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	<title>heritage Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>सरकार बनाम स्वयं-भू सरकार (भाग-2) ✍ दरभंगा राज के स्थापत्य धरोहर को दरभंगा राज की पीढ़ी जानती हैं? शायद नहीं 😢 कला, संस्कृति और गरिमा की बात करने पर लोग हँसते हैं 😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/do-the-generations-of-the-darbhanga-raj-know-about-its-architectural-heritage-perhaps-not</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Sep 2026 12:16:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga gharana]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: दरभंगा के अंतिम &#8216;संतानहीन&#8217; राजा डॉ. कामेश्वर सिंह 1 अक्टूबर, 1962 को अपने जन्मस्थान वाले शहर में ही अंतिम सांस लिए। यह भाग्य की बात थी। जिस दिन वे अनंत यात्रा पर निकले, सारा शहर और प्रान्त अश्रुपूरित था। उनकी मृत्यु के छह दशक बाद दरभंगा राज के &#8216;भगवती गृह&#8217; का क्या हश्र [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/do-the-generations-of-the-darbhanga-raj-know-about-its-architectural-heritage-perhaps-not">सरकार बनाम स्वयं-भू सरकार (भाग-2) ✍ दरभंगा राज के स्थापत्य धरोहर को दरभंगा राज की पीढ़ी जानती हैं? शायद नहीं 😢 कला, संस्कृति और गरिमा की बात करने पर लोग हँसते हैं 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: दरभंगा के अंतिम &#8216;संतानहीन&#8217; राजा डॉ. कामेश्वर सिंह 1 अक्टूबर, 1962 को अपने जन्मस्थान वाले शहर में ही अंतिम सांस लिए। यह भाग्य की बात थी। जिस दिन वे अनंत यात्रा पर निकले, सारा शहर और प्रान्त अश्रुपूरित था। उनकी मृत्यु के छह दशक बाद दरभंगा राज के &#8216;भगवती गृह&#8217; का क्या हश्र हुआ, रामबाग परिसर में उपस्थित यह जलकुम्भी गवाह बना। दो वर्ष पूर्व रामबाग परिसर का खुला मैदान और दरभंगा राज का भगवती घर महाराजा की मृत्यु के बाद संपत्ति धारकों की मानसिकता के कारण &#8216;जलकुम्भी मय हो गया। </strong></p>
<p><strong>वैसे इस कहानी को लिखते समय रामबाग परिसर के लोगों का कहना है कि जब घर के अंदर पानी प्रवेश का खतरा बना, अपने हितों के रक्षार्थ कुछ दृश्य &#8211; परिदृश्य में बदलाव लाना शुरू हुआ। आज मैदान को साफ़ कराकर दीवार बना गया है। लेकिन अब रामबाग परिसर में जमीं बची कहाँ? करीब 85 एकड़ में फैला कल के रामबाग की अधिकाधिक जमीन बिक गयी है और कई सौ जमीन के क्रेताओं ने अपना-अपना घर बना लिया है। जो शेष बची है वह भी आने वाले दिनों में क्रेता-विक्रेताओं के बीच कागज पर हस्ताक्षरित हो ही जाएगी।&#8221;</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-2.jpg" alt="" width="2048" height="914" class="aligncenter size-full wp-image-7851" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-2.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-2-300x134.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-2-1024x457.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-2-768x343.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-2-1536x686.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>​1 अक्टूबर को महाराजा डॉ कामेशवर सिंह अंतिम सांस लिए। साल 1962 था। माधवेश्वर में उनका दाह संस्कार दोनों महारानियों की उपस्थिति में कर दिया गया। उनके उतराधिकार को लेकर उनके कुछ प्रिय व्यक्तियों के मन में आशा थी, चाहे छोटी महारानी (अब दिवंगत) जो महाराजा के साथ रहती थी और महाराजा के भगिना कन्हैया जी झा (अब दिवंगत)। लेकिन महाराजा ने किसी को भी उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया। राजकुमार शुभेश्वर सिंह और राजकुमार यजनेश्वर सिंह वसीयत लिखे जाने के समय नाबालिक थे और उनकी शादी नहीं हुई थी सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह की दूसरी शादी नहीं हुई थी। आज जो भी स्वयं को &#8216;उत्तराधिकारी&#8217; कहते हैं, वे सभी &#8220;स्वयंभू&#8221; हैं। </p>
<p>मृत्यु से पूर्व 5 जुलाई 1961 को कोलकाता में उन्होंने ​अपनी अंतिम वसीयत की थी, जिसके एक गवाह पं. द्वारिकानाथ झा थे, जो महाराज के ममेरा भाई थे और दरभंगा एविएशन, कोलकाता में मैनेजर थे।​ मृत्यु का समाचार मिलने पर वे कोलकाता से दरभंगा पहुंचे और वसीयत के प्रोबेट कराने की प्रक्रिया ​शुरू करवा दी। कोलकाता उच्च न्यायालय द्वारा वसीयत सितम्बर 1963 को प्रोबेट हुई और पं. लक्ष्मी कान्त झा, अधिवक्ता, माननीय उच्चतम न्यायालय, पूर्व मुख्य​ न्यायाधीश पटना हाई कोर्ट ग्राम – बलिया ,थाना – मधुबनी पिता पंडित अजीब झा वसीयत के एकमात्र एक्सकुटर बने और एक्सेकुटर के सचिव बने पंडित द्वारिकानाथ झा। </p>
<p>वसियत के अनुसार दोनों महारानी के जिन्दा रहने तक संपत्ति का देखभाल ट्रस्ट के अधीन रहेगा और दोनों महारानी के ​स्वर्गवासी होने के बाद संपत्ति को तीन हिस्सा में बाँटने जिसमें एक हिस्सा दरभंगा के जनता के कल्याणार्थ देने और शेष हिस्सा महाराज के छोटे भाई राजा बहादुर विशेश्वर सिंह​, जो स्वर्गवाशी हो चुके थे​, के पुत्र राजकुमार जीवेश्वर सिंह​, राजकुमार यजनेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह के (अपने ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतानों के बीच) वितरित किया जाने का प्रावधान था।​ महाराजा को इस बात की शंका रही होगी तभी उन्होंने शुभेश्वर सिंह के साथ एक शर्त लगाए थे &#8211; ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतानों के बीच। आज जो भी दरभंगा राज में &#8216;स्वयंभू&#8217; सरकार हैं, वे सभी राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के संतान/वंशज हैं; न कि महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह के। खैर। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-4.jpg" alt="" width="1024" height="457" class="aligncenter size-full wp-image-7853" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-4.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-4-300x134.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Kechli-4-768x343.jpg 768w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></p>
<p><strong>दरभंगा राज का पतन </strong></p>
<p>वसीयत के अनुसार, दोनों महारानी को रहने के लिए एक – एक महल, जेवर, कार और कुछ संपत्ति मात्र उपभोग के लिए और दरभंगा राज से प्रति माह कुछ हजार रूपये माहवारी खर्च देने का प्रावधान था। पंडित लक्ष्मीकांत झा वसीयत के एक मात्र एक्सेक्यू​र बहाल हुए; ओझा मुकुंद झा जो महाराज के ​बहनोई थे, ट्रस्टी और तीसरे ट्रस्टी पंडित गिरीन्द्र मोहन मिश्र हुए, जो महाराज के सलाहकार थे और पक्के कांग्रेसी थे, हुए । गौरतलब है कि एक श्रोत्रिय, एक जैवार और एक शाकलदीपी मैथिल ब्राह्मण ट्रस्टी थे । ये तीनो ट्रस्टी महाराजा से उम्र में बड़े ​थे। </p>
<p><strong>दरभंगा राज के जनरल मेनेजर मि. डेनवी के समय रहे असिस्टेंट मेनेजर पं. दुर्गानन्द झा के जिम्मे दरभंगा राज का प्रबंध था । वे राजमाता साहेब के फूलतोड़ा के पुत्र थे और महाराज के बचपन के मित्र थे वे उस ज़माने के स्नातक थे और पंडित द्वारिका नाथ झा, महाराज के ममेरे भाई एक्सेक्यूटर के सचिव मनोनीत हो गये और कोलकाता से आकर गिरीन्द्र मोहन रोड के बंगला नंबर 5 में अपने मामा पं.यदु दत्त झा, जो दरभंगा राज के अनुभवी और दझ पदाधिकारी थे, जिन्हें मिस्टर देनबी ने अपने बाद जनरल मेनेजर के लिए अनुशंसा की थी जिनका उल्लेख 1934 के भूकंप में राहत कार्यक्रम में कुमार गंगानंद सिंह ने की है, के बगल के बंगला में रहने लगे ।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/2.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/2.jpg" alt="" width="1600" height="1090" class="aligncenter size-full wp-image-7854" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/2.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/2-300x204.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/2-1024x698.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/2-768x523.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/2-1536x1046.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/2-218x150.jpg 218w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी ने सबसे छोटे राजकुमार शुभेश्वर सिंह को अपने रामबाग में रखा। वसियत के अनुसार बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी के मृत्यु के बाद उनके महल पर राजकुमार शुभेश्वर सिंह का स्वामित्व होगा। बड़े कुमार जीवेश्वर सिंह (अब दिवंगत) राजनगर रहने लगे और उनकी बड़ी पत्नी राजकिशोरी जी ​(अब दिवंगत) अपनी दोनों ​बेटियों के साथ और मझले राजकुमार यजनेश्वर सिंह अपने परिवार के साथ यूरोपियन गेस्ट हाउस ऊपरी मंजिल पर उत्तर और दझिण भाग में आ गए।</p>
<p>बड़ी महारानी के 1976 में देहांत होने और 1978 में पंडित लक्ष्मी कान्त झा के देहांत के बाद दरभंगा राज का कार्य ट्रस्ट के अधीन हो गया। श्री मदनमोहन मिश्र ( गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बड़े पुत्र), श्री द्वारिका नाथ झा और श्री दुर्गानंद झा तीनो ट्रस्टी के अधीन​। फिर श्री दुर्गानंद झा के देहांत के बाद 1983 के आसपास श्री गोविन्द मोहन मिश्र ट्रस्टी बने और फिर उनके स्थान पर श्री कामनाथ झा ट्रस्टी बने । राजकुमार शुभेश्वर सिंह 1965 के आसपास दरभंगा राज के मामले में सक्रिय हो गये थे उन्हें रामेश्वर जूट मिल, फिर सुगर कंपनी और न्यूज़ पेपर &#038; पब्लिकेशन लिमिटेड का जिम्मेवारी मिली।​ ( अब सभी दिवंगत)</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/4.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7855" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/4.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/4-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/4-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/4-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/4-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>कहते हैं, सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह राजनगर ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी रहे दरभंगा राज के मामले में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं था। राजनगर से वे गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बाद बंगला नंबर १, गिरीन्द्र मोहन रोड में अपने दूसरी पत्नी और 5 पुत्री के साथ रहने लगे।​ स्व. महाराज के तथाकथित परिवार के सदस्यों ने माननीय उच्चतम न्यायालय में एक फॅमिली सेटलमेंट नो . 17406 &#8211; 07 ऑफ़ 1987 में फॅमिली सेटलमेंट हुआ। जिसमे महाराजा के वसीयत के विपरीत छोटी महारानी के जिन्दा रहते कुल संपत्ति का एक चौथै हिस्सा पब्लिक चैरिटी को मिला और एक चौथाई छोटी महारानी, एक-चौथाई राजकुमार शुभेश्वर सिंह और उनके दोनों पुत्र को और एक-चौथाई में मंझले राजकुमार के पुत्रों और बड़े राजकुमार के सात पुत्रियों को मिला।​ </p>
<p><strong>राजकुमार जीवेश्वर सिंह की प्रथम पत्नी लहेरियासराय में और दूसरी यानि छोटी पत्नी बंगला नंबर-1, गिरीन्द्र मोहन रोड में रहती है। जीवेश्वर सिंह स्वर्ग्वाशी हो चुके हैं मंझले राजकुमार ​(अब दिवंगत) अभी बंगला नंबर-9 गिरीन्द्र मोहन रोड में पत्नी के साथ रहते थे (अब दिवंगत)।​ राजकुमार शुभेश्वर सिंह को दो पुत्र हैं बड़ा अमेरिका में रहते है और छोटा दिल्ली में रहते हैं और दरभंगा प्रवास में रामबाग में । श्री शुभेश्वर सिंह ​और उनकी पत्नी भी अब जीवित नहीं हैं। महारजा कामेश्वर सिंह ने एक धार्मिक ट्रस्ट जिसके निमित दर्शाए गये सम्पति की आय से उसकी देखरेख का प्रावधान किया गया जिसे बेचने का अधिकार किसी को नहीं दी गयी। </strong></p>
<p>छोटी महारानी महाराजा के ​निधन के बाद अधिकांश समय दरभंगा हाउस केंद्र सरकार द्वारा लेने के बाद उससे सटे आउट हाउस में दिल्ली में रहने लगी ​थी और दरभंगा आने पर नरगोना पैलेस में। ​आज वे भी दिवंगत हो गयीं। 1980 के आसपास से नरगोना कैंपस में बेला पैलेस के सामने नवनिर्मित कल्याणी हाउस में आने पर रहती हैं। 1990 से अधिक समय दरभंगा में रहने लगीं है और दरभंगा रिलीजियस ट्रस्ट जिसके अधीन १०८ मंदिर है और सीताराम ट्रस्ट जिसके अधीन ​बनारस के बांस फाटक, गोदोलिया चौक के नजदीक राममंदिर आता है के एकमात्र ट्रस्टी थीं। आज सभी ट्रस्ट शुभेसजवर सिंह के छोटे पुत्र के पास है। ​ </p>
<p>इनसे पूर्व बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी इसके ट्रस्टी थीं। राजलक्ष्मी जी ने महाराज कामेश्वर सिंह के चिता पर माधवेश्वर में मंदिर का निर्माण करवायी थी। छोटी महारानी कामसुन्दरी जी महाराज कामेश्वर सिंह कल्याणी ट्रस्ट बनवायी जिसके तहत किताबों का प्रकाशन, महाराजा कामेश्वर सिंह जयंती आदि कराती थी। अभी महाराजा कामेश्वर सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट पर भी राजकुमार शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्र हैं। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/5.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7856" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/5.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/5-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/5-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/5-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/5-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>ओझा मुकुंद झा के एकमात्र पुत्र कन्हया जी झा ​भी अब नहीं रहे। ओझा मुकुंद झा अपना दरभंगा स्थित सारामोहनपुर हाउस मिथिला विश्वविद्यालय के स्थापना के समय दिए थे वे खुद ​कन्हैया जी कोठी जो लक्ष्मीश्वर विलास के पीछे है में रहते थे। वे भी जनकल्याण ट्रस्ट बनाये और अपनी अधिकांश सम्पति दान कर ​दिए, बेच दिए। पंडित द्वारिका नाथ झा, गिरीन्द्र मोहन रोड के बंगला नंबर 5 में और पंडित दुर्गानंद झा बंगला नंबर 8 में, श्री मदनमोहन मिश्र बंगला नंबर 2 में  &#8211; उक्त तीनो बंगला पब्लिक चैरिटी के हिस्से में था, बंगला नंबर 3 महारानी के और बंगला नंबर 4 राजकुमार शुभेश्वर सिंह के संतान के हिस्से में आया। जिसमे, कहा जाता है कि  सभी बिक गये है मात्र बंगला नंबर 4 का मुख्य मकान बचा है। </p>
<p>दरभंगा राज का पतन महाराजा के देहांत के चार-पांच साल बाद शरू हुआ जो 75-76 तक अधोगति को प्राप्त हो गया। 1989-90 में इंडियन नेशन और आर्यावर्त समाचार के प्रकाशन बंद होना दरभंगा राज के ताबूत में अंतिम कील माना जायेगा।  कलकत्ता का 42-चौरंगी भी बिक गया। सबसे पहले दिलखुश बाग का एरिया बिका फिर सिंह द्वार के समीप और सुनने में है कि मधुबनी स्थित भौरा गढ़ी का भी डील हो गया है और तालाब भरने का कार्य जारी है।</p>
<p><strong>​बहरहाल, कल अशोक सिंह झा से बात हुई। अशोक सिंह झा सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और शोधपरक अध्ययन से जुड़े रहे हैं। अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारंभिक दौर में वे पत्रकारिता और आकाशवाणी से भी जुड़े रहे तथा सामाजिक, सांस्कृतिक और विकास संबंधी विषयों पर लेखन एवं अनुसंधान करते रहे हैं। पिछले कई दशकों से वे बाल अधिकार, बाल श्रम उन्मूलन, बाल संरक्षण, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। बाल श्रम के विरुद्ध अभियान सहित विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ उन्होंने वंचित बच्चों, महिलाओं और युवाओं के लिए कार्य किया है। इतिहास, संस्कृति और विरासत के प्रति उनकी विशेष रुचि रही है।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/7.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7857" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/7.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/7-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/7-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/7-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/7-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p><strong>दरभंगा राज के स्थापत्य धरोहर</strong></p>
<p>अशोक सिंह झा कोई ढ़ाई दशक पहले महाराजा के सम्मानार्थ छोटी महारानी द्वारा स्थापित कामेश्वर सिंह कल्याणी फॉउंडेशन में शोधार्थी थे। शिक्षा और शोध से अटूट सम्बन्ध रखने के कारण उन्होंने “दरभंगा राज के स्थापत्य संदर्भित धरोहर” पर विशेष कार्य किया था। आर्यावर्तइंडियन नेशन(डॉट)कॉम से बात करते अशोक सिंह झा कहते हैं कि &#8220;स्थापत्य एक ऐसी विधा है जो हजारों वर्ष पुराने मानव-संस्कृति के विविध पहलुओं का परिलक्षण प्रस्तुत करती है। वस्तुतः वर्तमान में विस्मृत कई ऐतिहासिक सभ्यता, संस्कृति और राजवंश उस समय साकार हो जाते हैं जब उनके काल में सर्जित स्थापत्य सन्दर्भित सृजनों का अवलोकन और अन्वेषण हमारे द्वारा किया जाता है। इतिहास को अपने तथ्य की पुष्टि के लिए साक्ष्य चाहिए और साक्ष्य स्थापत्य सर्जनाओं से बढ़कर क्या हो सकता है ? इस विधा के आधार समयुगीन सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक आदि पहलूओं का अध्ययन सम्भव होता है । सिन्धु-सभ्यता का अध्ययन इसका ज्वलन्त उदाहरण है। </p>
<p>​उनका कहना है कि 1558 ई० के आस-पास खंडवलाकुल के चन्द्र ठाकुर के पुत्र महामहोपाध्याय महेश ठाकुर ने मुगल बादशाह अकबर से पारितोषिक में प्राप्त सरकार-ए-तिरहुत की चैधराई और कानूगोई पद को सुशोभित किया । यहीं से इस राजवंश की स्थापना एवं उत्कर्ष की कथा प्रारम्भ हुई तथा जिसका चरमोत्कर्ष एवं लगभग अंत, अंतिम उत्तराधिकारी महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह (1907-1962) के समय में हुआ । लगभग चार सौ वर्षों के खण्डवलाकुल शासन के अन्तर्गत मिथिला एवं मिथिला के बाहर करीब एक सौ पचास मन्दिर, बीसेक महल, चार किले, कम-से-कम पाँच धर्मशाला, जीतमम पुस्तकालय, विविध प्रयोजनार्थ छोटे-बड़े सैकड़ों भवन, पोखर एवं कुआँ, तीन टाउनशिप आदि का निर्माण हुआ ।</p>
<figure id="attachment_7867" aria-describedby="caption-attachment-7867" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Ashok-singh-jha.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Ashok-singh-jha.jpeg" alt="" width="1280" height="960" class="size-full wp-image-7867" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Ashok-singh-jha.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Ashok-singh-jha-300x225.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Ashok-singh-jha-1024x768.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/Ashok-singh-jha-768x576.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7867" class="wp-caption-text">अशोक सिंह झा</figcaption></figure>
<p>दरभंगा राज के तत्त्वावधान में स्थापत्य सर्जनाओं का अधिकांश कार्य दरभंगा तथा इसके निकटवर्ती क्षेत्र में हुआ। वैसे बिहार में पटना, गया, राँची, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया आदि जिला में, पश्चिम बंगाल में, कलकत्ता, खड्गपुर और दार्जिलिंग में, उत्तरप्रदेश में वाराणसी, इलाहाबाद, कनरवल और ऋषिकेश, आसाम में कामाख्या, हिमाचल प्रदेश में शिमला, महाराष्ट्र में मुम्बई, मिस्त्र में काहिरा, ब्रिटेन में लन्दन, पाकिस्तान में लाहौर और फिर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में हुआ। यदि मिथिला क्षेत्र में इनके सृजन का अवलोकन करें तो दरभंगा स्थानीय के अतिरिक्त राजनगर, मधुबनी, झंझारपुर, भवानीपुर, लोहना, पैटघाट, राजग्राम, भौरागढ़ी, कन्दर्पीघाट, सिमरी, सौरीपट्टी, सौराठ, उच्चैठ, छछबुलिया, कल्याणपुर (नाहर), पण्डौल, महीसी, नवबस्ती, मंगरौनी, पिपरागाछी, अहिल्या स्थान आदि स्थान इनके स्थापत्य सृजन कार्य से सुशोभित हैं। महल, मन्दिर, भवन, सराय, पोखर, कुआँ, सड़क, पुल- स्थापत्य-कला के विविध विधा-उपविधा का विकास दरभंगा राज के तत्वावधान में हुआ।</p>
<p>​अशोक सिंह जी आगे कहते हैं: किन्तु भारत का यह सुसांस्कृतिक क्षेत्र विनाशकारी भूकम्प और प्रलयंकारी बाढ़ से सदैव त्रस्त रहा है। निश्चित रूप से इन दोनों प्राकृतिक आपदाओं ने सर्वाधिक क्षति स्थापत्य सन्दर्भित उपलब्धियों को ही पहुँचाया है। इसका ही दुःखद परिणाम है कि दरभंगा स्थित आनन्दबाग पैलेस जैसे कुछ अपवाद को छोड़कर 1934 के पूर्व बने भवनों का ध्वसांवशेष ही मिलता है या फिर कहीं-कहीं तो वह भी दुर्लभ है। अतः 1934 ई० के पूर्व बने भवनों की संख्या आज की तारीख में अपेक्षाकृत काफी कम है। लेकिन दरभंगा, भौरागढ़ी, मधुबनी, राजग्राम, राजनगर आदि स्थानों पर बने भवन, मन्दिर आदि सौ-दो-सौ वर्ष पुराने होने के बावजूद अपनी ऐतिहासिकता और कलात्मकता से किसी भी कलाप्रेमी का ध्यान आकर्षित करते हैं। वैसे भी, खंडवलाकुल के अंतिम तीन शासक क्रमशः महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह (1860-1898), महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह (1929-1962), ने जो भव्य निर्माण कार्य करवाया वे ही इतने आकर्षक, कलात्मक और समन्वयात्मक शैली से समन्वित हैं कि आँखें मन्त्रमुग्ध हो जाती हैं ।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/11.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7859" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/11.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/11-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/11-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/11-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/11-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p><strong>दरभंगा राज के तत्वावधान में स्थापत्य सन्दर्भित निर्माण के क्रम में सर्वप्रमुख स्थान मन्दिर-निर्माण को दिया गया। इन मन्दिरों के निर्माण के लिए जिस स्थापत्य शैली का अनुसरण किया गया वह था उत्तरी भारत में सर्वाधिक प्रचलित नागर शैली । नागर स्थापत्य में नीचे से ऊपर की स्तूपी तक का भाग आयताकार या फिर कहीं-कहीं वर्गाकार होता है। इसकी मूलभूत विशेषता अनुप्रस्थिका (मापचित्र) और उत्थापन (ऊपर की ओर उत्कर्ष) है। वस्तुतः इसके नियोजन में आयताकार मापचित्र के दोनों पाश्वों में क्रमिक रूप से निकला हुआ बाहरी भाग होता है और अपनी ऊँचाई के क्रम में शिखर पतला होता जाता है। अधिकांश मन्दिरों में पार्श्व भाग की ऊँचाई भी शिखर तक पहुँचती है। इस शैली के नियोजन में बाहरी रूप-रेखा, प्रभावशाली तथा बड़े तौर पर उभरती है, जिससे इसे रेखा-शिखर भी कहते हैं। आयताकार मन्दिर के हर तरफ रथिका तथा बाहर निकलते हुए कोणों का नियोजन होता है। शिखर पर आमलक या कलश की स्थापना इसे विशेष आकर्षण प्रदान करती है।</strong></p>
<p>पुनः नागर शैली के अन्तर्गत स्थापत्य का आयोजन देखें। यदि आप मन्दिर के मुख्य द्वार की ओर मुँह किये हुए हैं तो पहले मंडप, फिर अंतराल और तब गर्भ गृह का नियोजन होता है। कहीं-कहीं मण्डप के ऊपर पिरामिडनुमा शीर्ष भाग होता है। इसके अतिरिक्त मुख्य शिखर पर अंग शिखर का प्रयोग तथा अन्तराल एवं मण्डप में स्तम्भों का नियोजन भी इसकी विशेषता रही है। प्रायः प्रत्येक मण्डप के अंग शिखरों से युक्त शिखर उत्तरोत्तर पतले होते हुए भव्य ऊँचाई तक पहुँचते हैं। कुछ मन्दिरों में अधिष्ठान के कोणो पर छोट-छोटे देवालय भी स्थापित हैं जो मन्दिरों को पंचायतन रूप प्रदान करते हैं। मन्दिर के अन्दर ही गर्भगृह के चारों ओर श्प्रदक्षिणा पथश् होने से इन्हें श्सान्धार प्रासादश् कहा जाता है ।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/8.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7860" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/8.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/8-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/8-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/8-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/8-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>मन्दिर निर्माण के क्रम में राज दरभंगा ने एक अपवाद छोड़कर (राजनगर का शिव मन्दिर-महाराजाधिराज रमेश्वर सिंह नागर शैली को ही अपनाया न कि वेसर (मिश्रित) शैली या द्रविड़ (दक्षिण) शैली को। दरभंगा राज के संस्थापक महामहोपाध्याय महेश ठाकुर ने इस क्रम में सोलहवीं सदी के सातवें दशक में दरभंगा से 35 कि० मी० उत्तर पूर्व स्थित एक छोटे से गाँव राजग्राम (मूल नाम भौर- खंडवलाकूल की प्रथम राजधानी या मुख्यालय) में अपनी कुल देवी कंकाली निर्मित्त एक मन्दिर का निर्माण करवाया जो इस वंश के शासकों द्वारा निर्मित सर्वाधिक प्राचीन ज्ञात मन्दिर है। कालक्रम में इसके क्षतिग्रस्त होने पर पुनर्निमाण की प्रक्रिया जारी रही और यह अब तक अपने वजूद को बनाये रखने में सक्षम है। यह मन्दिर जमीन से लगभग अढ़ाई फीट ऊपर उठे एक आयताकार अधिष्ठान पर अवस्थित है। मध्य में गर्भ गृह, उत्तर में दक्षिणकाली तथा दक्षिण में गणेश के लिए एक-एक लघु देवालय का आयोजन है। गर्भ गृह आयताकार है तथा ऊपर की स्तूपी गुम्बदनुमा है जो गोलाई लिये हुए भी चार बराबर भागों में बाह्य रूप से विभाजित प्रतीत होता है । सम्भवतः इस काल में और भी स्थापत्य सन्दर्भित सृजन हुए होंगे किन्तु उनके ध्वंसावशेष भी अनुपलब्ध हैं और ऐतिहासिक ग्रन्थ भी मौन हैं ।</p>
<p>इसी वंश के, क्रम में चैथे शासक शुभंकर ठाकुर ने भौर से भौरा (गढ़ी) अपना निवास एवं मुख्यालय स्थानान्तरित किया तथा आवश्यकतानुसार कुछ वास्तुकला के कार्य करबाये जो अब भूमिसात हो चुके हैं। सत्रहवीं सदी के दूसरे दशक में शुभंकर ठाकुर ने शुभंकरपुर नामक टाउनशिप की स्थापना दरभंगा के निकट बागमती के दक्षिण में की जो आज भी शुभंकरपुर महल्ला के नाम से प्रसिद्ध है। इसी तरह पुरुषोत्तमपुर को बसाया और फिर उनके पुत्र सुन्दर ठाकुर ने सुन्दरपुर की स्थापना की । यद्यपि ये सभी टाउनशिप अलग-अलग महल्लों के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं किन्तु यहाँ प्राचीन स्थापत्य-सर्जनाओं के ध्वंसावशेष का भी अभाव है। कभी-कभार किसी कारणवश खुदाई करते समय इन क्षेत्रों में लखौरी ईंटों के टुकड़े या फिर ईंट ही देखने को मिल जाती हैं ।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/12.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7861" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/12.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/12-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/12-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/12-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/12-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>खण्डवलाकुल के दसवें शासक राजा राघव सिंह ने दरभंगा राज की तत्कालीन राजधानी भौरा में एक किला का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त कई शिव मन्दिर भी बनवाये। जिनमें से दो भौर में तथा एक मधुबनी से आठ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम सौराठ में जीर्णावस्था में अवस्थित है। श्द एन्टीक्वेरियन रिमेन्स इन बिहारश् में डॉ० आर० डी० पाटिल ने भी इनका जिक्र किया है। किले के कुछ अवशेष अभी भी अतीत में अपने भव्य अस्तित्व की कहानी कहते प्रतीत होते हैं । </p>
<p><strong>खण्डवलाकुल वंश क्रम में तेरहवें शासक राजा प्रताप सिंह ने भौरा से राजधानी परिवर्तन दरभंगा किया। यह अंशतः ही हो सका क्योंकि एक तो अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में राजा ने यह कदम उठाया था, -दूसरे वे स्वयं विविध व्याधियों से ग्रसित थे। फिर भी रामबाग पैलेस एवं किले की नींव पड़ी। बाद में इनके उत्तराधिकारी माधव सिंह तथा उनके बाद के शासकों ने इसमें यथोचित परिवर्तन एवं विकास भी किया। यह एक अति उच्च अधिष्ठान पर अवस्थित था, क्योंकि राजागण पैलेस के बाहरी बराम्दे पर से ही हाथी की पीठ पर आसानी से बैठते थे । वैसे अभी इस अधिष्ठान की ऊँचाई बाहर की ओर से सात फीट तक है। कालक्रम में यह भीतर की ओर धँसता गया, लेकिन इसकी भव्यता अभी भी बरकरार है। इसके विशाल कक्ष और इसका चतुःसाल रूप देखते ही बनता है। भवन निर्माण की यह प्रचलित शैली मिथिला भवन-निर्माण कला की विशेषता है और आप इसकी बानगी मिथिला क्षेत्र के अधिकांश आम घरों में भी देख सकते हैं। फर्श से छत की ऊँचाई लगभग बीस फीट तक है ।</strong></p>
<p>राजा प्रताप सिंह के उत्तराधिकारी राजा माधव सिंह ने दरभंगा को अपनी स्थायी राजधानी बनाया। रामबाग महल को उन्होंने पूर्ण किया । इसके चारों ओर लगभग नौ फीट ऊँची दीवार खड़ी की। तीन फुट की दूरी पर एक अर्द्धचन्द्राकार घुमाव तथा हर जोड़-बिन्दु पर एक आमलक की रचना इसकी सुन्दरता को बढ़ाती है। इसके अवशेष कुछ हद तक अभी भी सुरक्षित हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने माधवेश्वर प्रांगण में माधवेश्वर शिव मन्दिर का निर्माण करवाया तथा इस प्राँगण की नींव डाली जो इस वंश के राजाओं के अंतिम संस्कार का स्थल बना । इस शिवालय के गर्भगृह की फर्श सतह से लगभग एक फीट नीचे है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/13.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7862" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/13.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/13-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/13-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/13-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/13-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>इसकी अनुप्रस्थिका बारह फीट ऊँची है तथा इसका उत्थापन स्तूपी की तरह है। शिखर पर नागर शैली का अनुसरण करते हुए कलश की स्थापना है। यह मन्दिर अपने निर्माण के दो सौ वर्ष बाद भी अपना अस्तित्व बचाये हुए है तथा इसका मौलिक स्वरूप कई पुनर्निमाण के बावजूद सुरक्षित है। इसमें नागर शैली के अनुरूप मंडप का अभाव है। मुख्य द्वार सामान्य है और प्रदक्षिणा पथ छतोच्छादित है । सौराठ में भी इसी तरह के शिवालय का निर्माण कार्य इन्होंने प्रारम्भ करवाया था किन्तु 1807 ई० में इनकी मृत्यु के साथ यह अपूर्ण रह गया ।</p>
<p>1807 ई० से 1839 ई० तक इनके उत्तराधिकारी पुत्र छत्र सिंह ने शासन किया । इन्होंने यहाँ धर्मशाला भी बनवायी । अहिल्या स्थान में भी एक मन्दिर बनवाया। दरभंगा में अपने रहने के लिए छत्र विलास भवन बनवाया जो इस वंश का पहला दोमहला महल था । किन्तु ये सभी 1934 के भूकम्प में पूर्णतः भूमिसात हो गये । फिर भी इनके बनवाये तीन मन्दिर अभी भी अवस्थित हैं। सदर हरि मन्दिर और देवी मन्दिर रामबाग प्राँगण के भीतर तथा राम मन्दिर नरगौना प्राँगण के भीतर। सदर हरि मन्दिर एक उच्च आयताकार अधिष्ठान पर अवस्थित है। गर्भगृह वर्गाकार है तथा इसकी छत सपाट है और स्तम्भों पर टिकी है। गर्भ गृह के दोनों पार्श्व में सटे हुए दो देवालय हैं। गर्भ-गृह, प्रदक्षिणा-पथ तथा अन्तराल एकाकार हैं एवं एक सामान्य छत से आच्छादित हैं। मण्डप खुला है। छत पर परकोटे की रचना है। यह मन्दिर प्राचीन हिन्दू स्थापत्य शैली का एक उदाहरण है। साँची प्रभृति स्थानों में गुप्त काल के कुछ प्राचीन मन्दिर भी इसी तरह के हैं। इनका बनवाया देवी मन्दिर सतह से पाँच फीट ऊपर अधिष्ठान पर अवस्थित है। गर्भ-गृह वर्गाकार है तथा इसके ऊपर की स्तूपी बहुत ही कलात्मक है।</p>
<p>स्तूपी का बाह्यान्तर से पाँच मोटी पट्टियों से कलात्मकतापूर्ण विभाजन किया गया है। शिखर सुरुचिपूर्ण आमलक एवं कलश से सुसज्जित है । इनके उत्तराधिकारी महाराज रुद्र सिंह (1839-1850) तथा महाराज महेश्वर सिंह (1850-1860) के समय में स्थापत्य सन्दर्भित कुछ विशेष निर्माण का न उल्लेख मिलता है और न अवशेष ही। कुछ सरकारी दस्तावेजों के अनुसार महाराज महेश्वर सिंह ने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय अँग्रेजी सत्ता के विरुद्ध एक लघु किला तथा सुरक्षा-खाई का निर्माण करवाया था।<br />
1860 से सितम्बर, 1879 तक राज दरभंगा कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अन्तर्गत संचालित होता रहा। यह प्रशासनिक सुसंगठन एवं सुव्यवस्था का काल था। इस काल में कई सड़कें, पुल, कार्यालयीन भवन एवं लक्ष्मीश्वर विलास महल का निर्माण शुरु हुआ जिसका मुख्य श्रेय महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह को जाता है ।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/14.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7863" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/14.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/14-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/14-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/14-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/14-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह का शासन काल मिथिला में सृजनकारी युग की शुरुआत मानी जाती है। शास्त्रीय और आधुनिक शिक्षा से परिपूर्ण महाराजा साहब ने अपने निर्देशन में निर्मित स्थापत्यकृतियों में इस सामंजस्य का समावेश किया । सर्वप्रथम इन्होंने एक दो महला चतुः साल महल बनवाया जिसे आनन्दबाग पैलेस या लक्ष्मेश्वर विलास पैलेस भी कहते हैं। सम्प्रति इसमें कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय कार्यरत है। इसकी फर्श एवं सीढ़ियों के निर्माण में इटालियन तथा मकराना के संगमरमर का प्रयोग है। यहाँ तक कि इसके रेलिंग भी इंगलैण्ड से मँगवाये गये थे। यह महल कला की दृष्टि से समन्वयात्मक शैली का है। क्योंकि मध्यकालीन एवं आधुनिक स्थापत्य शैली के साथ-साथ पाश्चात्य शैली का समन्वय भी इसमें है। </p>
<p>इसकी मीनार घड़ी, यूरोपियन बुर्ज, खुला-खुला सा माहौल, पोर्टिको, बाल्कनी, साज-सज्जा आदि यूरोपियन स्थापत्य से प्रभावित हैं। जबकि इसकी छत सपाट है। इसका पूर्ण स्वरूप चतुःसाल है- जो हिन्दू स्थापत्य शैली से मिलता है। इसका प्रमुख आकर्षण केन्द्र इसका दरबार हाल है। इसकी छत के भीतरी हिस्से ज्यामितीय चित्रण से सुसज्जित हैं। प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी सफेद परियाँ इस तरह से व्यवस्थित की गई हैं जैसे उन्होंने ही छत को अपने हाथों में उठा रखा हो । महल के चारों ओर पचास एकड़ क्षेत्र में वानस्पतिक तथा जैविक उद्यान लगाए गये। पुनः दरभंगा स्थित रामबाग प्रांगण के भीतर दिलखुश बाग के पूर्वी कोने पर इन्होंने एक सुन्दर दुर्गा मन्दिर बनवाया। यह एक छोटा किन्तु नागर शैली के आधार पर बना आकर्षक मन्दिर है। सीढ़ी से ऊपर चढ़ने पर खुला आयताकार बराम्दा है। </p>
<p><strong>पुनः छतोच्छादित अन्तराल और फिर प्रदक्षिणा-पथ के लिए काफी जगह छोड़ी गयी है। शिखर पर आमलक एवं क्रमशः छोटे होते गये कलशों की सजावट है। आयताकार अधिष्ठान पर स्थापित इस दुर्गा मन्दिर के चारों कोनों पर चार लघु देवालय भी स्थापित हैं। इन देवालयों की स्तूपी भी मुख्य देवालय की स्तूपी के समान ही कलात्मक है। इस मन्दिर की दीवारों पर वानस्पतिक नक्काशी उकेरी गयी है। तथा कहीं-कहीं मछली के जोड़े भी दर्शाये गये हैं। इसकी फर्श काले तथा सफेद पत्थर की बनी है जो भ्रम उत्पन्न करती है शतरंज की खुली बिसात का। इस मन्दिर में अन्तराल के ऊपर की झीरियों पर कुल तीन जगहों पर एम०एल० और एस० एक दूसरे पर प्रत्यारोपित कर व्यवस्थित हैं। यह महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के पूर्ण नाम का लघु रूप है। इसके ठीक सामने एक तलैया है जो इसकी रमणीयता को बढ़ाती है। सुर्खी, चूने और ईंट से बने इस मन्दिर को पूर्णतः भारतीय कारीगरों ने नागर शैली में बनाया है।</strong></p>
