लालू यादव के ‘चरवाहा विद्यालय’ के छात्र को ‘भाजपा’ बिहार का ‘मुख्यमंत्री’ बनाया, ‘पैरवी’ नीतीश कुमार किये, भाजपा में ‘कलह’ शुरू (नीतीश के बाद बिहार-1)

सातवां पास वनाम प्रदेश का मुख्य सचिव ​: इस दृश्य को देखकर लालू प्रसाद यादव की याद आना स्वाभाविक है। कुछ भी हो लालू यादव पटना विश्वविद्यालय से विधि स्नातक थे।

पटना / नई दिल्ली: आज इंडियन नेशन अख़बार के पूर्व संपादक ब्रजनन्दन आज़ाद, दीनानाथ झा, आर्यावर्त के संपादक श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, ब्रज किशोर झा ‘भास्कर’, हीरानंद झा ‘शास्त्री’, परमाननद झा ‘शास्त्री’, रामजी मिश्र ‘मनोहर’, सर्चलाइट के महेश प्रसाद, मुरारी मोहन प्रसाद, टीजेएस जॉर्ज, आरके मुक्कर, प्रदीप अख़बार के संपादक रामसिंह भारतीय, हरिओम पांडे, पारसनाथ सिंह, हरिनारायण निगम याद आ गए। उनकी धारदार कलम याद आ गया। आज अगर वे सभा होते तो देश के महान ज्ञाता, संविधान के निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के 135 वें जन्मदिवस पर बिहार की राजनीति में जो भूचाल आया उस पर सम्पादकीय अवश्य लिखते कि “स्वतंत्रता के 80 साल बाद भी, कागज पर प्रदेश का शैक्षिक दर भले 74 प्रतिशत (पुरुष-82% और महिला-66%) दीखता हो, लालू प्रसाद यादव द्वारा स्थापित चरवाहा विद्यालय का छात्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बना।”

कहने-सुनने में यह शब्द बहुत कटु लगता है, लेकिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 16 नवम्बर, 1968 को जन्म लिए 57-वर्षीय राकेश कुमार या सम्राट चौधरी में ऐसा क्या दिखा जो पहले समता पार्टी, फिर राष्ट्रीय जनता दल, फिर जनता दल यूनाइटेड और अंत में भारतीय जनता पार्टी का दामन पकड़ने वाले सकुनी चौधरी के पुत्र के हाथों प्रदेश का कमान सौंप दिया। उधर, दो दशक से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे नीतीश कुमार, जो बाद में तथाकथित विकास पुरुष’ के प्रत्यय से अलंकृत हुए, के समक्ष ऐसी कौन सी ‘मज़बूरी’ थी जो “सत्ता का हस्तानांतरण’ इस कदर किये कि 4 जून, 1947 को वायसराय माउंटबेटेन द्वारा देश को सम्बोधित किये गए संवादों को भी पीछे छोड़ गए। 

भारतीय हाथों में सत्ता के हस्तांतरण से सम्बंधित अपने अंतिम प्रसारण में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन कहा था: “आज रात आपको एक बयान पढ़कर सुनाया जाएगा, जिसमें महामहिम की सरकार का वह अंतिम फैसला बताया जाएगा कि किस तरीके से सत्ता ब्रिटिश हाथों से भारतीय हाथों में सौंपी जाएगी। लेकिन ऐसा होने से पहले, मैं भारत की जनता को एक निजी संदेश देना चाहता हूँ, और साथ ही उन चर्चाओं के बारे में भी संक्षेप में बताना चाहता हूँ जो मैंने राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ की हैं, और जिनके आधार पर मैंने लंदन की अपनी हालिया यात्रा के दौरान महामहिम की सरकार को अपनी सलाह दी थी। मार्च के आखिर में भारत आने के बाद से, मैंने लगभग हर दिन ज़्यादा से ज़्यादा समुदायों और हितों के नेताओं और प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करने में बिताया है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझे जो भी जानकारी और उपयोगी सलाह दी है, उसके लिए मैं उनका कितना आभारी हूँ। पिछले कुछ हफ्तों में मैंने जो कुछ भी देखा या सुना है, उससे मेरी यह पक्की राय ज़रा भी नहीं बदली है कि अगर समुदायों के बीच थोड़ी-बहुत भी सद्भावना हो, तो एक एकीकृत भारत ही इस समस्या का सबसे बेहतरीन हल होगा।

वायसराय माउंटबेटन आगे कहे थे: “सौ साल से भी ज़्यादा समय से, आप 40 करोड़ लोग एक साथ रहते आए हैं, और इस देश का शासन एक ही इकाई के तौर पर चलाया गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि संचार, रक्षा, डाक सेवाएँ और मुद्रा व्यवस्था एकीकृत हो गई हैं; टैरिफ और सीमा-शुल्क की रुकावट खत्म हो गई है; और एक एकीकृत राजनीतिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी गई है। मेरी सबसे बड़ी उम्मीद यही थी कि सांप्रदायिक मतभेद इस एकता को नष्ट नहीं करेंगे भारतीय लोगों का फ़ैसला चाहे जो भी हो, मुझे पूरा भरोसा है कि जिन भी ब्रिटिश अधिकारियों या अफसरों से कुछ समय के लिए रुकने को कहा जाएगा, वे उस फैसले को लागू करने में अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। हिज़ मैजेस्टी और उनकी सरकार, दोनों ने ही मुझसे आप सभी को भारत में आपके भविष्य के लिए अपनी दिली शुभकामनाएं और अपने निरंतर सद्भाव का भरोसा देने को कहा है। मुझे भारत के भविष्य पर पूरा भरोसा है और इस ऐतिहासिक समय में आप सबके साथ होने पर मुझे गर्व है। उम्मीद है कि आपके फैसले समझदारी से लिए जाएंगे और उन्हें गांधी-जिन्ना की अपील की शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण भावना के साथ लागू किया जाएगा।”

