
गांधी मैदान (पटना) : जयराम दास दौलत राम से आरिफ मोहम्मद खान तक बिहार 42 राज्यपालों, जो प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं, का चश्मदीद गवाह रहा है। यानी 1947 से 2025 तक औसतन राज्यपालों/कुलाधिपतियों का सेवा काल एक साल आठ महीने रहा है। बिहार के मामले में यह सत्य है। बिहार के लोग ही नहीं, देश के सभी 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नियुक्त होने वाले राज्यपालों में दस राज्यपालों का नाम, अथवा देश के सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपतियों में पांच कुलाधिपतियों का नाम सम्बंधित विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं नहीं बता पाएंगी – यह भी उतना ही सत्य है।
लेकिन जिनका नाम आज भी उनके मानस पटल पर अंकित है, अथवा होगा, वे ‘तारीख’ में दर्ज नहीं होते, और वे हैं ‘शिक्षक’। हमारी शैक्षिक व्यवस्था चाहे कितनी भी ख़राब हो, चरमरा गयी हो, हम बिना छत वाले विद्यालयों में, बिना पानी और शौचालय वाले महाविद्यालयों में पढ़कर शिक्षा प्राप्त किये हों, कर रहे हों – हम शिक्षकों को, शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को नहीं भूलते। लेकिन ‘कुलपति’ और ‘कुलाधिपति’ का नाम जानते तक नहीं – क्योंकि वे सभी राजनीतिक पदस्थापना के तहत आते हैं। परम्परानुसार, संबद्ध राज्य से उनका दूर-दूर का कोई संबंध नहीं होता, बाहरी व्यक्ति होते, केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं राज्यों में। वैसी स्थिति में अतः यह कहना या स्वीकार करना उतना ही अपच्य है कि उनका योगदान प्रदेश के विकास में होगा, क्योंकि अब तक 42 कुलाधिपति तो महज ‘तारीख’ बनकर रह गए।
साल 1996 था। जश्ने आज़ादी के 49वां दिवस का झंडोत्तोलन हो गया था। उस अवसर के पंद्रह दिन बाद पटना उच्च न्यायालय के आदेश से पटना कालेज के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना घटी थी। शायद आज प्रदेश के कुलाधिपति के कार्यालय के साथ-साथ शिक्षक संघ या छात्र संघ को भी मालूम नहीं हो। पटना कॉलेज के एक वरिष्ठ शिक्षक की सेवा अवधि सिर्फ दो दिन बची थी। दो दिन बाद वे सेवानिवृत होने वाले थे। परंपरा के अनुसार नहीं, कानूनन वे पटना कॉलेज के प्राचार्य पद के लिए वरिष्ठ शिक्षक होने के कारण प्रबल दावेदार थे। लेकिन कुलाधिपति के कार्यालय से उन्हें प्राचार्य नहीं बनाकर अन्य शिक्षक को पद पर आसीन कर दिया गया था।
फिर क्या था। प्रोफ़ेसर साहब कुलाधिपति के आदेश को पटना उच्च न्यायालय घसीट कर ले गए। वादी और प्रतिवादी के वकीलों में बहस हुआ। न्यायमूर्ति दोनों के जिरह को सुने। लेकिन वादी का पलड़ा भारी देखकर प्रतिवादी को, आदेश दिया कि प्रोफ़ेसर साहब को उनके हक़ के अनुसार ‘दो दिन के लिए ही सही’, प्राचार्य पद पर आसीन किया जाए।पटना कालेज के स्थापना काल से अब तक बने 94 प्राचार्यों की सूची में ’67 वें प्राचार्य’ के रूप में दो दिन का प्राचार्य बनकर पटना कॉलेज के इतिहास में अपना नाम लिखा दिए।
पटना कालेज के तत्कालीन मैथिली विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अमरेश पाठक 31-08-1996 को सेवामुक्त होने वाले थे। उन दिनों प्रोफ़ेसर एन.पी. वर्मा पटना कालेज के प्राचार्य थे। नियमतः वरिष्ठ शिक्षक होने के कारण प्राचार्य पद पर सेवानिवृत होने के पूर्व – दो दिन के लिए ही सही – उन्हें प्राचार्य बनना था। लेकिन कुलाधिपति के कार्यालय से ऐसा निर्णय नहीं हुआ। उन दिनों डॉ. अख़लाक़-उर-रहमान किदवई कुलाधिपति थे। डॉ. पाठक कुलाधिपति के आदेश को लेकर पटना उच्च न्यायालय पहुंचे जहाँ न्यायालय का आदेश उनके पक्ष में हुआ। साथ ही, यह आदेश भी हुआ की दो दिन के लिए ही सही, डॉ. पाठक को पटना कालेज का प्राचार्य बनाया जाए। डॉ. पाठक 30 और 31 अगस्त 1996 को पटना कालेज के प्राचार्य रहे।