<p>महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के उत्तराधिकारी इनके छोटे भाई महाराजा रमेश्वर सिंह थे। इनका शासन काल स्थापत्य कला के विकास के दृष्टिकोण से राज दरभंगा का स्वर्णयुग था। यूँ तो उन्होंने मिथिला एवं सम्पूर्ण राष्ट्र के स्तर पर विविध नगर एवं धार्मिक स्थलों पर देवालय, भवन आदि के निर्माण कार्य को अन्जाम दिया, किन्तु विशेष रूप से राजनगर उनका सर्वाधिक प्रिय स्थल था। एक तो यह उन्होंने अपने भाई के शासन काल में बाबुआना के रूप में प्राप्त किया था, दूसरे वे इसे अपनी राजधानी बनाना चाहते थे । राजनगर को वे एक श्स्वप्निल नगरश् बनाना चाहते थे । सच पूछा जाय तो वृहत् स्तर पर मुगल सम्राट अकबर के लिए जो महत्व फतेहपुर सिकरी का था- लघु स्तर पर महाराजा रमेश्वर सिंह के लिए बहुत हद तक राजनगर का भी वही स्थान था । वस्तुतः इनके समय में यह नगर मिथिलांचल का फतेहपुर सिकरी ही था । कमला नदी के तट पर बसे इस नगर का प्रायः कोई विशेष तांत्रिक महत्व रहा होगा कि महाराजाधिराज ने इसे अपनी राजधानी बनाना चाहा। राजनगर का किला, राजमहल, सचिवालय एवं पुस्तकालय भवन, विविध मन्दिर आदि कला के सुन्दर नमूने थे। राजनगर का मुख्य महल म०म० मुकुन्द झा के अनुसार आज से लगभग सौ वर्ष पहले अठारह लाख रुपये से अधिक लागत में बना था। इस महल की दीवारों पर भी अधिकांश स्थल पर बेलबूटे के उकेरण हैं। इसकी मुख्य मीनार पाँच तल्ले की थी। किन्तु यह 1934 के विनाशकारी भूकम्प में ध्वस्त हो गयी।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/15.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/15.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7864" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/15.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/15-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/15-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/15-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/15-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>मीनार के ऊपरी भाग में स्तूपी तथा स्तूपी के ऊपर छतरी का नियोजन था । मुख्य महल मूलतः तीन तल्ला था। मध्य एवं मुख्य शीर्ष भाग था। ऊपर के स्तूपी पर दो कलशों का नियोजन था। इस महल में हिन्दू, इस्लामिक और पाश्चात्य स्थापत्य शैली का स्पष्ट समन्वय परिलक्षित होता है । सुर्खी-चूने की जोड़ाई, ईट, संगमरमर तथा अन्य पत्थरों का प्रयोग, देशी-विदेशी अभियन्ताओं का निर्देशन, स्थानीय एवं बाहरी कारीगरों की कुशलता और सबसे बढ़कर इसके निर्माता महाराजाधिराज रमेश्वर सिंह की कल्पना- इन सबों ने मिलकर इस महल को वह रूप दिया कि आज इसका खंडहर भी पर्यटकों और स्थापत्य कला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए काफी है। यूँ तो इस महल के एक-एक कक्ष की अपनी विशेषता और सुन्दरता थी किन्तु इसका दुर्गा हॉल और दरबार कक्ष अपने सजावटी अलंकरण के कारण सुन्दरतम भाग माना जा सकता है । दुर्गाकक्ष की विशेषता है कि आप ऊपर की छत पर चित्रित देवी दुर्गा की ओर कक्ष के भीतर किसी भी भाग से देखेंगे तो वह आपको ही देखती प्रतीत होंगी । इस महल का मुख्य दरवाजा चार विशालकाय हाथी पर टिका है जो इसकी भव्यता को बढ़ाता है।</p>
<p>रमेश्वर सिंह को ही इस बात का श्रेय है कि उन्होंने मिथिला क्षेत्र में पहला दक्षिण भारतीय शैली का मन्दिर शिव-मन्दिर के रूप में बनवाया। यह मन्दिर विविध सजावटी डिजाइनों से युक्त मेहराबदार स्तम्भों पर आधारित था। इसके नियोजन में बाहरी रूप-रेखा बड़े स्पष्ट तथा प्रभावशाली ढंग से उभरी थी। इस आयताकार मन्दिर के हर तरफ रथिका तथा अनेक अस्त्रों (बाहर निकलते हुए कोणों) का नियोजन था। इस मन्दिर की बनावट यहाँ बने मन्दिरों की बनावट से बिल्कुल अलग थी। </p>
<p><strong>बिहार अर्थक्वेक एण्ड द दरभंगा राजश् (कुमार गंगानन्द सिंह, दरभंगा राज, 1936) तथा कैमरा चित्र एवं चलचित्र- राजनगर की जो तस्वीर पेश करते हैं- वह वर्णनातीत हैं। महाराज साहब ने यहाँ गणेश, दुर्गा, सूर्य, राजराजेश्वरी, अर्द्धनारीश्वर, त्रिपुरसुन्दरी, काली आदि मन्दिर भी बनवाये जो नागर शैली के अनुरूप हैं । किन्तु श्वेत संगमरमर से निर्मित काली मन्दिर अद्भुत है। एक छह फूट ऊँचे अधिष्ठान पर अवस्थित इस मन्दिर का प्रवेश द्वार चार स्तम्भों को छतोच्छादित कर बनाया गया है। इस काल में मिथिलांचल में बनने वाले मन्दिर, भवन आदि के दरवाजे, खिड़की आदि नीचे से ऊपर खड़ी रेखा की तरह बढ़ते थे और पुनः एक निश्चित ऊँचाई के बाद उलटे अर्द्धचन्द्र का आकार ले लेते थे । भारत में इसका प्रचलन ईस्वी सन् के पहले से था। इस मन्दिर में प्रवेश द्वार से ऊपर चढ़ने पर खुला स्थान तथा फिर वर्गाकार मण्डप का आयोजन है।</strong></p>
<p>इसका उत्थापन एक विशाल शिवलिंग की तरह हुआ है जो शिखर पर आमलक से सुसज्जित है । छतोच्छादित प्रदक्षिणा पथ के मध्य आयताकार गर्भ-गृह है जिसका स्थापन एक खड़ी स्तूपी की तरह है जो शिखर पर आमलक से सजायी हुई है। इस मन्दिर के चारों कोने पर अपेक्षाकृत पतली एवं खड़ी स्तूपी का नियोजन है। 1934 के भूकम्प में यह ध्वस्त हो गया था किन्तु महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने 1935-36 में ही इसका पुनर्निमाण करवाया ।</p>
<p>राजनगर में रमेश्वर सिंह ने एक विशाल पुस्तकालय, कार्यालय-भवन एवं अनेक भवन विविध प्रयोजनार्थ बनवाये। इसके अतिरिक्त इन्होंने दरभंगा में रामबाग परिसर के भीतर कंकाली मन्दिर, इन्द्र भवन आदि का निर्माण करवाया । दरभंगा में ही माधवेश्वर प्रांगण के भीतर रुद्रेश्वरी काली, लक्ष्मीश्वरी तारा एवं दुर्गा पंचायतन मन्दिर बनवाया । मधुबनी में प्रसिद्ध श्यामा मन्दिर एवं इसके निकट भौरागढ़ी में गुह्यकाली मन्दिर बनवाया । पटना में काली मन्दिर एवं दो भव्य भवनों का भी निर्माण करवाया। कलकत्ता, इलाहाबाद, लाहौर, कनरवल, मुजफ्फरपुर, शिमला, बनारस, खड़गपुर आदि प्रसिद्ध शहरों में भी मन्दिर बनवाए जो नागर शैली पर आधारित हैं ।</p>
<p>इनके उत्तराधिकारी तथा दरभंगा राज के अंतिम शासक महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह का शासन काल आधुनिक तथा परम्परागत शैली के समन्वय का काल था। चूँकि आधुनिक तकनीक एवं साधन अपेक्षाकृत आसानी से अब उपलब्ध थे- अतः सुदृढ़, सुन्दर, सुव्यवस्थित एवं सुविधाजनक भवनों का निर्माण इस काल में हुआ। महाराजाधिराज ने इस काल में स्थापत्य सन्दर्भित दो तरह के कार्यों को अंजाम दिया- नव निर्माण तथा पुनर्निर्माण । पुनर्निर्माण इसलिए भी महत्वपूर्ण कदम था कि 1934 के विध्वंसकारी भूकम्प ने दरभंगा तथा उसके निकटवर्ती विविध भवनों को इस तरह क्षति पहुँचायी कि उनका अस्तित्व ही पुनर्निर्माण के अभाव में लोप हो जाता । दरभंगा का लक्ष्मीश्वर विलास भवन हो या कंकाली मन्दिर, राजनगर का रमेश्वर विलास महल हो या फिर संगमरमर का काली-मन्दिर- छोटे-बड़े अधिकांश भवन एवं मन्दिर भूमिसात हो गये थे । नवनिर्माण इसलिए आवश्यक हो गया था कि आने वाले दिनों में फिर कोई प्राकृतिक आपदा राज निर्मित भवनों को क्षति न पहुँचा सके । प्रशासनिक विस्तार एवं विकास के कारण भी यह जरूरी हो गया था। इसके अन्तर्गत नरगौना महल, विशेश्वर विलास महल (बेला पैलेस), सचिवालय भवन, माधवेश्वर प्रांगण स्थित सुविख्यात श्यामा मन्दिर, पटना, दिल्ली, शिमला कलकत्ता आदि स्थानों पर श्दरभंगा हाउसश्, प्रशासनिक प्रयोजनार्थ राजदरभंगा क्षेत्र एवं इसके बाहर भी अनेक भवनों का निर्माण हुआ। राम बाग के विशाल किले का निर्माण भी पुनर्निर्माण की ही एक कड़ी थी। दरभंगा को एक आधुनिक आदर्श नगर बनाने की योजना भी बनायी गयी ।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/16.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/16.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7865" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/16.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/16-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/16-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/16-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/16-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>भवन-निर्माण के क्षेत्र में राज दरभंगा के लिए यह एक सर्वथा नया युग था- तकनीक, साधन और शैली- तीनों ही दृष्टिकोण से । अब स्टील फ्रेम, सिमेन्ट मोर्टार, बालू आदि ने सुर्खी-चूने आदि का स्थान ले लिया । नरगौना और बेला पैलेस तथा सचिवालय एवं यूरोपियन अतिथि-गृह जैसे भवनों को छोड़कर एकतल्ला भवन निर्माण पर बल दिया गया ताकि भूकम्प का प्रभाव कम हो। मेहराब, परकोटा, और पारम्परिक अलंकरण के स्थान पर सादगीपूर्ण सवं सुविधानुकूल सुदृढ़ भवन बनने लगे । प्रत्येक भवन की मुख्य संरचना की नींव एक ही इकाई के रूप में होने लगी। भवन भी यथा-सम्भव एक ही इकाई के रूप में संरचित होने लगे। 1934 के भूकम्प से भयभीत अभियन्ताओं ने भूकम्प सिद्ध भवन संरचना हेतु दो तरह के तकनीक अपनाये- प्रथम, रीइन्फोर्स्ड कन्करीट फेम तकनीक तथा द्वितीय, स्टील फ्रेम तकनीक । पुनः इनकी छत भी रीइन्फोर्स्ड कन्करीट से ढाली जाती थी ।</p>
<p><strong>पुराने नरगौना पैलेस (छत्र-विलास पैलेस) के स्थान पर नया महल बनवाया गया। स्वयं महाराज साहब ने अपने निर्देशन में मैकिन्टोशबर्न कम्पनी की अभियांत्रिकी सेवा से इसका निर्माण करवाया। इसका रंग-रोगन राजदरभंगा के मुख्य प्रबन्धक जी०पी० डेनबी के निर्देशन में हुआ। इसकी फर्निशिंग कलिम्पोंग आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स कम्पनी के माध्यम से हुआ । इस दो महले महल के मुख्य ड्राईंगरूम की छत मध्य स्थल में स्तूपीनुमा हो गयी है जिसमें कई जगह मोटे शीशे जड़े हैं जिनसे छनकर सूर्य की रोशनी और चाँद की चाँदनी भीतर कक्ष को आलोकित करती है । विशाल बाग, टेनिस कोर्ट, स्वीमिंग पुल, रेलवे सैलून पड़ाव आदि सुविधा से युक्त यह महल तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में अपने जरें-जरें से आधुनिकता की झलक प्रस्तुत करता है । सुरुचिपूर्ण कलाकारिता के बावजूद, इस महल की विशेषता इसकी सादगी है । सम्प्रति इसमें ल०ना० मिथिला विश्वविद्यालय के विविध विभाग अवस्थित हैं ।</strong></p>
<p>1936 में ही विशेश्वर-विलास महल की नींव पड़ी जो 1940 में बनकर तैयार हुआ । यह महल अपने छोटे भाई राजाबहादुर विशेश्वर सिंह के निवासार्थ नरगौना के निकट ही महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने बनवाया था । स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से यह यूरोपियन भवन शैली से प्रभावित है। इस दो महले महल का मूल ढाँचा स्टील फ्रेम पर आधारित है । इसके ऊपरी तल्ले की छत कोणीय है तथा सीमेन्ट के टाइल्स खपड़े की डिजाइन से सुशोभित है। इसकी सीढ़ी और फर्श पर संगमरमर का प्रयोग है। इससे सटे एक जनाना तरणताल का आयोजन है जो छतोच्छादित है और मुख्य महल से इस तक पहुँचने के लिए भूमिगत पथ की व्यवस्था थी। इस महल के चारों ओर विस्तृत जैविक उद्यान लगा हुआ था, जो अब लगभग विलुप्त हो चुका है, किन्तु महल पूर्णतः सुरक्षित है। सम्प्रति इसमें डाक प्रशिक्षण केन्द्र है। मेसर्स मैकिन्टोश बर्न एण्ड कम्पनी ने अपनी अभियांत्रिकी सेवा इसके निर्माण में प्रदान की थी ।</p>
<p>इसी कम्पनी ने योजनाबद्ध तरीके से दरभंगा राज का मुख्य कार्यालय भवन, तोषखाना (ट्रेजरी) तथा महाफीसखाना (रेकॉर्डरूम) आदि महाराज साहब के अनुसार बनाया था । सर आशुतोष मुखर्जी के पुत्र बामा प्रसाद मुखर्जी के निर्देशन में मेसर्स ब्रिटेनिया बिल्डिंग्स ने राज पुस्तकालय के भवन-निर्माण में अपनी अभियांत्रिकी सेवा प्रदान की थी। कोलेनल टेम्पल ने रमेश्वर प्लेस (चैरंगी) का डिजाइन तैयार किया था जिसे मैकिन्टोश बर्न ने आकार प्रदान किया था । मेसर्स मार्टिन एण्ड कम्पनी महाराजा साहब के निर्देशानुसार लेडी विलिंगडन अस्पताल भवन बनाया था जो अभी कामेश्वर सिंह चेरिटेबिल अस्पताल के रूप में है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/10.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7866" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/10.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/10-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/10-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/10-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/10-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>छोटे-बड़े सभी राजे-रजवाड़ों में किला निर्माण की एक परम्परा सी रही है और इसी कड़ी में महाराजा कामेश्वर सिंह ने 1945-46 में एक भव्य और विशाल किला-निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया । इसकी तकनीक और निर्माण-कार्य का प्रभार भी मैकिन्टोश बर्न को सौंपा गया। जहाँ इसकी ऊँचाई चालीस फीट तक है, वहीं इसकी मोटाई आधार स्थल में चालीस ईंच तक है। पहरेदारों के निरीक्षणार्थ जगह-जगह पर सुअलंकृत छतरीनुमा चैकी का आयोजन है। इसका कलात्मक एवं भव्य मुख्यद्वार मुगल-स्थापत्य शैली से प्रभावित है। द्वार-निर्माण में लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है । नागरिक असुविधा कानून के अन्तर्गत इसका निर्माण पृष्ठभाग से अपूर्ण रहा किन्तु इसकी भव्यता दर्शनीय है ।</p>
<p><strong>खण्डवला कुल के इस अंतिम महाराजाधिराज ने अपने पिता की स्मृति में 1932 ई० में रमेश्वरी श्यामा मन्दिर का निर्माण करवाया जो नागर-शैली पर आधारित है। चार फीट ऊँचे आयताकार अधिष्ठान पर अवस्थित इस मन्दिर के गर्भ-गृह की अनुप्रस्थिका वर्गाकार है। उत्थापन उत्तरोत्तर क्षीण होता गया है तथा शिखर के शीर्ष पर कलश का आयोजन है। मुख्य शिखर पर अंग-शिखरों का सुन्दर नियोजन है । माधवेश्वर प्रांगण में स्थित इस मन्दिर का प्रदक्षिणा-पथ एवं अन्तराल भी नागर-शैली के अनुरूप छतोच्छादित है। इसके नियोजन में बाह्य रूप-रेखा अपेक्षाकृत स्पष्ट और प्रभावशाली रूप से उभरी है। विशेषकर बाहर निकले हुए कोणों का नियोजन महत्त्वपूर्ण है। यह मन्दिर दरभंगा और उसके निकटवर्ती नगरवासियों के आकर्षण का केन्द्र है।</strong></p>
<p>इन भवनों और मन्दिरों के अतिरिक्त सैकड़ों छोटे-बड़े भवनों का निर्माण दरभंगा तथा इसके आस-पास, महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने करवाया। वर्तमान में इनका उपयोग विभिन्न सार्वजनिक कार्यालयों, शिक्षण-संस्थानों, शिक्षालय तथा चिकित्सालय के रूप में किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि सड़क, जल-निकासी माध्यम और भवन-निर्माण का नियोजन- इन तीनों का समायोजन कुछ इस तरह हुआ कि दरभंगा अपने जमाने का एक आदर्श बन गया । किन्तु त्रासदी इस बात की है कि हम कुछ नया और बेहतर तो कर नहीं पा रहे हैं- नागरिक और सरकारी स्तर पर &#8211; जो धरोहर दरभंगा राज ने हमें दी, उसकी भी रक्षा नहीं हो पा रही है। इतिहास, पर्यटन जनित उद्योग और इस महान राजवंश से मिली विरासत का सम्मान- प्रत्येक दृष्टिकोण से इनकी रक्षा करना अनिवार्य है । अस्तु, राज दरभंगा के सौजन्य से बने भवन, मन्दिर आदि की स्थापत्य कला का निचोड़ यही है कि ये, प्रभावशाली अलंकरण, आनुपातिक, सौम्यता, नियोजन में वास्तुकला की अन्तर्भूत शक्ति, संतुलन के रूप एवं समन्वयात्मक शैली के आदर्श उदाहरण हैं।</p>
<p>क्रमशः &#8230;..</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/do-the-generations-of-the-darbhanga-raj-know-about-its-architectural-heritage-perhaps-not">सरकार बनाम स्वयं-भू सरकार (भाग-2) ✍ दरभंगा राज के स्थापत्य धरोहर को दरभंगा राज की पीढ़ी जानती हैं? शायद नहीं 😢 कला, संस्कृति और गरिमा की बात करने पर लोग हँसते हैं 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>दरभंगा राज: &#8216;सरकार&#8217; बनाम &#8216;स्वयंभू सरकार&#8217; (भाग-1) ✍ वह &#8216;सरकार&#8217; है, &#8216;कुछ भी&#8217; कर सकती है, &#8216;राजनगर&#8217; क्या &#8216;रामबाग&#8217; पर भी आधिपत्य जमा सकती है &#8211; इतिहास गवाह है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/government-vs-self-proclaimed-government-part-1</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 Sep 2026 11:56:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा / पटना : सरकार &#8216;सरकार&#8217; होती है। &#8216;सत्ता&#8217; और &#8216;कानून&#8217; सरकार को &#8216;राष्ट्र के हित&#8217; में कोई भी कार्य करने का सर्वाधिकार देता है। आज़ादी के चौथे वर्ष 1951 में भारत के संविधान में पहला संशोधन किया गया था, जिसमें अन्य बातों के अलावे &#8216;भूमि सुधार&#8217; का मामला प्रमुख था, जो अंततः जमींदारी प्रथा [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/government-vs-self-proclaimed-government-part-1">दरभंगा राज: &#8216;सरकार&#8217; बनाम &#8216;स्वयंभू सरकार&#8217; (भाग-1) ✍ वह &#8216;सरकार&#8217; है, &#8216;कुछ भी&#8217; कर सकती है, &#8216;राजनगर&#8217; क्या &#8216;रामबाग&#8217; पर भी आधिपत्य जमा सकती है &#8211; इतिहास गवाह है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा / पटना : सरकार &#8216;सरकार&#8217; होती है। &#8216;सत्ता&#8217; और &#8216;कानून&#8217; सरकार को &#8216;राष्ट्र के हित&#8217; में कोई भी कार्य करने का सर्वाधिकार देता है। आज़ादी के चौथे वर्ष 1951 में भारत के संविधान में पहला संशोधन किया गया था, जिसमें अन्य बातों के अलावे &#8216;भूमि सुधार&#8217; का मामला प्रमुख था, जो अंततः जमींदारी प्रथा की समाप्ति पर विराम लिया। विगत माह हम जश्ने आज़ादी का 80 वां वर्षगाँठ मनाये है और अब तक देश के संविधान में कुल 106 संशोधन हुए हैं। यानी औसतन प्रतिवर्ष 1.3 का संशोधन अनुपात है &#8211; आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। </strong></p>
<blockquote><p>अगर सरकार देश को आज़ाद होने के कुछ समय बाद ही, राष्ट्र हित को सामने लाकर स्वतंत्र भारत के सैकड़ों जमींदारों की जमींदारी &#8216;जब्त&#8217; कर सकती है, बैंकों का &#8216;राष्ट्रीयकरण&#8217; कर सकती है, निजी क्षेत्र के हज़ारों कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर सकती है, बैंको का विलय कर सकती है &#8211; तो दरभंगा के संतानहीन महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह (अब दिवंगत) द्वारा अपने अनुज राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह (अब दिवंगत) को कल के दरभंगा और आज के मधुबनी जिला में स्थित राजनगर परिसर पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर सकती? इसमें कौन सी बड़ी बात है ?  वह &#8216;सरकार&#8217; है, कुछ भी कर सकती है &#8211; इतिहास गवाह है। </p></blockquote>
<p>&#8216;सरकार&#8217; और सरकार में बैठे लोग उन दिनों भी &#8216;आर्थिक सत्ता के केन्द्रीयकरण के खिलाफ थे,&#8217; आज समय के साथ-साथ सोच में भी आमूल परिवर्तन हुआ है। आज भी नहीं चाहते कि किसी एक व्यक्ति अथवा ट्रस्ट के अधीन कई हज़ार करोड़ की संपत्ति केंद्रित&#8217; रहे &#8211; चाहे वह पुस्तैनी धन ही क्यों न हो। स्वाभाविक है मधुबनी के राजनगर परिसर पर सत्ता में बैठे लोगों की नजर टिकेगी ही  &#8211; 369 एकड़ जमीन कम नहीं होती और इस जमीन को दरभंगा के वर्तमान “स्वयंभू सरकार” अपनी मेहनत से अर्जित नहीं किए हैं। स्वाभाविक है कुछ नियम भी बनेगा, कुछ नियमों में संशोधन भी होगा और &#8216;स्वयंभू सरकार&#8217;  चापलूसों और चाटुकारों के बीच बैठकर दरभंगा राज की गरिमा की बात, संस्कृति की बात करते रहेंगे &#8211; दुखद है।<br />
 <br />
<figure id="attachment_7821" aria-describedby="caption-attachment-7821" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7821" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7821" class="wp-caption-text">राजनगर का अवशेष &#8211; यह मानसिकता का जीवंत दृष्टान्त है</figcaption></figure></p>
<p>श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर सम्राट चौधरी तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे लोग या फिर मिथिला संसदीय क्षेत्रों &#8211;  दरभंगा, मधुबनी, झंझारपुर, समस्तीपुर, मधेपुरा, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, भागलपुर, कटिहार, खगरिया, मुंगेर आदि &#8211; से चुनकर भारत के संसद में या फिर मिथिला क्षेत्र के सैकड़ों विधान सभा क्षेत्रों से चुनकर बिहार के विधान सभा में बैठे सम्मानित विधायकगण अपने-अपने क्षेत्र के मतदाताओं के लिए, क्षेत्र के विकास के लिए, शिक्षा के लिए, उद्योगों की स्थापना के लिए, रोजगार के लिए इन आठ दशकों में क्या किये? यह तो प्रदेश के मतदाता अधिक जानते हैं। </p>
<p><strong>मिथिला विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक आर्यावर्तइंडियननेशन(डॉट)कॉम से कहते हैं: &#8220;सनद रहे: अगर कोई मैथिल अथवा गैर-मैथिल मैथिली भाषा में मुस्कुराकर बात कर रहे हैं, राजनेता हैं, तो इस बात से कदापि भ्रमित नहीं हो कि वे वास्तविक रूप से मिथिला का विकास चाहते हैं। वे स्वहित में बरगला रहे हैं। आज मिथिला क्षेत्र में ऐसे लोगों की किल्लत नहीं, बाढ़ है।&#8221;</strong></p>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;वैसे इस बात से भली भांति परिचित होने के बाद भी की आज न मिथिला में &#8216;पोखर है (अधिकांश बिक गए या भूमाफियाओं ने मिट्टी भरकर मकान बना दिए, न माँछ है (दक्षिण भारत से आयात होता है), मखान अब पोखर में नहीं बल्कि खेतों में व्यवसाय के लिए पैदा होता है, मधुर वाणी की किल्लत हो गयी है; फिर भी &#8220;पग पग पोखर, माछ-मखान,मधुर वाणी, मुख मेँ पान, ई थिक मिथिला के पहचान&#8221; फकरा गाते लोग थक नहीं रहे हैं।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7822" aria-describedby="caption-attachment-7822" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7822" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7822" class="wp-caption-text">राजनगर का अवशेष &#8211; यह मानसिकता का जीवंत दृष्टान्त है</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, बिहार का पहला मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक थे । इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। फिर बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968 तक, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968 तक, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968 तक, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972 तक, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969 तक, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक और कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। </p>
<p>कर्पूरी ठाकुर के बाद आये केदार पांडे जो 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973 तक मुख्यमंत्री थे। इनके बाद अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक, डॉ. जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980 तक, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985 तक, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988 तक, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 तक, सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक, डॉ. जगन्नाथ मिश्रा 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक मुख्यमंत्री रहे।<br />
 <br />
डॉ. मिश्र कांग्रेस युग के अंतिम कड़ी थे। उनके बाद आ गए लालू प्रसाद यादव 10 मार्च 1990 से 25 जुलाई 1997 तक, राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 2 मार्च 2000 फिर 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक, नितीश कुमार बीच में आठ दिन के लिए (3 &#8211; 11 मार्च  2000) फिर 24 नवम्बर 2005 से 20 मई 2014 फिर 22 फरवरी 2015 से 15 अप्रैल 2026 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। हां बीच में 20 मई 2014 से 22 फरवरी 2015 तक जीतन राम मांझी भी मुख्यमंत्री बने। विगत 15 अप्रैल 2026 से सम्राट चौधरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के कृपा से मुख्यमंत्री कार्यालय में उपस्थित हुए। इस बात से कटाई इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार विधानसभा की कुल 243 की संख्या में भारतीय जनता पार्टी (89 विधायक) और जनता दल &#8211; यूनाइटेड के (85-विधायक) के कुल 174 विधायकों में कई ऐसे विधायक हैं जो मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। खैर। </p>
<figure id="attachment_7823" aria-describedby="caption-attachment-7823" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7823" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7823" class="wp-caption-text">राजनगर: मानसिकता का दृष्टान्त </figcaption></figure>
<p>समयांतराल सत्ता के गलियारे में बैठे लोग टकटकी निगाहों देख रहे हैं अथवा दरभंगा राज की सम्पत्तियों पर मालिकाना हक़ रखने वाले अवसर की तलाश में हैं। कुमार शुभेश्वर सिंह के कालखंड में दरभंगा राज का क्या हश्र हुआ, मिथिला के लोग देखे हैं और उनकी मृत्यु के बाद क्या हश्र हुआ, हो रहा है &#8211; यह भी मिथिला के लोग गवाह बन रहे हैं। </p>
<p><strong>विगत दिनों जब प्रदेश के मुख्यमंत्री राजनगर आये थे, यह जानते हुए भी कि &#8216;यह संपत्ति और रास्ता आम नहीं है,&#8217; संपत्ति के वर्तमान मालिक को बुलाने के बारे में सोचे भी नहीं। कहते हैं कि स्थानीय नेता उनके भ्रमण के अंतिम क्षण में राजनगर के एक अधिकारी को फोन कर सूचना दिए कि &#8216;आप आ जाएँ&#8217; &#8211; यह मानसिकता को भी दर्शाता है और यह भी बताता है कि आपकी संपत्ति होने के बाद भी सत्ता के गलियारे में आपका क्या महत्व है। यह इस बात का द्योतक है कि राजनगर परिसर के मालिक से प्रदेश की नेताओं की क्षमता अधिक है। जिला प्रशासन, जानकारी के वावजूद सरकार के सामने कुछ नहीं कर सकती है।</strong></p>
<blockquote><p>दिवंगत राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पौत्र और कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र कपिलेश्वर सिंह को इस कहानी को लिखने से पहले कई संवाद उनके मोबाइल पर दिए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। रत्नेश्वर सिंह से जब पूछा की क्या वे राजनगर संपत्ति के मामले में वे कुछ सोच रहे हैं? उनका कहना था की उनमें उतनी शक्ति नहीं है कि वे वे इस दिशा में कोई पहल कर सकें। कुछ समय पहले वे न्यायालय में एक मुकदमा किए थे, लेकिन बाद में उसे निष्क्रिय कर दिए। वैसे दरभंगा राज और उसकी सम्पत्तियों पर महाराजा की अंतिम सांस से कोई दो महीने पहले से ही तत्कालीन राजनेताओं की नजर अटक गयी थी। आज महाराजा की मृत्यु के 62 साल बाद अगर दरभंगा के रास्ते पटना और दिल्ली तक के नेताओं की नजर टिकी है तो इसमें नया क्या है? </p></blockquote>
<figure id="attachment_7824" aria-describedby="caption-attachment-7824" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7824" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7824" class="wp-caption-text">राजनगर: मानसिकता का दृष्टान्त </figcaption></figure>
<p>उन दिनों भी दरभंगा राज परिवार के लोगों के साथ-साथ मिथिला के लोग, जो दरभंगा राज के करीबी कहते थे, दरभंगा के राजा के नहीं हुए थे, आज तो हैं ही नहीं। उन दिनों भी दरभंगा राज में, महाराजा के आसपास चापलूसों, चाटुकारों, हामी भरने वालों की लम्बी कतार थी; आज तो फ़ौज बनी है। सवाल कई हज़ार करोड़ का यह है कि क्या संतानहीन दिवंगत महाराजा के अनुज राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह के पौत्र और कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र द्वय सत्ता से लड़कर राजनगर स्थित ऐतिहासिक परिसर को बचाने की क्षमता रखते हैं? या फिर बंद कमरे में राजनेताओं के साथ हाथ मिलकर राजनगर की संपत्ति को सुपुर्द करने की योजना बनाकर समाज और लोगों के बीच &#8216;घड़ियाली आंसू&#8217; बहाकर &#8216;सांत्वना बटोरने का प्रयास कर रहे हैं? मिथिला के लोग अधिक ज्ञानवर्धन करेंगे क्योंकि अन्य सम्पत्तियों के अलावे महाराजा द्वारा स्थापित &#8216;आर्यावर्त&#8217; और &#8216;इंडियन नेशन&#8217; अखबारों का नामोनिशान मिटना, भवन को बिल्डर के हाथ बेचकर सैकड़ों लोगों को सड़क पर लाने का दृष्टान्त भी बहुत पुराना नहीं है।  </p>
<p>आज़ाद भारत के तीसरे, बाइसवें, चौब्बीसवें, और छब्बीसवें वर्षों में जब भारत की सरकार कानून के तहत जमींदारी प्रथा को समाप्त की, बैंकों का, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण की तो देश के लोग क्या कर लिए? या जब जमींदारी प्रथा की समाप्ति हुई तो दरभंगा के राजा भले न्यायालय में मुकदमा लड़े, लेकिन दरभंगा अथवा मिथिला के कितने लोग आगे आये जमींदारी बचने के लिए? शायद कोई नहीं। और अंततः महाराजा की मृत्यु होने के बाद, और फिर उनकी पत्नियों की मृत्यु होने के बाद दरभंगा राज का क्या हश्र हुआ, हो रहा है &#8211; सबों के सामने है। </p>
<p><strong>भारत की आजादी के बाद, राज्य सरकार ने जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने के लिए बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 लागू किया। 25 सितंबर, 1950 को बिहार सरकार ने इस अधिनियम के तहत एक आधिकारिक अधिसूचना जारी की, जिससे दरभंगा राज की विशाल ज़मीनें तुरंत राज्य के अधिकार में आ गईं। तत्कालीन और अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह ने इस ज़ब्ती को ज़ोरदार तरीके से चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने शुरू में इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसके बाद भारतीय संसद ने 1951 में भारत के संविधान का पहला संशोधन पारित किया (जिसमें भूमि सुधार कानूनों की सुरक्षा के लिए नौवीं अनुसूची जोड़ी गई)। यह कानूनी लड़ाई 27 मई, 1952 को खत्म हुई, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने &#8216;बिहार राज्य बनाम दरभंगा के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह&#8217; के ऐतिहासिक मामले में भूमि सुधारों को सही ठहराया। </strong></p>
<figure id="attachment_7825" aria-describedby="caption-attachment-7825" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7825" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7825" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>हालांकि 1950 के दशक की शुरुआत में ही उनके राजस्व इकट्ठा करने के अधिकार खत्म हो गए थे, लेकिन अक्टूबर 1962 में बिना किसी उत्तराधिकारी के महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के साथ ही &#8216;राज&#8217; की बची-खुची निजी संपत्ति और ढांचागत विरासत भी पूरी तरह खत्म हो गई। इसके बाद दशकों तक पारिवारिक विवाद चले और सरकार ने धीरे-धीरे उनके बचे हुए महलों और संपत्तियों को अपने कब्जे में ले लिया। </p>
<p>आज़ादी से पहले सं 1921 में बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास का विलय होकर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया बना, जो बाद में  1955 में भारतीय स्टेट बैंक के नाम से विख्यात हुआ। 1 जनवरी, 1949 को भारत के केंद्रीय बैंकिंग संस्थान, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया का राष्ट्रीयकरण &#8216;रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (सार्वजनिक स्वामित्व में हस्तांतरण) अधिनियम, 1948&#8217; के तहत किया गया। 1 जुलाई, 1955 को &#8216;स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया अधिनियम, 1955&#8217; के तहत इंपीरियल बैंक ऑफ़ इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया और इसका नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) कर दिया गया। 19 जुलाई, 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 बड़े कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। पुनः, 15 अप्रैल, 1980 को दूसरा बड़ा दौर आया और 6 अन्य कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।</p>
<p>चौदह बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, और बाद में छह और बैंकों को इसमें शामिल किया गया। ये ज़्यादातर बड़े बैंक थे जिनका पूरे भारत में ब्रांच नेटवर्क फैला हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इन बैंकों का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए एक अध्यादेश जारी किया। उन बैंकों को चुना गया जिनका कुल जमा कारोबार ₹50 करोड़ से ज़्यादा था। इस कदम का मकसद वित्तीय समावेश को बेहतर बनाना, खेती को बढ़ावा देना और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लोन देना था। उस समय देश में कुल बैंक जमा का लगभग 80% से 85% हिस्सा इन्हीं 14 बैंकों के पास था। कोई पचपन+ साल बाद बैंकिंग क्षेत्र में 1 अप्रैल 2017, 1 अप्रैल 2019 और 1 अप्रैल 2020 कोफिर एक भूचाल आया। </p>
<figure id="attachment_7826" aria-describedby="caption-attachment-7826" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i.jpg" alt="" width="1200" height="1600" class="size-full wp-image-7826" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7826" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>सन 1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक के साथ विलय हुआ। 1 अप्रैल 2017 को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के 5 सहयोगी बैंकों (स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर) और भारतीय महिला बैंक के साथ विलय हुआ। 1 अप्रैल 2019 बैंक ऑफ बड़ौदा का देना बैंक और विजया बैंक के साथ विलय हुआ। ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का 1 अप्रैल 2020 को पंजाब नेशनल बैंक के साथ विलय हुआ। इसी तरह, केनरा बैंक का सिंडिकेट बैंक के साथ विलय हुआ। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का आंध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के साथ विलय हुआ। इंडियन बैंक का इलाहाबाद बैंक के साथ विलय हुआ। लोग क्या कर लिए?</p>
<p>भारत ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1971 और 1973 के बीच दो बड़े चरणों में अपनी कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया, ताकि श्रमिकों की सुरक्षा बेहतर हो सके, उनका शोषण रोका जा सके और उत्पादन बढ़ाया जा सके।पहला चरण (कोकिंग कोल) अक्टूबर 1971 में शुरू हुआ जब सरकार ने कोकिंग कोल खदानों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। 1 मई 1972 को &#8216;कोकिंग कोल माइन्स (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972&#8217; के तहत औपचारिक रूप से राष्ट्रीयकरण किया गया। दूसरे चरण (नॉन-कोकिंग कोल) की शुरुआत जनवरी 1973 में हुई, जब नॉन-कोकिंग कोयला खदानों का प्रबंधन अपने हाथ में लिया गया। इसे औपचारिक रूप से 1 मई, 1973 को &#8216;कोल माइन्स (नेशनलाइज़ेशन) एक्ट, 1973&#8217; के तहत राष्ट्रीयकृत किया गया। इस राष्ट्रीयकरण के साथ भारत कोकिंग कोल् लिमिटेड का गठन किया गया। लोग क्या कर लिए सरकार की ?</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7827" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>राष्ट्रीयकरण से पहले, भारत में 226 प्राइवेट कोकिंग कोल खदानें और 711 प्राइवेट नॉन-कोकिंग कोल खदानें थी, यानी कुल 937 प्राइवेट कोयला खदानें थीं। IISCO, TISCO और DVC की कैप्टिव खदानों को छोड़ कर सभी निजी खदानों का इस आधार पर राष्ट्रीयकरण कर दिया गया क्योंकि उनमें अवैज्ञानिक तरीके से खनन हो रहा था, भंडार का संरक्षण ठीक से नहीं हो रहा था, मजदूरों की सुरक्षा और रहने की स्थिति खराब थी, और प्राइवेट मालिकों की ओर से पूंजी निवेश की कमी थी।<br />
आइये फिर वापस दरभंगा चलते हैं। अपनी मृत्यु से 52-दिन पहले दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपने कलकत्ता निवास से 9 अगस्त, 1962 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह को एक पत्र लिखे थे। पत्र में महाराजाधिराज सत्येंद्र नारायण सिंह से अनुरोध किये थे कि इस पत्र की कृपया अपने पत्रांक 1945, दिनांक 11 जुलाई, 1962 का निर्देश करें। </p>