लेकिन, नीतीश कुमार, जो पिछले दो दशक से प्रदेश मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे, करीब छह मिनट तक अपने मंत्रिमंडल के लोगों के समक्ष विदाई भाषण तो दिए, यह भी कहा कि वे अपने सामर्थ्य और क्षमता के अनुरूप कार्य करने की अनवरत कोशिश किये, उनके कुछ खास लोग भाव विह्वल भी हुए, वे अपने मंत्रिमंडल के लोगों से पूछे भी कि क्या उनका फैसला सबों को मंजूर है अथवा नहीं? सभी हामी भी भरे, सभी यह भी कहे कि उनकी कमी खलेगी – लेकिन अपने इस निर्णय को लेने से पहले अथवा निर्णय लेने के बाद प्रदेश की जनता से, चाहे उसकी शैक्षिक दर औसतन 74 फीसदी ही हो, एक बड़ा समुदाय भले पढ़ना-लिखना नहीं जानता हो, लेकिन बहरा कोई नहीं है, सुन सकता था, उसे अपने बात न जाते-जाते अथवा जाने के बाद भी नहीं कहे – जिसने इन 21 वर्षों में अपना बहुमूल्य मत देकर उन्हें और उनके जनता दल यूनाइटेड को सूत्रबद्ध रखा। यह तो उनकी ‘कुछ निजी’ और ‘कुछ राजनीतिक कमजोरी’ रही होगी, जिसके कारण अपने दर्जनों  विधानसभा क्षेत्र, जिस पर वे जीतते आये, भारतीय जनता पार्टी को शनै-शनै सौंपते आये और अंततः स्वयं के साथ-साथ प्रदेश की सत्ता को भी जनता के विचार को पूछे बिना सौंपकर दिल्ली की ओर कूच कर गए। आने वाले दिनों में बिहार के भाजपा में और जनता दल यूनाइटेड के नेताओं के बीच क्या-क्या होगा, यह नेपथ्य में लिखा जा रहा है।

सम्राट चौधरी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के दर्जनों नेताओं का गाल, मुंह सभी फुले हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बको ध्यानम लगाए रखने वाले नौजवान नेतागण कभी विधानसभा की ओर, तो कभी मंत्रालय की ओर त्यों कभी दिल्ली की ओर देखते नजर आ रहे हैं। कई नेता तो नेपथ्य में बैठे, अवकाशप्राप्त नेताओं से भी तालमेल जुटा रहे हैं। शायद यही राजनीति है। अगर आपकी पहुँच विधानसभा और मंत्रालय तक है तो साक्षात्आ देखें अन्यथा तस्वीरों का अवलोकन कर उनकी शारीरिक भाषाओँ को पढ़ें। खैर। 

सत्तर-अस्सी के दशक के सम्पादकों की याद आज इसलिए आ रही है कि आज से 51-वर्ष पहले 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल लगा था। आपातकाल की घोषणा के साथ ही प्रदेश की राजधानी पटना से प्रकाशित सभी अख़बारों के दफ्तरों में सरकारी मुलाजिम तैनात हो गए थे। अख़बारों में क्या प्रकाशनीय है और क्या नहीं, अपने-अपने कलम की लाल स्याही से निशान लगाने लगे थे। लोगों कह रहे थे कि अंग्रेजी हुकूमत के बाद स्वतंत्र भारत में शायद पहली बार ‘कलम की गिरफ़्तारी’ हुयी थी। पत्रकारों के चेहरों पर ‘सूजन’ दिखने लगा था। होठों के साथ-साथ कलम के स्याही में सूखने लगे थे। कागज पर कलम चले कोई 30 – घंटा से अधिक समय निकल गया था। 

इंडियन नेशन के तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा, जिस सम्पादकीय को लिख कर गए थे और सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने स्थान – बाएं पृष्ठ, बायां हाथ, सबसे ऊपर – पर लगा हुआ था, तत्काल हटा दिया गया। कुछ काल बाद वे स्वयं दफ्तर पहुंच गए थे। उनके आने का अर्थ था सम्पादकीय विभाग के सभी कर्मियों की उपस्थिति, वह भी प्रेस में। मशीन के आस-पास बाएं हाथ ‘इंडियन नेशन’ और दाहिने हाथ ‘आर्यावर्त’ अख़बारों का जहाँ पृष्ठ बन रहा था, मेला जैसा दिख रहा था। उन दिनों लोगों कह रहे थे कि प्रेस के अंदर ऐसी भीड़ शायद जंगे आज़ादी के बाद पहली बार हुई थी। 

दूसरे दिन अखबार का प्रातः संस्करण प्रकाशित हुआ। कितने अखबार प्रकाशित हुए थे, कितने बिके, न मुद्रक को मालूम था और ना ही मानदाता सिंह (अखबार के एजेंट थे) को। कुछ काल दोनों अख़बारों का सम्पादकीय विभाग खाली रहा, लेकिन जैसे ही घड़ी की सूई 10 की ओर बढ़ रही थी, लोगों का आना प्रारम्भ हो गया। सम्पूर्ण दफ्तर में सुई रखने का जगह नहीं था। पटना विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं से लेकर शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के नेताओं का आना-जाना शुरू हो गया था। 

