कभी सुने हैं कि भारत के फलाने राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, मुख्य मन्त्री या मंत्रीगण के बच्चे राष्ट्रध्वज के रक्षार्थ भारतीय सेना ‘ज्वाइन’ किये हैं?

कनॉट प्लेस सेन्ट्रल पार्क में  तिरंगा और सामने भारत का भविष्य 
कनॉट प्लेस सेन्ट्रल पार्क में  तिरंगा और सामने भारत का भविष्य 

कभी सुने हैं कि  ​भारत के ​ फलाने राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, मुख्य मन्त्री या मंत्रीगण बच्चे राष्ट्रध्वज के रक्षार्थ भारतीय सेना में अपनी सेवा देने ज्वाइन किये हैं? यहाँ “निपोटिज्म” नहीं हो सकता क्योंकि यहाँ “मौत से प्रत्येक-पल साक्षात्कार होता है”और​ देश के लिए मरने, अपने प्राणों की आहुति देने का कार्य सिर्फ-और-सिर्फ गरीबों, बीपीएल रेखा के नीचे ​रहने ​वाले देश के नागरिकों (आधारकार्ड/पैन कार्ड/वोटर आई-कार्ड धारक अवश्य हों) का है; क्योंकि​ आजकल दिल्ली के कनॉट प्लेस सेन्ट्रल पार्क स्थित गंगनचुंबी तिरंगा से लेकर देश के सभी राज्यों और केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में ऊँचा-ऊँचा राष्ट्रध्वज लगाने का जैसे फ़िल्मी-अंदाज में फैशन हो गया है।  ​अब न तो लोग उनसे पूछ सकते हैं और न वे बताना चाहेंगे (क्योंकि यही तो भावनात्मक राजनीति है) की आखिर चौराहे पर झंडे की ऊंचाई तो बढ़ रही है, लेकिन देश में मानवीयता क्यों रसातल की ओर उन्मुख है।

विस्वास नहीं हो तो अपने-अपने प्रदेश में ऐसे ऊँचे लहराते-फहराते झंडे को भी देखें और यह भी देखने में “राजनीति नहीं करें” “कोताही नहीं करें” की वहां के बच्चों को भर पेट खाना मिलता है अथवा नहीं? वहां के बच्चे वद्यालय जाते हैं अथवा नहीं? वहां के बच्चों का शरीर वस्त्र से ढंका है अथवा नहीं ? वहां सरकारी विद्यालय सुदृढ़ है अथवा नहीं? वहां की महिला सडकों पर प्रसव-पीड़ा करते अन्तिम सांस तो नहीं ले रहीं हैं? वहां की महिलाओं को अपने ही समाज के दवंग/आर्थिक-राजनीतिक दृष्टि से मजबूत लोग बलात्कार तो नहीं कर रहे हैं? आखिर यह भी तो आप ही देखेंगे – या फिर उस झंडे के नीचे जूते पहनकर, सेल्फी लेकर, सोसल मीडिया पर चिपकाएंगे और राष्ट्रभक्तों की कतार में पंक्तिबद्ध हो जायेंगे ? विचार जरूर करें। 

इससे भी बड़ी बिडम्बना तो यह है कि जितना देश की आर्थिक – राजनीतिक – सांस्कृतिक – स्वास्थ- शिक्षा – परिवहन – यातायात आदि क्षेत्रों में हिन्दमहासागर की गहराई से भी अधिक गहरे भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए कोई कदम नहीं उठाये जाते; इन स्थानों पर लहराए-फहराए तिरंगों को साफ़-सुथरा करने किए लिए धोबी घाट या लॉण्ड्रियों में भेजे जाते हैं, वह भी प्रत्येक 15-दिनों में एक बार । 

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कनॉट प्लेस सेन्ट्रल पार्क में  तिरंगा – अभी धुलने गया है 

