दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: दरभंगा के अंतिम ‘संतानहीन’ राजा डॉ. कामेश्वर सिंह 1 अक्टूबर, 1962 को अपने जन्मस्थान वाले शहर में ही अंतिम सांस लिए। यह भाग्य की बात थी। जिस दिन वे अनंत यात्रा पर निकले, सारा शहर और प्रान्त अश्रुपूरित था। उनकी मृत्यु के छह दशक बाद दरभंगा राज के ‘भगवती गृह’ का क्या हश्र हुआ, रामबाग परिसर में उपस्थित यह जलकुम्भी गवाह बना। दो वर्ष पूर्व रामबाग परिसर का खुला मैदान और दरभंगा राज का भगवती घर महाराजा की मृत्यु के बाद संपत्ति धारकों की मानसिकता के कारण ‘जलकुम्भी मय हो गया।
वैसे इस कहानी को लिखते समय रामबाग परिसर के लोगों का कहना है कि जब घर के अंदर पानी प्रवेश का खतरा बना, अपने हितों के रक्षार्थ कुछ दृश्य – परिदृश्य में बदलाव लाना शुरू हुआ। आज मैदान को साफ़ कराकर दीवार बना गया है। लेकिन अब रामबाग परिसर में जमीं बची कहाँ? करीब 85 एकड़ में फैला कल के रामबाग की अधिकाधिक जमीन बिक गयी है और कई सौ जमीन के क्रेताओं ने अपना-अपना घर बना लिया है। जो शेष बची है वह भी आने वाले दिनों में क्रेता-विक्रेताओं के बीच कागज पर हस्ताक्षरित हो ही जाएगी।”
1 अक्टूबर को महाराजा डॉ कामेशवर सिंह अंतिम सांस लिए। साल 1962 था। माधवेश्वर में उनका दाह संस्कार दोनों महारानियों की उपस्थिति में कर दिया गया। उनके उतराधिकार को लेकर उनके कुछ प्रिय व्यक्तियों के मन में आशा थी, चाहे छोटी महारानी (अब दिवंगत) जो महाराजा के साथ रहती थी और महाराजा के भगिना कन्हैया जी झा (अब दिवंगत)। लेकिन महाराजा ने किसी को भी उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया। राजकुमार शुभेश्वर सिंह और राजकुमार यजनेश्वर सिंह वसीयत लिखे जाने के समय नाबालिक थे और उनकी शादी नहीं हुई थी सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह की दूसरी शादी नहीं हुई थी। आज जो भी स्वयं को ‘उत्तराधिकारी’ कहते हैं, वे सभी “स्वयंभू” हैं।
मृत्यु से पूर्व 5 जुलाई 1961 को कोलकाता में उन्होंने अपनी अंतिम वसीयत की थी, जिसके एक गवाह पं. द्वारिकानाथ झा थे, जो महाराज के ममेरा भाई थे और दरभंगा एविएशन, कोलकाता में मैनेजर थे। मृत्यु का समाचार मिलने पर वे कोलकाता से दरभंगा पहुंचे और वसीयत के प्रोबेट कराने की प्रक्रिया शुरू करवा दी। कोलकाता उच्च न्यायालय द्वारा वसीयत सितम्बर 1963 को प्रोबेट हुई और पं. लक्ष्मी कान्त झा, अधिवक्ता, माननीय उच्चतम न्यायालय, पूर्व मुख्य न्यायाधीश पटना हाई कोर्ट ग्राम – बलिया ,थाना – मधुबनी पिता पंडित अजीब झा वसीयत के एकमात्र एक्सकुटर बने और एक्सेकुटर के सचिव बने पंडित द्वारिकानाथ झा।
वसियत के अनुसार दोनों महारानी के जिन्दा रहने तक संपत्ति का देखभाल ट्रस्ट के अधीन रहेगा और दोनों महारानी के स्वर्गवासी होने के बाद संपत्ति को तीन हिस्सा में बाँटने जिसमें एक हिस्सा दरभंगा के जनता के कल्याणार्थ देने और शेष हिस्सा महाराज के छोटे भाई राजा बहादुर विशेश्वर सिंह, जो स्वर्गवाशी हो चुके थे, के पुत्र राजकुमार जीवेश्वर सिंह, राजकुमार यजनेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह के (अपने ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतानों के बीच) वितरित किया जाने का प्रावधान था। महाराजा को इस बात की शंका रही होगी तभी उन्होंने शुभेश्वर सिंह के साथ एक शर्त लगाए थे – ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतानों के बीच। आज जो भी दरभंगा राज में ‘स्वयंभू’ सरकार हैं, वे सभी राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के संतान/वंशज हैं; न कि महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह के। खैर।
दरभंगा राज का पतन
वसीयत के अनुसार, दोनों महारानी को रहने के लिए एक – एक महल, जेवर, कार और कुछ संपत्ति मात्र उपभोग के लिए और दरभंगा राज से प्रति माह कुछ हजार रूपये माहवारी खर्च देने का प्रावधान था। पंडित लक्ष्मीकांत झा वसीयत के एक मात्र एक्सेक्यूर बहाल हुए; ओझा मुकुंद झा जो महाराज के बहनोई थे, ट्रस्टी और तीसरे ट्रस्टी पंडित गिरीन्द्र मोहन मिश्र हुए, जो महाराज के सलाहकार थे और पक्के कांग्रेसी थे, हुए । गौरतलब है कि एक श्रोत्रिय, एक जैवार और एक शाकलदीपी मैथिल ब्राह्मण ट्रस्टी थे । ये तीनो ट्रस्टी महाराजा से उम्र में बड़े थे।
दरभंगा राज के जनरल मेनेजर मि. डेनवी के समय रहे असिस्टेंट मेनेजर पं. दुर्गानन्द झा के जिम्मे दरभंगा राज का प्रबंध था । वे राजमाता साहेब के फूलतोड़ा के पुत्र थे और महाराज के बचपन के मित्र थे वे उस ज़माने के स्नातक थे और पंडित द्वारिका नाथ झा, महाराज के ममेरे भाई एक्सेक्यूटर के सचिव मनोनीत हो गये और कोलकाता से आकर गिरीन्द्र मोहन रोड के बंगला नंबर 5 में अपने मामा पं.यदु दत्त झा, जो दरभंगा राज के अनुभवी और दझ पदाधिकारी थे, जिन्हें मिस्टर देनबी ने अपने बाद जनरल मेनेजर के लिए अनुशंसा की थी जिनका उल्लेख 1934 के भूकंप में राहत कार्यक्रम में कुमार गंगानंद सिंह ने की है, के बगल के बंगला में रहने लगे ।
बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी ने सबसे छोटे राजकुमार शुभेश्वर सिंह को अपने रामबाग में रखा। वसियत के अनुसार बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी के मृत्यु के बाद उनके महल पर राजकुमार शुभेश्वर सिंह का स्वामित्व होगा। बड़े कुमार जीवेश्वर सिंह (अब दिवंगत) राजनगर रहने लगे और उनकी बड़ी पत्नी राजकिशोरी जी (अब दिवंगत) अपनी दोनों बेटियों के साथ और मझले राजकुमार यजनेश्वर सिंह अपने परिवार के साथ यूरोपियन गेस्ट हाउस ऊपरी मंजिल पर उत्तर और दझिण भाग में आ गए।
बड़ी महारानी के 1976 में देहांत होने और 1978 में पंडित लक्ष्मी कान्त झा के देहांत के बाद दरभंगा राज का कार्य ट्रस्ट के अधीन हो गया। श्री मदनमोहन मिश्र ( गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बड़े पुत्र), श्री द्वारिका नाथ झा और श्री दुर्गानंद झा तीनो ट्रस्टी के अधीन। फिर श्री दुर्गानंद झा के देहांत के बाद 1983 के आसपास श्री गोविन्द मोहन मिश्र ट्रस्टी बने और फिर उनके स्थान पर श्री कामनाथ झा ट्रस्टी बने । राजकुमार शुभेश्वर सिंह 1965 के आसपास दरभंगा राज के मामले में सक्रिय हो गये थे उन्हें रामेश्वर जूट मिल, फिर सुगर कंपनी और न्यूज़ पेपर & पब्लिकेशन लिमिटेड का जिम्मेवारी मिली। ( अब सभी दिवंगत)
कहते हैं, सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह राजनगर ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी रहे दरभंगा राज के मामले में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं था। राजनगर से वे गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बाद बंगला नंबर १, गिरीन्द्र मोहन रोड में अपने दूसरी पत्नी और 5 पुत्री के साथ रहने लगे। स्व. महाराज के तथाकथित परिवार के सदस्यों ने माननीय उच्चतम न्यायालय में एक फॅमिली सेटलमेंट नो . 17406 – 07 ऑफ़ 1987 में फॅमिली सेटलमेंट हुआ। जिसमे महाराजा के वसीयत के विपरीत छोटी महारानी के जिन्दा रहते कुल संपत्ति का एक चौथै हिस्सा पब्लिक चैरिटी को मिला और एक चौथाई छोटी महारानी, एक-चौथाई राजकुमार शुभेश्वर सिंह और उनके दोनों पुत्र को और एक-चौथाई में मंझले राजकुमार के पुत्रों और बड़े राजकुमार के सात पुत्रियों को मिला।
राजकुमार जीवेश्वर सिंह की प्रथम पत्नी लहेरियासराय में और दूसरी यानि छोटी पत्नी बंगला नंबर-1, गिरीन्द्र मोहन रोड में रहती है। जीवेश्वर सिंह स्वर्ग्वाशी हो चुके हैं मंझले राजकुमार (अब दिवंगत) अभी बंगला नंबर-9 गिरीन्द्र मोहन रोड में पत्नी के साथ रहते थे (अब दिवंगत)। राजकुमार शुभेश्वर सिंह को दो पुत्र हैं बड़ा अमेरिका में रहते है और छोटा दिल्ली में रहते हैं और दरभंगा प्रवास में रामबाग में । श्री शुभेश्वर सिंह और उनकी पत्नी भी अब जीवित नहीं हैं। महारजा कामेश्वर सिंह ने एक धार्मिक ट्रस्ट जिसके निमित दर्शाए गये सम्पति की आय से उसकी देखरेख का प्रावधान किया गया जिसे बेचने का अधिकार किसी को नहीं दी गयी।
छोटी महारानी महाराजा के निधन के बाद अधिकांश समय दरभंगा हाउस केंद्र सरकार द्वारा लेने के बाद उससे सटे आउट हाउस में दिल्ली में रहने लगी थी और दरभंगा आने पर नरगोना पैलेस में। आज वे भी दिवंगत हो गयीं। 1980 के आसपास से नरगोना कैंपस में बेला पैलेस के सामने नवनिर्मित कल्याणी हाउस में आने पर रहती हैं। 1990 से अधिक समय दरभंगा में रहने लगीं है और दरभंगा रिलीजियस ट्रस्ट जिसके अधीन १०८ मंदिर है और सीताराम ट्रस्ट जिसके अधीन बनारस के बांस फाटक, गोदोलिया चौक के नजदीक राममंदिर आता है के एकमात्र ट्रस्टी थीं। आज सभी ट्रस्ट शुभेसजवर सिंह के छोटे पुत्र के पास है।
इनसे पूर्व बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी इसके ट्रस्टी थीं। राजलक्ष्मी जी ने महाराज कामेश्वर सिंह के चिता पर माधवेश्वर में मंदिर का निर्माण करवायी थी। छोटी महारानी कामसुन्दरी जी महाराज कामेश्वर सिंह कल्याणी ट्रस्ट बनवायी जिसके तहत किताबों का प्रकाशन, महाराजा कामेश्वर सिंह जयंती आदि कराती थी। अभी महाराजा कामेश्वर सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट पर भी राजकुमार शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्र हैं।
ओझा मुकुंद झा के एकमात्र पुत्र कन्हया जी झा भी अब नहीं रहे। ओझा मुकुंद झा अपना दरभंगा स्थित सारामोहनपुर हाउस मिथिला विश्वविद्यालय के स्थापना के समय दिए थे वे खुद कन्हैया जी कोठी जो लक्ष्मीश्वर विलास के पीछे है में रहते थे। वे भी जनकल्याण ट्रस्ट बनाये और अपनी अधिकांश सम्पति दान कर दिए, बेच दिए। पंडित द्वारिका नाथ झा, गिरीन्द्र मोहन रोड के बंगला नंबर 5 में और पंडित दुर्गानंद झा बंगला नंबर 8 में, श्री मदनमोहन मिश्र बंगला नंबर 2 में – उक्त तीनो बंगला पब्लिक चैरिटी के हिस्से में था, बंगला नंबर 3 महारानी के और बंगला नंबर 4 राजकुमार शुभेश्वर सिंह के संतान के हिस्से में आया। जिसमे, कहा जाता है कि सभी बिक गये है मात्र बंगला नंबर 4 का मुख्य मकान बचा है।