कोई साढ़े दस बजे रिक्शा पर बैठे, कागजों का अम्बार लिए दीना नाथ झा परिसर में पधारे। मैं प्रथम द्रष्टा था। उनके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था आज कुछ होने वाला है। इसी बीच, सरकारी प्रतिनिधि में अपनी-अपनी गाड़ियों से पटना से प्रकाशित सभी समाचार पत्रों के दफ्तरों में आना-जाना शुरू कर दिए थे ‘अधिसूचना’ के साथ – कोई भी सामग्री बिना सरकारी मुलाजिमों को दिखाए अख़बार में प्रकाशित नहीं होगा। दीना बाबू, ज्वाला नंदन सिंह,गजेंद्र नारायण चौधरी, रिपूर्णानंद पांडे, दुर्गानाथ झा, मिथिलेश मैत्रा, केशव कुमार, सीता शरण झा, सुरपति झा, राजकुमार झा (आज सभी दिवंगत)और अन्य सभी सम्पादकीय विभाग के लोग कक्ष में उपस्थित थे। बीच-बीच में स्थानीय नेताओं का आना-जाना लगा था। जो आम तौर पर संध्याकाळ आते थे, जून के महीने में तपती धुप में आ रहे थे। 

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शाम में जब लाइनो विभाग के प्रमुख मोहम्मद सुभान खान को दीना बाबू का ‘पहला सम्पादकीय’ मिला तो उसे पढ़कर वह जोर से चिल्लाये, ठहाका लगाए, और सबों को अपने पास आने को कहे। अपने जीवनकाल में वे शायद पहली बार दीना बाबू लिखित ऐसे सम्पादकीय को पढ़े थे। सभी आश्चर्य चकित थे – लेकिन सभी उस सम्पादकीय में शब्दों के प्रयोग, वाक्यों के विन्यास और भाव से यह जान गए थे कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की इस हरकत के प्रति बिहार के लोगों की क्या राय है। 27 जून, 1975 का सम्पादकीय था – ‘आलू-बैगन की सब्जी कैसे बनाएं – क्योंकि लिखने के लिए कुछ था ही नहीं।  जो लिखते उसे सरकारी अधिकारी प्रकाशन में जाने ही नहीं देते। 

आज 51-वर्ष बाद जिस तरह कांग्रेस के तर्ज पर भाजपा के ‘आला कमान’ (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह/सहकारिता मंत्री अमित शाह) के निर्णय के आधार पर बिहार में 24 वें मुख्यमंत्री के रूप में सातवीं कक्षा पास सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया, आज भी अब लिखने को कुछ बचा नहीं है। जिस तरह पूर्व-मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रदेश के मतदाताओं के साथ ‘स्वहित’ में छल किया यह जानते हुए भी की विगत 21 वर्षों में जिस तरह बिहार का मतदाता उनके साथ खड़ा रहा और वे कुर्सी पर बैठे रहे, उसे बिना बताये, उसकी राय बिना लिए सत्ता को लालू यादव के चरवाहा विद्यालय के छात्र के हाथों सौंपकर दिल्ली सल्तनत की ओर कुछ किये – वेवजह नहीं हो सकता है। आज नीतीश कुमार भले उन तथ्यों का उजागर नहीं करें, कल समय स्वयं उसे सार्वजनिक कर देगा। 

2005 में भाजपा के 55 और जनता दल यूनाइटेड के 88 विधायक थे बिहार विधानसभा में। 2010 में भाजपा विधायकों की संख्या 91 हुई और जनता दाल यूनाइटेड की संख्या 115 हो गयी। पांच साल बाद जनता दाल यूनाइटेड की संख्या अचानक गिरकर 71 हो गयी और भाजपा की संख्या भी 53 पर लुढ़की। 2015 के बाद, यानी जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी, नीतीश कुमार भाजपा के अधीन वशीकरण होते गए। जिसका दृष्टान्त 2020 विधानसभा चुनाव में दिखा। एक तरफ भाजपा की संख्या जहाँ 53 से 74 हो गयी, वहीं जनता दल यूनाइटेड की संख्या 53 से 43 हो गयी। विगत 2025 के चुनाव में भाजपा 74 से 89, जनता दल यूनाइटेड 43 से 85 और राष्ट्रीय जनता दल 75 से 25 पर आ गयी। वैसे राजनीतिक विशेषज्ञ यह कि नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण आंदोलन के सहकर्मी रहे लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक मन्त्र को – मुस्लिम यादव समीकरण, जिसके बल पर राष्ट्रीय जनता दल कई वर्षों तक शासन में रहा – नष्ट कर आगरा-पिछड़ा एक ऐसा समीकरण बनाए जिसके दम पर वह 21 वर्षों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे।

