ पर आधिपत्य जमाकर प्रतिस्पर्धा के बाज़ार में छलांग लगा दिए, आगे निकलते हैं। बहुत सारी बातें हैं जो शोध का भी विषय है और व्याखायें का भी। 

इसी परिप्रेक्ष्य में, या यूँ कहें कि प्रदेश के युवाओं में अंग्रेजी की वर्तमान स्थिति को देखते हुए अंग्रेजी सिखने, सिखाने के लिए अब स्टार्टअप की भी शुरुआत हो गयी है जिसे मित्रवत नाम भी दिया गया है EnglishYaari ताकि युवा को विश्वास हो कि अंग्रेजी को मित्र बनाने से वर्षों पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर (अब भारतरत्न कर्पूरी ठाकुर) द्वारा राजनीतिक कारणों से जिस कदर अंग्रेजी को दूर कर ‘अंग्रेजी के बिना भी माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण किया जाता था (उस कालखंड के बच्चे आज भी भटक रहे हैं) वाली त्रासदी का सामना फिर नहीं करना पड़े। 

आइये पटना सचिवालय 

आइये पहले शैक्षणिक स्थिति, अंग्रेजी, हिंदी और अन्य भाषाओँ की लड़ाई से हटकर पटना सचिवालय चलते हैं। कोई 243 सदस्यों की संख्या वाले विधानसभा में अगर किसी दिन यह प्रश्न मंत्री और सम्मानित सदस्यों के ‘अंग्रेजी में नहीं, बल्कि हिंदी में ही’ पूछा जाय की विधान सभा भवन की जमीन किसकी थी? या पटना उच्च न्यायालय की जमीन किसकी थी? तो प्रश्न सुनते ही अधिकांश माननीय सदस्यगण को ‘गश’ में आ जायेंगे या फिर चारो-खाने चित्त हो जायेंगे और चिचियाने लगेंगे ‘पढ़ल-लिखल के बुलाब हो….. पढ़ल-लिखल के, जानकार के बुलाब’ कहने लगेंगे। क्योंकि आज जितने महाशय बैठे हैं वे जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के पैदाइश हैं और उस क्रांति में भले देश की राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन हुआ हो, ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है,’ का नारा देने वाले ‘सिंहासन पर विराजमान’ हो गए हों; हकीकत यह है कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का जितना मिट्टी पलीद हुआ, अन्य किसी का नहीं। 

इसका ज्वलंत दृष्टान्त यह है कि आज़ादी के 78 साल बाद आज तक कोई भी पुस्तकालय, वाचनालय का निर्माण नहीं हुआ। प्रदेश के नेताओं, मंत्रियों के लिए पुस्तकालय महत्वहीन है। इतना ही नहीं, प्रदेश के लोगों का, विद्वानों का, विदुषियों का, छात्रों का, छात्राओं का – वे सभी इस राजनीतिक दौर में मानसिक रूप से स्थिर (अपवाद छोड़कर) हो गए हैं। “आजाद भारत में जब हम दस या बीस रुपये में प्रकृति-प्रदत्त पानी की एक बोतल भी खरीद कर पीते हैं और शौचालय जाने हेतु कम-से-कम दो या पांच रुपए की राशि अदा करते हैं तो यह भी हमारी सरकार के गाल पर मारा हुआ एक झन्नाटेदार तमाचा है परन्तु यह भी हमारी सरकार पर अपना कोई असर नहीं छोड़ पाता क्योंकि यह सरकार तो अन्धी ही नहीं बल्कि बहरी भी होती है और इतना ही नहीं हमारी सरकार संवेदनहीन भी अव्वल दर्जे की होती है। 

