जब ‘खाने की वस्तु’ को ‘पहनाने लगे’ लोग, तो समझ लीजिये ‘राजनीति’ हो रही है, मिथिला का ‘मखान’ भी अछूता नहीं है, ‘पाग’ के बारे में तो पूछिए नहीं (बिहार स्टार्टअप-5)

जब खाने के वस्तु को पहनाने लगे लोग, तो समझ लीजिये राजनीति हो रही है, मिथिला का मखान भी अछूता नहीं है

मधुबनी / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: ​आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन जब किसी भोज्य पदार्थ का इस्तेमाल पहनाने में होने लगे, स्वयं से अशिक्षित लोगों के सर पर ‘पाग’ पहनाया जाने लगे, तो समझ लें उस बहुमूल्य वस्तु का राजनीतिक लाभार्थ इस्तेमाल होने लगा है – मिथिला का मखान या मिथिला का पाग भी ग्रसित हो गया है। वजह भी है मिथिला का शैक्षिक दर। मिथिला में ही नहीं, देश, दुनिया में मिथिला के लोग जहाँ-जहाँ हैं, आजकल ‘खुलेआम’, ‘यत्र-तत्र-सवर्त्र’ लोगों को, जहाँ ‘लाभ की आशा दिखती है,’ मिथिला का ‘पाग’ और मिथिला के ‘मखान’ का माला पहनाने में तनिक भी देरी नहीं करते नहीं करते हैं। पता नहीं, पसीने से लत पत वस्त्र में भींगा उस मखान भी लोग खाते भी हों।

मैथिली और मिथिला के ‘विकास’ से सम्बंधित कई वर्ष पहले गठित एक संगठन ने मिथिला के लोगों से निवेदन किया गया है कि पाग के निर्माणकर्ता पाग बनाते समय उसका आकार बढ़ाकर बनायें ताकि पहनने और पहनाने में असुविधा नहीं हो। यह बात दिनों संगठन द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में ​भी कहा गया। जबकि आज़ादी के 78 वर्ष बाद आज भी मिथिला का शैक्षिक दर 55 फीसदी से आगे बढ़ने पर कुथ रहा है।​ हालांकि, मिथिला क्षेत्र में दर्जनों शैक्षणिक संस्थाएं प्रदेश के राजनेताओं के नाम से गोदना गुदवाए हुए हैं, हज़ारों स्थानीय शैक्षिक माफियाओं द्वारा संचालित है। देशी, विदेशी नाम पर अंकित विद्यालयों और महाविद्यालयों की तो किल्लत है ही नहीं।

कल भारत के संसद के बाहर, विजय चौक के रास्ते रायसीना हिल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय के आस-पास मिथिला क्षेत्र के कर्मचारियों का कहना था कि “उक्त संगठन द्वारा पाग के मामले में जारी प्रेस विज्ञप्ति का प्रत्येक शब्द एक गहन शोध का विषय है। उनका कहना है कि “पाग का आकार बढ़ाने पर बल देने का सीधा अर्थ यही माना जायेगा कि “मिथिला में पाग पहनने वालों का माथा (शरीर का सबसे ऊपरी हिस्सा) का आकार या तो बढ़ गया है या फिर पाग के निर्माण कर्ता पाग के महत्व को इतना महत्वहीन बना दिए हैं कि उन्हें औसतन मानव माथे का आकर का ज्ञान नहीं रहा और पाग का आकार छोटा होता गया।”​

गृहमंत्रालय के सामने ​चबूतरे पर खड़े एक अधिकारी कहते हैं: “यौ झाजी !!! एहि बात से इंकार नै कयल जा सकैत अछि कि मिथिला के बाल-बच्चा शैक्षिक दुनिया में अव्वल अछि आ आवि रहल अछि। लेकिन इ सब बच्चा, चाहे बेटी होय अथवा बेटा, वैह अव्वल आवि रहल अछि जेकर माता-पिता अपन-अपन जीवनक निर्माण हेतु, बच्चाक जीवनक निर्माण हेतु गामक सीमा पार केलैथ।​” वे आगे कहते हैं कि “अगर चेन्नई, बंगलुरु, मुंबई, अहमदाबाद, कानपुर, नागपुर, दिल्ली, भोपाल आदि शहरों में मुद्दत से रहने वाले, पढ़ाने-लिखाने वाले किसी महानुभाव की बेटी विश्व के पटल पर अपना हस्ताक्षर करती है तो दरभंगा और लहेरियासराय के जिलाधिकारी उसकी शैक्षिक योग्यता को या उसकी उपलब्धि को अपनी सांख्यिकी में नहीं जोड़ सकता है न? पाग के साथ भी वही हश्र है, जो दुखद है। मिथिला में रहने वाले, पाग पहनने वाले, पाग पहनाने वाले औसतन 90 से अधिक फीसदी लोग (अपवाद छोड़कर) पाग के रंग का महत्व, कौन किसे पहनायेगा, किस अवसर पर किस रंग का पाग पहनाया जायेगा नहीं जानते।”​

आप​ स्वयं निर्णय करें

इसका ज्वलंत दृष्टान्त राष्ट्रीय जनता दल के नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और ऐतिहासिक चारा घोटाला कांड के अभियुक्त लालू प्रसाद यादव के नवमीं कक्षा पास पुत्र और उनकी ​पत्नी जी के सर पर पाग है। अगर मिथिला के लोग इन व्यक्तियों को पाग पहनाते हैं, तो इसका अर्थ सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक दुकानदारी ही माना जायेगा। क्या ये पाग पहनने के लायक है? तेजस्वी यादव और उनकी पत्नी को वैवाहिक जीवन पर बधाई देने का अनेकानेक तरीका हो सकता था परन्तु पाग पहनाकर पाग का अपमान भी किये।​