बिहार के राजनीतिक विशेषज्ञ इस बात को मानते हैं कि प्रदेश में राजनीतिक सियासत में सामाजिक और जातीय समीकरण अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दो वर्ष पूर्व 2 अक्टूबर, 2023 को बिहार में कराई गई जाति आधारित गणना के आंकड़े सार्वजनिक किये थे।बिहार विधानमंडल ने 18 फरवरी 2019 को राज्य में जाति आधारित जनगणना (सर्वे) कराने का प्रस्ताव पारित किया था। रिपोर्ट के मुताबिक अति पिछड़ा वर्ग 27.12 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग 36.01 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 19.65 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 1.68 प्रतिशत और अनारक्षित यानी सवर्ण 15.52 प्रतिशत हैं। इस जातिगत सर्वे से बिहार में आबादी का धार्मिक आधार भी पता चला। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में हिंदू 107192958 (कुल आबादी का 81.9%) है, जबकि मुसलमानों 23149925 (कुल आबादी 17.7%), ईसाई 0.05 प्रतिशत, बौद्ध 0.08 प्रतिशत, जैन 0.009 प्रतिशत है। 

जिस कालखंड में जेपी अंतिम सांस लिए, प्रदेश की आवादी करीब साढ़े पांच करोड़ के आस-पास थी। प्रदेश में शैक्षिक दर करीब 34-36 फीसदी तक आयी थी, जिसमें पुरुषों का शैक्षिक दर तक़रीबन 45 फीसदी आँका गया था और महिलाओं की शैक्षिक दर 22 फीसदी। आज जयप्रकाश नारायण की मृत्यु के साढ़े चार दशक बाद प्रदेश में शैक्षिक दर कागज पर भले 74+ फीसदी लिखा हो, पुरुषों (82+%) की तुलना में महिलाएं (66+%) आज भी 20 फीसदी पीछे हैं। और 20 फीसदी अशिक्षित महिला मतदाताओं को  को चुनाबी मैदान में ठगना कोई बड़ी बात नहीं है। खासकर जब प्रदेश का नेतृत्व देने वाला स्वयं सातवां पास हो। आज भी भाजपा का विधानमंडल में इतनी संख्या नहीं है कि वह अपने दम पर सरकार बना सके। वैसे आज किसी भी राजनीतिक पार्टी प्रदेश में अकेले सरकार बनाने के काबिल नहीं हैं। इस दृष्टि आला-कमान ने यह निर्णय लिया कि राजनीतिक तालमेल को बनाये रखने के लिए, प्रदेश की सभी जातियों को कमोवेश राजनीतिक गलियारे में स्थान बरकरार रखने के लिए जनता दल यूनाइटेड के कोटे से विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र यादव को डिप्टी सीएम बनाया जाय।

डॉ. भीमराव आंबेडकर के 135 वे जन्मदिवस पर भारतीय जनता पार्टी के ‘कल के उप-मुख्यमंत्री’, सम्राट चौधरी, आज के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। वह इस पद पर बैठने वाले भाजपा के पहले नेता हैं। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) ने चौधरी को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन में भाजपा, जनता दल (यूनाइटेड) और अन्य तीन पार्टियां शामिल हैं। चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार में जनता दल यूनाइटेड की तरफ से दो उपमुख्यमंत्रियों ने शपथ ली। उल्लेखनीय है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में भाजपा के दो उप-मुख्यमंत्री थे, चौधरी की सरकार में जनता दल यूनाइटेड के दो उपमुख्यमंत्री हैं। संसदीय बोर्ड ने शिवराज सिंह चौहान को इस बदलाव के लिए “केंद्रीय पर्यवेक्षक” नियुक्त किया था। 

आपको याद हो अथवा नहीं, लेकिन भारत सरकार के दस्तावेजों के साथ-साथ इंटरनेट और विभिन्न टीवी चैनलों, सोशल मीडिया पर आज भी उपस्थित है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार को सार्वजनिक मंच से बिहार में उनके राज में भ्रष्टाचार के घोटाले उजागर किये थे। जिस दिन मंच से प्रधानमंत्री यह बोल रहे थे, बिहार के लोगों में, खासकर मतदाताओं में एक आशा की किरण जगी – शायद प्रदेश का कुछ अच्छा होने वाला है। लेकिन समय बदलते गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक होते गए। इतना ही नहीं, आने वाले दिनों में भी शायद उन घोटालों से पर्दा कभी नहीं उठ पायेगा। 

ग्यारह साल पहले 30 अक्टूबर, 2015 को चुनाव प्रचार-प्रसार के दौरान लालू प्रसाद यादव के जन्मस्थान गोपालगंज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सार्वजनिक रूप से कहे थे : “नीतीश बाबू …. अरे चुनाव में तो हार जीत होती रहती है, ऐसा क्यों कर रहे हो? नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा था कि “दिल्ली में भी रोजाना भ्रष्टाचार के मामले आते थे। टूजी हो या कोयला, सब में पैसा खाया। लेकिन 16 महीनों से मुझ पर भ्रष्टाचार को कोई आरोप नहीं है।  नीतीश पर हमला करते हुए मोदी ने कहा, “हालत तो देखिए, नीतीश के मंत्री कैमरे के सामने पैसे लेते पकड़े गए, ये कम बड़ा अपराध है क्या? लेकिन उन्हें कोई शर्म है क्या? नीतीश ने कहा था जो भ्रष्टाचार में पकड़ा जाएगा उसके घर में गरीबों के लिए स्कूल खोला जाएगा। लालू को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल हुई, उनके घर को जब्त किया क्या? किसे पागल बना रहे हो नीतीश बाबू? इतना ही नहीं उनके मंत्री बिहार को बेच रहे हैं। नीतीश बाबू आपने अपने मंत्रियों के घर जब्त किए क्या? कोई कार्रवाई की क्या? अभी तो आपकी सरकार है। इन 25 सालों में इन्होंने जो किया है उसकी सूची है।” गोपालगंज की सभा में 84 सेकेंड तक महागठबंधन के नेताओं के समय की घोटालों की सूची लगातार 80 सेकेंड में उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार के समय के 25 और लालू यादव के समय के 7 घोटाले गिनाए। फिर 4 सेकेंड में बोले- मैं महागठबंधन के महाशय के चारा घोटाले को तो गिन ही नहीं रहा हूं। उसके बाद वे प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार और जंगलराज पर बोले। 