इस बात का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि नब्बे के दशक के बाद, या यूँ कहें कि जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के बाद से बिहार की शिक्षा व्यवस्था सत्यानाश हो गई। लेकिन महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों से लेकर शिक्षकेत्तर कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं का संघ इतना मजबूत था, कि नियमों के विरुद्ध आवाज उठाने में लोग कोताही नहीं करते थे। आज परिस्थिति कुछ अलग है। आज पूरे परिसर में कहीं से चूं की आवाज भी नहीं आती। क्या शिक्षक संघ, क्या छात्र संघ, क्या कर्मचारी संघ – सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पटना विश्वविद्यालय की गरिमा धूमिल हो रही है, हो गयी है; राजनेताओं द्वारा पूरे परिसर के शैक्षणिक वातावरण को समाप्त कर दिया गया है, फिर भी ‘उसे दुरुस्त करने की दिशा में कोई पहल नहीं है। शब्द कटु हैं, लेकिन सत्य यही है।
आज अगर इण्डियन नेशन अख़बार के संपादक श्री दीनानाथ झा होते तो शायद पटना विश्वविद्यालय की धूमिल होती गरिमा के विरुद्ध आवाज जरूर उठाते। व्यवस्था के विरुद्ध, कुलपति, कुलाधिपति की भागीदारी के विरुद्ध अपना सम्पादकीय स्थान ‘खाली’ जरूर छोड़ते या फिर खिलने में कोई कोई कोताही नहीं करते। दुर्भाग्य यह है कि 1990 के बाद बिहार में मुख्यमंत्री कार्यालय और उनके मंत्रिमंडल में वही लोग आये, बैठे जो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति से उपजे थे। बिहार के विश्वविद्यालयों के वर्तमान कुलाधिपति भी उसी आंदोलन के उपज है, लेकिन उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के।
लालू प्रसाद यादव के पुत्र पूर्व-उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की बात यहाँ नहीं करूँगा क्योंकि शिक्षा के महत्व को शायद वे नहीं समझेंगे; लेकिन चाहे लालू प्रसाद यादव हो, चाहे नीतीश कुमार हों, कभी उन लोगों ने न तो छात्र अथवा शिक्षकों से किसी भी तरह का कोई पन्गा लिया और ना ही शैक्षिक वातावरण को ठीक करने की कोशिश किया। वे संघ की ताकत को जानते हैं, आज जिस कुर्सी पर हैं, उसकी ताकत के बदौलत। लेकिन वे उस ताकत का अब ‘मजबूत’ नहीं, बल्कि ‘कमजोर’ बनाकर रखना चाहते हैं, ताकि कुर्सी पर कोई खतरा नहीं हो। यह भी उतना ही सच है। आज प्रदेश में जो भी शैक्षिक वातावरण है, शैक्षणिक संस्थानों में भ्रष्टाचार व्याप्त है, भाई-भतीजावाद है, पैसे की उगाही है, या वे सभी कारण, जिसके चलते प्रदेश में शिक्षा का यह हाल है; उसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय, शिक्षा मंत्री कार्यालय या फिर कुलपति, कुलाधिपति, शिक्षक संघ, छात्र संघ का कार्यालय जिम्मेदार है।
एक दृष्टान्त देता हूँ। आज बिहार के लोगों को, खासकर शिक्षा-जगत में जो हैं, यह मालूम नहीं होगा कि 1963-1967 के कालखंड में, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में कृष्ण वल्लभ सहाय थे (2 अक्टूबर, 1963 – 5 मार्च, 1967) थे, पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के सदस्यों की ताकत इतनी अधिक थी, कि छात्र संघ के पदाधिकारियों से मिलने मुख्यमंत्री स्वयं उनके छात्रावास में आते थे। नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल के लोगों के बारे में या कुलाधिपति के कार्यालय के लोगों के बारे में नहीं कह सकता’ परन्तु नीतीश कुमार या लालू यादव इस बात को जानते हैं, यह कह सकता हूँ।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि “उन दिनों मुख़्यमंत्री के साथ इतना तामझाम नहीं होता था। सहाय साहेब स्वयं और अपने कुछ साथियों के साथ पटना साइंस कालेज के कैवेंडिस छात्रावास में तत्कालीन छात्र संघ के पदाधिकारियों से मिलने आते थे। आज पटना विश्वविद्यालय ही नहीं, बिहार के अन्य विश्वविद्यालयों में शिक्षक संघ, शिक्षकेत्तर कर्मचारी संघ या छात्र संघों की क्या स्थिति है, यह सभी अवगत हैं। वैसी स्थिति में अगर “लॉटरी के आधार पर, पर्ची निकालकर कालेजों के प्राचार्यों की नियुक्ति होती है तो इसके जिम्मेदार कौन हैं?
