दरभंगा/मधुबनी/नई दिल्ली: विगत दिनों दिल्ली मेट्रो का डब्बा बिहार पर्यटन के आवरण से ढंका दिखा। कैमूर पहाड़ से लेकर महाबोधि मंदिर की तस्वीरें दिखीं। लेकिन सोचने को विवश हो गया कि व्यावहारिक तौर पर जो स्थिति बिहार ही नहीं, भारत के पुरातत्वों, ऐतिहासिक धरोहरों की है, वही स्थिति मिथिली की सांस्कृतिक गरिमा की हो रही है। वह तो धन्यवाद के पात्र हैं समाज के कुछ संवेदनशील व्यक्ति, युवा पीढ़ी और संस्कृति और कला को दांत से पकड़ी महिलाएं, जिनके कारण आज भी वह जीवित हैं।
आम तौर पर दिल्ली का कोई भी कोना ऐसा नहीं होगा जहाँ बिहार के लोग नहीं रहते हों। उनका दिल्ली में रहना शौकिया भी हो सकता है और मज़बूरी भी। औसतन सैकड़े 100 व्यक्तियों में 80 फीसदी लोग दिल्ली में मज़बूरी में रहते हैं। उनका मानना है कि अगर उनके प्रदेश में रोजी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ, खेती-बारी, बाजार-विपरण का उचित व्यवस्था होता, तो कभी वे बक्सर से आगे नहीं निकलते। कभी गंगा पार नहीं करते।
बिहार के पहली विधान सभा से लेकर नीतीश बाबू वाले विधान सभा तक, यानी श्री कृष्णा सिन्हा, दीप नारायण सिंह, बिनोदानंद झा, कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद सिंह, बी पी मंडल, भोला पासवान शास्त्री, हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पांडेय, अब्दुल गफूर, जगन्नाथ मिश्र, राम सुन्दर दास, चंद्र शेखर सिंह, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आज़ाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, जीतन राम मांझी और नीतीश कुमार – सभी महानुभाव भी तो बिहार के ऐतिहासिक ‘मानव पुरात्तव’ की ही गिनती में रहे – कुछ हैं तो कुछ कूच कर गए।
अगर ये सभी बिहार के महामानव ‘ऐतिहासिक पुरात्तव’ नहीं होते, प्रदेश में अपना स्थान, नाम, गरिमा अलग नहीं रखते, तो सन 1950 में बिहार के करीब 29,085,017 आवाम से लेकर आज के करीब 128,458,570 लोग, इन्हें पटना के डाक बंगला चौराहा से उठाकर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर क्यों चिपकाते? बहुत उम्मीद थी प्रदेश के मतदाताओं को इन ऐतिहासिक मानव पुरातत्वों से । वे इस उम्मीद से इन महानुभावों को प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व हस्तगत कराये की उनके जीते जी प्रदेश का बेहतरीन विकास होगा।
राजा जनक की नगरी से लेकर शेरशाह सूरी के मकबरा तक, गौतम बुद्ध की नगरी बोध गया से लेकर नालंदा की ऐतिहासिक विश्वविद्यालय तक, पटना के गोल घर से लेकर मधुबनी के राजनगर तक, पावापुरी के जैन मंदिर से पार्श्वनाथ के महावीर मंदिर तक, खेत से खलिहान तक, कोर्ट-कचहरी से विद्यालय-महाविद्यालय-विश्वविद्यालय तक – चतुर्दिक विकास होगा यह सुनते आये हैं। बिहार में राम राज्य स्थापित होगा। ‘सकारात्मक’ रूप में बिहार का दृष्टान्त विश्व के पटल पर दिया जायेगा। लोग बाग़ बिहार का नाम सुनते ही चुम्बक के उत्तरी-दक्षिणी ध्रुवों की तरह आकर्षित होंगे मगध की राजधानी सहित बिहार की भूमि को देखने के लिए ।