दरभंगा राज का पतन महाराजा के देहांत के चार-पांच साल बाद शरू हुआ जो 75-76 तक अधोगति को प्राप्त हो गया। 1989-90 में इंडियन नेशन और आर्यावर्त समाचार के प्रकाशन बंद होना दरभंगा राज के ताबूत में अंतिम कील माना जायेगा। कलकत्ता का 42-चौरंगी भी बिक गया। सबसे पहले दिलखुश बाग का एरिया बिका फिर सिंह द्वार के समीप और सुनने में है कि मधुबनी स्थित भौरा गढ़ी का भी डील हो गया है और तालाब भरने का कार्य जारी है।
बहरहाल, कल अशोक सिंह झा से बात हुई। अशोक सिंह झा सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और शोधपरक अध्ययन से जुड़े रहे हैं। अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारंभिक दौर में वे पत्रकारिता और आकाशवाणी से भी जुड़े रहे तथा सामाजिक, सांस्कृतिक और विकास संबंधी विषयों पर लेखन एवं अनुसंधान करते रहे हैं। पिछले कई दशकों से वे बाल अधिकार, बाल श्रम उन्मूलन, बाल संरक्षण, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। बाल श्रम के विरुद्ध अभियान सहित विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ उन्होंने वंचित बच्चों, महिलाओं और युवाओं के लिए कार्य किया है। इतिहास, संस्कृति और विरासत के प्रति उनकी विशेष रुचि रही है।
दरभंगा राज के स्थापत्य धरोहर
अशोक सिंह झा कोई ढ़ाई दशक पहले महाराजा के सम्मानार्थ छोटी महारानी द्वारा स्थापित कामेश्वर सिंह कल्याणी फॉउंडेशन में शोधार्थी थे। शिक्षा और शोध से अटूट सम्बन्ध रखने के कारण उन्होंने “दरभंगा राज के स्थापत्य संदर्भित धरोहर” पर विशेष कार्य किया था। आर्यावर्तइंडियन नेशन(डॉट)कॉम से बात करते अशोक सिंह झा कहते हैं कि “स्थापत्य एक ऐसी विधा है जो हजारों वर्ष पुराने मानव-संस्कृति के विविध पहलुओं का परिलक्षण प्रस्तुत करती है। वस्तुतः वर्तमान में विस्मृत कई ऐतिहासिक सभ्यता, संस्कृति और राजवंश उस समय साकार हो जाते हैं जब उनके काल में सर्जित स्थापत्य सन्दर्भित सृजनों का अवलोकन और अन्वेषण हमारे द्वारा किया जाता है। इतिहास को अपने तथ्य की पुष्टि के लिए साक्ष्य चाहिए और साक्ष्य स्थापत्य सर्जनाओं से बढ़कर क्या हो सकता है ? इस विधा के आधार समयुगीन सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक आदि पहलूओं का अध्ययन सम्भव होता है । सिन्धु-सभ्यता का अध्ययन इसका ज्वलन्त उदाहरण है।
उनका कहना है कि 1558 ई० के आस-पास खंडवलाकुल के चन्द्र ठाकुर के पुत्र महामहोपाध्याय महेश ठाकुर ने मुगल बादशाह अकबर से पारितोषिक में प्राप्त सरकार-ए-तिरहुत की चैधराई और कानूगोई पद को सुशोभित किया । यहीं से इस राजवंश की स्थापना एवं उत्कर्ष की कथा प्रारम्भ हुई तथा जिसका चरमोत्कर्ष एवं लगभग अंत, अंतिम उत्तराधिकारी महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह (1907-1962) के समय में हुआ । लगभग चार सौ वर्षों के खण्डवलाकुल शासन के अन्तर्गत मिथिला एवं मिथिला के बाहर करीब एक सौ पचास मन्दिर, बीसेक महल, चार किले, कम-से-कम पाँच धर्मशाला, जीतमम पुस्तकालय, विविध प्रयोजनार्थ छोटे-बड़े सैकड़ों भवन, पोखर एवं कुआँ, तीन टाउनशिप आदि का निर्माण हुआ ।

दरभंगा राज के तत्त्वावधान में स्थापत्य सर्जनाओं का अधिकांश कार्य दरभंगा तथा इसके निकटवर्ती क्षेत्र में हुआ। वैसे बिहार में पटना, गया, राँची, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया आदि जिला में, पश्चिम बंगाल में, कलकत्ता, खड्गपुर और दार्जिलिंग में, उत्तरप्रदेश में वाराणसी, इलाहाबाद, कनरवल और ऋषिकेश, आसाम में कामाख्या, हिमाचल प्रदेश में शिमला, महाराष्ट्र में मुम्बई, मिस्त्र में काहिरा, ब्रिटेन में लन्दन, पाकिस्तान में लाहौर और फिर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में हुआ। यदि मिथिला क्षेत्र में इनके सृजन का अवलोकन करें तो दरभंगा स्थानीय के अतिरिक्त राजनगर, मधुबनी, झंझारपुर, भवानीपुर, लोहना, पैटघाट, राजग्राम, भौरागढ़ी, कन्दर्पीघाट, सिमरी, सौरीपट्टी, सौराठ, उच्चैठ, छछबुलिया, कल्याणपुर (नाहर), पण्डौल, महीसी, नवबस्ती, मंगरौनी, पिपरागाछी, अहिल्या स्थान आदि स्थान इनके स्थापत्य सृजन कार्य से सुशोभित हैं। महल, मन्दिर, भवन, सराय, पोखर, कुआँ, सड़क, पुल- स्थापत्य-कला के विविध विधा-उपविधा का विकास दरभंगा राज के तत्वावधान में हुआ।
अशोक सिंह जी आगे कहते हैं: किन्तु भारत का यह सुसांस्कृतिक क्षेत्र विनाशकारी भूकम्प और प्रलयंकारी बाढ़ से सदैव त्रस्त रहा है। निश्चित रूप से इन दोनों प्राकृतिक आपदाओं ने सर्वाधिक क्षति स्थापत्य सन्दर्भित उपलब्धियों को ही पहुँचाया है। इसका ही दुःखद परिणाम है कि दरभंगा स्थित आनन्दबाग पैलेस जैसे कुछ अपवाद को छोड़कर 1934 के पूर्व बने भवनों का ध्वसांवशेष ही मिलता है या फिर कहीं-कहीं तो वह भी दुर्लभ है। अतः 1934 ई० के पूर्व बने भवनों की संख्या आज की तारीख में अपेक्षाकृत काफी कम है। लेकिन दरभंगा, भौरागढ़ी, मधुबनी, राजग्राम, राजनगर आदि स्थानों पर बने भवन, मन्दिर आदि सौ-दो-सौ वर्ष पुराने होने के बावजूद अपनी ऐतिहासिकता और कलात्मकता से किसी भी कलाप्रेमी का ध्यान आकर्षित करते हैं। वैसे भी, खंडवलाकुल के अंतिम तीन शासक क्रमशः महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह (1860-1898), महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह (1929-1962), ने जो भव्य निर्माण कार्य करवाया वे ही इतने आकर्षक, कलात्मक और समन्वयात्मक शैली से समन्वित हैं कि आँखें मन्त्रमुग्ध हो जाती हैं ।
