दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: बिहार में ‘फर्जी मतदाताओं’ के मामले में भारत का निर्वाचन आयोग ‘तत्परता से कार्य किया है, इसमें कोई शक नहीं है। तक़रीबन 40 लाख मतदाताओं के नामों को मतपत्रों से काटकर फेकने का कीर्तिमान स्थापित किया है। काश !! देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभाओं, विधान परिषदों के साथ-साथ लोकसभा और राज्य सभा में आने वाले आपराधिक छवि वाले ‘तथाकथित नेताओं’ के प्रवेश पर भी ‘प्रतिबंध’ लगा पाता, उन्हें भी प्रजातंत्र की इस पवित्र मंदिर से बाहर निकाल पाता।
‘भारत के निर्वाचन आयोग के प्रयास के तहत संशोधित एसआईआर के बाद बिहार में लगभग 40 लाख मतदाताओं के नाम कटने की संभावना है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 14 जुलाई 2025 को जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, बिहार के कुल मतदाताओं में से लगभग 4.52%, यानी लगभग 35.69 लाख मतदाता, मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान नाम कटने के लिए चिह्नित किए गए हैं। इनमें 1.59% मृतक, 2.20% स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता और 0.73% मतदाता शामिल हैं जो एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत हैं।”
आयोग के अनुसार, ‘ये आंकड़े बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) द्वारा घर-घर जाकर दो दौर के दौरे के बाद 6.6 करोड़ से अधिक मतदाताओं द्वारा जमा किए गए गणना प्रपत्रों (ईएफ) के सत्यापन पर आधारित हैं। 94.2 लाख मतदाताओं का अभी भी सत्यापन होना बाकी है, यदि 4.52% की वर्तमान अपात्रता प्रवृत्ति जारी रहती है, तो अतिरिक्त 4.25 लाख मतदाता अपात्र पाए जा सकते हैं। इससे नाम हटाए जाने की कुल संख्या लगभग 39.94 लाख हो जाएगी, जिससे बिहार के कुल मतदाता आधार 7.89 करोड़ का कुल नाम हटाने की दर लगभग 5.06% हो जाएगी।’
काश !! इतनी ही तत्परता विधान सभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा में बैठे आपराधिक छवि वाले नेताओं को हटाने में सफल हो पाता। अगर ऐसा हुआ होता तो आज लोकसभा के 543 नवनिर्वाचित सदस्यों में से 251 ‘माननीय सदस्य’ जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज है, विराजमान नहीं होते। देश के विधानसभाओं में कुल 4131 ‘सम्मानित विधायकों’ में कितने ‘आपराधिक छवि’ वाले हैं, भारत का निर्वाचन आयोग भली भांति जानता है।

वैसे भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में ‘राजनीति का अपराधीकरण’ या फिर राजनीति में बने रहने के लिए ‘अपराधियों का राजनीतिकरण’ कब से हुआ, यह शोध का विषय है। बिहार में राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीतिकरण का इतिहास काफी पुराना है; परन्तु वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री सुरेंद्र किशोर का मानना है कि ‘बिहार के मामले में बिनोदानंद झा की मृत्यु के बाद 1972 में हुए दरभंगा लोकसभा उपचुनाव में ललित नारायण मिश्र और कर्पूरी ठाकुर के प्रत्याशी रामसेवक यादव के टक्कर के समय से प्रारम्भ हुआ, ऐसा मान सकते हैं।’
आइये पहले चुनाव में अपराधियों के प्रवेश या उनकी चुनावी मदद से सम्बन्धी 55-वर्ष पहले की एक घटना का जिक्र करते हैं, जो आने वाले समय में, सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए, चाहे सत्तारूढ़ हों या विपक्ष; शुरुआत का दृष्टान्त बना। कहते हैं बिनोदानंद झा की मृत्यु के बाद दरभंगा लोकभा क्षेत्र से ललित नारायण मिश्र उपचुनाव में अपनी किस्मत आजमाने के किये चुनावी मैदान में आये। ऐसा माना जाता है कि कांग्रेस के ललित नारायण मिश्र की राजनीतिक छवि को कम करने के लिए कर्पूरी ठाकुर ने रामसेवक यादव को उनके विरुद्ध खड़ा कर दिए। यादव को प्रदेश में ‘गिरोहवादी’ कहा जाता था। कर्पूरी ठाकुर इस बात से आश्वस्त थे कि ललित नारायण मिश्र ‘यादव के गिरोह’ का सामना नहीं कर पाएंगे और वे चुनाव हार जायेंगे।