लेकिन श्री कृष्णा सिंह से लेकर कर्पूरी ठाकुर के रास्ते, लालू प्रसाद-राबड़ी देवी को याद करते सम्मानित नीतीश कुमार के वर्तमान कार्यकाल तक विकास की रेखाएं उसी तरह धूमिल होती दिखती हैं, जिस तरह नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेषों पर मुद्दत से जमी काई । हाँ, उपरोक्त ऐतिहासिक महामानवों में कुछेक को अपवाद स्वरुप छोड़कर, शेष ‘मानवीय पुरातत्वों’ की तुलना भारत के धनाढ्यों के धनाढ्य से ही किया जा सकता है। दुर्भाग्यवश प्रदेश के मतदाताओं ने विगत 72 सालों से अपनी उंगलियों में रोशनाई लगाकर चुनाव में उन्हें चुनते आये, नेता बनाते आये, मुख्यमंत्री बनाते आये – लेकिन विकास की रेखाएं बिहार के मतदाताओं के घरों तक नहीं पहुंचा। चाहे दिल्ली के रेसकोर्स रोड का नाम कल्याण मार्ग रख दिया जाय या फिर पटना के मजहरुल हक़ रोड को फ़्रेज़र रोड कहें या फिर बेली रोड को जवाहरलाल नेहरू मार्ग या फिर बैंक रोड को बी पी कोइराला मार्ग।
आंकड़ों के अनुसार देश में तकरीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। अगर औसतन भारतीयों से पूछा जाय की वे अपने ही राज्य में स्थित न्यूनतम 10 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों का नाम बताएं, तो उम्मीद है वे पांच अथवा छठे नाम बताते-बताते दम तोड़ देंगे। वजह यह है कि उन्हें उन ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है (अपवाद छोडकर्) यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमें सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानी उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है।
उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्नाटक का है जहाँ 506 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडु का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पांचवा स्थान गुजरात (293 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); छठा स्थान मध्य प्रदेश (292 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); सातवां स्थान महाराष्ट्र (285 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर), आठवां स्थान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ 174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; आंध्र प्रदेश में 129 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हरियाणा में 91 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; ओडिशा में 79 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; बिहार में 70 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; जम्मू-कश्मीर में 56 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; असम में 55 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; छत्तीसगढ़ में 47 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; उत्तराखंड में 42 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हिमाचल प्रदेश में 40 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; पंजाब में 33 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; केरल में 27 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; गोवा में 21 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; झारखण्ड में 13 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं और अंत में दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं। औसतन वैसे ऐतिहासिक पुरातत्वों को छोड़कर, जो “दुधारू गाय” है, देश के हज़ारों-हज़ार पुरातत्वों की स्थिति, “सोचनीय” ही नहीं, “निंदनीय” भी है।
