
दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : साल 1912 में अविभाजित भारत में बहुत सारी ऐतिहासिक घटनाएं घटी थी। एक तरफ जहाँ देश में मातृभूमि की आज़ादी के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक क्रांतिकारी एकजुट हो रहे थे, वहीं देश की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। नए सिरे से दिल्ली का निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया था जब जॉर्ज पंचम ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेशों की अपनी यात्रा के दौरान भारत आए थे। ब्रिटिश वायसराय ने सर एडविन लुटियंस को दिल्ली की समग्र योजना का दायित्व सौंपा गया था।
मार्च के महीने में बिहार को बंगाल से अलग कर उड़ीसा के साथ एक अलग प्रांत बना दिया गया था। एक तरफ़ जहाँ अंग्रेज़ देश में पैर जमाने की अनवरत कोशिश कर रहे थे, सर एडविन लुटियंस नई दिल्ली का नए सिरे से निर्माण कार्य शुरू किए थे; वहीँ एकजुट हो रहे क्रांतिकारी उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे।
उसी दरम्यान दिल्ली के चांदनी चौक में भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर उनके राजकीय प्रवेश के समय रास बिहारी बोस और उनके क्रांतिकारी समूह द्वारा उन्हें जान से मारने की कोशिश किया गया था, उनपर बंब फेंका गया था। 1912 की वह ऐतिहासिक घटना आज भी चांदनी चौक में दर्ज है। वैसे उस हमले में लार्ड हार्डिंग बाल-बाल बच गए थे, लेकिन आज भी वह घटना दिल्ली-लाहौर षडयंत्र के रूप में बल्ली मारन की गली के नुक्कड़ पर टाउन हॉल के सामने अंकित है।
उसी वर्ष बिहार के लोगों की आवाज मजबूत करने के लिए दरभंगा के तत्कालीन महाराजा रामेश्वर सिंह प्रदेश से हिंदी और अंग्रेजी भाषाओँ में दो अख़बारों के प्रकाशन पर जोर दिया। महाराजा रामेश्वर सिंह दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ कामेश्वर सिंह के पिता थे।

महाराजा रामेश्वर सिंह तत्कालीन स्थिति के मद्दे नजर लिखते हैं: “बिहार में ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत के अतिरिक्त अन्य जाति-समुदाय के लोगों कल्याणार्थ, उनके लाभार्थ, ऐसे समुदाय की बातों को उठाने के लिए, आवाज देने के लिए दैनिक अखबार का प्रकाशन अति आवश्यक है। इस अखबार का संचालन एक ऐसे दक्ष व्यक्ति द्वारा हो जो वास्तविक रूप से इस समुदाय के कल्याण और विकास में अभिरुचि रखते हैं । इस अखबार को वित्तीय रूप से पूरा संरक्षण हो, साथ ही, अखबार की कीमत बहुत सस्ती हो ताकि इसका प्रसार अधिक से अधिक हो।”
उन्होंने यह भी लिखा था कि “बिहार में ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत के अलावे अन्य जातियों के लोग भी हैं, जो विकसित नहीं हैं। वे चाहते थे कि उनके नेतृत्व में सभी एक साथ आएं ताकि सबों के हितों की रक्षा हो सके।” उनका कहना था कि “समाज में जो अविकसित लोग हैं, उनका सम्पूर्णता के साथ विकास हो सके। इस उद्देश्य से एक बैठक बुलाई जाए जिसमें बिहार के सभी जमींदारों के अलावे सभी लोग उपस्थित हों। एक पार्टी की स्थापना हो। बिहार को अलग प्रांत बनाने के लिए वायसराय को धन्यवाद भी दिया जाय।”
उन्होंने यह भी लिखा था कि “उनके नजर में, यानी वायसराय की नजर में इस बात को भी लाया जाए कि समाज के इन अविकसित लोगों की सुरक्षा किस प्रकार होगी। यदि ऐसा नहीं किया गया तो वे आने वाले समय में भुक्तभोगी होंगे। इतना ही नहीं, ”वायसराय को उन वर्गों की महत्ता को भी बताया जाए ताकि उनका समुचित विकास भी हो सके। वायसराय को यह बताया जाए की समाज में इस वर्ग का क्या महत्व है क्योंकि यह समुदाय बिहार की 90 फीसदी भूमि के स्वामी हैं।”