दरभंगा राज के तत्वावधान में स्थापत्य सन्दर्भित निर्माण के क्रम में सर्वप्रमुख स्थान मन्दिर-निर्माण को दिया गया। इन मन्दिरों के निर्माण के लिए जिस स्थापत्य शैली का अनुसरण किया गया वह था उत्तरी भारत में सर्वाधिक प्रचलित नागर शैली । नागर स्थापत्य में नीचे से ऊपर की स्तूपी तक का भाग आयताकार या फिर कहीं-कहीं वर्गाकार होता है। इसकी मूलभूत विशेषता अनुप्रस्थिका (मापचित्र) और उत्थापन (ऊपर की ओर उत्कर्ष) है। वस्तुतः इसके नियोजन में आयताकार मापचित्र के दोनों पाश्वों में क्रमिक रूप से निकला हुआ बाहरी भाग होता है और अपनी ऊँचाई के क्रम में शिखर पतला होता जाता है। अधिकांश मन्दिरों में पार्श्व भाग की ऊँचाई भी शिखर तक पहुँचती है। इस शैली के नियोजन में बाहरी रूप-रेखा, प्रभावशाली तथा बड़े तौर पर उभरती है, जिससे इसे रेखा-शिखर भी कहते हैं। आयताकार मन्दिर के हर तरफ रथिका तथा बाहर निकलते हुए कोणों का नियोजन होता है। शिखर पर आमलक या कलश की स्थापना इसे विशेष आकर्षण प्रदान करती है।
पुनः नागर शैली के अन्तर्गत स्थापत्य का आयोजन देखें। यदि आप मन्दिर के मुख्य द्वार की ओर मुँह किये हुए हैं तो पहले मंडप, फिर अंतराल और तब गर्भ गृह का नियोजन होता है। कहीं-कहीं मण्डप के ऊपर पिरामिडनुमा शीर्ष भाग होता है। इसके अतिरिक्त मुख्य शिखर पर अंग शिखर का प्रयोग तथा अन्तराल एवं मण्डप में स्तम्भों का नियोजन भी इसकी विशेषता रही है। प्रायः प्रत्येक मण्डप के अंग शिखरों से युक्त शिखर उत्तरोत्तर पतले होते हुए भव्य ऊँचाई तक पहुँचते हैं। कुछ मन्दिरों में अधिष्ठान के कोणो पर छोट-छोटे देवालय भी स्थापित हैं जो मन्दिरों को पंचायतन रूप प्रदान करते हैं। मन्दिर के अन्दर ही गर्भगृह के चारों ओर श्प्रदक्षिणा पथश् होने से इन्हें श्सान्धार प्रासादश् कहा जाता है ।
मन्दिर निर्माण के क्रम में राज दरभंगा ने एक अपवाद छोड़कर (राजनगर का शिव मन्दिर-महाराजाधिराज रमेश्वर सिंह नागर शैली को ही अपनाया न कि वेसर (मिश्रित) शैली या द्रविड़ (दक्षिण) शैली को। दरभंगा राज के संस्थापक महामहोपाध्याय महेश ठाकुर ने इस क्रम में सोलहवीं सदी के सातवें दशक में दरभंगा से 35 कि० मी० उत्तर पूर्व स्थित एक छोटे से गाँव राजग्राम (मूल नाम भौर- खंडवलाकूल की प्रथम राजधानी या मुख्यालय) में अपनी कुल देवी कंकाली निर्मित्त एक मन्दिर का निर्माण करवाया जो इस वंश के शासकों द्वारा निर्मित सर्वाधिक प्राचीन ज्ञात मन्दिर है। कालक्रम में इसके क्षतिग्रस्त होने पर पुनर्निमाण की प्रक्रिया जारी रही और यह अब तक अपने वजूद को बनाये रखने में सक्षम है। यह मन्दिर जमीन से लगभग अढ़ाई फीट ऊपर उठे एक आयताकार अधिष्ठान पर अवस्थित है। मध्य में गर्भ गृह, उत्तर में दक्षिणकाली तथा दक्षिण में गणेश के लिए एक-एक लघु देवालय का आयोजन है। गर्भ गृह आयताकार है तथा ऊपर की स्तूपी गुम्बदनुमा है जो गोलाई लिये हुए भी चार बराबर भागों में बाह्य रूप से विभाजित प्रतीत होता है । सम्भवतः इस काल में और भी स्थापत्य सन्दर्भित सृजन हुए होंगे किन्तु उनके ध्वंसावशेष भी अनुपलब्ध हैं और ऐतिहासिक ग्रन्थ भी मौन हैं ।
इसी वंश के, क्रम में चैथे शासक शुभंकर ठाकुर ने भौर से भौरा (गढ़ी) अपना निवास एवं मुख्यालय स्थानान्तरित किया तथा आवश्यकतानुसार कुछ वास्तुकला के कार्य करबाये जो अब भूमिसात हो चुके हैं। सत्रहवीं सदी के दूसरे दशक में शुभंकर ठाकुर ने शुभंकरपुर नामक टाउनशिप की स्थापना दरभंगा के निकट बागमती के दक्षिण में की जो आज भी शुभंकरपुर महल्ला के नाम से प्रसिद्ध है। इसी तरह पुरुषोत्तमपुर को बसाया और फिर उनके पुत्र सुन्दर ठाकुर ने सुन्दरपुर की स्थापना की । यद्यपि ये सभी टाउनशिप अलग-अलग महल्लों के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं किन्तु यहाँ प्राचीन स्थापत्य-सर्जनाओं के ध्वंसावशेष का भी अभाव है। कभी-कभार किसी कारणवश खुदाई करते समय इन क्षेत्रों में लखौरी ईंटों के टुकड़े या फिर ईंट ही देखने को मिल जाती हैं ।
खण्डवलाकुल के दसवें शासक राजा राघव सिंह ने दरभंगा राज की तत्कालीन राजधानी भौरा में एक किला का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त कई शिव मन्दिर भी बनवाये। जिनमें से दो भौर में तथा एक मधुबनी से आठ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम सौराठ में जीर्णावस्था में अवस्थित है। श्द एन्टीक्वेरियन रिमेन्स इन बिहारश् में डॉ० आर० डी० पाटिल ने भी इनका जिक्र किया है। किले के कुछ अवशेष अभी भी अतीत में अपने भव्य अस्तित्व की कहानी कहते प्रतीत होते हैं ।