लेकिन आजकल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले बिहारी भाई लोग बहुत खुश हैं। उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं है। कहते थकते नहीं कि दिल्ली मेट्रो बिहार स्थित ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों का प्रचार-प्रसार कर रही है। ताकि उन पर्यटन स्थानों से रूबरू होने के लिए लोग बाग़ बिहार की ओर उन्मुख हों। आंकड़े बताते हैं कि बिहार में शिक्षा और रोजगार की बदतर स्थिति के कारण लगभग 20,000 लोग नित्य बक्सर और गोरखपुर पार कर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अवतरित होते हैं। यानी दिल्ली की आवादी नित्य 20000 बढ़ती है। ऐसा माना जाता है कि इन सांजख्य में श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है। अब नीतीश कुमार क्या, आने वाले समय में दर्जनों, सैकड़ों सम्मानित मुख्यमंत्रीगण दिल्ली मेट्रो क्या अमेरिकन, फ़्रांस, जर्मनी, जापान के मित्रों ट्रेनों में, मुंबई में, कलकत्ता में, लखनऊ में चलने वाली मेट्रो ट्रेनों में गोलघर, बोधा गया, राजगीर की तस्वीरों की, लिट्टी-चोखा की, मालपुआ की तस्वीरों का आवरण क्यों न बना दें, इससे प्रदेश में पर्यटन सेवा अधिक नहीं हो सकती हैं।
मिथिला की सांस्कृतिक गरिमा को बचाना होगा
यहाँ प्रदेश के पुरातत्वों का जिक्र इसलिए किया कि पुरातत्व की तरह ही मिथिला की सांस्कृतिक गरिमा की है। विगत दिनों दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में लगे एक प्रदर्शनी देखने गया था जिसमें मिथिला लोक चित्र कला की भी भागीदारी थी। अधेड़ उम्र की महिलाएं तो मैथिली भाषा में बोलने की क्षमता राखी थी, लेकिन 40 से कम उम्र वाले लोग, महिला-पुरुष दोनों, मैथिली भाषा का नाम सुनते ही हकलाने लगे थे। उन्हें यह कहने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई कि वे मैथिली मैं बात नहीं कर सकते हैं। इतना ही नहीं, जब उनलोगों से यह पूछा कि मिथिला में जन्म से लेकर मृत्यु तक, विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अवसरों पर बनने वाले ‘अरिपन’ आदि के बारे में क्या वे जानते हैं? सभी ‘नकारत्मन’ स्वरुप गर्दन हिला दिए। खैर।
अभी मिथिला में विवाह का मौसम है। नवम्बर से जनवरी और फिर मई-जून महीने में शायद ही कोई गाँव, क़स्बा मिलेगा जहाँ वृद्ध माता-दादी-नानी ‘शुभे हे शुभे’ नहीं गाती मिलेंगी और अपने घरों में दीवारों पर कोहबर बनाती मिलेंगी । लेकिन मिथिला और नेपाल की तराई वाले इलाके में नाग पंचमी के दिन, जिस दिन राम और सीता का विवाह हुआ था, लोग अपनी बेटी का विवाह नहीं करते हैं। विवाहोपरांत देवी सीता को जो कष्ट हुआ था, उस कष्ट को सुनकर ही मिथिला के माता-पिता अपनी बेटियों का विवाह नाग पंचमी को वर्जित कर दिए। स्थानीय महिलाएं कहती हैं कि नव वर को पहले कोहबर से विवाह करना होता है, सिंदूर पहले कोहबर को लगता है; उसके बाद वधु से विवाह होता है और वधु को सिंदूर लगाता है।
मिथिला में इसकी अपनी परंपराएं और रीति-रिवाज हैं जो हजारों सालों से चले आ रहे हैं। मिथिला क्षेत्र में कई समुदाय हैं और सभी की अपनी शादी की रस्में हैं, लेकिन मैथिल ब्राह्मणों की शादी कुछ ऐसी है जो अपनी विशेषता और विशिष्टता के कारण सभी के बीच लोकप्रिय मानी जाती है। क्योंकि मिथिला में ब्राह्मणों का विवाह का सीधा संबंध रामायण से है। ऐसी मान्यता है कि मैथिल ब्राह्मणों का विवाह भी उन्हीं रीति-रिवाजों और रीति-रिवाजों से होता है, जिनका रामायण में भगवान राम और माता सीता के विवाह का उल्लेख है। माता सीता मिथिला के राजा जनक की पुत्री थीं। उनके विवाह के लिए राजा जनक ने स्वयंबर का आयोजन किया। भगवान राम ने स्वयंबर में उन्हें जीतकर उनसे विवाह किया। इस अवसर पर केवल राम और सीता से संबंधित गीत गाए जाते हैं।