पटना विश्वविद्यालय ही नहीं, बिहार के किसी भी विश्वविद्यालयों की गरिमा को मिट्टी पलीद करने में शिक्षकों का हाथ कम नहीं है। ‘राजनीति में प्रवेश करना सभी नागरिकों का मौलिक अधिकार है,’ यह ‘सर्वमान्य’ है, परन्तु बिहार का शैक्षिक इतिहास इस बात का गवाह है कि शिक्षकों ने अपने-अपने संस्थानों को राजनीति की तुलना में ‘द्वितीय स्थान’ दिया। ऐसे सैकड़ों शिक्षक हैं जो नौकरी की शुरुआत भले कालेजों से किये, समयांतराल, कालेजों से अवकाश अथवा वेतन-रहित अवकाश लेकर जीवन पर्यन्त राजनीति में कुर्सी हथियाने में लगे रहे। कालेजों का मुख कभी नहीं देखे।
लेकिन, इन वर्षों में इन विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति की भूमिका भी सराहनीय नहीं रहा। कुलाधिपति होने के नाते प्रदेश के राज्यपालों ने कभी भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये। वजह भी है। सैद्धांतिक रूप से राज्यपाल भले देश के राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व राज्यों में करते हों; हकीकत यह है कि वे कल भी प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर टकटकी निगाहों से देखते रहते थे, आदेश की प्रतीक्षा करते रहते थे; आज भी स्थिति जस-का-तस है।
विगत दिनों जब एक अभूतपूर्व कदम के तहत पटना विश्वविद्यालय के पांच कॉलेजों को ड्रॉ के जरिए प्राचार्य उपलब्ध कराया गया – इसे प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर अख़बारों में, पत्रिकाओं में लिखा गया, टीवी पर दिखाया गया। बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान, जो 24 सितम्बर 2024 को बिहार का राज्यपाल नियुक्त हुए थे, विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार ‘लॉटरी के माध्यम से प्राचार्यों को कालेजों का आवंटन किये। जब राष्ट्रव्यापी सुर्खिया बनने लगी, अपने इस कदम का बचाव करते हुए कहा, “हमने एक ऐसी प्रणाली अपनाई है जिसमें प्रिंसिपल की नियुक्ति व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से निर्देशित नहीं होती है।” विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार की एक अधिसूचना के अनुसार, नए प्रिंसिपलों की नियुक्तियां बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की सिफारिश पर की गई हैं।”
उनका कहना है कि यह प्रक्रिया तीन सदस्यीय समिति की देखरेख में आयोजित की गई, जिसमें विश्वविद्यालय के कुलपति और कुलाधिपति कार्यालय का एक प्रतिनिधि शामिल था। वे कहते हैं कि बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों के अंगीभूत महाविद्यालयों में नए प्राचार्यों की पदस्थापना में रैंडम / लाटरी सिस्टम का औचित्य बताते कहते हैं की वे केंद्र के सिस्टम को ज्यों का त्यों उठा लिए हैं। जिस मापदंड पर भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होती है , वे उसी प्रणाली को अपनाये हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हालात यह बन गए हैं कि कुछ महाविद्यालयों में प्राचार्य बनाने के लिए सिफारिशें आ रही थी, कुछ ऐसे भी थे जहाँ कोई जाना नहीं चाहता थे।”

इस पहल के आधार पर नागेंद्र प्रसाद वर्मा (मगध महिला कॉलेज), अनिल कुमार (पटना कॉलेज), अलका (पटना साइंस कॉलेज), सुहेली मेहता (वाणिज्य महाविद्यालय) और योगेंद्र कुमार वर्मा (पटना लॉ कॉलेज) को नियुक्त किया गया । राज्यपाल-सह-कुलाधिपति ने संवाददाताओं से कहा, “हमने एक ऐसी प्रणाली अपनाई है जिसमें प्रिंसिपल की नियुक्ति व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से निर्देशित नहीं होती है… विभिन्न विश्वविद्यालयों में। अब सवाल यह है कि “गृह विज्ञान या मानविकी का प्रोफेसर विज्ञान और वाणिज्य के लिए विशेष कॉलेज कैसे चला सकता है? यह उच्च शिक्षा के संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य को पराजित करता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा राज्य सरकार की प्राथमिकता नहीं है।”