खण्डवलाकुल वंश क्रम में तेरहवें शासक राजा प्रताप सिंह ने भौरा से राजधानी परिवर्तन दरभंगा किया। यह अंशतः ही हो सका क्योंकि एक तो अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में राजा ने यह कदम उठाया था, -दूसरे वे स्वयं विविध व्याधियों से ग्रसित थे। फिर भी रामबाग पैलेस एवं किले की नींव पड़ी। बाद में इनके उत्तराधिकारी माधव सिंह तथा उनके बाद के शासकों ने इसमें यथोचित परिवर्तन एवं विकास भी किया। यह एक अति उच्च अधिष्ठान पर अवस्थित था, क्योंकि राजागण पैलेस के बाहरी बराम्दे पर से ही हाथी की पीठ पर आसानी से बैठते थे । वैसे अभी इस अधिष्ठान की ऊँचाई बाहर की ओर से सात फीट तक है। कालक्रम में यह भीतर की ओर धँसता गया, लेकिन इसकी भव्यता अभी भी बरकरार है। इसके विशाल कक्ष और इसका चतुःसाल रूप देखते ही बनता है। भवन निर्माण की यह प्रचलित शैली मिथिला भवन-निर्माण कला की विशेषता है और आप इसकी बानगी मिथिला क्षेत्र के अधिकांश आम घरों में भी देख सकते हैं। फर्श से छत की ऊँचाई लगभग बीस फीट तक है ।
राजा प्रताप सिंह के उत्तराधिकारी राजा माधव सिंह ने दरभंगा को अपनी स्थायी राजधानी बनाया। रामबाग महल को उन्होंने पूर्ण किया । इसके चारों ओर लगभग नौ फीट ऊँची दीवार खड़ी की। तीन फुट की दूरी पर एक अर्द्धचन्द्राकार घुमाव तथा हर जोड़-बिन्दु पर एक आमलक की रचना इसकी सुन्दरता को बढ़ाती है। इसके अवशेष कुछ हद तक अभी भी सुरक्षित हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने माधवेश्वर प्रांगण में माधवेश्वर शिव मन्दिर का निर्माण करवाया तथा इस प्राँगण की नींव डाली जो इस वंश के राजाओं के अंतिम संस्कार का स्थल बना । इस शिवालय के गर्भगृह की फर्श सतह से लगभग एक फीट नीचे है।
इसकी अनुप्रस्थिका बारह फीट ऊँची है तथा इसका उत्थापन स्तूपी की तरह है। शिखर पर नागर शैली का अनुसरण करते हुए कलश की स्थापना है। यह मन्दिर अपने निर्माण के दो सौ वर्ष बाद भी अपना अस्तित्व बचाये हुए है तथा इसका मौलिक स्वरूप कई पुनर्निमाण के बावजूद सुरक्षित है। इसमें नागर शैली के अनुरूप मंडप का अभाव है। मुख्य द्वार सामान्य है और प्रदक्षिणा पथ छतोच्छादित है । सौराठ में भी इसी तरह के शिवालय का निर्माण कार्य इन्होंने प्रारम्भ करवाया था किन्तु 1807 ई० में इनकी मृत्यु के साथ यह अपूर्ण रह गया ।
1807 ई० से 1839 ई० तक इनके उत्तराधिकारी पुत्र छत्र सिंह ने शासन किया । इन्होंने यहाँ धर्मशाला भी बनवायी । अहिल्या स्थान में भी एक मन्दिर बनवाया। दरभंगा में अपने रहने के लिए छत्र विलास भवन बनवाया जो इस वंश का पहला दोमहला महल था । किन्तु ये सभी 1934 के भूकम्प में पूर्णतः भूमिसात हो गये । फिर भी इनके बनवाये तीन मन्दिर अभी भी अवस्थित हैं। सदर हरि मन्दिर और देवी मन्दिर रामबाग प्राँगण के भीतर तथा राम मन्दिर नरगौना प्राँगण के भीतर। सदर हरि मन्दिर एक उच्च आयताकार अधिष्ठान पर अवस्थित है। गर्भगृह वर्गाकार है तथा इसकी छत सपाट है और स्तम्भों पर टिकी है। गर्भ गृह के दोनों पार्श्व में सटे हुए दो देवालय हैं। गर्भ-गृह, प्रदक्षिणा-पथ तथा अन्तराल एकाकार हैं एवं एक सामान्य छत से आच्छादित हैं। मण्डप खुला है। छत पर परकोटे की रचना है। यह मन्दिर प्राचीन हिन्दू स्थापत्य शैली का एक उदाहरण है। साँची प्रभृति स्थानों में गुप्त काल के कुछ प्राचीन मन्दिर भी इसी तरह के हैं। इनका बनवाया देवी मन्दिर सतह से पाँच फीट ऊपर अधिष्ठान पर अवस्थित है। गर्भ-गृह वर्गाकार है तथा इसके ऊपर की स्तूपी बहुत ही कलात्मक है।
स्तूपी का बाह्यान्तर से पाँच मोटी पट्टियों से कलात्मकतापूर्ण विभाजन किया गया है। शिखर सुरुचिपूर्ण आमलक एवं कलश से सुसज्जित है । इनके उत्तराधिकारी महाराज रुद्र सिंह (1839-1850) तथा महाराज महेश्वर सिंह (1850-1860) के समय में स्थापत्य सन्दर्भित कुछ विशेष निर्माण का न उल्लेख मिलता है और न अवशेष ही। कुछ सरकारी दस्तावेजों के अनुसार महाराज महेश्वर सिंह ने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय अँग्रेजी सत्ता के विरुद्ध एक लघु किला तथा सुरक्षा-खाई का निर्माण करवाया था।
1860 से सितम्बर, 1879 तक राज दरभंगा कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अन्तर्गत संचालित होता रहा। यह प्रशासनिक सुसंगठन एवं सुव्यवस्था का काल था। इस काल में कई सड़कें, पुल, कार्यालयीन भवन एवं लक्ष्मीश्वर विलास महल का निर्माण शुरु हुआ जिसका मुख्य श्रेय महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह को जाता है ।
महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह का शासन काल मिथिला में सृजनकारी युग की शुरुआत मानी जाती है। शास्त्रीय और आधुनिक शिक्षा से परिपूर्ण महाराजा साहब ने अपने निर्देशन में निर्मित स्थापत्यकृतियों में इस सामंजस्य का समावेश किया । सर्वप्रथम इन्होंने एक दो महला चतुः साल महल बनवाया जिसे आनन्दबाग पैलेस या लक्ष्मेश्वर विलास पैलेस भी कहते हैं। सम्प्रति इसमें कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय कार्यरत है। इसकी फर्श एवं सीढ़ियों के निर्माण में इटालियन तथा मकराना के संगमरमर का प्रयोग है। यहाँ तक कि इसके रेलिंग भी इंगलैण्ड से मँगवाये गये थे। यह महल कला की दृष्टि से समन्वयात्मक शैली का है। क्योंकि मध्यकालीन एवं आधुनिक स्थापत्य शैली के साथ-साथ पाश्चात्य शैली का समन्वय भी इसमें है।