अगर उक्त संगठन के उक्त ‘प्रेस विज्ञप्ति’ के मद्दे नजर मिथिला की शैक्षिक दर को देखें – जो माथे के विस्तार का सूचक हो सकता है और बड़े आकार के पाग की जरुरत हो सकती है – तो बिहार का औसत शैक्षिक दर 63.82 फीसदी है जिसमें मिथिला क्षेत्र में शैक्षिक दर 55.18 से अधिक नहीं हैं। प्रदेश में सबसे अधिक शैक्षिक दर भोजपुरी क्षेत्र में है जहाँ औसतन शैक्षिक दर 66.19 फीसदी है। भोजपुरी क्षेत्र में रोहतास क्षेत्र में शैक्षिक दर 73.37 फीसदी है। इतना ही नहीं, मगध क्षेत्र में शैक्षिक दर मिथिला की तुलना में 9 फीसदी अधिक है, यानी 64.92 फीसदी है।​

दरभंगा के सांसद महोदय खुद बिना पाग पहने दूसरों को पाग पहनाते हैं – यह शोध का विषय है

यही कारण है कि दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में अपना हस्ताक्षर रखने वाले एक नौकरशाह कहते हैं: “पाग मिथिला का एक सम्मान है। मिथिला के प्रत्येक लोगों की इज्जत है। मिथिला का एक-एक बच्चा पाग के सांस्कृतिक गरिमा को पहले समझता था। पाग के रंगों की महत्ता को समझता था। वह यह भी समझता था कि किस रंग का पाग किस अवसर पर कौन पहनता है। पाग किसे पहनाया जाए । पाग पहनाने का शाब्दिक अर्थ और वास्तविक अर्थ क्या है। परन्तु, तकलीफ इस बात कि है कि मिथिला में अब राजनीति होती है और उस राजनीति में मिथिला का पाग धरल्ले से इस्तेमाल होता है। अन्यथा आज मिथिला पाग की यह स्थिति नहीं होती। मिथिला की संस्कृति की यह स्थिति नहीं होती।”​

अगर मिथिलांचल के लोग, विशेषकर जो “पाग की अहमियत” समझते हैं, अपने ही घरों में, अपने ही समाज में, टोले-मुहल्लों में एक सर्वे करें की किनके – किनके घरों में “वास्तविक पाग (सफ़ेद रंग का अथवा भटमैला रंग का) है ? हाल, पीला, हरा, ब्लू, रंग बिरंगा, सतरंगी, लोक चित्रकला वाला नहीं; तो औसतन सैकड़े घरों की बात नहीं करें, हज़ार घरों में शायद दस अथवा बीस घरों में पाग की उपस्थिति दर्ज होगी। विश्वास नहीं तो हो आजमा कर देखिए। अब स्थिति यह है कि हम अपने घरों में, मिथिला के समाजों में पाग के महत्व को नहीं बता सके, वर्तमान पीढ़ी को नहीं बता सके, लेकिन देश के मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई, बंगलुरु, मंगलुरु, कानपूर, नागपुर, बराकर के अतिरिक्त देश के 718 जिलों में “पाग से अर्थ कमाने के लिए पाग का विपरण करने में जुटे हैं।”

​इतना ही नहीं, अधिकारी आगे कहते हैं: “मिथिला में तो करवा चौथ नहीं होता है। वहां की महिलाएं अपने पति के लिए मधुश्रावणी पूजा करती हैं। लेकिन अब देखादेखी में मिथिला में ही नहीं प्रस्तावित मिथिला राज्य निर्माण के लिए सभी 24 जिलों, मसलन अररिया, बेगूसराय, दरभंगा, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर और बांका के अलावे पटना के कंकरबाग, शिवपुरी, लोहानीपुर, कदमकुआं और अन्य इलाकों सहित राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अनेकानेक क्षत्रों में, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई और अन्य प्रांतों में मिथिला की महिलाएं अब करवा चौथ करती हैं। और मैथिली भाषा के स्थान पर स्थानीय भाषाओँ का प्रयोग कर ‘मैथिली भाषा” की दुकानदारी करने में तनिक भी लज्जा नहीं करते। विश्वास नहीं हो तो दिल्ली के करोलबाग स्थित दिल्ली सरकार की दारू की खरीद-बिक्री वाले कार्यालय (भवन) के निचले तल्ले में मैथिली – भोजपुरी अकादमी को ठिठुरते देख लीजिये।

यह मिथिला की मछली नहीं नहीं, बल्कि कलकत्ता और दक्षिण भारत की है, मिथिला माँछ के नाम से बिकती है, गहन शोध का विषय है

आज़ादी के बाद, या यूँ कहें कि महाराजा कामेश्वर सिंह की मृत्यु तक मिथिला की संस्कृति जितनी मजबूत और सुरक्षित थी, आज नहीं है। यानि​, अक्टूबर 1962 के बाद मिथिलांचल में मिथिला की संस्कृति को संरक्षित रखने वाला नहीं रहा। आज भले हम मिथिला लोक-चित्रकला को विश्व में प्रचार-प्रसार के माध्यम से फैलाएं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मिथिला लोक चित्रकला के कलाकार आज मृत प्राय हो गया है। समाज, सरकार अथवा मिथिलांचल के जिला प्रमुखों से इस ऐतिहासिक लोक चित्रकला को उतना संरक्षण नहीं मिलता है जितने का वह हकदार हैं। आज स्थिति ऐसी हो गयी है की मिथिलाञ्चल के लोग, विशेषकर पुरुष समुदाय, न केवल “पाग के वास्तविक महत्व” से अपरिचित हैं, बल्कि उसका सम्मान भी नहीं कर पाते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो इस पाग को “सब धन बाईस पसेरी” जैसा सबों के माथे पर सजाकर फोटो-सेशन नहीं करते, सोसल मीडिया पर या भारत की सड़कों पर “पाग का राजनीतिकरण नहीं होने देते, नहीं करते।”