विगत दिनों जब पटना विश्वविद्यालय के पांच महाविद्यालओं को ‘पर्ची’ निकालकर प्राचार्य दिया गया, और प्रदेश के विश्वविद्यालय के कुलाधिपति अपने बचाव के लिए यह कहकर ढोल पीटने लगे की “हमने एक ऐसी प्रणाली अपनाई है जिसमें प्रिंसिपल की नियुक्ति व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से निर्देशित नहीं होती है,” समय दूर नहीं है जब प्रदेश में शिक्षकों, प्राध्यापकों, प्राचार्यों और कुलपतियों के लिए ‘निविदा’ निकाले जायेंगे।
लेकिन कुलाधिपति इस बात से अनभिज्ञ हैं कि आज से साढ़े चार दशक पहले जब जगन्नाथ कौशल चंडीगढ़ से बिहार के राज्यपाल बनकर आए थे, तब उनके बच्चों ने भी पटना विश्वविद्यालय में नामांकन कराया था। बिहार नेशनल कॉलेज में एक कार्यक्रम के दौरान कॉमन रूम का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था, “यदि मेरा वश चले तो मैं राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को बंद कर दूं, ताला लगा दूं।” विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के मुख से ऐसे शब्द क्या निकले, कौशल साहब ऐसे गए कि फिर कभी गौतम-महावीर-चन्द्रगुप्त की धरती पर फिर वापस नहीं आ सके।

बहरहाल, इस साल मार्च में, बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने लगभग 115 प्रोफेसरों के एक पैनल को शॉर्टलिस्ट किया, जिन्हें राज्य भर के कॉलेजों में प्राचार्य बनने के योग्य माना गया। उत्साह था, शैक्षणिक हलकों में प्रत्याशा का माहौल था। शीर्ष रैंकिंग वाले उम्मीदवार उन संस्थानों में नेतृत्व की भूमिका निभाने की उम्मीद कर रहे थे, जहां उन्होंने लंबे समय तक काम किया था, और उन संस्थानों में जहां कई लोग कभी छात्र रहे थे।
राजभवन की देखरेख में और वीडियो पर दर्ज की गई कार्यवाही के साथ, पटना विश्वविद्यालय के कुलपति अजय कुमार सिंह, रजिस्ट्रार शालिनी और कुलाधिपति के प्रतिनिधि रहमत जहान वाली तीन सदस्यीय समिति एक बॉक्स से चिट लेने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में एकत्र हुई। प्रत्येक चिट के साथ, शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का भाग्य एक ऐसे कॉलेज में सील कर दिया गया, जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें नियुक्त किया जाएगा।

आर्यावर्तइंडियननेशन(डॉट)कॉम से बात करते पटना विश्वविद्यालय के वाणिज्य महाविद्यालय के प्राचार्य पद पर चुनी गई सुहेली मेहता कहती हैं: “मैं नहीं ज्वाइन करूंगी वाणिज्य महाविद्यालय। मैं पैनल के रैंक में शीर्ष पर थीं। अगर कुलाधिपति इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में नियुक्ति भी उसी आधार पर होती, जिसका उन्होंने अनुकरण किया है, तो क्या अच्छे अंक लाने वाले अभ्यर्थियों को ‘होम कैडर’ नहीं मिलता है ? हम जिस महाविद्यालय में पढ़े, जहाँ से अपने पढ़ने-पढ़ाने का कार्य शुरू की; उसी कॉलेज का नेतृत्व करने का सपना देखा था, फिर अव्वल आने के बाद मुझे तो अपना होम-कैडर (मगध महिला कालेज) मिला चाहिए। लेकिन 2 जुलाई को चकनाचूर हो गया।
परंपरागत रूप से, बिहार की उच्च शिक्षा में नियुक्तियों में एक संरचित प्रोटोकॉल का पालन किया जाता है इसके अतिरिक्त, कुलाधिपति कार्यालय इस प्रक्रिया की देखरेख के लिए एक प्रतिनिधि को नामित करेगा। लेकिन यह पुरानी प्रणाली भ्रष्टाचार के आरोपों से ग्रस्त थी। हालांकि नई लॉटरी-आधारित नीति बिहार भर के सैकड़ों कॉलेजों को प्रभावित करती है, लेकिन पटना विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले पाँच प्रतिष्ठित कॉलेजों में प्राचार्यों की नियुक्ति ने अकादमिक समुदाय में सबसे ज़्यादा अशांति पैदा की है। परंपरागत रूप से, पटना कॉलेज में प्राचार्य पद के लिए (विश्वविद्यालय आयोग द्वारा) केवल सामाजिक विज्ञान या मानविकी के सबसे वरिष्ठ प्रोफेसरों पर ही विचार किया जाता था, यह परंपरा पचास वर्षों से भी ज़्यादा समय से चली आ रही है।
उत्तर प्रदेश के रसायन विज्ञान के प्राध्यापक अनिल कुमार को लॉटरी के माध्यम से 1863 में स्थापित पटना कॉलेज का प्रमुख चुना गया। उनकी नियुक्ति पहली बार विज्ञान के किसी संकाय सदस्य द्वारा इस ऐतिहासिक रूप से कला-केंद्रित संस्थान का नेतृत्व करने का प्रतीक है। छपरा स्थित जय प्रकाश विश्वविद्यालय के इतिहास के व्याख्याता नागेंद्र प्रसाद वर्मा को मगध महिला कॉलेज का प्राचार्य नियुक्त किया गया । बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय की गृह विज्ञान संकाय सदस्य अलका यादव को पटना साइंस कॉलेज के लगभग सौ साल के इतिहास में पहली महिला प्राचार्य नियुक्त किया गया। कुलाधिपति के कहने, दावा करने का आधार चाहे जो भी हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि “लॉटरी प्रणाली भ्रष्टाचार, लॉबिंग और बाहरी दबाव पर अंकुश लगा सकती है, लेकिन यह गारंटी नहीं देती कि ड्रॉ से एक मजबूत शैक्षणिक नेता उभरेगा।”
