सरकार बनाम स्वयंभू सरकार (भाग-3) : न्यायालय ने कहा “जब प्रतिवादी महारानी कामसुन्दरी की मृत्यु होगी तभी वादी कामेश्वर सिंह धार्मिक ट्रस्ट के ट्रस्टी होंगे,” और आदेश के 115 वें दिन महारानीधिराणी मृत्यु को प्राप्त की

​राजनगर (मधुबनी) में शिवलिंग

दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: आज 1 अक्टूबर है। आज दरभंगा के अंतिम संतानहीन राजा महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह को अंतिम सांस लिए 64-वर्ष हो गया। इन 64-वर्षों में दरभंगा की नहीं, मिथिला क्षेत्र में, खेत-खलिहान में, कला-संस्कृति में, शिक्षा-विज्ञान में, रोजगार-व्यवसाय में, उद्योगों में दरभंगा राज समर्थित कितना विकास हुआ, यह तो दरभंगा ही नहीं, मिथिला के गणमान्य विद्वान-विदुषियों से लेकर किसान-मजदुर तक अधिक जानते हैं।

लेकिन, पिछले वर्ष सितम्बर महीने के 19 तारीख को दरभंगा जिला न्यायालय के सिविल जज (सीनियर डिवीजन)-IX के न्यायालय ने यह आदेश दिया कि ‘समझौते की शर्तों के अनुसार, वादी, यानी राजकुमार शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के पुत्रद्वय राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह तभी कामेश्वर सिंह धार्मिक ट्रस्ट का ट्रस्टी बनेंगे जब महारानीधिराणी कामसुन्दरी की मौत हो जाएगी। इस आदेश के बाद 1978 में दायर टाइटिल सूट नंबर 45/1978 के वादियों का मनःस्थिति कैसा रहा होगा ? क्या ‘वादी’ कामेश्वर सिंह धार्मिक न्याय के तहत आने वाले सभी मंदिरों में स्थापित देवी-देवताओं से ‘प्रतिवादी’ की लम्बी आयु, स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना किये होंगे? यह गहन शोध का विषय है। ‘प्रतिवादी’ महाराजाधिराज की अंतिम पत्नी थी और ‘वादी’ महाराजाधिराज के ‘देवर’ राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र दिवंगत शुभेश्वर सिंह (मुख्य वादी) के पुत्रद्वय थे। इस आदेश के 115 वें दिन महारानीधिराणी अंतिम सांस ले लीं ।

न्यायमूर्ति कुमार रितेश के न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि महारानीधिराणी कामसुन्दरी की उम्र तथा स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए और ट्रस्ट का उचित प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए, यह न्यायालय आदेशित शर्तों को तब तक लागू करते है जब तक कि कपिलेश्वर सिंह और राजेश्वर सिंह कामेश्वर धार्मिक ट्रस्ट के ट्रस्टी का पद संभाल नहीं लेते। न्यायालय ने यह भी कहा कि उसके बाद वादी विविध मामले के निपटारे के लिए एक याचिका दायर करेगा। न्यायालय का यह आदेश टाइटिल संख्या 45/1978, जो राजकुमार शुभेश्वर सिंह ने दायर किया था। उस समय शुभेश्वर सिंह जीवित थे।

इस आदेश के 115 वे दिन महारानीधिराणी कामसुन्दरी 12 जनवरी, 2026 को 93-वर्ष की आयु में अपने दरभंगा स्थित अपने कल्याणी निवास में अंतिम सांस लीं। महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की तीन पत्नियां थी, जिसमें एक उनके जीवन काल में ही अंतिम सांस ली, जबकि शेष दो महाराजा की मृत्यु के बाद मृत्यु को प्राप्त की। दुर्भाग्यवश महाराजा संतानहीन ही रहे। 