<p><strong>महाराजाधिराज लिखते हैं: “यह बात अपने कानों तक पहुंची है कि कुछ ऐसे कॉलेजों को जो संस्कृतेतर विषयों के अध्यापन करते हैं और राज्य में कार्य करने वाले क्षेत्रीय विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में उचित रूप से हैं, संस्कृत विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में लाकर इसके रूप में परिवर्तन करने की चेष्टा की जा रही है। मेरी समझ से संस्कृत विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य, पाली और प्राकृत के साथ संस्कृत का विशिष्ट ज्ञान देना होना चाहिए जिससे की प्राचीन विद्वता की रक्षा हो और यथा-संभावदयातन बनाया जा सकते। इस विश्वविद्यालय की विशिष्ट स्वरूप में रक्षा अवश्य ही होनी चाहिए। मैंने इस विश्वविद्यालय के लिए  जो दान दिया है वह इसलिए दिया कि मेरे पूज्य पिताजी की इक्षा को इससे पूर्ति होती थी।  “यदि इस विश्वविद्यालय को क्षेत्रीय सामान्य विश्वविद्यालय का रूप दिया जाएगा तो मैं समझूंगा कि मेरा दिया हुआ दान बर्बाद हो गया।” </strong></p>
<p>महाराजाधिराज आगे लिखते हैं: यदि सरकार मिथिला में एक क्षेत्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करे तो मैं इसका स्वागत करूँगा किन्तु उसे संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ किसी भी रूप में मिलाना नहीं चाहिए जो कि एक निश्चित उद्देश्य और निश्चित विचार से स्थापित किया गया है। वह विश्वविद्यालय इससे सर्वथा पृथक रहना चाहिए। इतना ही नहीं, सम्भवतः जिस लिफ़ाफ़े में महाराजाधिराज को पत्र-प्रेषित किया गया था, अथवा पत्र में सावधान किया गया था, उसमें “श्व” के स्थान पर “स्व” लिखा था। यह महाराजाधिराज को अच्छा नहीं लगा। इसलिए शिक्षा मंत्री के जवाबी पत्र में उन्होंने बहुत ही “शालीनता” के साथ लिखे: “मेरे नाम का शुद्ध विवरण ‘कामेश्वर सिंह’ है न कि ‘कामेस्वर सिंह।” मेरे पास भेजे गए विधेयक के प्रारूप पर मुझे सामान्यतः कोई टिप्पणी नहीं करनी है। किन्तु यदि इसमें कोई परिवर्तन हुआ तो स्थिति भिन्न हो जाएंगी –भवदीय, कामेश्वर सिंह। सरकार और सरकार में बैठे लोग ऐसे ही होते हैं जो &#8216;श्व&#8217; और &#8216;स्व&#8217; में फर्क नहीं समझते, साथ ही, &#8216;क्षेत्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना सम्बन्धी विचार को कूड़ेदान में फेंक देते हैं। </p>
<figure id="attachment_7827" aria-describedby="caption-attachment-7827" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7827" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7827" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>सन 1960 के 30 मार्च को महाराजाधिराज द्वारा पटना में स्थापित दि इण्डियन नेशन समाचार पत्र में “लक्ष्मी-वर-विलास-प्रसाद” को दान-स्वरुप देने के उपलक्ष्य में वहां उपस्थित महामानवों के सम्मुख, सर कामेश्वर सिंह अश्रुपूरित आखों से जो भाषण दिए थे, उस भाषण के शब्द कुछ ऐसे थे : </p>
<p><strong>डॉ जाकिर हुसैन साहब, बिहार केसरी, महिलाओं और सज्जनों !</strong></p>
<p>“जिस वस्तुओं को किसी ने अपने बाल्यकाल से ही न केवल प्यार किया हो बल्कि समादर भी किया हो, उससे अलग होना सामान्यतः दुःखद होता है, किन्तु राज्यपाल जी ने और मुख्यमंत्री महोदय ने जो संस्कृत विश्वविद्यालय का केंद्र बनाने के लिए उसे ग्रहण करने की कृपा कर, स्वयं यहां पधारने का कष्ट किया है, इससे मुझे प्रसन्नता है। </p>
<p>डॉ जाकिर हुसैन साहब, मैं आपका अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जो स्वयं आपने कृपापूर्वक आज के अपरान्ह में यहाँ पधारने का कष्ट किया। मैं अपने मुख्यमंत्री महोदय का भी आभारी हूँ, जिन्होंने न केवल मेरे अनुरोध को स्वीकार ही किया, बल्कि मिथिला में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना में गहरी दिलचस्पी ली। यदि हमारे शिक्षा मंत्री महोदय का उनके पदभार ग्रहण करने के समय से ही लगातार समर्थन और सहयोग नहीं प्राप्त होता, तो शायद यह स्वप्न साकार नहीं हो पाता। संस्कृत की विद्वता के सम्मान में आज से चार सौ वर्ष पहले हमारे पूर्वज महामहोपाध्याय महाराज महेश ठाकुर को बादशाह अकबर ने तिरहुत का राज्य दिया था। इसलिए यह बिलकुल उचित है कि हमारा संस्कृत पुस्तकालय, जिसको हमारे पूर्वजों ने वंश परंपरा से विगत शताब्दी में संघटित किया है, वह संस्कृत विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का केंद्र बने।&#8221; </p>
<figure id="attachment_7828" aria-describedby="caption-attachment-7828" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg" alt="" width="1200" height="1600" class="size-full wp-image-7828" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7828" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>&#8220;यह भी उचित है कि लक्ष्मीश्वर विलास प्रसाद जो कि केवल हमलोगों का घर ही नहीं था, बल्कि वह स्थान था, जहाँ अनेक वर्षों तक राज के अनेक प्रकार के उत्सव होते रहे, वह संस्कृत विश्वविद्यालय का स्थान बने। मुझे पूर्ण विश्वास है कि संस्कृत विश्वविद्यालय केवल जीवित ही नहीं रहेगा बल्कि इस प्राचीन भूमि में जो कुछ भी उत्तम तत्व है, उसको प्रोत्साहित करेगा और उसका उद्धार करेगा। इसी विश्वास के साथ मैं आपके हाथों में वह बहुमूल्य खजाना सौंप रहा हूँ, जो मैंने पैतृक संपत्ति के रूप में पाया है, और विश्वास करता हूँ कि आपके छत्र-छाया में संस्कृत शिक्षा की श्री-वृद्धि होगी। संस्कृत सदा अमर रहे।” </p>
<p>बहरहाल, दिनांक 30-03-1960 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री के नाम लिखे गए पत्र में महाराजाधिराज ने लिखा कि दरभंगा नगर में अवस्थित ‘लक्ष्मीश्वर – विलास’ नामक अपना प्रसाद उसके आस-पास की सम्बद्ध भूमि के साथ ‘संस्कृत विश्वविद्यालय’ के लिए दान स्वीकार किया है बशर्ते कि वह विश्वविद्यालय दरभंगे में स्थापित और अवस्थित किया जाय और चूँकि बिहार विधान सभा द्वारा दरभंगे में  इस तरह के एक विश्वविद्यालय को स्थापित करने के लिए एक अधिनियम पारित किया जा चुका है, जिसको बिहार के राज्यपाल की स्वीकृति भी प्राप्त हो चुकी है  और चूँकि बिहार राज्यपाल ने दरभंगे में इस प्रकार का एक विश्वविद्यालय अगले सत्र से स्थापित करने का प्रस्ताव किया है और चूँकि सम्बद्ध भूमि के साथ अपने उपर्युक्त भवन को दरभंगे में “संस्कृत विश्वविद्यालय के उपयोग के लिए” दान देने को इच्छुक हैं, और चूंकि दान-ग्रहीता उपर्युक्त दान को स्वीकार करने को इच्छुक हैं और चुंकि एक उचित दान पात्र लिख देना आवश्यक है, अतः यह दान-पात्र प्रमाणित करता है कि :</p>
<figure id="attachment_7828" aria-describedby="caption-attachment-7828" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg" alt="" width="1200" height="1600" class="size-full wp-image-7828" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7828" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>दरभंगा नगर में अवस्थित लक्ष्मी-वर-विलास-प्रसाद” नामक भवन, उससे सम्बद्ध भूमि जिसका सम्पूर्ण विवरण परिशिष्ट ‘ए’ में दिया गया है तथा भूमि के नक़्शे में जिसे लाल और पीले रंगों में पृथक कर दिया गया है और जिसे ‘बी’ से चिन्हित किया गया है और जो इस दान पत्र का अंग है, उसे कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, 1960 के उपबंधों के अनुसार स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय के उपयोग के लिए डाटा इसके दान ग्रहीता को हस्तान्तरित और पत्यर्पित करते हैं। दान ग्रहीता इस दान को स्वीकार करते हैं और कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, 1960 के अनुसार स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय के लिए दान-पत्र के द्वारा प्रदत भवन और भूमि का उपयोग करने को सहमत होते हैं। </p>
<p>दाता को नरगौना स्थित अपने आवासीय प्रसाद में आने जाने के मार्ग के उपयोग को अधिकार रहेगा जो मार्ग लक्ष्मीश्वर विलास-प्रसाद के सटे पूर्व से निकलता है और जिसे “बी” चिन्हित नक़्शे में पीले रामनग से पृथक दिखया गया है और उनके यातायात के अधिकार का उपयोग दाता और उनके कार्यकर्त्ता नरगौना प्रसाद में जाने-आने में कर सकते हैं। लक्ष्मीश्वर विलास प्रसाद के सटे पश्चिम में अवस्थित तलाबन के सटे दक्षिण में पश्चिम से पूर्व की ओर जाने वाली सड़क, जिसे पृथक कृत तथा बी चिन्हित नक़्शे में हरे रंग में दिखलाया गया है, विश्वविद्यालय में आने जाने वाले लोगों के उपयोग में आयेगी, किन्तु सामान्य जनता या अन्य कार्य के लिए खुली नहीं रहेगी। लक्ष्मीश्वर विलास प्रासाद के सटे पूर्व से जाने वाली सड़क पर, जहाँ दान में दी गयी भूमि का  अंत होता है, दाता एक फाटक बनवा सकते हैं। जिनके प्रमाण के रूप में यह दान पात्र लिख दिया है और दान ग्रहीता ने दान स्वीकार करने के प्रमाण में अपना हस्ताक्षर कर दिया है। </p>
<p><strong>क्रमशः&#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/government-vs-self-proclaimed-government-part-1">दरभंगा राज: &#8216;सरकार&#8217; बनाम &#8216;स्वयंभू सरकार&#8217; (भाग-1) ✍ वह &#8216;सरकार&#8217; है, &#8216;कुछ भी&#8217; कर सकती है, &#8216;राजनगर&#8217; क्या &#8216;रामबाग&#8217; पर भी आधिपत्य जमा सकती है &#8211; इतिहास गवाह है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>जिस कक्ष में पंडित नेहरू &#8216;अंतिम सांस&#8217; लिए थे, वह कक्ष, वहां रखी वस्तुएं आज भी &#8216;जीवित&#8217; है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Aug 2026 06:07:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[heritage]]></category>
		<category><![CDATA[independenmce]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[pandit jawaharlal nehru]]></category>
		<category><![CDATA[prime ministers]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>तीन मूर्ति भवन (नई दिल्ली) : &#8220;बहुत साल पहले हमने किस्मत से एक वादा किया था, और अब वह समय आ गया है जब हम अपना वादा पूरा करेंगे &#8211; पूरी तरह से नहीं, लेकिन काफी हद तक। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और आज़ादी के लिए जागेगा। इतिहास में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-room-where-pandit-nehru-breathed-his-last-is-still-alive">जिस कक्ष में पंडित नेहरू &#8216;अंतिम सांस&#8217; लिए थे, वह कक्ष, वहां रखी वस्तुएं आज भी &#8216;जीवित&#8217; है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>तीन मूर्ति भवन (नई दिल्ली) : &#8220;बहुत साल पहले हमने किस्मत से एक वादा किया था, और अब वह समय आ गया है जब हम अपना वादा पूरा करेंगे &#8211; पूरी तरह से नहीं, लेकिन काफी हद तक। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और आज़ादी के लिए जागेगा। इतिहास में कभी-कभी ऐसा पल आता है जब हम पुराने से नए की ओर बढ़ते हैं, जब एक युग खत्म होता है, और जब एक देश की आत्मा, जो लंबे समय से दबी हुई थी, अपनी आवाज़ पाती है। यह सही है कि इस खास पल में, हम भारत और उसके लोगों की सेवा और मानवता के बड़े मकसद के लिए खुद को समर्पित करने का संकल्प लें। </strong></p>
<p>इतिहास की शुरुआत में, भारत ने अपनी कभी न खत्म होने वाली खोज शुरू की थी, और सदियों का सफर उसकी कोशिशों और उसकी सफलता-असफलता की भव्यता से भरा है। अच्छे और बुरे दोनों समय में, उसने कभी उस खोज को नहीं छोड़ा, और न ही उन आदर्शों को भुलाया जिन्होंने उसे ताकत दी थी। आज हम मुश्किलों के दौर को खत्म कर रहे हैं और भारत खुद को फिर से खोज रहा है। आज हम जिस कामयाबी का जश्न मना रहे हैं, वह बस एक कदम है, एक मौका है उन बड़ी जीतों और कामयाबियों के लिए जो हमारा इंतज़ार कर रही हैं। </p>
<blockquote><p>क्या हम इतने बहादुर और समझदार हैं कि इस मौके को पकड़ सकें और भविष्य की चुनौती को स्वीकार कर सकें? आज़ादी और ताकत के साथ जिम्मेदारी भी आती है। यह ज़िम्मेदारी इस सभा पर है, जो भारत के आजाद लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक आज़ाद संस्था है। आज़ादी मिलने से पहले, हमने बहुत तकलीफ सही हैं और उन दुखों की याद से हमारे दिल भारी हैं। उनमें से कुछ तकलीफें अभी भी बनी हुई हैं। फिर भी, बीता हुआ समय बीत चुका है और अब भविष्य हमें बुला रहा है।&#8221;</p></blockquote>
<figure id="attachment_7802" aria-describedby="caption-attachment-7802" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/25-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/25-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7802" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/25-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/25-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/25-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/25-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/25-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7802" class="wp-caption-text">15 अगस्त, 1947: दिल्ली संस्करण का हिंदुस्तान टाइम्स</figcaption></figure>
<p><strong>मैं नहीं जानता की 14 अगस्त 1947 की आधी रात को संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू जिन शब्दों को &#8216;A Tryst With Destiny&#8217; पढ़कर स्वतंत्र भारत का सुस्वागतम किये थे, उन शब्दों को लिखते समय पंडित नेहरू की मानसिक स्थिति कैसी रही होगी? लिखते समय उनकी उंगलियां ख़ुशी से काँप रही थी या नहीं? अगस्त के महीने में दिल्ली का तापमान भी उष्म ही रहा होगा, उनके चेहरे और कपाल से पसीने की बूंदें कागज पर गिरी अवश्य होगी, कागज पर लिखे शब्द पसीने में भींगे जरूर होंगे &#8211; आज जब तीन मूर्ति भवन में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आवासीय कार्यालय के सामने खड़े होकर उस कालखंड की कल्पना कर रहा हूँ तो सोचता हूँ &#8216;भारत यूँ ही नहीं बना है।&#8221; </strong></p>
<figure id="attachment_7803" aria-describedby="caption-attachment-7803" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/16.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/16.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7803" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/16.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/16-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/16-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/16-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/16-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7803" class="wp-caption-text">श्रीमती कमला कौल नेहरू की तस्वीर आज भी पंडित जवाहरलाल नेहरू के शयनकक्ष में उपस्थित है जहाँ पंडित नेहरि अंतिम सांस लिए थे</figcaption></figure>
<p>कल के फ्लेग स्टाफ हॉउस और आज के तीन मूर्ति भवन की पाहकलि मंजिल पर खड़ा हूँ। मैं जहाँ खड़ा हूँ मेरे बाएं और दाहिने हाथ हमारी उम्र से लम्बी, साफ़-सुधरी गलियारा है, जहाँ कुछ सुरक्षाकर्मी अपनी पैनी निगाह आवक-जावक पर लगाए हैं। मेरे बाएं हाथ शीशे के अंदर एक ऊँचे स्थान पर श्रीमती कमला (कौल) नेहरू की एक 10&#8243;x8&#8243; आकार की तस्वीर रखी है। शीशा तो साफ़ दिख रहा है, लेकिन श्रीमती कमला नेहरू की तस्वीर की शीशे पर धूल की परतें जमी होने का आभास हो रहा है। </p>
<p>इस तस्वीर के सामने बाएं हाथ तीन माननीया/मान्यवरों के बैठने के लिए एक सोफा और उसके बाएं-दाहिने एक-एक व्यक्ति के बैठने के लिए एक-एक सोफे रखा है। सोफे सफ़ेद वस्त्रों से ढंके हैं। सामने जिस तरफ एक सोफे लगा है, वहां एक चौकोर और दूसरा गोलाकार छोटा-छोटा मेज रखा है, जिसपर एक टेबुल लैम्प भी जल रहा है। इसी मेज पर एक एस्ट्रे भी रखा है। कोई दो हाथ हटके बाएं दीवार से सटे एक और गोलाकार मेज है जिस पर एक और एस्ट्रे के अलावे पानी रखने वाला एक धातु का सुराही रखा है। यह सभी वस्तुएं पंडित नेहरू की ही हैं। </p>
<figure id="attachment_7804" aria-describedby="caption-attachment-7804" style="width: 2041px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/11.jpg" alt="" width="2041" height="1276" class="size-full wp-image-7804" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/11.jpg 2041w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/11-300x188.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/11-1024x640.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/11-768x480.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/11-1536x960.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2041px) 100vw, 2041px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7804" class="wp-caption-text">इसी कक्ष में, इसी विस्तार पर पंडित जवाहरलाल नेहरू अंतिम सांस लिए थे </figcaption></figure>
<p>दो हाथ हटकर फिर एक चौकोर आकार का मेज है जिसपर एक और टेबुल लैम्प जला है। मेज पर कुछ अन्य सामन भी रखे हैं । इस मेज से कोई पांच फुट बाएं एक और चौकोर मेज स्थित है जिसपर एक घड़ी और बुद्ध की दो प्रतिमा रखा है। इस कमरे में अगर बाएं हाथ श्रीमती कमला नेरू की तस्वीर से प्रारम्भ करें तो अंत भगवान् बुद्ध की प्रतिमा से होती है। बुद्ध वाली मेज के पीछे एक कुर्सी रखी है। इन दोनों मेजों के बीच कोई चार फुट चौड़ा और छः फुट लम्बा एक गद्देदार बिस्तर है, बिना किसी सिलबट के। बिस्तर पर सफ़ेद चादर बिछा है और उसके ऊपर सोने वाले व्यक्ति को अपना शरीर ढंकने के लिए एक चादर भी, जो पुरे बिस्तर को लगभग 70 फीसदी हिस्से को ढंका है। </p>
<blockquote><p>मैं टुकुर-टुकुर इस कक्ष को देख रहा हूँ । इस कक्ष में रखी सभी वस्तुओं को भी देख रहा हूँ और मन ही मन सोच भी रहा हूँ कि इसी कक्ष में, इसी बिस्तर पर भारत का पहला प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अपनी अंतिम सांस कैसे लिए होंगे। इस छोटे से कमरे में जब एक पांच फुट दस इंच का व्यक्ति, जिसका वजन उस समय शायद 65-68 किलो था, अंतिम सांस लेकर भारत के लोगों की अपूर्ण आशाओं को बीच रास्ते में छोड़कर कैसे जा सकते हैं?</p></blockquote>
<p>74-वर्ष के नेहरू 27 मई, 1964 को अंतिम सांस लिए। उस दिन रविवार था। इस कमरे के सामने खड़े होकर सोच रहा हूँ कि अपनी अंतिम सांस से पहली रात को वे देर रात (करीब 11 .30) तक कार्य किये थे। अगली सुबह कोई 06.30 बजे शौचालय से वापस आने के बाद सीने में दर्द महसूस किये। कुछ समय अचेत रहे। बाद में उपस्थित चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिए। भारत में तत्कालीन प्रकाश अन्धकार में बदल गया। आधिकारिक रूप से भारत के संसद में पंडित नेहरू की मृत्यु की सूचना दोपहर बाद 2 बजे दी गयी। पंडित नेहरू के बारे में बहुत तो नहीं जानता, लेकिन मेरा जन्म (1959) नेहरू के कालखंड में ही हुआ था। शायद मेरा प्रारब्ध था कि मैं पंडित नेहरू के शयन कक्ष के सामने उस दृश्य की कल्पना कर सकूँ, तभी आज यहाँ खड़ा हूँ। </p>
<figure id="attachment_7805" aria-describedby="caption-attachment-7805" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7805" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7805" class="wp-caption-text">​पंडित नेहरू की छड़ियाँ</figcaption></figure>
<p><strong>जब मैं गलियारों में घूम रहा था, तो मुझे भारत की आज़ादी की लड़ाई के बारे में बहुत जानकारी मिल रही थी। मैंने उन महान पुरुषों और महिलाओं की तस्वीरें देखीं, जिनसे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री की मुलाकात हुई थी। मुख्य इमारत के कुछ कमरों को वैसे ही रखा गया है, जैसे वे पूर्व प्रधानमंत्री के समय में थे। उम्र से लम्बी गलियारे में जब पीछे मुड़ा, पंडित नेहरू का अध्ययन कक्ष दिखा। कोई छह फुट-चार फुट आकार का टेबुल, जिसके दोनों तरफ एक-एक कुर्सी रखी दिखी। इसे देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि आमतौर पर अध्ययन कक्ष में इस मेज पर उनके साथ सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति ही बैठ सकता था।</strong> </p>
<p>मेज पर बाएं हाथ एक शब्दाबली, बीच में होल्डर वाला कलम-दबात, दाहिने हाथ काला, सफ़ेद और आसमानी रंग का तीन टेलीफोन, सामने (जिधर दूसरे व्यक्ति बैठेंगे) के बाएं- दाहिने फाइलों और अन्य कागजातों को रखने के लिए दो ट्रे भी रखा दिखा। पंडित नेहरू के मेज के सामने पांच लोगों के बैठने के लिए सोफे (एक पर तीन व्यक्ति और एक-एक अलग अलग आमने सामने ) रखा दिखा जिस पर आसमानी रंग के वस्त्र के गद्दे लगे थे। इसे देखकर सोच रहा था कि जब पंडित नेहरू से मिलने एक से अधिक व्यक्ति आते होंगे इस कक्ष में, वे या तो सोफे पर आकर बातचीत करते होंगे, या फिर अपनी कुर्सी पर बैठे सोफे पर बैठे लोगों से बात करते होंगे। पंडित नेहरू की कुर्सी के बाएं हाथ एक और मेज लगी थी। शायद इस मेज का इस्तेमाल पानी रखने के लिए किया जाता होगा। </p>
<figure id="attachment_7817" aria-describedby="caption-attachment-7817" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/15.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/15.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7817" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/15.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/15-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/15-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/15-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/15-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7817" class="wp-caption-text">पंडित जवाहरलाल के शयनकक्ष में रखा यह पंखा </figcaption></figure>
<p>नेहरू जी की मृत्यु के बाद, इस घर को एक राष्ट्रीय संग्रहालय में बदल दिया गया, जिसमें एक लाइब्रेरी और एक म्यूज़ियम शामिल है। तीन मूर्ति के अंदर, घर के बड़े लॉन में एक बड़े पत्थर पर &#8220;आखिरी भाषण&#8221; &#8211; &#8216;फ्रीडम एट मिडनाइट&#8217; (आधी रात को आजादी) लिखा हुआ है।</p>
<figure id="attachment_7806" aria-describedby="caption-attachment-7806" style="width: 2041px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/14.jpg" alt="" width="2041" height="1276" class="size-full wp-image-7806" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/14.jpg 2041w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/14-300x188.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/14-1024x640.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/14-768x480.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/14-1536x960.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2041px) 100vw, 2041px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7806" class="wp-caption-text">स्वतंत्र भारत के बच्चे और आशाओं का आसमान</figcaption></figure>
<p><strong>नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी तीन मूर्ति भवन के ऊँची छतों वाले हॉल में स्थित है। 1966 में संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित, इसे &#8220;आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू के स्मारक&#8221; के रूप में बनाया गया था। लाइब्रेरी खुद को &#8220;औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक भारत के लिए शोध और संदर्भ केंद्र&#8221; बताती है। इसमें बड़े पैमाने पर अभिलेखागार भी हैं, जिनमें 19वीं और 20वीं सदी के भारतीयों के निजी कागजात और मौखिक इतिहास का बड़ा संग्रह है। राष्ट्रीय आंदोलन की घटनाओं को बहुत ही क्रमबद्ध तरीके से रखा गया है। कांग्रेस का गठन और गांधी का उदय, होमरूल, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन, अलग-अलग ब्रिटिश कमीशन, दो विश्व युद्ध, कॉन्फ्रेंस का दौर और आख़िरकार, बंटवारे के साये में आज़ादी &#8211; एक दस्तावेज जैसा रखा है जिसे कोई भी व्यक्ति उस घटनाक्रम को समझ सकता है।</strong> </p>
<figure id="attachment_7807" aria-describedby="caption-attachment-7807" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7807" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7807" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में निर्मित प्रधानमंत्री म्यूजियम से नेहरू म्यूजियम भवन के आंतरिक हिस्से का दृश्य</figcaption></figure>
<p>अंदर घुसते ही युवा नेहरू की प्रदर्शनी दिखती है &#8211; कभी वे अपनी माँ की गोद में हैं, तो कभी पूरे ठाठ-बाट के साथ अपने पिता के बगल में खड़े हैं, कभी घोड़े पर सवार हैं, तो कभी कैम्ब्रिज से ग्रेजुएट हो रहे हैं या कश्मीर से पोस्टकार्ड भेज रहे हैं। युवा नेहरू की ज़िंदगी कांग्रेस के शुरुआती दौर से जुड़ जाती है, जिसमें नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच बंटवारा और एक दशक बाद उनका फिर से एक होना शामिल है। म्यूज़ियम में घूमते तस्वीरों, चिट्ठियों और अख़बार की कतरनों के ज़रिए दिखाए गए राष्ट्रीय आंदोलन के बीच-बीच में, इन कमरों में गुज़री ज़िंदगी की झलकियाँ भी मिलती हैं।</p>
<p>आज़ादी की लड़ाई की मुख्य कहानी कांग्रेस के उतार-चढ़ाव और अंग्रेज़ों के साथ बातचीत के इर्द-गिर्द घूमती है। सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज, नौसेना विद्रोह और लाल किले में चले मुकदमों का ज़िक्र बस &#8216;साइडलाइट्स&#8217; या गौण घटनाओं के तौर पर ही मिलता है। यही वह कहानी है जो पीढ़ियों से छात्रों को पढ़ाई जाती रही है, जिसमें नेहरू और गांधी केंद्र में हैं और आज़ादी सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन से मिली है।</p>
<blockquote><p>श्रीमती कमला नेहरू से रूबरू </p></blockquote>
<p>अंतिम सांस लेने के कोई नब्बे साल छह महीने बाद श्रीमती कमला कौल नेहरू से रूबरू हुआ था। भारतवर्ष में आज़ादी से पूर्व और आज़ादी के बाद दो ही कमला नामक महिला चर्चित हुई। एक-श्रीमती कमला कॉल जो पंडित जवाहरलाल नेहरू की अर्धांगिनी थी। विवाहोपरांत नेहरू उपनाम के साथ वे कमला कौल नेहरू बनी। और दूसरी: 1980 के दशक में इंडियन एक्सप्रेस के तत्कालीन संवाददाता श्री अश्विनी सरीन की &#8216;कमला&#8217; (नाम बदल दिया गया था) जिसे वे भारत के एक राज्य से खरीदकर लाये थे यह दर्शाने की आज़ादी के 35-वर्ष बाद भी महिलाओं की खरीद-बिक्री जारी है। यह अलग बात है कि इस कार्य के लिए अश्विनी सरीन को दिल्ली के तिहाड़ कारावास भी जाना पड़ा था। </p>
<figure id="attachment_7808" aria-describedby="caption-attachment-7808" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/18.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/18.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7808" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/18.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/18-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/18-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/18-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/18-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7808" class="wp-caption-text">हक्सर की हवेली का एक दृश्य &#8211; यहाँ कभी महल हुआ करता था जहाँ पंडित नेहरू और श्रीमती कमला कौल का विवाह हुआ था</figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, पिछले दिनों जब पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार गया था तो हक्सर की हवेली भी गया था। वह हवेली कभी दो-मंजिला इमारत थी और उसी इमारत में कमला कौल रहती थी। यही उनका पारिवारिक घर था और उसी घर में जवाहरलाल नेहरू का विवाह हुआ था सुश्री कमला कॉल के साथ, साल 1916 था । आज़ादी के बहुत बाद तक यह स्थान बहुत बेहतर था और स्थानीय लोगों के अलावे, शहर के विद्वान, विदुषी इस स्थान को जवाहरलाल नेहरू का ससुराल के नाम से जानते थे। सीताराम बाजार की तंग गलियों में रहने वाले उस कालखंड की तीसरी-छठो पीढ़ी के लोग आज भी फक्र से कहते हैं कि इसी गली से सुश्री कमला का विवाह हुआ था देश के एक होनहार नौजवान के साथ। यह हवेली दो गलियों की नुक्कड़ पर होने के कारण, समयंतराल दोनों तरफ कोई 18 दुकानें बनी। दुकानदारों की तीसरी पीढ़ियां आज तक यहाँ से अपने अपरिवार का भरण पोषण करते आ रहे हैं।</strong> </p>
<figure id="attachment_7809" aria-describedby="caption-attachment-7809" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/19.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/19.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7809" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/19.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/19-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/19-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/19-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/19-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7809" class="wp-caption-text">हक्सर की हवेली का एक दृश्य &#8211; यहाँ कभी महल हुआ करता था जहाँ पंडित नेहरू और श्रीमती कमला कौल का विवाह हुआ था</figcaption></figure>
<p>पूर्व भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) अधिकारी पवन के वर्मा द्वारा लिखित वॉल्ड सिटी में हवेलियों पर एक किताब – ‘मैन्शन एट डस्क: द हवेलिस ऑफ ओल्ड डेल्ही’ के अनुसार 1857 के विद्रोह के दौरान हवेली को बहुत नुकसान पहुंचा था। जंगे आज़ादी के दौरान इस हवेली को तत्कालीन ब्रिटिश सैनिकों ने इसमें तोड़फोड़ की थी। परिणाम यह हुआ कि यहां रहने वाले लोग यहाँ नहीं रह सकते थे। सन् सत्तावन के युद्ध के करीब तीन दशक बाद 1887 के आस-पास इसका पुनर्निर्माण कराया गया था। यह भी कहा जाता है कि हक्सर परिवार ने 1970 के दशक के मध्य में यह संपत्ति दिल्ली यार्न एसोसिएशन को बेच दी थी। </p>
<p>चूड़ीवालान और बाजार सीताराम का यह इलाका उन दिनों कश्मीर से आये लोगों के लिए विख्यात था। यहाँ कई सौ नहीं, बल्कि कई हज़ार कश्मीरी परिवार रहते थे। यह भी माना जाता है कि आज़ादी के बाद, कश्मीर के वासिंदे क्रमशः यहाँ से विस्थापित होकर दिल्ली के अन्य इलाकों के अलावे कश्मीर भी वापस हुए थे। हक्सर की हवेली एक भव्य संरचना हुआ करती थी जिसमें पारंपरिक शाहजहानाबादी हवेली की सभी विशेषताएं थी। कौल परिवार ने 1970 के दशक की शुरुआत या मध्य में हवेली बेच दी थी और नए मालिक ने इसका रखरखाव नहीं किया, जिसके कारण यह ढह गई। संपत्ति का एक हिस्सा 1980 के दशक में ढह गया और दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा 90 के दशक में ढह गया। </p>
<figure id="attachment_7810" aria-describedby="caption-attachment-7810" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/20.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/20.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7810" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/20.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/20-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/20-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/20-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/20-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7810" class="wp-caption-text">हक्सर की हवेली का एक दृश्य &#8211; यहाँ कभी महल हुआ करता था जहाँ पंडित नेहरू और श्रीमती कमला कौल का विवाह हुआ था</figcaption></figure>
<p><strong>कमला कौल नेहरू का जन्म अगस्त के महीने में ही पहली तारीख को हुआ था। साल 1899 था। वे एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक भी थीं । भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान एक शांत लेकिन मजबूत ताकत बनकर उभरीं थीं।पारंपरिक परवरिश की बंदिशों के बावजूद, उन्होंने राष्ट्रवादी कामों का समर्थन करने और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने के लिए सभी बाधाओं को तोड़ा। 17 साल की उम्र में जवाहरलाल नेहरू से साथ विवाहोपरांत वे राजनीति के केंद्र में आ गईं। 1920 के दशक के असहयोग आंदोलन में अहम भूमिका निभाई और &#8216;सेवा मंदिर&#8217; की कमान संभाली, जो महिलाओं के सशक्तिकरण और शिक्षा के लिए समर्पित एक संस्था थी। उसी दौरान अंग्रेज़ों ने नेहरू को जेल में डाल दिया, तो कमला ने निडर होकर जनसभाओं को संबोधित किया और विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया, जिसमें उन्हें अक्सर गिरफ़्तारी और पुलिस की बर्बरता का सामना करना पड़ा। </strong></p>
<p>यह भी कहा जाता है कि उन्होंने महात्मा गांधी के साथ मिलकर काम किया और महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक भागीदारी की जोरदार वकालत की। उनकी शांत शक्ति और नैतिक दृढ़ता ने उन्हें उभरती महिला नेताओं के लिए एक रोल मॉडल बना दिया।बार-बार जेल जाने और सही इलाज न मिल पाने के कारण कमला नेहरू की सेहत खराब हो गई। आज जब श्रीमती कमला नेहरू की तस्वीर को उनके पति के शयन कक्ष में जहाँ वे अंतिम सांस लिए, रखा देख सोचने पर विवश हो गया कि नेहरू कितना प्यार करते थे अपनी पत्नी को। श्रीमती कमला नेहरू को टीबी हो गया था और 1936 में स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन में 37 साल की कम उम्र में 28 फरवरी को उनका निधन हो गया। उनकी मौत ने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन और उनके पति व बेटी के जीवन में एक गहरा खालीपन छोड़ दिया।</p>
<figure id="attachment_7811" aria-describedby="caption-attachment-7811" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/17.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/17.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7811" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/17.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/17-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/17-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/17-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/17-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7811" class="wp-caption-text">तीन मूर्ति</figcaption></figure>
<blockquote><p>तीन मूर्ति भवन की यात्रा </blockquote

कोई पच्चीस साल पहले एक बार तीन मूर्ति भवन आया था। उन दिनों मेरे एक मित्रवत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ. ओम प्रकाश केजरीवाल का पदस्थापन नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में निदेशक के रूप में हुआ था। साल 1997 था और वे अवकाश प्राप्त करने के समय (2004) तक यहीं निदेशक थे। मैं उन दिनों दिल्ली से प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में कई वर्ष कार्य करने के बाद दी स्टेट्समैन अखबार में विशेष संवाददाता के रूप में सेवा की शुरुआत किया था। साल 2000 था। 

मैं जिस समय दिल्ली आया था डॉ. केजरीवाल आकाशवाणी में पदस्थापित थे। 1980-1990 के कालखंड में वे आकाशवाणी में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किये थे। जब प्रसार भारती की स्थापना हुई, कालखंड 15 सितम्बर 1997 था, उस समय एसएस गिल प्रसार भारती के पहले मुख्य कार्यकारी अधिकारी (23 नवंबर 1997 से 31 अगस्त, 1998) बने। 31 अगस्त, 1998 से जून 11 तक डॉ. केजरीवाल को भी शीर्षस्थ पर पर कार्य करने का मौका मिला। लेकिन दिल्ली में राजनीति नहीं हो, यह संभव न था और ना ही है। डॉ. केजरीवाल तीन मूर्ति के तरफ अग्रसर कराया गया और कारण आधे दर्जन से अधिक अभियंत्रण में उपाधि रखने वाले, और दर्जनों सम्मान से सम्मानित राजीव रत्न शाह को 11 जून 1999 को प्रसार भारती का मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी बनाया गया।
 
आज जब तीन मूर्ति स्थित मुख्य ऐतिहासिक भवन के प्रथम तल्ले पर दीवारों को, खिड़कियों को, फर्स को, छत को, मेजों को, कुर्सियों को, खासकर भारत के तत्कालीन सेन्ट्रल असेम्ब्ली और आज के संसद के साथ-साथ, तत्कालीन वायसराय और आज के राष्ट्रपति भवन की ओर से आने वाली हवाओं को महसूस कर रहा था, तो सोचने पर बाध्य हो गया कि आज से 80 वर्ष पहले, जब अंग्रेजी हुकूमत के लोग देश का बागडोर तत्कालीन नेताओं के हाथों सौंप कर लन्दन जाने को सज्ज हो रहे होंगे, उस समय इस भवन में रहने वाले ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ़ के साथ-साथ भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन (फरवरी 1947 से अगस्त 1947) को कैसा लग रहा होगा ?