इधर, ललित नारायण मिश्र संसदीय क्षेत्र में अपनी स्थिति को देखते दरभंगा से तनिक दूर, लेकिन गंगा नदी के तट पर तत्कालीन ‘बाहुबली और समाजसेवी’ कामदेव सिंह से मदद मांगे। कामदेव सिंह का उस ज़माने में बिहार में ‘तूती’ बोलती थी। यह कहा जाता है कि उस ज़माने में कई लाख रूपये भी व्यय किये गए। कामदेव सिंह की सहायता से कांग्रेस के ललित नारायण मिश्र के उस उप-चुनाव में अपना विजय पताखा फहराया। उस उप चुनाव के कुछ समय बाद बिहार में छात्र आंदोलन धीरे-धीरे रंग पकड़ रहा था। पद्मश्री सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि ‘प्रदेश में राजनेताओं द्वारा प्रदेश के बाहुबलियों का इस्तेमाल राजनीति में पहले भी हुआ था, लेकिन सत्तर के दशक आते – आते राजनीति में बाहुबलियों का प्रयोग खुलकर होने लगा।”
सत्तर के कालखंड में 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 तक 162 दिनों के लिए कर्पूरी ठाकुर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। यह पांचवां विधानसभा का कालखंड था। इस विधानसभा में हरिहर सिंह (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस), भोला पासवान शास्त्री (लोकतान्त्रिक कांग्रेस), राष्ट्रपति शासन, दरोगा प्रसाद राय, फिर राष्ट्रपति शासन, फिर कर्पूरी ठाकुर, फिर भोला पासवान शास्त्री, फिर राष्ट्रपति शासन और अंततः 9 जनवरी, 1972 को छठे विधानसभा के चुनाव के लिए विधानसभा को भंग कर दिया गया था।
छठे विधानसभा के चुनाव के समय, यह कहा जाता है कि प्रदेश के एक वरिष्ठ नेता के सहयोग से कर्पूरी ठाकुर को मदद करने के लिए फिर कामदेव सिंह से मदद मांगी गई थी। यह भी चुनाव आयोग के पास सांख्यिकी होगा ही कि उन दिनों कैसे 32 मतदान पेटियों को कामदेव सिंह कर्पूरी ठाकुर के पक्ष में ‘उठा लिए’ थे। उस समय 32 पीठासीन अधिकारियों से लिखा कर एक याचिका दायर हुआ था, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि कैसे कर्पूरी ठाकुर के पक्ष में चुनाव को करने के लिए अवैध लोगों ने मतपत्रों के साथ मतपेटियां उठा लिया था। उस घटना से कर्पूरी ठाकुर का चुनाव रद्द होना स्वाभाविक था। परन्तु, अब तक प्रदेश में जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल बज चुका था, समय को देखते कर्पूरी ठाकुर इस्तीफा दे दिए।
दरभंगा लोकसभा सीट पर आपातकाल से पहले कांग्रेस का दबदबा था। 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में अपनी ही रियासत के तहत आने वाले दरभंगा उत्तर से महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। जबकि संसदीय क्षेत्र के मतदाता मछली और रसगुल्ला महीनों से खाते आ रहे थे । कांग्रेस से चुनाव लड़ने वाले श्याम नंदन प्रसाद ने उन्हें हराया था। 1952 से 1971 / 1972 (उप-चुनाव) तक हुए सभी चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी। आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में यह सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई थी। 1977 में सुरेंद्र झा भारतीय लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते। इमरजेंसी के बाद कांग्रेस इस सीट पर सिर्फ एक बार जीत दर्ज कर सकी है। 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निधन के बाद सहानुभूति लहर में कांग्रेस के हरि नाथ मिश्रा चुनाव जीते थे।