उन्होंने लिखा कि “आने वाले समय में जब नए एल.जी. अपना पदभार ग्रहण करेंगे तो इस विषय से संबंधित एक प्रतिवेदन भी दिया जाय। समय समय पर इस दिशा में पहल भी की जाए ताकि समाज के इस वर्ग के लोगों को काउन्सिल (लेजिस्लेटिव) में उचित स्थान भी मिले। एक मतदाता सूची का भी निर्माण हो। जो सक्षम हों वे आवेदन भी करें ताकि उनका नाम दर्ज हो। साथ ही, इस समुदाय की सम्पूर्ण भलाई के लिए वे सभी कार्य किये जाये जिससे वे एक्जीक्यूटिव काउंसिल में अपना स्थान भी प्राप्त कर सकें
महाराजा रामेश्वर सिंह का कालखंड 1898 से 1929 का था। साल 1929 में जब वे अंतिम सांस लिए, उनके तीन संतानों – बेटी लक्ष्मी दाई, बड़े पुत्र कामेश्वर सिंह और छोटे पुत्र विश्वेश्वर सिंह – में बड़े पुत्र कामेश्वर सिंह दरभंगा के महाराजा बने। दो पन्नों में स्व-हस्तलिखित पत्र की चर्चा मैं नहीं, बल्कि महाराजा रामेश्वर सिंह की सबसे बड़ी संतान, उनकी पुत्री की आज की चौथी पीढ़ी के वंशज, वह भी एक महिला, सुश्री वसुधा झा कर रही थी।
अपनी आँखों को बारम्बार अपनी साड़ी की पल्लू से पोछती सुश्री झा कहती हैं कि “महाराजा रामेश्वर सिंह को अनंत यात्रा पर निकले आज 96-वर्ष हो गए, उनके पुत्र महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की मृत्यु को 63-वर्ष हो गए, लेकिन आज दरभंगा राज के कोई भी व्यक्ति इस बात पर शोध नहीं कर सके कि उन शब्दों के माध्यम से रामेश्वर सिंह अपने मन में अपने प्रान्त के विकास के लिए क्या सोचे होंगे, जब उन शब्दों को कागज के टुकड़ों पर लिखे होंगे?
अपने पिता की इस सोच को जमीन पर उतारने के लिए, रामेश्वर सिंह की मृत्यु के अगले वर्ष, यानी 1930 में, उनके पुत्र महाराजा कामेश्वर सिंह पटना में ‘दी इण्डियन नेशन” और फिर “आर्यावर्त” अखबार का प्रकाशन प्रारम्भ किये। साथ ही, मैथिली भाषा के विकास के लिए ‘मिथिला मिहिर’ पत्रिका का भी प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। उन दोनों अख़बारों को अपने जीवन पर्यन्त उन्होंने संरक्षण दिया। अख़बारों की कीमत लोगों की आर्थिक शक्ति के अनुरूप ही रही। प्रान्त के कई हज़ार लोगों की जीविका का माध्यम बना था वह दोनों अखबार। प्रदेश के लोगों की आवाज था वह अखबार। अपने समयकाल में उन अख़बारों को वे उत्कर्ष पर ले गए। सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इन अख़बारों का प्रसार एक लाख से ऊपर था बिहार में।
महाराजाधिराज डॉ, सर कामेश्वर सिंह के मृत्यु दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देती अपनी अश्रुपूरित आँखों से सुश्री झा कहती हैं: “जिन लोगों को, परिवारों को, संस्कृति को, विरासत को, गरिमा को वह दोनों अखबार सुरक्षित और संरक्षित किया, जिन लोगों के मुख में वह अखबार आवाज दिया, जिस दिन वह अंतिम सांस ले रहा था, सभी अपने-अपने घरों में, दरवाजों के पीछे छुप गए। प्रदेश में उन अख़बारों के अस्तित्व के साथ राजनीति हो रही थी, लोग अपने-घरों में चौरस खेल रहे थे।”

इस संवाददाता से बात करते सुश्री झा कहती हैं कि “महाराजा की मृत्यु के कुछ वर्ष बाद से ही दोनों अख़बार राजनीति का शिकार हो गया। हम किसी व्यक्ति अथवा समूह पर दोषारोपण नहीं करते, हम भी उतने ही दोषी हैं, हम भी आगे बढ़कर नहीं आये (‘हम’ का अर्थ दरभंगा राज के साथ-साथ प्रदेश के सभी सशक्त लोग, जो अर्थ से, सामर्थ से, पहुँच से, इन अख़बारों को बंद होने से बचा सकते थे; मिथिला को, मिथिला की संस्कृति को, पाग की गरिमा को बचा सकते थे; आगे नहीं नहीं आये। जो आये भी वे लाभ और हानि का बही साथ लेकर।)