[caption id="attachment_7812" align="aligncenter" width="2047"]<a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7812" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a> यह वृक्ष और यह भवन एक साथ वृद्ध हो रहा है [/caption]</p>
<p><strong>कल का &#8220;फ्लैग स्टाफ हाउस&#8217; और आज का तीन मूर्ति भवन ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसेल ने 1929-30 में नई दिल्ली की शाही राजधानी के हिस्से के तौर पर डिजाइन किया था और यह आर्किटेक्चर का एक बेहतरीन नमूना है। आज का तीन मूर्ति मार्ग कल का रॉबर्ट्स रोड कहा जाता था। शुरू में यह ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ का घर था, लेकिन बाद में यह आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आधिकारिक घर बन गया। नेहरू यहाँ सोलह साल तक रहे और 1964 में अपने निधन तक । उनकी 75वीं जयंती पर, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस एस्टेट को &#8216;नेहरू मेमोरियल म्यूजियम&#8217; के तौर पर देश को समर्पित किया।</strong></p>
<p>आज के ही दिन (12 अगस्त) को कभी भारत नहीं आने वाले सिरिल रैडक्लिफ की अध्यक्षता में बनी बाउंड्री कमीशन, जिसे रेडक्लिफ लाइन के रूप में जाना जाता है &#8211; पंजाब और बंगाल की सीमा रेखा &#8211; को सरदार वल्लभ भाई पटेल, पंडित जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना को आधिकारिक तौर पर बताया गया था। साल १९४७ था। उन दिनों सिरिल रैडक्लिफ 1, रायसीना रोड, जहाँ आज प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया है, रहते थे। </p>
<p><strong>अपवाद छोड़कर परिसर में प्रवेश के साथ कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं दिखा। जो पेड़-पौधे छोटे थे, अब बड़े दिखे। लेकिन दो ऐसे वृक्ष दिखे जो उस समय अपने युवास्था में था जब पंदिर नेहरू इस परिसर में देश का प्रथम प्रधानमंत्री बनकर आये थे। इन अस्सी वर्ष में नेहरू के प्रति अनेकों आरोप-प्रत्यारोप होने के बाद भी उनके व्यक्तित्व पर आंच नहीं आने देने के लिए भवन की सुरक्षा और सुंदरता बरकरार रखने के लिए खड़ा है। यह दोनों वृक्ष जंगे आज़ादी भी देखा, स्वतंत्र भारत का स्वागत भी किया और आज़ादी के बाद तत्कालीन भारतीय नेताओं को छांव भी दिया है। इस बृक्ष और भवन के बीच जिस मैदान को आप देख रहे हैं इस मैदान में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू मैदान के एक हिस्से को खेत में परिवर्तित कर राष्ट्र के लोगों को आह्वान किया था &#8220;अधिक अन्न उपजायें &#8221; और मैदान के आधे हिस्से में गेंहू की खेती किये । फसल होने के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी फसल को काफी थी।</strong> </p>
<p>बहरहाल, नई दिल्ली के ऐतिहासिक सत्ता के गलियारों के बीच यह एक ऐसा म्यूज़ियम है जो दुनिया में अपनी तरह का अकेला है। यह एक ऐसा संस्थान है जो भारत की कहानी को सिर्फ़ तारीखों या समय-सीमाओं के जरिए नहीं, बल्कि आज़ादी के बाद देश को आगे ले जाने वाले नेताओं के जीवन, उनके नेतृत्व और उनकी विरासत के ज़रिए बताता है। यह म्यूज़ियम सिर्फ़ नेताओं के बारे में नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र-निर्माण, निरंतरता और नागरिकता के बारे में भी है। यह म्यूज़ियम आने वालों को एक ऐसी यात्रा पर ले जाता है जो व्यक्तिगत पहल और सामूहिक प्रयास, दोनों को उजागर करती है—ये दोनों ही आज़ादी के बाद भारत की तरक्की की मुख्य ताकतें रही हैं।</p>
<figure id="attachment_7813" aria-describedby="caption-attachment-7813" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7813" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7813" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में बने नए प्रधानमंत्री म्यूजियम में आप जो कुर्सी आरक्षित है, उस पर नहीं, अलबत्ता सामने वाली कुस्ती पर बैठकर आप किसी भी प्रधानमंत्री के साथ, चाहे आपकी आयु कितनी भी हो, तस्वीर ले सकते हैं &#8211; विज्ञान का चमत्कार</figcaption></figure>
<p>यह इमारत, जिसका मुख राष्ट्रपति भवन (तब वायसराय हाउस) की दक्षिण दिशा की ओर है, पत्थर और स्टको से बनी है। इसमें विक्टोरियन और फ़्रेंच आर्किटेक्चर का संगम देखने को मिलता है। ‘फ्लैगस्टाफ हाउस’ का नाम जल्द ही बदलकर ‘तीन मूर्ति भवन’ कर दिया गया था । यह नाम ब्रिटिश मूर्तिकार लियोनार्ड जेनिंग्स द्वारा बनाई गई तीन मूर्तियों के कारण रखा गया था। ये मूर्तियाँ जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर लांसर्स की याद में बनाई गई थीं, जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सीरिया, फिलिस्तीन और सिनाई के युद्ध-क्षेत्रों में बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी। ये मूर्तियाँ भवन के मुख्य गेट के सामने बने गोल चक्कर पर लगी हुई हैं।</p>
<p>9 अगस्त, 1968 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फैसला किया कि इस इमारत में भारत के अगले प्रधानमंत्री रहेंगे। हालाँकि, ऐसा नहीं हुआ और सभी संबंधित अधिकारियों ने सहमति जताई कि इसके बजाय तीन मूर्ति हाउस को नेहरू के स्मारक में बदल दिया जाए । स्मारक संग्रहालय के अलावा, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी, जो 1966 में शुरू हुई थी, का औपचारिक उद्घाटन 1974 में किया गया। शुरुआत में यह मुख्य इमारत से ही चलती थी, जब तक कि बाद में इसके लिए एक अलग इमारत नहीं बनाई गई।</p>
<p>कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर डेरेक एल. इलियट ने लिखा कि: &#8220;तीन मूर्ति एक ऐसी जगह है जो भारतीय इतिहास में रची-बसी है और यहाँ का बौद्धिक माहौल दिल्ली के किसी भी अन्य बड़े आर्काइव (अभिलेखागार) से कहीं बेहतर है। बिना किसी का पक्ष लिए यह ज़रूर कहा जा सकता है कि यह इमारत सिर्फ़ इतिहास का प्रतीक नहीं है – बल्कि यह खुद इतिहास है।&#8221; यह परिसर 30 एकड़ भूखंड में फैला है। </p>
<figure id="attachment_7814" aria-describedby="caption-attachment-7814" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7814" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7814" class="wp-caption-text"><br />प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में बने नए प्रधानमंत्री म्यूजियम में पर अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों का, जिन्होंने 15 अगस्त को ऐतिहासिक लाल किले से राष्ट्र को सम्बोधित किये, के भाषण को सुन सकते हैं &#8211; विज्ञान का चमत्कार</figcaption></figure>
<p><strong>इस इमारत का नाम पास ही बने एक स्मारक के नाम पर पड़ा है, जिसमें तीन मूर्तियाँ हैं। 23 सितंबर 1918 को, 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड — जिसमें मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद के घुड़सवार सैनिक और भावनगर, कश्मीर और काठियावाड़ की टुकड़ियाँ शामिल थीं — ने हाइफ़ा के किलेबंद बंदरगाह शहर पर हमला किया। उन्होंने हाइफ़ा पर कब्ज़ा कर लिया और मित्र देशों के लिए एक अहम रास्ता खोल दिया। हाइफ़ा को आज़ाद कराने के दौरान इन तीन रियासतों के कुल 44 सैनिक शहीद हुए। असल में, भारतीय सेना 23 सितंबर को &#8216;हाइफ़ा दिवस&#8217; के तौर पर मनाती है।1914-18 के महान युद्ध के दौरान दस लाख से ज़्यादा भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में सेवा की। इनमें से लगभग 62,000 सैनिक मारे गए और 67,000 अन्य दुनिया भर में युद्ध के अलग-अलग मोर्चों पर घायल हुए। इन्हीं जगहों में से एक था इज़राइल का सबसे बड़ा बंदरगाह, हाइफ़ा।</strong></p>
<p>तीन मूर्ति भवन के बगल में एक ट्रैफिक गोलचक्कर पर एक ओबिलिस्क (स्तंभ) बना है, जो हाइफ़ा की घेराबंदी में शहीद हुए सैनिकों को समर्पित है। यह स्मारक 1924 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने की 10वीं बरसी पर बनाया गया था और इसका उद्घाटन भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रीडिंग ने किया था। काँसे की ये मूर्तियाँ मशहूर ब्रिटिश मूर्तिकार लियोनार्ड जेनिंग्स ने बनाई थीं। तीनों तरफ कांस्य की एक-एक पट्टिका भी लगी है, जिस पर लिखा है &#8211; &#8216;देयर नेम लिवेथ फॉर एवरमोर&#8217; (उनके नाम हमेशा जीवित रहेंगे)। इस लेख के ऊपर घुड़सवार रेजिमेंटों &#8211; मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद लांसर्स &#8211; के नाम और लोगो बने हैं। पट्टिकाओं के ऊपर, ओबेलिस्क के किनारों पर उन सैनिकों के नाम खुदे हुए हैं जो शहीद हुए या लापता हो गए थे।त्रिकोणीय स्मारक के आधार पर भी तीन लेख लिखे हैं &#8211; दो में इस घटना का विवरण अंग्रेजी और उर्दू में है, और तीसरे में उन आस-पास की जगहों के नाम हैं जहां इन सैनिकों ने लड़ाई लड़ी थी। इनमें स्वेज नहर, गाजा, यरूशलेम, जॉर्डन घाटी, हाइफ़ा, दमिश्क और अलेप्पो शामिल हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/10.jpg" alt="" width="2041" height="1276" class="aligncenter size-full wp-image-7815" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/10.jpg 2041w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/10-300x188.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/10-1024x640.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/10-768x480.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/10-1536x960.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2041px) 100vw, 2041px" /></a></p>
<p>1966 में, इस संस्थान को &#8216;नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी&#8217; के तौर पर औपचारिक रूप दिया गया। यह आधुनिक और समकालीन भारत पर एडवांस्ड रिसर्च को बढ़ावा देने वाली एक सोसाइटी थी। दशकों के दौरान, यह आर्काइव्स, ओरल हिस्ट्री और विद्वानों की रिसर्च के लिए देश के प्रमुख केंद्रों में से एक बन गया। खैर। </p>
<p><strong>15 अगस्त 2023 को इसका नाम बदलकर &#8216;प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय सोसाइटी&#8217; कर दिया गया। यह बदला हुआ नाम इसके व्यापक दायरे को दिखाता है, जिसमें भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का सम्मान किया जाता है। &#8216;प्रधानमंत्री संग्रहालय&#8217; देश के प्रधानमंत्रियों के जीवन, संघर्षों और योगदान के ज़रिए आधुनिक भारतीय इतिहास को बताने की एक अनोखी कोशिश है। नेतृत्व का सम्मान करने के विज़न के तौर पर शुरू हुई यह पहल अब एक जीवंत राष्ट्रीय संस्थान बन गई है। यह संस्थान आर्काइव्स, मल्टीमीडिया और अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी को जोड़कर भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का एक जीवंत इतिहास तैयार करता है।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/12.jpg" alt="" width="2041" height="1276" class="aligncenter size-full wp-image-7816" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/12.jpg 2041w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/12-300x188.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/12-1024x640.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/12-768x480.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/08/12-1536x960.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2041px) 100vw, 2041px" /></a></p>
<p>प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय में लाइब्रेरी, आर्काइव्स, ओरल हिस्ट्री डिवीज़न, रिसर्च और पब्लिकेशन सेक्शन, रिप्रोग्राफी सेक्शन, प्रधानमंत्री संग्रहालय और तारामंडल (प्लेनेटेरियम) के साथ-साथ एडमिनिस्ट्रेशन और फाइनेंस ब्लॉक भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री संग्रहालय में, &#8216;ओल्ड ब्लॉक&#8217; (ब्लॉक I) नेहरू के मूल संग्रहालय के नए रूप में तैयार किए गए स्वरूप को बनाए रखता है, जबकि नई इमारत (ब्लॉक II) इस कहानी को आगे बढ़ाते हुए सभी प्रधानमंत्रियों को शामिल करती है। इस तरह, यह जगह एक प्रतीकात्मक निरंतरता को दर्शाती है: आज़ादी के बाद के नेतृत्व का जन्मस्थान अब उसी नेतृत्व की विरासत का संरक्षक भी है।</p>
<p>भारत के लोकतांत्रिक विकास और नेतृत्व की विरासत को याद करने के लिए, भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल 2022 को प्रधानमंत्री संग्रहालय का उद्घाटन किया। इसका मकसद यह दिखाना है कि कैसे अलग-अलग प्रधानमंत्रियों ने निष्पक्ष और समावेशी तरीके से भारत की प्रगति का मार्गदर्शन किया है। यह संग्रहालय सिर्फ़ हस्तियों को श्रद्धांजलि देने के बजाय, प्रधानमंत्रियों को राष्ट्रीय बदलाव लाने वाले लोगों के तौर पर पेश करता है। यह राजनीतिक फैसलों, नीतिगत विकल्पों और सामाजिक-आर्थिक उपलब्धियों को एक बड़ी लोकतांत्रिक गाथा के हिस्से के रूप में दिखाता है। हर नेता की गैलरी में इन बातों पर गौर किया जाता है: •⁠  ⁠शुरुआती जीवन और उन पर पड़े प्रभाव •⁠  ⁠राजनीतिक सफर और जनसेवा •⁠  ⁠अहम फैसले और देश को आकार देने वाले पल •⁠  ⁠समाज, अर्थव्यवस्था और विदेश संबंधों पर व्यापक असर इस नज़रिए से, आने वाले लोग न सिर्फ़ व्यक्तिगत उपलब्धियों को देखते हैं, बल्कि समय के साथ भारत के शासन में निरंतरता, अंतर और जटिलताओं को भी समझते हैं।<br />
मैं आभारी हूँ श्री अनुराग अरोड़ा, प्रशासनिक प्रबंधक और सुश्री आस्था राजवळ, शोधार्थी, प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय लाइब्रेरी का। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-room-where-pandit-nehru-breathed-his-last-is-still-alive">जिस कक्ष में पंडित नेहरू &#8216;अंतिम सांस&#8217; लिए थे, वह कक्ष, वहां रखी वस्तुएं आज भी &#8216;जीवित&#8217; है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित्त&#8217;, आप शताब्दी पुराने &#8216;आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 May 2026 05:55:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली, 8 मई:  पिछले वर्ष 3 अप्रैल को एक प्रश्न के लिखित जवाब में, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री टोखन साहू ने संसद को बताया कि केंद्र सरकार ने दिल्ली गोल्फ क्लब की लीज़ 2050 तक बढ़ा दी है। यह फैसला क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की उसकी गुज़ारिश को ध्यान में रखते हुए लिया [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/modi-hai-toh-mumkin-hai-slogan-lies-flat-on-its-face-at-the-entrance-of-the-delhi-golf-club">&#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित्त&#8217;, आप शताब्दी पुराने &#8216;आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली, 8 मई:  पिछले वर्ष 3 अप्रैल को एक प्रश्न के लिखित जवाब में, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री टोखन साहू ने संसद को बताया कि केंद्र सरकार ने दिल्ली गोल्फ क्लब की लीज़ 2050 तक बढ़ा दी है। यह फैसला क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की उसकी गुज़ारिश को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, खासकर इसलिए क्योंकि 2016 से गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा बन गया। </strong></p>
<blockquote><p>अब जब मंत्रीजी लीज-अवधि बढ़ा ही दिए हैं, स्वाभाविक है, इस बात की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को होगा ही। इस दृष्टि से &#8221;मोदी है तो मुमकिन है&#8217; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित&#8217; दिखाई दिया। देश के लोगों को, खासकर पुरातत्व और विरासत प्रेमियों को, चाहे वे &#8216;देशज&#8217; हों या &#8216;विदेशज&#8217;, यह समझ लेना चाहिए कि वे कई शताब्दी पुराने न्यूनतम आठ पुरातत्वों को अपने जीवनकाल में देखने से वंचित रह जायेंगे। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/4.mov"></a></p>
<p>जनसँख्या के दृष्टिकोण से अगर भारत के लोगों की आयु संभाविता (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) को देखें तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यह 70 वर्ष है 2026 तक। इस दृष्टि से भारत में आज 162.8 मिलियन लोग 60+ वर्ष के हैं। यानी आगामी 2050 में, जब तक दिल्ली गोल्फ क्लब का विस्तारित लीज अवधि है, वे सभी अपने जीवन प्रत्याशा उम्र से 15 वर्ष अधिक के रहेंगे, अगर जीवित रहे तो। और आज जो 50-वर्ष के हैं, जिनकी संख्या करीब 250 मिलियन है, दिल्ली गोल्फ क्लब की अगली लीज के नवीकरण के समय जीवन प्रत्याशा उम्र को पार कर जायेंगे। यानी इस धरती पर पैदा होने के बाद भी उन्हें अपने देश, देश की राजधानी में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्वों, विरासतों को देखे बिना धरती से कूच करना होगा। फिर &#8216;मोदी है तो मुमकिन है&#8217; का क्या मतलब? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7729" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>विडम्बना यह है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासतों और धरोहरों की गरिमा के प्रति न केवल भारत के लोगों के लिए, बल्कि वैश्विक स्तर पर आकर्षण का मार्ग ढूंढ रहे हैं, प्रशस्त कर रहे हैं; वहीं दूसरे तरफ उन्हीं के मंत्रिमंडल के लोग देशज-विदेशज पर्यटकों को दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर के विरासतों को देखने से वंचित कर रहे हैं। यानी केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय और मंत्री के सामने सम्मानित प्रधानमंत्री की बातों का, विचारों का &#8211; कोई मोल नहीं।</strong>  </p>
<p>संसद में साहू ने कहा कि &#8220;पिछली बार लीज़ का विस्तार दिल्ली गोल्फ क्लब के अनुरोध पर वर्ष 2050 तक किया गया। यह विस्तार दिल्ली गोल्फ क्लब के उस अनुरोध को ध्यान में रखते हुए किया गया जिसमें क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की बात कही गई थी, क्योंकि 2016 से गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा बनने वाला था।&#8221; मंत्री के अनुसार, इस उद्देश्य के लिए बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए, दिल्ली गोल्फ क्लब ने लंबी अवधि की योजना के तहत लीज़ को 2070 तक बढ़ाने का अनुरोध किया था। दिल्ली गोल्फ क्लब की स्थापना 1930 के दशक की शुरुआत में एक म्युनिसिपल कोर्स के तौर पर हुई थी और पहले इसे लोधी गोल्फ क्लब के नाम से जाना जाता था। मंत्री ने &#8216;लीज अवधि&#8217; तो विस्तारित कर दिए, लेकिन यह नहीं सोचे कि प्रधानमंत्री का सांस्कृतिक विरासतों से संबंधित प्रयासों का क्या होगा?</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7730" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे, दिल्ली गोल्फ क्लब के आस-पास ही नहीं, दिल्ली सल्तनत के लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अगर पुराने कानूनों को रद्द करने, उनमें संशोधन करने पर विशेष जोर दिया और परिणामस्वरूप अगस्त 2025 तक 1,500 से अधिक पुराने या अनावश्यक केंद्रीय अधिनियमों को रद्द किया जा सकता है; तो दिल्ली गोल्फ क्लब के लीज को &#8216;शर्तयुक्त&#8217; क्यों नहीं किया जा सकता है, ताकि भारत के लोगों को ऐतिहासिक पुरातत्व और विरासतों को, जो परिसर के अंदर है, प्रतिबंधित है, देखने से वंचित नहीं होना पड़े। लोगों का कहना है कि सरकार ने विभिन्न कानूनों के तहत 3,700 से अधिक प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया है या उन्हें सरल बनाया है, और 40,000 से अधिक अनुपालन आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया है। ज्ञातव्य हो कि भारत के विधि आयोग और विधायी विभाग द्वारा गठित दो-सदस्यीय समिति द्वारा 1824 ऐसे केंद्रीय कानूनों की पहचान किये गए थे, जो अब अनावश्यक और पुराने हो चुके थे। </p>
<p><strong>इतना ही नहीं, 1 जुलाई, 2024 से, भारतीय दंड संहिता, 1860 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की जगह क्रमशः भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने ले ली है। मुख्य बदलावों में सामुदायिक सेवा की शुरुआत, कानूनी प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण, न्याय के लिए अनिवार्य समय-सीमाएं, आतंकवाद की परिभाषाएं, और धाराओं का पुनर्कर्मांकन तथा उन्हें सुव्यवस्थित किया गया। ऐसी स्थिति में, अगर प्रधानमंत्री देश के लोगों के कल्याणार्थ, देश की गरिमा के लिए अंग्रेजी हुकूमत कालीन कानूनों को भारतीय बना सकते हैं तो फिर दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर स्थित पुरातत्व को देखने, समझने के लिए भारत के लोगों के लिए विशेष पहल तो कर ही सकते हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7731" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे भी, यह क्लब कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत रजिस्टर्ड है—जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी कंपनी है जिसका मकसद कॉमर्स, कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, रिसर्च, समाज कल्याण, धर्म, दान या पर्यावरण की सुरक्षा को बढ़ावा देना है। धारा 8 कंपनियों का मुनाफा सिर्फ़ उसी मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जिसके लिए उन्हें बनाया गया है। यह क्लब आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12A के तहत भी रजिस्टर्ड है, जिससे इसे आयकर देने से भी छूट मिलती है। आय-व्यय के बारे में तो सरकार का कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय है ही, जांच करने के लिए। </p>
<p>जाकिर हुसैन रोड पर 179 एकड़ ज़मीन पर बना है दिल्ली गोल्फ क्लब, जिसे केंद्र सरकार ने 1950 के दशक की शुरुआत में क्लब को लीज पर दिया था। हाई कोर्ट में कर्मचारियों की एक याचिका के मुताबिक, भले ही इस ज़मीन की कीमत पचपन हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा है, फिर भी क्लब केंद्र सरकार को हर महीने प्रति एकड़ सिर्फ़ 16,620 रुपये की नाममात्र की लाइसेंस फीस देता है। </p>
<p><strong>प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर शहरी विकास मंत्रालय ने अपने तीन अधिकारियों को क्लब की जनरल कमेटी का सदस्य बनाया है। क्लब आवेदन और सब्सक्रिप्शन फीस लेता है। इसके अलावा, सदस्यता के लिए चुने गए आवेदकों से एंट्री फीस 3.5 लाख रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक ली जाती है, जिसमें लागू टैक्स भी शामिल होता है। कहते हैं यहाँ करीब 4000 + सदस्य हैं। इस क्लब की खासमखास विशेषता यह है कि चतुर्दिक लाल रंग से रंगे चारदीवारी वाले इस क्लब में भारतीय नौकरशाहों, न्यायविदों, न्यायमूर्तियों, राजनेताओं, व्यापारियों, कारोबारियों, के साथ-साथ खिलाड़ियों की सदस्यता की सूची काफी लम्बी है। </strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7732" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><em>दिल्ली गोल्फ क्लब परिसर में नौ स्मारक स्थित हैं। <br />
1. लाल बंगला (प्रवेश द्वार के पास), <br />
2. गोल्फ क्लब में होल नंबर 6 के पास स्थित मस्जिद, <br />
3. गोल्फ क्लब में होल नंबर 4 के पास स्थित बगीची, <br />
4. गोल्फ क्लब में होल नंबर 10 के पास स्थित सैयद आबिद का मकबरा, <br />
5. गोल्फ क्लब में होल नंबर 14-16 के पास स्थित अज्ञात मकबरा, <br />
6. गोल्फ क्लब में होल नंबर 18 के पास स्थित अज्ञात मकबरा, <br />
7. बारह खंभा, 8. मीर तकी का मकबरा और <br />
9. स्विमिंग पूल से सटा हुआ स्मारक। </em></p>
<p>प्रवेश द्वार पर स्थित लाल बंगला को छोड़कर, दिल्ली गोल्फ क्लब में, ऐतिहासिक इमारतों को उनके अपने इतिहास से पूरी तरह से काट दिया गया है। अब वे किसी सांस्कृतिक या पुरातात्विक परंपरा की प्रतिनिधि बनकर खड़ी नहीं हैं, बल्कि उन्हें महज़ एक सजावटी वस्तु के तौर पर इस्तेमाल परिसर के अंदर है। अब तो इनके लाल बलुआही रंग को भी बदलकर सफ़ेद कर दिया गया है। परिसर के अंदर स्थित विरासतों की बात तत्काल के लिए किनारे कर, लाल बंगला, जो क्लब के प्रवेश द्वार के पास बाएं तरफ स्थित है, करते हैं। यह &#8216;प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958&#8217; के तहत संरक्षित है। लाल रंग के एक बोर्ड पर लिखा है। कहते हैं कि सर लाल बंगला ही &#8216;राष्ट्रीय स्मारक&#8217; घोषित है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7733" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>लेकिन यहाँ की अवस्था, बंगले की स्थिति, साफ़-सफाई देखकर ऐसा लगता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी शायद फाइलों पर अधिक साफ़-सफाई दिखा रहे हैं। इस बात को न तो संस्कृति मंत्रालय या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी प्रधानमंत्री को बताएँगे। शौचालय में प्रवेश जैसा मार्ग जो एक तरफ पुरातत्व और दूसरे तरफ दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा निर्मित लोहे के बाड़ से घिरा है, लाल बंगला परिसर की ओर जाता है। यहाँ निजी क्षेत्र के एक सुरक्षाकर्मी दिखे तो जरूर, लेकिन परिसर की गंदगी को देखकर, सूखे पत्तों का विशाल अम्बार देखकर, मिट्टी से बनी कई परतों की काई को देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसकी देखरेख करता है। </strong></p>
<p>दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर बिखरे हुए लगभग 10 स्मारक एक पहेली के टुकड़ों की तरह हैं। सबसे पहले तो, इनमें से ज़्यादातर जगहों पर जाना मना है और परिसर में प्रवेश करने के लिए क्लब अधिकारियों से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।  इसका मतलब यह भी है कि न केवल पर्यटक, बल्कि दिल्ली के कई लोग भी इन मध्ययुगीन इमारतों के अस्तित्व से अनजान हैं। इसके अलावा, गोल्फ कोर्स शायद एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ कोई दिल्ली के सभी सात शहरों के अवशेष देख सकता है। इनमें से ज़्यादातर स्मारक भव्य हैं, लेकिन वे गुमनाम मकबरे हैं — जो शहर के वास्तुशिल्प इतिहास के दस्तावेज़ीकरण में कमियों की ओर इशारा करते हैं।</p>
<blockquote><p>लाल बलुआ पत्थर से बने दो मकबरों का एक समूह, जो निजामुद्दीन की ओर  से आते फ्लाईओवर से दिखाई देता है, का निर्माण 1779-80 में हुआ था। इन उत्तर-मुगलकालीन संरचनाओं के केंद्र में चौकोर कमरे हैं, कोनों पर छोटे चौकोर कमरे हैं जिनके बीच आयताकार हॉल हैं, और चौकोर छतों के केंद्र में गुंबद हैं। प्रवेश द्वार के पास वाला मकबरा ज़्यादा पुराना लगता है, जिसमें एक ऊँचे चबूतरे पर एक चौकोर कमरा बना है। दोनों का लेआउट केंद्रीय कक्ष के चारों ओर बने बड़े मकबरों जैसा है, लेकिन आकार में ये छोटे हैं। पास में ही उत्तर-मुगलकालीन दो-मंज़िला प्रवेश द्वार है, जिसमें एक केंद्रीय मंडप और गुंबददार छतरियाँ बनी हैं। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7734" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>लाल बंगला परिसर में घूमने, देखने से प्रतीत होता है कि यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी, या उनके द्वारा ठेकेदारी प्रथा से ही सही, श्रमिक कभी आये ही नहीं हैं। इस स्मारक या इस परिसर की मरम्मत कभी हुई ही नहीं है। यह जानना शोध का विषय है कि आखिर इसके रखरखाव पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अब तक कितनी राशि व्यय की है।अंदर प्रवेश के साथ दाहिने हाथ दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा निर्मित टेंट दीखते हैं। सामने क्लब के मैदान में घास काटने वालों की भीड़ दिखाई देती है। सामने मैदान में सफ़ेद रंग का मकबरा नुमा विरासत दिखाई देता है, जो सफ़ेद रंग का दीखता है । कहते हैं कि वह मकबरा सैयद आबिद, शाहजहाँ की सेना के एक प्रमुख सिपाही—खान दौराँ खान—के सहयोगी थे, की है। सामने लोहे के ग्रिल पर रसोइयों का वस्त्र भी दिखाई दिया। इस हिस्से में क्लब के कई पुराने सामानों के अलावे टूटे-फूटे सामानों का भण्डार भी दिखा। </p>
<p><strong>कोई पांच साल पहले, यानी 19 अगस्त, 2021 को दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली गोल्फ क्लब और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से एक याचिका पर उनका पक्ष पूछा था । इस याचिका में दावा किया गया था कि नागरिकों को क्लब परिसर में स्थित स्मारकों को देखने की अनुमति नहीं दी जा रही है। जस्टिस रेखा पल्ली ने केंद्र, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग और दिल्ली गोल्फ क्लब को नोटिस भी जारी किए थे, जवाब भी माँगा था। कोर्ट ने केंद्र और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से अपने जवाब में विशेष रूप से इस बात का ज़िक्र करने को कहा कि यहाँ के अन्य ऐसे ही स्मारकों में प्रवेश की अनुमति है या नहीं क्योंकि मामला सिर्फ़ दिल्ली गोल्फ क्लब से जुड़ा नहीं है। लेकिन आज जब दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर अंदर स्थिर विरासतों को देखने पर प्रतिबन्ध देखा तो पांच साल पहले की घटना याद आ गयी। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7735" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>बहरहाल, लाल बंगला के मामले में, इस बात पर कुछ बहस है कि यहाँ किसे दफनाया गया है। ज्यादातर ऐतिहासिक खोजें इस बात की पुष्टि करती हैं कि यह मकबरा बेगम जान—सम्राट शाह आलम द्वितीय की बेटी—और उनकी माँ नवाब ज़ीनत महल साहिबा (जिन्हें लाल कुँवर के नाम से भी जाना जाता था) का है; शायद इसी नाम के कारण इस स्मारक का नाम भी पड़ा हो। कुछ अन्य लोगों का मानना है कि यह मकबरा लाल कुंवर का हो सकता है, जो औरंगजेब के बेटे जहाँदार शाह की पत्नी थीं। मूल लाल बंगला परिसर में तीन गुंबददार मकबरे है। प्राचीन प्रवेश द्वार के पास वाला मकबरा लगभग 1626 ईस्वी में बनाया गया था और इसमें सैयद आबिद की कब्र है, जो शाहजहाँ के प्रमुख सैनिकों में से एक, खान दौरन खान के सहयोगी थे। यह मकबरा आम जनता के लिए सुलभ नहीं है क्योंकि यह दिल्ली गोल्फ क्लब के परिसर के अंदर स्थित है। शेष दो मकबरों में मुग़ल शैली की वास्तुकला को दर्शाता है। ये मकबरे पास में ही बने सफ़दरजंग के मकबरे से वास्तुकला के मामले में काफ़ी मिलते-जुलते हैं।</p>
<p>कहते हैं कि लाल कुँवर को कभी गाने वाली लड़की, कभी नाचने वाली लड़की, कभी &#8216;नौच गर्ल&#8217; या &#8216;कंचनी&#8217; कहकर पुकारा जाता था। उनका दरबार से पहले कोई लेना-देना नहीं था और न ही वे किसी शाही परिवार से थीं, लेकिन धीरे-धीरे वे जहाँदार शाह की सबसे पसंदीदा साथी बन गईं। कहा जाता है कि उनके पिता, ख़ुसूसियत ख़ान, अकबर के ज़माने के मशहूर संगीतकार मियाँ तानसेन के वंशज थे। लाल कुंवर का बादशाह पर बहुत ज़्यादा असर था। उन्होंने बादशाह को ऐशो-आराम और मौज-मस्ती में डूबे रहने के लिए उकसाया, जिसकी वजह से आख़िरकार बादशाह का बहुत ही शर्मनाक पतन हुआ। इसका एक बहुत ही बुरा उदाहरण यह है कि उन्होंने अपनी सहेली ज़ुहरा को, जो दिल्ली की सड़कों पर फल और सब्ज़ियाँ बेचती थी, बादशाह की सबसे खास सेविका बना दिया था।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7736" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>जहाँदार शाह का राज बहुत कम समय तक चला—29 मार्च 1712 से 11 फ़रवरी 1713 तक। उन्हें और लाल कुँवर, दोनों को ही जेल में डाल दिया गया था। इसके बाद जहाँदार शाह को पीट-पीटकर मार डाला गया और फिर उनका सिर काट दिया गया। जहाँदार शाह के शव को बाद में दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया—दो हाथियों से उल्टा लटकाकर—और फिर उन्हें हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया। लाल कुंवर सज़ा से बच गईं, और 17 जून 1759 को अपनी मृत्यु तक उन्हें सुहागपुरा में निर्वासित रखा गया। यह भी कहा जाता है कि दोनों मकबरे ज़ीनत महल साहिबा (जिन्हें प्यार से लाल कुंवर भी कहा जाता था) और बेगम जान के थे; ये दोनों ही दिवंगत मुगल बादशाह शाह आलम II (1728-1806) की माँ और बेटी थीं। </strong></p>
<p>कैर स्टीफन ने अपनी किताब &#8220;The Archaeology and Monumental Remains of Delhi&#8221; (1876 में प्रकाशित) में लिखा है कि इस मकबरे में एक कब्र मौजूद थी, जिसे हाल ही में वहाँ से हटा दिया गया था। यह कब्र बेगम जान की थी—जो शाह आलम II की बेटी थीं। मज़े की बात यह है कि पहले मकबरे में मौजूद कब्रों में से एक कब्र को भी इन्हीं बेगम जान का बताया जाता है! हो सकता है कि पहले मकबरे में मौजूद दूसरी कब्र शाही परिवार के किसी और सदस्य की रही हो। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि पिछले कई सालों में ऐसी बहुत सी कब्रें (या स्मारक) गायब हो चुकी होंगी।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7737" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कुछ विद्वानों का यह भी दावा है कि इस मकबरे में &#8211; जो अब पूरी तरह खाली है &#8211; कभी और भी कब्रें मौजूद थीं। ये कब्रें मिर्ज़ा सुल्तान परवेज़, मिर्ज़ा दारा बख्त (जिनकी मृत्यु 1849 में हुई थी; ये बीसवें और आखिरी मुगल बादशाह, बहादुर शाह ज़फ़र के सबसे बड़े बेटे थे) और मिर्ज़ा दाऊद की थीं। यह बात थोड़ी अजीब लगती है कि मिर्ज़ा दारा बख्त की मृत्यु के महज़ 25 साल बाद प्रकाशित हुई कैर स्टीफन की किताब में इन लोगों का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। इस तरह, यह भी एक और रहस्य बनकर ही रह जाता है। इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि तीन लापता मकबरे अकबर द्वितीय (मृत्यु 1837) के परिवार से जुड़े हैं। ज़ाहिर है, इस जगह में काफ़ी बदलाव आए हैं। लाल बंगला की कुछ मूल इमारतें अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी हैं, इसके घेरे के बचे हुए हिस्से को गोल्फ़ कोर्स में बदल दिया गया है, और पिछले कुछ सालों में छतरियों को भी हटा दिया गया है; ऐसे में आज यहाँ जो कुछ भी बचा है, वह उस मूल स्वरूप का बस एक छोटा सा हिस्सा भर है जो कभी यहाँ मौजूद था।</p>
<p><strong>बहरहाल, विगत दिनों भारत का सर्वोच्च न्यायालय के  न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति  एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिल्ली पुलिस को राजधानी में सभी सुरक्षित स्मारकों और हेरिटेज जगहों को अतिक्रमण और तोड़-फोड़ से बचाने का निर्देश दिया। साथ ही, इन इमारतों को बचाने की तुरंत जरूरत पर ज़ोर दिया। कंजर्वेशनिस्ट और इतिहासकार स्वप्ना लिडल की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए, जिसमें इन ज़रूरी चिंताओं को बताया था। कोर्ट ने कहा, “हम दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को निर्देश देते हैं कि वे उन सभी लोकल स्टेशन हाउस ऑफिसर को निर्देश दें जो या तो सुरक्षित हैं या हेरिटेज या ऐतिहासिक महत्व की जगहों की कैटेगरी में आते हैं, ताकि उन्हें अतिक्रमण या तोड़-फोड़ के खतरे से बचाया जा सके।” कोर्ट दिल्ली के रहने वाले राजीव सूरी की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें डिफेंस कॉलोनी में शेख अली की गुमटी को बचाने की मांग की गई थी। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7738" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>न्यायालय ने लिडल की रिपोर्ट की जांच की, जिसमें महरौली में प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स के 100 मीटर के बैन एरिया में बन रहे स्ट्रक्चर दिखाने वाली तस्वीरें शामिल थीं। उन्होंने कई जगहों पर तोड़-फोड़ के मामलों का भी ज़िक्र किया। लिडल ने दिल्ली सरकार को अपने आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा कंज़र्व किए जा रहे कई स्ट्रक्चर को &#8220;प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स&#8221; के तौर पर नोटिफ़ाई करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। सीनियर एडवोकेट शिखिल सूरी ने कहा, “दिल्ली में 48 मॉन्यूमेंट हैं जिन्हें दिल्ली सरकार को प्रोटेक्टेड के तौर पर नोटिफाई करना है, लेकिन 2015 से ऐसा नहीं किया गया है।” उनकी रिपोर्ट में 1397 के मॉन्यूमेंट ‘तरबूज का गुंबद’ का उदाहरण दिया गया, जो अभी साउथ दिल्ली के एक स्कूल में है। इसमें दिल्ली गोल्फ क्लब में मुगल-काल के तीन स्ट्रक्चर को भी मार्क किया गया है जो बहुत खराब हालत में हैं।</p>
<p>पीठ ने कहा: “हमें लगता है कि गोल्फ क्लब के अंदर के स्ट्रक्चर पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किए गए हैं। इंटेक ने दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा स्ट्रक्चर का पूरी तरह से मेंटेनेंस करने की ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए सुपरविज़न और विजिलेंस न रखकर आंखें मूंद ली हैं। हमें नई दिल्ली म्यूनिपाल कौंसिल का ऐसा बर्ताव लापरवाही का एक बड़ा मामला लगता है।” नई दिल्ली म्यूनिपाल कौंसिल के वकील ने बताया कि ज़मीन क्लब को लीज़ पर दी गई थी। बेंच ने कहा, “एक बार जब आप इसे दे देते हैं, तो आप इस पर सोते रहते हैं और इसकी परवाह नहीं करते। ऐसा लगता है कि राज्य इन स्ट्रक्चर की हेरिटेज वैल्यू को नहीं समझता है। वे पूरी तरह से खराब हो चुके हैं और उन पर पेड़-पौधे उग रहे हैं।”इंटेक की 2021 की रिपोर्ट में दिल्ली में 1,100 से ज़्यादा नोटिफ़ाइड हेरिटेज साइट्स और स्ट्रक्चर्स का डॉक्यूमेंटेशन है, जो मुगल-पूर्व से लेकर कॉलोनियल समय के आखिर तक के समय को कवर करते हैं।</p>
<p>इतना ही नहीं, विगत दिनों अपने आदेश के जानबूझकर किए गए उल्लंघन पर सख्त रुख अपनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को अवमानना का नोटिस जारी किया है। यह नोटिस राष्ट्रीय राजधानी में 173 अधिसूचित विरासत स्थलों के संरक्षण की स्थिति पर जवाब दाखिल करने में विफल रहने के कारण जारी किया गया है।</p>
<p><strong>तस्वीरें: संजय शर्मा </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/modi-hai-toh-mumkin-hai-slogan-lies-flat-on-its-face-at-the-entrance-of-the-delhi-golf-club">&#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित्त&#8217;, आप शताब्दी पुराने &#8216;आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;आई लव यू पिंकी&#8217;, &#8216;स्वीटी लव्स जानू&#8217;, &#8216;कॉल मी एट &#8230;.&#8217; और 18 अप्रैल को &#8217;43 वां विश्व विरासत दिवस&#8217; का जश्न</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 12:14:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[april 18]]></category>
