बिहार में ‘स्कूल आओ – खिचड़ी खाओ’, ‘मेडल लाओ-नौकरी पाओ’, ‘तुम करो-हम कुच्छो नहीं करेंगे’ नारा बुलंद, खेल-खिलाड़ियों का विकास फाइलों में हो रहा है

पटना के राजेंद्र नगर स्थित शाखा मैदान में अपने छोटे-छोटे खिलाड़ियों को हुनर सिखाते प्रशिक्षक संतोष कुमार

मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम, नई दिल्ली / शाखा मैदान, राजेंद्र नगर, पटना : सांख्यिकी कहता है कि भारत में तक़रीबन 36+ करोड़ युवा 14 वर्ष और कम के आयु के हैं। इस अल्प आयु में देश का प्रधानमंत्री अगर एक युवा के कंधे पर हाथ रखकर उसकी हुनर की तारीफ करें, तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है उस युवक के लिए। या फिर बिहार के मुख्यमंत्री उस युवक को प्रदेश का सम्मान बढ़ने के लिए पचास लाख रूपये का चेक हस्तगत कराये तो उसके मन में क्या हो सकता है? समस्तीपुर (बिहार) के 14-वर्षीय आईपीएल सनसनी वैभव सूर्यवंशी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था विगत दिनों जब भारत के युवा खिलाड़ियों को सन्देश देते प्रधानम्नत्री नरेंद्र मोदी पटना स्थित जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर वैभव सूर्यवंशी और उसके माता-पिता से मिलकर युवा क्रिकेटर की प्रशंसा की, जिनके बल्लेबाजी कौशल ने पुरे देश में प्रशंसक बटोरे हैं। और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (अब पूर्व-मुख्यमंत्री) चेक दिए थे कैमरे में मुस्कुराते तस्वीरक खिंचाए थे उस बच्चे के साथ। यह उसकी हुनर की बात थी – जो उसकी ‘अपनी’ थी, मेहनत का परिणाम था और इसमें सरकार, शासन का कोई योगदान नहीं था। यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जानते थे और मुख्यमंत्री (अब पूर्व) नीतीश कुमार तो जानते ही थे।

प्रधानमंत्री के साथ साथ नीतीश कुमार का भी सोशल मीडिया पर तस्वीरों के साथ प्रचार-प्रसार हुआ। प्रधानमंत्री अपने ‘X’ पोस्ट पर लिखे भी : “पटना एयरपोर्ट पर युवा क्रिकेट सनसनी वैभव सूर्यवंशी और उनके परिवार से मुलाकात की। उनके क्रिकेट कौशल की पुरे देश में प्रशंसा हो रही है। उनके भविष्य के प्रयासों के लिए मेरी शुभकामनाएं। ” उसी महीने की शुरुआत में, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सातवें खेलो इंडिया यूथ गेम्स के उद्घाटन समारोह के दौरान, मोदी ने वैभव की सफलता के पीछे की कड़ी मेहनत को उजागर किया था। उन्होंने कहा था, “मैंने आईपीएल में बिहार के बेटे वैभव सूर्यवंशी का शानदार प्रदर्शन देखा है। इतनी कम उम्र में वैभव ने इतना बड़ा रिकॉर्ड बनाया है। वैभव के प्रदर्शन के पीछे कड़ी मेहनत है।”

बिहार में सभी खिलाड़ियों का भाग्य तो श्रेयसी सिंह जैसा नहीं होगा

भारत सरकार के खेल मंत्रालय के अनुसार, 2016-17 में शुरू की गई खेलो इंडिया – राष्ट्रीय खेल विकास कार्यक्रम, का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जन भागीदारी और खेल उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है। इस योजना को 2021 में 3,790.50 करोड़ रु के परिव्यय के साथ पाँच वर्षों के लिए विस्तार दिया गया। प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं। मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इन वर्षों में 3,124.12 करोड़ रु की लागत वाली 326 नई खेल अवसंरचना परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गयी है, साथ ही, जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण और सहायता के लिए 1,045 खेलो इंडिया केंद्रों (केआईसी) की स्थापना की गयी है। इतना ही नहीं, देश में खेल-कूद के विकास के लिए, ताकि भारतीय प्रतियोगी वैश्विक स्तर पर अपनी मेधा का बहुगामी प्रदर्शन कर देश का नाम उज्जवल कर सकें।

दिल्ली में मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम के प्रवेश मार्ग पर भारतीय खेल प्राधिकरण के इस बोर्ड पर ‘भारतिय’ इस कदर लिखा देख खेल और खिलाड़ियों का भविष्य दीखता है (तस्वीर: संजय शर्मा)

लेकिन दिल्ली में जब प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई दो किलोमीटर दूर मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम के प्रवेश द्वार पर ‘भारतिय’ खेल प्राधिकरण इस कदर लिखा दिखा और पटना के खेल मैदानों को खिलाड़ियों के पैरों के लिए तरसते देखा तो खेल के प्रति सत्ता के गलियारे में बैठे नेताओं, अभिनेताओं, अधिकारियों, पदाधिकारियों, बिचौलियों का खेल के प्रति उनकी मानसिकता को चीत्कार लेते भी महसूस किया, सरकारी फाइलों में खेल और खिलाड़ियों के लिए सरकारी प्रयास को कागज पर दौड़ते, सफलता प्राप्त करते देखा। बिहार में राजनीतिक पहुँच होने पर ‘कांस्य’ और ‘रजत’ (स्वर्ण नहीं) विजेता खेल मंत्री बनते हैं और खिलाड़ी मैदान के लिए तरसते हैं।

खेल मंत्रालय के अनुसार, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है, जिसमें लगभग 65% लोग 35 वर्ष से कम आयु के हैं। इस जनसांख्यिकीय लाभांश की क्षमता को पहचानते हुए, युवा मामले और खेल मंत्रालय युवा विकास और खेल प्रोत्साहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह विभिन्न पहलों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण, कौशल वृद्धि और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करता है।

आंकड़ों के अनुसार, भारत के खेल भविष्य को बढ़ावा देने के लिए, सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए युवा मामले और खेल मंत्रालय को 3794 करोड़ रु का रिकॉर्ड आवंटन किया है। इसका एक बड़ा हिस्सा, यानी 2,191.01 करोड़ रु, केंद्र की योजनाओं को आवंटित किया गया है, जिसमें प्रमुख खेलो इंडिया कार्यक्रम को 1,000 करोड़ रु मिले हैं। वित्त वर्ष 2014-15 में मंत्रालय को बजट आवंटन 1643 करोड़ रु था, जो 2025-26 में 130.9% की वृद्धि दर्शाता है। लेकिन देश के खेलों के मैदानों में खिलाड़ियों का हुनक बनाते, संवारते प्रशिक्षकों को अर्थ के लिए, सरकारी सहायता के लिए, खेल और खिलाड़ियों के वास्तविक विकास के लिए रोते भी देखा। खैर।