देवशंकर नवीन का कहना है​ कि “क्या सर्वजन मैथिलों ने आम सहमति से अपने पारंपरिक प्रतीक ‘पाग’ के स्वरूप में यह फेरबदल स्वीकार कर लिया? अब तक पाग पर किसी तरह की चित्रकारी की मान्यता नहीं थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि बाजार की चमक-दमक ने मैथिलों के सांस्कृतिक संकेत पर अपना कब्जा बना लिया! दूसरा सवाल पाग की पारंपरिक मान्यता को लेकर है। बचपन से देखता आ रहा हूं कि अनेक शहरों में मैथिल जनता अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए महाकवि विद्यापति की बरसी मनाती है। उन आयोजनों में आमंत्रित विशिष्ट जनों का पाग-डोपटा से सम्मान करते और अपने सांस्कृतिक उत्कर्ष का दावा करते हुए मैथिल आत्ममुग्ध होते हैं। गीत, कविता, चुटकुला, नाच-नौटंकी सब आयोजित करते हैं। आयोजन का नाम रहता है ‘विद्यापति स्मृति पर्व’, पर विद्यापति वहां सिरे से गायब रहते हैं। आयोजन का लक्ष्य शायद ही कहीं साहित्य और संस्कृति का उत्थान या अनुरक्षण रहता हो!​”

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आजकल दरभंगा के टावर चौक से दिल्ली के जंतर मंतर तक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के कार्यालय तक बिहार को काट-छांट कर अलग मिथिला ​राज्य बनाने की चर्चाएं आम हैं। मिथिला क्षेत्र के राजनीति में सक्रिय रहने वाले लोग न केवल प्रस्तावित अलग राज्य के निर्माण में किन-किन जिलों को बिहार से अलग कर मिथिला राज्य में​ अंकित कर देना चाहिए की सूची बनाकर मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पेश कर रहे हैं, बल्कि राज्य बनने के बाद कौन-​कौन महापुरुष और महिला नए राज्य के मंत्रिमंडल में शामिल होंगे, ​कौन मुख्यमंत्री बनेंगे, कौन वित्त मंत्रीं बनेंगे, कौन शिक्षा मंत्री बनेंगे की ​मन-ही-मन सूची बनाने में भी कोताही नहीं कर रहे हैं। ​

यह अलग बात है कि उत्तर बिहार इस गंगा तराई क्षेत्र के इन जिलों में राज्य के 11 नदियों की पानी के अलावे कुछ नहीं है और शैक्षिक दर का फीसदी भी महिला-पुरुष मिलकर 60 फीसदी से अधिक नहीं पहुंच पाया है।मिथिला के महात्मनों का कहना है कि अब तक 24 जिलों को प्रस्तावित राज्य में शामिल करने का प्रस्ताव है। इन जिलों में अररिया, बेगूसराय, दरभंगा, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर और बांका शामिल हैं। ​जबकि ‘प्रस्तावित मंत्रिमंडल की सूची’ को ‘सार्वजनिक’ नहीं कर रहे हैं। यह अलग बात है कि दिल्ली सल्तनत में ‘मैथिली’ भाषा के ‘तथाकथित विकास और विस्तार के लिए’ राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु बना “मैथिली – भोजपुरी अकादमी” दिल्ली सरकार के “दारू का बोतल गिनने वाले भवन में स्थित है। हालात यह है कि यहाँ मैथिली अथवा भोजपुरी के अलावे सभी भाषाओं में वार्तालाप होती है और दिल्ली में रहने वाले मैथिली भाषा भाषी मुद्दत से मूक-बधिर बने हैं। यह राजनीति हैं।

बिहार सं 22 मार्च, 1912 को बंगाल से काटकर अपने अस्तित्व में आया था। लगभग 24 वर्ष बाद, 1 अप्रैल, 1936 को बिहार का पहला खंडन हुआ और उस खंडन से ओड़िसा राज्य का अस्तित्व बना। ओड़िसा राज्य बनने के कोई 64 वर्ष बाद बिहार का फिर दो फांक हुआ झारखण्ड राज्य ​बनाने के लिए। सन 2000 से पहले, तत्कालीन दक्षिण बिहार के स्थानीय लोगों की दशकों से चल रही क्रांति, जिसमें कई सौ लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दिए, 15 नवम्बर, 2000 को झारखण्ड राज्य अपने अस्तित्व में आया। अब उत्तर बिहार के गंगा तराई क्षेत्र में स्थित जिलों को काटकर मिथिला राज्य बनाने की राजनीति चल रही है। ​खैर।

विष्णुपुराण के मिथिला-माहात्म्य

इंटरनेट पर जब लिखा देखा कि विष्णुपुराण के मिथिला-माहात्म्य में मिथिला एवं तीर भुक्ति दोनों नाम कहे गये हैं, मन खुश हो गया। शायद मिथिला क्षेत्र से आने वाले किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेतागण, चाहे जिला परिषद् में बैठते हों या प्रदेश के विधानसभा और विधान परिषद् में या फिर भारत के ऊपरी और निचली संसद में कुर्सियां तोड़ते हों ‘नहीं जानते होंगे, नहीं पढ़े होंगे।’ वजह भी है। मिथिला क्षेत्र में शैक्षिक दर 55 फीसदी से अधिक नहीं होने दिए ‘महात्मनों’ ने। क्योंकि अगर मतदाता पढ़ेगा तो सोचने की शक्ति बढ़ेगी, वाद-विवाद करने में सामर्थ्यवान होगा और मतदान करने से पहले नेता को परखेगा – जो महात्मन नहीं चाहते रहे हैं, नहीं चाहेंगे।