नितीश कुमार के कालखंड में हुए घोटालों को गिनाते, मसलन दवा खरीद घोटाला, ट्रांसफाॅर्मर खरीद घोटाला, एस्टीमेट घोटाला, फर्टिलाइजर सब्सिडी घोटाला, मस्टर रोल घोटाला, राशन-किरासन घोटाला, शराब घोटाला, इंदिरा आवास घोटाला, मनरेगा घोटाला, शौचालय घोटाला, कोसी केनाल निर्माण घोटाला, मिड डे मील घोटाला, आंगनबाड़ी घोटाला, कुलपति घोटाला, पथ निर्माण घोटाला, पुल निर्माण घोटाला, शिक्षा अभियान घोटाला, टेक्स्टबुक छपाई घोटाला, परिवहन घोटाला, वायरलेस बैटरी खरीद घोटाला, बियाडा जमीन घोटाला, बुद्ध स्मृति पार्क घोटाला और चावल घोटाला, प्रधानमंत्री सांस भी नहीं लिए। लेकिन दुर्भाग्य है कि इन विगत वर्षों में कौन किसकी आलोचना क्यों किये यह तो वे भी जानते हैं और नितीश कुमार – लालू यादव एंड कंपनी तो जानते ही हैं।  

बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक। 

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जहाँ तक प्रदेश में भाजपा का नेतृत्व और लोगों पर उसकी पकड़ का प्रश्न है, वह अभी 20 फीसदी से अभी अधिक नहीं है। अगर इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं होता तो औसतन 60 फीसदी से अधिक अभ्यर्थी मुंह के बल गिरते। कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24), दिलीप कुमार जायसवाल (2024 -दिसंबर 2025 तक) और संजय सराओगी (दिसंबर 2025 से अब तक) ये सभी पिछले 46 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। लेकिन बिहार में अब तक बने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष में शायद सम्राट चौधरी का कालखंड सबसे कम है (24 मार्च, 2023 को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बने और 26 जुलाई, 2024 को दिलीप कुमार जायसवाल को कुर्सी पद देकर हटे) – कुल 489 दिन। अब इन दिनों को आधार मानकर अगर भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री के काबिल समझ लिया, तो इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि आने वाले दिनों में राजनीति शास्त्र के देशज और विदेशज छात्र-छात्राएं इन विषय पर शोध अवश्य करेंगे। यह भी शोध का विषय मानेंगे की आखिर ऐसा क्या हुआ कि बिहार में भाजपा को पहचान देने वाला सुशील कुमार मोदी को भाजपा का  केंद्रीय आला कमान कभी आए आने नहीं दिया? 

बिहार के लोग जब नरेंद्र मोदी का नाम नहीं सुने थे, बिहार में सुशील मोदी का नाम घरेलू हो गया था। अगर राजनीति नहीं हो और राज नेता के अनुयायी ‘निष्पक्ष निर्णय लेने लायक हो, तो आज ही नहीं, आने वाले काल खंडों में भी आधुनिक बिहार (जय प्रकाश नारायण आंदोलन के बाद) में अगर किसी भी ‘शिक्षित’, ‘तथ्यगत जानकारी रखने वाला’, ‘स्पष्टवक्ता’ राजनेताओं का नाम लिया जाएगा तो वह नाम ‘एक वचन” से बहुवचन नहीं हो पाएगा और सुशील मोदी के नाम पर पूर्ण विराम भी लग जाएगा। आज बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गुलबंद बांधकर भले भारतीय जनता पार्टी के आला नेता के संग बैठकर कुर्सी का मज़ा लें, ठहाका-पर-ठहाका लगाएं, आला नेता भले यह स्वीकार नहीं करें, लेकिन हक़ीक़त यही है कि बिहार में सन् सत्तर के दशक के बाद पहले ‘दीपक’ को ‘बुझने’ से बचाये रखने, जलाये रखने और फिर कमल को खिलने-खिलाने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया तो वह पटना के राजेंद्र नगर रोड नंबर 8 के निवासी सुशील कुमार मोदी के अलावे कोई नहीं था। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा भी सुशील मोदी के सामने बौने हैं। भले वे गोल-मटोल होकर, गोल-मटोल बातें कर सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हों।