​मोइनुलहक स्टेडियम में जब अभिनेत्रियों की घुंघरू बजने वाली थी

जब अविभाजित बिहार में भारत के पूर्व क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पांच-छह वर्ष के थे और क्रिकेट की दुनिया में बिहार या बिहारी ​खिलाड़ियों का ‘बाजारीकरण’ नहीं ​हुआ था, सभी ‘खेल को खेल की भावना से खेलते’ थे, उस समय पटना के मोइनुल हक़ स्टेडियम में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। मसला था कला-संस्कृति को मंच पर लाकर अर्थ एकत्रित करना जिसका उपयोग पटना में एक कैंसर अस्पताल बनाना था।

इस कार्यक्रम के कर्ताधर्ता थे आजादी के 13-माह पूर्व भुवनेश्वर प्रसाद सिन्हा और श्रीमती श्यामा देवी सिन्हा के घर में जन्म लिए शत्रुघ्न सिन्हा। बाद में लोगबाग उन्हें ‘शॉटगन’ के नाम से या फिर ‘खामोश’ के उपनाम से जानने लगे। शत्रुघ्न सिन्हा को मुंबई फिल्म जगत में गए कोई 17 वर्ष हुए थे और सिनेमा की दुनिया में अपना नाम स्थापित कर चुके थे। शत्रुघ्न सिन्हा पटना में अपने पिता के नाम पर एक कैंसर अस्पताल बनाना चाहते थे। उन दिनों बिहार में कैंसर के मरीजों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ना शुरू हो गया था। अगर आज की सांख्यिकी को देखें तो आज कोई दो लाख के आसपास पास लोग, विभिन्न उम्र के, इन भयंकर बीमारी से प्रदेश में ग्रसित हैं, मृत्यु प्राप्त करने के लिए जीवन की सांसे गिन रहे हैं।

शत्रुघ्न सिन्हा के अभिन्न मित्र सुनील दत्त इनके इस अदम्य कार्य में मदद कर रहे थे। इसका वजह भी था क्योंकि सुनील दत्त की मोहतरमा नरगिस दत्त पैनक्रियाटिक कैंसर (अग्नाशय कैंसर) के कारण 3 मई, 1981 को 51-वर्ष की आयु में मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली थी। सुनील दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा की असीम इच्छा थी कि प्रदेश के किसी भी कैंसर से पीड़ित मरीज को तत्कालीन बम्बई (अब मुंबई) टाटा कैंसर अस्पताल में इलाज के लिए नहीं भागना पड़े।

दिल्ली में मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम के प्रवेश के साथ दाहिने हाथ एक छोटा सा मैदान (तस्वीर: संजय शर्मा)

भारत में तवायफों का योगदान

पिछले दिनों जब पुरानी दिल्ली सहित देश के अन्य भागों में तवायफों की स्वाधीनता संग्राम में योगदान पर कहानी कर रहा था, उस समय जामा मस्जिद के पिछले हिस्से में नई सड़क के बाएं हाथ तत्कालीन तवायफ गौहर जान की हवेली के चौखट पर बैठा था। गौहर जान की हवेली उन दिनों दो मंजिला हुआ करती थी, मुगलकालीन साज-सज्जा से श्रृंगारित थी, झरोखों से बीबी गौहर जान से रूबरू होने के लिए गलियों में समाज के संभ्रांतों से लेकर धनाढ्यों की लम्बी कतार हुआ करती थी।उन दिनों के इतिहास को समेटे सत्रहवीं शताब्दी में उनकी हवेली के नीचे बाएं कोने पर स्थापित शिवलिंग आज भी गवाही दे रहा है। शिवलिंग के बगल में कभी जहाँ बाउली हुआ करता था, आज उसे मिट्टी-पत्थर से भरकर पांच-सात मंजिला भवन बन गया है और बीबी गौहर जान की हवेली आज एक बाजार में तब्दील हो गया है।

कहते हैं गौहर जान आर्थिक तंगी के दौरान मोहनदास करमचंद गाँधी को 12,000 रूपये की मदद की थी अपनी गीत-गानों और घुंघरू की कमाई से। वैसे यह घटना आज से कोई 124+ वर्ष पहले की है, लेकिन आज भी भारत ही नहीं, विश्व की संगीत की दुनिया में बीबी गौहर जान अपनी आवाज से जीवित है। जंगे आज़ादी के दिनों में देश में असंतोष बढ़ रहा था और इस विद्रोह का सीधा असर पड़ा था दिल्ली सल्तनत की इन गलियों के अलावे देश की विभिन्न प्रांतो की तवायफों पर, उनकी संस्कृति पर, नाच-गानों पर, कलाओं पर, नृत्यों पर, वाद्ययंत्रों पर, सारंगी और संतूर की तारों पर। घुंघरुओं की आवाज धीमी होने लगी थी। गले का स्वर कमजोर होने लगा था। अन्य वाद्य यंत्रों से भी आवाज निकालना समय के साथ-साथ कमजोर होने लगा था। यानी तवायफों की कलाओं के लिए मौत की घंटी थी बज चुकी थी ।

इस चौखट पर बैठे-बैठे बीबी गौहर जान के नाम से गलियों में लटके दुकानों के साइन बोर्डों पर “गली बीबी गौहर जान” लिखा देख रहा था। इसी बीच अनायास रूपमती, अनारकली, राणा दिल, लाल कुंवर नूर बाई, चमानी राम जानी, उत्तम बाई, फिरदौस जान, अद बेगम, अल्फिना, पुन्ना बाई और जद्दन बाई जैसी नामी तवायफों का नाम मानस पटल पर आने लगा। जद्दनबाई सुनील दत्त की सास और नरगिस की माँ थी। बॉलीवुड की पहली महिला संगीतकार थीं। वह एक गायिका, संगीतकार, नर्तकी, अभिनेत्री, फिल्म निर्माता और भारतीय सिनेमा की शुरुआती हस्तियों में से एक थीं। वह अख्तर हुसैन, अनवर हुसैन और मशहूर हिंदी अभिनेत्री नरगिस की माँ थीं, और प्रिया दत्त व संजय दत्त की नानी थीं।

पटना के राजेंद्र नगर स्थित शाखा मैदान में अपने छोटे-छोटे खिलाड़ियों को हुनर सिखाते प्रशिक्षक संतोष कुमार

