रघुवंश बाबू को बहुत जल्द ‘वैशाली’ याद आ गया,  फिर तो ‘अम्बपाली-अरुणध्वज’ भी मस्तष्क में होगा ही 

रधुवंश प्रसाद सिंह 
रधुवंश प्रसाद सिंह 

“प्रोफ़ेसर” रघुवंश प्रसाद सिंह बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। बहुत सीधे-साधे मनुष्य हैं। शिक्षक तो थे, रहे नहीं; परन्तु एक राजनेता होने के बाबजूद, बिहार के डाकबंगला चौराहे से दिल्ली के राजपथ तक, न तो प्रदेश के लिए और ना ही, प्रदेश के मतदाताओं के लिए कोई ऐसा कार्य किये, जो “वैशाली” में प्रथम गणतंत्र की स्थापना जैसा आज भी बिहार के लोगों को मालूम हो। 

वैसे यदि किसी भी एजेंसी से बिहार में एक सर्वे कराया जाय तो प्रोफ़ेसर साहेब के अलावे, प्रदेश का शायद दशमलव तीन से पांच फीसदी  आवाम को छोड़कर, 99 . 5 फीसदी लोग   नहीं जानते होंगे की वैशाली में प्रथम गणतंत्र की स्थापना हुई थी। वजह यह है कि उस गणतंत्र में तो लोगों के पास खाने के लिए अन्न था, तन ढंकने के लिए वस्त्र था – आज आज़ादी के 74 साल बाद, और प्रोफ़ेसर रघुवंश बाबू की पार्टी –  राष्ट्रीय जनता दल –  की दो-दसक सत्ता में रहने बाद बिहार में, बिहार के लोगों के लिए और उनकी पार्टी नेताओं द्वारा गणतन्त्र का  हुआ, यह तो प्रोफ़ेसर साहेब बेहतर जानते हैं। 

प्रोफ़ेसर साहेब बहुत बेहतर वक्ता हैं, परन्तु  इनकी अपनी कोई पहचान नहीं है, यदि राष्ट्रीय जनता दल और लालू प्रसाद के साथ नहीं होते। लालू द्वार किये गए अनेकानेक कुकर्मों का ये प्रत्यक्षदर्शी थे, आज भी हैं। लालू के राजनीतिक ‘सन्यास’ (स्वास्थ के कारण भी हो सकता है) के बाद रघुवंश बाबू को लालू की अगली पीढ़ी के साथ नहीं पटेगा, यह तय है।  और सामंजस्य हो भी तो क्यों? दो पीढ़ियों है। रघुवंश जी चार पन्ने की चिठ्ठी लिखे हैं बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार को और तीन मांगों की चर्चा  किये हैं। 

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परन्तु सवाल यह है कि अपने तीन-दसक की राजनीतिक दोस्ती में वे, अथवा उनकी पार्टी के मुख्य मन्त्री बिहार के लोगों के लिए क्या किये?

इन तीन सवालों में दूसरे और तीसरे सवालों का क्रियान्वयन तो वे और उनकी पार्टी जब सत्ता में रही, सकती थी, परन्तु आज यह कार्य नितीश कुमार को करने क्यों कह रहे हैं ? जहाँ तक मनरेगा में जमीनों पर होने वाले कार्यों का सवाल है, उस कानून में फिर “दूसरों की जमीनों पर भी काम” सम्मिलित करने की बात क्यों? वे और उनकी पार्टी  और उनके नेतागण बिहार से दिल्ली तक तो सिर्फ जाति/वर्ण को इस्तेमालकर, बरगलाकर कुर्सी पर चिपके रहे। 

सवाल यह है कि कहीं अभियन्ता साहेब और प्रोफ़ेसर साहेब मिलकर कोई राजनीतिक-कूटनीति तो नहीं गढ़ रहे हैं बिहारी मतदाताओं के माथे पर चढ़कर !! प्रोफ़ेसर होने के नाते तो वे अवश्य जानते होंगे की “राजगृह से तो अम्बपाली ‘खुद’ वैशाली गयी थी, जहाँ वह ‘राज-नर्तकी’ बनी और उसका प्रेमी अरुणध्वज जीते-जी मर गया” – आज अचानक प्रोफ़ेसर साहेब को वैशाली राज्य कहाँ से याद आ गया। 

रघुवंश बाबू कोविड-19 संक्रमण के बाद कुछ दिक्कतों को लेकर दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती हैं। ” अपनी पार्टी”, यानि  वाला राष्ट्रीय  जनता दल छोड़ दिए हैं, चिठ्ठी लिखकर। दो-चार चिठ्ठी और  लिखे हैं बिहार के अधिकारियों को, बिहार सरकार को और विशेषकर मुख्य मंत्री को।  साथ तीन मांग भी किये हैं :