सुश्री वसुधा झा, जो विगत साढ़े पांच वर्षों से चल रहे आर्यावर्त – इंडियन नेशन अख़बारों की गरिमा को पुनः स्थापित करने वाले वेबसाइट का नेतृत्व करने का दायित्व स्वीकार की हैं, इस संवाददाता से कहती हैं: “उन दिनों मैं स्वयं अल्प आयु में थी। मैं निजी तौर पर कुछ भी नहीं कर सकती थी। मैं, अपनी माँ और दादी के साथ स्वयं शिक्षा पर आधिपत्य के लिए लड़ रही थी। दरभंगा राज का देश में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना से लेकर, शिक्षा के विस्तार पर क्या योगदान हैं, उन बातों को को मैं यहाँ नहीं दोहराना चाहती हूँ, लेकिन यह कहते तनिक भी संकोच नहीं करती कि उस कालखंड में भी दरभंगा राज की महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में आगे आना चाहती थी, अपनी योग्यता को बढ़ाना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं होने दिया गया।”
सुश्री वसुधा झा कहती हैं: “मैं उसी शिक्षा पर अपना आधिपत्य जमाकर अपनी पहचान बनाना चाहती थी। मैं इलाहाबाद से दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हॉउस में अपनी शिक्षा, प्रतिभा का हस्ताक्षर की। अपनी योग्यता के बल पर कॉर्पोरेट की दुनिया में अपनी पहचान बनायी। इसलिए कल जो नहीं हो सका, आज हमारी कोशिश होगी कि हम अपनी भूमिका अदा कर सकें।”
सुश्री झा आगे कहती हैं: “यह समय का तकाजा देखिये या फिर हमारा प्रारब्ध, आज महात्मा गांधी का 156वां जन्मदिन है। आज आजाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का 121वां जन्म दिन है। आज के ही दिन सन 1962 में दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह का पार्थिव शरीर भूमि में समाहृत हो गया था। 55-वर्ष की आयु में 1 अक्टूबर, 1962 को वे अंतिम सांस लिए थे। मिथिला उस दिन करुणामय दृश्य था। कई घरों में चूल्हे नहीं जले थे। नवजात शिशु भी उस दिन अपने उदर-पूर्ति के लिए बिलखे नहीं थे। मेरे दादाजी, यानी महाराजाधिराज की बहन श्रीमती लक्ष्मी दाईजी के पुत्र दरभंगा के माधवेश्वर में मुखाग्नि दिए थे। आज उनके सम्मानार्थ मैं इस दायित्व को स्वीकार की हूँ। शायद यही समर्पण होगा उनके लिए।
2 अक्टूबर, 1962 को “आर्यावर्त” अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित समाचार को उद्धृत करते सुश्री वसुधा झा कहती हैं: “आज प्रातः काल उन्हें ह्रदय में पीड़ा का अनुभव हुआ और उपचार के लिए बुलाये गए कलेकिन पहुँचने के पूर्व ये परधाम को छोड़कर सदा के लिए सो गए। खण्डवला कुल गौरव महाराजा डॉ कामेश्वर सिंह का जन्म 1907 ईस्वी के 28 नवम्बर को हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह बहादुर बहुत ही व्यवहार कुशल और दक्ष प्रशासक थे। उन्होंने आरम्भ से उनकी शिक्षा दीक्षा के ऊपर विशेष ध्यान रखा। 21 वर्ष की आयु में ही 1929 की 14 जुलाई को आप दरभंगा राज की गद्दी पर बैठे और बड़ी कुशलता से राज के कार्यों की व्यवस्था की। महाराज अधिराज उदार शासक के रूप में जाने जाते थे। सम्राट अकबर से जो राज्य पांडित्य के पुरस्कार स्वरुप दरभंगा राजवंश के संस्थापक स्वर्गीय महेश ठाकुर को प्राप्त हुआ था उसे ये श्रेष्ठ शासक थे। उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय से और बनारस विश्वविद्यालय से उपाधि भी मिली थी।”