1989 में शकीउल रहमान दरभंगा मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति बनकर यहां आए थे। उन्होंने शिक्षा सुधार के लिए कई काम किए। इससे युवाओं के बीच उनकी बेहतर छवि बन गई। रहमान ने जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़े और कांग्रेस के नागेंद्र झा को हराकर लोकसभा पहुंचे। वह चुनाव तो जीत गए, लेकिन क्षेत्र में दोबारा लौटकर नहीं आए। शकीउल रहमान के चुनाव प्रचार की कमान मोहम्मद अली अशरफ फातमी के हाथ में थी। फातमी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करते थे और छात्र राजनीति छोड़कर दरभंगा आए थे।
रहमान के साथ फातमी उनके साए की तरह जुड़े रहते थे। इससे लोग फातमी को भी अच्छी तरह पहचानने लगे और जनता के बीच उनकी गहरी पैठ बन गई। 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता दल ने फातमी को टिकट दिया और वे जीतकर संसद पहुंचे। इस सीट से सबसे ज्यादा जीत का रिकॉर्ड मोहम्मद अली अशरफ फातमी के नाम है। वह यहां से दो बार जनता दल और दो बार राजद के टिकट पर सांसद रहे। दरभंगा से कीर्ति आज़ाद ने भाजपा को पहली जीत दिलाई थी। वह 1999 में चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे। आजाद इस सीट से 2009 और 2014 में भी सांसद बने। तीनों बार उन्होंने राजद प्रत्याशी मोहम्मद अली अशरफ फातमी को शिकस्त दी थी। आज भाजपा के गोपाल जी ठाकुर प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। खैर।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, राजनीति और अपराध के गठजोड़ ने हमेशा से ही राजनीति के वास्तविक कारण को गैर-ज़रूरी बना दिया है। राजनीति के विकेंद्रीकरण की नींव में, खासकर पार्टी चुनावों, पंचायत चुनावों और नागरिक चुनावों में, बढ़ती आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक (सत्ता की लड़ाई) अपने नागरिकों की सरकारी सहायता के लिए लोकप्रियता आधारित संसाधनों का इस्तेमाल करके हासिल की गई थी। यह सर्वविदित है कि आजकल आपराधिक छवि वाले, यहाँ तक कि आपराधिक छवि वाले, उम्मीदवारों और नेताओं की बढ़ती संख्या राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल केवल अपने व्यर्थ लाभ के लिए कर रही है। किसी भी वैचारिक समूह के नेता उत्कृष्ट राजनीतिक गुणों और नागरिकता के मानदंडों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। वे सकारात्मक ऊर्जा और राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी को बढ़ावा नहीं देते। राजनीति या राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल एक ही बात है।
अजीब बात यह है कि बिहार में राजनीतिक अपराधीकरण के बढ़ते चलन ने विधायी मामलों के अपराधीकरण के बजाय अपराध के राजनीतिकरण को बढ़ावा दिया है और यह वर्तमान सत्ताधारी वर्ग की राजनीतिक संस्कृति का एक प्रमुख हिस्सा बन गया है। बिहार में राजनीतिक अपराधीकरण एक गंभीर समस्या है, जो धीरे-धीरे खतरनाक स्तर पर पहुँच गई है। राजनीतिक अपराधीकरण की यह बुराई लोगों का विशेष ध्यान आकर्षित करती है क्योंकि यह मुद्दा सभी दलों के विधायकों के निजी हितों के इर्द-गिर्द घूमता है क्योंकि ऐसे लोग कभी भी यह विश्वास नहीं कर सकते कि विधायक इस बुराई को दूर करने के लिए कोई पहल करेंगे। इस शोध पत्र में, बिहार की राजनीति में गुंडों के बढ़ते प्रभुत्व और उसके समाधान के उपायों का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है।