कहते हैं कि जद्दनबाई को अपनी ज़िंदगी में तीन बार प्यार हुआ और उन्होंने तीन बार शादी की। उनकी पहली शादी एक अमीर गुजराती व्यापारी, नरोत्तमदास खत्री से हुई थी। इस शादी से उन्हें एक बेटा हुआ, जिसका नाम अख्तर हुसैन था। उनकी दूसरी शादी उस्ताद इरशाद मीर खान से हुई, जिनसे उन्हें दूसरा बेटा, अभिनेता अनवर हुसैन हुआ। इसके बाद जद्दनबाई ने तीसरी शादी मोहनचंद उत्तमचंद त्यागी से की, जिन्होंने शादी के बाद इस्लाम अपना लिया और अपना नाम बदलकर अब्दुल राशिद रख लिया। फिल्म अभिनेत्री नरगिस उन्हीं की बेटी थीं।

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खेल के मैदानों और खिलाड़ियों के साथ उपेक्षा

आइये, वापस मोइनुलहक स्टेडियम आते हैं। अंतरष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में भारतीय मुद्रा का मोल एक अमेरिकन डालर=12.23 रुपये था । लेकिन लोगों की मानसिकता, खासकर जो सत्ता के गलियारे में बैठकर ‘स्वहित की राजनीति करते थे/हैं’, का मोल उस दिन भी ढुलमुल नीति के गिरफ्त में थी, आज तो है ही। उन दिनों देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने ही अंगरक्षक की गोलियों का शिकार हो चुकी थी और प्रधानमंत्री कार्यालय में राजीव गाँधी बैठे थे।

इधर पटना सचिवालय में मुख्यमंत्री कार्यालय में आठवीं विधान सभा के कालखंड के दो मुख्यमंत्रियों – डॉ जगन्नाथ मिश्र और चन्द्रशेखर सिंह – से आगे निकलकर नवमी विधानसभा कालखंड में श्रमिक नेता बिंदेश्वरी दुबे आ गए थे। इस विधानसभा में भागवत झा आज़ाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और डॉ जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री कार्यालय में रखे पुस्तिका पर अपना-अपना हस्ताक्षर किये थे। प्रदेश में सत्ता के गलियारे में राजनीतिक चमचों का जन्म, संरक्षण तेजी से होने लगा था। नेता किसी भी पार्टी के हों, अपनी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को सज्ज हो रहे थे।

इधर शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य ‘चैरिटी शो’ करना था। उस कार्यक्रम में मुंबई के लगभग सभी अभिनेता, अभिनेत्रियां, गीतकार, संगीतकार, गायक, गायिका, नर्तकियां अपनी उपस्थिति दर्ज करने को सज्ज हो रहे थे। कार्यक्रम का तारीख तय हो गया था। मंच बन गए थे। लाउडस्पीकर पर हेल्लो-हेल्लो का भी टेस्टिंग हो गया था। यह सभी बातें शत्रुघ्न सिन्हा के निजी देखरेख में हो रहा था।

वरिष्ठ पत्रकार और खेलकूद विशेषज्ञ दीपक कोचगवे

उधर, सचिवालय में सत्ता के गलियारे में बैठे लोग पटना से लेकर दिल्ली में राजीव गांधी का कान फूंकना शुरू कर दिए थे। उस समय तत्कालीन कांग्रेस के लोग ही नहीं, बल्कि डॉ. सीपी ठाकुर भी नहीं चाहते थे कि यह कार्यक्रम नहीं हो। उन सभी लोगों का मानना था कि अगर ऐसा हुआ और कार्यक्रम सफल हुआ, पैसे एकत्रित हुए, कैंसर अस्पताल बने तो कांग्रेस का नामोनिशान समाप्त हो जायेगा। राजीव गांधी को पत्र भी लिखा गया। यह कहा गया कि अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस का बंटाधार हो जायेगा। चमचे, वह भी राजनीति में, दशकों से जन्म लेते आये हैं, परंपरा जारी रहेगा।

दिल्ली में बैठे राजीव गांघी शायद यह समझ नहीं पा रहे थे की बिहार में कांग्रेस का जीवन काल पांच वर्ष से भी कम बचा है। नवमी विधान सभा में बिंदेश्वरी दुबे (1988), भागवत झा आज़ाद (1989), सत्येंद्र नारायण सिन्हा (1989) और डॉ. जगन्नाथ मिश्र अपने-अपने हाथों कांग्रेस का गला घोंटते, मृत्यु की ओर उन्मुख करते, प्रदेश की सत्ता का बागडोर 10 मार्च 1990 को लालू प्रसाद यादव को सौंप दिए। शायद वह दौर कांग्रेस के लिए अंतिम दौड़ थी। खैर।

कार्यक्रम प्रारम्भ होने के चार दिन पूर्व हमारे एक मित्र वरिष्ठ पत्रकार दीपक कोचगवे, जो उन दिनों पटना से प्रकाशित ‘आज’ अखबार में ‘हरफन मौला संवाददाता’ थे, खेलकूद में महारत हासिल कर चुके थे, मोइनुलहक स्टेडियम विषय को लेकर शत्रुघ्न सिन्हा से मिले। कोचगवे का सिन्हा के साथ बहुत मधुर सम्बन्ध था।

आर्यावर्तइंडियननेशन कॉम से बात करते दीपक कोचगवे कहते हैं: “शत्रुघ्न सिन्हा बहुत ही गंभीर मुद्रा में बैठे थे। मुझे देखते ही वे भावविह्वल हो गए और अवरार अल्वी की कहानी पर बनी फिल्म, जिसमें गुरुदत्त, माला सिन्हा, वहीदा रहमान, जॉनी वाकर और रेहमान अभिनय किये थे, शाहिर लुधियानवी के गीत थे, जिसमें संगीत दिया था सचिनदेव वर्मन और गायक थे हेमंत कुमार – इसको ही जीना कहते हैं, तो यूँही जी लेंगे, उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे, आँसू पी लेंगे; ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला; हमने तो जब कलियाँ माँगी, काँटों का हार मिला; जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला – गुनगुनाकर, अश्रुपूरित आँखों से सम्पूर्ण कहानी का निचोड़ कह डाले।”

अगले दिन आज के प्रातः कालीन संस्करण में प्रथम पृष्ठ पर एक संवेदनशील कहानी मेरे नाम (दीपक कोचगवे) से प्रकाशित हुयी।” ‘आज’ अखबार में प्रकाशन के दो-चार दिन बाद दिल्ली से प्रकाशित ‘जनसत्ता’ अखबार में पटना के संवाददाता सुरेंद्र किशोर की भी कहानी प्रकाशित हुई।