“आर्यावर्त” अखबार में लिखा था: “महाराजाधिराज के पार्थिव शरीर को अपने में समेत कर ज्योहीं चिता की लपटें ऊपर आसमान की ओर उठीं, वहां उपस्थित एक हज़ार से अधिक व्यक्तियों की आखें अश्रुपूरित हो उठी। चिता में आग लगाए जाने से पूर्व स्थानीय सशत्र सैनिकों के एक दस्ते ने अपनी बन्दुक झुकाकर स्वर्गीय महाराजाधिराज को सैनिक सलामी दी। दरभंगे के जिलाधिकारी डॉ जे सी कुंद्रा, एस.पी. श्री एस.एन. श्रीवास्तव, सिविल सर्जन डॉ मेहरा, अस्पताल के अधीक्षक डॉ सफदरली खान, सदर एस.डी.ओ. श्री यु. एन. चौबे, सदर डीएसपी श्री लक्ष्मण प्रसाद तथा अन्य सरकारी अधिकारियों ने, जो वहां मौजूद थे। इसके बाद श्रद्धांजलि देने वाले शिक्षकों, छात्रों, व्यवसायियों तथा अन्य नागरिकों का जिनमें स्त्री, बच्चे, बूढ़े सभी थे, तांता लग गया।”
सुश्री वसुधा झा आगे कहती हैं: “एक महान शिक्षा प्रेमी और उदार दानी के रूप में जाने जाने वाले महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के.सी.आई.इ., एल.एल.बी., डी.लिट् की उपाधि से अलंकृत थे। एक बड़े उदार विचार के कामेश्वर सिंह इस बात पर जोर दिया था कि यदि लोग अपने चरित्र को रक्षा करें तो केवल समुद्र यात्रा से जाति या धर्म को हानि की आशंका नहीं की जा सकती। वे मिथिला के महान समाज सुधारक थे। वे धर्म में क़ानूनी हस्तक्षेप के विरोधी थे और इस प्रसंग में राज्य परिषद् के अधिवेशनों में अपने विचार जोरदार रूप से व्यक्त किया करते थे।
सन 1935 में 12 फरवरी को राज्य परिषद् (काउन्सिल ऑफ़ स्टेट) में अपने विचार व्यक्त करते हुये महाराजधिराज ने कहा भी था: “मैं उन लोगों में हूँ जिनका विश्वास कि भिन्न भिन्न धर्मों और सामाजिक आचार विचारों को मानने वाले सदस्यों से बनी हुयी व्यवस्थापिका हिन्दुओं के धार्मिक नियमों में परिवर्तन करने की अधिकारिणी नहीं है। सामाजिक सुधर समाज के अंदर से होना चाहिए। कानून द्वारा सामाजिक सुधार करना एक बहाना है।”
सुश्री वसुधा झा का कहना है कि “महाराजाधिराज भारत के सबसे बड़े जमींदार थे और तरुण अवस्था में ही अपने उदार विचारों के कारण इन्होने पर्याप्त ख्याति प्राप्त कर ली थी। राजनीतिक समस्याओं का उन्होंने गहरा अध्ययन किया था और विलक्षण राजनीतिज्ञ होने के साथ साथ ये पक्के राष्ट्रवादी थे। गोलमेज सम्मलेन में महाराजाधिराज की राजनीतिज्ञता, राष्ट्रवादिता, योग्यता की तत्कालीन भारत मंत्री श्री उद बेनेने बड़ी तारीफ की थी। महाराजाधिराज की राजनीतिज्ञता और स्पष्टवादिता प्रवाल प्रमाण है वह भाषण जो इन्होने 1933 के 27 मार्च को काउंसिल ऑफ़ स्टेट में श्वेत पात्र के विषय में किया था। उन्होंने कहा – मुझे मालूम है की हमें जो कुछ मिल रहा है, वह न तो महात्मा गाँधी का स्वतंत्रता का सार है, न भारतवासियों द्वारा प्रितिक्षित औपनिवेशिक स्वराज्य (डोमिनियन स्टेट) है। जनतंत्र निरंकुश राज तंत्र द्वारा संचालित होने जा रहा है।”
इतना ही नहीं, सुश्री वसुधा झा आगे कहती हैं, “सांप्रदायिक भेदभाव को महाराजाधिराज भारत का कलंक मानते थे और 1932 में 4 सितम्बर को बिहार संयुक्त दल की बैठक में रांची में भाषण करते हुए उन्होंने कहा था कि हमें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए की हमें पूर्ण राष्ट्रीयता के रास्ते पर चलना है। भिन्न भिन्न जातियों और सम्प्रदायों में जो भेदभाव हैं उनको मिटाकर सबमें सामंजस्य स्थापित करना है और अपनी राष्ट्रिय आकांक्षाओं की की पूर्ति के लिए अपनी सारी शक्ति लगा देनी है। जातीय स्वार्थ को राष्ट्रहित के लिए बलिदान कर दीजिये और सांप्रदायिक झगड़ों को मिल्टन के लिए हमें बाहरी शक्ति की जरुरत पड़े, इस राष्ट्र्रीय अपमान को दूर करने की चेष्टा कीजिये।”