हम सभी प्रथम द्रष्टा हैं। सुशील मोदी जेपी आंदोलन की उपज माने जाते थे। जयप्रकाश आंदोलन से रामजनम सिन्हा, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, नरेंद्र सिंह, सुशील मोदी, शिवानंद तिवारी जैसा राजनीतिक नेताओं का जन्म हुआ। सुशील मोदी की छात्र राजनीति की शुरुआत साल 1971 में हुई जब वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ की पांच सदस्यीय कैबिनेट के सदस्य निर्वाचित हुए। 1973 में वो महामंत्री चुने गए। उस वक़्त पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और संयुक्त सचिव रविशंकर प्रसाद चुने गए थे। भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांतकार और संघ विचारक रहे केएन गोविंदाचार्य को सुशील कुमार मोदी का राजनीतिक गुरु माना जाता है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल के दौरान मोदी बिहार की राजनीतिक वातावरण में उभर कर आए। अपनी वाक्पटुता, स्पष्ट विचार के कारण वे पटना के मजदूरों से लेकर शिक्षाविदों तक सभी के पसंदीदा रहे। आपातकाल के दौरान वे 19 महीने जेल में रहे। सन 1977 से 1986 तक वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। बिहार की राजनीति में सुशील मोदी अपना नाम अपने दम पर लिखा। सन 1968 में वे राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और आजीवन आरएसएस के कार्यकर्त्ता बने रहे। सन 1974 आंदोलन के दौरान वे बिहार प्रदेश छात्र संघर्ष समिति के सदस्य बने। सन 1983 आते-आते वे विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय महासचिव के पद पर आसीन हुए। 1990 में सुशील कुमार मोदी ने पटना केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े और विधानसभा पहुंचे। 1995 और 2000 का भी चुनाव वो इसी सीट से जीते। साल 2004 में उन्होंने भागलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीता था। साल 2005 में उन्होंने संसद सदस्यता से इस्तीफा दिया और विधान परिषद के लिए निर्वाचित होकर उपमुख्यमंत्री बने। साल 2005 से 2013 और फिर 2017 से 2020 के दौरान वो बतौर उपमुख्यमंत्री अपनी भूमिका निभाते रहे। इस दौरान वो पार्टी में भी अलग-अलग दायित्व संभालते रहे। दिसंबर, 2020 में उन्हें पार्टी ने राज्यसभा भेजा। 

नब्बे में जिस पटना केंद्रीय विधानसभा क्षेत्र (अब कुम्हरार विधानसभा क्षेत्र) से सुशील मोदी चुनाव जीते थे, कोई साढ़े तीन दशक बाद आज तक उस विधानसभा क्षेत्र में ‘मोदी के पग के निशान’ दीखते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस स्थान से भारतीय जनता पार्टी का कोई भी अभ्यर्थी चुनावी मैदान में अपनी टोपी उछालेगा, वह सुशील मोदी के नाम से विजय हो जायेगा। राजनीतिक विचारधाराओं में विविधता के वावजूद इस विधानसभा क्षेत्र के सभी लोग सुशील मोदी का बहुत सम्मान करते हैं। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जन्म लिए किसी भी राजनेताओं को, यहाँ तक की वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या अन्य केंद्रीय मंत्रियों को वह सम्मान नहीं प्राप्त हुआ।

लेकिन सम्राट चौधरी का तो दूर-दूर तक कभी न तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ सम्बन्ध रहा, न देश के किसी शाखा में वे कसरत किये, न भाजपा के लिए झंडा उठाया, फिर ऐसी क्या बात हुयी कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह (क्योंकि इन दोनों के अलावे भाजपा में आज कोई है ही नहीं जो निर्णय ले सके, चाहे पार्टी की हो या सरकार  की) के इतने प्रियपात्र हो गए, विश्वासी हो गए कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गयी। 

वैसे पटना के वरिष्ठ पत्रकार कमलाकांत पांडे कहते हैं: “बिहार की राजनीति में इस बदलाव के संकेत पिछले वर्ष नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान ही मिल गए थे, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तारापुर के चुनावी सभा में कहा था कि उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को “बड़ा आदमी” बनाया जायेगा। सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी एक पूर्व सैनिक हैं। शकुनी चौधरी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी और बाद में अलग-अलग समय में लालू प्रसाद तथा नीतीश कुमार के साथ जुड़े। जबकि सम्राट चौधरी ने साल 2017 में भाजपा का दामन थामा। इससे पहले वह एक दशक से अधिक समय तक लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल में थे फिर दो वर्ष तक नीतीश कुमार के पार्टी जदयू में भी रहे। साथ ही, लोजपा और हम के भी राही रहे। सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राबड़ी देवी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री भी रहे। राजद के वर्ष 2005 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी वह लंबे समय तक इस पार्टी के साथ बने रहे, लेकिन 2014 में एक बागी धड़े के साथ जद(यू) में शामिल हो गए, जब जीतन राम मांझी राज्य के मुख्यमंत्री थे। तीन वर्ष बाद उन्होंने जद(यू) छोड़कर भाजपा का रुख किया।

बिहार के एक वरिष्ठ नेता (अपना नाम नहीं लिखना चाहते हैं) कहते हैं: “आज के राजनीतिक माहौल में चाहे किसी भी पार्टी का हो, सत्तारूढ़ हो या विपक्ष, सभी पार्टियों में कांग्रेस के तर्ज पर ‘आला कमान हो गया है। आला कमान शब्द की शुरुआत इंदिरा गाँधी के कालखंड से हुआ। उन दिनों भी जो मैडम के विरुद्ध गया, वह कभी फिर से राजनीती की मुख्यधारा में नहीं आ सका। सीताराम केसरी जी से बड़ा दृष्टान्त और क्या हो सकता हैं। उसी तरह, जयप्रकाश नारायण आंदोलन के बाद प्रदेश में जितने भी नेता जन्म लिए, वे सभी पारम्परिक राजनेता या खानदानी राजनेता नहीं हुए, थे या हैं; बल्कि अर्थ, सामर्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय, दबंगता, व्यापार, व्यवसाय का राजनीतिकरण कर राजनेता बने।