पटना विश्वविद्यालय के एक शिक्षक कहते हैं: चाहिए तो यह था कि जिन जिन लोगों ने अपनी नियुक्ति या पदस्थापना के लिए कुलाधिपति कार्यालय के दरवाजे को खटखटाये, या किसी और को खटखटाने के लिए कहे, उन सभी अभ्याथियों का नाम निरस्त कर देते, पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को प्रेषित कर देते या फिर सचिवालय थाना में सरकारी कार्य में हस्तक्षेप के कारण उनके विरुद्ध प्रथम प्राथमिकी दर्ज करवा देते। यकीन मानिए यह इतिहास होता। कुलाधिपति का नाम “तारीख में नहीं, इतिहास में दर्ज होता। प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक प्रभाव पड़ता। लेकिन उन्होंने केंद्रीय चयन पद्धति का दृष्टांत देकर प्राचार्यों की नियुक्ति और पदस्थापन के लिए लाटरी निकाल दिए। समय दूर नहीं है जब केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की पद्धति के तर्ज पर महाविद्यालयों में शिक्षकों और विश्वविद्यालयों के कुलपति और अप कुलपति की नियुक्ति और पदस्थापन के लिए निविदा निकाल दिया जाय। क्योंकि कुलाधिपति कहें या राज्यपाल, आख़िर आपके प्रदेश के तो होते नहीं और प्रदेश में केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे वही करते हैं जो केंद्र चाहेगा। आपके मुख्यमंत्री कुछ कर नहीं सकते, शिक्षा मंत्री कुछ कर नहीं सकते-सभी का जमीर और वजूद पर प्रश्नवाचक चिह्न लगा हैं।”

1839 में गवर्नर जनरल लार्ड ऑकलैंड के आदेश से पटना में एक केन्द्रीय कॉलेज को स्थापित करने की योजना बनी और 1841-42 में पटना हाई स्कूल में कुछ बदलाव करके इस योजना को साकार रूप प्रदान किया गया। 26 सितम्बर 1844 को इस स्कूल कॉलेज का दर्जा प्राप्त हो गया। किन्तु ढाई वर्ष पश्चात ही यह कॉलेज बंद हो गया क्योंकि इस कॉलेज को चलाने में पटनावासियों ने रुचि नहीं ली। 1856-57 में पुनः कॉलेज खोलने की योजना असफल रही। योजना बनाने वालों के बीच आपसी मतभेद रहा। फलस्वरूप अप्रैल 1858 में पटना हाई स्कूल भी बंद हो गया। सन 1857 के आज़ादी के आन्दोलन के शंखनाद के कोई पांच साल बाद 1863 को पटना के गंगा नदी के किनारे इस शैक्षणिक संस्थान को स्थापित किया गया था। दुर्भाग्य यह है कि कभी अपने में स्वर्णिम इतिहास समेटे पटना कॉलेज ने समाज और शिक्षा जगत को काफी कुछ दिया। पटना कालेज “पूर्व का ऑक्सफोर्ड नहीं रहा।
लेकिन आज रसायन विज्ञान के प्राध्यापक अनिल कुमार पटना कॉलेज के प्राचार्य के रूप में पद आवंटित होने पर एक छात्र कहता हैं: “यह समझ से परे है कि कुर्सी पर बैठने के बाद राजनेता स्वयं को सबसे ऊपर, सब ज्ञानी कैसे समझने लगते हैं। बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र नेता रह चुके हैं। यहाँ पटना विश्वविद्यालय के पूर्ववर्ती छात्र नेताओं की कमजोरी है कि वे सत्ता के सिंहासन पर बैठने के बाद सबसे अधिक अगर सत्यानाश किये तो शिक्षा और शैक्षणिक व्यवस्था को। शिक्षकों से लेकर छात्रों-छात्राओं तक, सभी को राजनीति का स्वाद चखाकर शैक्षणिक व्यवस्था को चकनाचूर कर दिए। आज तक कभी उन लोगों ने शैक्षिणक सत्र को दुरुस्त नहीं कर पाए, कक्षा की समय-सारिणी को ठीक नहीं कर पाए, प्रदेश का शिक्षा मंत्री कभी किसी महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों की स्थिति को देखने, समझने की कोशिश नहीं किये। आज अचानक लाटरी के आधार पर रसायन शास्त्र के शिक्षक को कला संकाय वाले महाविद्यालय में पदस्थापित कर दिया गया। गृह-विज्ञानं पढ़ाने वाली शिक्षिका को पटना साइंस कालेज का प्राचार्य बना दिया गया।”