इसकी मीनार घड़ी, यूरोपियन बुर्ज, खुला-खुला सा माहौल, पोर्टिको, बाल्कनी, साज-सज्जा आदि यूरोपियन स्थापत्य से प्रभावित हैं। जबकि इसकी छत सपाट है। इसका पूर्ण स्वरूप चतुःसाल है- जो हिन्दू स्थापत्य शैली से मिलता है। इसका प्रमुख आकर्षण केन्द्र इसका दरबार हाल है। इसकी छत के भीतरी हिस्से ज्यामितीय चित्रण से सुसज्जित हैं। प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी सफेद परियाँ इस तरह से व्यवस्थित की गई हैं जैसे उन्होंने ही छत को अपने हाथों में उठा रखा हो । महल के चारों ओर पचास एकड़ क्षेत्र में वानस्पतिक तथा जैविक उद्यान लगाए गये। पुनः दरभंगा स्थित रामबाग प्रांगण के भीतर दिलखुश बाग के पूर्वी कोने पर इन्होंने एक सुन्दर दुर्गा मन्दिर बनवाया। यह एक छोटा किन्तु नागर शैली के आधार पर बना आकर्षक मन्दिर है। सीढ़ी से ऊपर चढ़ने पर खुला आयताकार बराम्दा है।
पुनः छतोच्छादित अन्तराल और फिर प्रदक्षिणा-पथ के लिए काफी जगह छोड़ी गयी है। शिखर पर आमलक एवं क्रमशः छोटे होते गये कलशों की सजावट है। आयताकार अधिष्ठान पर स्थापित इस दुर्गा मन्दिर के चारों कोनों पर चार लघु देवालय भी स्थापित हैं। इन देवालयों की स्तूपी भी मुख्य देवालय की स्तूपी के समान ही कलात्मक है। इस मन्दिर की दीवारों पर वानस्पतिक नक्काशी उकेरी गयी है। तथा कहीं-कहीं मछली के जोड़े भी दर्शाये गये हैं। इसकी फर्श काले तथा सफेद पत्थर की बनी है जो भ्रम उत्पन्न करती है शतरंज की खुली बिसात का। इस मन्दिर में अन्तराल के ऊपर की झीरियों पर कुल तीन जगहों पर एम०एल० और एस० एक दूसरे पर प्रत्यारोपित कर व्यवस्थित हैं। यह महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के पूर्ण नाम का लघु रूप है। इसके ठीक सामने एक तलैया है जो इसकी रमणीयता को बढ़ाती है। सुर्खी, चूने और ईंट से बने इस मन्दिर को पूर्णतः भारतीय कारीगरों ने नागर शैली में बनाया है।
महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के उत्तराधिकारी इनके छोटे भाई महाराजा रमेश्वर सिंह थे। इनका शासन काल स्थापत्य कला के विकास के दृष्टिकोण से राज दरभंगा का स्वर्णयुग था। यूँ तो उन्होंने मिथिला एवं सम्पूर्ण राष्ट्र के स्तर पर विविध नगर एवं धार्मिक स्थलों पर देवालय, भवन आदि के निर्माण कार्य को अन्जाम दिया, किन्तु विशेष रूप से राजनगर उनका सर्वाधिक प्रिय स्थल था। एक तो यह उन्होंने अपने भाई के शासन काल में बाबुआना के रूप में प्राप्त किया था, दूसरे वे इसे अपनी राजधानी बनाना चाहते थे । राजनगर को वे एक श्स्वप्निल नगरश् बनाना चाहते थे । सच पूछा जाय तो वृहत् स्तर पर मुगल सम्राट अकबर के लिए जो महत्व फतेहपुर सिकरी का था- लघु स्तर पर महाराजा रमेश्वर सिंह के लिए बहुत हद तक राजनगर का भी वही स्थान था । वस्तुतः इनके समय में यह नगर मिथिलांचल का फतेहपुर सिकरी ही था । कमला नदी के तट पर बसे इस नगर का प्रायः कोई विशेष तांत्रिक महत्व रहा होगा कि महाराजाधिराज ने इसे अपनी राजधानी बनाना चाहा। राजनगर का किला, राजमहल, सचिवालय एवं पुस्तकालय भवन, विविध मन्दिर आदि कला के सुन्दर नमूने थे। राजनगर का मुख्य महल म०म० मुकुन्द झा के अनुसार आज से लगभग सौ वर्ष पहले अठारह लाख रुपये से अधिक लागत में बना था। इस महल की दीवारों पर भी अधिकांश स्थल पर बेलबूटे के उकेरण हैं। इसकी मुख्य मीनार पाँच तल्ले की थी। किन्तु यह 1934 के विनाशकारी भूकम्प में ध्वस्त हो गयी।
मीनार के ऊपरी भाग में स्तूपी तथा स्तूपी के ऊपर छतरी का नियोजन था । मुख्य महल मूलतः तीन तल्ला था। मध्य एवं मुख्य शीर्ष भाग था। ऊपर के स्तूपी पर दो कलशों का नियोजन था। इस महल में हिन्दू, इस्लामिक और पाश्चात्य स्थापत्य शैली का स्पष्ट समन्वय परिलक्षित होता है । सुर्खी-चूने की जोड़ाई, ईट, संगमरमर तथा अन्य पत्थरों का प्रयोग, देशी-विदेशी अभियन्ताओं का निर्देशन, स्थानीय एवं बाहरी कारीगरों की कुशलता और सबसे बढ़कर इसके निर्माता महाराजाधिराज रमेश्वर सिंह की कल्पना- इन सबों ने मिलकर इस महल को वह रूप दिया कि आज इसका खंडहर भी पर्यटकों और स्थापत्य कला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए काफी है। यूँ तो इस महल के एक-एक कक्ष की अपनी विशेषता और सुन्दरता थी किन्तु इसका दुर्गा हॉल और दरबार कक्ष अपने सजावटी अलंकरण के कारण सुन्दरतम भाग माना जा सकता है । दुर्गाकक्ष की विशेषता है कि आप ऊपर की छत पर चित्रित देवी दुर्गा की ओर कक्ष के भीतर किसी भी भाग से देखेंगे तो वह आपको ही देखती प्रतीत होंगी । इस महल का मुख्य दरवाजा चार विशालकाय हाथी पर टिका है जो इसकी भव्यता को बढ़ाता है।
रमेश्वर सिंह को ही इस बात का श्रेय है कि उन्होंने मिथिला क्षेत्र में पहला दक्षिण भारतीय शैली का मन्दिर शिव-मन्दिर के रूप में बनवाया। यह मन्दिर विविध सजावटी डिजाइनों से युक्त मेहराबदार स्तम्भों पर आधारित था। इसके नियोजन में बाहरी रूप-रेखा बड़े स्पष्ट तथा प्रभावशाली ढंग से उभरी थी। इस आयताकार मन्दिर के हर तरफ रथिका तथा अनेक अस्त्रों (बाहर निकलते हुए कोणों) का नियोजन था। इस मन्दिर की बनावट यहाँ बने मन्दिरों की बनावट से बिल्कुल अलग थी।