‘मिथि’ के नाम से मिथिला तथा अनेक नदियों के ”तीर’ पर स्थित होने से तीरों से पोषित होने से तीरभुक्ति नाम माने गये हैं।इस ग्रंथ में गंगा से लेकर हिमालय के बीच स्थित मिथिला में मुख्य 15 नदियों की स्थिति मानी गयी है तथा उनके नाम भी गिनाये गये हैं। यह तीरभुक्ति मिथिला सीता का निमिकानन कहा गया है। आज स्थिति ऐसी है कि मिथिला के माता-पिता अपनी बेटियों का नाम “सीता” नहीं रख रहे हैं। उस पुराण में मिथिला को ‘ज्ञान का क्षेत्र’ है और ‘कृपा का पीठ’ कहा गया है। आज मिथिला में पुरुष-महिला का शैक्षिक दर 55 फीसदी है। आज मिथिला मैथिली भाषा भाषी भी अपनी भाषा में बात नहीं करते। खैर। जानकी कि यह जन्मभूमि मिथिला निष्पापा और निरपेक्षा है।

सैद्धांतिक रूप से जैसे साकेत नगरी संसार के कारण स्वरूप है वैसे ही यह मिथिला समस्त आनंद का कारण स्वरूप है। इसलिए महर्षिगण समस्त परिग्रहों को छोड़कर राम की आराधना के लिए प्रयत्न पूर्वक यहीं निवास करते हैं। श्रीसावित्री तथा श्रीगौरी जैसी देव-शक्तियों ने यही जन्म ग्रहण किया। स्वयं सर्वेश्वरेश्वरी श्रीसीता जी की जन्मभूमि यह मिथिला यत्नपूर्वक वास करने से समस्त सिद्धियों को देने वाली है। मिथिला की सीमा (चौहद्दी) का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा गया है कि​

शिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यवै।योजनानि चतुर्विंश व्यायामः परिकीर्त्तितः॥
गङ्गा प्रवाहमारभ्य यावद्धैमवतम्वनम् ।विस्तारः षोडशप्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन॥

अर्थात् पूर्व में कोसी से आरंभ होकर पश्चिम में गंडकी तक 24 योजन तथा दक्षिण में गंगा नदी से आरंभ होकर उत्तर में हिमालय वन (तराई प्रदेश) तक 16 योजन मिथिला का विस्तार है। महाकवि चन्दा झा ने उपर्युक्त श्लोक का ही मैथिली रूपांतरण करते हुए मिथिला की सीमा बताते हुए लिखा है कि

गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूब कौशिकी धारा।पश्चिम बहथि गंडकी उत्तर हिमवत वन विस्तारा॥

इस प्रकार उल्लिखित सीमा के अंतर्गत वर्तमान में नेपाल के तराई प्रदेश के साथ बिहार राज्य के पश्चिम और पूर्वी चम्पारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, खगड़िया जिले का प्रायः पूरा भूभाग तथा भागलपुर और पूर्णिया जिले का आंशिक भूभाग आता है।

‘पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान

जिस महामहोपाध्याय ने मिथिला का चित्रण ‘पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक’ इन शब्दों में किये थे, वे बहुत दूरदर्शी थे। लगता है वे सरस्वती के वरद पुत्र थे और उन्हें ज्ञात था कि आने वाले समय में मिथिला के लोग उनकी कविता को मिथिला के चौराहों पर ‘पाठ’ करके, मिथिला का गुणगान करके अपने-अपने हिस्से की मिथिला अपने नाम लिखाएँगे। प्रदेश के लेखाकार में ‘एक खास किस्म के लोग’ दरभंगा राज का ‘मुहर’ लेकर तैयार भी रहेंगे जो आतंरिक-बाहरी माफिआओं के साथ मिलकर मिथिला (दरभंगा राज और उसकी गरिमा) को बेचकर, उसे मिट्टी पलीद करेंगे और स्वयं ‘संभ्रांत’ और ‘धनाढ्यों’ की श्रेणी में सूचीबद्ध हो जायेंगे, नेता, अभिनेता भी हो सकते हैं।

मिथिला के किसी भी स्थान पर खड़े होकर मिथिला के बाबू, बबुआइन और बौआसिन लोग अगर “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” कविता पाठ करते मिल जायँ, तो समझ लीजिये वे ‘सरेआम झूठ’ बोल रहे हैं। अपने-अपने हितों के रक्षार्थ वे स्थानीय लोगों को बरगला रहे हैं। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे राजनीति में प्रवेश करने के लिए मिथिला की कविता पाठ करना प्रारम्भ कर दिए हों जो उनके अनेकानेक प्रयासों में, एक यह भी प्रयास हो। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जिस समय इस कविता की रचना हुई होगी, उस कवि के नजर में मिथिला और उसकी गरिमा अपने उत्कर्ष पर रहा होगा। मिथिला के सभी क्षेत्रों में, प्रत्येक कदम पर, प्रत्येक घरों के सामने-पीछे छोटा-बड़ा पोखर रहा होगा। तत्कालीन राजा-महाराजा-महाराजाधिराज स्थानीय लोगों के सम्मानार्थ, तत्कालीन पानी की समस्याओं के निदानार्थ अपने खर्च पर पोखर, तालाब बनबाये होंगे। यह सच भी है।