		<category><![CDATA[archeological survey of india]]></category>
		<category><![CDATA[heritage]]></category>
		<category><![CDATA[safdarjung tomb]]></category>
		<category><![CDATA[world heritage day]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अरविंदो मार्ग (नई दिल्ली) : आज ही नहीं, आने वाले कल के भी युवापीढ़ी देश के कोने-कोने में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्व और ऐतिहासिक विरासतों की दीवारों पर &#8220;आई लव यू पिंकी&#8221;, &#8220;स्वीटी लव्स जानू&#8221;, &#8220;कॉल मी एट &#8230;. &#8221; लिखना बंद कर दें, तो इन विरासतों के रख-रखाव पर होने वाले खर्चों में न्यूनतम 20 फीसदी [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अरविंदो मार्ग (नई दिल्ली) : आज ही नहीं, आने वाले कल के भी युवापीढ़ी देश के कोने-कोने में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्व और ऐतिहासिक विरासतों की दीवारों पर &#8220;आई लव यू पिंकी&#8221;, &#8220;स्वीटी लव्स जानू&#8221;, &#8220;कॉल मी एट &#8230;. &#8221; लिखना बंद कर दें, तो इन विरासतों के रख-रखाव पर होने वाले खर्चों में न्यूनतम 20 फीसदी की कमी तो आ ही जाएगी।  इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अभिलाषा &#8211; विरासत सिर्फ इतिहास नहीं, यह मानवता की एक साझा चेतना भी है &#8211; उनके ही काल में पूरा हो जाता। लेकिन &#8216;का पर करब श्रृंगार पिया मोर आन्हर।&#8217; </strong></p>
<p>पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि &#8216;विरासत सिर्फ़ इतिहास नहीं है। बल्कि यह मानवता की एक साझा चेतना है। जब भी हम ऐतिहासिक स्थलों को देखते हैं, तो यह हमारे मन को मौजूदा भू-राजनीतिक कारकों से ऊपर उठा देता है।&#8217; प्रधानमंत्री ने यह भी स्वीकारा कि हमारी विरासत सिर्फ़ पत्थरों, लिपियों या खंडहरों से नहीं बनी है। यह मंदिर की दीवार की हर सरसराहट, प्राचीन किलों पर की गई हर नक्काशी और पीढ़ियों से चले आ रहे हर लोकगीत में जीवित है। यह उन कहानियों को बताती है कि हम कौन थे, हम किन मूल्यों के लिए खड़े थे और हमने कैसे विपरीत परिस्थितियों का सामना किया। विश्व विरासत दिवस एक दिल को छू लेने वाली याद दिलाता है कि ये कालातीत खजाने सिर्फ़ प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए भी हैं।</p>
<blockquote><p>बहरहाल, नवाब शुजा-उद-दौला द्वारा अपने पिता मिर्ज़ा मुकीम अबुल मंसूर खान &#8216;सफदरजंग&#8217; के सम्मानार्थ बनाए गए मकबरे के प्रवेश के साथ दाहिने हाथ दूर तक लोहे की बनी कृत्रिम सीढ़ियों के बीच कुछ मजदूर बाहरी दीवारों पर सदियों पुराने पत्थरों, ईंटों के बीच की परत को साफ़ कर रहे थे। छेनी-हथौड़े की चोट से खट-खट ध्वनि आ रही थी। और हम उसी ध्वनि के बीच से 43 वां विश्व विरासत दिवस मनाने के सप्ताह में प्रवेश कर रहे हैं। इस वर्ष &#8216;संघर्षों और आपदाओं के संदर्भ में जीवित विरासत के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया&#8217; विषय को आधार मानकर आगामी 18 अप्रैल, 2026 मनाया जा रहा है। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7585" aria-describedby="caption-attachment-7585" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7585" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7585" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा के बाहरी दीवारों के आंतरिक हिस्सों का जीर्णोद्धार करता एक मजदूर  &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>यह कहा जा रहा है कि यह विषय उन सांस्कृतिक स्थलों और विरासत समुदायों को सुदृढ़ बनाने, उनकी रक्षा करने और उसमें लचीलापन विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देता है, जो अचानक आए संकटों और संघर्षों का सामना कर रहे हैं। आगे पचास-पचास कदम पर चारो दिशाओं से सफदरजंग मकबरे को जोड़ने वाली कभी प्रयोग में नहीं आयी सड़कों पर 550/- रूपये प्रतिदिन की दैनिक मजदूरी पर दिल्ली सल्तनत के बाहर के &#8216;भारतीय&#8217; महिला-पुरुष मजदूर उपेक्षित सड़कों पर मौसम के प्रभाव से जमने वाली मिट्टी, उगने वाले घास को खुरपी, छेनी, हथौड़ा, करनी से साफ़ कर रहे थे। </p>
<p>विश्व विरासत दिवस की घोषणा &#8216;स्मारकों और स्थलों पर अंतरराष्ट्रीय परिषद&#8217; ने ट्यूनीशिया में की थी जिसे बाद में यूनेस्को ने मंजूरी दी और सदस्य देशों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस दिवस का उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत की विविधता के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इसके संरक्षण तथा बचाव के लिए आवश्यक प्रयासों को बढ़ावा देना है।इसका मकसद मानव विरासत का उत्सव मनाना और उन समूहों को सम्मानित करना है जो इसके संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। यह सभी बातें कागजों और फाइलों पर लिखा है। पुरातत्वों और विरासतों की दीवारों पर तो कुछ और लिखा होता है। इस कहानी में उन बातों को नहीं लिखा जा सकता है। विश्वास नहीं हो तो देश के किसी भी शहर में स्थित पुरातत्वों पर भ्रमण-सम्मेलन का विश्वास अर्जित कर लें।  </p>
<figure id="attachment_7586" aria-describedby="caption-attachment-7586" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7586" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7586" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा के दाहिने हिस्से के सामने बना पानी का जमावबड़ा  &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>यह तो सर्वविदित है कि भारत, दुनिया के कुछ सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक और पुरातात्विक खजानों का घर है। खजुराहो के बारीक नक्काशी वाले मंदिरों और हम्पी के ऐतिहासिक खंडहरों से लेकर पूजनीय सोमनाथ मंदिर तक, यह देश ऐसे स्मारकों की एक विशाल श्रृंखला का दावा करता है जो इसके समृद्ध इतिहास, विविध परंपराओं और स्थापत्य कला की भव्यता को दर्शाते हैं। उत्तरी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी के दक्षिणी छोर तक फैले ये स्थल भारत के गौरवशाली अतीत और सांस्कृतिक विरासत के प्रमाण हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और मौसम के चरम पैटर्न, जैसे कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर, लू, जंगल की आग, मूसलाधार बारिश और तेज़ हवाएँ, इन अमूल्य ऐतिहासिक स्थलों को गंभीर खतरे में डाल रहे हैं। इन कारकों से होने वाला नुकसान चल और अचल, दोनों प्रकार की विरासतों के क्षरण की गति को तेज कर रहा है, जिससे भारत की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर खतरा मंडरा रहा है। इन ऐतिहासिक खजानों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि तत्काल सुरक्षा उपायों के अभाव में इनका भविष्य खतरे में बना रहेगा।</strong></p>
<figure id="attachment_7587" aria-describedby="caption-attachment-7587" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7587" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7587" class="wp-caption-text">​हुमायूँ का मकबरा। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>1861 में स्थापित, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण 3,698 स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा और रखरखाव के लिए जिम्मेदार है, जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। ये स्थल &#8216;प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904&#8217; और &#8216;प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958&#8217; के तहत संरक्षित हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण प्रागैतिहासिक शैल-आश्रयों, नवपाषाणकालीन स्थलों, महापाषाणकालीन समाधियों, शैल-उत्कीर्ण गुफाओं, स्तूपों, मंदिरों, चर्चों, मस्जिदों, मकबरों, किलों, महलों और अन्य सहित विरासत की एक विस्तृत श्रृंखला का संरक्षण करता है। ये स्थल भारत के समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को दर्शाते हैं।</p>
<p>भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपने 37 सर्कल कार्यालयों और 1 मिनी सर्कल कार्यालय के माध्यम से काम करता है, जो मुख्य रूप से राज्यों की राजधानियों में स्थित हैं; यहाँ यह संरक्षण प्रयासों और पर्यावरणीय विकास का समन्वय करता है। इसका लक्ष्य इन ऐतिहासिक स्थलों की अखंडता को आने वाली पीढ़ियों के लिए बनाए रखना है, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे अपने मूल रूप में संरक्षित रहें और भारत की विरासत को दर्शाते रहें। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत स्मारकों के संरक्षण के लिए आवंटित राजस्व में 70% की वृद्धि हुई है। वर्ष 2020-21 में, आवंटन ₹260.90 करोड़ था और व्यय ₹260.83 करोड़ था, जबकि वर्ष 2023-24 में, आवंटन और व्यय दोनों बढ़कर ₹443.53 करोड़ हो गए। </p>
<figure id="attachment_7588" aria-describedby="caption-attachment-7588" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7588" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7588" class="wp-caption-text">​पुरानी दिल्ली स्थित अजमेरी गेट का दृश्य । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>वैसे, भारत ने विश्व धरोहर सूची में अपनी उपस्थिति का लगातार विस्तार किया है। जुलाई 2024 में, असम के &#8220;मोइडाम्स: अहोम राजवंश की टीला-समाधि प्रणाली&#8221; को एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में शामिल करके एक गौरवपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अक्टूबर 2024 तक, 196 देशों में 1,223 विश्व विरासत स्थल हैं (952 सांस्कृतिक, 231 प्राकृतिक, 40 मिश्रित)। भारत के अब विश्व धरोहर सूची में 43 स्थल हो गए हैं, और 62 अन्य स्थल यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल हैं। देश की यह यात्रा 1983 में आगरा किले को सूची में शामिल करने के साथ शुरू हुई थी, जिसके बाद ताजमहल, अजंता गुफाएं और एलोरा गुफाएं भी इस सूची में शामिल हुईं। इन स्थलों को न केवल इतिहास के प्रतीकों के रूप में संरक्षित किया जाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सीखने के स्थानों के रूप में भी सहेज कर रखा जाता है।</strong></p>
<p>भारत ने अपनी विशाल सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर की रक्षा, जीर्णोद्धार और उसे बढ़ावा देने के लिए कई सार्थक कदम उठाए हैं। ये पहलें देश की शाश्वत परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। साथ ही, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। सरकार ने वर्ष 1976 से 2024 के बीच विदेशों से 655 प्राचीन वस्तुएँ वापस हासिल की हैं, जिनमें से 642 प्राचीन वस्तुएँ 2014 के बाद वापस लाए गए हैं।</p>
<figure id="attachment_7589" aria-describedby="caption-attachment-7589" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7589" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7589" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा में प्रवेश के साथ दाहिने हाथ बगीचे के बीच से आती सड़क जो कई दशक से उपकेशित थी &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<blockquote><p>आंकड़ों के अनुसार देश में तकरीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। अगर औसतन भारतीयों से पूछा जाय की वे अपने ही राज्य में स्थित न्यूनतम 10 ऐतिहासिक पुरातत्व और घरोहरों का नाम बताएं, तो उम्मीद है वे पांच अथवा छठे नाम बताते-बताते दम तोड़ देंगे। वजह यह है कि उन्हें उन ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है (अपवाद छोडकर्) यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। </p></blockquote>
<p>उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्णाटक का है जहाँ 506 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडु का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पांचवा स्थान गुजरात (293 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); छठा स्थान मध्य प्रदेश (292 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); सातवां स्थान महाराष्ट्र (285 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर), आठवां स्थान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ 174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; आंध्र प्रदेश में 129 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हरियाणा में 91 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; ओडिसा में 79 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; बिहार में 70 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; जम्मू-कश्मीर में 56 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; असम में 55 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; छत्तीसगढ़ में 47 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; उत्तराखंड में 42 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हिमाचल प्रदेश में 40 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; पंजाब में 33 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; केरल में 27 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; गोवा में 21 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; झारखण्ड में 13 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं और अंत में दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं।</p>
<p>बहरहाल, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का भारतीयऐतिहासिक स्मारकों, पुरातत्वों और विरासतों के संरक्षण के बारे में क्या कहना है यह तो गहन शोध का विषय है ही, लेकिन मुगलकालीन अवध के गर्वनर मिर्ज़ा मुक़ीम अबुल मंसूर खान &#8216;सफदरजंग&#8217; का मकबरा और उसका परिसर इस साल के अंत तक भव्य अवश्य दिखेगा &#8211; बशर्ते ऐतिहासिक विरासतों के रखवालों की नियत साफ़ रहे। अगर सरकारी कोष से निकली राशि का कुछ अंश खर्च कर, दीवारों को लाल-पीला कर, चुना लेप कर, शेष राशियों को मुनाफा में तब्दील करने की सोच होगी तो शायद विरासतों का हाल भी दयनीय ही रहेगा। क्योंकि मुद्दत बाद सफदरजंग मकबरा के साथ-साथ परिसर में चारो तरफ इसके रख-रखाव को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। </p>
<figure id="attachment_7590" aria-describedby="caption-attachment-7590" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7590" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7590" class="wp-caption-text">​​सफदरजंग मकबरा &#8211; उपेक्षित दीवारों की मरम्मति का अभियान &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>मुहम्मद मुकीम, जिन्हें सफदरजंग के नाम से ज़्यादा जाना जाता है, अवध के दूसरे नवाब (शासनकाल: 1539-54) और मुग़ल दरबार के एक अहम व्यक्ति थे। उन्होंने मुगल दरबार में प्रधानमंत्री के तौर पर काम किया और मुग़ल शासक मुहम्मद शाह (शासनकाल: 1719-48) ने उन्हें ‘सफदरजंग’ की उपाधि दी। मुहम्मद शाह, जिन्हें रंगीला (रंगीन मिज़ाज वाला) के नाम से ज़्यादा जाना जाता था, दरबार के बजाय हरम में ज़्यादा समय बिताना पसंद करते थे। उन्हें अपना साम्राज्य सफदरजंग के हाथों में सौंपने में बहुत खुशी होती थी। रंगीला की मौत के बाद भी यह परंपरा जारी रही, क्योंकि उनके उत्तराधिकारी अहमद शाह बहादुर (शासनकाल: 1748-54) ने अपने पिता के नक्शेकदम पर ही चले। इससे सफदरजंग और भी ज़्यादा ताकतवर हो गए। 1753 में, सफदरजंग ने अपनी योजना में कुछ ज़्यादा ही दांव लगा दिया और मराठों की मदद से उन्हें मुग़ल दरबार से बाहर निकाल दिया गया। वे भागकर अवध चले गए और अपनी मौत के समय ही दिल्ली लौटे, जब उनके बेटे शुजा-उद-दौला ने अपने पिता का मकबरा दिल्ली में बनवाने की इजाज़त मांगी।</strong></p>
<figure id="attachment_7591" aria-describedby="caption-attachment-7591" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7591" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7591" class="wp-caption-text">सफदरजंग मकबरा &#8211; दाहिने तरफ का उपेक्षित स्थान &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>सफदरजंग का मकबरा, ऐसा माना जाता है कि हुमायूँ के मकबरे से प्रेरित है। यह मकबरा परिसर के केंद्र में स्थित है और चारों ओर से बगीचों से घिरा हुआ है। पहली नज़र में यह ताज महल का बलुआ पत्थर वाला रूप लग सकता है, लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि इस मकबरे में ताज महल जैसा अनुपात नहीं है; इसकी ऊंचाई कुछ ज़्यादा ही सीधी है और इसमें पिरामिड जैसा एहसास नहीं है, जिसकी वजह से इसका संतुलित स्वरूप कहीं खो सा गया है। विलियम डेलरिम्पल अपनी किताब, *सिटी ऑफ़ जिन्स* में लिखते हैं: “दुनिया भर का हर स्कूली बच्चा ताज के स्वरूप को जानता है, और जहाँ तक सफदरजंग के मकबरे की बात है, तो पहली नज़र में यह कुछ अलग और गलत सा लगता है: इसकी रेखाएं कहीं न कहीं दोषपूर्ण और खटकने वाली हद तक गलत लगती हैं।” वे आगे कहते हैं, “&#8230;आप इसे जितनी देर तक देखते हैं, इस मकबरे के गुण और इसका चरित्र उतने ही ज़्यादा स्पष्ट होते जाते हैं, और यह बात भी उतनी ही साफ हो जाती है कि इसका वास्तुकार सिर्फ़ ताज की नकल करने की कोशिश नहीं कर रहा था, और न ही वह इसमें नाकाम रहा।” </p>
<figure id="attachment_7592" aria-describedby="caption-attachment-7592" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7592" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7592" class="wp-caption-text">सफदरजंग मकबरा &#8211; पिछले हिस्से में मरम्मत हेतुर सामग्रियों का जमाव &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p><strong>सफदरजंग का मकबरा एक ऊंचे चबूतरे पर बना है, जिस तक जुड़वां सीढ़ियों से पहुंचा जा सकता है। मकबरे के ऊपर एक बड़ा, गोल गुंबद बना हुआ है। इस चौकोर मकबरे के कोनों पर बहुभुजी मीनारें बनी हैं, जिनके ऊपर छतरियां लगी हैं। मकबरे का बीच वाला कमरा चौकोर आकार का है और इसमें सफदरजंग की संगमरमर से बनी एक सुंदर और नक्काशीदार कब्र है। इसके नीचे स्थित निचले कमरे (जो आम जनता के लिए खुला नहीं है) में दो कब्रें हैं; माना जाता है कि दूसरी कब्र सफदरजंग की पत्नी की है। बीच वाले कमरे के चारों ओर आठ छोटे कमरे बने हैं, जिनमें से कोनों वाले कमरे अष्टभुजी आकार के हैं। इन सभी कमरों को नक्काशीदार और रंगीन प्लास्टर के काम से सजाया गया है। आज, सफदरजंग का मकबरा रात के समय रोशनी से जगमगा उठता है, जिससे यह एक भव्य और शानदार नज़ारा पेश करता है। कहते हैं इस मकबरे को बनाने में लगभग तीन लाख रुपये खर्च हुए थे।</strong></p>
<figure id="attachment_7593" aria-describedby="caption-attachment-7593" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7593" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7593" class="wp-caption-text">सफदरजंग मकबरा &#8211; प्रवेश के साथ दाहिने हाथ स्थित मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए आये लोग &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा<br /></figcaption></figure>
<p>इस मकबरे के गुंबद के संगमरमर के काम में पिछले दो सालों में दरारें और खाली जगहें आ गई थी, जिसे बाद में संगमरमर के बीच की दरारों और खाली जगहों को भरा गया था। इस कार्य पर ₹45 लाख खर्च हुआ था। गुंबद के चारों ओर अलग-अलग हिस्सों में भी दरारें भरी गयी थी। मरम्मत के अलावा, संगमरमर को चमकाया गया था ताकि पर्यटन की दृष्टि से यह अधिक आकर्षक लग सके। चूंकि 18वीं सदी के इस मकबरे का गुंबद सफ़ेद संगमरमर से बना है, इसलिए इस कार्य के लिए कच्चा माल राजस्थान के मकराना और धौलपुर से मंगाया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक अधिकारी का कहना है कि &#8220;हमारी पूरी कोशिश होती है कि हम न केवल सफदरजंग मकबरा, बल्कि हमारे अधिक के सभी ऐतिहासिक पुरातवों और विरासतों को उनकी मूल विशेषताओं को बनाए रखकर उसे बनाए रखें। दिल्ली में खासकर ऐसे स्थानों पर उनके बगीचे सबसे अधिक आकर्षक होते हैं, यहाँ भी हैं, इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सफदरजंग मकबरा उप-सर्कल में पुरातात्विक उद्यानों के वार्षिक रखरखाव और देखभाल के लिए 29 अगस्त 2025 को (संदर्भ संख्या 15/36/2025-W (गार्डन) 4594445/- रुपये का एक ई-टेंडर निकाला गया था। आप बगीचे की स्थिति देख सकते हैं।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7594" aria-describedby="caption-attachment-7594" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7594" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7594" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा &#8211; पिछला हिस्सा  &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>विगत वर्ष 18 सितम्बर 2015 को केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा था कि देश में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकार क्षेत्र में 3685 केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारक/स्थल हैं। इन केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों और स्थलों का संरक्षण, परिरक्षण और रखरखाव एक सतत प्रक्रिया है, और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति के अधीन, आवश्यकता और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार कार्य किए जाते हैं। आवश्यकतानुसार, स्मारक/स्थल की मरम्मत, जीर्णोद्धार और संरचनात्मक स्थिरीकरण कार्यों के लिए LiDAR मैपिंग, GIS और ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण जैसे आधुनिक उपकरणों को अपनाया जाता है। ज्ञातव्य हो कि देश में केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों और स्थलों के संरक्षण पर 2020-21 में 260.83 करोड़, 2021-22 में 269.57 करोड़, 2022-23 में 391.93 करोड़, 2023-24 में 443.53 करोड़ और 2024-25 में 313.04 करोड़ खर्च हुए थे।</strong> </p>
<figure id="attachment_7595" aria-describedby="caption-attachment-7595" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7595" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7595" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा सामने से &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना एक निरंतर और बहुआयामी प्रयास है, जिसके लिए पर्यावरणीय, कानूनी और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने हेतु सक्रिय उपायों की आवश्यकता होती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, विभिन्न एजेंसियों के सहयोग से, राष्ट्र के स्मारकीय खजानों की निगरानी, सुरक्षा और संरक्षण का कार्य जारी रखे हुए है। निरंतर समर्पण के साथ, ये प्रयास यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत का समृद्ध इतिहास आने वाली पीढ़ियों के अनुभव और सराहना के लिए सुरक्षित रहे।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/i-love-you-pinky-sweetie-loves-janu-and-the-43rd-world-heritage-day">&#8216;आई लव यू पिंकी&#8217;, &#8216;स्वीटी लव्स जानू&#8217;, &#8216;कॉल मी एट &#8230;.&#8217; और 18 अप्रैल को &#8217;43 वां विश्व विरासत दिवस&#8217; का जश्न</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-2)​ : मिट्टी के अंदर दबी मिथिला की संस्कृति जैसे कह रही है: &#8216;अंत तक पहुंचना हो तभी उत्खनन ​की शुरुआत करना&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Mar 2026 12:09:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[asi]]></category>
		<category><![CDATA[Blirajgarh]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[excavation]]></category>
		<category><![CDATA[heritage]]></category>
		<category><![CDATA[madhubani]]></category>
		<category><![CDATA[mithila]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली : उन दिनों बिहार और उड़ीसा के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे चार्ल्स एस बेली। कालखंड 1915 का था। पटना में डाक बंगला चौराहे से पटना उच्च न्यायालय के रास्ते आगे जाने वाली सड़क &#8216;बेली रोड&#8217;, चार्ल्स बेली ने नाम पर ही अलंकृत हैं। इनकी अध्यक्षता में पटना में आज से 111-साल पहले [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-culture-of-mithila-buried-beneath-the-soil-is-telling-us-something">​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-2)​ : मिट्टी के अंदर दबी मिथिला की संस्कृति जैसे कह रही है: &#8216;अंत तक पहुंचना हो तभी उत्खनन ​की शुरुआत करना&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली : उन दिनों बिहार और उड़ीसा के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे चार्ल्स एस बेली। कालखंड 1915 का था। पटना में डाक बंगला चौराहे से पटना उच्च न्यायालय के रास्ते आगे जाने वाली सड़क &#8216;बेली रोड&#8217;, चार्ल्स बेली ने नाम पर ही अलंकृत हैं। इनकी अध्यक्षता में पटना में आज से 111-साल पहले 1915 में बिहार और उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी ​संस्था का निर्माण हुआ। बिहार-ओड़िसा विभाजन के बाद यह बिहार रिसर्च सोसाइटी ​के नाम से जाना जाता है। बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के बाद ​यह संस्थान अपनी तरह की दूसरी सबसे​ पुरानी और सम्पन्न संस्था है।आज 3 मार्च, 2026 है। आज से 17-वर्ष पहले 2 मार्च, 2009 को बिहार रिसर्च सोसाइटी को बिहार सरकार अधिग्रहण किया था। ​और जब से बिहार सरकार के अधीन आया, बिहार रिसर्च सोसाइटी ही नहीं, शिक्षण, शोध से संबंधित जितनी भी संस्थाएं थी, बिलख बिलख कर मृत्युप्राय होती गयी। शब्द कटु हैं, लेकिन विचारणीय हैं।</strong> </p>
<p><em>आज होली की पूर्व संध्या भी है। आज ऐतिहासिक चंद्रग्रहण भी है। इसी समय मिथिला में मिथिला की माताएं &#8216;सप्ता-बिपता&#8217; व्रत करती हैं। भगवान सूर्य की उपासना करती हैं अपने पति, संतानों की लम्बी आयु, सुख-समृद्धि के लिए मंगल कामना करती हैं। सप्ता-बिपता&#8217; कथा के अनुसार विपत्ति के दिनों में नल-देवयंती का पुत्र एक विशाल पोखर में डूब जाता है। समयांतराल उसे एक मछली निगल जाती है। जब नल-देवयंती का समय सापेक्ष होने लगता है, एक दिन एक मछुआरा को विशालकाय मछली जाल में फंसती है। वह राजा के पास लेकर आता है। नौकरानी &#8216;चेरिया&#8217; जो मछली को साफ करने बैठती है, मछली की बोली सुनती है। मछली निर्देश देती है कि किस प्रकार वह काटे, साफ करे, क्योंकि नल-देवयंती का पुत्र अंदर है। &#8216;चेरिया&#8217; यह सुनकर बिलखने लगती है । आज मिथिला के बलिराजगढ़ में जब मिट्टी उत्खनन की बात शुरू हुई है तो ऐसा लगता है जैसे वहां की मिट्टी भी बोल रही हो, कह रही हो &#8220;अगर मिथिला की सांस्कृतिक गौरव-गाथा को वास्तविक रूप में जानना है, तो अंत तक जानने के लिए ही उत्खनन की शुरुआत करना, अन्यथा मुझे जमीन के अंदर ही रहने देना, मरे साथ अब राजनीति नहीं करना, थक गयी हूँ।&#8221;</em></p>
<p>मिथिला के लोग अगर दरभंगा राज के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह के नहीं हुए, ललित नारायण मिश्र के नहीं हुए, तो किसी के नहीं होंगे। सब समय और अवसरवादी अवसरों का खेल है। स्वाधीन भारत में अगर मिथिला के लोग सिर्फ इन दो महात्मनों के हुए होते, बिना किसी राजनीति और राजनीतिक लाभ के, तो शायद मिथिला का जो रूप और स्वरूप आज है, वह कुछ अलग होता। प्रदेश ही नहीं, देश ही नहीं, वैश्विक पटल पर मिथिला का आज तूती बोला जाता। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7420" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जितनी राजनीति देश के किसी अन्य प्रांतों में नहीं हुई, विशेषकर आज़ाद भारत में, मिथिला अपने ही लोगों की &#8216;स्वहित राजनीति&#8217; का शिकार होता गया। मिथिला के लोग (अपवाद छोड़कर) स्वहित में राजनीति का जाल बिछाते गए, कुछ फंसते गए, उच्च फंसाते गए। परिणाम यह हुआ कि &#8216;राजनेता&#8217;, &#8216;समाज-सेवक&#8217; तो बढ़ते गए, उनका पचास किलो का शरीर और तीन ​अंक वाला बैंक का खाता, जमीन-जायदाद में हज़ारो नहीं, अलबत्ता लाखों गुना का इजाफा हो  गया; लेकिन &#8216;मिथिला और मिथिला के आम लोग&#8217; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक यहाँ तक की राजनीतिक &#8216;विपन्नता&#8217; का शिकार होते गए, गरीबी रेखा के नीचे धंसते गए और सिर्फ मतदाता या अनुयायी बनकर &#8216;ताली बजाते&#8217; रह गए। </p>
<p><strong>दुर्भाग्य यह है कि सत्ता के गलियारे में बैठे लोग एक तरफ जहाँ मिथिला, मैथिली, मिथिला की गरिमा और संस्कृति की &#8216;तथाकथित विकास&#8217; के नाम पर जनमानस को लुभाकर स्वयं &#8216;संभ्रांत&#8217; हो रहे हैं, मिथिला की मिट्टी बिलख रही है। लेकिन सुनेगा कौन? क्योंकि आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मधुबनी जिले के बलिराजगढ़ में उत्खनन के लिए एक कागज़ पर मंजूरी क्या दिया, मिथिला के लोग यह दावा करने लगे कि यह उत्खनन मिथिला की इतिहास और गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को उजागर करेगी। इस &#8216;तथाकथित उत्खनन&#8217; से किसे कितना लाभ होगा, यह तो सत्ता में बैठे गणमान्य के अलावे बलिराजगढ़ की वीरान बंजर जमीन जानती ही हैं। </strong></p>
<p>आज मिथिला में स्थिति यह है कि जिस कार्य पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कार्यादेश का फरमान जारी किया है, और यह भी कहा है कि यह फरमान एक वर्ष की अवधि के लिए ही मान्य है; मिथिला के लोग इतने प्रसन्न हैं कि वे 3 जनवरी, 1975 को मिथिला के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर बम्ब धमाके में मृत्यु को प्राप्त किये ललित नारायण मिश्र का नाम भी सुनना नहीं चाहते, जहां तक बलिराजगढ़ अन्वेषण और उत्खनन का सवाल है। आज मिथिला के नेताद्वय, जो अपने हाथों में बलिराजगढ़ के बारे में कागज के पन्नों पर लिखे तथ्यों को आने से पहले नाम तक नहीं जाते थे, उसकी भौगोलिक स्थिति के बारे में कहना ही क्या, अख़बारों के पन्नों से लेकर टीवी के पर्दों और सामाजिक क्षेत्र के मीडिया प्लेटफॉर्मों पर अपनी-अपनी छवि देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। इसे कहते हैं राजनीति। वैसे बलिराजगढ़ में उत्खनन से क्या निकलेगा यह तो समय निर्धारित करेगा। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7421" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>हकीकत यह है कि अगर ललित नारायण मिश्र, प्रोफ़ेसर उपेंद्र ठाकुर, डॉ. सीताराम रॉय, डॉ. शिवकुमार मिश्र, पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुनील कुमार कर्ण ​(कर्ण द्वारा पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर नहीं किया गया होता), या साईकिल से मिथिला के पुरातत्वों की खोज करने वाले मुरारी कुमार झा बलिराजगढ़ के बारे में पिछले चार-पांच दशक और अधिक समय पूर्व से आज तक नहीं लिखे होते, प्रश्न नहीं ​किये होते, न्यायालय में सरकार के रवैय्ये की बात नहीं उठाये होते, तो शायद आज ये &#8216;सफेदपोश&#8221; नेतागण बलिराजगढ़ का नाम भी नहीं जानते। अगर ऐसा नहीं होता तो पटना उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर होने के बाद सत्ता के गलियारे से याचिककर्ता के घर में फोन की घंटी नहीं बजी होती &#8211; याचिका वापस लें, वापस लें, नहीं कहा गया होता, न्यायालय में जनहित याचिका &#8216;डिस्पोज ऑफ&#8217; के बदल &#8216;डिसमिस&#8217; नहीं किया गया होता । आज प्रदेश  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कालखंड में बलिराजगढ़ में एकत्रित जल में गाय-भैंस-बकरी नहाता है, लोग-बाग़ खुले में शौच करते हैं, अपनी-अपनी गाड़ियां धोते हैं, बच्चे उस परिसर में क्रिकेट खेलते हैं और दरवाजे के आसपास कुत्ते विचरण करते हैं। जबकि सत्ता के गलियारे में मिथिला की गरिमा और संस्कृति की बात करते थक नहीं रहे हैं लोग। </strong></p>
<figure id="attachment_7429" aria-describedby="caption-attachment-7429" style="width: 1515px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7.jpg" alt="" width="1515" height="1254" class="size-full wp-image-7429" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7.jpg 1515w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7-300x248.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7-1024x848.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7-768x636.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1515px) 100vw, 1515px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7429" class="wp-caption-text">उपेंद्र ठाकुर​ (अब दिवंगत)</figcaption></figure>
<p>आज से 34-वर्ष पहले दी जर्नल ऑफ़ दी बिहार रिसर्च सोसाइटी, जिसके संपादक रहे थे उपेंद्र ठाकुर, जनवरी-दिसंबर 1990-1992 के अंक (VOLS.LXXVI-LXXVIII) में &#8216;पुरातत्व की दृष्टि में मिथिलापुरी: बलिराजगढ़&#8217; शीर्षक में दस पन्नों का दस्तावेज-रूपी लेख प्रकाशित किया था। उपेंद्र ठाकुर मगध विश्वविद्यलय के एन्सिएंट इंडिया एंड एशियन स्टडीज के विभागध्यक्ष थे। इसी तरह सत्तर के दशक के उत्तरार्ध डॉ. सीताराम रॉय बलिराजगढ़ पर विस्तार से व्याख्या किय थे, जिसका दस्तवेजीकरण भी हुआ था, ताकि तत्कालीन सरकार, व्यवस्था और पुरात्तव से जुड़े लोगों का ध्यान बलिराजगढ़ की और आकर्षित किया जाय। </p>
<p>सैद्धांतिक रूप से इस लेख के प्रकाशन के पूर्व अथवा उसके बाद, बिहार के सत्ता के गलियारे में बैठे राजनेताओं, मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, संस्कृति मंत्री के कार्यालय में इस लेख की प्रतियां अवश्य गयी होगी। नब्बे के दशक में मुख्यमंत्री कार्यालय से डॉ. जगन्नाथ मिश्र कांग्रेस पार्टी को बोरिया-बिस्तर बांधकर विदा करने के बाद स्वयं निकल गए थे और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लालू प्रसाद यादव का आगमन हो गया। वैसे बिहार में जितने भी शोध संस्थान हैं, चाहे मिथिला शोध संस्थान  हो, मैथिली अकादमी हो, संस्कृत अकादमी हो, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संसथान हो, यह बिहार रिसर्च सोसाइटी हो या अन्य, सबों की हालत और हालात प्रदेश के राजनेताओं के साथ-साथ स्वहित में उनके साथ जुड़े लोगों ने नेश्तोनाबूत कर दिया।  लालू यादव को प्रदेश के पुरातत्व से कितना लगाव था, यह तो सर्वविदित है। </p>
<figure id="attachment_7422" aria-describedby="caption-attachment-7422" style="width: 1363px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3.jpg" alt="" width="1363" height="1993" class="size-full wp-image-7422" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3-205x300.jpg 205w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3-700x1024.jpg 700w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3-768x1123.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3-1050x1536.jpg 1050w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7422" class="wp-caption-text">कुदाल सेना के संस्थापक राम लखन झा (अब दिवंगत)</figcaption></figure>
<p><strong>कुदाल सेना और बलिराजगढ़ </strong></p>
<p>आज के लोगों को तो शायद यह भी ज्ञात नहीं होगा कि बलिराजगढ़ की खुदाई के लिए नब्बे के दशक के पूर्वार्ध वर्षों में रामलखन झा ने कुदाल सेना&#8217; का गठन कर दिया था। झा उन दिनों, न केवल प्रदेश में सत्ता के गलियारे में कुर्सी तोड़ते नेताओं और अधिकारियों को ललकार था, बल्कि प्रदेश क विद्वानों, विदुषियों और पुरातत्व प्रेमियों को आह्वान भी किया था कि वे मिथिला की सांस्कृतिक इतिहास और गरिमा को स्थापित और मजबूत करने क लिए बलिराजगढ़ की खुदाई करने आगे आएं। क्योंकि व्यवस्था इस दिशा में अपना  कदम नहीं उठा रहा था। उन दिनों उनकी बातों को बहुत ही प्रमुखता के साथ तत्कालीन अख़बारों में स्थान मिला था। वे कुदाल सेना का गठन किये थे। लेकिन सरकार में बैठे लोग कान में तेल और रुई डालकर सो गए थे। राजनीति में बैठे लोग समाज की संस्कृति के साथ कितने जुड़े होते हैं यह आज भी प्रदेश के उपेक्षित पुरातत्व स्थानों के साथ साथ बंजर और वीरान पड़े बलिराजगढ़ ज्वलंत दृष्टान्त है। </p>
<figure id="attachment_7432" aria-describedby="caption-attachment-7432" style="width: 776px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn.jpg" alt="" width="776" height="967" class="size-full wp-image-7432" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn.jpg 776w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn-241x300.jpg 241w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn-768x957.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 776px) 100vw, 776px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7432" class="wp-caption-text">सुनील कुमार कर्ण, अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार रिसर्च सोसाइटी की भूमिका </strong></p>
<p>बिहार रिसर्च सोसाइटी, देश के इंडोलॉजिकल और ओरिएंटल स्टडीज़ के सबसे पुराने इंस्टीट्यूशन में से एक है, जो रिसर्चर्स के लिए स्वर्ग था। 108 साल पहले इसकी शुरुआत से ही दुनिया भर के स्कॉलर्स इस केंद्र में आते रहे हैं, जिसके पास 10,000 से ज़्यादा संस्कृत और तिब्बती मैन्युस्क्रिप्ट्स का रेयर और मशहूर कलेक्शन है। जनवरी 1915 में पटना में बिहार और उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी के तौर पर उस समय के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर चार्ल्स एस बेली की चेयरमैनशिप में शुरू हुई यह इंस्टीट्यूशन हिस्ट्री, आर्कियोलॉजी, न्यूमिज़माटिक्स, फिलॉसफी, फिलोलॉजी, एंथ्रोपोलॉजी और फोकलोर में रिसर्चर्स के एकेडमिक इंटरेस्ट को पूरा करती रही। बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के बाद बिहार रिसर्च सोसाइटी अपनी तरह की दूसरी सबसे पुरानी इंस्टीट्यूशन है। </p>