सुहेली मेहता कहती हैं: “एक ऐसा संस्थान जिसकी शैक्षणिक विशेषज्ञता मेरी योग्यता और अनुशासन से बिल्कुल मेल नहीं खाती, मैं वहां की प्राचार्य बनकर क्या कर लूंगी ? मैंने शुरू से ही लॉटरी सिस्टम का विरोध किया। मैंने लॉटरी सिस्टम के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका क्योंकि मुझ पर अपनी अपील वापस लेने का दबाव था। कुलाधिपति के इस निर्णय से बिहार के विश्वविद्यालयों के छात्र और शिक्षक कुलाधिपति द्वारा लागु की जाने वाली प्रणाली को समझ नहीं पा रहे हैं। उनका कहना है ‘यह मनमानी’ है। राजनेताओं ने, चाहे कुलाधिपति ही क्यों न हों, शिक्षा जगत को एक प्रयोगशाला बना दिए हैं। छात्रों, शिक्षको को उपकरण। वैसे कुछ इसे एक प्रगतिशील प्रणाली स्थापित करने की दिशा में एक कदम के रूप में भी देखते हैं जो बिहार में चीजों को हिला सकता है।
लोग कहते हैं वर्तमान कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान का कार्य करने का तरीका अलग है। ये भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नेता रह चुके हैं उसी कालखंड में जब नीतीश कुमार या लालू यादव पटना विश्वविद्यालो छात्र नेता बन रहे थे । आरिफ मोहम्मद खान अलीगढ़ मुस्लिक विश्वविद्यालय छात्र संघ के पहले सचिव (1972-73) बने और फिर अध्यक्ष (1973-74) बने। तीन साल बाद, उत्तर प्रदेश के सियाना विधानसभा क्षेत्र से विधायक (1977-80) बने। फिर सातवीं, आठवीं, नवमी और बारहवीं लोकसभा में कानपुर और बहराइच से सांसद बने। केंद्र में मंत्री भी रहे। लेकिन अगर यही तरीका है उनके कार्य करने का, तो यह शोध का विषय है।
हकीकत यह है कि बिहार में धूल चाटती शिक्षा की स्थिति का अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार है तो वह है संवैधानिक दृष्टि से सबसे सबल हैं और कल से लेकर आज तक के कुल 41 विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं। आज बिहार में 41 विश्वविद्यालय है जिसमें 8 राष्ट्रीय स्तर के हैं, 4 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, 20 राज्य विश्वविद्यालय हैं, 7 निजी विश्वविद्यालय हैं, 1 डीम्ड विश्वविद्यालय है और 4 केंद्र द्वारा पोषित। इन विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होने के नाते क्या अब तक राज्यपाल भवन का जबाबदेही नहीं था कि अपने सभी संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को अव्वल बनाते? शायद नहीं।
आज़ादी के बाद भारत के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में पदस्थापित राज्यपालों, उप-राज्यपालों की कार्य अवधि और उस अवधि के दौरान राज्य का प्रथम नागरिक, संवैधानिक प्रमुख होने के नाते प्रदेशों का कितना विकास हो पाया है, इसकी विवेचना तो देश के वातानुकूलित कक्षों में बैठे राजनीतिक समीक्षक और विशेज्ञों के साथ-साथ अवकाश प्राप्त प्रदेश प्रमुख ही करेंगे। इन आठ महीनों में वे प्रदेश का विकास करने में सफल होंगे अथवा सेवा काल के समाप्ति के साथ ‘पोस्ट रिटायरमेंट बेनिफिट्स’ के साथ जीवन का समय गुजरेंगे, आज ही नहीं, आने वाले दिनों में भी राजनीतिक विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों के लिए बहुत बड़ा शोध का विषय रहेगा। दुर्भाग्य यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के अलावे इन विशेषज्ञों का ध्यान प्रदेश प्रमुख की ओर जाता ही नहीं है।
नई प्रणाली के तहत, बिहार के 13 विश्वविद्यालयों में प्रिंसिपल की नियुक्तियां की जाएंगी, जिसमें 115 पद भरे जाएंगे। पटना विश्वविद्यालय के अंतर्गत पाँच कॉलेजों के लिए निकाली गई लॉटरी अब राज्य के शेष संस्थानों में भी इसी तरह लागू होने वाली है। पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व डीन प्रोफेसर तरुण कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा, “संकाय नियुक्तियों और तबादलों से लेकर प्राचार्यों की नियुक्ति तक अपनी पहुँच बढ़ाकर, राजभवन ने कुलपति को वस्तुतः विश्वविद्यालय के एक प्रधान लिपिक—मात्र एक ‘बड़ा बाबू’—में बदल दिया है।” वे आगे कहे: “राजभवन और विधानसभा जैसी संस्थाओं में भ्रष्टाचार गहराई तक समाया हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम लॉटरी सिस्टम के ज़रिए इसका समाधान करना शुरू कर दें। क्या इन संस्थानों को अपनी नियुक्तियों के लिए भी लॉटरी सिस्टम अपनाना चाहिए?”