अब जब मिथिला में असंख्य पोखर / तालाब रहा होगा तो उसके महार (इम्बैंकमेंट) पर पान की खेती, मखान की खेती होती होगी, जिसका उपयोग अपने-अपने घरों में, आगंतुकों के लिए, सगे-सम्बन्धियों के लिए किया जाता होगा। कोई सौ वर्ष पहले तक मिथिला में ‘शिक्षा’ चाहे ‘प्राथमिक’ हो, ‘माध्यमिक’ हो या ‘उच्च शिक्षा हो – पढ़ने वालों के साथ-साथ पढ़ाने वालों की किल्लत नहीं थी। अपने-अपने क्षेत्र के अनेकानेक आचार्य, प्राचार्य, महामहोपाध्याय समाज में उपलब्ध थे। शिक्षा के मामले में बनारस और इलाहाबाद की दूरियां मिथिला से अधिक नहीं थी। पाटलिपुत्र में भी मिथिला के लोग आकर शिक्षित होते थे। लेकिन, दुर्भाग्य यह रहा कि शिक्षा प्राप्ति के बाद उन्हें समाज को जो वापस करना था, वह नहीं कर सके। मिथिला के ग्रामीण इलाकों से खेतिहर-परिवारों से लेकर विद्वानों के परिवारों तक, जो भी शिक्षा के लिए शहर की ओर उन्मुख हुए, कभी वापस नहीं आये। और वापस भी आये तो वृद्धावस्था में। परिणाम यह हुआ कि मिथिला की जो अपनी पारम्परिक शिक्षा और शिक्षा पद्धति थी, उसका सर्वनाश हो गया।

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समय बदल रहा था। समाज बदल रहा था। सोच बदल रहे थे। स्वाभाविक है शिक्षा का स्वरूप भी में बदलेगा ही। लेकिन तकलीफ इस बात की है कि आज भी हम उसी कविता पाठ को दोहरा रहे हैं और कहते थक भी नहीं रहे है कि “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” – खासकर तब जब बिहार के ग्रामीण इलाकों में शैक्षिक दर पुरुषों में 57 फीसदी और महिलाओं में 29 फीसदी है। मिथिला भी इसी आकंड़े के अधीन है। पूरे प्रदेश में औसतन शैक्षिक दर 69 फीसदी है। इसमें पुरुषों के हिस्से 70 फीसदी और महिलाओं के हिस्से 53 फीसदी है। यानी दोनों के बीच आज भी 17 फीसदी का फासला है और यही 17 फीसदी का फासला, चाहे मिथिला में पंचायत का चुनाव हो, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, भागलपुर, मुंगेर, आदि शहरों में जिला परिषद् का चुनाव हो या बिहार के विधान सभा और विधान परिषद का चुनाव हो – निर्णायक होता है।

सबसे महत्वपूर्ब बात तो माँछ (मछली) से सम्बंधित है। माँछ की कथा-व्यथा बनारसी पान जैसी है। बनारस में पान की खेती नहीं होती, लेकिन हज़ारों-हज़ार पान की दुकानें हैं। प्रत्येक चार दुकान या चार मकान के बाद पान की दुकानें मिलेंगी। लगभग सभी किस्मों के पान यहाँ, जगन्नाथ जी, गया और कलकत्ता आदि स्थानों से आते हैं। पान का जितना बड़ा व्यावसायिक केन्द्र बनारस है, शायद उतना बड़ा केन्द्र विश्व का कोई नगर नहीं है। काशी में इसी व्यवसाय के नाम पर दो मुहल्ले बसे हुए हैं। केवल शहर के पान विक्रेता ही नहीं, बल्कि दूसरे शहरों के विक्रेता भी इस समय इस जगह पान खरीदने आते हैं।

बस इतना ही समझ लें कि आज मिथिला में माँछ का उपलब्धता जितना है वह मिथिला के दो फीसदी लोगों की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकता। मिथिला के बाज़ारों में जो माँछ आप देख रहे हैं वह सन 1911 से पहले देश की राजधानी जिस प्रदेश में थी, वहां से और आंध्र प्रदेश से आती है। मिथिला में महज ‘ठप्पा’ लगता है। अब सोचिये खाते हैं बंगाल की – आंध्र की मछली और आज भी कविता पाठ किये हैं “पग-पग पोखर माँछ ,,,,” जब इस कविता की रचना की गयी थी माछ, पान और मखान मिथिला की शान, पहचान अवश्य थी। लेकिन समय के साथ मिथिला अपनी इस पहचान को न सिर्फ खो दिया है, बल्कि इन सभी चीजों पर अब दूसरे प्रदेशों द्वारा कब्जा भी हो गया है। इस दृष्टि से मिथिला की पहचान खतरे में है और लोग बाग़ है कि इस खतरे में भी खतरा उठाना चाहते हैं ‘मिथिला को अलग राज्य का दर्जा दो” – गजब है।

पूरे मिथिला में स्थित पोखरों की संख्या को अगर तनिक बाद में अध्ययन करें तो सिर्फ दरभंगा के महाराजा के साम्राज्य में तक़रीबन 9113 पोखर और तालाब थे। इसमें दरभंगा शहर में ही 350 के आस-पास थे। आज अगर अवकाश है (वैसे मिथिला के लोग वेवजह व्यस्त होते हैं। मोबाईल पर घंटी आज बजायेंगे तो तीसरे दिन हेल्लो ट्यून सुनाई देदा) तो शहर में धूम लें और पोखरों, तालाबों की संख्या, उसकी स्थिति, उसमें दौड़ती मछलियों से, खिलते माखन से, महारों पर लगे पानों की खेती की स्थिति से अवगत हो लें। यकीन मानिए ‘भोकार’ नहीं, ‘चीत्कार’ मारकर रोने लगेंगे, अगर आखों में पानी होगा तो।

इन कविता वाचकों को शायद यह मालूम भी नहीं होगा कि पान की खेती करने के लिए दो-रस मिट्टी की जरूरत होती है। न ज्यादा पानी और न ज्यादा धूप की जरूरत होती। पानी इतना हमेशा चाहिए, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। यहां तो लोगों की आखों में नमी नहीं है, बेचारी मिट्टी क्या करे। यही कारण है कि कलकत्तिया पान दरभंगिया बनाकर मिथिला के बाज़ार पर अधिपत्य जमा लिया है, कब्ज़ा कर लिया है यानी ‘सुतल छी आ वियाह होईत अछि’ वाली कहावत सिद्ध हो रही है और कविता वाचक पाठ करते नहीं थक रहे हैं “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” – पूरी मिथिला की सांख्यिकी आप निकालें, यहाँ दरभंगा जिले में रोज तकरीबन 8 टन मछली की खपत है, लेकिन दरभंगा ज़िले से मात्र 500 किलो तक भी मछली बाजार में नहीं पहुंच पाती है।