बिहार के मतदाता इस बात के चश्मदीद गवाह है कि चंपारण में अपहरण कैसे करोड़ों रुपये का उद्योग बन गया; बेलची, पिपरा, दलेलचक, बिहटा और ऐसे अनगिनत अज्ञात स्थानों पर सामूहिक हत्याएं सत्ताधारी लोगों के राजनीतिक समर्थन से हुईं; दक्षिण बिहार (अब झारखंड) में कोयला माफिया की गतिविधियां; भागलपुर में नोआखाली के बाद से भयानक सामूहिक दंगे; कैमूर पर्वत श्रृंखलाओं में डकैत जातियों का कब्जा आदि प्रमुख हैं। 1950 के दशक में, अय्यर आयोग ने छह प्रमुख सरकारी अधिकारियों – के.बी. सहाय, सत्येंद्र नारायण सिंह, महेश प्रसाद सिन्हा, राघवेंद्र नारायण सिंह, अंबिका शरण सिंह और नरसिम्हा राव ब्यूरो के एक वरिष्ठ सदस्य, लखन सिंह यादव – के खिलाफ 189 आरोपों की जांच की।
राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि अय्यर आयोग की सिफारिशें कभी प्रकाश में नहीं आईं। इसी तरह, माधोकर आयोग ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश महामाया प्रसाद सिन्हा के खिलाफ कई गंभीर आरोप पाए, जो पटना सचिवालय में कहीं दबे पड़े हैं। समय के साथ, उच्च जाति के हत्यारों के गिरोहों की जगह शक्तिशाली पिछड़ी जातियों के गिरोहों ने ले ली। 80 के दशक के अंत तक, घोषित अपराधियों ने यह तय कर लिया था कि राजनेताओं के लिए गंदा काम करने के बजाय, खुद चुनाव लड़ना ही बेहतर है बिना किसी बदले की भावना के। गौरतलब है कि बिहार में हमेशा से ही राजनीतिक गलियारों में गुंडे रहे हैं। ऐसा ही एक व्यक्ति है मोहम्मद शहाबुद्दीन, जिसका लालू प्रसाद यादव ने समर्थन किया है। हालाँकि उन्हें आम तौर पर चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी, लालू प्रसाद यादव ने 2009 में अपने जीवनसाथी को बिहार के सीवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी थी।
पटना विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ शिक्षक कहते हैं कि “उच्च गुणवत्ता और नैतिकता को राजनीति से ऊपर रखने के प्रयासों को कम प्राथमिकता मिली है, वहीं दूसरी ओर, हर वैचारिक समूह का एक ही नारा है – बिहार को अपराध मुक्त करना। यह भले ही भ्रामक लगे, लेकिन बिहार की धरती पर राजनीति और अपराध का गठजोड़ कायम है। इससे ज़्यादा और क्या हो सकता है कि पप्पू यादव ने मधेपुरा चुनाव दो लाख वोटों से जीता, इसके बावजूद कि उन्होंने जेल से चुनाव लड़ा था? तो फिर बिहार के सभी केंद्रीय नेता अपराधीकरण से लड़ने की बात क्यों कर रहे हैं। आज ‘संख्या’, चाहे लोकसभा में हो या विधान सभा में, गुणवत्ता और नैतिकता से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, वैसी स्थिति में अपराधी और राजनीति का गठबंधन होना स्वाभाविक है।
वैसे चुनाव आयोग से लेकर भारत का सर्वोच्च न्यायालय तक, कई मर्तबा यह कोशिश किया कि राजनीतिक दलों को ऐसे उम्मीदवारों को टिकट नहीं देने चाहिए। उनका कहना है कि वास्तविक और प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को टिकट देने के बजाय, राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को ज्यादा टिकट दे रहे हैं। नब्बे के दशक के मध्य में एक कट्टरपंथी (टी.एन. शेषन) द्वारा भारतीय संविधान के दलदल को साफ करने के लिए एक अकेले अभियान के रूप में शुरू हुआ था। लेकिन उसका परिणाम क्या हुआ, यह सर्वविदित है।