राकेश कुमार झा मिथिला चित्रकला, मिथिलांचल की लोक-सांस्कृतिक चित्रकला के ज्ञाता हैं । उनका कहना है कि कोबर लिखिया या चित्रण वस्तुत: अनेक प्रतीक-चिन्हों का अदभुत संयोजन है। उनके अपने उद्देश्य हैं, अपनी विशेषताएं हैं, अपने सिद्धांत हैं जो विज्ञान की अवधारणाओं पर आधारित हैं। उन प्रतीक चिन्हों की लिखिया कोबर घर यानी नव वर-वधू के दांपत्य जीवन की शुरुआत के निमित तैयार कक्ष की भित्तियों पर की जाती है। मिथिला चित्रकला के बाजारीकरण के पश्चात् कागज पर कोबर का चित्रण बढ़ा और उसके चित्र असंख्य में मिलते हैं। कोबर लिखिया के परंपरागत ज्ञान के आलोक में जब हम उन चित्रों को देखेंगे, तब पाएंगे कि युवा पीढ़ी के पास उसके निरूपण की जानकारियों का कितना अभाव है। उनमें प्रतीक-चिन्हें की परंपरागत व्यवस्था और उसका संतुलन स्पष्ट रूप से बिगड़ा दिखता है।

कोबर लिखिया में प्रतीक चिन्हों की व्यवस्था पर चर्चा से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि लिखिया की पात्रता किसे प्राप्त है। हमारी परंपरा केवल उन सुहागन महिलाओं को जिनकी गृहस्थी सफल है, कोबर लिखिया की पात्रता देता है। अविवाहित युवतियों और निःसन्तान महिलाओँ के लिए कोबर की लिखिया वर्जित है। घर में कोबर पूजन का स्थान एवं दिशा भी नियत है। वैदिक संस्कृति में इसके लिए अग्नेय कोण को उपयुक्त माना गया है। अग्नेय कोण यानी दक्षिण-पूर्व दिशा, जिसके स्वामी अग्नि हैं। इसी वजह से यज्ञ वेदी के लिए भी यही कोण निर्धारित है। अग्नेय कोण को कुलदेवी का स्थान भी माना जाता है। कोबर लिखिया में प्रतीक-चिन्हों का स्थान भी नियत है। प्रतीक चिन्हों में सूर्य-चन्द्रमा, नव-नवग्रह-पंच-देवता, पुरैन-बांस, लटपटिया तोता (जोड़ा तोता), केला का पेड़, हाथी, कछुआ, मछली, नैना जोगिन आदि का चित्रण होता है।
प्रतीक चिन्हों की व्यवस्था की चर्चा सबसे पहले नैना जोगिन से करते हैं। यह माना जाता है कि नैना जोगिन का चित्रण बौद्ध धर्म के प्रभाव में शुरू हुआ। मिथिला के गृहस्थ परिवारों पर जब बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा, तब उसे निष्प्रभावी बनाने हेतु नैना जोगिन के चित्रण की परंपरा शुरू हुई। इसके लिए चारों दिशाओं को तांत्रिक विधि से साधा जाता था और कोबर घर को उसके चारों कोणों में नैना जोगिन का चित्रण कर बांधा जाता था। नैना जोगिन की चित्रण की परंपरा आज भी जारी है, इस वजह से कि वह ऐसी किसी भी बुरी शक्ति, जो नव-दंपत्तियों को गृहस्थ आश्रम से दूर ले जाती हो, उसे निष्प्रभावी कर नव-दंपत्तियों में परस्पर आसक्ति और सम्मोहन भाव को बनाये रखेगी, ताकि वे सफल गृहस्थ बने रहें।
सूर्य-चन्द्रमा, पंच-देवता-नवग्रह का चित्रण कोबर घर में पूर्व की दीवार पर किया जाता है। मिथिलांचल में विवाह पंच-देवता अर्थात् सूर्य, अग्नि, दुर्गा, महादेव और गणेश को साक्षी मान कर संपन्न होता है। उनकी कृपा नव-विवाहित दंपत्ति पर बनी रहे और नवग्रह उनके जीवन में साकारात्मक प्रभाव पैदा करें, इसलिए उनकी पूजा का विधान है। वही विधान लिखिया के माध्याम से कोबर में अभिव्यक्त होता है। ज्ञातव्य है कि मिथिला कर्मकांडीय व्यवस्थाओं में विष्णु का स्थान नवग्रहों में नहीं है। कोबर में महादेव और गौरी को स्थान दिया गया है। इसकी वजह है। महादेव और गौरी दोनों अलग-अलग परिवेशों में पलें-बढ़े हैं। दोनों के गुण-धर्म में भी अंतर है। एक मसान साधक हैं तो एक पर्वतराज की राजकुमारी। फिर भी गौरी महादेव को अपने आदर्श-पति के रूप में अपनाती हैं और दोनों सफल गृहस्थ जीवन का आनंद उठाते हैं। नव-दंपति भी वही आदर्श अपने भीतर स्थापित करें, इसकी कामना कोबर में गौरी-महादेव का चित्रण कर की जाती है।