बिहार अर्थक्वेक एण्ड द दरभंगा राजश् (कुमार गंगानन्द सिंह, दरभंगा राज, 1936) तथा कैमरा चित्र एवं चलचित्र- राजनगर की जो तस्वीर पेश करते हैं- वह वर्णनातीत हैं। महाराज साहब ने यहाँ गणेश, दुर्गा, सूर्य, राजराजेश्वरी, अर्द्धनारीश्वर, त्रिपुरसुन्दरी, काली आदि मन्दिर भी बनवाये जो नागर शैली के अनुरूप हैं । किन्तु श्वेत संगमरमर से निर्मित काली मन्दिर अद्भुत है। एक छह फूट ऊँचे अधिष्ठान पर अवस्थित इस मन्दिर का प्रवेश द्वार चार स्तम्भों को छतोच्छादित कर बनाया गया है। इस काल में मिथिलांचल में बनने वाले मन्दिर, भवन आदि के दरवाजे, खिड़की आदि नीचे से ऊपर खड़ी रेखा की तरह बढ़ते थे और पुनः एक निश्चित ऊँचाई के बाद उलटे अर्द्धचन्द्र का आकार ले लेते थे । भारत में इसका प्रचलन ईस्वी सन् के पहले से था। इस मन्दिर में प्रवेश द्वार से ऊपर चढ़ने पर खुला स्थान तथा फिर वर्गाकार मण्डप का आयोजन है।
इसका उत्थापन एक विशाल शिवलिंग की तरह हुआ है जो शिखर पर आमलक से सुसज्जित है । छतोच्छादित प्रदक्षिणा पथ के मध्य आयताकार गर्भ-गृह है जिसका स्थापन एक खड़ी स्तूपी की तरह है जो शिखर पर आमलक से सजायी हुई है। इस मन्दिर के चारों कोने पर अपेक्षाकृत पतली एवं खड़ी स्तूपी का नियोजन है। 1934 के भूकम्प में यह ध्वस्त हो गया था किन्तु महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने 1935-36 में ही इसका पुनर्निमाण करवाया ।
राजनगर में रमेश्वर सिंह ने एक विशाल पुस्तकालय, कार्यालय-भवन एवं अनेक भवन विविध प्रयोजनार्थ बनवाये। इसके अतिरिक्त इन्होंने दरभंगा में रामबाग परिसर के भीतर कंकाली मन्दिर, इन्द्र भवन आदि का निर्माण करवाया । दरभंगा में ही माधवेश्वर प्रांगण के भीतर रुद्रेश्वरी काली, लक्ष्मीश्वरी तारा एवं दुर्गा पंचायतन मन्दिर बनवाया । मधुबनी में प्रसिद्ध श्यामा मन्दिर एवं इसके निकट भौरागढ़ी में गुह्यकाली मन्दिर बनवाया । पटना में काली मन्दिर एवं दो भव्य भवनों का भी निर्माण करवाया। कलकत्ता, इलाहाबाद, लाहौर, कनरवल, मुजफ्फरपुर, शिमला, बनारस, खड़गपुर आदि प्रसिद्ध शहरों में भी मन्दिर बनवाए जो नागर शैली पर आधारित हैं ।
इनके उत्तराधिकारी तथा दरभंगा राज के अंतिम शासक महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह का शासन काल आधुनिक तथा परम्परागत शैली के समन्वय का काल था। चूँकि आधुनिक तकनीक एवं साधन अपेक्षाकृत आसानी से अब उपलब्ध थे- अतः सुदृढ़, सुन्दर, सुव्यवस्थित एवं सुविधाजनक भवनों का निर्माण इस काल में हुआ। महाराजाधिराज ने इस काल में स्थापत्य सन्दर्भित दो तरह के कार्यों को अंजाम दिया- नव निर्माण तथा पुनर्निर्माण । पुनर्निर्माण इसलिए भी महत्वपूर्ण कदम था कि 1934 के विध्वंसकारी भूकम्प ने दरभंगा तथा उसके निकटवर्ती विविध भवनों को इस तरह क्षति पहुँचायी कि उनका अस्तित्व ही पुनर्निर्माण के अभाव में लोप हो जाता । दरभंगा का लक्ष्मीश्वर विलास भवन हो या कंकाली मन्दिर, राजनगर का रमेश्वर विलास महल हो या फिर संगमरमर का काली-मन्दिर- छोटे-बड़े अधिकांश भवन एवं मन्दिर भूमिसात हो गये थे । नवनिर्माण इसलिए आवश्यक हो गया था कि आने वाले दिनों में फिर कोई प्राकृतिक आपदा राज निर्मित भवनों को क्षति न पहुँचा सके । प्रशासनिक विस्तार एवं विकास के कारण भी यह जरूरी हो गया था। इसके अन्तर्गत नरगौना महल, विशेश्वर विलास महल (बेला पैलेस), सचिवालय भवन, माधवेश्वर प्रांगण स्थित सुविख्यात श्यामा मन्दिर, पटना, दिल्ली, शिमला कलकत्ता आदि स्थानों पर श्दरभंगा हाउसश्, प्रशासनिक प्रयोजनार्थ राजदरभंगा क्षेत्र एवं इसके बाहर भी अनेक भवनों का निर्माण हुआ। राम बाग के विशाल किले का निर्माण भी पुनर्निर्माण की ही एक कड़ी थी। दरभंगा को एक आधुनिक आदर्श नगर बनाने की योजना भी बनायी गयी ।
भवन-निर्माण के क्षेत्र में राज दरभंगा के लिए यह एक सर्वथा नया युग था- तकनीक, साधन और शैली- तीनों ही दृष्टिकोण से । अब स्टील फ्रेम, सिमेन्ट मोर्टार, बालू आदि ने सुर्खी-चूने आदि का स्थान ले लिया । नरगौना और बेला पैलेस तथा सचिवालय एवं यूरोपियन अतिथि-गृह जैसे भवनों को छोड़कर एकतल्ला भवन निर्माण पर बल दिया गया ताकि भूकम्प का प्रभाव कम हो। मेहराब, परकोटा, और पारम्परिक अलंकरण के स्थान पर सादगीपूर्ण सवं सुविधानुकूल सुदृढ़ भवन बनने लगे । प्रत्येक भवन की मुख्य संरचना की नींव एक ही इकाई के रूप में होने लगी। भवन भी यथा-सम्भव एक ही इकाई के रूप में संरचित होने लगे। 1934 के भूकम्प से भयभीत अभियन्ताओं ने भूकम्प सिद्ध भवन संरचना हेतु दो तरह के तकनीक अपनाये- प्रथम, रीइन्फोर्स्ड कन्करीट फेम तकनीक तथा द्वितीय, स्टील फ्रेम तकनीक । पुनः इनकी छत भी रीइन्फोर्स्ड कन्करीट से ढाली जाती थी ।