इन उम्मीदवारों पर लगाए गए कुछ आरोप गंभीर प्रकृति के हैं जैसे हत्या, आपराधिक धमकी, हमला और अनुचित प्रतिबंध। एक अध्ययन के अनुसार, बिहार से चुने गए सांसदों की संख्या, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे थे, 2004 की तुलना में 2014 में बढ़कर 87% हो गई। 2004-2014 के दौरान लोकसभा चुनावों के उम्मीदवारों द्वारा दर्ज की गई रिपोर्टों से पता चला है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की संख्या में 122% की वृद्धि हुई है। इसी प्रकार, राज्य से चुने गए सांसदों (संसदों) की संख्या, जिनके खिलाफ आपराधिक सबूत आने वाले थे, 2004 की तुलना में 2014 में बढ़कर 87% हो गई। सोलहवीं लोकसभा में, बिहार के 40 सांसदों में से 28 के खिलाफ आपराधिक सबूत दर्ज थे, जबकि 20 पर गंभीर मामले दर्ज थे। इसके अलावा, वर्तमान बिहार विधानसभा चुनाव में 243 में से 141 लोगों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए हैं।
बिहार में 22 संसदीय सीटें जीतने वाली भाजपा के सांसदों (16) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से आठ पर गंभीर अपराधों का आरोप है। राजद भी पीछे नहीं है, क्योंकि उसके सभी चार सांसद अपने सहयोगी कांग्रेस की तरह गंभीर प्रकृति के मामलों का सामना कर रहे हैं। राज्य के चुनावों में भी स्थिति चिंताजनक रही। 2014 के चुनावों में लगभग 70% सांसदों ने कहा कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि 2009 में यह संख्या 42% और 2004 में 38% थी। 2005 से 2015 तक राज्य विधानसभा चुनावों में आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की संख्या में 96% की वृद्धि हुई। आपराधिक मामलों वाले निर्वाचित विधायकों की संख्या में भी 2005 की तुलना में 2015 में 43% की वृद्धि हुई।
बिहार विधानसभा चुनाव वॉच और बहुमत परिवर्तन संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में, जब पिछली बार विधानसभा चुनाव हुए थे, बिहार के 68% विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। उनमें से 96 विधायकों पर हत्या, सामूहिक बलात्कार, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराधों सहित गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। उनमें से 46 विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे; इनमें से 34 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। आपराधिक और गंभीर अपराधों वाले विधायकों की संख्या क्रमशः भाजपा के लिए 34 और 19 है, जबकि जदयू के लिए 37 और 28 है। कांग्रेस के भी सदन में 27 में से 11 विधायकों पर गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं। जदयू के 39 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जो 2010 के चुनावों के बाद बने सदन में सबसे कम हैं। भाजपा (23 विधायक) दूसरे स्थान पर है। बिहार में भाजपा और जदयू सत्ताधारी गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
2005 और 2010 में, नीतीश कुमार बिहार की छवि को भ्रष्टाचार और अपराध से मुक्त करने के वादे पर सत्ता में आए थे। कुमार के साथ कुख्यात डॉन से नेता बने अनंत सिंह जैसे उम्मीदवार भी थे। 2010 के विधानसभा चुनावों में 32 प्रतिशत उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे, जबकि 2005 के चुनावों में यह संख्या 27 प्रतिशत थी। 2005 में केवल 98 विधायकों पर आपराधिक आरोप थे, जबकि 2010 में यह संख्या बढ़कर 23 प्रतिशत (121 विधायक) हो गई। 2015 के विधानसभा चुनावों में पिछली विधानसभा की तुलना में 16 प्रतिशत अधिक दागी विधायक थे।