कांस्य, रजत पदक और खेल मंत्री

चार दशक बाद उस घटना की, मोइनुलहक़ स्टेडियम के बहाने पटना स्थित खेल के मैदानों की चर्चा इसलिए कर रहा हूँ कि आज से चार ही नहीं सात दशक पहले भी पटना में खेल, खिलाड़ियों की जो स्थिति थी, मैदानों की जो हालत और हालात थी, उसमें कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ है। परिवर्तन सिर्फ यह हुआ श्रेयसी सिंह की। 2014 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में निशाने बाजी के डबल ट्रैप स्पर्धा में क्रमशः ‘रजत’ और ‘कांस्य’ पदक जीतने वाली खिलाड़ी श्रेयसी सिंह छह साल बाद, यानी 2020 भारतीय जनता पार्टी की सदस्य बनती है और 2025 के अंत में विधान सभा की चुनाव में भाजपा के टिकट पर जमुई विधानसभा से जीतकर विधानसभा आती है और फिर स्वतंत्र रूप से खेल मंत्रालय का खेल मंत्री बन जाती है। आजाद भारत, और फिर बिहार में आज़ादी के बाद अब तक कौन सा खिलाड़ी खेल मंत्री बना है, सांख्यिकी नहीं है। या इसे यूँ भी कह सकते हैं कि बिहार के वर्तमान खेल मंत्री जैसा भाग्य प्रदेश के किसी भी खिलाड़ी को अब तक नहीं प्राप्त हो सका।

वैसे 1983 में कपिल देव के नेतृत्व में विश्वकप जीतने वाले टीम में बिहार में जन्म लिए कीर्ति वर्धन आज़ाद भी थे, उन्हें तो वह सम्मान नहीं दिया प्रदेश के लोगों ने। जिस वर्ष कपिल देव विश्व कप लाये थे, उस दिन से दो वर्ष पूर्व तत्कालीन बिहार के रांची में देश का एक दूसरा क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का जन्म हो गया था। धोनी दस वर्ष तक भारतीय क्रिकेट का कप्तान रहे थे और 2007 – 2017 के दौरान 332 मैच खेले थे। एक रिकार्ड आज भी है। टी-20 विश्वकप, 2011 ओडीआई विश्वकप के साथ-साथ 2013 में भारत को चैम्पियन ट्रॉफी भी दिए थे – बिहार के लोग कभी उन्हें न तो बिहार में, ना ही झारखण्ड में और ना दी दिल्ली में खेल मंत्री बनाने के लिए, भारत रत्न दिलाने के लिए सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पर ही सही, दो शब्द लिखे थे।

अलबत्ता, खेल और खिलाडी का महत्व उतना ही रह गया है जितना स्कूल में बच्चों को बुलाने के लिए खिचड़ी पर न्योता, साईकिल का लोभ, पैसे का प्रलोभन दिया जाता रहा है। विश्वास नहीं होता तो वर्तमान में बिहार सरकार का स्लोगन देख लें। “मेडल लाओ-नौकरी पाओ” योजना के बाद बिहार खेल छात्रवृति योजना शुरू की जा रही है जिसके तहत प्रति वर्ष तीन, पांच और 20 लाख रुपये तक की राशि 725 प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को राष्ट्रीय खेल दिवस के मौके पर दी जाएगी। पैसे पर नजर नेताओं की एक बार जो टिकी, ख़त्म किये नहीं हटी, चाहे खेल और खिलाड़ियों की स्थिति बत्तर क्यों न हो जाय।

वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर झा

यही कारण है कि आज खेल के लिए प्रदेश का बजट 680 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इतना ही नहीं, विगत वर्ष कला, संस्कृति व युवा विभाग से खेल विभाग का अलग गठन किया गया है। वैसे सरकार दावा करती है कि इसका उद्देश्य प्रदेश में खेल का बेहतर माहौल बनाना है, प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की खोज कर ओलंपिक जैसी प्रतियोगिता के लिए तैयार करना है, लेकिन सच क्या है यह खेल विभाग के अधिकारी, पदाधिकारी, नेता, अभिनेता, दलाल, बिचौलिए सभी जानते हैं क्योंकि प्रदेश का खेल जगत, खिलाडी लम्बे समय से खस्ताहाल वाले बुनियादी ढांचे, भ्रष्टाचार और राजनीति का शिकार होते आ रहा है।

जबकि, वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर झा का कहना है कि यह पहली बार है जब बिहार को एक विशेष खेल मंत्री (श्रेयसी सिंह, अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज) मिला है। राजगीर में एक खेल विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है, और राजगीर स्टेडियम में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हॉकी टूर्नामेंट खेले गए हैं। पिछले एक साल से बिहार ने खिलाड़ियों को नौकरियां भी दी हैं। अब राजेंद्र नगर में एक और एस्ट्रोटर्फ बनाया जा रहा है। लोगों को यह आश्वासन दिया गया है कि मोइनुल हक स्टेडियम की जगह एक बड़ा और सुंदर स्टेडियम बनाया जाएगा। नए उभरते हुए खिलाड़ी दूसरों को प्रेरित करेंगे।

मोइनुलहक – मेवालाल, और शिवनाथ सिंह

वैसे, पटना में जन्में सैय्यद मोइन-उल-हक़ एक भारतीय कोच थे जिनका खेल और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान रहा। वह भारत में ओलंपिक आंदोलन के अग्रणी रहें। उन्होंने जीवन भर खेलों के लिए संघर्ष किया और बिहार में खेल क्रांति की शुरुआत की। मोइन उल हक जी ने क्रमशः लंदन और हेलसिंकी में आयोजित 48वें और 52वें संस्करण के दौरान भारतीय ओलंपिक दल का मुख्य प्रतिनिधि के रूप में प्रतिनिधित्व किया। वह वर्ष 1951 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों के उद्घाटन के मुख्य आयोजकों में से एक थे। खेल के क्षेत्र में उनके अपार योगदान के लिए सम्मान के प्रतीक के रूप में, उनकी मृत्यु के उपरांत 1970 के दशक में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर जी के द्वारा पटना के राजेंद्र नगर स्टेडियम का नाम बदला कर ‘मोइन उल हक’ स्टेडियम कर दिया गया। तब से आज तक यह स्टेडियम इसी नाम से जाना जाता रहा है। लेकिन पटना के लोगों सेवक बार पूछ कर देखिए कि मोइनुलहक कौन थे ?