एक बात गर्दन से नीचे नहीं उतरता वह यह कि जब पोखर और तालाबों की संख्या उत्तरोत्तर शून्य की ओर अग्रसर है, फिर पानी में पैदा होने वाला मखान कहाँ से आ रहा है? मखान को सुपर फूड का दर्जा मिला है। ‘जी-टैग’ भी मिला है। कई तरह के कंपनियां अपने अपने नाम की ब्रांडिंग भी कर लिए हैं।

कहा जाता है कि मल्लाह जाति के लोग ही मखाना की खेती करते थे/हैं। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में निषाद समाज की करीब 21 उपजातियां हैं। करीब चार दर्जन ‘सरनेम’ लगाए बैठे हैं। प्रदेश की सम्पूर्ण आबादी में करीब एक करोड़ 70 लाख लोग निषाद जाति के हैं। लेकिन सवाल यह है कि जो समाज के लोग, उनका परिवार, बाल-बच्चा बिहार के, तालाबों-पोखरों में पहले गर्दन भर पानी में डूब कर मखान की खेती करने में अपना सौभाग्य समझते थे, आज ठेंघुने और घुटने पर पानी नहीं है उन तालाबों और पोखरों में। इन कहावतों को व्यापारीकरण कर रहे हैं। इतना ही नहीं, अब तो मिथिला के पाग पर भी धावा बोल दिया गया है। ‘पाग’ तो अब रंगबिरंगा हो गया। सफ़ेद पाग कहीं दीखता नहीं। लाल-पाग और हल्दी-रंग नुमा पाग महज अवसर पर ही लोग माथे पर रखते हैं। अब तो ‘पान’, मखान, माँछ, मुस्की, आम, लताम (अमरुद), लीची सभी मिथिला के पाग पर दिखेंगे और राष्ट्रीय ही नहीं, अंतराष्ट्रीय बाजार में मिथिला पेंटिंग के नाम पर बेचे जा रहे हैं, जाएंगे और फिर कहते भी नहीं थकेंगे “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान…..” ।​

बिहार में मखाना बोर्ड की स्थापना

केन्‍द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी, 2025 को संसद में केन्‍द्रीय बजट 2025-26 पेश करते हुए भारत की विकास यात्रा के लिए ‘कृषि को प्रथम इंजन’ की संज्ञा देते हुए अन्नदाताओं के लाभ के लिए कृषि क्षेत्र के विकास और उत्पादकता में वृद्धि के लिए कई उपायों की घोषणा की।​ बिहार में मखाना बोर्ड की स्थापना के सरकार के निर्णय की घोषणा करते हुए श्रीमती निर्मला सीतारमण ने कहा कि मखानों का उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन में सुधार लाने के लिए बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इन कार्यकलापों में लगे लोगों को एफपीओ में संगठित किया जाएगा। यह बोर्ड मखाना किसानों को पथ-प्रदर्शन और प्रशिक्षण सहायता उपलब्ध कराएगा और यह सुनिश्चित करने के लिए भी कार्य करेगा कि उन्हें सभी संगत सरकारी योजनाओं के लाभ मिले।

​बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित करने के सरकार के फैसले की घोषणा करते हुए श्रीमती सीतारमण ने कहा कि इससे मखाना के उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन में सुधार होगा और साथ ही इन गतिविधियों में लगे लोगों को किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) में संगठित करने में सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा कि बोर्ड मखाना किसानों को सहायता और प्रशिक्षण सहायता प्रदान करेगा और यह सुनिश्चित करने के लिए भी काम करेगा कि उन्हें सभी प्रासंगिक सरकारी योजनाओं का लाभ मिले।​

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने बजट-2025 को विकसित और हर क्षेत्र में श्रेष्ठ भारत के निर्माण की दिशा में मोदी सरकार की दूरदर्शिता का ब्लूप्रिंट बताया। केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने सर्वसमावेशी और दूरदर्शी बजट के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण जी को बधाई दी।

​लेकिन बीबीसी के संवाददाता सीटू तिवारी​ बजट प्रस्तुत होने, मखाना बोर्ड बनने की घोषणा होने के दो माड़ बाद लिखती हैं कि बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के भागलपुर में एक कार्यक्रम में 300 दिन मखाना खाने की बात कही ​थी।जानकारी के मुताबिक़, “बोर्ड का गठन मखाने के उत्पादन, प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और मार्केटिंग को बेहतर बनाने के लिए किया जाएगा. ये बोर्ड मखाना किसानों को प्रशिक्षण सहायता देगा और मखाना उत्पादन से जुड़े लोगों को एफ़पीओ में संगठित ​करेगा।”​

वे लिखती हैं कि मखाना किसानों के लिए पहले भी मोटे तौर पर इन्हीं उद्देश्यों के साथ बिहार में राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र खोला गया था, लेकिन ये मखाना केंद्र खुद ही बदहाल​ है। ​”स्थिति ये है कि इस केंद्र में एक अदद फुल टाइम निदेशक नहीं है और सिर्फ़ 10 स्टाफ़ के सहारे पूरा संस्थान चल रहा है.​ अपने 23 साल के सफ़र में मखाना केंद्र के पास 18 साल तक ‘राष्ट्रीय’ का दर्जा भी नहीं ​रहा।” साल 2002 में राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र के तौर पर खुले मखाना केंद्र से ‘राष्ट्रीय’ होने का दर्जा साल 2005 में छिन गया था, जो साल 2023 में जाकर वापस ​मिला। दरभंगा में मखाने के एक राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र खोलने की योजना नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) में बनी थी. जिसके बाद साल 2002 में मखाना अनुसंधान केंद्र का कैम्प ऑफिस पटना स्थित आलू अनुसंधान केंद्र में ​खुला। बाद में ये केंद्र दरभंगा शिफ्ट हो ​गया। इस केंद्र का उद्देश्य मखाना उत्पादन से जुड़े मुश्किल काम को आसान करने के लिए तकनीक विकसित करना, उत्पादकता, रोज़गार, वैल्यु एडिशन, मार्केटिंग आदि करना ​था। लेकिन मखाना केंद्र की ये उपलब्धियां उसके 23 साल के सफ़र और मखाना उत्पादन से जुड़े लोगों की मुश्किलों के सामने बहुत ‘बौनी’ नज़र आती ​है। दरअसल, मखाना केंद्र खुद ही अपनी समस्याओं से जूझता ​रहा।