खुदाबक़्श पुस्तकालय की चर्चा किये बिना अधूरा 

पढ़ने-पढ़ाने, सीखने-सीखाने की बात के लिए खुदाबक़्श पुस्तकालय की चर्चा करना नितांत आवश्यक है। इस पुस्तकालय की शुरुआत मौलवी मुहम्मद बक़्श, जो छपरा के थे, उनके निजी पुस्तकों के संग्रह से हुई थी। वे स्वयं कानून और इतिहास के विद्वान थे और पुस्तकों से उन्हें खास लगाव था। उनके निजी पुस्तकालय में लगभग चौदह सौ पांडुलिपियाँ और कुछ दुर्लभ पुस्तकें शामिल थीं। 1876 में जब वे अपनी मृत्यु-शय्या पर थे उन्होंने अपनी पुस्तकों की जायदाद अपने बेटे को सौंपते हुए एक पुस्तकालय खोलने की इच्छा प्रकट की। इस तरह मौलवी खुदाबक्श खान को यह संपत्ति अपने पिता से विरासत में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने लोगों को समर्पित किया। खुदाबक़्श ने अपने पिता द्वारा सौंपी गयी पुस्तकों के अलावा और भी पुस्तकों का संग्रह किया तथा 1888 में लगभग अस्सी हजार रुपये की लागत से एक दो मंज़िले भवन में इस पुस्तकालय की शुरुआत की और 1891 में 29 अक्टूबर को जनता की सेवा में खुदाबक्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के रूप में समर्पित किया। उस समय पुस्तकालय के पास अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी की चार हजार दुर्लभ पांडुलिपियां थीं। 

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विगत 78-वर्षों का बिहार का इतिहास देख लें और आंक लें कि कितने धनाढय (अपवाद छोड़कर) या कितने राजनेताओं के पास उनका निजी पुस्तकालय है – दुर्भाग्यवश किन्ही का नहीं। क्योंकि शिक्षा का महत्व उनके लिए नहीं है। बहरहाल, सन 1969 में भारत सरकार ने संसद में पारित एक विधेयक के जरिये खुदा बख्श लाइब्रेरी को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के तौर पर मान्यता दी। लाइब्रेरी में फ़िलहाल अरबी, फारसी, संस्कृति और हिंदी की लगभग 21,000 से अधिक पांडुलिपियां और 2.5 लाख से अधिक किताबें हैं – उनमें से कुछ बहुत ही दुर्लभ हैं। इतिहास में दर्ज़ है कि 1891 में जब इसे खोला गया था तब खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी अपनी तरह की ऐसी पहली लाइब्रेरी थी जिसमें आम लोग जा सकते थे। करीब 12 साल बाद भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन पटना में गंगा किनारे स्थित इस लाइब्रेरी का दौरा करने पहुंचे तो इसमें संग्रहित पांडुलिपियों को देखकर इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इसके विकास के लिए धन उपलब्ध कराया। आभार जताने के लिए लाइब्रेरी की तरफ से 1905 में कर्जन रीडिंग हॉल की स्थापना की गई। उसके पश्चात यह रीडिंग हॉल पढ़ने की मुख्य जगह बन गई।

व्हीलर सीनेट हॉल, पटना विश्वविद्यालय 

खुदाबक्श पुस्तकालय से पचास कदम आगे बढ़कर पटना विश्वविद्यालय परिसर पहुँचते हैं। बिहार ही नहीं, अविभाजित भारत में शिक्षा के विकास के मामले में दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह का योगदान ‘अक्षुण’ है, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन पटना विश्वविद्यालय के मामले में मुंगेर के जमींदार देवकी नंदन प्रसाद सिंह के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता है। दुर्भाग्य से, प्रदेश के लोगों ने प्रदेश की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक विकास के मामले में अपने प्रदेश के राजाओं और जमींदारों की भूमिका को ‘भुला’ ही नहीं, अपितु मानसिक तौर पर ‘दफना’ भी कर दिया। अपने ही प्रदेश में उन लोगों को वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। यह अलग बात है कि प्रदेश की गलियों, चौराहों पर राजनेताओं की मूर्तियां चतुर्दिक लगे हैं। लेकिन ‘शिक्षा’ के मामले में शैक्षणिक संस्थानों में उन लोगों के नामों को नेस्तनाबूद कर दिया गया। अगर ऐसा नहीं होता तो पटना विश्वविद्यालय के ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ में उन राजाओं और जमींदारों का स्थान आज भी ‘सुरक्षित’ रहता। परन्तु जब प्रदेश का उप-नेतृत्व ‘नवमीं कक्षा’ उत्तीर्ण नेता करे, ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ का अर्थ और भावार्थ समझना नामुमकिन है।