न्यायालय ने महारानीधिराणी, जो मुकदमा में प्रतिवादी संख्या-एक पर अंकित थी, को निर्देश दिया कि वह ट्रस्ट डीड के उद्देश्यों और लक्ष्यों को पूरा करने और ट्रस्ट की संपत्ति के कामकाज को संभालने के लिए ईमानदारी और सर्वोत्तम हित में अपने कर्तव्यों का पालन करे। यदि भविष्य में आईएनएम कैम्पस पुलिस स्टेशन के अधीन रामबाग रैसर में रहने वाले स्वर्गीय कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्रद्वय – राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह, जो वादी के रूप में मुकदमा लड़ रहे थे, को कोई गड़बड़ी या कुप्रबंधन मिलता है, तो वह इस अदालत में विविध मामला दायर कर सकते हैं और क़ानूनी का अख्तियार कर सकते हैं।

न्यायालय ने महारानीधिराणी को यह भी निर्देश दिया कि वह पुजारियों को नियमित भुगतान बहाल करे, राज भोग और सनाइया उत्सव आयोजित करे, और ट्रस्ट की आय से मंदिरों और ठाकुरबाड़ियों की आवश्यक मरम्मत करवाए। साथ ही, महारानी धिराणी / पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर / ट्रस्ट के मैनेजर को यह भी आदेश दिया गया कि इस कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना वे ट्रस्ट की संपत्ति (जिसमें देवी-देवताओं के आभूषण भी शामिल हैं) को न तो बेच सकते हैं, ना ही हस्तांतरित कर सकते हैं, ना ही उसे गिरवी रख सकते हैं और ना ही उसे लीज पर दे सकते हैं। वे न्यायालय की पूर्व अनुमति लेने के लिए एक विविध मामला दायर कर सकते हैं। इतना ही नहीं, यदि प्रतिवादी नंबर 1/ट्रस्ट के मैनेजर/पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर द्वारा फैसले की तारीख से कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना कोई बिक्री/लीज़/हस्तांतरण करते हैं, तो उसे अमान्य माना जाएगा।

न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि प्रतिवादी नंबर 1 (महारानीधिराणी) ने मुकदमे के लंबित रहने के दौरान ट्रस्ट डीड के उद्देश्यों और मंशा का उल्लंघन करते हुए ट्रस्ट की कोई संपत्ति बेची है, तो वादी उसकी वैधता को चुनौती देने के लिए अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट में जा सकते हैं। उन्हें / पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर/ट्रस्ट के मैनेजर को उस बैंक लॉकर को संचालित करने से भी रोका जाता है जिसमें देवी-देवताओं के आभूषण रखे हैं (बिना कोर्ट की पूर्व अनुमति के); और भारतीय स्टेट बैंक मुख्य शाखा, लहेरियासराय के मैनेजर को भी निर्देश दिया जाता है कि वे लॉकर संचालित करने की अनुमति देने से पहले कोर्ट का अनुमति पत्र मांगें।

न्यायालय ने कहा कि वंशावली चार्ट को देखने पर पता चलता है कि वादी (राजकुमार शुभेश्वर सिंह) के पिता स्वर्गीय राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, स्वर्गीय महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह के सगे भाई थे। बहादुर (जो बड़े भाई थे) औरजेठाधिकार के नियम (जिसके तहत उत्तराधिकार तय होता है) के अनुसार दरभंगा राज की गद्दी पर बड़े भाई का अधिकार हुआ, और इस तरह डॉ. सर कामेश्वर सिंह बहादुर दरभंगा राज के महाराजाधिराज बने और शुभेश्वर सिंह के पिता राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह को राजनगर राज की ‘बाबूआना’ जागीर मिली।

महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह, जो उस समय दरभंगा के महाराजा थे, उन्होंने 16-03-1949 को एक रजिस्टर्ड ट्रस्ट डीड के ज़रिए एक धार्मिक ट्रस्ट बनाया। उन्होंने भारत में अलग-अलग जगहों पर स्थित राज के कई मंदिरों में स्थापित देवी-देवताओं की पूजा, राग, भोग, समय-समय पर होने वाले उत्सवों और मंदिरों व उनसे जुड़ी इमारतों के रखरखाव और मरम्मत के लिए दरभंगा और मुजफ्फरपुर ज़िलों में स्थित कुछ संपत्तियां इस ट्रस्ट को समर्पित कीं। उन्होंने खुद को जीवन भर के लिए एकमात्र ट्रस्टी नियुक्त किया, इस शर्त के साथ कि उनके निधन के बाद ट्रस्टीशिप का उत्तराधिकार दरभंगा राज की गद्दी के उत्तराधिकार के नियम से तय होगा।

बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत दरभंगा राज की संपत्ति के हस्तांतरण के बाद, बिहार राज्य ने उक्त ट्रस्ट को एक वैध ट्रस्ट के रूप में मान्यता दी और बिहार राज्य द्वारा उक्त ट्रस्ट को एन्युइटी (वार्षिक भुगतान) का भुगतान किया गया। 1 अक्टूबर, 1962 को महाराजाधिराज का दरभंगा में निधन हो गया और 01.04.1962 से 30.09.1962 तक ट्रस्ट के लिए देय वार्षिकी (एन्युइटी) के रूप में 84,235.61 रुपये जमा हो गए थे। महाराजाधिराज अपने पीछे दो विधवाओं – महारानी राजलक्ष्मी देवी और महारानीधिराणी कामसुन्दरी को छोड़ गए।

प्रतिवादी नंबर 1 ने दरभंगा के जिला न्यायाधीश के समक्ष उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (सक्सेशन सर्टिफिकेट) के लिए याचिका दायर की (जिसे सक्सेशन सर्टिफिकेट केस नंबर 42/1955 के रूप में दर्ज किया गया था), जो 30.09.1962 तक देय 84,235.61 रुपये की वार्षिकी राशि से संबंधित थी। वादी ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने पर कई आधारों पर आपत्ति जताई, जिसमें यह तर्क भी शामिल था कि ट्रस्टी के पद के लिए उत्तराधिकार का नियम वही होगा जो अविभाज्य ‘राज दरभंगा’ के उत्तराधिकार पर लागू होता है। वादी ट्रस्टी का पद संभालने का हकदार था क्योंकि वादी के दो अन्य भाई – राजकुमार जीवेश्वर सिंह और राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह – ने उस मामले में नोटिस मिलने के बावजूद कोई दावा नहीं किया था। अंततः, दरभंगा के महाराजाधिराज की विधवाओं (उस मामले में आवेदक) और वादी के बीच ट्रस्ट से संबंधित निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातों पर आपसी समझौता हुआ।

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दोनों महारानियों के निधन पर, जो जीवन भर ट्रस्टी रहेंगी, ट्रस्टीशिप दिवंगत राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के तीन बेटों (जिनमें वादी भी शामिल है) को हस्तांतरित हो जाएगी। यह भी सहमति बनी कि संस्थापक के परिवार या उनके भाई के परिवार के पुरुष सदस्यों को ट्रस्ट के खातों की जांच या निरीक्षण करने का अधिकार होगा। वे यह देख सकेंगे कि उस समय कार्यरत ट्रस्टी या ट्रस्टीगण ट्रस्ट की संपत्ति का उचित प्रबंधन कर रहे हैं और ट्रस्ट के उद्देश्यों को पूरा कर रहे हैं। इसमें यह भी उल्लेख किया गया था कि ट्रस्टी… ट्रस्ट के मैनेजमेंट में वादी की सलाह लें। कहा गया समझौता दरभंगा के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज की कोर्ट ने तब स्वीकार किया था, जब सक्सेशन सर्टिफिकेट का केस निपटारे के लिए ट्रांसफर किया गया था और दो महारानी-अधिराणियों को सक्सेशन सर्टिफिकेट दिया गया था।