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लोकसभा में फरवरी 2025 में कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी के दिए गए जवाब के मुताबिक़, मखाना अनुसंधान केंद्र ने वित्तीय वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच महज 3.4 करोड़ रुपये खर्च किए ​हैं। साल 2024-25 में मखाना केंद्र ने जनवरी माह तक महज 1.27 करोड़ रुपये खर्च ​किये गए। दरअसल, इतनी कम राशि खर्च करने की वजह मखाना अनुसंधान केंद्र का दर्जा ​है। साल 2005 में इस केंद्र से ‘राष्ट्रीय’ का दर्जा वापस लेकर इसे आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) पूर्वी क्षेत्र के प्रशासनिक नियंत्रण में लाया ​गया। बाद में साल 2023 में फिर से मखाना अनुसंधान केंद्र को राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र का दर्जा वापस ​मिला।

​बहरहाल, बिहार में फिलहाल लगभग 35 हजार हेक्टेयर में मखाने की खेती होती ​है। कारण 25000 किसान इससे जुड़े हुए ​हैं। देश में सबसे अधिक मखाना उत्पादन करने वाला राज्य बिहार ​है। अब तो प्रचार-प्रसार के लिए समझें या मिथिला क्षेत्र की मखाना की राजनीति, मखाना महोत्सव भी मनाया जाने लगा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित अन्य नेतागण भी ताल थोक रहे हैं कि मखाना का उत्पादन बढ़ाने को लेकर प्रयास किए जा रहे ​हैं। लक्ष्य है कि अगले दो-तीन साल में 50-60 हजार हेक्टेयर में इसकी खेती हो और 50 हजार किसान मखाने की खेती से ​जुड़े।

मखाने की खेती उत्तरी और पूर्वी बिहार में मखाना की खेती की जाती ​है। इसमें मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, अररिया, सीतामढ़ी और किशनगंज जिले में मखाना की खेती होती ​है। मखाना अपने गुणों के कारण सुपर फूड माना जाता है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में होते हैं। यह पानी में उपजने वाला पौधा है और जलवायु लचीलापन फसल ​है। ​चुकि मखाना की जड़ें पानी के अंदर होती हैं, इसलिए जमीन की सतह पर होने वाली फसलों की तुलना में इस पर तेज गर्मी का असर कम होता है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन का असर मखाना की खेती पर भी पड़ने लगा है।​ लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि मखाने की खेती के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है। 40 डिग्री से अधिक तापमान इसके लिए बिल्कुल अच्छा नहीं है। हर तीन-चार साल में एक बार मखाना की फसल पर ड्राई स्पेल (सूखे का दौर) आ जाता है, जिससे किसानों को नुकसान होता है।

मखाना का उत्पादव और बिहार

भारत दुनिया का लगभग 90 प्रतिशत मखाना उत्पादित करता है और इस उत्पादन ​ में बिहार का योगदान करीब 85 फीसदी से भी अधिक है। बिहार के 38 जिलों में से छह जिले “एक जिला, एक उत्पाद” (ओडीओपी) योजना के तहत मखाना की खेती के लिए चिह्नित किए गए हैं। ये जिले हैं – दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, सुपौल, अररिया और कटिहार। ओडीओपी योजना के तहत इन जिलों के किसानों को इनपुट खरीद, सामान्य सेवाओं का लाभ लेने और उत्पादों के विपणन के लिए ज्यादा सुविधाएं मिलती हैं। हालांकि, मिथिलांचल और कोसी-सीमांचल के 10 जिलों में मखाना की खेती होती है और उन जिलों के किसान बिहार सरकार द्वारा संचालित मखाना विकास योजना का लाभ लेने के पात्र हैं। ये 10 जिले हैं – कटिहार, पूर्णिया, मधुबनी, किशनगंज, सुपौल, अररिया, मधेपुरा, सहरसा, दरभंगा और खगड़िया। वर्ष 2022 में मिथिला मखाना को​ जीआई टैग भी मिला है।

बिहार में मखाना की खेती तेजी से बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2012-13 में मखाना का रकबा 13,000 हेक्टेयर था, जो वर्ष 2021-22 में बढ़कर 35,224 हेक्टेयर हो गया। यह 171 प्रतिशत की वृद्धि है। इस दौरान मखाना के उत्पादन में भी 152 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2012-13 में 9,360 टन मखाना का उत्पादन हुआ था, जो 2021-22 में बढ़कर 23,656 टन हो गया। इसी दौरान मखाना के बीज का उत्पादन भी 56,389 टन हो गया।​ इसके उत्पादन में 70 फीसदी हिस्सा सिर्फ मिथिलांचल का है। ​आज बिहार के अलावा बंगाल, असम, उड़ीसा, जम्मू कश्मीर, मणिपुर और मध्य प्रदेश में भी इसकी खेती की ​जा रही है। मखाना की खपत देश के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी है। भारत के अलावा चीन, जापान, कोरिया और रूस में मखाना की खेती की जाती है। मखाना के निर्यात से देश को हर साल 25 से 30 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

