‘बिहार युवा आयोग’ 2.70+करोड़ 18-45 वर्ष के मतदाताओं के लिए ‘चुनावी लॉलीपॉप’ बा !!😢विधानसभा चुनाव में 56+नए चेहरे दिखेंगे👁

2005 में 55/88 से बढ़कर 2010 में 115 अंक जाना, फिर 2015 में घटकर 71 और 2020 में 43 किस सुशाशन का प्रमाण है - लोग जनता दल यूनाइटेड को नहीं चाहते हैं। विश्वास नहीं है तो 2025 विधानसभा में देख लें

पटना / नई दिल्ली : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 74-वर्ष की आयु में, वह भी दो दशक से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद और 18 वीं विधानसभा चुनाव से पूर्व, प्रदेश के युवाओं के बारे में ‘सोच’ आयी है। ‘बिहार युवा आयोग’ का गठन कर दिए। बिहार में 15 से 44 वर्ष की आयु के युवाओं की संख्या आज 27012426+ है। राजनीति में चाहे जितनी तालियाँ बजा लें, बिहार के लोग, खासकर मतदाता, आज गांठ बांध लें कि ‘इस आयोग का भी हश्र वही होगा, जैसे प्रदेश में अब तक बने कमेटी और कमीशन का होता आया है।’ या फिर, यह आयोग “अपने लोगों को अंतः मन से आभार व्यक्त करने के लिए विश्रामगृह बन जायेगा – चुनवोपरांत। 

वैसे वर्तमान सत्ताधारियों को ‘इंदिरा गांधी का नाम आज भी हजम नहीं होगा,’ लेकिन इस आयोग के गठन को देखकर देश की पूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी याद आ गई। उस जमाने में किसी हादसा होने के बाद शासन प्रशासन के विरुद्ध उठती आवाज को बंद करने के लिए कमेटी या कमीशन का गठन हो जाता था। केंद्र में स्वयं श्रीमती गांधी अथवा प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा होता था, और राज्यों में उनके ‘पसंदीदा मुख्यमंत्रियों’ द्वारा। कमेटी/कमीशन के प्रमुख की, सदस्यों की नियुक्ति हो जाती थी, सरकारी कोष से पैसे निकल जाते थे। समयांतराल लोग उस घटना को भी भूल जाते थे और सरकार तो भुलाने के लिए ही इनका गठन करती ही थी। यकीन मानिए अंतिम मतदान की तारीख के बाद युवा आयोग वृद्धावस्था तक याद नहीं किए जाएंगे, क्योंकि बिहार के लोगों को भूलने की आदत प्रबल हैं । 

दिल्ली में यमुना पार और नई दिल्ली को जोड़ने वाला  ‘विकास मार्ग’, जिसका आईटीओ चौराहे पर आकर “विकास” का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और आगे दीनदयाल उपाध्याय मार्ग के नाम से जाना जाता है; चर्चाएं आम हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव के बाद एक बार मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे नीतीश कुमार और रायसीना पहाड़ पर बैठे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की उठती-झुकती निगाहों को देख रहे हैं ‘नतमस्तक’ होकर। 

वजह यह है कि नीतीश कुमार या उनकी जनता दल युनाइटेड पार्टी की ‘अपनी’, ‘स्वयं की’ इतनी क्षमता नहीं रही कि वे अकेले सरकार का गठन कर लेंगे। विगत वर्षों की राजनीतिक घटनाएं, सरकार बनने, बिखरने की परम्परा गवाह हैं। नीतीश कुमार को किसी न किसी राजनीतिक पार्टी का, चाहे राष्ट्रीय जनता दल ही क्यों न हो, बैशाखी जैसा सहारा लेना ही पड़ा है और पड़ेगा। वैसी स्थिति में न्यूनतम संख्या के बाद भी मुख्यमंत्री बनना ‘राजनीतिक बर्चस्वता’ नहीं, अपितु, ‘करुणामय’ आधार पर सरकार बनाना है। रायसीना पहाड़ पर लोग कहते भी हैं कि प्रधानमंत्री अपने किसी ‘उपासक’ को ‘अतृप्त’ नहीं छोड़े हैं, संभव है अगर उनकी कृपा रही तो नीतीश कुमार का यह भी मनोरथ पूरा हो सकता है, बन भी सकते हैं, इतिहास का सवाल है। बिहार को अब तक 22 मुख्यमंत्री मिला चुका है। 