इस समझौते की शर्तों के अनुसार 05.09.1970 को इस बारे में वादी और दो महारानी-अधिराणियों के बीच एक एग्रीमेंट भी किया गया और रजिस्टर किया गया। स्वर्गीय महाराजाधिराज के समय से राज के पुराने और भरोसेमंद कर्मचारी रवींद्रनाथ बनर्जी को ट्रस्ट की देखभाल और मैनेजमेंट के लिए ट्रस्ट का मैनेजर नियुक्त किया गया था और वे मैनेजर के तौर पर इसका मैनेजमेंट कर रहे थे। को-ट्रस्टी में से एक, महारानी-अधिराणी राजलक्ष्मी देवी का 22.11.1976 को निधन हो गया, और उनके बाद उनकी को-विडो (साथी विधवा) प्रतिवादी ही जीवित ट्रस्टी बचीं; उन्होंने अपनी मर्जी से और वादी से सलाह किए बिना, दूसरे पक्ष के प्रतिवादी को ट्रस्ट का मैनेजर नियुक्त कर दिया।

दूसरे पक्ष के प्रतिवादी दीनानाथ झा, जो पहले पक्ष के प्रतिवादी के साथ मिलीभगत करके काम कर रहे थे, ने रवींद्रनाथ बनर्जी की जगह ले ली और रवींद्रनाथ बनर्जी को दूसरे पक्ष के प्रतिवादी को चार्ज सौंपने के लिए मजबूर किया गया। वादी को 01.01.1977 के आसपास और 03.05.1978 को ट्रस्ट के पूर्व कर्मचारियों से पता चला—और वादी को विश्वास करने का कारण है—कि स्वर्गीय महारानी राजलक्ष्मी के निधन के बाद, ट्रस्ट के फंड का एक हिस्सा पहले पक्ष के प्रतिवादी ने खुद हड़प लिया था; दो मौकों पर कुल 2,00,000 रुपये की रकम हड़पी गई और ट्रस्ट की कुछ ज़मीनें गैर-कानूनी और गलत इरादे से उदय नाथ मिश्रा और उनके भतीजे (बहन के बेटे) विष्णु झा और उनके अन्य रिश्तेदारों को ट्रांसफर कर दी गईं। पिता की तरफ से और ‘गोसई-घर’ मंदिर (दरभंगा राज परिवार के धार्मिक कार्यक्रमों की जगह, जैसा कि इस शिकायत के शेड्यूल-A में बताया गया है) में स्थापित देवी-देवताओं के गहने बेच दिए गए हैं और बिक्री से मिली रकम मौजूदा ट्रस्टियों ने अपने पास रख ली है।

इसके अलावा, प्रतिवादी नंबर 1 ने काशी नाथ मिश्र को ट्रस्ट का असिस्टेंट मैनेजर और अन्य कर्मचारियों को नियुक्त किया, जो ट्रस्ट के हितों के खिलाफ है और इससे ट्रस्ट के फंड का नुकसान हो रहा है। ये सभी काम गंभीर कदाचार और ट्रस्ट के साथ विश्वासघात हैं, जिसके कारण प्रतिवादी नंबर 1 ट्रस्टी के तौर पर काम करने और बने रहने के अयोग्य हो जाता है। इसलिए, प्रतिवादी नंबर 1 को ट्रस्टीशिप से हटा दिया जाना चाहिए और स्वर्गीय राजा बहादुर के बेटों में से नया ट्रस्टी या ट्रस्टी नियुक्त किए जाने चाहिए।

ट्रस्ट के उद्देश्यों और हितों के खिलाफ किए गए कई कामों की वजह से, प्रतिवादी को आगे ट्रस्टी के तौर पर बने रहने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। वादी का मानना है कि प्रतिवादी नंबर 1, प्रतिवादी नंबर 2 के साथ मिलकर ट्रस्ट का सही प्रबंधन नहीं कर रहा है, बल्कि उसका गलत प्रबंधन कर रहा है, उसका दुरुपयोग और गबन कर रहा है। साथ ही, वह देवताओं की रोज़ाना पूजा-अर्चना, राग-भोग-पूजा-पाठ और समय-समय पर होने वाले उत्सवों, और मंदिरों व इमारतों की मरम्मत और रखरखाव में लापरवाही बरत रहा है, और ट्रस्ट के फंड और संपत्तियों को नुकसान पहुंचा रहा है।