अब उन्हें कौन समझाए की “भैय्ये !!! तिरंगा साफ़ नहीं, अपने-अपने अन्दर झांककर देखो, उसे साफ़ करो तभी तुम्हारा, तुम्हारे गाँव का, प्रखंड का, जिला का, प्रदेश का और देश का भलाई है। अगर तिरंगा साफ़ नहीं भी रहेगा तो भी भारत के लोग, नौजवान, युवतियां इस तिरंगे के लिए अपने-अपने प्राणों को उत्सर्ग करने की क्षमा रखते हैं।

वैसे आपने कभी सुना नहीं होगा अब तक (यदि जानकारी हो तो लिखें जरूर) कि  “फलाने मन्त्री के, या फलाने मुख्य मन्त्री के या फलाने प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति के बच्चे भारतीय सेना में, राष्ट्रध्वज के रक्षार्थ अपनी सेवा देने ज्वाइन किये हैं?” नहीं न। 

लेकिन एक बात नगारा बजाकर, ताल-ठोककर, ढ़ोलक बजाकर, शंखनाद कर कहा जा सकता है की देश में आम-आदमियों की बात छोड़िए, इन तिरंगों के देखरेख करने वाले देश के सम्भ्रान्त लोग-बाग़, नेतागण, समाज-सेवी/सेवकगण, खाकी-वर्दी धारीगण (सेना के नौजवानों और सीमा पर लड़ने वाले योद्धाओं को छोड़कर) – इन तिरंगों का इतिहास-भूगोल-नागरिक शास्त्र के मामले में “शून्य” जानकारी रखते हैं। 

अगर भारतीय न्यायिक व्यवस्था या देश के उम्दा-से-उम्दा अन्वेषण एजेंसियाँ इन तिरंगा-स्थलों के निर्माण से लेकर आज की तारीख तक इसके रख-रखाव और इनसे जुड़े अन्य पहलुओं की, भारत-माँ की मिट्टी की शपथ लेकर जाँच करें, तो देश में “अजूबा स्केम” सतह पर उभरेगा। 
राष्ट्रध्वज की ऊंचाई अधिकाधिक बनाने से यह कतई नहीं माना जा सकता है कि उस जिला, राज्य की व्यवस्था अथवा सरकार में शामिल लोगबाग, वहां का आवाम “सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त है और राष्ट्र के लिए आज भी अपने प्राणों को उत्सर्ग करने हेतु 24 x 7 तत्पर रहते हैं।”

यकीन नहीं होता तो भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय / गृह मंत्रालय या देश के सभी प्रदेशों के गृह मंत्रालयों का आंकड़ा देखें। भारत के तीनो सैनिक ईकाइयों में, मसलन जल-थल और वायु में, ग्रामीण-युवकों, युवतियों की संख्या उत्कर्ष पर है, न कि जहाँ-जहाँ राष्ट्रध्वज राजनीतिक कारणों से ऊँचे खड़े किये गए हैं, उन स्थानों के। 

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जिस राष्ट्रध्वज के ठीक नीचे सतह पर, जहाँ से उस ध्वज को खड़ा रखने के लिए “लोहे” अथवा “स्टील” का पाईप जमीन में गड़े होते हैं; वहां अगर देश के लोग जूता-चप्पल पहनकर खड़े, “वैसे लोगों की मानसिकता, उनकी सोच, राष्ट्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और तिरंगा के प्रति उनका सम्मान और समर्पण का अन्दाजा वैसे लोग कर सकते हैं जो ऐसा नहीं करते हैं। 

इतना ही नहीं, भारत में “दरिद्र-मानसिकता” वाले लोगों द्वारा, जिसमें देश के सम्भ्रान्त, विचारवान, शिक्षित, सम्पन्न व्यक्ति अधिक हैं, राष्ट्रध्वज की बेज्जती आप गणतन्त्र दिवस और स्वाधीनता दिवस पर खुलेआम देखते होंगे, देख सकते  देखते रहेंगे। क्योंकि, गाल पर, चाहे खेल  मैदान हो या गणतन्त्र दिवस / स्वाधीनता दिवस का अवसर हो, राष्ट्रध्वज का “क्षणिक गोदना गोड़वाकर सोसल मीडिया पर सेल्फी चिपकाने से कोई राष्ट्रभक्त नहीं हो सकता है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि ऐसे परिवारों में, लोगों को, बच्चों को घर-समाज के बड़े-बुजुर्ग जिन्होंने उस तिरंगे-तले इसी देश के लोगों को मरते देखे, अंग्रेजी हुकूमत की गोलियों से भारतीयों के शरीरों को छल्ली-छल्ली होते देखे, चश्मदीद गवाह बने – वे भी नहीं रोकते हैं, वे भी नहीं टोकते हैं।