इसी तरह, साहू मेवालाल का जन्म बिहार के गया जिले (अब नवादा जिले ) के चितरघाटी पंचायत के दौलतपुर में साहू महादेवराम और कुसुमी देवी के घर वर्ष 01 जुलाई 1926 में हुआ था। साहू मेवालाल भारतीय फुटबॉल टीम के लिए स्ट्राइकर के रूप में काफी प्रसिद्ध थें। मेवालाल का पहला बड़ा टूर्नामेंट लंदन में आयोजित 1948 का ग्रीष्मकालीन ओलंपिक था । ओलंपिक की तैयारी के हिस्से के रूप में, वह जुलाई में राष्ट्रीय टीम के साथ यूरोप गए, जिसने पिनर एफसी, हेस एफसी और एलेक्जेंड्रा पार्क एफसी जैसी अंग्रेजी टीमों के खिलाफ मैचो में जीत दर्ज की। ओलंपिक में भारतीय टीम, फ्रांस से 1-2 से हार गई । ओलंपिक के बाद डच क्लब एएफसी अजाक्स के खिलाफ 5-1 से गेम जीता । इन खेलों में साहू मेवालाल शीर्ष स्कोरर बनकर उभरे । मार्च 1951 में, नई दिल्ली में एशियाई खेलों में, वह चार गोल के साथ शीर्ष स्कोरर रहें, जिसमें भारत ने स्वर्ण पदक जीता।

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मेवालाल और उनकी टीम ने स्वर्ण पदक जीत मैच में ईरान को 1-0 से हराकर देश को पहली ट्रॉफी दिलाया था। इसके साथ ही वह हेलसिंकी में 1952 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भाग लेने वाली टीम का भी हिस्सा भी रहें । वह उस राष्ट्रीय टीम का भी हिस्सा थे जिसने 1940 के दशक के अंत में कई यूरोपीय देशों का दौरा किया और डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड जैसी टीमों के खिलाफ खेला, जिसमें उन्होंने छह गोल किए। बाद में उन्होंने टीम के बांग्लादेश दौरे में भाग लिया, 1950 के दशक के दौरान अफगानिस्तान, म्यांमार और थाईलैंड। आजादी के बाद 1952 के कोलंबो चतुष्कोणीय टूर्नामेंट में बर्मा पर 4-0 की जीत में भारत के लिए हैट्रिक बनाने वाले मेवालाल जी पहले खिलाड़ी थे। आज मेवालाल को कोई जानता नहीं।

इसी तरह, बिहार के बक्सर जिले में 11 जुलाई 1946 को जन्में शिवनाथ सिंह भारत के एक अद्भुत धावक थे। उन्होंने वर्ष 1976 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया और 1976 के ओलंपिक पुरुष मैराथन में 11 वें स्थान पर रहे। शिवनाथ सिंह ने अपने पूरे करियर के दौरान नंगे पैर प्रतिस्पर्धा की। इसके साथ ही उन्होंने सर्वश्रेष्ठ समय के साथ भारतीय राष्ट्रीय मैराथन रिकॉर्ड भी स्थापित किया। यह उपलब्धि उन्होंने वर्ष 1978 में जालंधर में हासिल किया था। शिवनाथ सिंह के द्वारा बनाया गया एथलेटिक्स रिकॉर्ड सबसे लंबे समय तक कायम रहने वाला रिकॉर्ड में से एक है।

अर्जुन पुरस्कार विजेता चद्रेश्वर प्रसाद सिंह भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान थे। 1965 में जापान में खेलते हुए भारत की जूनियर फुटबॉल टीम की कप्तानी की। 1966 और 1970 में एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया बैंकोक में जहां भारतीय टीम ने कांस्य पदक जीता। उन्होंने 1971 में सीनियर भारतीय फुटबॉल टीम की कप्तानी की और महाद्वीप के प्रमुख फुटबॉलरों वाली एशिया ऑल स्टार टीम में जगह बनाई।

खेलकूद विशेषज्ञ और क्रिकेट के महान खिलाड़ी अजय नारायण शर्मा

क्या कहते हैं अजय नारायण शर्मा

76-वर्षीय अजय नारायण शर्मा, जिन्होंने अपना सात दशक का जीवन क्रिकेट को दे दिया, आर्यावर्तइंडियन नेशन कॉम से बात करते कहते हैं “बिहार में खेल का माहौल नहीं है। मैदान नहीं है। सरकार के तरफ से जितनी भी बातें इन दशकों में कही गयी है, कही जा रही है, सभी फरेब हैं। खेल के प्रति न तो सरकार को, न मंत्रालय में बैठे मंत्रियों को, अधिकारियों को, पदाधिकारियों को, किसी को भी कोई प्रेम नहीं है। आज जो भी खिलाड़ी प्रदेश, राष्ट्रीय अथवा अंतराष्ट्रीय स्टार पर उभर कर आ रहे हैं, वह सम्पूर्ण रूप से उनकी अपनी मेहनत, परिवार, माता-पिता का बलिदान और प्रशिक्षकों के सहयोग के कारण ही है। आप सोचिये न!! खेल के प्रति संवेदनशील व्यवस्था अगर यह कहती है कि “मैडल लाओ-नौकरी पाओ” तो यह नारा कितना वीभत्स लगता है। व्यवस्था खेल और खिलाड़ियों के लिए बिना कुछ किये मेडल की बात सोच्तिओ है, इससे बड़ा शर्म की बात क्या हो सकता।’

अजय नारायण शर्मा आगे कहते हैं कि आज भी मेवालाल साहू, शिवनाथ सिंह, चंद्रेश्वर प्रसाद जैसे प्रतिभावान खिलाड़ी बिहार के गाँव में एक नहीं, सैकड़ों हैं; लेकिन अर्थ की किल्लत के कारण, खेल की सुविधा के कारण अपने गाँव की आड़ को भी लाँघ नहीं पाते।’

ज्ञातव्य हो की अजय नारायण शर्मा बिहार क्रिकेट एसोसिएशन में सही तौर से काम- काज किये जाने को लेकर एक एडहॉक अर्थात तदर्थ कमेटी बनाने हेतु एक जनहित याचिका पटना हाई कोर्ट में दायर किये थे ताकि प्रदेश में खेल और खिलाडी के लिए एक बेहतरीन माहौल बने।याचिका में आगे यह भी आरोप लगाया गया था कि कुर्सी पर कथित रूप से अवैध तौर पर बैठे लोग प्रतिभावान क्रिकेट खिलाड़ियों के दावों को हतोत्साहित कर और खिलाड़ियों के बेजा औऱ अनुचित तौर से चयन कर क्रिकेट को बेचने पर उतारू हैं, इसलिए राज्य में खिलाड़ियों की स्थिति और भी खराब होते जा रही है। जिसकी वजह से खिलाड़ी घरेलू टूर्नामेंट जितने में भी कामयाब नहीं हो रहे हैं।