जलीय एवं थलीय जीव-जंतुओं में मछली, कछुआ और हाथी कोबर में प्रमुखता से स्थान पाते हैं। कोबर में हाथी का चित्रण सूर्य-चन्द्रमा के ठीक नीचे किया जाता है। हाथी ऐश्वर्य का प्रतीक है। वह नव-दम्पति को धन-धान्य से भरपूर जीवन का आशीर्वाद देता है। भारतीय योग परंपरा में मछली को चंद्रमा और सूर्य से संबंधित माना गया है, जो मानव जीवन में प्राण (जीवन ऊर्जा) का संचार करती है जबकि हिंदू ज्ञान परंपरा और बौद्ध ज्ञान परंपरा में उसे धन, समृद्धि और ऐश्वर्य की बहुलता का प्रतीक माना गया है। वह प्रेम, सद्भाव, खुशी और जुड़ाव का भी प्रतीक है। तंत्र विद्या में मछली की आंख सम्मोहन का प्रतीक है। इसलिए कोबर में मछली के चित्रण से न केवल नव-दंपत्ति के ऐश्वर्यपूर्ण जीवन की कामना की जाती है बल्कि उनके बीच सम्मोहन का भाव बना रहे, यह कामना भी की जाती है। एक-दूसरे के मध्य सुरक्षा और विश्वास की भावना के प्रतीकार्थ भी मछली का चित्रण कोबर में किया जाता है।
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि कोबर में मछली का चित्रण एकल होता है या अलग-अलग स्थानों पर। उन्हें जोड़े में चित्रित करने की परंपरा नहीं रही है। वास्तुशास्त्र के मुताबिक जोड़े में मछली का चित्रण जल का प्रतीक है और जल नव-दंपत्तियों के बीच की प्रेमाग्नि को ठंडा कर सकता है। मछली के चित्रण का संबंध प्रजननता से भी है। उसकी उर्वरा शक्ति असीम होती है। कछुआ भी लंबी आयु के साथ-साथ असीम प्रजनन शक्ति के प्रतीक के रूप में कोबर में उपस्थित होता है। कछुए और मछली के चित्रण के जरिए देवी गौरी से यह कामना की जाती है कि वह नव-दंपत्ति को संतान सुख और लंबी आयु तक संसारिक सुखों को भोगने का आशीर्वाद दें।
कछुआ का संबंध भगवान विष्णु के कच्छप अवतार से भी है जिन्होंने समुद्र मंथन क्रम में मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया था। उसे नव-निधियों में स्थान दिया गया है जो धन-धान्य, सुख-समृद्धि का भी प्रतीक है। वह अपने आसपास साकारात्मक ऊर्जा प्रवाह को बनाये रखता है, जिसे सुख-शांति का एक कारक भी माना गया है। इसलिए ऐसी मान्यता है कि कोबर का कछुआ नव-दंपत्ति के वैवाहिक-जीवन को न केवल मजबूत आधार देगा बल्कि वह उनके बीच की नाकारात्मक ऊर्जा का नाश भी करेगा।
कोबर में जिन आकृतियों पर सबसे पहले नजर जाती है, वह है पुरैन और बांस। कोबर की दक्षिणी दीवार पर पुरैन और बांस का चित्रण विधि सम्मत है। बांस पर ही लटपटिया सुग्गे और मोर का चित्रण किया जाता है। लटपटिया सुग्गे को प्रेमी युगल का प्रतीक माना जाता है। उनके साथ बांस का चित्रण नव-दंपत्ति के कुल या वंश की वृद्धि एवं उनके दीर्घायु होने की मंगलकामना का द्योतक है। ज्ञात है कि बांस, ग्रामिनीई (Gramineae) कुल का एक बहुपयोगी घास है। वह सबसे तेज बढ़ने वाले पौधों में शामिल है। उस पर कीटों का प्रभाव नहीं पड़ता है। वह सूखा या अत्यधिक वर्षा में भी अप्रभावित रहता है। बांस में फूल शुष्क परिस्थितियों में ही खिलते हैं। उसकी इन्हीं क्षमताओं-विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए कोबर में उसे स्थान दिया गया है। नवदंपति को यह सीख दी गयी है कि गृहस्थ जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी आपसी संबंधों में प्रेम-पुष्प खिलाये रखना चाहिए।