राजा देवकी नंदन प्रसाद सिंह के आज के वंशज श्री शरद सिंह से बात करने पर उन्होंने कहा: “पटना विश्वविद्यालय हमारे पूर्वजों के ऐतिहासिक योगदान के निमित्त तत्कालीन व्यवस्था द्वारा चिकित्सा महाविद्यालय और साइंस कॉलेज में दो-दो सीट दिया गया था। पहले यह स्थान पटना विश्वविद्यालय सीनेट के लिए निमित्त हुआ, परन्तु तत्कालीन व्यवस्था से अनुरोध करने पर दो-दो स्थान दो कॉलेजों में सुरक्षित रखा गया। पिछले कई वर्षों से हम सभी प्रदेश के राज्यपालों की लिखते आये हैं, लेकिन कोई निर्णय नहीं हो पाया। कोई दो दशक पहले सरकार के द्वारा आरक्षण को समाप्त कर दिया गया। स्वाभाविक है सरकारी निर्णय के बाद हम सभी हताश हो गए।”

दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह पटना के गंगा-तट पर करीब 15 एकड़ और अधिक भूमि पर बने ऐतिहासिक ‘दरभंगा हॉउस’ का सम्पूर्ण परिसर के साथ-साथ भविष्य में प्रदेश में शिक्षा और विज्ञान को अधिकाधिक मजबूत बनाने के लिए करीब सात लाख रूपये का दान स्वाधीनता मिलने के करीब आठ साल बाद सन 1955 में किये। लेकिन मुंगेर के जमींदार देवकी नंदन प्रसाद सिंह दरभंगा के महाराजाधिराज से कोई 29-वर्ष पूर्व पटना विश्वविद्यालय के छात्र-छात्रों, शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के कार्यों में कोई बाधा न हो, ऐतिहासिक ‘सीनेट हॉउस’ बनाने में ‘अकेला योगदान’ किये।

पटना विश्वविद्यालय के एक अवकाश प्राप्त प्राध्यापक का कहना है कि “जब प्रदेश में शिक्षा को अपाहिज कर गंगा में डुबकी लगाने के लिए छोड़ दिया गया, आप सीनेट और सिंडिकेट की बात करते हैं। आज ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ का अर्थ और भावार्थ बताने वालों की भी किल्लत है शैक्षणिक संस्थानों में। हम किस संस्कार और गरिमा की बात करते हैं? पटना विश्वविद्यालय का सीनेट हॉल अपने ही प्रदेश के एक नागरिक का देन है जिन्होंने आज से सौ वर्ष पहले शिक्षा के महत्व को समझा। शिक्षाओं की बैठकी का महत्व समझा। दीक्षांत समारोह का महत्व समझा। आज अगर विश्वविद्यालय अथवा प्रदेश की सरकार उस स्थान पर मॉल या वातानुकूलित बाजार खोलने की बात कर दे तो यकीन कीजिये प्रदेश के लाखों लोग पैसे फूंकने को तैयार हो जाएंगे । आज शिक्षा का कोई मोल नहीं है। शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। प्रदेश में जो भी पढ़ने पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं हैं वे अपने जीवन निर्माण के लिए, पढ़ने के लिए प्रदेश से पहले ही बाहर निकल जाते हैं।”