मामले की और जानकारी और असल स्थिति जानने के लिए, वादी ने 09.07.1977 को प्रतिवादी नंबर 2 को पत्र लिखकर ट्रस्ट के कामकाज से जुड़ी कुछ जानकारी मांगी थी, जो नहीं दी गई। इसके बाद, वादी ने 11.05.1978 को वकील संतोष कुमार सिन्हा (लहेरियासराय) के ज़रिए नोटिस भेजा। इसमें प्रतिवादी नंबर 1 से कहा गया कि वह प्रतिवादी नंबर 2 को निर्देश दे कि वादी को ट्रस्ट के खातों की जांच करने दे (05.09.1970 से, जब अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, दरभंगा की अदालत ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किया था) और वादी द्वारा 09.07.1977 के पत्र में मांगी गई जानकारी नोटिस मिलने के दो हफ़्ते के भीतर उपलब्ध कराए। ये नोटिस 19.05.1978 को मैसेंजर के जरिए दिए गए और 18.05.1978 को रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजे गए, जो 24.05.1978 को मिले।

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यह भी कहा जाता है कि वादी, जो ट्रस्ट के संस्थापक का भतीजा है और भविष्य के ट्रस्टियों में से एक है, ट्रस्ट के कामकाज और रखरखाव के सही प्रबंधन में गहरी दिलचस्पी रखता है। उसे खातों की जांच करने का अधिकार है ताकि यह पता चल सके कि खर्च सही ढंग से किया गया है या नहीं, और ट्रस्ट के फंड और संपत्तियों का गबन या बर्बादी तो नहीं हुई है, और ट्रस्ट के गबन और कुप्रबंधन की बात सच है या नहीं। इसके बावजूद कि समय सीमा खत्म हो गई है… नोटिस मिलने के 15 दिनों के बाद भी, प्रतिवादी नंबर 1 ने अपने मैनेजर को मांगी गई जानकारी देने या वादी को ट्रस्ट के खातों की जांच करने की अनुमति देने का निर्देश नहीं दिया है। प्रतिवादी कोई भी खाता नहीं दिखा रहे हैं और गलत इरादों से उन्हें छिपा रहे हैं।

कार्रवाई का कारण 22.11.76 को तब पैदा हुआ जब प्रतिवादी नंबर 1 एकमात्र ट्रस्टी बना; और 01.07.77 से 03.05.78 की अवधि के दौरान, जब वादी को देवताओं के गहनों के गबन और अवैध हस्तांतरण/बिक्री की विभिन्न घटनाओं और प्रतिवादी नंबर 1 द्वारा ट्रस्ट की संपत्ति की उपेक्षा और बर्बादी की विभिन्न गतिविधियों के बारे में पता चला; और 09.07.77 को जब वादी का पत्र प्रतिवादी नंबर 2 को भेजा गया; और 18.05.78 और 19.05.78 को जब क्रमशः रजिस्टर्ड पोस्ट और मैसेंजर के माध्यम से भेजे गए नोटिस प्रतिवादी नंबर 1 को क्रमशः 24.05.78 और 19.05.78 को मिले; और इस अदालत के अधिकार क्षेत्र में आने वाले दरभंगा में उक्त नोटिस मिलने के 15 दिन पूरे होने पर।

प्रतिवादी नंबर 1 ने अपने बयान में 16 मार्च, 1949 के ट्रस्ट डीड में अन्य बातों के अलावा यह प्रावधान है कि दरभंगा राज परिवार के सदस्यों (और किसी अन्य को नहीं) को यह देखने का अधिकार होगा कि उस समय का ट्रस्टी ट्रस्ट की संपत्ति का प्रबंधन कैसे कर रहा है। इस प्रकार, उक्त ट्रस्ट डीड दरभंगा राज परिवार से संबंधित लोगों के अलावा अन्य सभी व्यक्तियों को ट्रस्ट के प्रबंधन और मामलों के बारे में कोई भी जानकारी मांगने/प्राप्त करने और/या ट्रस्टी की जिम्मेदारियों को लागू करने से रोकती है; इसलिए, वादी, ऐसे बाहर रखे गए व्यक्तियों में से एक होने के नाते, वर्तमान मुकदमा दायर करने का हकदार नहीं है।