कमल या पुरैन कोबर चित्रण का अभिन्न अंग है। कोबर घर में कमल-पुष्प, कमल-नाल और कमल-पात का चित्रण नव-दंपत्ति को गृहस्थाश्रम के कई गूढ़ अर्थों से परिचय कराता है। कमल अपने शरीर में हुए रचनात्मक एवं क्रियात्मक परिवर्तनों द्वारा जल में सरलतापूर्वक जीवन व्यतीत करता है। वह अपनी अनुकूलन क्षमता से कम ऑक्सीजन वाली मिट्टी में उग सकता हैं, वंश वृद्धि कर सकता है और प्रतिकूल जलीय परिस्थितियों में भी स्वयं को जीवित रख पाने में सक्षम होता है। यही वजह है कि नव-दंपत्ति को कमल सदृश्य जीवन अपनाने की सीख दी जाती है।
उन्हें यह सीख भी दी जाती है कि जिस प्रकार कमल विपरीत परिस्थिति में खुद को स्थिर रख वंश वृद्धि करता है, वे भी अपने जीवन के झंझावातों के बीच स्वयं को स्थिर रखें, अपने भीतर नवीन आशाओं का संचार करे और अपना वंश बढ़ाएं। साथ ही, जिस प्रकार पानी में रहने के बावजूद कमल अपनी पत्तियों पर पानी की बूंदों का निषेध करता है, उसी तरह नव-दंपत्ति अपने संबंधों के बीच किसी भी बाहरी तत्वों का प्रवेश निषेध करें। यह संभव है कि नाकारात्मक ऊर्जा कभी उन्हें विलग कर दे, उस परिस्थिति में भी दोनों के अंत:स्थ का व्यवहार कमल के पत्ते (पुरईन) समान होना चाहिए।
हिन्दू धर्म में सुंदर पंखुड़ी युक्त कमल पुष्प को देवी लक्ष्मी का वास माना गया है और कोबर में कमल का चित्रण उनसे सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य प्राप्ति की कामना का भाव लिए किया जाता है। सत्यम-शिवम-सुन्दरम का रूपक रचता कमल पुष्प का उदाहरण विशिष्ट उपमाओं के तौर कमल हस्त, कमल नयन, कमल चरण, कमल हृदय के रूप में दिया जाता है। इन्हें ईश्वर का गुण-धर्म माना गया है जिसे नव-दंपत्ति अपने आचरण में धारण करेंगे, इसकी कामना की जाती है।
सूर्योदय के साथ कमल का खिलना और सूर्यास्त के साथ उसकी पंखुडियों का बन्द हो जाना, जीवन में सूर्य की ऊर्जा के महत्व को दर्शाता है। विष्णु की नाभि से निसृत, कमल-नाल द्वारा पुष्प का ब्रह्मा से जुड़ा होना, ब्रह्मा से सृष्टि की उत्पत्ति को भी दर्शाता है। इन अर्थों में कमल, ब्रह्मा के प्रतीक स्वरूप भी कोबर में उपस्थित होता है और कमल-नाल सृष्टि की सृजन शक्ति और मनुष्य की सृजन शक्ति के मध्य एक संबंध स्थापित करता है। इन सबके अतिरिक्त कोबर घर के चारों कोण में केला के वृक्ष लगाने की परंपरा रही है, जो कदली वन में योग या साधना को प्रतिबिंबित करता है। मिथिलांचल की साहित्य परंपराओं में इसकी चर्चा खूब मिलती है।

श्रीमती मीना चौधरी का कहना है कि कोहबर मिथिलांचल की एक लोक सांस्कृतिक प्रथा है जिसमें नव वर वधु अपने नए दांपत्य जीवन की शुरुआत करते हैं। पुराने ज़माने में घर की दीवारों पर रंग बिरंगे चटकीले कोहबर बना कर, घर को मूर्त रूप में जीवंत बनाया जाता था। सभी देवी देवताओं, सृष्टि जगत को इस माध्यम से साक्षी बनाया जाता था। नव दंपत्ति (वर – कनियाँ) के मध्य हमेशा प्रेम सामंजस्य बना रहे और सम्पूर्ण सृष्टि, नाइकी दुल्हन को अखंड सौभाग्यवती बने रहने का आशीर्वाद प्रदान करें, इस सद्भावना से कोहबर लिखा जाता था। इसीलिए मिथिला कला में दीवारों पर लिखने की इस प्रक्रिया को भित्ति चित्र व लिखिया कहा जाता है।