इतना ही नहीं, अजय नारायण शर्मा अपनी याचिका के जरिये चयनकर्ताओं/ सपोर्ट स्टाफ व बी सी सी आई द्वारा संचालित घरेलू टूर्नामेंट में विभिन्न उम्र के राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाडियों को सही तौर से चयन करने को लेकर आदेश देने का आग्रह भी याचिका में किया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रबंधन कमेटी में अवैध रूप से कुर्सी पर विराजमान व्यक्तियों द्वारा ऐसा नहीं किया जा रहा है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बोर्ड ऑफ कंट्रोल फोर क्रिकेट इन इंडिया एंड अदर्स बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार व अन्य के मामले में सिविल अपील संख्या – 4235 में 9 अगस्त, 2018 को दिये गए फैसले के अनुसार जस्टिस आर एम लोढ़ा कमेटी द्वारा की गई अनुशंसा के आलोक में खिलाड़ियों का सही तौर से चयन करने हेतु क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी के गठन करने को लेकर आदेश देने का आग्रह भी किया गया है। खैर।

क्या आप इन्हें जानते हैं ?

महेंद्र सिंह धोनी, प्रतिक नारायण, मनीष कुमार, पवन कुमार, जीशान अली, सैयद सब्बा करीम, प्रमोद कुमार, राजू वाल्स, प्रभात कुमार, राजीव रंजन, धीरज कुमार, राम कुमार. अशोक कुमार, विष्णु शंकर, नीरज कुमार, सुनील कुमार, देवकी नंदन दस, सूरज नारायण लाल, तारिक-उर-रहमान, अमीकर दयाल, राजीव कुमार, अजय नारायण शर्मा, निखिलेश रंजन, तरुण कुमार, कीर्तिवर्धन आज़ाद, ईशान किशन, मुककेश कुमार, सौरभ तिवारी, अपूर्व आनंद, निखिल आनंद, अनुनय सिंह, सरफराज असरफ, सुते बनर्जी, सुब्रतो बनर्जी, अनजान भट्टाचार्य, उत्कर्ष, चिरंजीवी कुमार, सुब्रो दस, बेनु दस, अजय झा, कमलेश कुमार, रोबिन मुखर्जी, सुबित मुखर्जी आदि जैसे सैकड़ों क्रिकेट के खिलाड़ी आये, कुछ पल के लिए रुके, उभरे और गायब हो गए। किसी ने पूछा तक नहीं ऐसा क्यों हुआ?

अपवाद छोड़कर जो अपने घरों से अर्थ से कमजोर नहीं थे, घर में खाना और अन्य स्वस्थ वर्धक वस्तुएं मिलते थे, वे तो कहते गए, आगे बढ़ते गए; ल;यकीन शेष सभी गुमनाम हो गए। दुर्भाग्य यह है कि सरकार को, मंत्रीजी को, अधिकारी-पदाधिकारी को मैडल तो चाहिए, लेकिन सरकारी कोष से निकलने वाले पैसे खेल और खिड़ाइयों पर खर्च नहीं करना पड़े । आज वैभव सूर्यवंशी या ईशान किशन को लेकर बिहार में सत्ता के गलियारे में बैठे लोग जितना भी ‘राजनीतिक कबड्डी खेल लें,’ हकीकत यही है कि इन दोनों को वैश्विक पटल पर पहुँचने में शासन, प्रशासन, व्यवस्था का कोई योगदान नहीं है।

क्या कहते हैं प्रेम बल्लभ सहाय

बिहार के विख्यात क्रिकेट विशेषज्ञ प्रेम बल्लभ सहाय कहते हैं “चाहे प्रदेश की सरकार और गली-कूचियों में कुकुरमुत्तों की तरह पनपने वाले नेता, जो खेल, खासकर क्रिकेट के कलेजे पर बैंठकर अपनी राजनीती करते आये हैं, कर रहे हैं, का प्रदेश में खेल और खिलाडी का विकास हो, कभी नहीं सोचे। इन लोगों का कोई योगदान नहीं है। पटना में अभी मोइनुलहक़ स्टेडियम, सचिवालय मैदान, गर्दनीबाग मैदान, पटना हाई स्कूल मैदान, पटना साइंस कॉलेज का मैदान, केमेस्ट्री ग्राउंड, फुलवारी सरीफ का ऊर्जा स्टेडियम, जगजीवन राम स्टेडियम कभी यहाँ के खिलाड़ियों के लिए खेल का मैदान था, आज सभी मैदान समाप्त हो गए हैं। क्या खिलाड़ी इन नेताओं के माथे पर बैठकर खेलेगा, बॉलिंग और बैटिंग करेगा? क्या कभी इन नेताओं ने, अधिकारियों ने इस विषय के बारे में सोचा, समस्याओं का समाधान किया? नहीं।

खेलकूद विशेषज्ञ और क्रिकेट खिलाड़ी और कोच प्रेम बल्लभ सहाय

सहाय आगे कहते हैं “आज अगर कोई भी खिलाड़ी राज्य, राष्ट्रीय अथवा अंतराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचता है तो इसमें सरकार या व्यवस्था का कोई योगदान नहीं होता है। केंद्र के साथ-साथ बिहार सरकार के कोषागार से खेल के नाम पर करोड़ों, अरबों, खरबों रुपयों का आवंटन हो रहा था, लेकिन पटना के मोइनुलहक स्टेडियम सहित अविभाजित बिहार के सभी राज्यों के खेल के मैंदानों में जमीन बंजर हो गई थी। मैदानों में खिलाड़ियों के पैर के निशान दूर-दूर तक कहीं नहीं दीखते थे, अलबत्ता प्रदेश के अपराधियों से बने राजनेताओं या फिर राजनेता का खेल के प्रति आपराधिक स्वरुप खेल के मैदान को बाँझ बना रहा था। बिहार को छोड़कर, देश में कई राज्य ऐसे हैं जहाँ खेल और खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए सरकार सुविधाएँ जमीन पर दिखती है, जबकि बिहार में यह नदारत है। हाँ, नेताओं और अधिकारियों के मुख से लच्छेदार शब्दों का माला गूंथने में कोई कमी नहीं करते।