<p>शायद आज के लोगों को मालूम हो अथवा नहीं, बिहार बनने के कुछ समय बाद ही, सरकार ने राज्य में संस्कृत स्टडी को रीऑर्गेनाइज़ करने का काम शुरू किया। सरकार की स्कीम में एक काम संस्कृत मैन्युस्क्रिप्ट्स का सर्वे करना था। इस मकसद के लिए दो इलाकों, मिथिला और पुरी को चुना गया। मिथिला में खोज के नतीजे में, स्मृति, साहित्य, ज्योतिष और वेदों पर मैन्युस्क्रिप्ट्स की चार वॉल्यूम की एक डिस्क्रिप्टिव कैटलॉग पब्लिश हुई। सोसाइटी ने आगे पूर्णिया, शाहाबाद, भागलपुर, पटना और गया ज़िलों पर डॉ. बुकानन की रिपोर्ट्स पब्लिश कीं। ये पब्लिकेशन इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी में रखी ओरिजिनल मैन्युस्क्रिप्ट्स और डॉ. बुकानन की रखी डायरियों से किए गए थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="alignright size-full wp-image-7423" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>एंथ्रोपोलॉजी के क्षेत्र में भी, बिहार रिसर्च सोसाइटी ने कीमती योगदान दिया है। इसके पहले सेक्रेटरी, राय बहादुर एस सी रॉय ने आदिवासियों के सामाजिक संगठन और रीति-रिवाजों का अध्ययन करने के लिए छोटानागपुर क्षेत्र का एक बड़ा सर्वे किया। नतीजे सोसाइटी के जर्नल में पब्लिश किए गए। सोसाइटी ने भारतीय इतिहास और आर्कियोलॉजी के क्षेत्र में भी बड़ी तरक्की की। हालांकि, बिहार रिसर्च सोसाइटी का सबसे कीमती सेक्शन तिब्बती सेक्शन है। </p>
<p>असल में, यह तिब्बत में जमा किए गए भारतीय रिपॉजिटरी का एक हिस्सा है, जिसे मशहूर भारतीय पंडितों, खासकर बौद्धों ने, जो पुराने समय में अपने धर्म और ज्ञान का प्रचार करने के लिए वहां गए थे। यह सेक्शन महापंडित राहुल सांकृत्यायन की कड़ी मेहनत की वजह से बना है, जो इंडोलॉजी के इतिहास में एक बड़ा नाम है। राहुल कलेक्शन में संस्कृत किताबों के तिब्बती भाषा में सही अनुवाद हैं, जो ज़्यादातर 7वीं और 13वीं सदी AD के बीच तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं ने लिखे थे, जो संस्कृत साहित्य के अच्छे जानकार थे। इस कलेक्शन में हाथ से बने कागज़ पर लकड़ी के ब्लॉक से छपी ज़िलोग्राफ़्ड किताबें, खुरदुरे कागज़ पर हाथ से लिखी कुछ मैन्युस्क्रिप्ट और पुरानी मैथिली में तालपत्र पर लिखे संस्कृत के फ़ोटो वाले टेक्स्ट शामिल हैं।</p>
<p>1930 के दशक में एक महान बौद्ध विद्वान, पंडित राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत से बहुत सारी मैन्युस्क्रिप्ट्स दान की थीं जो आज भी दुनिया में रेयर हैं। दान की गई चीज़ों में ज़ाइलोग्राफ, फिल्म शामिल थीं। नेगेटिव और पेंटिंग के अलावा बौद्ध धर्म, फिलॉसफी, तंत्र, आर्ट और कल्चर पर ज़रूरी किताबें भी हैं। सोसाइटी के पास जो तिब्बती ग्रंथ हैं, वे ल्हासा एडिशन हैं और उनकी एक्यूरेसी और अच्छी प्रिंटिंग को देखते हुए उन्हें सबसे अच्छा एडिशन माना जाता है। कांग-ग्यूर (कैनन) और तांग-ग्यूर (कमेंट्री) सीरीज़ के पूरे टेक्स्ट के अलावा, इस सेक्शन में इतिहास, फिलॉसफी, ज्योतिष और भारतीय और तिब्बती भिक्षुओं की बायोग्राफी समेत अलग-अलग टॉपिक पर 1619 अलग-अलग टेक्स्ट हैं, जिनमें से कई नालंदा और विक्रमशिला की पुरानी यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं। जब दलाई लामा फरवरी 1979 में BRS आए, तो वे इसका बड़ा कलेक्शन देखकर बहुत खुश हुए।</p>
<p><strong>बहरहाल, 2004 के कालखंड में राज्य सरकार ने पटना के सिर्फ़ 88 साल पुराने अंतराष्ट्रीय लेवल पर मशहूर इंडोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, बिहार रिसर्च सोसाइटी (BRS) को अपने कब्ज़े में लेने का फ़ैसला किया। जैसे ही सोसाइटी यह फैसला हुआ, सोसाइटी में सभी एकेडमिक और रिसर्च एक्टिविटीज़ पूरी तरह से रुक गई। 2 मार्च, 2009 को तत्कालीन सर्कार ने इसे पूर्णरूपेण अधिग्रहित कर ली। और उसके बाद बिहार रिसर्च सोसाइटी ही नहीं, प्रदेश के अन्य शोध संस्थानों का जो हश्र हुआ वह सर्वविदित हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7424" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>आइये बलिराजगढ़ चलते हैं</strong></p>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम ​बिहार राज्य इंटेक के को-कन्वेनर और पुरातत्वविद डॉ. शिव कुमार मिश्र</strong> से पुरातत्व की दृष्टि में मिथिला, खासकर बलिराजगढ़ के बारे में ​विस्तार से बातचीत किया। वे कहते हैं कि भारत-नेपाल सीमा के निकट बिहार के उत्तरी भाग में करीब दो सौ एकड़ का एक विशाल भू-भाग है जिसे लोग बलिराजगढ़ (मधुबनी जिला) या बलीगढ़ या बलराजगढ़ के नाम से जानते हैं। यद्यपि यह स्थल बिहार के अन्य प्राचीन स्थलों से अधिक आकर्षक है किन्तु इसके ऐतिहासिकता के लिए सामग्रियों का सर्वथा अभाव है। बिहार एवं मिथिला के इतिहास लेखकों में इस स्थल के प्रति कोई विशेष अभिरुचि नहीं मिलती है। अभी तक इस स्थल का पुरातात्विक उत्खनन कार्य तीन बार हो चुका है। यद्यपि पुरातात्विक दृष्टिकोण से ये उत्खनन अत्यल्प एवं अपूर्ण रहे हैं किन्तु इससे प्राप्त पुरावशेष मिथिला एवं बिहार की गौरवशाली संस्कृति को प्रतिबिंबित करती है।</p>
<p>मिश्र का कहना है कि बलिराजगढ़ की ऐतिहासिकता पर मतैक्य नहीं है। स्थानीय परम्परानुसार यह महाकाव्यों एवं पुराणों में वर्णित दानवराज बलि की राजधानी का ध्वंसावशेष है किन्तु पुरातात्विक उत्खननों से जानकारी मिलती है कि इसका निर्माण दूसरी सदी ई.पू. में हुआ था। इस प्रकार स्थानीय परंपरा को सही मानना अनुचित होगा। ओ मैले के अनुसार स्थानीय लोगों का विश्वास या कि इस समय भी राजा बलि अपने सैनिकों के साथ इस किले में रहते हैं। और इसी सम्भावना के भय से कोई भी इस भूमि को खेती के लिए जोतने को हिम्मत नहीं करता था। वे केवल दिन में मवेशियों को इस भूमि पर चराते थे किन्तु रात को इसे देखने से भी डरते थे। इस तरह प्रचलित अफवाहों के चलते इस भूमि एवं किला की सुरक्षा अपने-आप होती रही। </p>
<p><strong>उन्होंने आगे कहा कि एक अनुमण्डल अधिकारी ने इस गढ़ का उत्खनन कराना आरम्भ किया किन्तु वह गंभीर रूप से बुखार से पीड़ित हो गया। जिससे लोगों में यह अवधारणा बनी कि राजा बल ने ही उसे बीमार कर दिया है। बुकानन के अनुसार बेणु, बरिजन एवं सहस्रमल का चौथा भाई बल एक राजा था। इन चारों भाइयों ने एक-एक किला बनवाया जो उनके नामों से जाना जाता है। इन्हीं किलाओं में से बलिराजगढ़ भी एक है। </strong></p>
<p>मिश्र का मानना है कि बुकानन के अनुसार वे लोग डोमकटा ब्राह्मण थे, जो महाभारत में वर्णित राजा विराट के बाद तथा युधिष्ठिर के समकालीन थे। लेकिन इस मत को स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि अन्य किलाओं से बलराजगढ़ बहुत दूर है साथ ही सहसमल के किले की पहचान अभी तक नहीं की जा सकी है। एक अन्य विद्वान ने इस गढ़ को विदेहराज जनक के अन्तिम सम्राट द्वारा निर्मित माना है। </p>
<figure id="attachment_7425" aria-describedby="caption-attachment-7425" style="width: 1515px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6.jpg" alt="" width="1515" height="1254" class="size-full wp-image-7425" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6.jpg 1515w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6-300x248.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6-1024x848.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6-768x636.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1515px) 100vw, 1515px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7425" class="wp-caption-text">बिहार राज्य इंटेक के को-कन्वेनर और पुरातत्वविद डॉ. शिव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p>​शिव कुमार मिश्र के अनुसार जनक राजवंश के अंतिम चरण में आकर जनक वंश कई शाखाओं में बंट गया और उन शाखाओं का शासन विदेह राज्य के अन्तर्गत ही विभिन्न भूखण्डों पर रहा होगा और यह गढ़ उन्हीं में से किसी एक शाखा द्वारा बनवाया गया किला का ध्वंसावशेष है। उनके अनुसार किसी बलवान राजा द्वारा निर्मित कराने के कारण ही इस किला का नाम बलीगढ़ पड़ा। किन्तु इस मत के लिए ऐतिहासिक तथ्यों का सर्वथा अभाव है। प्रो. उपेंद्र झा ने बलिगढ़ का उल्लेख करते हुए लिखा है कि प्रख्यात चीनी यात्री हेनसांग ने तीरभुक्ति भ्रमण के क्रम में वैशाली गए तथा वैशाली से चेन-सु-ना सम्भवतः बलिगढ़ गए और वहाँ से बड़ी नदी अर्थात् महानंदा के निकट गए।</p>
<blockquote><p>शिव कुमार मिश्र कहते हैं कि बलिराजगढ़ की ऐतिहासिकता के लिए एक तर्क यह है कि विदेह राज जनक की राजधानी अर्थात् रामायण में वर्णित मिथिलापुरी यहीं स्थित थी। यद्यपि मिथिलापुरी की समता आधुनिक जनकपुर (नेपाल) से की गई है किन्तु पुरातात्विक सामग्रियों के अभाव में इसे सीधे मान लेना कठिन है। अन्यान्य विद्वानों ने भी आधुनिक जनकपुर को प्राचीन मिथिलापुरी मानने से इन्कार किया है। रामायण के अनुसार राम, लक्ष्मण एवं विश्वामित्रजी गौतम-आश्रम से ईशानकोण की ओर चलकर मिथिला नरेश के यज्ञमण्डप पहुंचे।&#8221; गौतमआश्रम की पहचान दरभंगा जिले के बह्मपुर गाँव से की गई है। जिसका उल्लेख स्कन्दपुराण में भी मिलता है। आधुनिक जनकपुर गौतम आश्रम अर्थात् ब्रह्मपुर से ईशानकोण में न होकर उत्तर दिशा में है। </p></blockquote>
<p>इस तरह गौतम आश्रम से ईशानकोण में बलिराजगढ़ को छोड़कर कोई ऐसा ऐतिहासिक स्थल नहीं दिखाई देता है जिस पर प्राचीन मिथिलापुरी होने की सम्भावना व्यक्त किया जा सके। पुनः पुरातात्त्विक उत्खननों के रिपोर्टों से ऐसी सूचना मिलती है कि पानी की सतह ऊँची रहने के कारण पूर्ण उत्खनन नहीं हो सका फिर भी तीसरी शताब्दी ई.पू. के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इसलिए ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ण उत्खनन होने पर तीसरी शताब्दी ई.पू. से पहले की सामग्री भी निश्चित रूप से प्राप्त हो सकती है। अब गौतम आश्रम से ईशानकोण में इस तरह के पुरावशेष अन्य स्थानों से नहीं प्राप्त हुए हैं अतः बलिराजगढ़ के पक्ष में ऐसा तर्क दिया जा सकता है कि बाल्मीकि की मिथिलापुरी इसी स्थल पर स्थित थी।</p>
<p>मिश्र का कहना है कि पालि साहित्य में कहा गया है कि अंग की राजधानी चंपा (आधुनिक भागलपुर) से मिथिला नगर की दूरी साठ योजन थी। महाउम्मग्ग जातक के अनुसार नगर के चारों द्वारों पर चार बाजार थे जिसे यवभञ्ज्यक कहा जाता था। भिक्षा के लिए पांच घर बनवाए गए थे जो चारों द्वारों पर एवं नगर के बीच में अवस्थित थे। नगर को चारों तरफ से पार करने के लिए गलियारे बने हुए थे। जातकों में दीवारों, द्वारों एवं परकोटों का भी उल्लेख मिलता है। राजा ऊपर के महल में रहते थे। महल में हवा आने के लिए पूरब से खिड़की रहता था। इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि बौद्ध काल में मिथिला नगर बहुत विकसित था। और इस तरह के विकसित नगर का पुरावशेष मिथिला में अन्यत्र कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। अतः इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि बौद्धकालीन मिथिलानगर का ध्वंशावशेष भी बलिराजगढ़ ही है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7426" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>मिश्र आगे कहते हैं कि महाभारत में मिथिला के अन्तिम राजा कराल जनक का उल्लेख है तथा बौद्ध साहित्य में कलार जनक का उल्लेख है। सम्भवतः दोनों एक ही था। कलार जनक का समय आठवी शताब्दी ई.पू. माना गया है। बौद्ध ग्रन्य दीपवंश से संकेत मिलता है कि कलार जनक के पश्चात् उसके वंश के पच्चीस राजाओं ने मिथिला नगर पर शासन किया किन्तु इन राजाओं के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है। प्रोफेसर योगेन्द्र मिश्र ने भी कलार जनक के पश्चात् इक्कीस राजाओं द्वारा मिथिला पर शासन करने की बात स्वीकार की है। उनके अनुसार कराल जनक के पश्चात् ई.पू. 347 तक विदेह में राजतन्त्र स्थापित था। ऐसा लगता है कि ई.पू. चौथी सदी के पश्चात् विदेह राज्य का क्षेत्र छोटा हो गया तथा छोटे-छोटे राजा इस पर शासन करने लगे। बलिराजगढ़ के अल्प उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों से इस बात की पुष्टि होती है कि इन कालों में भी प्रशासन का केन्द्र यहीं रहा। साथ ही मौर्य, गुप्त एवं बाद के समयों के प्राप्त पुरावशेषों से भी यह बात साबित होती है कि बलिराजगढ़ इन कालों में प्रशासनिक केन्द्र रहा तथा यहाँ एक विकसित एवं सुव्यवस्थित नगर बना रहा।</p>
<p><strong>मिश्र जी कहते हैं सर्वप्रथम आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के मध्य-पूर्वी अंचल द्वारा 1962-63 ई. में एक लघुस्तर का उत्खनन कराया गया। ​उसके अनुसार सुरक्षा दीवार मिट्टी की ईटों से निर्मित है तथा ऐसा लगता है कि इसका निर्माण दूसरी शताब्दी ई.पू. में हुआ जिसका उपयोग पालवंश के समय तक हुआ। दीवार का निर्माण एवं मरम्मत कार्य तीन चरणों में हुआ। ऐसा लगता है कि किसी भीषण बाढ़ में दीवार क्षतिग्रस्त हो गया जिसका पुनर्निर्माण कराया गया हो। रिपोर्ट के अनुसार सिक्के, हड्डियों के औजार, मनके, शुंगकालीन मिट्टी से निर्मित मूर्तियों के फलक तथा एक मन्दिर का भग्नावशेष आदि प्राप्त हुए हैं। प्राप्त फलकों में  बाएँ सिर कटी हुई महिला तथा दाएँ पुरुष के सिर का फलक है। पुरुष के सिर पर पगड़ी तथा आभूषण दिखाई दे रहे हैं। महिला का चित्र भी आभूषणों से सुसज्जित मालूम होता है। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="alignright size-full wp-image-7433" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>चित्र IB किसी देवता का फलक जैसा मालूम होता है। चित्र IC मिथुन फलक है इसमें मकर का चित्र भी नीचे से दिखाई देता है जिससे किसी देवी का फलक होने की सम्भावना लगती है। गंगादेवी का वाहन मकर है फिर भी इस फलक के लक्षणों से गंगादेवी के फलक की संज्ञा देना सम्भव नहीं जान पड़ता। लक्षणों से यह मिथुन फलक जैसा ही मालूम पड़ता है जिसका सिर चित्र 1A के सिर से मिलता है। मिथुन फलक आभूषणों एवं वस्त्रों से सुसज्जित दिखाई देता है। सिर पर बड़ी पगढ़ी तथा गले में हार है, हाथ में कोई अख जैसा मालूम होता है। फलक का दूसरा भाग टूटा हुआ मालूम पड़ता है किन्तु फलक पर बारीकी से कारीगरी की गई है। ID चित्र में बाएँ से एक महिला एक बच्चा को अपनी गोद में लेकर खड़ी है। इसे &#8216;अंक धात्री&#8217; का फलक माना जा सकता है। दाहिनी ओर की फलक में एक महिला एक बच्चा की गोद में लेकर खड़ी है। बच्चा का बायाँ हाथ महिला के बाएँ स्तन को स्पर्श कर रहा है जिससे स्पष्ट होता है कि माँ एवं बच्चा का यह फलक है जिसे &#8216;क्षीर भात्री&#8217; की संज्ञा दी जा सकती है। इस फलक की महिला का सिर टूटा हुआ है तथा गर्दन में एक सुन्दर हार है जो दोनों स्तन को स्पर्श करती हुई नीचे तक लटकती है। अंक धात्री का सिर साड़ी से ढ़का हुआ है तथा ललाट में बिन्दी जैसा मालूम होता है। इससे ऐसा संकेत मिलता है कि उसी काल से मिथिला की नारियों में सिर पर साड़ी लेने एवं बिन्दी करने की परम्परा कायम है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7427" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>​शिवकुमार मिश्र आगे कहते हैं कि पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय बिहार, पटना, के तत्वावधान में 1972-73 में दूसरी बार उत्खनन कार्य चलाया गया। इस रिपोर्ट के अनुसार किले की सुरक्षा-दीवार का निर्माण दो चरणों में कराया गया। पहले चरण में 50x20x4 में से.मी. आकार के बड़े ईटों का प्रयोग किया गया था। ऐसा लगता है कि असली दीवार किसी भीषण बाढ़ में क्षतिग्रस्त हो गया जिसे बाद में पुनर्निर्माण कराया गया। असली दीवार उत्तरी-कृष्ण-मार्जित (एन.बी.पी.) मृदभाण्ड के टुकड़े मिले हैं जिससे ऐसा अनुमान लगाया गया है कि दूसरी सदी ई.पू. में इसका निर्माण हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार दो सांस्कृतिक कालों के पुरावशेष मिले हैं। प्राप्त पुरावशेषों में हड्डी की कीलें, कान्ति ताम्र सिक्के, ताम्बे और एन्टीमनी छड़े, मिट्टी की पकी हुई गोलियाँ एवं मनके, स्वस्तिक चिह्न के साथ एक सील, एक लोहे का कुल्हारी एवं अत्यन्त सुन्दर तथा अर्द्ध-कीमती पत्थरों के मनके आदि है। इन पुरावशेषों के साथ-साथ उत्तरी-कृष्ण-मार्जित मृदभाण्ड (एन.बी.पी. वेयर) एवं धूसर और लाल मृदभाण्ड के टुकड़े मिले है।</p>
<p>​<strong>उस रिपोर्ट के अनुसार मिट्टी से निर्मित कुछ मूर्तियों के फलक प्राप्त हुए है जो दूसरी सदी ई.पू. से दूसरी सदी ई. के हैं किन्तु एक पुरात्तत्त्वविद् इसे शतप्रतिशत सही नहीं मानते हैं। उनके अनुसार चित्र 2A में सबसे ऊपर बीच का फलक गुप्तकाल (पांचवीं-छठी सदी ई.) का है एवं ऊँगलियों से बनाया गया है। सबसे नीचे बायीं ओर का फलक किसी महिला का है जिसका समय गुप्तकाल में रखना उचित होगा। चित्र 24 में दाहिनी ओर के फलक को किसी बौने का फलक कहा गया है। किन्तु इस फलक में चित्र को नंगा दिखाया गया है जो किसी बौना के लिए सम्भव नहीं है अतः यह किसी बच्चा के चित्र का फलक है। इस चित्र में बच्चा हँस रहा है जिससे उसके कुछ दाँत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहे हैं। बच्चा की कमर में चौड़ी कमरबन्द, बाँहों में भुजबन्द तथा पाँवों में चौड़ी पट्टियों है तथा हाथों में कोई एक लम्बा वस्तु या खिलौना है।</strong> </p>
<p>इसका काल दूसरी सदी ई.पू. न होकर छठी सदी ई. मानना उचित होगा। चित्र 2B के मूर्तियों को भी दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी सदी ई. के बीच का माना गया है जबकि सबसे नीचे हाथी (बाएँ का चित्र) के मूर्ति का काल तीसरी सदी ई.पू. अर्थात् उत्तर मौर्यकाल में रखा जा सकता है। इस चित्र में अन्य मूर्तियाँ भेड़, सांड़ आदि जानवरों का है। इसी उत्खनन में दूसरे काल अर्थात् ​200 ई, से ​600 ई. तक के भी पुरावशेष मिले हैं जिनमें मिट्टी से निर्मित पशुओं की मूर्तियाँ, पत्थरों के मनके, मिट्टी की पकी हुई गोलियों एवं वृत्ताकार छिद्रयुक्त आयताकार खपड़े आदि प्रमुख है। इस दूसरी सतह की मोटाई 1.60 मीटर है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7428" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>1974-75 ई. में भी इसी विभाग के द्वारा उत्खनन कार्य कराया गया। इस वर्ष भी पानी के ऊँची सतह के कारण पूर्ण उत्खनन कार्य नहीं हो सका। पहले की भाँति सांस्कृतिक कालों की जानकारी इस वर्ष भी मिली। पहले काल में पुरुष एवं महिला के चित्रों के फलक, पशुओं एवं जानवरों के चित्रों के फलक मिले हैं। अन्य महत्वपूर्ण पुरावशेषों में मिट्टी के पके हुए पहिए, टूटे हुए खिलौने के गाड़ी, कापर-एन्टीमनी छड़, लोहे की कीलें तथा विभिन्न अर्द्ध कीमती (अर्द्ध-बहुमूल्य) पत्थरों से निर्मित विभिन्न आकार के मनके आदि मिले हैं। इस सतह से उत्तरी-कृष्ण-मार्जित मृद्भाण्ड तथा धूसर एवं लाल मृद्भाण्ड के टुकड़े मिले हैं जिनके कंधे पर नक्काशी के चित्र मिलते है। पहले उत्खनन की भाँति खपड़े भी मिले हैं। दूसरे सांस्कृतिक काल के पुरावशेषों में, मिट्टी से निर्मित जानवरों के मूर्तियाँ, पत्थरों के मनके, मिट्टी की पकी हुई मनके एवं गोलियाँ, मुद्भाण्ड के टुकड़े आदि मिले हैं। इस उत्खनन से प्राप्त मिट्टी से निर्मित मूर्तियों के फलक चित्र 3.A एवं 38 में है। इन्हें शुंगकालीन माना गया है। किन्तु चित्र 3A का बीच वाला मूर्ति गुप्तकालीन है। यह मूर्ति अजमुखी नैगमेष की है। नैगमेष को संतानदायिनी देवी &#8216;षष्ठी&#8217; का पति कहा गया है।</strong></p>
<p>इस प्रकार इन उत्खनन कार्यों के रिपोर्टों से स्पष्ट रूप से दो सांस्कृतिक कालों की जानकारी मिलती है। पहले काल के अन्तर्गत तीसरी सदी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई. सन् तक एवं दूसरे काल के अन्तर्गत दूसरी शताब्दी ई. से छठी शताब्दी ई. तक के पुरावशेष मिलते हैं। गढ़ की सुरक्षा दीवार का निर्माण दो चरणों में हुआ था। प्रथम चरण 50x20x4 से.मी. माप के ईंटों का प्रयोग हुआ है जबकि दूसरे चरण में 40x20x2 से.मी. माप का। यद्यपि उत्खनन कार्य एक बहुत ही कम स्थान पर किया गया है किन्तु उससे बड़े ही महत्वपूर्ण पुरावशेष मिले हैं। प्रथम काल के अन्तर्गत लगभग दो मीटर मोटी सतह मिलती है जिसमें पक्की ईंटों से निर्मित आवासीय मकानों के अवशेष प्राप्त हुए है। इसमें एक कूओं मिला है जिसका व्यास 1.40 मीटर है तथा यह फनाकार ईंटों से निर्मित है। एक मण्डल-कूप (रिंगवेल) भी मिलता है जिसके व्यास का माप 1.25 मीटर है।</p>
<figure id="attachment_7430" aria-describedby="caption-attachment-7430" style="width: 1363px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4.jpg" alt="" width="1363" height="698" class="size-full wp-image-7430" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4-300x154.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4-1024x524.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4-768x393.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7430" class="wp-caption-text">शोधार्थी मुरारी कुमार झा और प्रोफ़ेसर जय शंकर झा</figcaption></figure>
<p>मिश्र का कहना है कि इसके निर्माण में फनाकार ईंटों का प्रयोग किया गया है जिसकी लम्बाई 24 से.मी. तथा एक ओर की चौड़ाई ​19 से.मी. और दूसरी ओर ​15 से.मी. चौड़ी है। ये ईंट ​2.5 से.मी. मोटी है। बड़ी संख्या में खंडित खपड़े मिलते हैं जो तत्कालीन खपड़ों की अच्छी बनावटों की सूचना देती है। ये आयताकार खपड़े एक तरफ वक्त है जिससे ऐसा मालूम होता है कि इसे बंधक विधि के द्वारा जोड़ा जाता था। मिट्टी से निर्मित पुरुष एवं श्री दोनों की ही मूर्तियाँ एवं फलकें मिलती हैं। ये मूर्तियाँ एवं फलकों के चित्र आभूषणों से सुसज्जित है तथा केश-विन्यास अनोखे ढंग से किए गए हैं। केश बाँधने का तरीका भी अत्यन्त ही सुन्दर है जिसे तत्कालीन समाज के श्रृंगार के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। विभिन्न प्रकार के आभूषणों, जो मूर्तियों पर मिलते हैं, वे तत्कालीन मूर्तिकारों की ही कुशलता को नहीं दर्शाती है बल्कि विभित्र प्रकार के स्वर्णकारों की कुशलता को भी स्पष्ट करते हैं। बिना फलक वाले मूर्तियों के केश-विन्याश एवं कलाकृति तत्कालीन सामाजिक लोगों के शारीरिक अंगों को भी प्रतिबिंबित करती है। </p>
<p>पशुओं एवं जानवरों की मूर्तियों, जिसमें अधिकांशतः सांड़ों एवं भेड़ों की मूर्तियां मिलती हैं। इससे तत्कालीन कृषि व्यवस्था तथा पशुपालन कार्य प्रतिबिम्बित होता है। इन पुरावशेषों के अलावा मिट्टी की पकी हुई गोलियों एवं मनके आदि मिलते है जिसमें ऐसा कहा जाता है कि बड़े गोलियों का प्रयोग युद्ध एवं बड़े जानवरों के शिकार के लिए किया जाता था जबकि छोटे गोलियों का प्रयोग सम्भवतः छोटी पक्षियों एवं छोटे जानवरों को चोट पहुँचाने के लिए किया जाता था। मिट्टी की पकी हुई मनके का प्रयोग सम्भवतः पशुओं को माला बनाकर पहनाने में किया जाता था। हड्डियों के कीलों का प्रयोग जानवरों का शिकार करने तथा मछलियों को मारने में किया जाता था।</p>
<p>उत्खनन से अनेक प्रकार के पत्थरों के मनके मिले हैं। इन पत्थरों में गोमेद, स्फटिक, जैस्पर, पुष्पराज (टोपैज), कानैलियन आदि प्रमुख हैं। मनकों का प्रयोग महिलाएँ माला बनाकर पहनने में करती थीं। उत्खनन से उत्तर-कृष्ण-मार्जित मृद्भाण्ड के टुकड़े के साथ ही धूसर एवं लाल मृद्भाण्ड के टुकड़े भी मिले हैं किन्तु पूरे सतह पर लाल मृ‌द्भाण्ड के उद्योग होने का प्रमाण मिलता है। उत्तरी-कृष्ण-मार्जित मृ‌द्भाण्ड के टुकड़ों में तस्तरी एवं कटोरे के आकार का ढाँचा मिलता है जो अत्यन्त ही सुन्दर हैं। काले, सुनहले एवं चाकलेट रंग में रंगे हुए मृद्भाण्ड के टुकड़े भी मिले हैं। काला एवं धूसर मृद्भाण्ड एवं उत्तरी-कृष्ण-मार्जित मृद्भाण्ड के टुकड़े प्रकार एवं बनावट में अलग नहीं मालूम होते हैं। लाल मृद्भाण्ड टुकड़ों के ढाँचों से अनेक प्रकार के बर्तनों के आकार-प्रकार के विषय में स्पष्टता होती है। इनके भांड, नाली या द्रोणिका, टोटीदार बर्तनें, मूठयुक्त कड़ाही एवं बर्तनें सछिद्र बर्तबाने (जार्स), ढक्कन वाली छोटी बर्तनें, मुठयुक्त ढक्कनें, कलशें आदि के बनावट मिलते हैं। लाल मृद्भाण्ड के कंधे पर बंधे हुए रस्सी की भाँति चित्र स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं साथ ही कुछ बर्तनों पर चटाई, बंशी या कंघी की भाँति छाप मिलते हैं। इस प्रकार तत्कालीन उद्योग-धंधों, रहन-सहन एवं कलाकारिता के विषय में स्पष्ट जानकारी मिलती है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7431" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर कहा जा सकता है कि बलिराजगढ़ प्राचीन मिथिलानगर का ध्वंशावशेष है तथा यहाँ सदियों तक एक सुन्दर एवं विकसित नगर स्थापित रहा किन्तु इस स्थल का पूर्ण पुरातात्विक उत्खनन एवं शोध होना अति आवश्यक है। इसके बाद ही इसका गौरवशाली इतिहास उजागर होगा। फिर भी यहाँ से प्राप्त पुरावशेषों से प्राचीन मिथिला एवं बिहार के लोगों के रहन-सहन, वेशभूषा, उद्योग-धंधे, धार्मिक एवं आर्थिक क्रियाकलापों के विषय में जानकारी मिलती है। कला के क्षेत्र में मूर्तिकारों की कुशलता देखने को मिलती है जो स्वर्णकारों की भी कुशलता को प्रतिबिंबित करती है। इससे स्पष्ट होता है कि मिथिला में शुंगकाल के पूर्व ही अनेक कलाओं का विकास हो चुका था जो मिथिला के इतिहास लेखन के लिए एक महत्वपूर्ण सामग्री है।</strong></p>
<p><strong>बलिराजगढ़ की सभी तस्वीरें : राज झा, मधुबनी </strong><br />
<strong>क्रमशः &#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-culture-of-mithila-buried-beneath-the-soil-is-telling-us-something">​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-2)​ : मिट्टी के अंदर दबी मिथिला की संस्कृति जैसे कह रही है: &#8216;अंत तक पहुंचना हो तभी उत्खनन ​की शुरुआत करना&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>किला राय पिथौरा:  भारत की विरासत भारत लौटी: धन्यवाद प्रधानमंत्री, धन्यवाद गोदरेज</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/qila-rai-pithora-indias-heritage-returns-to-india-thank-you-prime-minister</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 03 Jan 2026 12:47:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[buddha]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[heritage]]></category>
		<category><![CDATA[Mehrauli]]></category>
		<category><![CDATA[Quila Rai Pithoura]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>किला राय पिथौरा: भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सवा सौ साल के इंतज़ार के बाद, भारत की विरासत लौटी है, भारत की धरोहर लौटी है। आज से भारतीय जन-मानस, भगवान बुद्ध के इन पवित्र अवशेषों के दर्शन कर पाएगा, भगवान बुद्ध का आशीर्वाद ले पाएगा।  प्रधानमंत्री ने कहा कि &#8216;मैं इस शुभ-अवसर पर [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किला राय पिथौरा: भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सवा सौ साल के इंतज़ार के बाद, भारत की विरासत लौटी है, भारत की धरोहर लौटी है। आज से भारतीय जन-मानस, भगवान बुद्ध के इन पवित्र अवशेषों के दर्शन कर पाएगा, भगवान बुद्ध का आशीर्वाद ले पाएगा।</strong> </p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि &#8216;मैं इस शुभ-अवसर पर यहां उपस्थित, सभी अतिथियों का स्वागत और अभिनंदन करता हूं। इस पावन अवसर पर, बौद्ध परंपरा से जुड़े भिक्षु और धर्माचार्य भी हमें आशीर्वाद देने के लिए यहां उपस्थित हैं। मैं आप सभी का वंदन करता हूं। आप सभी की उपस्थिति, इस आयोजन को नई ऊंचाई, नई ऊर्जा दे रही है। 2026 की शुरुआत में ही ये शुभ उत्सव, बहुत प्रेरणादायी है। और मेरे लिए भी सौभाग्य है कि 2026 का मेरा यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम है, जो भगवान बुद्ध के चरणों से शुरू हो रहा है। मेरी कामना है, भगवान बुद्ध के आशीर्वाद से, 2026, दुनिया के लिए शांति, समृद्धि और सद्भाव का नया दौर लेकर के आए।&#8217;</p>
<figure id="attachment_7222" aria-describedby="caption-attachment-7222" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200320.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200320.jpg" alt="" width="2200" height="1872" class="size-full wp-image-7222" /></a><figcaption id="caption-attachment-7222" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में भगवान बुद्ध से संबंधित पवित्र पिपरहवा अवशेषों की ग्रैंड इंटरनेशनल प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर PHOTO:PIB</figcaption></figure>
<p>दक्षिणी दिल्ली के किला राय पिथौरा में भगवान् बुद्ध से सम्बंधित पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि &#8216;जिस स्थान पर ये प्रदर्शनी लगी है, वो भी अपने आप में विशेष है। किला राय पिथौरा का ये स्थान, भारत के गौरवशाली इतिहास की यशभूमि है, इस ऐतिहासिक किले के इर्द-गिर्द, लगभग एक हजार साल पहले, उस समय के पूर्व शासकों ने, एक दृढ़ और मजबूत सुरक्षित दीवारों से घिरे नगर की स्थापना की थी। आज उसी ऐतिहासिक नगर परिसर में, हम अपने इतिहास की एक आध्यात्मिक और पुण्य गाथा को जोड़ रहे हैं।&#8217;</p>
<figure id="attachment_7223" aria-describedby="caption-attachment-7223" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200323.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200323.jpg" alt="" width="2200" height="1778" class="size-full wp-image-7223" /></a><figcaption id="caption-attachment-7223" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में भगवान बुद्ध से संबंधित पवित्र पिपरहवा अवशेषों की ग्रैंड इंटरनेशनल प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर PHOTO:PIB</figcaption></figure>
<p>भगवान बुद्ध से जुड़े ये पवित्र रेलिक्स, भारत की विरासत हैं, शताब्दी भर की प्रतीक्षा के बाद, ये धरोहरें फिर से भारत लौटी हैं, इसलिए मैं देश भर के लोगों से भी कहूंगा, कि वो इन पुण्य अवशेषों के दर्शन के लिए, भगवान बुद्ध के विचारों से जुड़ने के लिए, एक बार यहां अवश्य आएं। हमारे जो स्कूल के विद्यार्थी हैं, जो कॉलेज के स्टूडेंट्स हैं, जो युवा साथी हैं, जो बेटे-बेटियां हैं, वो इस प्रदर्शनी को जरूर देखें। ये प्रदर्शनी, हमारे अतीत के गौरव को, हमारे भविष्य के सपनों से जोड़ने का बहुत बड़ा माध्यम है। मैं देश भर के लोगों से आग्रह करूंगा, कि वो इस प्रदर्शनी में जरूर सहभागिता करें। </p>
<p>उन्होंने कहा कि &#8216;भगवान बुद्ध के पवित्र रेलिक्स को अपने बीच पाकर हम सभी धन्य हैं। इनका भारत से बाहर जाना और लौटकर फिर भारत आना, ये दोनों ही पड़ाव अपने आप में बहुत बड़ा सबक हैं। सबक ये है कि गुलामी सिर्फ राजनीतिक और आर्थिक नहीं होती, गुलामी, हमारी विरासत को भी तबाह कर देती है। भगवान बुद्ध के पवित्र रेलिक्स के साथ भी यही हुआ। गुलामी के कालखंड में इन्हें भारत से छीना गया, और तब से करीब सवा सौ साल तक, ये देश से बाहर ही रहे। जो लोग इन्हें भारत से लेकर गए थे, उनके वंशजों के लिए तो ये सिर्फ निर्जीव एंटीक पीस ही थे। इसलिए उन्होंने इन पवित्र अवशेषों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नीलाम करने का प्रयास किया, लेकिन भारत के लिए तो, ये पवित्र रेलिक्स हमारे आराध्य का ही एक अंश है, हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग है। इसलिए भारत ने तय किया कि हम इनकी सार्वजनिक नीलामी नहीं होने देंगे। और मैं आज गोदरेज समूह का भी आभार व्यक्त करता हूं, उनके सहयोग से भगवान बुद्ध से जुड़े ये पवित्र अवशेष, भगवान बुद्ध की कर्मभूमि, उनकी चिंतनभूमि और उनकी महाबोधि भूमि और उनकी महा-परिनिर्वाण भूमि पर वापस लौटे हैं।&#8217;</p>
<figure id="attachment_7224" aria-describedby="caption-attachment-7224" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200297.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200297.jpg" alt="" width="2200" height="1401" class="size-full wp-image-7224" /></a><figcaption id="caption-attachment-7224" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री ने 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में &#8216;द लाइट एंड द लोटस रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन&#8217; नाम की प्रदर्शनी का दौरा किया।</figcaption></figure>
<p>इतिहास कहता है कि सन् 1160 में चौहान शासकों ने तोमरों से दिल्ली छीन ली और उनके दुर्ग लाल कोट पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने लाल कोट का विस्तार किया और यह किला राय पिथौरा के नाम से जाना जाने लगा। 1192 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस पर अधिकार कर लिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। महरौली-बदरपुर रोड और अधचीनी से कुतुब मीनार जाने वाली सड़क किला राय पिथौरा को काटती हुई जाती है। दिल्ली के चौथे प्राचीन शहर माने जाने वाले जहांपनाह की दीवार किला राय पिथौरा से मिलती है। जहांपनाह की यह दीवार साकेत में प्रेस एनक्लेव एरिया के पास किला राय पिथौरा की दीवार से मिलती है। जहांपनाह को मोहम्मद बिन तुगलक (1325-51) ने पहले दो प्राचीन शहरों किला राय पिथौरा और सीरी के बीच बसे इलाके को घेरकर बसाया था।</p>
<figure id="attachment_7225" aria-describedby="caption-attachment-7225" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200310.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200310.jpg" alt="" width="2200" height="2212" class="size-full wp-image-7225" /></a><figcaption id="caption-attachment-7225" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री ने 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में &#8216;द लाइट एंड द लोटस रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन&#8217; नाम की प्रदर्शनी का दौरा किया।</figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत केवल भगवान बुद्ध के पावन अवशेषों का संरक्षक नहीं है, बल्कि उनकी परंपरा का जीवंत वाहक भी है। पिपरहवा, वैशाली, देवनी मोरी और नागार्जुनकोंडा से प्राप्त भगवान बुद्ध से जुड़े अवशेष, बुद्ध के संदेश की जीवित उपस्थिति हैं। भारत ने इन अवशेषों को, साइंस और आध्यात्म, हर रूप में संभाला है, सहेजा है। उन्होंने कहा कि भारत का ये भी निरंतर प्रयास रहा है, कि दुनिया में बौद्ध विरासत से जुड़े भी स्थान हों, जो भी स्थान हों, उनके विकास के लिए हम यथासंभव योगदान दे सकें। जब नेपाल में आए भीषण भूकंप ने प्राचीन स्तूपों को नुकसान पहुंचाया, तो भारत ने इसके पुनर्निर्माण में सहयोग दिया। म्यांमार के बागान में आए भूकंप के बाद, हमने 11 से अधिक पगोडाओं का संरक्षण किया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। भारत में भी बौद्ध परंपरा से जुड़े स्थानों और अवशेषों की खोज, और उनके संरक्षण का काम निरंतर चल रहा है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि &#8216;हमारा प्रयास है कि बौद्ध विरासत, सहज रूप से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे। वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन, वैशाख और आषाढ़ पूर्णिमा जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के पीछे यही सोच है। आप सभी जानते हैं, कि भगवान बुद्ध के अभिधम्म, उनकी वाणी, उनकी शिक्षाएं मूल रूप से पाली भाषा में हैं। हमारा प्रयास है कि पाली भाषा सामान्य जन तक पहुंचे। इसके लिए पाली को क्लासिकल लैंग्वेज का दर्जा दिया गया है। इससे धम्म को, उसके मूल भाव को समझना और समझाना और अधिक आसान हो जाएगा। इससे बौद्ध परंपरा से जुड़ी रिसर्च को भी बल मिलेगा। </p>
<p>भगवान बुद्ध के जीवन दर्शन ने सीमाओं और भौगोलिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर, दुनिया को एक नई राह दिखाई है। भवतु सब्ब मंगलम्] रक्खन्तु सब्ब देवता, सब्ब बुद्धानुभावेन&#8221;सदा सुत्ति भवन्तु ते। इसमें पूरे विश्व के कल्याण की ही तो कामना है। भगवान बुद्ध ने पूरी मानवता को अतिवाद से बचाने का प्रयास करते हुए, अपने अनुयायियों से कहा- &#8221; अत्त दीपो भव भिक्खवे! परीक्ष्य भिक्षवो ग्राह्यम्, मद्वचो न तु गौरवात्।&#8221; अर्थात भिक्खुओं, अपना दीपक स्वयं बनो। मेरे वचनों की भी परीक्षा करके उनका ग्रहण करो, सिर्फ मेरे प्रति आदर के कारण नहीं।</p>
<figure id="attachment_7226" aria-describedby="caption-attachment-7226" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200314.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200314.jpg" alt="" width="2200" height="1442" class="size-full wp-image-7226" /></a><figcaption id="caption-attachment-7226" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री ने 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में &#8216;द लाइट एंड द लोटस रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन&#8217; नाम की प्रदर्शनी का दौरा किया।</figcaption></figure>
<p>उन्होंने कहा कि &#8216;मैं खुद को बहुत भाग्यशाली समझता हूं, क्योंकि भगवान बुद्ध का मेरे जीवन में बहुत ही गहरा स्थान रहा है। मेरा जन्म जिस वडनगर में हुआ, वो बौद्ध शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र था। जिस भूमि पर भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम उपदेश दिए, वो सारनाथ आज मेरी कर्मभूमि है। जब मैं सरकार के दायित्वों से दूर था, तब भी मैं एक तीर्थयात्री के रूप में बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा करता रहता था। प्रधानमंत्री के रूप में तो मुझे दुनियाभर में बौद्ध तीर्थों में जाने का सौभाग्य मिला है। नेपाल के लुम्बिनी में, पवित्र मायादेवी मंदिर में नतमस्तक होना, अपने आप में अद्भुत अनुभव था। जापान में तो-जी मंदिर और किंकाकु-जी में, मैंने महसूस किया कि बुद्ध का संदेश समय की सीमाओं से आगे है। मैं चीन में शीआन की बिग वाइल्ड गूज पैगोडा में, वहां भी गया, जहाँ से बौद्ध ग्रंथ पूरे एशिया में पहुँचे, वहां भारत की भूमिका आज भी स्मरण की जाती है। मैं मंगोलिया के गंदन मठ में गया, तो मैंने देखा कि लोगों की आँखों में बुद्ध की विरासत से कितना जुड़ाव है। श्रीलंका के अनुराधापुरा में जया श्री महाबोधि के दर्शन करना, उस परंपरा से जुड़ने का एहसास था, जिसके बीज सम्राट अशोक, भिक्कू महेंदा और संघमित्रा जी ने बोए थे। थाईलैंड के वाट फो और सिंगापुर के बुद्ध टूथ रेलिक मंदिर की यात्राओं ने, भगवान बुद्ध के संदेशों के प्रभाव को लेकर मेरी समझ को और गहराई दी। </p>