श्रीमती चौधरी आगे कहती हैं कि कोहबर की एक विशिष्ट बात यह है की इसमें सभी आकृतियाँ जैसे – तोता, मोर, भंवरा इत्यादि जोड़े में बनाई जाती हैं। उन सभी वस्तुओं को कोहबर में स्थान प्राप्त हैं, जो वास्तविक रूप में प्रेम को प्रद्रर्शित करते हैं। हमारे शब्दों में कोहबर प्रेम, सौहार्द, सामंजस्य और सभी के आशीर्वाद का प्रतीक है। परन्तु अब नए ज़माने के अनुसार लोगों के मध्य यह इक वक्त की बर्बादी और उपेक्षा का विषय बनते हुए विलुप्त होने की ओर बढ़ रहा है। इसका मूलतः कारण लोगों में जानकारी का आभाव है। फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध में हमारे बच्चे अपनी संस्कृति को उपेक्षित बनाकर इसके महत्त्व को काम कर रहे हैं, एवं पाश्चात्य संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। युवा वर्ग को जागरूक कर अपनी संस्कृति से अवगत कराने की आवश्यकता हैं, तभी यह मैथिल धरोहर संरक्षित, सुव्यवस्थित व संगठित रह पायेगी।
इसी तरह, श्रीमती अपर्णा लाल कहती हैं “कोहबर” अर्थात् विवाह उपरांत वर–वधू के मिलन का पवित्र घर, जिसे क्षेत्रीय भाषा में कोहबर घर कहा जाता है।कोहबर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है या यूं कहें कि जितनी पुरानी सनातन धर्म में विवाह की परंपरा है, उतना ही प्राचीन कोहबर का इतिहास। रामायण में भी इसका वर्णन विस्तृत मिलता है। जनकदुलारी सीता जी की नगरी मिथिला अपने लोक चित्रकला के लिए विश्व – प्रसिद्ध है, जिसमें कोहबर को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। विभिन्न जगह ऐसा वर्णित है कि नगर निवासियों की भागीदारी, राजा–प्रजा के मध्य आपसी प्रेम– सौहार्द व सहयोग को प्रदर्शित करते हुए जनकपुर के राजा जनक ने अपनी पुत्री के विवाह में सम्पूर्ण नगर को लोक चित्रकारी के माध्यम से सजाया, जिसमें नगर के सभी दीवारों पर विभिन्न प्रकार के पेड़ – पौधों, जीव – जंतुओं, देवी –देवताओं इत्यादि को चित्रित करवाया। आशय यह था कि श्रीराम –जनकनंदिनी सीता के विवाह में समस्त चराचर की उपस्थिति, साक्षी बनाया गया एवं उनके आशीर्वाद से इनका नव दाम्पत्य जीवन युग–युगान्तर तक पल्लवित – पुष्पित रहे, प्रेम– सौभाग्य अखंडवत बना रहे।

श्रीमती अर्पणा जी का कहना है कि कोहबर बनाने के कुछ विशेष नियम होते हैं। इसे बनाने की शुरुआत मुख्यतः मिथिलांचल के किसी भी वैवाहिक अथवा शुभ मुहूर्त में की जाती है। नियमतः इसमें सभी चीज़ें जोड़े में बनाई जाती है।सूर्य, चांद, नव–नवग्रह, ककबा, जलीय जीव जैसे– सांप, कछुआ,शंख, बिच्छू,कमल, पुरैनिक पत्ता,(७/९ की संख्या में),बांस लटपटिया तोता,भंवरा, शिव–पार्वती, बसहा, वर–कनियां,हाथी डाला, पुरहर, पातिल, आसन, लौंग, केला,बेलपत्र इत्यादि का पेड़ बनाया जाता है। जिसमें पुरैनिक पत्ता अर्थात स्त्री (कनियां) एवं बांस अर्थात पुरुष लोक मान्यतानुसार एक प्रतीकात्मक रूप है। “मिथिलांचल में मुख्यतः सभी वैवाहिक रस्म व अनुष्ठान कोहबर की छांव में ही संपन्न किये जाते हैं।”
मिथिला कला व्यवसायिक रूप में संपूर्ण विश्व में अपनी पहचान को एक नया आयाम देने के लिए अग्रसित तो हो रही है परन्तु अपने मूल स्वरूप व क्षेत्र से लगभग विलुप्त हो रही है। मेरे व्यक्तिगत अनुभव से अगर बात करें तो प्रायः शुद्धता का आभाव परंपरागत अनुभवी लोगों का आभाव, क्षेत्रीय लोगों में अपने इस कला के प्रति उदासीनता व हीनभावना, पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध के प्रति बढ़ते लगाव इसके मुख्य कारण बन रहें हैं।




