वे कहते हैं: “किसी अन्य का दृष्टान्त देने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही लीजिये। सत्तर के दशक में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पहले अंशकालीन, बाद में पूर्णकालिक प्रचारक बने। करीब सत्रह-अट्ठारह साल बाद 1985 में भाजपा में कार्य कार्य करने का जवाबदेही मिला। सन 1987 में वे गुजरात यूनिट के महासचिव बने। महासचिव बनने के कोई 15-साल बाद 7 अक्टूबर, 2001 को वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने। करीब 12 साल 227 दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में रहने के बाद 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिए। अब सवाल यह है कि पहले राबड़ी-लालू के साथ, फिर नितीश के साथ और फिर भाजपा में, आखिर नरेंद्र मोदी-अमित शाह को इनमें कुछ तो दिखा होगा जो भाजपा में 9-वर्ष होते-होते भारत के दूसरे सबसे बड़े जनसँख्या बाहुल्य, जाति-बाहुल्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिए। इस दृष्टि से सम्राट चौधरी महज एक रबर-स्टाम्प होंगे। केंद्र के इशारे पर कार्य करेंगे। कल आप लालू यादव की आलोचना करते थे, आज लालू यादव के चरवाहा विद्यालय का छात्र ही प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया। आज न भाजपा और ना ही जनता दल यूनाइटेड के किसी भी नेता अथवा विधायक में इतनी क्षमता है कि वे कुछ बोल सकें। सभी अंदर से भयभीत हैं। अगर मुंह खोले तो मंत्रालय से बाहर।

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इतना ही नहीं, दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर इस बात की चर्चा आम है कि भाजपा का केंद्रीय आला कमान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसा कर्मठ, जुझारू मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं बिहार में। बिहार में भाजपा का एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो सिर्फ उनकी बात सुने और वही करे जो वे चाहते हैं। यह कि सुशील मोदी बिहार के लिए सबसे सबल व्यक्ति थे जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते, लेकिन आज वे नहीं हैं, और उनके बाद भाजपा में जो भी व्यक्ति हैं शायद केंद्रीय आला कमाल की बातों को प्रदेश में पूर्णतः लागू नहीं भी करते, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक बात की चर्चा और है कि नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार में जो भी हुए हैं, उन बातों पर कल अगर जांच-पड़ताल करने की बात आये, या फिर, जनतादल यूनाइटेड को ‘डिवाइडेड’ कर विधजायकों को भाजपा के छतरी तले लाने की बात हो, या फिर लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार तथा परिजनों पर शिकंजा कसने की बात आये तो सम्राट चौधरी ही एक मात्र मुख्यमंत्री होंगे हो पीछे नहीं हटेंगे। यह भी तय है।

पूर्व डिप्टी सीएम विजय सिन्हा का राधामोहन सिंह से मिलना बीजेपी के अंदर की राजनीति के अलग हवा दे रहा है।

बीबीसी के पूर्व पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं: “नीतीश कुमार डरपोक हैं। बीस साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने वाला व्यक्ति इतना कमजोर हो जायेगा, इतना डरपोक हो जायेगा, यह बिहार का मतदाता कभी सोचा नहीं होगा। अगर नीतीश कुमार अपने कार्यकाल में सच में विकास पुरुष थे, तो उन्हें केंद्र को चैलेंज करना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया उन्होंने। वे धीरे-धीरे बिना किसी पदचाप के सत्ता का बागडोर भाजपा के हाथों सौंपते गए। वे प्रदेश के उन मतदाताओं के साथ न्याय नहीं किये जिन्होंने पिछले 21 वर्षों से उन्हें देखकर, उनकी पार्टी या उनके पार्टी के लोगों के पक्ष में मतदान किया था। प्रदेश का मुख्यमंत्री को छोड़कर कोई राज्यसभा की कुर्सी पकड़ता है। उन्हें तो चाहिए था मंत्रिमंडल को भंग कर जनमत की बात करते। जनता अगर चाहती उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक लाती। इतना ही नहीं, समाजवाद के पक्ष में, परिवारवाद के विरुद्ध बोलने वाला व्यक्ति अपने राजनीतिक जीवन के अंत में धृतराष्ट्र बन गया। पुत्र मोह में जकड़ गया। पुत्र को उप-मुख्यमंत्री बनाने की बात करने लगा। फिर तो वे लालू यादव, आनंद मोहन सिंह, जीतन राम मांझी, शकुनि चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा, राम विलास पासवान, जगन्नाथ मिश्र, प्रभुनाथ सिंह जैसे नेताओं के साथ पंक्तिबद्ध हो गए।

आज भी बिहार में सभी जातियों के लोगों को चाहे अगारी हो – भूमिहार हो, ब्राह्मण हो, राजपूत हो, कायस्थ हो, शेख हो, पठान हो, या पिछड़ी ओबीसी/ईबीसी) में यादव हो, कोइरी हो, कुशवाहा हो, कुर्मी हो, बनिया हो, कुम्हार हो, तेली हो, धानुक हो, मल्लाह हो, ततवा हो, कनु हो या फिर अनुसूचित जाति में चमार हो, रविदास हो, दुसाध हो, पासवान हो, मुसहर हो, धोबी हो, डोम हो, पासी हो, भुईंया हो या फिर अनुसूचित जनजाति में संथाल हो, गोंड हो, मुंडा हो, अपवाद छोड़कर जो आज से तीस-साल पहले थे, आज भी वहीँ हैं, जहाँ तक उनका या उनके परिवार का विकास का सवाल है। क्या आज कोई चमार, या दुसाध, या डोम या पासी, यहाँ तक की सवर्ण में भी चाहे राजपूत या भूमिहार समाज के निर्धन, अशिक्षित व्यक्ति अपने-अपने समुदायों के तथाकथित रूप से ‘नेता’ कहलाने वाले लोग उन्हें अपने साथ, अपनी कुर्सी पर बैठाकर बात करेंगे, खाना खिलाएंगे ? सब कागज पर है या चुनाव के समय होता है।