जब उनसे पूछा कि भारत में शिक्षण संस्थाओं की स्थापना से लेकर शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर दरभंगा राज भी भूमिका अक्षुण है, लेकिन क्या वजह रहा कि ‘अपने ही किले के चारदीवारी के अंदर महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में आगे नहीं आ सकीं, और जो आयीं, उन्हें बाहर मसक्कत करना पड़ा? सुश्री वसुधा झा कहती हैं कि “”शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और छात्रवृत्तियों की व्यवस्था का महाराजधिराज ने शिक्षा के कार्यों में अपनी सच्ची लगन का जो परिचय दिया वह अनुकरणीय और आदर्श है। कलकत्ता, काशी और पटना विश्वविद्यालय को इस परिवार से जो दान प्राप्त हुए थे उसके सम्बन्ध में यहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती है। अपने योग्य पूर्वजों के सामान महाराजाधिराज ने अपने जीवन काल में शिक्षा की उन्नति के लिए जो दान दिए और जो कार्य किये वो भुलाये नहीं जा सकते।”
सुश्री झा कहती हैं: “देश में सबसे पहले संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना उनकी ही दें है। एक बड़ा भूमिपति होने के वावजूद उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रीय भाग लिया एवं अंग्रेजों की परवाह न कर स्वातंत्र्य आंदोलन में खुले दिल से सहायता की। जिस कालखंड में वे अंतिम सांस लिए, देश को आजाद हुए महज 15 वर्ष हुआ था। आज हम 79 वां जश्ने आजादी वर्ष में चल रहे हैं। आप मुझे बताएं कि इन विगत 64 वर्षों में राष्ट्रध्वज फहराते समय, चाहे जिला में हो, प्रदेश के सचिवालय पर हो या दिल्ली के लाल किले पर, कभी किसी ने दरभंगा के राजाओं के योगदान पर दो शब्द कहे हैं ? शायद नहीं। हकीकत यह है कि हम अपने स्वाभिमान के साथ ही राजनीति करते चले गए। वे लोगों के बीच थे, इन वर्षों में हम लोगों से दर किनार होते गए। सवाल यह है कि जब हम अपनों से ही अलग हो गए, फिर पंचायत तो बाहरी व्यक्ति ही करेगा। कभी किसी ने पूछा कि ‘मेरे घर में तुम पंचायत करने वाला कौन हो?” शायद नहीं।
सुश्री झा का कहना है कि “वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और संस्कृत शिक्षा के उन्नयन के लिए उनके दान की तुलना नहीं की जा सकती। मिथिला संस्कृत शोध प्रतिष्ठान के लिए विशाल भूखंड का दान अपने ढंग का अनूठा माना जायेगा। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के लिए लक्ष्मेश्वर विलास राज प्रसादा और इसके साथ ही एक विशाल और सर्वांगपूर्ण पुस्तकालय का दान महाराजाधिराज की उदारता का युग-युग तक प्रोज्ज्वल परिचायक बना रहेगा। मिथिला कालेज तथा अन्य शैक्षणिक संस्थाओं को भी महाराजधिराज की और से मुक्त हस्त दान दिया गया है जो महाराजाधिराज के शिक्षा प्रेम और दानशीलता का ज्वलंत उदाहरण रहेगा।”
लेकिन, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि ‘चारदीवारी के अंदर महिलाओं को शिक्षा के क्षेत्र में जो अवसर और सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। जबकि उन दिनों जितनी भी महिलाएं थीं, वे व्यावहारिक रूप से इतनी प्रखर थीं कि अवसर मिलने पर वह अपने अंदर की प्रतिमा को उतना ही अधिक उजागर कर पा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। और अगर उन दिनों चारदीवारी के अंदर की महिलाओं को भी शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त अवसर दिया गया होता, तो शायद दरभंगा राज का उनकी मृत्यु के बाद जो हश्र हुआ, आज जो हम देख रहे हैं; शायद ऐसा नहीं होता।”