16 मार्च, 1949 की ट्रस्ट डीड में यह भी कहा गया है कि ट्रस्ट का मैनेजमेंट और/या कामकाज ट्रस्टी अपनी समझ और निर्देश के अनुसार चलाएगा। ऊपर बताई गई बातों और अन्य कारणों से, यह मुकदमा चलाने लायक नहीं है क्योंकि जिन आरोपों पर यह आधारित है, उनमें ऐसे मामलों पर फैसला करना शामिल है, जिनके बारे में ट्रस्ट के ट्रस्टी के तौर पर इस प्रतिवादी (डिफेंडेंट) को पूरा और बिना किसी रोक-टोक के अधिकार है। ट्रस्टी के पद पर उत्तराधिकार से संबंधित 16 मार्च, 1949 की ट्रस्ट डीड की शर्त पर वादी का भरोसा गलत है। वह शर्त शून्य, अमान्य और बेअसर है और किसी भी स्थिति में लागू करने लायक नहीं है क्योंकि यह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और खासकर इसकी धारा 4(1) के प्रावधानों के खिलाफ है; और वैसे भी, उक्त अधिनियम के लागू होने से पहले भी यह लागू करने लायक नहीं थी।

वादी के पास ट्रस्टी के पद पर कोई दावा करने का कोई कानूनी अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं है, भले ही यह मान लिया जाए कि 16 मार्च, 1949 की ट्रस्ट डीड की वह शर्त वैध और लागू होने लायक है। वादी का उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र केस नंबर 42/1965 में 9 मई, 1970 के कथित समझौते पर भरोसा करना गलत है, क्योंकि दोनों ही अमान्य, शून्य और अप्रभावी है। ये ट्रस्ट डीड, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और कानून (उक्त अधिनियम से अलग) के खिलाफ हैं या उनसे मेल नहीं खाते हैं।

प्रतिवादी मानता है कि दरभंगा के अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश की अदालत ने उक्त याचिकाकर्ता को 01.04.1962 से 30.09.1962 तक ट्रस्ट को देय वार्षिकी (एन्युइटी) के संबंध में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (सक्सेशन सर्टिफिकेट) दिया था, जो 84,234.61 रुपये की राशि थी। उक्त उत्तराधिकार प्रमाण पत्र का उद्देश्य उक्त याचिकाकर्ताओं को 10 अगस्त 1970 के उक्त समझौते के अनुसार उक्त बकाया राशि वसूल करने का अधिकार देना था। यह कहा जाता है कि 9 मई 1970 के उक्त समझौते जैसी ही एक सहमति वादी, इस प्रतिवादी और महारानीधिराणी राजलक्ष्मी के बीच हुई थी। उक्त सहमति भी उन्हीं कारणों से शून्य, अमान्य और अप्रभावी है, जिन कारणों से 9 मई 1970 का समझौता था।

जबकि वादी ने कहा कि 22.11.1976 को महारानी राजलक्ष्मी देवी की मृत्यु के बाद, प्रतिवादी नंबर 1 एकमात्र ट्रस्टी बन गईं और उन्होंने ट्रस्ट का गलत प्रबंधन करना, फंड का गलत इस्तेमाल करना, ट्रस्ट की ज़मीनें अपने रिश्तेदारों को ट्रांसफर करना और मंदिर की मरम्मत व रोज़ाना पूजा-पाठ की अनदेखी करना शुरू कर दिया। वादी का कहना है कि 11.05.1978 के नोटिस के ज़रिए खातों की जांच की मांग करने के बावजूद, प्रतिवादी नंबर 1 ने जांच की अनुमति नहीं दी। इसलिए वादी ने प्रतिवादी नंबर 1 को हटाने और परिवार की वादी वाली शाखा से नए ट्रस्टी नियुक्त करने, साथ ही खातों को पेश करने का निर्देश देने की मांग की है।