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चलिए, जब शिक्षा और जानकारी की बात चल ही रही है तो यह भी जान लें कि पटना विश्वविद्यालय के आज के छात्र- छात्राएं, शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारी इस बात से अनभिज्ञ होंगे कि आज से सौ साल पहले, यानी सन 1917-1922 के कालखंड में पटना विश्वविद्यालय का ‘अस्थायी कार्यालय’ पटना उच्च न्यायालय का परिसर था। पटना उच्च न्यायालय भवन से ही पटना विश्वविद्यालय का प्रशासनिक कार्य चलता था। सुनकर, पढ़कर अजीब तो लगेगा, लेकिन सच यही है। इतना ही नहीं, स्थान के अभाव में संकायों (फैकल्टी) की बैठक न्यू कॉलेज (पटना कॉलेज) के विशाल कक्ष में हुआ करता था। साथ ही, पटना विश्वविद्यालय सीनेट की बैठक पटना सचिवालय के सम्मेलन कक्ष में होता था । लाट साहब (राज्यपाल) का ‘दरबार कक्ष’ का इस्तेमाल पटना विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के लिए किया जाता था। 

मुंगेर के जमींदार राजा देवीकी नंदन प्रसाद सिंह पटना विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल का निर्माण कार्य का सम्पूर्ण खर्च वहां किये। उस कालखंड में इसके निर्माण पर कुल 125000/- रुपये खर्च हुए थे। करीब एक हज़ार लोगों की बैठने की क्षमता वाले इस सीनेट हॉल का निर्माण कार्य सन 1926 में पूरा हो गया। इस विशाल हॉल का नाम ‘सर हैनरी व्हीलर’ के नाम पर रखा गया जो उस समय अविभाजित बिहार-उड़ीसा प्रान्त के राज्यपाल थे। सर हैनरी सन 1926 में ‘व्हीलर सीनेट हॉल’ का लोकार्पण किया। इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण उस समय हुआ था जब मातृभूमि की आज़ादी के लिए देश के नौजवान संगठित हो रहे थे। इसी समय भगत सिंह किसानों और श्रमिकों को रैली के माध्यम से अपने हक़ के लिए ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज बुलंद किये थे। यह अलग बात है कि आज 92-साल बाद भी भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारी, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए फांसी के फंदों को चूमा, ‘शहीद’ का दर्जा नहीं मिला। 

ज्ञातव्य है कि व्हीलर सीनेट हॉल अपने अस्तित्व काल में लार्ड माउंटबेटन, सरदार वल्लभभाई पटेल, सरोजनी नायडू, सी. डी. देशमुख, विजया लक्ष्मी पंडित, जयप्रकाश नारायण, जगदीश चंद्र बॉम सी.वी. रमन, सत्येन्द्रनाथ बोस जैसे महान हस्तियों को अपने छत के नीचे छात्रों को, शिक्षकों को सम्बोधित करते देखा है। अपने निर्माण के एक दशक बाद 17 मार्च, 1936 को इसी सीनेट हॉल में रवीन्द्रनाथ टैगोर का अभिनन्दन समारोह का भी आयोजन हुआ था। आज़ादी के पूर्व वर्ष में जवाहरलाल नेहरू को भी इसी हॉल में तत्कालीन सांप्रदायिक दंगों के कारण शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था। पटना विश्वविद्यालय की स्थापना अक्टूबर, 1917 में बिहार और उड़ीसा के अलग प्रांत के निर्माण के बाद की गई थी। बिहार में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक सकारात्मक कदम उठाया गया है। जुलाई 1919 में पटना कॉलेज में विभिन्न कला विषयों में स्नातकोत्तर कक्षाएं शुरू की गईं। उच्च वैज्ञानिक शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए 1927 में साइंस कॉलेज एक अलग इकाई बन गया। खैर। 