घंटों की बातचीत में सुश्री वसुधा झा अनंत बार अपनी अश्रुपूरित आंखों को होनी आँचल से पोछ रही थी। अवरुद्ध कंठ को पानी पीकर तरल कर रही थी। लेकिन बार-बार वे इस बात को दोहराने में कोई कोताही नहीं कर रही थीं कि “महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद इन वर्षों में, अन्ततः हमने क्या क्या? यह बहुत ही बड़ा सवाल है। यह बहुत बड़ा शोष का विषय है। अपनी मृत्यु के बाद वे अपार सम्पत्तियों का अम्बार छोड़ गए। अनेकानेक ट्रस्ट बनाकर गए ताकि मिथिला के लोगों का, प्रदेश के लोगों का सर्वांगीण विकास हो सके। लेकिन अंततः हुआ क्या? हमने किया क्या? यह सर्वविदित है। सभी देख सकते हैं।
सुश्री झा का कहना है कि “आज स्थिति ऐसी है कि किले के ईंट से ईंट अलग हो रहे हैं, चारदीवारी के अंदर-बाहर रहने वाले लोगों का आपसी सम्बन्ध कटुता के शिखर पर है। महारानी अपने जीवन की अंतिम सांस गईं रही हैं। सामाजिक कल्याण को छोड़कर, लोगों की निगाह महाराजा की सम्पत्तियों पर टिकी है। सभी लूट-खसोट के अंग बने हैं। दूर-दरस्त के लोगों, जो परिवार का कभी हिस्सा रहा ही नहीं, आधिपत्य जमा रहे हैं। वैसी स्थिति में जहाँ लोभ का साम्राज्य हो गया है, वहां संस्कृति, गरिमा, कीर्ति को बचाने की बात कौन करेगा। सबसे बड़ा और अहम् सवाल है “उनके मरने के बाद हमने क्या किया? इन 63 वर्षों में हमारा क्या योगदान है? इस बात को लोग जब आत्मचिंतन करेंगे तो स्वयं के अंदर शुन्य पाएंगे।”
पचपन-वर्षीय सुश्री झा का कहना है कि “इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारतीय शैक्षिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों में दरभंगा राज की, महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की, महाराजा रामेश्वर सिंह की, महाराजा कामेश्वर सिंह की भूमिका अत्यधिक है। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद कभी किसी ने किसी भी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों, कुलाधिपतियों से यह प्रश्न पूछा कि उनके दान के पश्चयात विश्वविद्यालय के सीनेट और सिंडिकेटों में जो स्थान सुरक्षित किया गया था, वह स्थान कहाँ है? कोई नहीं।
इतना ही नहीं, जिस कामाख्या में दशकों से लोग देवी भगवती की पूजा-अर्चना करने आते हैं, उस कामाख्या मंदिर में जो ट्रस्ट है, उसके संस्थापक थे महाराजा रामेश्वर सिंह। वे एक सिद्ध पुरुष थे। एक सिद्ध तांत्रिक थे। कामाख्या मंदिर के ऊपर पहाड़ पर बने एक मंदिर में वे पूजा किया करते थे। आज उस थान पर किसी और का कब्ज़ा है। कामाख्या के विकाश और विस्तार के लिए उनका बहुत योगदान है। दो स्थान उस ट्रस्ट में सुनिश्चित थे दरभंगा के लिए। लेकिन जब बोलने, बात करने वाला ही कोई नहीं है, किसी को थोथी नहीं है, फिर तो बहार वाले ही पंचायत करेंगे।
सुश्री वसुधा झा कहती हैं कि “मैं एक दृष्टान्त देती हूँ। आप यदि बनैली राज के जानकी नन्दन सिंह की बात पर ध्यान दें, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘महाराजाधिराज डॉ कामेश्वर सिंह के उठ जाने से मिथिला अनाथ हो गयी। आज मिथिला में कितने लोग हैं, यहाँ तक कि दरभंगा राज के चारदीवारी के अधीन, जिनके बारे में अब ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया हो इन छह दशकों में। शायद कोई नहीं क्योंकि हमने कुछ किया ही नहीं।”
क्रमशः…….


