बिहार के वर्तमान राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान प्रदेश के राज्यपाल भवन की सूची पट्टिका में 42 वें स्थान पर अंकित हैं। आज़ादी के बाद सर्वप्रथम जयरामदास दौलतराम प्रदेश के राज्यपाल बनाये गए। उनकी कार्य अवधि छः माह की थी।आज प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आधिकारिक आवास जिस सड़क पर स्थित है, वह सड़क (अणे मार्ग) बिहार के दूसरे राज्यपाल माधव श्रीहरि अणे के नाम से अंकित है। इसने बाद आये आर. आर. दिवाकर और फिर जाकिर हुसैन । जाकिर हुसैन के बाद एम. ए. एस. अय्यंगार, नित्यानंद कानूनगो, न्यायमूर्ति यू.एन. सिन्हा (कार्यवाहक), देव कांत बरुआ, और रामचन्द्र धोंडीबा भंडारे प्रदेश के राज्यपाल बने। भंडारे के बाद राज्यपाल भवन में आये जगन्नाथ कौशल, न्यायमूर्ति के.बी.एन. सिंह (कार्यवाहक), अखलाकुर रहमान किदवई, पी. वेंकटसुब्बैया, गोविंद नारायण सिंह जो 11 महीने की अवधि पूरा कर घर चले गए। अब आये न्यायमूर्ति दीपक कुमार सेन (कार्यवाहक), आर.डी. प्रधान, जगन्नाथ पहाड़िया, न्यायमूर्ति जी.जी. सोहोनी (कार्यवाहक), मोहम्मद सलीम, बी. सत्य नारायण रेड्डी (कार्यवाहक) ।
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र कहते हैं कि 1990 के बाद जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने, बिहार के विश्वविद्यालयों की स्थिति तेजी से बिगड़ गई। कुलपतियों की नियुक्ति में मेरिट की सबसे बड़ी क्षति हुई, और जातीय आधार पर नियुक्तियों की परंपरा शुरू हुई। विश्वविद्यालयों को विभिन्न जातियों के नाम पर “डिस्ट्रिब्यूट” कर कुलपति बनाए जाने लगे। राजभवन की जगह आर्य कुमार रोड की एक गली में राष्ट्रीय जनता दल के नेता रंजन प्रसाद यादव के घर कुलपतियों की बैठक होने लगी। यहीं पर उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक और इंटरमीडिएट काउंसिल के अध्यक्ष भी बैठने लगे। यहीं नीतिगत फैसले लिए जाने लगे, यहां तक कि शिक्षकों के प्रोमोशन और डिमोशन के फैसले भी वहीं होते थे। तत्कालीन राज्यपाल मोहम्मद शफी कुरैशी, जो चांसलर भी थे, ने एक बार कहा था, “अब तो रंजन यादव सुपर चांसलर हो गए हैं।” एक कुलपति, जो दिल्ली-पटना राजधानी एक्सप्रेस से नेता जी के साथ सफर कर रहे थे, उनके साथ नेता जी का परिवार भी था। बच्चे ने कोच में शौच कर दिया, और कुलपति ने अपने हाथों से सफाई की।
लालू प्रसाद यादव के आगमन के साथ शिक्षा लज्जित होकर गंगा में गोंता लगाने लगी और पुरे प्रदेश में तथकथित नेताओं का जन्म होने लगा। इसी कालखंड में पहले राज्यपाल आये मोहम्मद शफी कुरैशी, फिर आए अखलाकुर रहमान किदवई, सुंदर सिंह भंडारी, न्यायमूर्ति बी.एम. लाल (अभिनय), सूरज भान (अतिरिक्त प्रभार), वी. सी. पांडे, एम आर जोइस, वेद प्रकाश मारवाह, बूटा सिंह, गोपालकृष्ण गांधी, आर. एस. गवई, आर. एल. भाटिया, देवानंद कोंवर, डी. वाई. पाटिल, केशरी नाथ त्रिपाठी (अतिरिक्त प्रभार), राम नाथ कोविन्द, सत्यपाल मलिक, लालजी टंडन, फाल्गुन चौधरी, राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, और आज विराजमान हैं आरिफ मोहम्मद खान।
इन वर्षों में जे.जी.जेनिंग्स, वी.एच.जैक्सन, सर एस.सुल्तान हमद, स्टीवर्ट मैकफर्सन, न्यायमूर्ति के. एम. नूर, सचिदानंद सिन्हा, सी. पी. एन. सिंह, सारंगधर सिंह, डॉ के एन बहल, वी.के.एन. मेनन, डॉ बासुदेव नारायण , डॉ बलभद्र प्रसाद, श्री बी एन राय, डॉ जॉर्ज जैकब, डॉ. के.के.दत्ता, महेंद्र प्रताप, के. अब्राहम, सचिन दत्त), श्रीमती रमोला नंदी , श्री डी. एन. शर्मा, डॉ. ए.के. धन, जी.एस. ग्रेवाल, डॉ. टी. बी. मुखर्जी, डॉ. आर. सी. सिन्हा पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने।सत्तर के दशक के अंत में पटना कालेज के प्राचार्य, स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. केदार नाथ प्रसाद कुलपति बने। अस्सी के दशक के प्रारंभिक वर्षों में सबसे पहले कुलपति बने डॉ. आर. शुक्ला, डॉ. एस. पी. सिन्हा, डॉ. जी. पी. सिन्हा, डॉ. के. एन. प्रसाद, डॉ एस एन दास, डॉ ए एल साहा, डॉ. आर.के.अवस्थी, डॉ. एम. मोहिउद्दीन, राहुल सरीन, अनिल कुमार, डॉ. एस. एन. पी. सिन्हा, डॉ एस नज़र अहसन, डॉ एल एन राम, डॉ. के.के. झा, डॉ. विभाष के. यादव, डॉ.जगन्नाथ ठाकुर, डॉ सैयद एहतेशामुद्दीन, प्रो. वाई. सी. सिम्हाद्री, डॉ श्याम लाल, डॉ सुदीप्तो अधिकारी, प्रो. शंभु नाथ सिंह, प्रो. यू.के. सिन्हा, प्रोफेसर अरुण कुमार सिन्हा, प्रो. येदला सी. सिम्हाद्री, प्रो.सुधीर कुमार श्रीवास्तव, प्रो. रासबिहारी सिंह, प्रो. (डॉ.) एच.एन. प्रसाद ( प्रो. (डॉ.) गिरीश कुमार चौधरी , प्रो. के.सी. सिंह और प्रो. अजय कुमार सिंह।