वैशाली का खंडहर 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा है कि मनरेगा कानून में ”सरकारी और एससी, एसटी की जमीन में काम होगा” का प्रबंध है, उस खंड में आम किसानों की जमीन में भी काम होगा, जोड़ दिया जाये ।  इस आशय का अध्यादेश तुरंत लागू कर आनेवाले आचार संहिता से बचा जाये. इससे किसानों को मजदूर गारंटी और मजदूरी सब्सीडी, गड़बड़ी में आयेगी और सरकार पर से खर्च का बोझ घटेगा ।  जैसे मुखिया से मजदूर काम मांगता है और किसान भी मुखिया से मजदूर मांगेंगे. किसानों की जमीन के रकबा के आधार पर मजदूरों की संख्या को लिमिट रखा जाये. मजदूरी में आधी सरकार और आधी मजदूरी किसान भी दे. यह काम छूट गया था. इसे करा दें, आपकी बड़ी होगी । 

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम दूसरा पत्र भी लिखा है ।  इसमें उन्होंने कहा है कि ”वैशाली जनतंत्र की जननी है. विश्व का प्रथम गणतंत्र है ।  लेकिन इसमें सरकार ने कुछ नहीं किया है ।  इसलिए मेरा आग्रह है कि झारखंड राज्य बनने से पहले 15 अगस्त को मुख्यमंत्री पटना में और 26 जनवरी को रांची में राष्ट्र ध्वज फहराते थे ।  इसी प्रकार 26 जनवरी को पटना में राज्यपाल और मुख्यमंत्री रांची में राष्ट्रध्वज फहराते थे ।  उसी तरह 15 अगस्त को मुख्यमंत्री पटना में और राज्यपाल विश्व के प्रथम गणतंत्री वैशाली में राष्ट्रध्वज फहराने का निर्णय कर इतिहास की रचना करें. इसी प्रकार 26 जनवरी को राज्यपाल पटना में और मुख्यमंत्री वैशाली गढ़ के मैदान में राष्ट्रध्वज फहरायें । 

इसलिए कि वैशाली विश्व का प्रथम गणतंत्र है ।  आप इसे 26 जनवरी, 2021 से वैशाली में राष्ट्रध्वज फहरायें ।  इस आशय की सारी औपचारिकताएं पूरी हैं ।  फाइल मंत्रिमंडल सचिवालय में लंबित है ।  केवल पुरातत्व सर्वेक्षण से अनापत्ति प्रमाण पत्र आना बाकी था, जो आ गया है. आग्रह है कि कृपा कर आप इसे स्वीकृत कर दें ।  वैशाली गढ़ के मैदान में वहां दस-बारह वर्षों से राष्ट्रध्वज फहराया जा रहा है ।  इसे सरकारी समारोह बनाने हेतु शीघ्र निर्णय कर दें ।  आगे उन्होंने कहा है कि भगवान बुद्ध की अस्थियां अवशेष की स्थापना हेतु आपने वैशाली में 432 करोड़ की जमीन अर्जित कर 3-4 सौ करोड़ का स्तूप बनवा रहे हैं, लेकिन विश्व का प्रथम गणतंत्र वैशाली के लिए एक यह भारी काम होगा. विश्व में संदेश जायेगा कि विश्व का प्रथम गणतंत्र, वैशाली में होने के कारण वहां राष्ट्रीय दिवसों पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल द्वारा राष्ट्रध्वज फहराया जा रहा है । 

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रघुवंश बाबू ने नीतीश कुमार से तीसरी मांग पूरी करने की अपील की है ।  इसमें उन्होंने कहा है कि लोकसभा में शून्यकाल में मेरे द्वारा भगवान बुद्ध का पवित्र भिक्षापात्र अफगानिस्तान के कंधार से वैशाली लाने हेतु सवाल उठाने पर विदेश मंत्री श्री एसएम कृष्णा ने लिखित उत्तर में कहा कि भगवान बुद्ध का पवित्र भिक्षापात्र अब कंधार में नहीं सुरक्षा कारणों से काबुल म्यूजियम में रखा गया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से उद्गम का पता लगा कर उसे वैशाली लाया जायेगा. क्योंकि, भगवान बुद्ध अंतिमवें वर्षावास में वैशाली छोड़ने के समय अपना भिक्षापात्र स्मारक के रूप में वैशालीवालों को दिया था. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की लाल फीताशाही की गुटबंदी के कारण पर्याप्त साक्ष्य नहीं है, कह कर ठप करवा दिया. जबकि, अफगानिस्तान वाले मोटे अक्षरों में अपने काबुल म्यूजियम भगवान बुद्ध को भिक्षापात्र लिख कर स्वीकार कर रहा है । 

   

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