​मनीष आनंद और मिथिला नेचुरल्स

​बहरहाल, मनीष आनंद ​(मिथिला नेचुरल्स​) मधुबनी जिले के अरेर गांव में 70,000+ वर्ग फुट का दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत माखन प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित किया।​ मनीष आनंद एक अनुभवी पेशेवर हैं, जिन्होंने अपने अनुभव और व्यावसायिकता का उपयोग अपने गांव जराइल-अरेर, क्षेत्र मिथिला और राज्य बिहार में गांव के पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाने के लिए करने के लिए शानदार एमएनसी जीवन को छोड़ दिया।​ उन्होंने 24 से अधिक देशों के बाज़ार में काम किया और कंट्री मैनेजर के रूप में दक्षिण एशिया को संभाला। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार का गहन ज्ञान और अनुभव है।​ उन्होंने आकर्षक लेकिन नीरस नियमित कॉर्पोरेट जीवन को छोड़ दिया और बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी ब्लॉक में अपने गांव जराइल में ‘वापस जड़’ पर जाने का फैसला किया।

वे एक दूरदर्शी और बिहार के सबसे तेजी से बढ़ते ब्रांड, मिथिला नेचुरल्स के संस्थापक हैं। उन्होंने 2012 में मिथिला के साथ अपनी यात्रा शुरू की। मिथिला/बिहार और इसकी ताकत और कमजोरियों का अध्ययन करने के बाद, उन्होंने कृषि आधारित कृषि उपज में अपनी अगली पेशेवर यात्रा शुरू करने का फैसला किया, जो मिथिला/बिहार की ताकत है। उन्होंने अपने गाँव के तालाब में मखाना की खेती देखी और मखाना में उतरने का फैसला किया। अगले 3 वर्षों में, उन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया, बाजार का अध्ययन किया, संभावित विकास का अनुमान लगाया, मूल्य वर्धित मखाना के दायरे पर शोध किया, किसानों, फोरिस, मनी लेंडर्स, व्यापारियों, स्टॉकिस्ट, जमाखोरों जैसे हितधारकों से मुलाकात की और 2015 में दिल्ली हाट, आईएनए में पहला प्रोटोटाइप उत्पाद लॉन्च किया। तब 4 उत्पाद लॉन्च किए गए थे; फूल मखाना, भुना हुआ फ्लेवर्ड मखाना, मखाना पाउडर और मखाना पाक।

2018 में उन्होंने मिथिला से पहला एकीकृत खाद्य ब्रांड ‘मिथिला नेचुरल्स’ और पहला प्रीमियम फूल मखाना ब्रांड ‘मिथिला मखान’ लॉन्च करने का फैसला किया। यह सफल रहा और अब उनके उत्पाद बास्केट में 100 से अधिक SKU हैं जो दुनिया भर में अब तक 10 मिलियन से अधिक पैकेट बेचे जाने के साथ बढ़ रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अमेरिकी उपभोक्ता बाजार का पता लगाने के लिए अपनी कंपनी मिथिला नेचुरल्स यूएसए कॉर्प को पंजीकृत किया, जो दुनिया में सबसे बड़ा है। और अंदाज़ा लगाइए, उनके सभी एंड टू एंड उत्पाद मूल्य श्रृंखला उत्पादन उनके दूरदराज के गाँव से आते हैं जहाँ समाज के कमज़ोर वर्ग की ज़्यादातर अकुशल महिला कर्मचारी काम करती हैं। यू.के. एम.एन.सी. के लिए काम करते समय अपनी शुरुआती प्रवृत्ति में, उन्होंने 6 व्यावसायिक लाइनें (ऑप्थैल्मिक ग्लास, ऑप्टिकल ग्लास, एक्सरे ग्लास, ग्लास मास्टर, न्यूक्लियर ग्लास, बिल्डिंग ग्लास) स्थापित कीं और भारत और पड़ोसी देशों में एंटीस्लिप उत्पादों का व्यवसाय बनाया।

उन्होंने अपने व्यवसाय को तकनीकी उत्पादों से बिल्डिंग उत्पादों में बदल दिया और अंततः ‘आटा-डेटा’ सिद्धांत में विश्वास करते हुए कृषि और खाद्य क्षेत्र में बदल दिया। हमारा लक्ष्य 10 साल में 10 हजार करोड़ का ब्रांड बनना है। हमारा लक्ष्य पूर्वी भारत का अग्रणी घरेलू खाद्य ब्रांड बनना है। हमने मखाना से शुरुआत की है, लेकिन हम स्टेपल में भी प्रवेश कर रहे हैं और घरों में रोजाना खाए जाने वाले सभी खाद्य उत्पाद जैसे चावल, दाल, बेसन, सत्तू, आटा, सूखे मेवे, खाद्य तेल, मसाले, बेकरी, डेयरी, पानी आदि बनाएंगे। हम कैसे बेचेंगे? हम B2B आपूर्ति के साथ-साथ पारंपरिक, आधुनिक, ईकॉम और डार्क स्टोर मॉडल पर काम कर रहे हैं। हम D2C से आगे बढ़कर D2V मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं।

मखान-पोखर वाली सभी तस्वीरें अजय कुमार कोशी बिहार के सौजन्य से

1 COMMENT

  1. Bahut sundar aur satik baat likhe hai 👌. Ye baat sahi men ajiv lagta hai ki Makhan ka mala aur Paag ka apne swarth ke liye jo neta kar rahe hai wo bilkul sahi nahi kar rahe hai. Paag ka mahatwa aur usko kisko dena chahiye? kya wo us smman ke layak hai! Us baat se koi sarokaar nahin hai. Kahin kahin to idhar wo paag pahnaya gaya aur dusre taraf usko fenk diya jata hai side men jo bahut dukhad hai😢

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