आइये फिर दिवसों पर चर्चा करते हैं। 

पहली जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक दिवस से लेकर 26 दिसंबर को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल स्थापना दिवस तक साल के 365 दिनों में करीब 191 + दिनों का अलंकरण महत्वपूर्ण दिवसों के रूप में अंकित है। इन 365  दिनों में 351 और 358 ‘हिन्दी’ किसी दीवार से सटकर चुपचाप सहमी पड़ी होती है। अकस्मात् सात दिन (हिन्दी सप्ताह) और चौदह दिन (हिन्दी पखवाड़ा) के लिए ‘फूल-माला पहनाकर, सुसज्जित कर लोगबाग, अधिकारी, पदाधिकारी, मंत्री, संत्री उसे सामने की मेज पर बैठा देते हैं ‘दर्शनार्थ’ और फिर कहते भी नहीं थकते है ‘हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।’  उसकी स्थिति कुछ वैसी ही होती है जैसे गणतंत्र दिवस पर मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को अर्पित करने वाले गीतों का गाना-बजाना। भारत के लोग, शिक्षित, अशिक्षित सभी लोग बजाते हैं। मिथिला सहित, बिहार सहित, देश के सभी 787 जिलों, 649481 गाँवों, 2 .68 ग्राम पंचायतों में तो बजता ही है। बेचारी हिंदी। वैसे चाहे महिला (स्त्रीलिंग) सशक्तिकरण के बारे में लोगबाग, समाज, सरकार और व्यवस्था कितना भी ढ़ोल पिट लें, महिला जानती है समाज के संभ्रांत लोग, राजनेता, दबंग कितना सशक्त होने दिए हैं, शोध का विषय है। 

भारत में आज बच्चे कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, संत विदास, मीराबाई, रहीम, रसखान, भूषण, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बिहारी, भीष्म साहनी, महाबीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलि शरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, सियाराम शरण गुप्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’, मुंशी प्रेमचंद, सुभद्रा कुमारी चौहान, जैनेन्द्र कुमार, यशपाल, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, माखनलाल चतुर्वेदी, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, गया प्रसाद शुक्ल, महादेवी वर्मा, शरतचंद चट्टोपाध्याय, कमलेश्वर, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, गोपाल सिंह ‘नेपाली’, हरिवंश राय ‘बच्चन’, सोहन लाल द्विवेदी, नागार्जुन, सुमित्रानंदन पन्त, दुष्यंत कुमार, त्रिलोचन, भवानी प्रसाद मिश्र का नाम भी नहीं जानते होंगे, क्योंकि आज अधिकांश हिन्दी की किताबों में इनका नाम दीखता ही नहीं, या फिर बड़े-बुजुर्ग इन हिन्दी के हस्ताक्षरों के बारे में अपने बच्चों को बताने की जबाबदेही अपने कंधे से झटक दिए हैं। इतना ही नहीं, हिन्दी को, जिसे भारतीय संविधान के तहत राजभाषा का दर्जा प्राप्त है । राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा होती है। जिसमें पूरा देश संवाद करता है। जिससे राष्ट्र की पहचान होती है । यह तभी संभव है जब हम सभी दोहरी मानसिकता को छोड़कर राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपने जीवन में अपनाने की शपथ मन से लें। तभी सही मायने में हिन्दी का राष्ट्रीय स्वरूप उजागर हो सकेगा। 

बिहार का नया स्टार्टअप EnglishYaari 

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आइये अब बिहार में खुले नए स्टार्टअप EnglishYaari को देखते हैं क्योंकि जब लखनऊ के हजरतगंज स्थित पुलिस ठाणे से दस कदम आगे बाएं हाथ भवन के ऊपर एक पट्ट पर “मास्टर माइंड स्टडी सर्किल का विज्ञापन लिखा देखा ‘फेल छात्र पास करें इसी वर्ष’ तो उत्तर प्रदेश की राजधानी में भी शिक्षा के महत्व का ज्ञान हो गया था। English Yaari बिहार से निकला एक स्टार्टअप है, जिसकी स्थापना विकास, संदीप और पीयूष ने की है, जो MIT मुजफ्फरपुर में इंजीनियरिंग के दिनों में मिले थे। हमने किसी भी संदर्भ में धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने के महत्व को महसूस किया। हालांकि, बिहार से होने के कारण, हमारे पास अपने अंग्रेजी कौशल का अभ्यास करने और उसे बेहतर बनाने के लिए माहौल की कमी थी। यह संघर्ष कॉलेज के दिनों में स्पष्ट हो गया, खासकर जब हमें एहसास हुआ कि नौकरी के साक्षात्कार से लेकर दैनिक बैठकों तक, हमारे मजबूत तकनीकी कौशल के बावजूद, अंग्रेजी एक ज़रूरत थी।