सातवां पास वनाम प्रदेश का मुख्य सचिव ​: इस दृश्य को देखकर लालू प्रसाद यादव की याद आना स्वाभाविक है। कुछ भी हो लालू यादव पटना विश्वविद्यालय से विधि स्नातक थे।

एक राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि सम्राट चौधरी का यह सफर भाजपा के पारंपरिक ढांचे से थोड़ा अलग नजर आता है। महज कुछ वर्षों पहले पार्टी में आए इस नेता का अचानक शीर्ष पर पहुंचना कई लोगों के लिए आश्चर्य है, तो कई के लिए असहजता भी। पार्टी के भीतर ही कई वरिष्ठ चेहरे इस उभार से सहज नहीं हैं। कहा जाता है कि शीर्ष नेतृत्व की पसंद कोई और थी, संघ की अपनी सोच थी, लेकिन अंततः राजनीति वही करवाती है, जो जमीन तय करती है। और जमीन ने इस बार सम्राट चौधरी के नाम पर मुहर लगा दी। मुझे तो लगता है कि जाते जाते नीतीश जी ने भाजपा की नहीं चलने दी, और लव कुश समीकरण को ध्यान में रखते हुए साथ ही साथ कुर्मी कोयरी वोट बैंक को बनाए रखने के लिए सम्राट का चयन किया गया, निजी विश्वसनीयता भी पैमाना हो सकती है। कुल मिलाकर सम्राट भाजपा के मुख्यमंत्री तो है मगर मात्र नाममात्र के।

उनका कहना है कि यह वही बिहार है, जहाँ भाजपा दो दशकों तक सत्ता में साझेदार रही, लेकिन अपना एक सर्वमान्य मुख्यमंत्री चेहरा खड़ा नहीं कर पाई। यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है—इतना बड़ा संगठन, इतनी मजबूत विचारधारा, फिर भी नेतृत्व “आयातित” क्यों? भाजपा को बिहार में स्थापित करने वाले स्वर्गीय कैलाशपति मिश्र ओर माननीय गोविंदाचार्य आज क्या सोच रहे होंगे ये तो वही जान रहे होंगे ? क्या बिहार में राजनीति अब भी व्यक्ति आधारित है, न कि विचार आधारित? या फिर यह मान लिया जाए कि यहाँ जीत उसी की होती है, जो पहले से तैयार खिलाड़ी हो—चाहे वह किसी भी पाठशाला से आया हो। विडंबना देखिए, जिस लालू यादव की “पॉलिटिकल पाठशाला” को खत्म करने की कसमें कभी भाजपा नेताओं ने खाई थीं, आज उसी पाठशाला का एक “छात्र” भाजपा के सबसे बड़े चेहरे के रूप में सामने खड़ा है। यह बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा ट्विस्ट है—यहाँ लड़ाई भले विचारों की होती हो, लेकिन जीत अक्सर व्यक्तियों की होती है।

कमलाकांत पांडे कहते हैं कि “सम्राट चौधरी कोइरी समुदाय से आने वाले बिहार के दूसरे मुख्यमंत्री है। इससे पहले 1968 में सतीश प्रसाद सिंह इस समुदाय से मुख्यमंत्री बने थे, जिनका कार्यकाल मात्र पांच दिन का रहा था। अब शीर्ष पद पर पहुंचने के बाद सम्राट चौधरी के सामने बिहार में भाजपा को एक मजबूत राजनीतिक आधार के रूप में स्थापित करने की चुनौती होगी।” कभी नित्यानंद राय के संरक्षण में भाजपा में आए सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक कौशल और पार्टी के ‘कास्ट कार्ड’ के सटीक समीकरण से न केवल विपक्षी दलों को, बल्कि अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं नित्यानंद राय, मंगल पांडेय, प्रेम कुमार, राजीव प्रताप रूडी और विजय सिन्हा जैसे चेहरों को भी रेस में काफी पीछे छोड़ कर मुख्यमंत्री बन गए। कहते हैं एक समय सम्राट चौधरी मुरेठा (साफा) बांधकर, दाढ़ी-बाल बढाकर प्रतिज्ञा लिए कि इसे तब तक नहीं हटाऊँगा जब तक नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर नहीं कर दूंगा। समय का खेल देखिये अयोध्या में प्रतिज्ञा तोड़ दिए जब नीतीश कुमार की सरकार में उप-मुख्यमंत्री बने। एक समय था जब नित्यानंद राय को बिहार भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता था और वे मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। नित्यानंद राय के प्रयासों से चौधरी भाजपा में शामिल हुए थे। उस समय शायद राय भी नहीं सोचे कि आने वाले दिनों में यह खुद नित्यानंद राय और अन्य वरिष्ठ नेताओं के लिए ही बड़ी चुनौती बन जायेंगे।

क्रमशः …..

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