<figure id="attachment_7227" aria-describedby="caption-attachment-7227" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200305.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200305.jpg" alt="" width="2200" height="1747" class="size-full wp-image-7227" /></a><figcaption id="caption-attachment-7227" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री ने 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में &#8216;द लाइट एंड द लोटस रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन&#8217; नाम की प्रदर्शनी का दौरा किया।</figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री के कहा कि पिछले 10–11 वर्षों में भारत ने बौद्ध स्थलों को आधुनिकता से जोड़ने का भी प्रयास किया है। बोधगया में कन्वेंशन सेंटर और मेडिटेशन व एक्सपीरियंस सेंटर बनाया गया है। सारनाथ में धमेख स्तूप पर लाइट एंड साउंड शो और बुद्ध थीम पार्क का निर्माण किया गया है। श्रावस्ती, कपिलवस्तु और कुशीनगर में, आधुनिक सुविधाओं का निर्माण किया गया है। तेलंगाना के नालगोंडा में एक डिजिटल एक्सपीरिएंस सेंटर बनाया गया है। सांची, नागार्जुन सागर, अमरावती, इन सभी जगहों पर तीर्थयात्रियों के लिए नई सुविधाएं विकसित की गई हैं। आज देश में एक  बौद्ध सर्किट बनाया जा रहा है, ताकि भारत के सभी बौद्ध तीर्थ स्थलों की आपस में बेहतर कनेक्टिविटी हो, और दुनियाभर के तीर्थयात्रियों को आस्था और आध्यात्म का एक बेहतरीन अनुभव मिल सके।</p>
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		<title>दरभंगा राज की कृतियों की व्याख्या करने से बेहतर होगा हम उसमें गरिमा, संस्कृति, प्रतिष्ठा के कुछ और अध्याय जोड़ें ✍ सुश्री वसुधा झा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Oct 2025 06:54:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga culture. mithila]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga raaj]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[heritage]]></category>
		<category><![CDATA[mithila culture]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : साल 1912 में अविभाजित भारत में बहुत सारी ऐतिहासिक घटनाएं घटी थी। एक तरफ जहाँ देश में मातृभूमि की आज़ादी के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक क्रांतिकारी एकजुट हो रहे थे, वहीं देश की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। नए सिरे [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : साल 1912 में अविभाजित भारत में बहुत सारी ऐतिहासिक घटनाएं घटी थी। एक तरफ जहाँ देश में मातृभूमि की आज़ादी के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक क्रांतिकारी एकजुट हो रहे थे, वहीं देश की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। नए सिरे से दिल्ली का निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया था जब जॉर्ज पंचम ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेशों की अपनी यात्रा के दौरान भारत आए थे। ब्रिटिश वायसराय ने सर एडविन लुटियंस को दिल्ली की समग्र योजना का दायित्व सौंपा गया था। </strong></p>
<p>मार्च के महीने में बिहार को बंगाल से अलग कर उड़ीसा के साथ एक अलग प्रांत बना दिया गया था। एक तरफ़ जहाँ अंग्रेज़ देश में पैर जमाने की अनवरत कोशिश कर रहे थे, सर एडविन लुटियंस नई दिल्ली का नए सिरे से निर्माण कार्य शुरू किए थे; वहीँ एकजुट हो रहे क्रांतिकारी उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे। </p>
<p>उसी दरम्यान दिल्ली के चांदनी चौक में भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर उनके राजकीय प्रवेश के समय रास बिहारी बोस और उनके क्रांतिकारी समूह द्वारा उन्हें जान से मारने की कोशिश किया गया था, उनपर बंब फेंका गया था। 1912 की वह ऐतिहासिक घटना आज भी चांदनी चौक में दर्ज है। वैसे उस हमले में लार्ड हार्डिंग बाल-बाल बच गए थे, लेकिन आज भी वह घटना दिल्ली-लाहौर षडयंत्र के रूप में बल्ली मारन की गली के नुक्कड़ पर टाउन हॉल के सामने अंकित है। </p>
<blockquote><p>​उसी वर्ष बिहार के लोगों की आवाज मजबूत करने के लिए दरभंगा के तत्कालीन महाराजा रामेश्वर सिंह प्रदेश से हिंदी और अंग्रेजी भाषाओँ में दो अख़बारों के प्रकाशन पर जोर दिया। महाराजा रामेश्वर सिंह दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ कामेश्वर सिंह के पिता थे। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7091" aria-describedby="caption-attachment-7091" style="width: 1444px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/rsz_22.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/rsz_22.jpg" alt="" width="1444" height="851" class="size-full wp-image-7091" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/rsz_22.jpg 1444w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/rsz_22-300x177.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/rsz_22-1024x603.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/rsz_22-768x453.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1444px) 100vw, 1444px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7091" class="wp-caption-text">​महाराजा रामेश्वर सिंह का हस्तलिखित पत्र</figcaption></figure>
<p>महाराजा रामेश्वर सिंह तत्कालीन स्थिति के मद्दे नजर लिखते हैं: &#8220;बिहार में ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत के अतिरिक्त अन्य जाति-समुदाय के लोगों कल्याणार्थ, उनके लाभार्थ, ऐसे समुदाय की बातों को उठाने के लिए, आवाज देने के लिए दैनिक अखबार का प्रकाशन अति आवश्यक है। इस अखबार का संचालन एक ऐसे दक्ष व्यक्ति द्वारा हो जो वास्तविक रूप से इस समुदाय के कल्याण और विकास में अभिरुचि रखते हैं । इस अखबार को वित्तीय रूप से पूरा संरक्षण हो, साथ ही, अखबार की कीमत बहुत सस्ती हो ताकि इसका प्रसार अधिक से अधिक हो।&#8221;</p>
<p>उन्होंने यह भी लिखा था कि &#8220;बिहार में ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत के अलावे अन्य जातियों के लोग भी हैं, जो विकसित नहीं हैं। वे चाहते थे कि उनके नेतृत्व में सभी एक साथ आएं ताकि सबों के हितों की रक्षा हो सके।​&#8221; उनका कहना था कि &#8220;समाज में जो अविकसित लोग हैं, उनका सम्पूर्णता के साथ विकास हो सके। इस उद्देश्य से एक बैठक बुलाई जाए जिसमें बिहार के सभी जमींदारों के अलावे सभी लोग उपस्थित हों। एक पार्टी की स्थापना हो। बिहार को अलग प्रांत बनाने के लिए वायसराय को धन्यवाद भी दिया जाय।​&#8221;</p>
<p>उन्होंने यह भी लिखा था कि &#8220;उनके नजर में​, यानी वायसराय की नजर में इस बात को भी लाया ​जाए कि समाज के इन अविकसित लोगों की सुरक्षा किस प्रकार होगी। यदि ऐसा नहीं किया गया तो वे आने वाले समय में भुक्तभोगी होंगे। इतना ही नहीं, ​&#8221;वायसराय को उन वर्गों की महत्ता को भी बताया जाए ताकि उनका समुचित विकास भी हो सके। वायसराय को यह बताया जाए की समाज में इस वर्ग का क्या महत्व है क्योंकि यह समुदाय बिहार की 90 फीसदी भूमि के स्वामी हैं।​&#8221;</p>
<p>​उन्होंने लिखा कि &#8220;आने वाले समय में जब नए एल.जी. अपना पदभार ग्रहण करेंगे तो इस विषय से संबंधित एक प्रतिवेदन भी दिया जाय। समय समय पर इस दिशा में पहल भी की जाए ताकि समाज के इस वर्ग के लोगों को काउन्सिल (लेजिस्लेटिव) में उचित स्थान भी मिले। एक मतदाता सूची का भी निर्माण हो। जो सक्षम हों वे आवेदन भी करें ताकि उनका नाम दर्ज हो। साथ ही, इस समुदाय की सम्पूर्ण भलाई के लिए वे सभी कार्य किये जाये जिससे वे एक्जीक्यूटिव काउंसिल में अपना स्थान भी प्राप्त कर सकें</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-5.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7092" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-5.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-5-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-5-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-5-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-5-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<blockquote><p>महाराजा​ रामेश्वर सिंह का कालखंड 1898 से 1929 का था। साल 1929 में जब वे अंतिम सांस लिए, उनके तीन संतानों &#8211; बेटी लक्ष्मी दाई, बड़े पुत्र कामेश्वर सिंह और छोटे पुत्र विश्वेश्वर सिंह &#8211; में बड़े पुत्र कामेश्वर सिंह दरभंगा के महाराजा बने। दो पन्नों में स्व​-हस्तलिखित पत्र की चर्चा ​मैं नहीं, बल्कि महाराजा रामेश्वर सिंह की सबसे बड़ी संतान, उनकी पुत्री की आज की चौथी पीढ़ी के वंशज, वह भी एक महिला, सुश्री वसुधा झा कर रही थी। </p></blockquote>
<p>अपनी आँखों को बारम्बार अपनी साड़ी की पल्लू से पोछती सुश्री झा कहती हैं कि &#8220;महाराजा रामेश्वर सिंह को अनंत यात्रा पर निकले आज 96-वर्ष हो गए, उनके पुत्र महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की मृत्यु को 63-वर्ष हो गए, लेकिन आज दरभंगा राज के कोई भी व्यक्ति इस बात पर शोध नहीं कर सके कि उन शब्दों के माध्यम से रामेश्वर सिंह अपने मन में अपने प्रान्त के ​विकास के लिए क्या सोचे होंगे​, जब उन शब्दों को कागज के टुकड़ों पर लिखे होंगे? </p>
<p>अपने पिता की इस सोच को जमीन पर उतारने के लिए, ​रामेश्वर सिंह की मृत्यु के अगले वर्ष, यानी 1930 में, ​उनके पुत्र महाराजा कामेश्वर सिंह पटना में &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8221; और फिर &#8220;आर्यावर्त&#8221; अखबार का प्रकाशन प्रारम्भ ​किये। साथ ही, मैथिली भाषा के विकास के लिए &#8216;मिथिला मिहिर&#8217; पत्रिका का ​भी प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। उन दोनों अख़बारों ​को अपने जीवन पर्यन्त उन्होंने संरक्षण दिया। अख़बारों की कीमत लोगों की आर्थिक शक्ति के अनुरूप ही रही। प्रान्त के कई हज़ार लोगों की जीविका का माध्यम बना था वह दोनों अखबार। प्रदेश के लोगों की आवाज था वह अखबार। अपने समयकाल में उन अख़बारों को ​वे उत्कर्ष पर ले गए। सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इन अख़बारों का प्रसार एक लाख से ऊपर था बिहार में।​ </p>
<p><strong>महाराजाधिराज डॉ, सर कामेश्वर सिंह के मृत्यु दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देती अपनी ​अश्रुपूरित आँखों से सुश्री झा कहती हैं​: &#8220;जिन लोगों को, परिवारों को, संस्कृति को, विरासत को, गरिमा को वह दोनों अखबार सुरक्षित और संरक्षित किया, जिन लोगों के मुख में वह अखबार आवाज दिया, जिस दिन वह अंतिम सांस ले रहा था, सभी अपने-अपने घरों में, दरवाजों के पीछे छुप गए। प्रदेश में उन अख़बारों के अस्तित्व के साथ राजनीति हो रही थी, लोग अपने-घरों में चौरस खेल रहे थे।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_7093" aria-describedby="caption-attachment-7093" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-ji.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-ji.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7093" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-ji.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-ji-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-ji-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-ji-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-ji-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7093" class="wp-caption-text">महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह अपनी पत्नी के साथ</figcaption></figure>
<p>इस संवाददाता से बात करते सुश्री झा कहती हैं कि &#8220;महाराजा की मृत्यु के कुछ वर्ष बाद से ही दोनों अख़बार राजनीति का शिकार हो गया। हम किसी व्यक्ति अथवा समूह पर दोषारोपण नहीं करते, हम भी उतने ही दोषी हैं, हम भी आगे बढ़कर नहीं आये (&#8216;हम&#8217; का अर्थ दरभंगा राज के साथ-साथ प्रदेश के सभी सशक्त लोग, जो अर्थ से, सामर्थ से, पहुँच से, इन अख़बारों को बंद होने से बचा सकते थे; मिथिला को, मिथिला की संस्कृति को, पाग की गरिमा को बचा सकते थे; आगे नहीं नहीं आये। जो आये भी वे लाभ और हानि का बही साथ लेकर।) </p>
<p><strong>​सुश्री वसुधा झा, जो विगत साढ़े पांच वर्षों से चल रहे आर्यावर्त &#8211; इंडियन नेशन अख़बारों की गरिमा को पुनः स्थापित करने वाले वेबसाइट का नेतृत्व करने का दायित्व स्वीकार की हैं, इस संवाददाता से कहती हैं: &#8220;उन दिनों मैं स्वयं अल्प आयु में थी। मैं निजी तौर पर कुछ भी नहीं कर सकती थी। मैं, अपनी माँ और दादी के साथ स्वयं शिक्षा पर आधिपत्य के लिए लड़ रही थी। दरभंगा राज का देश में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना से लेकर, शिक्षा के विस्तार पर क्या योगदान हैं, उन बातों को को मैं यहाँ नहीं दोहराना चाहती हूँ, लेकिन यह कहते तनिक भी संकोच नहीं करती कि उस कालखंड में भी दरभंगा राज की महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में आगे आना चाहती थी, अपनी योग्यता को बढ़ाना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं होने दिया गया।&#8221;</strong></p>
<p>सुश्री वसुधा झा कहती हैं: &#8220;मैं उसी शिक्षा पर अपना आधिपत्य जमाकर अपनी पहचान बनाना चाहती थी। मैं इलाहाबाद से दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हॉउस में अपनी शिक्षा, प्रतिभा का हस्ताक्षर की। अपनी योग्यता के बल पर कॉर्पोरेट की दुनिया में अपनी पहचान बनायी। इसलिए कल जो नहीं हो सका, आज हमारी कोशिश होगी कि हम अपनी भूमिका अदा कर सकें।&#8221;</p>
<p>सुश्री झा आगे कहती हैं: &#8220;यह समय का तकाजा देखिये या फिर हमारा प्रारब्ध, आज महात्मा गांधी का 156वां जन्मदिन है। आज आजाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का 121वां जन्म दिन है। आज के ही दिन सन 1962 में दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह का पार्थिव शरीर भूमि में समाहृत हो गया था। 55-वर्ष की आयु में 1 अक्टूबर, 1962 को वे अंतिम सांस लिए थे। मिथिला उस दिन करुणामय दृश्य था। कई घरों में चूल्हे नहीं जले थे। नवजात शिशु भी उस दिन अपने उदर-पूर्ति के लिए बिलखे नहीं थे। मेरे दादाजी, यानी महाराजाधिराज की बहन श्रीमती लक्ष्मी दाईजी के पुत्र दरभंगा के माधवेश्वर में मुखाग्नि दिए थे। आज उनके सम्मानार्थ मैं इस दायित्व को स्वीकार की हूँ। शायद यही समर्पण होगा उनके लिए। </p>
<p>2 अक्टूबर, 1962 को &#8220;आर्यावर्त&#8221; अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित समाचार को उद्धृत करते सुश्री वसुधा झा कहती हैं: &#8220;आज प्रातः काल उन्हें ह्रदय में पीड़ा का अनुभव हुआ और उपचार के लिए बुलाये गए कलेकिन पहुँचने के पूर्व ये परधाम को छोड़कर सदा के लिए सो गए। खण्डवला कुल गौरव महाराजा डॉ कामेश्वर सिंह का जन्म 1907 ईस्वी के 28 नवम्बर को हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह बहादुर बहुत ही व्यवहार कुशल और दक्ष प्रशासक थे। उन्होंने आरम्भ से उनकी शिक्षा दीक्षा के ऊपर विशेष ध्यान रखा। 21 वर्ष की आयु में ही 1929 की 14 जुलाई को आप दरभंगा राज की गद्दी पर बैठे और बड़ी कुशलता से राज के कार्यों की व्यवस्था की। महाराज अधिराज उदार शासक के रूप में जाने जाते थे। सम्राट अकबर से जो राज्य पांडित्य के पुरस्कार स्वरुप दरभंगा राजवंश के संस्थापक स्वर्गीय महेश ठाकुर को प्राप्त हुआ था उसे ये श्रेष्ठ शासक थे। उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय से और बनारस विश्वविद्यालय से उपाधि भी मिली थी।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7094" aria-describedby="caption-attachment-7094" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-3a.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-3a.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7094" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-3a.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-3a-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-3a-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-3a-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-3a-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7094" class="wp-caption-text">दरभंगा के किले रामबाग परिसर का द्वार &#8211; हश्र का निर्णय आप स्वयं करें</figcaption></figure>
<p><strong>&#8220;आर्यावर्त&#8221; अखबार में लिखा था: &#8220;महाराजाधिराज के पार्थिव शरीर को अपने में समेत कर ज्योहीं चिता की लपटें ऊपर आसमान की ओर उठीं, वहां उपस्थित एक हज़ार से अधिक व्यक्तियों की आखें अश्रुपूरित हो उठी। चिता में आग लगाए जाने से पूर्व स्थानीय सशत्र सैनिकों के एक दस्ते ने अपनी बन्दुक झुकाकर स्वर्गीय महाराजाधिराज को सैनिक सलामी दी। दरभंगे के जिलाधिकारी डॉ जे सी कुंद्रा, एस.पी. श्री एस.एन. श्रीवास्तव, सिविल सर्जन डॉ मेहरा, अस्पताल के अधीक्षक डॉ सफदरली खान, सदर एस.डी.ओ. श्री यु. एन. चौबे, सदर डीएसपी श्री लक्ष्मण प्रसाद तथा अन्य सरकारी अधिकारियों ने, जो वहां मौजूद थे। इसके बाद श्रद्धांजलि देने वाले शिक्षकों, छात्रों, व्यवसायियों तथा अन्य नागरिकों का जिनमें स्त्री, बच्चे, बूढ़े सभी थे, तांता लग गया।&#8221; </strong></p>
<p>​सुश्री वसुधा झा आगे कहती हैं: &#8220;एक महान शिक्षा प्रेमी और उदार दानी ​के रूप में जाने जाने वाले महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के.सी.आई.इ., एल.एल.बी., डी.लिट् ​की उपाधि से अलंकृत थे। एक बड़े उदार विचार के ​कामेश्वर सिंह इस बात पर जोर दिया था ​कि यदि लोग अपने चरित्र को रक्षा करें तो केवल समुद्र यात्रा से जाति या धर्म को हानि की आशंका नहीं की जा सकती। ​वे मिथिला के महान समाज सुधारक थे। ​वे धर्म में क़ानूनी हस्तक्षेप के विरोधी थे और इस प्रसंग में राज्य परिषद् के अधिवेशनों में अपने विचार जोरदार रूप से व्यक्त किया करते थे। </p>
<p>सन 1935 में 12 ​फरवरी को राज्य परिषद् (काउन्सिल ऑफ़ स्टेट) में अपने विचार व्यक्त करते हुये महाराजधिराज ने कहा ​भी था: &#8220;मैं उन लोगों में हूँ जिनका ​विश्वास कि  भिन्न भिन्न धर्मों और सामाजिक आचार विचारों को मानने वाले सदस्यों से बनी हुयी व्यवस्थापिका हिन्दुओं के धार्मिक नियमों में परिवर्तन करने की अधिकारिणी नहीं है। सामाजिक सुधर समाज के अंदर से होना चाहिए। कानून द्वारा सामाजिक ​सुधार करना एक बहाना है।&#8221;</p>
<p><strong>​सुश्री वसुधा झा का कहना है कि &#8220;महाराजाधिराज भारत के सबसे बड़े जमींदार थे और तरुण अवस्था में ही अपने उदार विचारों के कारण इन्होने पर्याप्त ख्याति प्राप्त कर ली थी। ​राजनीतिक समस्याओं का ​उन्होंने गहरा अध्ययन किया था और विलक्षण राजनीतिज्ञ होने के साथ साथ ये पक्के राष्ट्रवादी थे। गोलमेज सम्मलेन में महाराजाधिराज की राजनीतिज्ञता, राष्ट्रवादिता, योग्यता की तत्कालीन भारत मंत्री श्री उद बेनेने बड़ी तारीफ की थी। महाराजाधिराज की राजनीतिज्ञता और स्पष्टवादिता प्रवाल प्रमाण है वह भाषण जो इन्होने 1933 के 27 मार्च को काउंसिल ऑफ़ स्टेट में श्वेत पात्र के विषय में किया था। उन्होंने कहा &#8211; मुझे मालूम है की हमें जो कुछ मिल रहा है, वह न तो महात्मा गाँधी का स्वतंत्रता का सार है, न भारतवासियों द्वारा प्रितिक्षित औपनिवेशिक स्वराज्य (डोमिनियन स्टेट) है। जनतंत्र निरंकुश राज तंत्र द्वारा संचालित होने जा रहा है।&#8221;</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7095" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>​इतना ही नहीं, सुश्री वसुधा झा आगे कहती हैं, &#8220;सांप्रदायिक भेदभाव को महाराजाधिराज भारत का कलंक मानते थे और 1932 में 4 सितम्बर को बिहार संयुक्त दल की बैठक में रांची में भाषण करते हुए उन्होंने कहा था​ कि हमें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए की हमें पूर्ण राष्ट्रीयता के रास्ते पर चलना है। भिन्न भिन्न जातियों और सम्प्रदायों में जो भेदभाव हैं उनको मिटाकर सबमें सामंजस्य स्थापित करना है और अपनी राष्ट्रिय आकांक्षाओं की की पूर्ति के लिए अपनी सारी शक्ति लगा देनी है। जातीय स्वार्थ को राष्ट्रहित के लिए बलिदान कर दीजिये और सांप्रदायिक झगड़ों को मिल्टन के लिए हमें बाहरी शक्ति की जरुरत पड़े, इस ​राष्ट्र्रीय अपमान को दूर करने की चेष्टा कीजिये।&#8221;</p>
<p>​जब उनसे पूछा कि भारत में शिक्षण संस्थाओं की स्थापना से लेकर शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर दरभंगा राज भी भूमिका अक्षुण है, लेकिन क्या वजह रहा कि &#8216;अपने ही किले के चारदीवारी के अंदर महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में आगे नहीं आ सकीं, और जो आयीं, उन्हें बाहर मसक्कत करना पड़ा? सुश्री वसुधा झा कहती हैं कि &#8220;&#8221;शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और छात्रवृत्तियों की व्यवस्था का महाराजधिराज ने शिक्षा के कार्यों में अपनी सच्ची लगन का जो परिचय दिया वह अनुकरणीय और आदर्श है। कलकत्ता, काशी और पटना विश्वविद्यालय को इस परिवार से जो दान प्राप्त हुए थे उसके सम्बन्ध में यहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती​ है। अपने योग्य पूर्वजों के सामान महाराजाधिराज ने अपने जीवन काल में शिक्षा की उन्नति के लिए जो दान दिए और जो कार्य किये वो भुलाये नहीं जा सकते।​&#8221;</p>
<blockquote><p>सुश्री झा कहती हैं: &#8220;देश में सबसे पहले संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना उनकी ही दें है। एक बड़ा भूमिपति होने के वावजूद उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रीय भाग लिया एवं अंग्रेजों की परवाह न कर स्वातंत्र्य आंदोलन में खुले दिल से सहायता की। जिस कालखंड में वे अंतिम सांस लिए, देश को आजाद हुए महज 15 वर्ष हुआ था। आज हम 79 वां जश्ने आजादी वर्ष में चल रहे हैं। आप मुझे बताएं कि इन विगत 64 वर्षों में राष्ट्रध्वज फहराते समय, चाहे जिला में हो, प्रदेश के सचिवालय पर हो या दिल्ली के लाल किले पर, कभी किसी ने दरभंगा के राजाओं के योगदान पर दो शब्द कहे हैं ? शायद नहीं। हकीकत यह है कि हम अपने स्वाभिमान के साथ ही राजनीति करते चले गए। वे लोगों के बीच थे, इन वर्षों में हम लोगों से दर किनार होते गए। सवाल यह है कि जब हम अपनों से ही अलग हो गए, फिर पंचायत तो बाहरी व्यक्ति ही करेगा। कभी किसी ने पूछा कि &#8216;मेरे घर में तुम पंचायत करने वाला कौन हो?&#8221; शायद नहीं। </p></blockquote>
<p>सुश्री झा का कहना है कि &#8220;​वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और संस्कृत शिक्षा के उन्नयन के लिए उनके दान की तुलना नहीं की जा सकती। मिथिला संस्कृत शोध प्रतिष्ठान के लिए ​विशाल भूखंड का दान अपने ढंग का अनूठा माना जायेगा। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के लिए लक्ष्मेश्वर विलास राज प्रसादा और इसके साथ ही एक विशाल और सर्वांगपूर्ण पुस्तकालय का दान महाराजाधिराज की उदारता का युग-युग तक प्रोज्ज्वल परिचायक बना रहेगा। मिथिला कालेज तथा अन्य शैक्षणिक संस्थाओं को भी महाराजधिराज की और से मुक्त हस्त दान दिया गया है जो महाराजाधिराज के शिक्षा प्रेम और दानशीलता का ज्वलंत उदाहरण रहेगा।&#8221;​ </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-6.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7096" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-6.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-6-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-6-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-6-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-6-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>लेकिन, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि &#8216;चारदीवारी के अंदर महिलाओं को शिक्षा के क्षेत्र में जो अवसर और सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। जबकि उन दिनों जितनी भी महिलाएं थीं, वे व्यावहारिक रूप से इतनी प्रखर थीं कि अवसर मिलने पर वह अपने अंदर की प्रतिमा को उतना ही अधिक उजागर कर पा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। और अगर उन दिनों चारदीवारी के अंदर की महिलाओं को भी शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त अवसर दिया गया होता, तो शायद दरभंगा राज का उनकी मृत्यु के बाद जो हश्र हुआ, आज जो हम देख रहे हैं; शायद ऐसा नहीं होता।&#8221;</p>
<p>घंटों की बातचीत में ​सुश्री वसुधा झा अनंत बार अपनी अश्रुपूरित आंखों को होनी आँचल से पोछ रही थी। अवरुद्ध कंठ को पानी पीकर तरल कर रही थी। लेकिन बार-बार वे इस बात को दोहराने में कोई कोताही नहीं कर रही थीं कि &#8220;महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद इन वर्षों में, अन्ततः हमने क्या क्या? यह बहुत ही बड़ा सवाल है। यह बहुत बड़ा शोष का विषय है। अपनी मृत्यु के बाद वे अपार सम्पत्तियों का अम्बार छोड़ गए। अनेकानेक ट्रस्ट बनाकर गए ताकि मिथिला के लोगों का, प्रदेश के लोगों का सर्वांगीण विकास हो सके। लेकिन अंततः हुआ क्या? हमने किया क्या? यह सर्वविदित है। सभी देख सकते हैं। </p>
<p><strong>सुश्री झा का कहना है कि &#8220;आज स्थिति ऐसी है कि किले के ईंट से ईंट अलग हो रहे हैं, चारदीवारी के अंदर-बाहर रहने वाले लोगों का आपसी सम्बन्ध कटुता के शिखर पर है। महारानी अपने जीवन की अंतिम सांस गईं रही हैं। सामाजिक कल्याण को छोड़कर, लोगों की निगाह महाराजा की सम्पत्तियों पर टिकी है। सभी लूट-खसोट के अंग बने हैं। दूर-दरस्त के लोगों, जो परिवार का कभी हिस्सा रहा ही नहीं, आधिपत्य जमा रहे हैं। वैसी स्थिति में जहाँ लोभ का साम्राज्य हो गया है, वहां संस्कृति, गरिमा, कीर्ति को बचाने की बात कौन करेगा। सबसे बड़ा और अहम् सवाल है &#8220;उनके मरने के बाद हमने क्या किया? इन 63 वर्षों में हमारा क्या योगदान है? इस बात को लोग जब आत्मचिंतन करेंगे तो स्वयं के अंदर शुन्य पाएंगे।&#8221;</strong></p>
<p>पचपन-वर्षीय सुश्री झा का कहना है कि &#8220;इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारतीय शैक्षिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों में दरभंगा राज की, महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की, महाराजा रामेश्वर सिंह की, महाराजा कामेश्वर सिंह की भूमिका अत्यधिक है। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद कभी किसी ने किसी भी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों, कुलाधिपतियों से यह प्रश्न पूछा कि उनके दान के पश्चयात विश्वविद्यालय के सीनेट और सिंडिकेटों में जो स्थान सुरक्षित किया गया था, वह स्थान कहाँ है? कोई नहीं।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-8.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7097" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-8.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-8-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-8-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-8-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Darbhanga-8-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p><strong>इतना ही नहीं, जिस कामाख्या में दशकों से लोग देवी भगवती की पूजा-अर्चना करने आते हैं, उस कामाख्या मंदिर में जो ट्रस्ट है, उसके संस्थापक थे महाराजा रामेश्वर सिंह। वे एक सिद्ध पुरुष थे।  एक सिद्ध तांत्रिक थे। कामाख्या मंदिर के ऊपर पहाड़ पर बने एक मंदिर में वे पूजा किया करते थे। आज उस थान पर किसी और का कब्ज़ा है। कामाख्या के विकाश और विस्तार के लिए उनका बहुत योगदान है। दो स्थान उस ट्रस्ट में सुनिश्चित थे दरभंगा के लिए। लेकिन जब बोलने, बात करने वाला ही कोई नहीं है, किसी को थोथी नहीं है, फिर तो बहार वाले ही पंचायत करेंगे। </strong></p>
<p>​सुश्री वसुधा झा कहती हैं कि &#8220;मैं एक दृष्टान्त देती हूँ। आप यदि बनैली राज के जानकी नन्दन सिंह​ की बात पर ध्यान दें, जिसमें उन्होंने कहा था कि &#8216;महाराजाधिराज डॉ कामेश्वर सिंह के उठ जाने से मिथिला अनाथ हो गयी। आज मिथिला में कितने लोग हैं, यहाँ तक कि दरभंगा राज के चारदीवारी के अधीन, जिनके बारे में अब ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया हो इन छह दशकों में। शायद कोई नहीं क्योंकि हमने कुछ किया ही नहीं।&#8221; </p>
<p><strong>क्रमशः&#8230;&#8230;. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/it-would-be-better-if-we-add-some-more-chapters-on-dignity-culture-and-prestige-of-darbhanga-raj">दरभंगा राज की कृतियों की व्याख्या करने से बेहतर होगा हम उसमें गरिमा, संस्कृति, प्रतिष्ठा के कुछ और अध्याय जोड़ें ✍ सुश्री वसुधा झा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>इतिहास गवाह है नदियों का किनारा &#8216;कला और संस्कृति&#8217; के विकास में &#8216;अहम&#8217; योगदान दिया है, &#8216;हुगली&#8217;, &#8216;बनारस&#8217; प्रथम द्रष्टा है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Apr 2025 03:48:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस / हुगली (कोलकाता) : वैसे जब भी नदियों की बात आती है पवित्र नदियों में गंगा, यमुना, सरस्वती के साथ हुगली नदी का भी नाम लिया जाता है। उसी तरह जब नदियों की पवित्रता की बात आती है तो मन में सर्वप्रथम गंगा नदी की ही बात ही आती है। लेकिन जब हम पश्चिमी बंगाल के इतिहास में नदियों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/river-banks-have-made-a-significant-contribution-to-the-development-of-art-and-culture">इतिहास गवाह है नदियों का किनारा &#8216;कला और संस्कृति&#8217; के विकास में &#8216;अहम&#8217; योगदान दिया है, &#8216;हुगली&#8217;, &#8216;बनारस&#8217; प्रथम द्रष्टा है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बनारस / हुगली (कोलकाता) : वैसे जब भी नदियों की बात आती है पवित्र नदियों में गंगा, यमुना, सरस्वती के साथ हुगली नदी का भी नाम लिया जाता है। उसी तरह जब नदियों की पवित्रता की बात आती है तो मन में सर्वप्रथम गंगा नदी की ही बात ही आती है। लेकिन जब हम पश्चिमी बंगाल के इतिहास में नदियों की कहानी को दोहराते हैं तब हुगली नदी को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं और यही कारण है कि पश्चिम बंगाल की महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। यह तक़रीबन 260 किमी लंबी गंगा नदी की एक शाखा के रूप में अपने अस्तित्व में है जो मुर्शिदाबाद से निकलती है जहां गंगा नदी दो भागों में विभाजित हो जाती है। एक &#8211; बांग्लादेश से बहने वाले भाग को पद्मा कहते हैं और दूसरा हुगली नदी के नाम से विख्यात है। हुगली नदी की दो सहायक नदियों में दामोदर नदी और रूपनारायण नदी हैं। गंगा नदी की अन्य धाराओं की भांति हुगली-भागीरथी नदी को भी हिन्दुओं द्वारा पवित्र माना जाता है। इसकी औसत गहराई लगभग 108 फीट और अधिकतम गहराई है 381 फीट है। हावड़ा में यह अधिकतम गहराई 147 फीट के साथ बहती है। बैरकपुर और सेरामपूर में इस नदी की अधिकतम गहराई 300 फीट है।</strong></p>
<p>हुगली नदी, उसकी पवित्रता, उसकी गहराई, उसके स्रोतों की चर्चा यहाँ इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि इस शहर, इस प्रान्त में जन्म लिए हरेक व्यक्ति, चाहे इस प्रान्त में आज रहते हैं अथवा विश्व के किसी कोने में प्रवासित हो गए हों; अपने मानस पटल पर सदा ही कला और साहित्य को विशेष स्थान दिए हैं। यही कारण है की इसे भारत का सांस्कृतिक शहर भी कहा जाता है। हुगली नदी के तट पर बसा भारत का एक प्राचीनतम शहर जो अपने उद्गम के समय से अपने साहित्यिक, क्रांतिकारी और कलात्मक धरोहरों के लिए जाना जाता है। यह शहर, भारत की पूर्व राजधानी होने के कारण आधुनिक भारत की साहित्यिक और कलात्मक सोच का जन्म स्थान भी रहा है और आज भी अपने ह्रदय में उसे धरोहर बनाकर रखा है &#8211; यानी पश्चिम बंगाल की राजधानी कल का कलकत्ता और आज का कोलकाता। और इसी शहर में रहते हैं महान कलाकार अमित भर। ऋषिकेश, हरिद्वार, मिर्जापुर, कानपुर, प्रयागराज के रास्ते बनारस होते हुए गंगा की अविरल धारा जिस तरह अपने किनारे बसे शहरों की मिट्टी को धोते हुगली नदी के माध्यम से पश्चिम बंगाल होते जीवंत रूप में सागर में विलीन हो जाती है, अमित भर की कलाकृति भी उसी तरह कला को समझने, परखने वालों के ह्रदय में अपना स्थान बनाते जीवंत बन जाती है। अमित भर की बनारस के घाटों की चित्रांकन अद्भुत है। <br />
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<figure id="attachment_6330" aria-describedby="caption-attachment-6330" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6330" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6330" class="wp-caption-text">अमित भर की कीर्तियाँ </figcaption></figure></p>
<p><strong>कलकत्ता के महान कलाकार परेश दास, निलय घोष और सुबल जाना को अपना गुदेव मानने वाले श्री अमित भर का जन्म कलकत्ता शहर में ही है। वाटर कलर वाले पेंटिंग पर लाइट और शेड का का गजब का कमाल दिखने वाले यह कलाकार अब तक अनेकों पेंटिंग कर चुके हैं, प्रदर्शनी लगाये हैं और सम्मान पाये हैं। आधिकारिक रूप से इस शहर का नाम कोलकाता पहली जनवरी 2001 को रखा गया। इसका पूर्व “कैलकटा’ था लेकिन बांग्ला भाषी इसे सदा कोलकाता या कोलिकाता के नाम से ही जानते है। नाम की कहानी और विवाद चाहे जो भी हों इतना तो तय है कि यह आधुनिक भारत के शहरों में सबसे पहले बसने वाले शहरों में से एक है। सन 1690 में ईस्ट इंडिया कंपनी “जाब चारनाक” ने अपने कंपनी के व्यापारियों के लिये एक बस्ती बसाई थी, आठ साल बाद, कंपनी ने एक स्थानीय जमींदार सावर्ण रायचौधरी से तीन गाँव (सूतानुटि, कोलिकाता और गोविंदपुर) लिया इन तीन गाँवों का विकास प्रेसिडेंसी सिटी के रूप में करना शुरू किया।</strong></p>
<p>सन 1927 में किंग जॉर्ज &#8211; 2 के आदेशानुसार यहाँ एक नागरिक न्यायालय की स्थापना की गयी। बाद में 1756 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। उसने इसका नाम “अलीनगर” रखा। लेकिन साल भर के अंदर ही सिराजुद्दौला की पकड़ यहाँ ढीली पड़ गयी और अंग्रेजों का इस पर पुनः: अधिकार हो गया। सन 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने कैलकटा को ब्रिटिश शासकों के लिए भारत की राजधानी बना दी जो 1912 तक भारत में अंग्रेजों की राजधानी बनी रही, बाद में भारत की राजधानी दिल्ली बनी।</p>
<figure id="attachment_6331" aria-describedby="caption-attachment-6331" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-12-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-12-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-6331" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-12-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-12-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-12-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-12-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-12-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-12-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6331" class="wp-caption-text">अमित भर की कीर्तियाँ </figcaption></figure>
<p><strong>ये बात तो राजनीतिक  है, परन्तु जो तथ्य है वह यह की बंगाल की कला में कला के विभिन्न रूप हैं। मसलन नृत्य, पेंटिंग्स, मूर्तिकला आदि। वे पर्यटक जो पश्चिम बंगाल की कला को जानना चाहते हैं उनकी पहली पसंद शांतिनिकेतन होती है। मेले और त्योहार पश्चिम बंगाल पर्यटन का महत्वपूर्ण भाग है जिसमें दुर्गा पूजा, काली पूजा, सरस्वती पूजा, लक्ष्मी पूजा, जगदधात्री पूजा आदि प्रसिद्ध त्योहार शामिल हैं जिसमें विभिन्न रूप में स्त्री शक्तियों की पूजा की जाती है। गंगा सागर मेला प्रतिवर्ष हज़ारों पर्यटकों को आकर्षित करता है। बंगाल में साहित्य, कला और संगीत की त्रिवेणी बहती है। यहाँ जनसामान्य में साहित्य, कला, नाटक और संगीत के प्रति जैसा अनुराग है वह भारत के अन्य प्रान्तों में दुर्लभ है। 1911 तक कोलकाता देश की राजधानी थी। राजाराम मोहन राय जैसे समाज सुधारकों के कारण बंगाल में सामाजिक रूढ़ियाँ कमजोर हुईं जिसके कारण बंगाल में राष्ट्रवादी आन्दोलन की राजनीतिक चेतना विकसित हुई। रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे सांस्कृतिक पुरुषों के प्रयास से जन सामान्य में साहित्य और संस्कृति के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ। कला संस्कृति से जुड़ना सुसंस्कृत होने की शर्त बनी।</strong></p>
<figure id="attachment_6332" aria-describedby="caption-attachment-6332" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6332" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6332" class="wp-caption-text">अमित भर की कीर्तियाँ </figcaption></figure>