उनका कहना है कि “हमने पाया कि मौजूदा एप्लिकेशन और बाज़ार समाधान प्रभावी नहीं थे। ऑफ़लाइन केंद्रों में 20-30 छात्रों के बड़े बैच थे, जिससे हमारे जैसे अंतर्मुखी लोगों के लिए अभ्यास करना या बोलने का साहस हासिल करना मुश्किल हो गया। इंजीनियरों के रूप में, हमारा ध्यान समस्याओं को हल करने पर था। बाजार की क्षमता और बढ़ने के अवसर को पहचानते हुए, हमने 2021 में EnglishYaari की स्थापना की। नाम अपने आप में बोलता है। हर कोई चाहता है कि जब वह गलती करे तो उसे सुधारा जाए, लेकिन दूसरों के सामने ऐसा करना शर्मनाक हो सकता है, जिससे बोलने में झिझक हो सकती है। इन बाधाओं को तोड़ने के लिए, हमने लाइव वन-ऑन-वन सेशन की पेशकश शुरू की, जहाँ शिक्षार्थी बिना किसी झिझक के बोल सकते हैं और सुधार प्राप्त कर सकते हैं।”

जैसा कि कहा जाता है, अभ्यास से सिद्धि मिलती है। EnglishYaari उसी सिद्धांत पर काम करता है। यदि आप अपने कौशल में सुधार करना चाहते हैं, तो आपको कार्रवाई करने की आवश्यकता है। शुरुआत में, शीर्ष ट्यूटर्स को लाना और लोगों तक पहुँचना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन हमें यह महसूस हुआ कि हम बदलाव ला सकते हैं। ऐसे दिन भी आए जब हम अटके हुए महसूस करते थे, शिक्षार्थियों को पाने या परेशानी मुक्त सेवा प्रदान करने के लिए संघर्ष करते थे। हालाँकि, हमें सपनों की शक्ति पर विश्वास था, और आज तक, हमने 10,000 से अधिक शिक्षार्थियों को सेवा प्रदान की है। इस उद्यमशीलता की यात्रा ने हमें अधिक समझदार और जोखिम लेने वाले व्यक्तियों के रूप में आकार दिया है। हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि दूसरों को अंग्रेजी सीखने में उन्हीं संघर्षों का सामना न करना पड़े जो हमें करना पड़ा। अब कोई बदमाशी, घबराहट या नकारात्मक भावनाएँ नहीं हैं – हमने अंग्रेजी सीखने का मार्ग सरल बना दिया है। 

EnglishYaari स्टार्टअप का ‘ब्रांड स्टोरी’ 

EnglishYaari की शुरुआत एक किफायती कीमत पर सभी के लिए बोली जाने वाली अंग्रेजी को आसान और सुलभ बनाने के उद्देश्य से की गई थी। यह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के लिए वन-स्टॉप समाधान के रूप में कार्य करता है। चाहे वे कामकाजी पेशेवर हों जिन्हें ऑफिस मीटिंग, प्रेजेंटेशन या नौकरी में पदोन्नति में मदद की ज़रूरत हो, इंटरव्यू की तैयारी कर रहे छात्र हों या विदेश में पढ़ाई कर रहे हों, या बोलने में आत्मविश्वास की तलाश कर रही गृहणियाँ हों, EnglishYaari उन सभी की ज़रूरतों को पूरा करता है। इसे संचालित करने वाले लोगों का कहना है कि ‘हमारे शिक्षक हमारी सबसे बड़ी संपत्ति हैं। हमारे सभी शिक्षक IELTS, TOEFL, CELTA, DELTA, TLP, PTE और कई अन्य योग्यताओं में अनुभवी और प्रमाणित हैं। सुधार के लिए सही मार्गदर्शन और वातावरण महत्वपूर्ण हैं, और EnglishYaari दोनों प्रदान करने में उत्कृष्ट है। हमारे शिक्षक न केवल शिक्षार्थियों की ज़रूरतों को समझते हैं बल्कि उनकी कमज़ोरियों को भी ताकत में बदल देते हैं।’