लेकिन असली बात यह है कि प्रदेश के सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों से प्राप्त सांख्यिकी के आधार पर प्रदेश के सभी राजनीतिक पार्टियों के करीब 23 फीसदी प्रतिनिधि, जो वर्तमान में विधानसभा के सदस्य हैं, “पूर्व सदस्य” की श्रेणी में पंक्तिबद्ध हो जाएँगे। “पूर्व विधायक” बनने वालों में नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड के भी विधायक सम्मिलित है। सांख्यिकी के अनुसार, आज के 243  विधानसभा सदस्यों में से कोई 56 विधायकों का चेहरा ‘नवीन’ होगा और वर्तमान में विधानसभा के “कौन क्या है” डायरी में आज के चेहरे बदल जाएँगे। 

रायसीना पहाड़ के एक विश्वस्त सूत्र का कहना है कि ‘इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कालखंड में जिस तरह कांग्रेस का मुख्यालय दिल्ली से देश के सभी राज्यों के कांग्रेस मुख्यालयों पर अपना आधिपत्य रखता था, आज के इस बदलते समय में दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भारतीय जनता पार्टी का मुख्यालय देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ही नहीं, जिला मुख्यालयों के साथ-साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सभी पार्टियों के मुख्यालयों को अपने सीसीटीवी के अधीन रखती है। विश्वास नहीं है तो पूछ लें नितीश कुमार जी से या उनके मंत्रिमंडल से लेकर दिल्ली के लोकसभा सभा और राज्यसभा में ‘जनता दल युनाइटेड के रूप में’ बैठे ‘भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधियों’ से। 

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बिहार में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भी उस सीसीटीवी के अधीन ही हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि आज नीतीश कुमार 80 फीसदी से अधिक भाजपा के, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह के हो चुके हैं। शेष जो दिख रहे हैं, वे प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करने और अभी तक बचे 45 विधायकों को संतुष्ट करने के लिए है। आगामी विधानसभा चुनाव में यह संख्या न केवल आधी भी हो सकती है, बल्कि किन महाशयों और किन माननीया को चुनाव में टिकट दिया जाएगा, इसका निर्णय नीतीश कुमार या प्रदेश के जनता दल यूनाइटेड के लोग नहीं करेंगे, बल्कि दीनदयाल उपाध्याय मार्ग करेगा, खासकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह। क्योंकि नीतीश कुमार महज एक डगरा पर रखा बैगन’ हो गए हैं।”  

सूत्रों की बात सुनकर ‘आश्चर्य’ नहीं लग रहा था। विगत 25 वर्षों में, देश ने नीतीश कुमार का जो राजनीतिक चरित्र देखा है – अधोगति की ओर उन्मुख – इस बात का गवाह है कि वे उत्तरोत्तर पार्टी की मुख्यधारा पर अपना प्रभुत्व खोते ही नहीं जा रहे हैं, बल्कि अपनी सत्ता को शनै-शनै भाजपा को सुपुर्द भी करते जा रहे हैं। आज के परिपेक्ष में भले नीतीश कुमार स्वयंभू ‘शेर-ए-बिहार’ या ‘प्रदेश का ‘लौह पुरुष’ भले समझते हैं, हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे चरण में आगमन के बाद वे नीतीश कुमार को उनकी वास्तविक स्थिति और छवि से अवगत कराते आ रहे हैं। 

बिहार में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भी उस सीसीटीवी के अधीन ही हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि आज नीतीश कुमार 80 फीसदी से अधिक भाजपा के, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह के हो चुके हैं।