2015 में, “छोटे सरकार” के नाम से मशहूर सिंह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधानसभा पहुँचे। सिंह के हलफनामे में बताया गया है कि उन पर 38 गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें सात हत्या के मामले भी शामिल हैं। पिछले दो बिहार विधानसभा चुनावों में सभी बड़ी पार्टियों – भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), राजद और कांग्रेस – के 50 प्रतिशत से ज़्यादा विधायक दागी थे। 2015 में, राजद के 81 विधायकों में से 46 (64%) पर आपराधिक आरोप थे, उसके बाद भाजपा – 53 में से 36 विधायकों पर आपराधिक पृष्ठभूमि थी और जदयू – जिसके 71 सीटों में से 34 विधायक दागी थे।
राजनीति में अपराधियों के प्रवेश को रोकने के लिए, फरवरी 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का विवरण जनता के सामने प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया था। सितंबर 2020 में, भारत के चुनाव आयोग ने पार्टियों के लिए अपने उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास का विवरण प्रकाशित करने हेतु एक संशोधित दिशानिर्देश जारी किया। 2021 में बिहार चुनाव में उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड का खुलासा न करने पर सर्वोच्च न्यायालय ने जेडीयू, आरजेडी, लोजपा, कांग्रेस, बीजेपी और सीपीआई पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया था, जबकि सीपीआई(एम) और एनसीपी पर पांच-पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया। न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने राजनीति में अपराधियों के प्रवेश पर रोक लगाने के लिए कानून में संशोधन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि राजनीति में अपराधीकरण की बुराई को समाप्त करने के लिए एक बड़ी सर्जरी की आवश्यकता है।
एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, अदालत ने जेडी-यू, आरजेडी, लोक जनशक्ति पार्टी, कांग्रेस, भाजपा, सीपीआई (एम), सीपीआई, एनसीपी और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को 13 फरवरी, 2020 को पारित अपने आदेश की अवमानना का दोषी ठहराया था। पीठ ने कहा, “यह ध्यान में रखते हुए कि ये हमारे निर्देश जारी होने के बाद हुए पहले चुनाव थे, हम इस मामले में उदार रुख अपनाने के लिए तैयार हैं। हालाँकि, हम उन्हें चेतावनी देते हैं कि वे भविष्य में सतर्क रहें और यह सुनिश्चित करें कि इस न्यायालय और चुनाव आयोग द्वारा जारी निर्देशों का अक्षरशः पालन किया जाए।”
वर्तमान में बिहार में 82,585 से अधिक सक्रिय बंदूक लाइसेंस हैं। पंचायत स्तर के राजनेताओं से लेकर राष्ट्रीय नेताओं तक, भू-माफियाओं और ठेकेदारों से लेकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों तक – आग्नेयास्त्र सार्वजनिक जीवन का लगभग सामान्य हिस्सा बन गए हैं। पिछले दिनों प्रदेश में दर्जनों से अधिक जिला मजिस्ट्रेटों का तबादला हुआ। नेपाल के पास एक सीमावर्ती जिले में, एक डीएम ने राजधानी में तैनात होने से पहले अपने कार्यकाल के अंतिम सप्ताह में रिकॉर्ड 300 बंदूक लाइसेंस स्वीकृत किए। बांग्लादेश के पास एक अन्य सीमावर्ती जिले में, निवर्तमान डीएम ने पटना जाने से पहले 600 लाइसेंस जारी किए। मध्य बिहार में, राज्य की राजधानी से सिर्फ़ 50 किलोमीटर दूर, एक डीएम ने अपने तबादले के आदेश के प्रभावी होने से ठीक पहले 400 व्यक्तियों के लाइसेंस स्वीकृत किए।