इन बातों का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि बिहार के सचिवालय से कोई 120 किलोमीटर दूर समस्तीपुर के ताजपुर इलाके में रहने वाले सूर्यवंशी परिवार को पिछले दो साल पहले तक कोई नहीं जानता था। यहाँ तक कि प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में कुर्सी में चिपके दर्जनों नहीं, सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों-हज़ार शुतुरमुर्ग जैसा स्वेत-वस्त्रघारी राजनेता, महामहिम, मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री, खेल मंत्री कोई भी नहीं जानते-पहचानते थे। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बिहार ही नहीं, भारत में रहने वाले 10 और 19 साल के करोड़ों बच्चों में ताजपुर ठाकुरबाड़ी की गली का यह बच्चा अचानक क्षितिज पर सूर्य जैसा चमक उठा। रातो-रात उसे जितनी शोहरत मिली, शायद भारत के इतिहास में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी नहीं मिला होगा – सच यही है, आप स्वीकार करें अथवा नहीं। और इसका एक मात्र कारण था ‘एक पिता का जिद’, ‘एक पिता का अपनी असफलता को पुत्र की सफलता में बदलना, और बहुत सी बातें जो माता-पिता और संतान के बीच मानसिक, प्राकृतिक, मनोवैज्ञानिक संबंधों के समीकरण को निर्धारित करता था। अब अगर सूर्यवंशी की सफलता का यश बिहार सरकार स्वयं ले तो इससे अधिक नीच मानसिकता और क्या हो सकता है।

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निजी क्रिकेट कोचिंग की बाढ़

आज शहर में सैकड़ों निजी क्षेत्र के क्रिकेट कोचिंग केंद्र खुल रहे हैं, सैकड़ों नहीं, हज़ारों खिलाड़ी न्यूनतम 600 रूपये से हजारों रूपये देकर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। मैं कभी नहीं कहूंगा की यह गलत है, लेकिन अगर यही सुविधा सरकारी स्तर पर, बेहतरीन कोचों के द्वारा, सभी सुविधाओं के साथ उपलब्ध कराया जाता तो आज प्रदेश में मेडलों का भरमार लग जाता।कलेकिन ऐसा नहीं है। आज शहर में जितने कोचिंग केंद्र हैं, अपवाद छोड़कर, किसी भी केंद्र में कोई प्रशिक्षित प्रशिक्षक नहीं हैं, यह ईशान किशन के वर्तमान कोच का संतोष कुमार का मानना है।

वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत घोष

विगत दिनों वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत घोष टाइम्स ऑफ़ इंडिया में लिखे हैं: क्या बिहार क्रिकेट का पावरहाउस बन सकता है? उनका कहना है कि पिछले महीने, जब ईशान किशन ने T20 वर्ल्ड कप में कोलंबो में पाकिस्तान के खिलाफ एक ज़बरदस्त पारी खेलकर पूरे भारत को रोशन कर दिया था, तो सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पर यह खबर खूब वायरल हुआ था: ‘एक बिहारी सब पे भारी’ । रविवार रात न्यूज़ीलैंड के खिलाफ, जब इस “पॉकेट रॉकेट” ने एक और शानदार प्रदर्शन किया – एक धमाकेदार अर्धशतक और आउटफील्ड में कुछ बेहतरीन कैच।

फिर भी, इस मैसेज में एक विडंबना भी छिपी है। ईशान का जन्म पटना में हुआ था, जहाँ उनके पिता – जो एक रियल एस्टेट कारोबारी हैं – और उनका बाकी परिवार रहता है। लेकिन यह विकेटकीपर-बल्लेबाज़ घरेलू क्रिकेट पड़ोसी राज्य झारखंड के लिए खेलता है, जिसे साल 2000 में दक्षिण बिहार से अलग करके बनाया गया था। असल में, इसी साल उन्होंने कप्तान के तौर पर सैयद मुश्ताक अली टूर्नामेंट में अपनी टीम को जीत दिलाई थी। ईशान का क्रिकेट के लिए ‘पलायन’ – बिहार में मुश्किल हालात में दूसरे राज्यों में जाने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक स्थानीय शब्द – कोई अकेला उदाहरण नहीं है।हाल के सालों में, दो तेज गेंदबाजों – उत्तर-पश्चिमी जिला गोपालगंज के मुकेश कुमार और दक्षिण-पश्चिमी जिला रोहतास के आकाश दीप – ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी जगह बनाई है। ये दोनों ही घरेलू क्रिकेट बंगाल के लिए खेलते हैं।

दिल्ली में मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम। तस्वीर: संजय शर्मा

दूसरे राज्यों में जाने की इन घटनाओं की मुख्य वजह बिहार क्रिकेट एसोसिएशन का खराब कामकाज है। बीसीसीआई ने 2004 में बीसीए को निलंबित कर दिया था, और 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही इसे दोबारा बहाल किया गया। यहाँ तक कि राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव ने भी अपना एकमात्र फ़र्स्ट-क्लास मैच बिहार के लिए नहीं, बल्कि झारखंड के लिए खेला था (2009 में)। बीसीए के अंदरूनी झगड़े अभी भी खत्म नहीं हुए हैं। जनवरी 2024 में, दो अलग-अलग गुटों ने रणजी मैच के लिए खिलाड़ियों की अलग-अलग लिस्ट सौंपी थीं। हालाँकि, इस सीजन में कुछ अच्छे संकेत ज़रूर दिखे हैं। बिहार ने रणजी ट्रॉफी और विजय हज़ारे ट्रॉफी, दोनों के ‘प्लेट डिवीज़न’ में जीत हासिल की है, और अब वह वापस ‘एलीट ग्रुप’ में पहुँच गया है – जहाँ बड़े-बड़े खिलाड़ी खेलते हैं। भारत के दूसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य के लिए यह एक नई शुरुआत है।

लेकिन जिस चीज़ ने बिहार क्रिकेट को सचमुच सुर्खियों में ला दिया है, वह है वैभव सूर्यवंशी का उदय – एक असाधारण और बिहार में ही तराशा गया टैलेंट। इस महीने की शुरुआत में, वैभव ने U-19 वर्ल्ड कप के फाइनल में 80 गेंदों पर 175 रन बनाकर इंग्लैंड को पूरी तरह से पस्त कर दिया। यह बच्चा, जिसकी उम्र अभी 15 साल भी नहीं हुई है, उसने 15 छक्के और 15 चौके जड़े। ‘द गार्डियन’ ने उसकी तारीफ़ करते हुए लिखा, “खेल जगत में हमेशा ही कोई न कोई विलक्षण प्रतिभा सामने आती रहती है, लेकिन यह बच्चा सचमुच सबसे अलग है।” वैभव ने अपनी IPL टीम, राजस्थान रॉयल्स की ओर से खेलते हुए गुजरात टाइटंस के खिलाफ महज़ 35 गेंदों में शतक जड़ दिया; यह इस टूर्नामेंट का दूसरा सबसे तेज़ शतक है। मोहम्मद सिराज, इशांत शर्मा, राशिद ख़ान और प्रसिद्ध कृष्णा जैसे गेंदबाज़ों को उसके बल्ले का कहर झेलना पड़ा। अगर वह इसी तरह अपना ध्यान केंद्रित रखता है, तो यकीनन वह ‘व्हाइट-बॉल क्रिकेट’ (सीमित ओवरों के क्रिकेट) का एक महान बल्लेबाज़ बनेगा।