ज्ञातव्य हो कि बिहार में आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भी ‘शेर-ए-बिहार’ और बिहार का ‘लौह पुरुष’ की चर्चा होगी, चाहे किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय के लोग होंगे, चाहकर भी रामलखन सिंह यादव को नजर अंदाज नहीं कर सकते। रामलखन सिंह यादव की मृत्यु के बाद उस स्थान को लालू प्रसाद यादव अधिपत्य ज़माने की कोशिश किये, लेकिन महज यादव उपनाम’ से कोई शेर-ए-बिहार नहीं हो सकता है। लालू के जेल जाने के बाद, या यूँ कहें कि सत्ता से पदच्युत होने के बाद नीतीश कुमार स्वयंभू ‘शेर-ए-बिहार’ बनने, दलितों का, प्रदेश के गरीब-गुरबों का ‘स्वयंभू’ नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं।  लेकिन बन नहीं पाए। रामलखन सिंह यादव सं 1952 से 1991 तक बिहार विधान सभा में मुस्तैद रहे। जिसका हुए, उसका कभी हाथ नहीं छोड़े और जिसका नहीं हुए, उसका कभी ऊँगली भी नहीं पकड़े। लेकिन न तो लालू किसी का हुए और ना ही नीतीश कुमार किसी का हो सके। 

दहशत’ था ‘शेर-ए-बिहार’ का ‘सम्मान’ के साथ। ‘लोग’ दूर से डरते अवश्य थे, लेकिन पास आते ही पिघल जाते थे। लोग घबराते जरूर थे, लेकिन ‘थरथराते’ नहीं थे। आज के नेता इस सम्मान के बारे में सोच नहीं सकते, चाहे ‘ब्राह्मण’ हों, ‘क्षत्रिय’ हो, ‘वैश्य’ हो, ‘शूद्र’ हो, ‘यादव’ हों, ‘कुर्मी’ हो, ‘कायस्थ’ हो, ‘पासवान’ हो, ‘कुशवाहा’ हो; क्योंकि ‘सम्मान’ ‘अर्जित’ किया जाता है बहुत मसक्कत से, और वर्तमान राजनीतिक गलियारे में, चाहे पटना का सरपेंटाइन रोड हो या दिल्ली का संसद मार्ग औसतन 90 फीसदी से अधिक नेतागण उस सम्मान से कोसों दूर हैं । विगत 35-वर्षों में बिहार में जितने भी नेता जन्म लिए, मंत्री से मुख्यमंत्री तक, वह सम्मान नहीं पा सके, जो शेर-ए-बिहार के नाम से अंकित था। 

बहरहाल, आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम को प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक नीतीश कुमार पटना को गंगा के उस पार के लोगों से जोड़ने के लिए, आवागमन की सुविधा को बेहतर बनाने के लिए अपने कालखंड में भले बेहतर कार्य करने का दावा करते हों, हकीकत यह है कि मिथिला राज्य के निर्माण के लिए प्रस्तावित जिलों के करीब 60 फीसदी मतदाता अपने अपने वर्तमान विधायकों से खुश नहीं हैं और वे परिवर्तन को औचित्य बताते हैं। इन विधायकों में जनता दल यूनाइटेफ़ के अलावे राष्ट्रीय जनता दल के भी हैं, भारतीय जनता पार्टी के भी हैं और कुछ अन्य भी हैं। सीतामढ़ी के एक मतदाता का कहना है कि “राजनीतिक पार्टियों ने अपने अपने पार्टियों के नामकरण में जनता शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल किए हैं, लेकिन वे और उनके विधायकगण जनता के कभी नहीं हुए। 