न्यायालय ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर प्राथमिकता के आधार पर निर्णय लिया जाना है। न्यायालय ने कहा कि महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह द्वारा 16-03-1949 को निष्पादित ट्रस्ट डीड है, उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि उनकी मृत्यु के बाद ट्रस्टी कौन होगा। ट्रस्ट डीड में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ट्रस्टी के उत्तराधिकार का नियम वही होगा जो उक्त अविभाज्य राज दरभंगा के उत्तराधिकार को नियंत्रित करता है। यह न्यायालय पाता है कि अविभाज्य राज दरभंगा के उत्तराधिकार का नियम कामेश्वर धार्मिक ट्रस्ट के ट्रस्टी के मामले में भी लागू होगा।

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अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अविभाज्य राज दरभंगा के उत्तराधिकार के संबंध में क्या नियम हैं। ‘प्राइमोजेनीचर’ (ज्येष्ठाधिकार) का कानून दरभंगा राज के सिंहासन के उत्तराधिकार को नियंत्रित करता है। इस कानून के तहत, सबसे बड़ा बेटा पिता की पूरी संपत्ति (आमतौर पर ज़मीन-जायदाद) का उत्तराधिकारी बनता है, जबकि छोटे बेटों और बेटियों को इसमें हिस्सा नहीं मिलता। इसका उद्देश्य बड़ी जागीरों या राज्यों को कई उत्तराधिसियों के बीच विभाजित होने के बजाय अखंड बनाए रखना था। सबसे बड़ा बेटा पहले उत्तराधिकारी बनता है। यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसका बेटा (अगला उत्तराधिकारी) विरासत संभालता है। सबसे बड़े बेटे को बड़ा हिस्सा मिलता है, लेकिन छोटे बेटों को छोटा हिस्सा या भत्ता मिल सकता है।

यह मुख्य रूप से शासकों, ज़मींदारों और रियासतों पर लागू होता था, न कि आम हिंदुओं या मुसलमानों पर। लेकिन सामान्य हिंदू उत्तराधिकार कानून (मिताक्षरा या दायभाग) में, संपत्ति बेटों के बीच विभाजित की जाती थी, और प्राइमोजेनीचर का पालन नहीं किया जाता था। स्वतंत्रता के बाद, और विशेष रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के साथ 1956 में, निजी विरासत के लिए ‘प्राइमोजेनीचर’ (सबसे बड़े बेटे को उत्तराधिकार मिलने) का कानून खत्म कर दिया गया। अब, संपत्ति कानूनी उत्तराधिकार कानूनों (वारिसों के लिए समान अधिकार) के अनुसार मिलती है, न कि सबसे बड़े बेटे के विशेष अधिकार के आधार पर। हालाँकि, शाही उपाधियों और औपचारिक पदों के मामले में, कुछ शाही परिवार अभी भी पारिवारिक परंपरा के तौर पर प्राइमोजेनीचर का पालन करते हैं।