<p>20 वीं सदी की शुरुआत में बंगाल में नवजागरण और जातीय चेतना के उन्मेष के कारण कला में भी भारतीयता की तलाश शुरू हुई। इसके पूर्व केरल में राजा रवि वर्मा यूरोपियन कला के सम्मिश्रण से, कला के क्षेत्र में नवजागरण का सूत्रपात्र कर चुके थे। वे ब्रिटिश शासन काल में यूरोपीय कलाकारों की शैली में, भारतीय जनमानस में गहरे पैठी देवी देवताओं और पौराणिक आख्यानों पर आधारित चित्र बनाकर अकेले ही उन यूरोपीय कलाकारों के सामने चुनौती पेश कर रहे थे। राजा रवि वर्मा के चित्र तत्कालीन राजा महाराजा के महलों से लेकर जनसाधारण के घरों में कैलेंडर के रूप में मौजूद और काफी लोकप्रिय था। आज हिंदुस्तान में जन मानस में देवी देवताओं की जो छवि निर्मित है, वह राजा रवि वर्मा की ही देन है। अवनीन्द्रनाथ टैगोर जो कविवर रविंद्रनाथ टैगोर के भतीजे थे, यूरोपीय शैली के बरक्स जिस भारतीय शैली की तलाश कर रहे थे, उसका एक रास्ता यह था कि वे राजा रवि वर्मा की शैली को ही आगे बढ़ाते जैसा कि हेमेन मजुमदार ने किया परंतु तब कला में जिस भारतीयता की तलाश की जा रही थी वह अधूरी रह जाती।</p>
<p>19 वीं सदी के अंतिम दशक में कोलकाता के गवर्नमेंट स्कूल ऑफ आर्ट एवं क्राफ्ट में ई.वी. हैवल प्रिंसिपल बनकर आये । हैवल पहले विदेशी थे जिन्होंने सही परिप्रेक्ष्य में भारतीय कला का मूल्यांकन किया था। उनके विचार भारत की कला और भारत के इतिहास दोनों के संबंध में सुलझे हुए थे। उन्होंने विदेशी संस्कारों से ग्रसित और हीन भावनाओं से पीड़ित भारतीय मानस को एक नई कला चेतना दी। हैवल का मत था कि भारत की चित्रकला और मूर्तिकला मात्र प्रतिरूप नहीं है,वह व्यक्ति विशेष के दैहिक रूप मात्र का प्रतिनिधित्व नहीं करती बल्कि उसके अंतर्निहित अध्यात्मिक भावों को भी उजागर करती है।</p>
<figure id="attachment_6333" aria-describedby="caption-attachment-6333" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6333" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6333" class="wp-caption-text">अमित भर की कीर्तियाँ </figcaption></figure>
<blockquote><p>इसी तरह यामनी राय बंगाल-स्कूल को पश्चिमी शैली से प्रभावित मानते थे। पश्चिमी शैली के अंधानुकरण को वे हेय दृष्टि से देखते थे। विदेशों में आज भी यामिनी राय के चित्रों की मांग है क्योंकि वे एकमात्र भारतीय कलाकार हैं जिनमें शत-प्रतिशत भारतीयता है।यामिनी राय के बाद आधुनिक भारतीय चित्रकला में अमृता शेरगिल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अमृता ने अपनी छोटी सी आयु में भारतीय चित्रकला को अपनी मौलिक प्रतिभा से एक नई दिशा और ऊँचाई दी। उसने अपनी चित्रकला के लिए भारतीय विषयों खासकर आम महिलाओं के जीवन को आधार बनाया।</p></blockquote>
<p>1942 में भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था । 1943 में बंगाल में भयानक अकाल पड़ा । जनजीवन अस्त- व्यस्त हो गया, लेकिन बंगाल स्कूल के प्रशिक्षित कलाकारों ने तत्कालीन समाज के कटु यथार्थ को चित्रित नहीं कर पाये । जिन कलाकारों ने बंगाल के दुर्भिक्ष का अपनी कलाकृतियों में चित्रण किया उनमें प्रमुख थे — जैनुअल बैदिन, आदिनाथ मुखर्जी,चित्तोप्रसाद, रामकिंकर बैज, सोमनाथ होर ,प्राणनाथ मागो। आजादी के बाद बंगाल में शुरुआती दौर की चित्रकला में पाश्चात्य और भारतीय शैलियों के मिश्रण की अधिकता थी। बंगाल में जोगेन चौधुरी, गणेश पाइन, कार्तिक चन्द्र पाइन और गणेश हालोई जैसे बहुत से कलाकार हैं जिन्होंने अपने बचपन में भारत विभाजन का दंश को भोगा हैं, शरणार्थी जीवन के संघर्ष के ताप को महसूस किया है। शैशवास्था का तनाव इन कलाकारों का कामों में झलकता है।</p>
<figure id="attachment_6334" aria-describedby="caption-attachment-6334" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-8.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-6334" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-8.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-8-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-8-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-8-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-8-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6334" class="wp-caption-text">अमित भर की कीर्तियाँ </figcaption></figure>
<p>गणेश हालोई अद्भुत शैली में लैंडस्केप को चित्रित करते हैं। इनका लैंडस्केप देख कर ऐसा लगता है जैसे काफी ऊँचाई से अवलोकन कर चित्रित किया गया हो। गणेश हालोई बंगाल में अमूर्त शैली में काम करने वाले गिने चुने कलाकारों में से एक हैं।विकास भट्टाचार्य ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने मुख्यधारा सेमी-ऐब्सट्रैक्ट के विपरीत जाकर आकृति मूलक ओर पोर्ट्रेट में अपना विशिष्ट मुकाम बनाया है। ये कला में यथार्थ शैली के पक्षधर हैं।बी आर पनेसर’कोलाज शैली’ के महत्वपूर्ण कलाकार हैं। रंगों के वजाय वे कागज़ के टुकड़ों को चिपकाकर पेंटिंग बनाते हैं। उन्होंने ग्राफ़िक माध्यम में भी बहुत अच्छे काम किये है। पनेसर जी ने शकीला जैसे फूटपाथ पर रहने वाले बच्चे को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कलाकार बनाने में योगदान दिया है, जो उन्हें विशिष्ट बनाता है।बी आर पनेसर इसे ‘ह्यूमन कोलाज’ कहते हैं। अरिंदम चटर्जी अमूर्त शैली में लैंडस्केप चित्रित करते हैं। अमूर्त दृश्यों को उम्दा कलाकृतियों में बदल देने की कलाकार के पास एक अद्भुत क्षमता एंव शैली है।कहा जाता है कि महिलाएं आदिकाल से समाज को मापने का पैमाना रहीं हैं। समाज में महिलाओं की स्थिति से जाना जा सकता है कि समाज कितना समुन्नत है। </p>
<p><strong>बहरहाल, वापस अमित भर के पास चलते हैं। एक स्व-शिक्षित कलाकार, अमित भर ने वाराणसी की अपनी मनमोहक पेंटिंग्स से सफलता और लोकप्रियता हासिल की है। उनके कैनवस शांत हैं, फिर भी जीवन से भरे हुए हैं, जैसे कि धुंध भरी नदी से नावें निकलती हैं और साधु घाटों पर चढ़ते हैं। लोगों से लेकर वास्तुकला और प्रकृति तक, उनके काम में प्रत्येक विवरण को बहुत सटीकता और नाटकीय प्रस्तुति के साथ प्रस्तुत किया गया है। कुछ वर्ष पूर्व कला लेखिका और इतिहासकार संध्या बोर्डेवेकर को उन्होंने कहा था कि &#8216;मेरे पिता, चाची और चाचा चित्रकारी में बहुत अच्छे थे। लेकिन चूँकि इससे उन्हें किसी तरह की आजीविका नहीं मिलती थी, इसलिए उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया और इसे एक शौक के रूप में लिया। जब मेरे पिता ने कला के प्रति मेरे जुनून को देखा, तो उन्होंने मुझे इससे दूर करने और ऐसे विषयों में मेरी रुचि जगाने के लिए हर संभव प्रयास किया, जिससे मुझे अच्छी आजीविका कमाने में मदद मिले। मैं उन्हें दोष नहीं देता; हर माता-पिता अपने बच्चे के लिए सबसे अच्छा चाहते हैं। लेकिन मैंने दृढ़ निश्चय किया और अपने जुनून को जारी रखा।&#8217;</strong> </p>
<figure id="attachment_6335" aria-describedby="caption-attachment-6335" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6335" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6335" class="wp-caption-text">अमित भर की कीर्तियाँ </figcaption></figure>
<p>कलाकार भर आगे कहते हैं कि &#8216;अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो गर्व के साथ कह सकता हूँ कि 6 या 7 साल की छोटी सी उम्र में भी मैं बहुत अच्छी तरह से चित्रकारी करता था। मुझे आज भी वह दिन अच्छी तरह याद है जब मैं हुगली नदी के किनारे, गंगा घाट पर, अपने गृहनगर चिनसुरा के बहुत करीब बैठा था और कागज़ के टुकड़ों पर रेखाचित्र बना रहा था। मेरे साथ छात्रों का एक समूह और उनके कला शिक्षक भी थे। उन्होंने मेरे कंधे पर नज़र डाली कि मैं क्या बना रहा हूँ। वह निलोय घोष थे, जो एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय कलाकार और शिक्षक थे, जो अपने स्टूडियो में कला की शिक्षा देते थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे अपनी कक्षा में निःशुल्क शामिल होने के लिए कहा। एक कलाकार के रूप में मेरे विकास में यह पहला जीवन बदलने वाला मोड़ था।&#8217;</p>
<p>उनका कहना है कि &#8216;निलोय घोष के मार्गदर्शन में मेरी ड्राइंग में बहुत सुधार हुआ। मैंने तय किया कि जब मैं स्कूल खत्म कर लूंगा, तो कला में अपनी उच्च शिक्षा जारी रखूंगा। उस समय, मैं कलाकार-शिक्षक सुबल जन से भी मिला, जो कोलकाता के सरकारी कला महाविद्यालय में पढ़ाते थे। उन्होंने मुझे अच्छे कला महाविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रियाओं के बारे में मार्गदर्शन किया और प्रवेश परीक्षाओं के लिए जीवन अध्ययन और अन्य व्यावहारिक विषय सिखाए। मैं फुटपाथ पर बिकने वाली किताबों की दुकानों से पुरानी किताबें खरीदता था, जिनमें यूरोपीय मास्टर कलाकारों की पेंटिंग की तस्वीरें होती थीं और उन तकनीकों को आजमाता था जो उन्होंने इस्तेमाल की थीं। यह एक बहुत अच्छा अभ्यास था।&#8217;</p>
<figure id="attachment_6336" aria-describedby="caption-attachment-6336" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6336" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6336" class="wp-caption-text">अमित भर और उनकी पत्नी</figcaption></figure>
<p><strong>मेरे परिवार की मुश्किल आर्थिक स्थिति के कारण, मैंने मूवी होर्डिंग्स को पेंट करने, सभी तरह के डिज़ाइन का काम करने, ड्राइंग, पेंटिंग, कला से जुड़े काम करने का काम लिया। इससे मुझे पैसे कमाने में मदद मिली और साथ ही एक कलाकार के रूप में मेरे कौशल को कई तरह से निखारा। चूँकि मूवी होर्डिंग्स को पेंट करने के लिए यथासंभव अभिनेताओं के करीब यथार्थवादी चेहरे बनाने पर अच्छे नियंत्रण की आवश्यकता होती है, इसलिए मेरे चाचा ने मुझे परेश दास से मिलवाया, जो एक बहुत अच्छे कलाकार थे, जो एक स्कूल में पढ़ाते थे और मेरे घर के काफी करीब रहते थे। शुरुआत में, उन्होंने मुझे &#8216;होर्डिंग पेंटर&#8217; समझकर टाल दिया, लेकिन जब उन्होंने मेरी स्केचबुक देखी, तो वे मेरा मार्गदर्शन करने के लिए तैयार हो गए। वह मार्गदर्शन अमूल्य था क्योंकि उन्होंने मुझे ब्रश स्ट्रोक के महत्व, कैनवास पर मानव त्वचा को कैसे चित्रित किया जाए, सबसे छोटी झुर्रियों पर काम करने और कई अन्य यथार्थवादी पेंटिंग तकनीकों के बारे में समझाया और दिखाया। इसने पोर्ट्रेट में मेरे बाद के काम की नींव रखी।&#8217; </strong></p>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;इस दौरान मैंने कुछ स्थानीय कपड़ा प्रिंटरों के लिए कपड़े पर छपाई के लिए डिज़ाइन भी बनाए। मुझे तब नहीं पता था कि यह एक बेहतरीन नौकरी का अवसर था। मैं कपड़ा छपाई की एक बड़ी कंपनी के लिए काम करने के लिए बैंगलोर चला गया। मुझे रहने के लिए एक घर दिया गया था, और जैसे-जैसे मैं उस शहर में आगे बढ़ा और कपड़ा छपाई में आधुनिक तकनीक के बारे में सब कुछ सीखा, मैंने नौकरी बदली। मेरा वेतन बढ़ा, और मुझे एक कार भी दी गई। मेरा परिवार बहुत खुश था। लेकिन मैं खुश नहीं था। यह मेरे जीवन में दूसरा जीवन बदलने वाला मोड़ था। रातों-रात मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी। और इसके साथ ही वह सब खो गया जिसे हम &#8216;जीवन की अच्छी चीजें&#8217; कहते हैं। मैं सचमुच सड़क पर था, फुटपाथ पर सोता था। अपनी बचत से, मैंने एक छोटा सा घर किराए पर लिया जहाँ मैं रहता था और स्कूली छात्रों को ट्यूशन देना शुरू कर दिया। मैं फिर से ड्राइंग और पेंटिंग करने लगा। और काफी खुश था।</p>
<figure id="attachment_6337" aria-describedby="caption-attachment-6337" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-9.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-6337" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-9.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-9-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-9-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-9-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-9-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6337" class="wp-caption-text">अमित भर की कीर्तियाँ </figcaption></figure>
<p>भर कहते हैं: &#8220;एक दिन, मैंने बैंगलोर में रहने वाले बंगालियों के स्थानीय संघ द्वारा शहर में पूजा समारोहों का एक पोस्टर देखा। मैंने उनसे संपर्क किया और आवश्यक सजावट और देवी की छवि रखने वाले बड़े पंडाल को बनाने का काम मिला, जो पूरे बंगाल में और जहाँ भी बंगाली समुदाय दुर्गा पूजा मनाते हैं, वहाँ प्रचलित एक पारंपरिक और लोकप्रिय प्रारूप है। मेरे द्वारा डिज़ाइन किए गए उस पंडाल ने इतना ध्यान आकर्षित किया कि मैं आने वाले त्योहारों और पारिवारिक समारोहों से संबंधित और अधिक परियोजनाओं से अभिभूत हो गया। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैंने बैंगलोर के कुछ कला-प्रेमियों और कला दीर्घाओं का ध्यान आकर्षित किया।&#8221;</p>
<p>बैंगलोर की उन दीर्घाओं में से एक ने मुझे तुरंत एक प्रदर्शनी की पेशकश की। मैं बहुत खुश था! यह मेरे जीवन में तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण जीवन-परिवर्तनकारी मोड़ था। मेरी बैंगलोर गैलरी से समर्थन निरंतर और सक्रिय था। इसने मुझे भारत भर के अन्य शहरों और बाद में, दुनिया के अन्य हिस्सों में प्रदर्शन करने का आत्मविश्वास दिया। मैंने पोर्ट्रेट पर भी काम करना शुरू किया। इनमें सतह अलंकरण का एक अतिरिक्त आयाम था, एक तकनीक जो मैंने कपड़ा डिजाइन और छपाई पर काम करते समय सीखी थी। मेरे पोर्ट्रेट भी किसी व्यक्ति के केवल यथार्थवादी चित्रण से परे थे &#8211; उन्हें चेहरे की विशेषताओं के &#8216;लैंडस्केप&#8217; में उनके जीवन में महत्वपूर्ण व्यक्तियों या घटनाओं के चित्रों के साथ हाइलाइट किया गया था। </p>
<figure id="attachment_6338" aria-describedby="caption-attachment-6338" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-10-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-10-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-6338" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-10-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-10-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-10-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-10-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-10-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Amit-10-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6338" class="wp-caption-text">अमित भर की कीर्तियाँ </figcaption></figure>
<p><strong>फिर एक दिन मुझे वाराणसी की एक तस्वीर मिली जिसने मुझे पूरी तरह से चौंका दिया। तस्वीर में दिख रही गंगा मुझे बचपन के हुगली के गंगा घाट पर ले गई। यादें ताज़ा हो गईं। मैंने वाराणसी के लिए अगली फ्लाइट पकड़ी। मैं सुबह से लेकर देर रात तक उस पुराने पवित्र शहर में घूमता रहा, असामान्य नज़ारे, मंदिर, घाट, गंगा पर नावें, संकरी गलियाँ, श्लोक और मंत्रों का जाप, इसकी व्यापक आध्यात्मिकता को देखता रहा। मैंने वाराणसी पर एक पूरी प्रदर्शनी बनाई, जिसमें इसके कई पहलुओं को दर्शाया गया। तब से वाराणसी मेरी कल्पना में बहुत बड़ा है और इस पर काम करना एक शानदार विषय है। मैं एक नए व्यक्ति के रूप में वापस आता हूँ, मेरा सिर और दिल दृश्यात्मक रूप से रोमांचक विचारों से भरा हुआ है। 2005 में, मैंने व्यक्तिगत रूप से नई दिल्ली के हैबिटेट सेंटर में अपना शो आयोजित किया, जिसमें 37 ऐक्रेलिक पेंटिंग और वॉटरकलर प्रदर्शित किए गए। वे सभी बिक गए &#8211; यह एक तरह का रिकॉर्ड था! प्रदर्शनी को मीडिया &#8211; प्रिंट और टीवी में व्यापक रूप से कवर किया गया था।</strong> </p>
<p>व्यक्तिगत रूप से, मुझे जल रंग बनाना बहुत पसंद है। मेरी पिछली प्रदर्शनियों में कैनवस की तुलना में जल रंग ज़्यादा थे। यह एक कठिन और चुनौतीपूर्ण माध्यम है &#8211; आप गलती करते हैं, और इसे सुधारना संभव नहीं है। हालाँकि कला दर्शक जल रंग को लेकर गर्मजोशी से प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन जब खरीदने की बात आती है, तो लोग कैनवास पर तेल या ऐक्रेलिक को प्राथमिकता देते हैं। ऐसा ही है। लेकिन मेरे दिल में, जो राज करता है वह है वाराणसी और जल रंग। मैं बैंगलोर में रहता था और काम करता था, लेकिन मुझे अपने माता-पिता की बहुत याद आती थी। मैं चाहता था कि मेरे पिता यह समझें कि कला एक सच्चे दृढ़ निश्चयी कलाकार को एक अच्छी आजीविका कमाने में मदद कर सकती है। यह अवसर 2007 में आया जब मेरी बैंगलोर गैलरी ने हाल ही में खुले लीला पैलेस होटल में एक प्रदर्शनी आयोजित की, जो नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के करीब है। यह एक बहुत बड़ा एकल शो था जहाँ मैंने अपनी बनाई हर तरह की कलाकृति प्रदर्शित की थी। बैंगलोर के &#8220;कौन कौन है&#8221; और हर जगह से कला संग्रहकर्ता आमंत्रित किए गए थे। मैं अपने पिता को उद्घाटन के लिए बुला लाया, और उन्हें शो के उद्घाटन के अवसर पर दीप प्रज्वलित करने का सम्मान मिला।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/river-banks-have-made-a-significant-contribution-to-the-development-of-art-and-culture">इतिहास गवाह है नदियों का किनारा &#8216;कला और संस्कृति&#8217; के विकास में &#8216;अहम&#8217; योगदान दिया है, &#8216;हुगली&#8217;, &#8216;बनारस&#8217; प्रथम द्रष्टा है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 Nov 2024 04:03:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अन्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: आज ही नहीं, आने वाले समय में जब देश के बच्चों, नौजवानों से पूछा जायेगा की भारत के तीसरे प्रधान मन्त्री कौन थे? तब बच्चे गर्दन घुमाकर गुगुल करेंगे। अगर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अन्तर्वीक्षा में टेबुल के दूसरे तरफ बैठे महानुभाव अभ्यर्थी से पूछ बैठें की [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/others/name-five-historical-sites-and-archaeological-sites-of-your-village-of-which-you-are-proud">आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: आज ही नहीं, आने वाले समय में जब देश के बच्चों, नौजवानों से पूछा जायेगा की भारत के तीसरे प्रधान मन्त्री कौन थे? तब बच्चे गर्दन घुमाकर गुगुल करेंगे। अगर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अन्तर्वीक्षा में टेबुल के दूसरे तरफ बैठे महानुभाव अभ्यर्थी से पूछ बैठें की &#8220;यौ !! अहाँक गामक पांच टा ऐतिहासिक स्थान/पुरातत्वक नाम की? (अपने गाँव या जिला का कोई ऐतिहासिक पुरातत्व का नाम बताएं), तो अभ्यर्थी कहीं गलती से किसी पूर्ववर्ती – मृत नेता का नाम न बता बैठें। सुनने में अटपटा लगता है, पढ़ने में तो बुरा लगेगा ही; परन्तु जब आराम से सोचेंगे तो “यथार्थ” लगने लगेगा। क्योंकि मिथिलांचल में घर-घर नेता पनपते हैं, पंचायत से विधानसभा, विधान परिषद् के रास्ते संसद में बैठने के लिए, लेकिन प्रदेश के रक्षार्थ, सम्मानार्थ बिरले कोई कदम बढ़ाते हैं। </strong></p>
<p>आंकड़ों के अनुसार देश में तक़रीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। अगर औसतन भारतीयों से पूछा जाय की वे अपने ही राज्य में स्थित न्यूनतम 10 ऐतिहासिक पुरातत्व और घरोहरों का नाम बताएं, तो उम्मीद है वे पांच अथवा छठे नाम बताते-बताते दम तोड़ देंगे। वजह यह है कि उन्हें उन ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है (अपवाद छोडकर्) यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। </p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्णाटक का है जहाँ 506 राष्ट्रीय स्तर के ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडू का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पांचवा स्थान गुजरात (293 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); छठा स्थान मध्य प्रदेश (292 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); सातवां स्थान महाराष्ट्र (285 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर), आठवां स्थान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; आंध्र प्रदेश में 129 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हरियाणा में 91 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; ओडिसा में 79 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; बिहार में 70 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; जम्मू-कश्मीर में 56 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; असम में 55 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; छत्तीसगढ़ में 47 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; उत्तराखंड में 42 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हिमाचल प्रदेश में 40 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; पंजाब में 33 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; केरल में 27 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; गोवा में 21 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; झारखण्ड में 13 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं और अंत में दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png" alt="" width="1280" height="869" class="alignleft size-full wp-image-5920" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-300x204.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-1024x695.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-768x521.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>औसतन वैसे ऐतिहासिक पुरातत्वों को छोड़कर, जो “दुधारू गाय” है, देश के हज़ारों-हज़ार पुरातत्वों की स्थिति, “सोचनीय” ही नहीं, “निंदनीय” भी है। ​वर्तमान वित्तीय वर्ष में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को लगभग 1273.91 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ था ताकि देश में ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों को, पुरातत्वों को सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सके। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में यह राशि 142.83 करोड़ अधिक थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का एक हिस्सा है जिसका अहम् कार्य ऐतिहासिक स्थानों और पुरातत्वों को बचाना है। यह तो केंद्रीय स्तर की बात हुई देश में प्रत्येक राज्यों का संस्कृति मंत्रालयों के साथ साथ देश के कुल 787 जिलों के जिलाधिकारियों का भी यह दायित्व है कि स्थानीय रूप से उनके अपने-अपने क्षत्रों के ऐसे स्थानों और पुरातत्वों की देखभाल करे। </p>
<p>विगत दिनों पूर्व में कोसी से आरम्भ होकर पश्चिम में गंडक तक 24 योजन और दक्षिण में गंगा से आरम्भ होकर उत्तर में हिमालय की तराई तक 16 योजन में फैले मिथिला इलाके को अपनी साइकिल के पहियों से नापने वाले ललित नारायण मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगाके प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा से बात हुई। झा बाबू अपने नाम के आगे &#8216;पुरातत्व&#8217; लिखते हैं । मेरे बाबूजी कहते थे कि अगर एक मनुष्य अपने जीवन काल में अपने नाम का ही अर्थ समझ लिया, अथवा अपने नाम का सार्थकता सिद्ध करने का यत्न-प्रयत्न किया, तो इससे बेहतर जीवन ​उद्देश्य और कुछ नहीं हो सकता है। मुरारी बाबू अपने जीवन के इस अल्पायु में अपने नाम का सार्थकता लगभग 90 फीसदी सिद्ध कर लिए हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg" alt="" width="1280" height="799" class="alignright size-full wp-image-5921" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-768x479.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>मेरा मानना है पढ़ना-लिखना, नौकरी-पेशा करना, घर-परिवार होना, घन कामना यह सभी जीवन का एक दूसरा पक्ष है जो पहले (उपरोक्त) पक्ष की तुलना में द्वितीय स्थान पर है। मुरारी बाबू अपने सामर्थ्य भर मिथिला क्षेत्र में गुमनाम ऐतिहासिक स्थलों, पुरातत्वों को न केवल ढूंढ रहे हैं, बल्कि वर्तमान ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी दस्तावेज के रूप में उन खोजों को, तस्वीरों के साथ, फिल्मों के साथ समर्पित करेंगे। मिथिला में मुझे अभी तक ऐसे कोई भी युवक अथवा युवती नहीं दिखे हैं। श्री मुरारी बाबू और उनका कार्य अद्वितीय हैं।</p>
<p>आज अगर दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह जीवित होते तो शायद मुरारी बाबू को अपने सर पर बैठाकर  सम्मानित करते &#8211; अर्थ से, सामर्थ्य से, महाराजा मुरारी बाबू के पीछे खड़े हो जाते क्योंकि उस काल खंड में मिथिला में विचारवान लोगों की किल्लत नहीं थी। आज राज परिवार में उस सोच के लोग नहीं हैं, अतः उनसे उम्मीद करना मूर्खता होगी। मिथिला में आज &#8216;सामर्थ्यवान&#8217; लोगों की तो बाढ़ है, गली-कूचियों में नेताओं का जमघट है, प्रत्येक नेता अरबपति, खरबपति है; परन्तु दुर्भाग्यवश &#8216;विचारवान&#8217;, &#8216;संवेदनशील&#8217;, &#8216;पुरातत्वों के प्रति प्रेम&#8217; लोगों की सुखाड़ है। खैर। </p>
<p><strong>मुरारीजी शायद देश का पहला शोधार्थी है जो साइकिल को अपने शोध का हिस्सा बनाकर मिथिलांचल के ऐतिहासिक पुरातत्वों को ढूंढकर दस्तावेज बना रहे हैं। उधर राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए 55 फीसदी शैक्षिक दर वाले मिथिलांचल में मैथिली भाषा भाषी मतदाताओं को अपनी भाषा में संविधान का ज्ञान प्राप्त करने के लिए संविधान दिवस पर मैथिली भाषा में संविधान का लोकार्पण किया गया और पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनके मंत्रिमंडल के आला मंत्री-संत्री-अधिकारीगण दांत निपोड़ रहे हैं, कह रहे हैं &#8220;अच्छा !!!! वह आर्यन काल का है&#8230;. अच्छा गुप्ता काल का है, अच्छा वह&#8230;. क्योंकि न उन्हें पुरा से मतलब है और ना ही तत्व से। फिर मिथिला का इतिहास बचेगा कैसे?</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg" alt="" width="1313" height="720" class="alignleft size-full wp-image-5922" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg 1313w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-300x165.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-1024x562.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-768x421.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1313px) 100vw, 1313px" /></a></p>
<p>मुरारी जी कहते हैं कि वे मूलतः मिथिला परिक्षेत्र के दरभंगा जिला स्थित लवानी गाँव(बिहार) के निवासी हैं और वर्तमान समय में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा से पुरातत्त्व विषय में Ph.D. उपाधि हेतु शोध कार्य कर रहे हैं।  वे कहते हैं कि आज से नौ वर्ष पूर्व जब वे पुरातत्त्व के क्षेत्र में शोध के उद्देश्य से भ्रमण का योजना बनाये, तब साधन और संसाधन का अभाव सामने था। किंतु, उन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को साधन के रूप में प्रयोग में लाना आरंभ किया।मुरजी जी कहते हैं: &#8220;आज तक में मैं अपने साइकिल से लगभग 1.5 लाख किलोमीटर सफ़र तय करते हुए पुरास्थल, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के गाँव, प्राकृतिक सम्पदा आदि के अन्वेषण के उद्देश्य से लगभग 600 से अधिक यात्रा किया हूँ, जिसमें एक दिन में सबसे लम्बी दूरी 202 किमी. रही है। इस बार लगभग 300 किमी. दूरी तय करते हुए एक शोधपूर्ण यात्रा वृत्तांत प्रकाशित कराने की योजना है।&#8221;</p>
<p><strong>उनका मानना है कि &#8220;मिथिला, भारत के सबसे प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों में से एक है, जिसे ऐतिहासिक, धार्मिक और प्राकृतिक धरोहरों का केंद्र माना जा सकता है। इस क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों, पुरास्थलों, नदियों, झीलों और सांस्कृतिक धरोहरों का भंडार है। हमारी कोशिश है कि सभी स्थलों तक पहुंचकर उसका व्यापक रूप से शोध और दस्तावेज़ीकरण किया जाय।&#8221; </strong></p>
<p>मुरारी जी कहते हैं: &#8220;मेरी साइकिल यात्रा (300किमी) दिसंबर 2024 के प्रथम सप्ताह में होगी और इसमें लगभग 3000 से अधिक पुरास्थल, प्राचीन मंदिर, प्राकृतिक धरोहर, क्षेत्रीय आयूर्वेद, गाँव, नदी, नहर, पोखर, झील, पक्षी अभ्यारण, कृषि, पशुपालन सहित अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों का विवरण और सूचीकरण किया जाएगा। इस परियोजना के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली पुस्तक में इन सभी स्थलों का विवरण और चित्रण सहित उनसे जुड़ी सांस्कृतिक व्याख्या सम्मिलित होगी। यह परियोजना मिथिला की धरोहर और संस्कृति को संरक्षित और प्रचारित करने के साथ ही आम जनमानस को धरोहर संरक्षण के प्रति जागरूक करने हेतु एक व्यापक प्रयास का हिस्सा है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="alignright size-full wp-image-5923" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>​<strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> जब परियोजना का उद्देश्य​ पूछा तो मुरारी जी कहते हैं कि &#8220;इस परियोजना का उद्देश्य एक साइकिल यात्रा के माध्यम से मिथिला क्षेत्र के पुरास्थलों, प्राचीन मंदिरों, प्राकृतिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासतों का गहन अध्ययन और उनका सूचीकरण के साथ ही इस वृत्तांत को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना है, ताकि इन धरोहरों के बारे में शोधपूर्ण जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक​ पहुंचना है ताकि लोगों में अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक विरासतों के बारे में पता चले।  इससे स्थानीय  और राष्ट्रीय स्तर पर धरोहर और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।​&#8221;</p>
<p><strong>​जब उनसे पूछा कि इस यात्रा, शोध और पुस्तकी की छपाई के लिए आर्थिक श्रोत क्या है? मुरारजी जी कुछ क्षण रुके, लम्बी सांस लिए और फिर कहते हैं: &#8220;यही बिडम्बना है। यही हमारा दुर्भाग्य है। हम वीरसातों की महत्ता को तो समझते हैं, उसे उजागर करने के लिए सतत प्रयन्तशील हैं और चाहते हैं कि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दस्तावेज छोड़े जो उनके गान, प्रखंड, अंचल, जिला, क़स्बा के धरोहरों का जिवंत दृष्टान्त होगा। अर्थ के मामले में हम हैं कमजोर जो जाते हैं। हम एक शोधार्थी हैं। हम जानते हैं कि जिस कार्य को हम कर रहे हैं वह न केवल जिला प्रशासन के लिए, प्रदेश की सरकार के लिए या फिर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, इस कार्य से करोड़ों रूपये कमाए जा सकते हैं। हम अपने प्रदेश के, देश के लोगों से, जो देश से बाहर रहते हैं, उसने प्रार्थना कर रहे हैं कि इस कार्य में वे सभी हमारा हाथ पकड़ें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मिथिला में लोग हाथ पकड़ते नहीं, हाथ झटक देते हैं।&#8221;</strong></p>
<p>झा का जन्म 15 फरवरी 1994ई० को दरभंगा जिले के ही बेनीपुर प्रखंड अंतर्गत आने वाले लवानी गाँव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ और इनका लालन-पालन एवं सम्पूर्ण पढाई जिले के ही बहादुरपुर प्रखंड अंतर्गत देकुली गाँव स्थित नाना-नानी के घर से हुआ।​ ​स्नातकोत्तर के दौरान ही 02 दिसंबर 2015 को तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ मदन मोहन मिश्र, शिक्षक डॉ अयोध्या नाथ झा और विभागीय कर्मचारी श्री कैलाश प्रसाद के समक्ष प्राचीन इतिहास विभाग(मोतीमहल परिसर) से प्राप्त हुए 1341ई० के &#8220;मोती महल स्तंभ लेख&#8221; के ऐतिहासिक खोज के साथ ही इन्होंने पुरातत्व के दुनिया में अपना पहला कदम रखा। किंतु, आगे की खोज जारी रखने हेतु इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में साधन और संसाधन का अभाव था, बावजूद इसके; इन्होंने अपना खोज-कार्य जारी रखा। चूंकि, नवीन खोज करना इनका प्रथम पसंद था; इसीलिए तत्काल इन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को ही साधन के रूप में उपयोग किया।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg" alt="" width="1159" height="1600" class="aligncenter size-full wp-image-5924" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg 1159w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-217x300.jpeg 217w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-742x1024.jpeg 742w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-768x1060.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-1113x1536.jpeg 1113w" sizes="auto, (max-width: 1159px) 100vw, 1159px" /></a></p>
<p>स्वतंत्र भारत में, खासकर मिथिला क्षेत्र में मुरारी जी शायद पहला शोधार्थी है जो साइकिल से ही पुरास्थलों को खोजने हेतु दूर-दूर तक जाते हैं। दरभंगा के आनंदपुर से विदा होकर चार घंटे  पुरास्थल (गिरिजा स्थान फुलहर) पर कार्य करने के उपरांत कुल 13 घंटे में पुनः आनंदपुर आ गए थे, यानी कि 202 किमी की दूरी अपने साइकिल से 9 घंटे में तय किए। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों को खोजने के लिए अपने साइकिल से ये अभी तक दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, वैशाली, पटना आदि जिलों के लगभग 400 से 500 पुरास्थलों का भ्रमण कर चुके हैं। इससे संबंधित इनके दर्जन भर से अधिक आलेख भी प्रकाशित हैं। इनके सहयोग से देकुली (बहादुरपुर, दरभंगा) से एक शिवलिंग, ओझौल (बहादुरपुर, दरभंगा) से विष्णु प्रतिमा, भटौरा मठ (शिवाजीनगर, समस्तीपुर) से विष्णु प्रतिमा को दरभंगा जिला स्थित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संगृहीत किया जा चूका है। धरोहर संरक्षण हेतु, इन्हें विगत वर्ष मार्च महीने में चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के दौरान &#8216;पुरातत्व भूषण सम्मान-2023&#8242; से सम्मानित किया गया।</p>
<p>​मुरारीजी कहते हैं: &#8220;केवल दरभंगा जिला को ही लें तो, शंकरपुर डीह, खैरा-सिरुआ, कुर्सों-नदियामी, इनाई, महथावन आदि पुरास्थलों से प्राचीन सिक्के, भच्छी, कोर्थू, पिपरौलिया, पंचोभ, तिलकेश्वर मठ, दरभंगा राज परिसर आदि पुरास्थलों से अभिलेख, बहेरा, बरई, शंकरपुर डीह, देवकुली, रतनपुर, ब्रह्मपुर, हावीडीह, कोर्थू आदि पुरास्थलों से प्राचीन भवनों मंदिरों के प्रमाण, रमौली, हरहच्चा, कोइलवाड़ा, महथावन, वाराही आदि पुरास्थलों से टेराकोटा और समस्त दरभंगा जिला से सैकड़ों प्रतिमाएं प्राप्त हुए हैं और समय-समय प्राप्त होते रहते हैं। इस जिले के 300 से अधिक ऐसे पुरास्थल और गांव हैं, जहां विभिन्न प्रकार के पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। ये सभी पुरावशेष ईस्वी पूर्व से आधुनिक काल तक के हैं, जिसका वैज्ञानिक परीक्षण और अध्ययन होना अति आवश्यक है।​ मेरी कोशिश है कि अपनी यात्रा के दौरान ऐतिहासिक धरोहर, प्राकृतिक धरोहर, मानव स्वास्थ्य, जल संचयन एवं संरक्षण, संस्कृति के संरक्षण, जैविक कृषि आदि के महत्व को बताते हुए स्थानीय लोगों को जागरूक ​करते रहें क्योंकि जीवन में निरंतरता, लगन, एकाग्रता, सहनशीलता और बुद्धिमता सबसे आवश्यक है।&#8217;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg" alt="" width="667" height="591" class="aligncenter size-full wp-image-5925" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg 667w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5-300x266.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 667px) 100vw, 667px" /></a></p>
<p>मुरारी ​जी एक समर्पित और बहु-आयामी शोधकर्ता और पुरातत्वविद हैं, जो मिथिला क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और प्राकृतिक धरोहरों को संरक्षित करने में गहरी रुचि रखते हैं। मुरारी ​जी का मुख्य शोध मिथिला क्षेत्र की पुरातात्विक धरोहर पर केंद्रित है। उनके शोध का उद्देश्य दरभंगा जिले और इसके आस-पास के क्षेत्रों में छिपी प्राचीन धरोहरों और स्थलों की पहचान करना और उन्हें संरक्षित करना है। उन्होंने कई अज्ञात और अपरिचित स्थलों का अन्वेषण किया है, जिन्हें अब तक नजरअंदाज किया गया था।</p>
<p>उनके शोध कार्य का सबसे अनोखा पहलू यह है कि उन्होंने किसी विशेष साधन के बजाय अपनी साइकिल का उपयोग करके हजारों किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने अपनी साइकिल को &#8216;हवाई जहाज&#8217; नाम दिया और अब तक लगभग 1,50,000 किलोमीटर की दूरी तय की है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहरों का गहन अध्ययन किया और उन्हें संरक्षित करने का प्रयास किया। इतिहास और पुरातत्व के अलावा, मुरारी कुमार झा भूगोल और प्रकृति में भी गहरी रुचि रखते हैं। उन्होंने मिथिला के भौगोलिक परिदृश्य, नदियों, झीलों, और प्राकृतिक संसाधनों का अध्ययन किया है। वे इन प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति भी समर्पित हैं, खासकर जल प्रबंधन और पारिस्थितिक संतुलन के क्षेत्रों में।</p>
<p>मिथिला की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली और कृषि पद्धतियों का भी मुरारी ने गहन अध्ययन किया है। वे आयुर्वेद, कृषि, और पशुपालन में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की वकालत करते हैं। उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर आयुर्वेदिक पौधों और पारंपरिक कृषि तकनीकों का संरक्षण और प्रोत्साहन किया है। मुरारी कुमार झा एक कुशल लेखक भी हैं। उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर, पुरातात्विक स्थलों, और स्थानीय परंपराओं पर कई लेख और पुस्तकों का लेखन किया है। उनकी लेखनी में गहराई और स्पष्टता है, जो पाठकों को मिथिला की समृद्ध धरोहर के प्रति आकर्षित करती है। इसके अलावा, कला में उनकी रुचि, खासकर मिथिला पेंटिंग्स और अन्य पारंपरिक कलाओं में, उन्हें एक बहु-आयामी व्यक्तित्व बनाती है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/others/name-five-historical-sites-and-archaeological-sites-of-your-village-of-which-you-are-proud">आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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