वे यह भी मानते हैं कि ‘अंग्रेजी बोलना सिर्फ़ भारतीयों के लिए ही समस्या नहीं है; यह दुनिया भर के कई गैर-देशी वक्ताओं के लिए एक चुनौती है। हम गर्व से न केवल भारत से बल्कि दुबई, कतर, यूएई, मध्य पूर्व, ओमान और कई अन्य खाड़ी देशों से भी शिक्षार्थियों की सेवा करते हैं। यह बाजार लगातार बढ़ रहा है, और EnglishYaari भी। केवल एक वर्ष में, हमने अपने मासिक राजस्व को 1 लाख से 15 लाख तक बढ़ाया है, यह वास्तव में अप्रयुक्त बाजार के प्रति हमारे दृष्टिकोण का समर्थन करता है जिसे अभी तक हासिल नहीं किया गया है।’

पटना कॉलेज का ऐतिहासिक कॉरिडोर जो अंग्रेजी विभाग और प्रशासनिक विभाग को जोड़ता है और इस कॉर्डियर पर आज भी लाखों छात्र-छात्राओं के पैरों के निशान हैं जो यहाँ अंग्रेजी पढ़कर इंसान भी बने, अधिकारी भी बने और भारत की भाषा और संस्कृति को मजबूत बनाया। अब EnglishYaari की बारी है

इतना ही नहीं उन्हें विश्वास है कि ‘वर्ष 2031 तक, अंग्रेजी भाषा सीखने का बाजार 11.1% की CAGR से बढ़ते हुए $88.1 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो विकास और प्रभाव के अवसर को दर्शाता है। हमारा लक्ष्य 2029 तक 1 मिलियन शिक्षार्थियों और 100 करोड़ राजस्व तक पहुंचना है। “EnglishYaari किसी भाषा को सिखाने के बारे में नहीं है, यह व्यक्तियों को सशक्त बनाने, उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने और नए करियर के अवसर पैदा करने के बारे में है।” संस्थापकों का कहना है कि “हमारा लक्ष्य सभी स्तरों पर शिक्षार्थियों तक पहुँचना और उन्हें नए करियर के अवसरों का लाभ उठाते हुए एक सहायक वातावरण में अपने अंग्रेजी कौशल को बेहतर बनाने में मदद करना है। इसलिए ‘अपना ट्यूटर चुनें’, ‘अपने शेड्यूल के अनुसार अपना सत्र बुक करें’, ‘किसी भी समय अपना सत्र लें’ और अंततः ‘बाकी सब ट्यूटर संभाल लेंगे।

क्रमशः ……

1 COMMENT

  1. Bahut sundar aur satik baat poore lekh men hai. Jo mukhya mudda sarkaar ka hona chhiye wahi gaun hai. Baat ye bhi hai ki jo aajkal ke neta hote hai unlogon ko isse koi fark nahin parta hai. Kyonki log unko unka hitaisi samajh ka vote to kar hi denge. To fir usko itna tool dena koi matlab nahin hai.

    Jab logon men jagrukta aayegi to fir Neta daal daal to public paat paat. Kamna karta hun ki logon men siksha men sudhar ke prati kranti aaye.

    English Yaari ka delhi men bhi branch hai?

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