वैसे, फर्जी शस्त्र लाइसेंस, अवैध आग्नेयास्त्र और गोला-बारूद की अनधिकृत बिक्री – इन्हें बिहार पुलिस ने पिछले 10 वर्षों में राज्य में बढ़ते हिंसक अपराधों का प्रमुख कारण माना है, और अब विभाग इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहा है। राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2015 से 2024 के बीच के दशकीय आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले एक अध्ययन में, बिहार पुलिस ने राज्य में हिंसक अपराधों में वृद्धि को सीधे तौर पर राज्य में अवैध हथियारों और गोला-बारूद की बढ़ती बिक्री से जोड़ा है – जिन्हें हत्या, फिरौती के लिए अपहरण, डकैती, लूट, बैंक डकैती और सड़क डकैती जैसे अपराधों के रूप में परिभाषित किया गया है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, बिहार 2017 से 2022 के बीच हिंसक अपराधों के मामले में लगातार शीर्ष पांच राज्यों में शुमार रहा है।
इतना ही नहीं, शस्त्र अधिनियम के मामलों के पंजीकरण में पटना सबसे आगे है, जहां वार्षिक औसत 321.7 मामले प्रति वर्ष दर्ज किए जाते हैं। इसके बाद बेगूसराय (167.7), मुजफ्फरपुर (158.3), नालंदा (117.9) और वैशाली (117.8) का स्थान है।पिछले 10 वर्षों में, बरामद देशी आग्नेयास्त्रों की संख्या 2015 में 2,356 से दोगुनी होकर 2024 में 4,981 हो गई है। अवैध देशी आग्नेयास्त्रों की बरामदगी पर जिलावार आंकड़े बताते हैं कि पटना 384.4 बरामद आग्नेयास्त्रों/वर्ष के साथ सूची में सबसे ऊपर है – मुंगेर से बहुत आगे, जो 222.3/वर्ष के साथ दूसरे स्थान पर आता है। पिछले 10 वर्षों में, बरामद गोला-बारूद/कारतूसों की संख्या 2015 में 9,449 से बढ़कर 2024 में 23,451 हो गई है, और सबसे ज़्यादा बरामदगी 2023 (31,691) में होगी। बरामद अवैध गोला-बारूद/कारतूसों के ज़िलेवार आँकड़े बताते हैं कि औरंगाबाद इस सूची में सबसे ऊपर है, उसके बाद पटना और गया का स्थान है। हालाँकि, माओवादी आंदोलन से प्रभावित औरंगाबाद और गया, दोनों ही सबसे ज़्यादा अवैध हथियार बरामदगी वाले 10 ज़िलों में शामिल नहीं हैं।
बहरहाल, आगामी विधानसभा चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, बिहार सरकार ने राज्य भर में त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों को हथियार लाइसेंस जारी करने का निर्णय लिया है। यह फैसला पंचायत प्रतिनिधियों, सकर मुखियाओं (पंचायत प्रमुखों) पर हुए हिंसक हमलों की एक श्रृंखला के बाद लिया गया है। राज्य सरकार ने सभी जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को निर्वाचित पंचायत सदस्यों के शस्त्र लाइसेंस आवेदनों पर कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है।हालाँकि, निर्देश में ज़ोर दिया गया है कि शस्त्र लाइसेंस आवेदनों के सत्यापन के लिए स्थापित नियमों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। सरकार ने कहा कि सत्यापन प्रक्रिया शीघ्रता से और बिना किसी अनावश्यक देरी के पूरी की जानी चाहिए।
यह कदम कई हाई-प्रोफाइल हत्याओं के बाद उठाया गया है। पिछले हफ़्ते ही लखीसराय ज़िले में एक मुखिया और उनके सहयोगी की एक समारोह से घर लौटते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। फ़रवरी में, गया ज़िले की चिरैला पंचायत के उप मुखिया और जदयू ब्लॉक सचिव महेश मिश्रा की हत्या कर दी गई थी। समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, सारण, भोजपुर, जमुई और नवादा जैसे कई जिलों से हत्या के प्रयास और धमकियों सहित ऐसी ही घटनाएँ सामने आई हैं। बिगड़ती सुरक्षा स्थिति से चिंतित पंचायत प्रतिनिधियों ने पहले भी राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों से मिलकर सुरक्षा की माँग की थी।




