क्रिकेट की यह नई विलक्षण प्रतिभा ताजपुर नामक एक छोटे से कस्बे से आती है। ऐसे छोटे और साधारण से परिवेश से निकलकर इस मुकाम तक पहुँचना, उसकी असाधारण यात्रा को और भी ज़्यादा विस्मयकारी बना देता है। वैभव अभ्यास करने के लिए अपने घर (राजपूत टोला) से निकलकर शहर के ‘पटेल मैदान’ तक का सफ़र तय करता था; यह मैदान ज़िला मुख्यालय समस्तीपुर में स्थित है और उसके घर से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। उसके पहले कोच बृजेश झा, जो खेल का सामान बेचने वाली एक दुकान भी चलाते हैं, बताते हैं, “जब वह पहली बार मेरे पास आया था, तब उसकी उम्र महज़ छह साल थी और गेंद उसके हाथों से भी ज़्यादा बड़ी लगती थी।” झा आगे कहते हैं, “लेकिन 8-9 साल की उम्र से ही उसने दिन में 8 घंटे अभ्यास करना शुरू कर दिया था—4 घंटे घर पर और 4 घंटे मैदान पर।”

वैभव और ईशान, दोनों ही अपने करियर के अलग-अलग पड़ावों पर खड़े हैं। बहुत कम लोगों को यह बात याद होगी कि U-19 भारतीय टीम की कप्तानी ईशान ने ही की थी; उस टीम में ऋषभ पंत, सरफ़राज़ ख़ान और वॉशिंगटन सुंदर जैसे दिग्गज खिलाड़ी शामिल थे। वर्ष 2016 में, उस टीम को वेस्ट इंडीज़ के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। उस टूर्नामेंट में बल्लेबाज़ के तौर पर ईशान का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था। लेकिन इस बल्लेबाज-विकेटकीपर ने अपनी कमियों पर काम किया और अपने खेल में सुधार किया; इसके बाद उसे IPL में खेलने का मौका मिला, जहाँ उसने करोड़ों रुपये कमाए और फिर भारतीय टीम के लिए क्रिकेट के तीनों प्रारूपों (टेस्ट, वनडे और T20) में खेलने का गौरव भी हासिल किया।

हालाँकि, बाद में उसका फॉर्म भी बिगड़ गया। इसके अलावा, पिछले दो वर्षों के दौरान बीसीसीआई के नियमों का पालन न करने के कारण चयनकर्ताओं की नजर में उसकी अहमियत भी कम हो गई थी। लेकिन इस T20 वर्ल्ड कप में उसने अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर एक बार फिर अपनी खोई हुई साख और जगह वापस हासिल कर ली है। ईशान के करियर में आए उतार-चढ़ावों और उसकी सफलताओं से वैभव भी कुछ अहम सबक सीख सकता है। और ऐसा ही पृथ्वी शॉ भी कर सकते हैं, जो बिहार से जुड़ाव रखने वाले एक और प्रतिभाशाली क्रिकेटर हैं, और जिन्होंने भारत को U-19 विश्व कप की ट्रॉफी जिताई थी। ईशान, वैभव, मुकेश और आकाश दीप इस बात को साबित करते हैं कि बिहार प्रतिभाओं से भरा हुआ है। लेकिन क्या यह राज्य घरेलू क्रिकेट का एक बड़ा केंद्र बन सकता है?

पिछले डेढ़ दशक में, नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य में बहुत सारा इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचा) तैयार किया गया है—हालांकि अब उनका कार्यकाल समाप्त होने वाला है। बिहार में चारों ओर बेहतरीन सड़कें (हाईवे) फैली हुई हैं। शहरों का विस्तार भी बहुत तेज़ी से हो रहा है। और इसके बावजूद, खेलों से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर भारत के बाकी हिस्सों के मुकाबले काफी पीछे है। निजी क्रिकेट अकादमियां तो कुकुरमुत्तों की तरह उग आई हैं। लेकिन राज्य सरकार और BCA—जिनकी वेबसाइट भी काफी पुरानी और अव्यवस्थित है—को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी। बिहार में आखिरी बार कोई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच 1996 में खेला गया था। उम्मीद है कि राजगीर में बना नया-नवेला स्टेडियम और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स इस बदलाव की शुरुआत करेंगे।

वैभव ‘नए बिहार’ का प्रतिनिधित्व करते हैं—एक ऐसा बिहार जो अनगिनत संभावनाओं से भरा हुआ है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर आप अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत को एक साथ मिला लें, तो आप अपने आस-पास के माहौल की सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ सकते हैं। उनकी सफलता, और साथ में ईशान की सफलता, बिहार—और पूरे भारत—में क्रिकेट के लिए एक ‘गेम-चेंजर’ (पासा पलटने वाली घटना) साबित हो सकती है।

बहरहाल जब ईशान किशन के कोच संतोष कुमार से पूछा तो उनका कहना था कि किशन प्रतिभाशाली है, जिस तरह खेलते हैं, कैच पकड़ते हैं आने वाले दिनों में वे ‘हरफनमौला; बन सकते हैं। किसी भी खिलाड़ी को यहाँ तक पहुँचने में कोच के योगदान के बारे में जब पूछा तो संतोष कुमार का कहना है कि ‘कोच तो एक गाइड के रूप में कार्य करता है। एक खिलाडी किस कदर खेलेगा पिच पर यह तो तत्कालीन सूझ-बच पर निर्मभर करता है। हमारी कोशिश होती है कि सैद्धांतिक रूप से एक खिलाड़ी को बताएं, अभ्यास कराएं जिससे खेल के मैदान में वह उसे व्यावहारिक रूप वह दे सके। पहले खेल था, खेल को खेलने की भावना से खेला जाता था। आज समीकरण बदल गया है। आज खेल में पैसा का बोलबाला हो गया है। परिणाम यह हुआ है कि अर्थ से कमजोर खिलाडी इस दौड़ में पिछड़ रहा है अन्यथा बिहार में टैलेंट की किल्लत नहीं है। इतना ही नहीं, आज एक अथवा दो सफलता के बाद से ही खिलाड़ियों में ैटिचुड़ आ जाता है, उनकी भाषा, चाहे मौखिक हो या शारीरिक बदल जाती है। पैसा बोलने लगता है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज खिलाड़ी बिकते नहीं।

क्रमशः ….. खिलाड़ियों के पैरों के लिए तरसता पटना का मैदान, खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते रोते-बिलखते प्रशिक्षक – कौन देखेगा?

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