कहा जाता है कि जो समाज अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणो की आहुति देने वाले क्रान्तिकारियों, शहीदों का कद्र नहीं करता, उनके वंशजों के प्रति कृतज्ञता के साथ-साथ संवेदनशील नहीं होता, वह समाज कभी “मानवीय” नहीं कहला सकता। व्यवस्था अथवा सरकार तो महज एक संस्था का नाम है जो ईंट-पथ्थर से बना होता है, जो निर्जीव होता है। उस ईंट-पथ्थर से बने भवन के छत के नीचे रहने वाले मनुष्य अगर अगर संवेदनशील हैं, मानवीय हैं तो व्यवस्था अथवा सरकार भी मानवीय होगी और वह भवन भी “जीवित” कहलायेगा ।​ वैसे भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान बिहार में 134 क्रान्तिकारी शहीद हुए थे।

चाहे जलियांवाला बाग़ हो या पटना का सात मूर्ति, या फिर दिल्ली का पुराना जेल – देश में स्थित शहीद स्मारकों की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। यकीं मानिए , अगर दिल्ली के लोगों से दिल्ली का पुराना जेल के बारे में पूछा जाय, और उनसे यह भी पूछा जाय की यह कहाँ है और कितने लोगों को यहाँ फांसी पर लटकाया गया था – उनकी मानसिकता पहले से ही लटकी मिलेगी। इसके लिए व्यवस्था, शाशन से अधिक जिम्मेदार समाज है, परिवार है, बड़े-बुजुर्ग हैं जिन्होंने कभी यह नहीं बताया की उनके गाँव, मोहल्ला, समाज, प्रखंड, जिला और प्रदेश की क्या भूमिका रही थी, क्रांतिकारियों, शहीदों की क्या भूमिका रही थी – आज़ादी के दौरान !!

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जलियाँवाला बाग के उस घटना का जिक्र करें तो सौ बरस पहले की वह घटना आज भी हर संवेदनशील मन को झकझोर देती है। मैदान के चारों तरफ बने मकानों की दीवारों में धंसी गोलियों के निशान, और एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत का मंजर जैसे दिल दहला देता है। यहां हर दिन आने वाले हजारों लोगों में से बहुत से लोग उस पिरामिड नुमा पत्थर के नजदीक बैठकर फफक फफककर रोने लगते हैं, जिसपर लिखा है, “यहां से चलाई गई थीं गोलियां।’’ यह तारीख आज भी विश्व के बड़े नरसंहारों में से एक के रूप में दर्ज है। दुनियाभर के मुल्कों में आजादी के लिए लोगों ने कुर्बानियां दी हैं, लेकिन यह अपनी तरह की पहली घटना है, जिसमें एक ही स्थान पर एक साथ इतने लोगा शहीद हुए हों।

बिहार की आवादी आज 10 करोड़ से ज्यादा है जो देश में जनसंख्या की दृष्टि से तीसरे स्थान पर आता ​हैं। दस करोड़ आवादी मतलब एक फिलीपीन्स। लेकिन क्या बिहार के लोग ​पटना सचिवालय के सामने 11 अगस्त, 1942 को अंग्रेजी हुकूमत की गोलियों से छल्ली-छल्ली हुए सात नौजवान शहीदों उनके जीवित वंशजों को जानते हैं? पहचानते हैं? नहीं न। फिर आएं ‘मानसिक रूप’ से गोईठा पाथें। वैसे उन सात शहीदों में एक के घर ​की दीवारों पर बिहार के लोग गोईठा पिछले ७६ वर्षों से पाथते चले आ रहे हैं।

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