पुराने नरगौना पैलेस (छत्र-विलास पैलेस) के स्थान पर नया महल बनवाया गया। स्वयं महाराज साहब ने अपने निर्देशन में मैकिन्टोशबर्न कम्पनी की अभियांत्रिकी सेवा से इसका निर्माण करवाया। इसका रंग-रोगन राजदरभंगा के मुख्य प्रबन्धक जी०पी० डेनबी के निर्देशन में हुआ। इसकी फर्निशिंग कलिम्पोंग आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स कम्पनी के माध्यम से हुआ । इस दो महले महल के मुख्य ड्राईंगरूम की छत मध्य स्थल में स्तूपीनुमा हो गयी है जिसमें कई जगह मोटे शीशे जड़े हैं जिनसे छनकर सूर्य की रोशनी और चाँद की चाँदनी भीतर कक्ष को आलोकित करती है । विशाल बाग, टेनिस कोर्ट, स्वीमिंग पुल, रेलवे सैलून पड़ाव आदि सुविधा से युक्त यह महल तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में अपने जरें-जरें से आधुनिकता की झलक प्रस्तुत करता है । सुरुचिपूर्ण कलाकारिता के बावजूद, इस महल की विशेषता इसकी सादगी है । सम्प्रति इसमें ल०ना० मिथिला विश्वविद्यालय के विविध विभाग अवस्थित हैं ।
1936 में ही विशेश्वर-विलास महल की नींव पड़ी जो 1940 में बनकर तैयार हुआ । यह महल अपने छोटे भाई राजाबहादुर विशेश्वर सिंह के निवासार्थ नरगौना के निकट ही महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने बनवाया था । स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से यह यूरोपियन भवन शैली से प्रभावित है। इस दो महले महल का मूल ढाँचा स्टील फ्रेम पर आधारित है । इसके ऊपरी तल्ले की छत कोणीय है तथा सीमेन्ट के टाइल्स खपड़े की डिजाइन से सुशोभित है। इसकी सीढ़ी और फर्श पर संगमरमर का प्रयोग है। इससे सटे एक जनाना तरणताल का आयोजन है जो छतोच्छादित है और मुख्य महल से इस तक पहुँचने के लिए भूमिगत पथ की व्यवस्था थी। इस महल के चारों ओर विस्तृत जैविक उद्यान लगा हुआ था, जो अब लगभग विलुप्त हो चुका है, किन्तु महल पूर्णतः सुरक्षित है। सम्प्रति इसमें डाक प्रशिक्षण केन्द्र है। मेसर्स मैकिन्टोश बर्न एण्ड कम्पनी ने अपनी अभियांत्रिकी सेवा इसके निर्माण में प्रदान की थी ।
इसी कम्पनी ने योजनाबद्ध तरीके से दरभंगा राज का मुख्य कार्यालय भवन, तोषखाना (ट्रेजरी) तथा महाफीसखाना (रेकॉर्डरूम) आदि महाराज साहब के अनुसार बनाया था । सर आशुतोष मुखर्जी के पुत्र बामा प्रसाद मुखर्जी के निर्देशन में मेसर्स ब्रिटेनिया बिल्डिंग्स ने राज पुस्तकालय के भवन-निर्माण में अपनी अभियांत्रिकी सेवा प्रदान की थी। कोलेनल टेम्पल ने रमेश्वर प्लेस (चैरंगी) का डिजाइन तैयार किया था जिसे मैकिन्टोश बर्न ने आकार प्रदान किया था । मेसर्स मार्टिन एण्ड कम्पनी महाराजा साहब के निर्देशानुसार लेडी विलिंगडन अस्पताल भवन बनाया था जो अभी कामेश्वर सिंह चेरिटेबिल अस्पताल के रूप में है।
छोटे-बड़े सभी राजे-रजवाड़ों में किला निर्माण की एक परम्परा सी रही है और इसी कड़ी में महाराजा कामेश्वर सिंह ने 1945-46 में एक भव्य और विशाल किला-निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया । इसकी तकनीक और निर्माण-कार्य का प्रभार भी मैकिन्टोश बर्न को सौंपा गया। जहाँ इसकी ऊँचाई चालीस फीट तक है, वहीं इसकी मोटाई आधार स्थल में चालीस ईंच तक है। पहरेदारों के निरीक्षणार्थ जगह-जगह पर सुअलंकृत छतरीनुमा चैकी का आयोजन है। इसका कलात्मक एवं भव्य मुख्यद्वार मुगल-स्थापत्य शैली से प्रभावित है। द्वार-निर्माण में लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है । नागरिक असुविधा कानून के अन्तर्गत इसका निर्माण पृष्ठभाग से अपूर्ण रहा किन्तु इसकी भव्यता दर्शनीय है ।
खण्डवला कुल के इस अंतिम महाराजाधिराज ने अपने पिता की स्मृति में 1932 ई० में रमेश्वरी श्यामा मन्दिर का निर्माण करवाया जो नागर-शैली पर आधारित है। चार फीट ऊँचे आयताकार अधिष्ठान पर अवस्थित इस मन्दिर के गर्भ-गृह की अनुप्रस्थिका वर्गाकार है। उत्थापन उत्तरोत्तर क्षीण होता गया है तथा शिखर के शीर्ष पर कलश का आयोजन है। मुख्य शिखर पर अंग-शिखरों का सुन्दर नियोजन है । माधवेश्वर प्रांगण में स्थित इस मन्दिर का प्रदक्षिणा-पथ एवं अन्तराल भी नागर-शैली के अनुरूप छतोच्छादित है। इसके नियोजन में बाह्य रूप-रेखा अपेक्षाकृत स्पष्ट और प्रभावशाली रूप से उभरी है। विशेषकर बाहर निकले हुए कोणों का नियोजन महत्त्वपूर्ण है। यह मन्दिर दरभंगा और उसके निकटवर्ती नगरवासियों के आकर्षण का केन्द्र है।
इन भवनों और मन्दिरों के अतिरिक्त सैकड़ों छोटे-बड़े भवनों का निर्माण दरभंगा तथा इसके आस-पास, महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने करवाया। वर्तमान में इनका उपयोग विभिन्न सार्वजनिक कार्यालयों, शिक्षण-संस्थानों, शिक्षालय तथा चिकित्सालय के रूप में किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि सड़क, जल-निकासी माध्यम और भवन-निर्माण का नियोजन- इन तीनों का समायोजन कुछ इस तरह हुआ कि दरभंगा अपने जमाने का एक आदर्श बन गया । किन्तु त्रासदी इस बात की है कि हम कुछ नया और बेहतर तो कर नहीं पा रहे हैं- नागरिक और सरकारी स्तर पर – जो धरोहर दरभंगा राज ने हमें दी, उसकी भी रक्षा नहीं हो पा रही है। इतिहास, पर्यटन जनित उद्योग और इस महान राजवंश से मिली विरासत का सम्मान- प्रत्येक दृष्टिकोण से इनकी रक्षा करना अनिवार्य है । अस्तु, राज दरभंगा के सौजन्य से बने भवन, मन्दिर आदि की स्थापत्य कला का निचोड़ यही है कि ये, प्रभावशाली अलंकरण, आनुपातिक, सौम्यता, नियोजन में वास्तुकला की अन्तर्भूत शक्ति, संतुलन के रूप एवं समन्वयात्मक शैली के आदर्श उदाहरण हैं।
क्रमशः …..





