लव कुमार मिश्र कहते हैं: “पहले जब शारंगधर सिंह, के.के. दत्त, सचिन दत्त और महेन्द्र प्रताप जैसे विद्वान कुलपति होते थे, वे शिक्षा मंत्री के यहां भी नहीं जाते थे। स्वयं मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह पटना विश्वविद्यालय के कुलपति से सलाह लेने उनके घर जाते थे। 1977 तक पटना विश्वविद्यालय के कुलपति का आधिकारिक आवास गांधी मैदान के दक्षिण कोने पर था, जहां अब मौर्य होटल है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. केदारनाथ प्रसाद, जो इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे, ने मुख्य सचिव को लिखित आपत्ति दी थी कि उनकी अनुमति के बिना पटना कॉलेज में डीएम ने पुलिस भेज दी। उन्होंने कहा था कि वे प्रमंडल के आयुक्त से भी वरिष्ठ हैं। जब पटना के डीएम ने राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में परीक्षा पर रोक लगाई, तो कुलपति अतर देव सिंह ने विरोध करते हुए परीक्षा का आयोजन कराया। वे भी इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे।”
मिश्र आगे कहते हैं “यदि आज विश्वविद्यालयों की स्थिति खराब है, तो उसके लिए राज्यपाल भी जिम्मेदार हैं। पिछले 15 वर्षों में बिहार में कुछ ऐसे राज्यपाल भी आए, जिन पर खुले तौर पर यह आरोप लगे कि उनके करीबियों ने दो-दो करोड़ रुपये में कुलपति पद बेचे। एक बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजभवन द्वारा नियुक्त छह कुलपतियों की नियुक्ति को रोक दिया था। वर्तमान में सत्ता पक्ष के अनुषांगिक संगठनों द्वारा भेजे गए नामों पर नियुक्तियाँ हो रही हैं। एक कुलपति ने दावा किया कि उनका नाम “हाई कमान” से भेजा गया था। जब हम विद्यार्थी थे, तब कुलपति भी लेक्चर लेने आते थे। मुझे स्मरण है कि सचिन दत्त, जो केंद्र में वित्त सचिव थे, सेवानिवृत्त होकर पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने और पटना कॉलेज के बी.ए. लेक्चर थिएटर में इकोनॉमिक्स पढ़ाने आते थे। महेन्द्र प्रताप, जो कैम्ब्रिज से पीएचडी थे, अंग्रेजी का क्लास लेते थे। जॉर्ज जैकब और ए.के. धान, जो यूपीएससी के अध्यक्ष रहे थे, कुलपति रहते हुए भी कक्षाएं लेते थे। अब यदि राज्यपाल को पीड़ा हो रही है, रोना आता है, तो उन्होंने ऐलान कर दिया है – अब राजभवन में नहीं, कॉलेज में ही बैठकें होंगी।”
हाल के वर्षों में राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालय पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। राज्य के बाहर के लोग शायद इस पर विश्वास न करें, लेकिन यहां एक ही विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार और 20 प्राचार्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे जा चुके हैं। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र प्रसाद के आवास से निगरानी विभाग ने तीन करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। इसी विश्वविद्यालय के तीन अन्य कुलपति – प्रो. अरुण कुमार, प्रो. फहीमुद्दीन अहमद और प्रो. बी.एन. रावत – भी जेल भेजे गए। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी जेल गए हैं। एक कुलपति पर आरोप है कि एक ‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’ की पत्नी ने उनके विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा दी, आठ विषयों में से केवल एक में उपस्थित हुईं, बाकी सात में अनुपस्थित रहीं, फिर भी प्रथम श्रेणी में पास कर दी गईं। राज्य में दो कुलपतियों पर उनकी ही महिला शिक्षकों ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। पिछले महीने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने राज्यपाल से लिखित शिकायत की और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उन्हें अपने ही कुलपति से जान का खतरा है।

