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आजादी के बाद अब तक के मंत्रिमंडल में भले तथाकथित रूप से सामाजिक सरोकार रखने का दावा करने वाले सफेदपोश या रंग बिरंगे वस्त्रों को धारण करने वाले जनहित की बात करें, अखबारों, पत्रिकाओं में  उनका नाम प्रकाशित हों; लेकिन प्रदेश के 324 विधानसभा, 40 लोक सभा, 16 राज्य सभा और 75 विधान परिषद क्षेत्र (63 निर्वाचित और 12 मनोनीत) के रोते, बिलखते, पेट-पीठ एक किए, अशिक्षित, बेरोजगार, बीमार, पीड़ित मतदाता से बड़ा दूसरा कोई उद्धरण नहीं हो सकता है। आने वाले समय में भारत के शोधकर्ता ही नहीं, विश्व के प्रतिष्ठित शोध संस्थाओं के दिग्गज आज़ादी के बाद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लड़ी गयी दूसरी जंगे आज़ादी और उस आंदोलन से जन्म लिए तथाकथित नेताओं पर गहन शोध अवश्य करेंगे। और 18 वीं विधानसभा हेतु होने वाली चुनाव से पूर्व नीतीश कुमार द्वारा ‘युवा आयोग’ का गठन भी एक मुख्य विषय होगा। 

जय प्रकाश नारायण के सिद्धांतों को, उनके विचारों को उनके ही अनुयायियों द्वारा धज्जी उड़ाते देखना हो तो बिहार का भ्रमण सम्मेलन कर लें। अपने को जयप्रकाश नारायण-कर्पूरी ठाकुर का शिष्य कहने वाले लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार जैसे अनुयायी अगर करोड़पति हो सकते हैं, तो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के बाद बिहार की धरती पर जन्म लेने वाले, राज्यसभा, लोकसभा, विधान सभा या विधान परिषद में बैठने वाले ‘सम्मानित’ नेतागण अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं।  वैसे आज 74 वर्ष के हैं नीतीश कुमार। 25 वर्ष पहले 2000 में बिहार की सत्ता में आये थे। यानी उस समय उनकी आयु 49 वर्ष की थी। उस समय प्रदेश के युवाओं के बारे में ज्ञान नहीं हुआ उन्हें। आज 74 वर्ष की आयु में, वह भी जब प्रदेश 18 वीं विधानसभा चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है, और यह भी देख रहे हैं कि मोदी जी कृपा रही तो फिर एक बाद बैठिये जायेंगे कुर्सी पर, युवा आयोग बनाने का लॉलीपॉप फेके – वैसे उनका जनता दल युनाइटेड का आकर भी संकुचित होगा। 

बिहार सरकार ने युवाओं को आत्मनिर्भर और रोजगारोन्मुखी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ‘बिहार युवा आयोग’ के गठन को मंजूरी दी है। यह फैसला मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया, जिसमें कुल 43 प्रस्तावों को स्वीकृति दी गई। इनमें विकास योजनाएं, नियुक्तियों की प्रक्रिया और आर्थिक प्रस्ताव भी शामिल हैं। आयोग में एक अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष और सात सदस्य होंगे, जिनकी अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष तय की गई है। यह आयोग राज्य के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दिलाने वाली नीतियों के पालन की निगरानी भी करेगा।

इस बार चुनाव के बाद मुख्यमंत्री आवास में कौन रहेंगे?

मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म ‘एक्स’ पर जानकारी देते हुए कहा कि बिहार के युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने, उन्हें प्रशिक्षित करने तथा सशक्त और सक्षम बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने बिहार युवा आयोग के गठन का निर्णय लिया है। यह आयोग इस बात की निगरानी करेगा कि राज्य के स्थानीय युवाओं को राज्य के भीतर निजी क्षेत्र के रोजगारों में प्राथमिकता मिले। साथ ही राज्य के बाहर अध्ययन करने वाले और काम करने वाले युवाओं के हितों की भी रक्षा हो। सामाजिक बुराईयों को बढ़ावा देने वाले शराब एवं अन्य मादक पदार्थों की रोकथाम के लिए कार्यक्रम तैयार कर और ऐसे मामलों में सरकार को अनुशंसा भेजना भी इसका महत्वपूर्ण कार्य होगा। राज्य सरकार की दूरदर्शी पहल का उद्देश्य है कि इस आयोग के माध्यम से युवा आत्मनिर्भर, दक्ष और रोजजगारोन्मुखी बनें, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो।