अब यह स्पष्ट है कि ‘प्राइमोजेनीचर’ का कानून, जो दरभंगा राज के सिंहासन के उत्तराधिकार को नियंत्रित करता है, कामेश्वर धार्मिक ट्रस्ट के ट्रस्टी के उत्तराधिकार पर लागू नहीं होगा; बल्कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होगा। प्रथागत कानून कानूनी कानून पर हावी नहीं होगा; अगर कोई टकराव होता है तो कानूनी कानून प्रथागत कानून पर हावी होता है। जब दोनों मौजूद हों, तो अदालतें आम तौर पर मानती हैं कि कानून प्रथा से ऊपर है, जब तक कि कानून खुद प्रथा को बचाता या मान्यता नहीं देता। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 ने प्राइमोजेनीचर को खत्म कर दिया है और प्रथा इसे ओवरराइड नहीं कर सकती है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 से संबंधित कानून के तहत यदि कोई हिंदू पुरुष बिना वसीयत (इंटेस्टेट) और बिना संतान के मर जाता है, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के अनुसार संपत्ति सबसे पहले क्लास -1 के वारिस को मिलेगी, जिसमें विधवा, माँ, बेटा, बेटी आदि शामिल हैं। इस मामले में, महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की मृत्यु (जो 1962 में बिना संतान के हुई थी) के बाद, उनकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नियों – महारानीधिरानी राज लक्ष्मी और महारानीधिरानी कामसुंदरी – को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के अनुसार अपने पति महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की संपत्ति मिली और वे उत्तराधिकार के नियम के अनुसार कामेश्वर सिंह धार्मिक ट्रस्ट की ट्रस्टी भी बनीं। जब कोई हिंदू महिला बिना वसीयत के मरती है और उसे अपने पति (या ससुर) से संपत्ति विरासत में मिली होती है, तो उसकी संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(1) के अनुसार हस्तांतरित होती है। यदि विधवा की कोई संतान नहीं है और पति की पहले ही मृत्यु हो चुकी है, तो संपत्ति पति के वारिसों को मिलती है।

न्यायालय ने कहा कि मौजूदा केस में प्रतिवादी नंबर 1 (महारानी कामसुंदरी) की कोई संतान नहीं है, इसलिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(1) के अनुसार, वादी (जो क्लास-II वारिस हैं – भाई का बेटा और बेटी) प्रतिवादी नंबर 1 की मौत के बाद उनकी संपत्ति के उत्तराधिकारी बनने के हकदार हैं। दस्तावेज के अनुसार, जो 17.06.1970 का समझौता है और वादी तथा स्वर्गीय महाराजा कामेश्वर सिंह की दो रानियों के बीच हुआ था, वे अपनी ज़िंदगी भर ट्रस्टी रहेंगी और दोनों रानियों – राजलक्ष्मी और कामसुंदरी – की मौत के बाद वादी और उनके भाइयों को कामेश्वर धार्मिक ट्रस्ट का ट्रस्टी नियुक्त किया जाएगा। ट्रस्ट डीड में यह भी लिखा है कि ट्रस्टी कामसुंदरी और राजलक्ष्मी अपनी ज़िंदगी में अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं कर सकतीं।

न्यायालय ने कहा कि जो केस नंबर 42/65 (तारीख 05.09.1970) में समझौते की सर्टिफाइड कॉपी है, दोनों पक्षों ने समझौता किया और आपसी सहमति से तय किया कि किसी भी सह-ट्रस्टी या सह-शेबैत को अपना उत्तराधिकारी-ट्रस्टी या शेबैत नियुक्त करने का अधिकार नहीं होगा। उन्होंने आगे यह भी तय किया कि अगर सह-ट्रस्टी या सह-शेबैत में से किसी एक की मौत हो जाती है, तो दूसरा सह-ट्रस्टी या सह-शेबैत अपनी ज़िंदगी भर के लिए अकेला ट्रस्टी या शेबैत रहेगा।

उन्होंने यह भी तय किया कि अगर दोनों सह-ट्रस्टी या सह-शेबैत की मौत हो जाती है, तो स्वर्गीय महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के तीन भतीजे – राजकुमार जीवेश्वर सिंह, राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और राजकुमार सुभेश्वर सिंह – मिलकर सह-ट्रस्टी या शेबैत के तौर पर काम करेंगे। उन्हें अपने परिवार के पुरुष सदस्यों में से अपने उत्तराधिकारी ट्रस्टी या शेबैत को चुनने का अधिकार होगा। समझौते की शर्तों के अनुसार, यह भी साफ है कि वादी तभी ट्रस्टी बनेगा जब प्रतिवादी नंबर 1 (महारानीधिराणी कामसुंदरी) की मौत हो जाएगी।

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