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आयोग के सदस्यों की अधिकतम उम्र सीमा 45 वर्ष होगी। यह आयोग राज्य सरकार को युवाओं के कल्याण, शिक्षा, रोजगार और उनके सर्वांगीण विकास से जुड़े मुद्दों पर सलाह देगा। आयोग विभिन्न सरकारी विभागों के साथ समन्वय करेगा ताकि युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर मिल सकें। राज्य के बाहर जो युवा काम करने जाते हैं, उनके हितों की रक्षा करना भी इस आयोग का कार्य होगा। इनमें से सबसे बड़ा ऐलान मूल निवासी महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण और युवा आयोग के गठन को लेकर किया गया है।

24 साल पहले तीन मार्च, 2000 को नीतीश कुमार ने पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. हालांकि, उनकी यह सरकार सात दिनों तक ही चल पायी. बहुमत का जुगाड़ नहीं हो पाने के कारण उन्होंने 10 मार्च, 2000 को इस्तीफा दे दिया। दूसरी बार वे पूरे बहुमत के साथ नवंबर 2005 में एनडीए सरकार के मुखिया बने। तीसरी बार पांच साल बाद हुए 2010 में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए एक बार फिर भारी बहुमत से सत्ता में आया और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। जदयू ने वर्ष 2013 में भाजपा से नाता तोड़ लिया था। लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, नीतीश कुमार भाजपा के खिलाफ लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए। लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी के खराब प्रदर्शन की जिम्मेवारी लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने थे। जीतन राम मांझी करीब एक साल तक मुख्यमंत्री रहे। 

वर्ष 2015 में आरजेडी और कांग्रेस के साथ जदयू ने गठबंधन किया और महागठबंधन की सरकार बिहार में बानी और उस सरकार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री तो लालू यादव के पुत्र तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि 2015 में बनी महागठबंधन सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं सर सकी। 2017 में तेजस्वी यादव पर सीबीआई की ओर से लगे आरोपों के बाद नीतीश कुमार ने महागठबंधन से रिश्ता तोड़ लिया। महागठबंधन से अलग होकर नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई और खुद छठवीं बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में जनता दल युनाइटेड और बीजेपी साथ मैदान में उतरी। इसमें लोकसभा की 39 सीटों पर एनडीए को जीत मिली। लोकसभा चुनाव के ठीक एक साल बाद बिहार में हुए विधानसभा चुनाव 2020 में भी जेडीयू ने एनडीए साथ रही। इस गठबंधन को जनता का भरपूर साथ मिला और सूबे में एनडीए की फिर से सरकार बनी। 2020 में जेडीयू को कम सीटें मिली, लेकिन बीजेपी ने नीतीश कुमार को सातवीं बार सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया।

हालांकि दो साल बाद ही 2022 में नीतीश कुमार और बीजेपी के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू एनडीए से अलग हो गई। राज्य में एनडीए की सरकार गिर गई। नीतीश कुमार ने फिर एक बार राजद के साथ मिलकर बिहार में महागठबंधन की सरकार बना ली। इस बार भी सीएम नीतीश कुमार ही रहे। यह आठवीं बार था जब नीतीश कुमार राज्य के मुख्यमंत्री बने। यह सरकार भी करीब डेढ़ साल ही टिक सकी। फिर नीतीश कुमार बीजेपी के संग मिलकर नौंवी बार सीएम बन रहे हैं। अब दसवीं की तैयार है बिहार के युवाओं को ‘युवा आयोग’ और कर्पूरी ठाकुर के नाम पर मतदाताओं को आकर्षित कर। शेष कार्य तो मतदाता करेंगे। 

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