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	<title>Delhi Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित्त&#8217;, आप शताब्दी पुराने &#8216;आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते&#8217;</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/modi-hai-toh-mumkin-hai-slogan-lies-flat-on-its-face-at-the-entrance-of-the-delhi-golf-club</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 May 2026 05:55:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पुरातत्व]]></category>
		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली, 8 मई:  पिछले वर्ष 3 अप्रैल को एक प्रश्न के लिखित जवाब में, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री टोखन साहू ने संसद को बताया कि केंद्र सरकार ने दिल्ली गोल्फ क्लब की लीज़ 2050 तक बढ़ा दी है। यह फैसला क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की उसकी गुज़ारिश को ध्यान में रखते हुए लिया [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/modi-hai-toh-mumkin-hai-slogan-lies-flat-on-its-face-at-the-entrance-of-the-delhi-golf-club">&#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित्त&#8217;, आप शताब्दी पुराने &#8216;आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली, 8 मई:  पिछले वर्ष 3 अप्रैल को एक प्रश्न के लिखित जवाब में, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री टोखन साहू ने संसद को बताया कि केंद्र सरकार ने दिल्ली गोल्फ क्लब की लीज़ 2050 तक बढ़ा दी है। यह फैसला क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की उसकी गुज़ारिश को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, खासकर इसलिए क्योंकि 2016 से गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा बन गया। </strong></p>
<blockquote><p>अब जब मंत्रीजी लीज-अवधि बढ़ा ही दिए हैं, स्वाभाविक है, इस बात की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को होगा ही। इस दृष्टि से &#8221;मोदी है तो मुमकिन है&#8217; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित&#8217; दिखाई दिया। देश के लोगों को, खासकर पुरातत्व और विरासत प्रेमियों को, चाहे वे &#8216;देशज&#8217; हों या &#8216;विदेशज&#8217;, यह समझ लेना चाहिए कि वे कई शताब्दी पुराने न्यूनतम आठ पुरातत्वों को अपने जीवनकाल में देखने से वंचित रह जायेंगे। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/4.mov"></a></p>
<p>जनसँख्या के दृष्टिकोण से अगर भारत के लोगों की आयु संभाविता (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) को देखें तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यह 70 वर्ष है 2026 तक। इस दृष्टि से भारत में आज 162.8 मिलियन लोग 60+ वर्ष के हैं। यानी आगामी 2050 में, जब तक दिल्ली गोल्फ क्लब का विस्तारित लीज अवधि है, वे सभी अपने जीवन प्रत्याशा उम्र से 15 वर्ष अधिक के रहेंगे, अगर जीवित रहे तो। और आज जो 50-वर्ष के हैं, जिनकी संख्या करीब 250 मिलियन है, दिल्ली गोल्फ क्लब की अगली लीज के नवीकरण के समय जीवन प्रत्याशा उम्र को पार कर जायेंगे। यानी इस धरती पर पैदा होने के बाद भी उन्हें अपने देश, देश की राजधानी में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्वों, विरासतों को देखे बिना धरती से कूच करना होगा। फिर &#8216;मोदी है तो मुमकिन है&#8217; का क्या मतलब? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7729" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>विडम्बना यह है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासतों और धरोहरों की गरिमा के प्रति न केवल भारत के लोगों के लिए, बल्कि वैश्विक स्तर पर आकर्षण का मार्ग ढूंढ रहे हैं, प्रशस्त कर रहे हैं; वहीं दूसरे तरफ उन्हीं के मंत्रिमंडल के लोग देशज-विदेशज पर्यटकों को दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर के विरासतों को देखने से वंचित कर रहे हैं। यानी केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय और मंत्री के सामने सम्मानित प्रधानमंत्री की बातों का, विचारों का &#8211; कोई मोल नहीं।</strong>  </p>
<p>संसद में साहू ने कहा कि &#8220;पिछली बार लीज़ का विस्तार दिल्ली गोल्फ क्लब के अनुरोध पर वर्ष 2050 तक किया गया। यह विस्तार दिल्ली गोल्फ क्लब के उस अनुरोध को ध्यान में रखते हुए किया गया जिसमें क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की बात कही गई थी, क्योंकि 2016 से गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा बनने वाला था।&#8221; मंत्री के अनुसार, इस उद्देश्य के लिए बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए, दिल्ली गोल्फ क्लब ने लंबी अवधि की योजना के तहत लीज़ को 2070 तक बढ़ाने का अनुरोध किया था। दिल्ली गोल्फ क्लब की स्थापना 1930 के दशक की शुरुआत में एक म्युनिसिपल कोर्स के तौर पर हुई थी और पहले इसे लोधी गोल्फ क्लब के नाम से जाना जाता था। मंत्री ने &#8216;लीज अवधि&#8217; तो विस्तारित कर दिए, लेकिन यह नहीं सोचे कि प्रधानमंत्री का सांस्कृतिक विरासतों से संबंधित प्रयासों का क्या होगा?</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7730" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे, दिल्ली गोल्फ क्लब के आस-पास ही नहीं, दिल्ली सल्तनत के लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अगर पुराने कानूनों को रद्द करने, उनमें संशोधन करने पर विशेष जोर दिया और परिणामस्वरूप अगस्त 2025 तक 1,500 से अधिक पुराने या अनावश्यक केंद्रीय अधिनियमों को रद्द किया जा सकता है; तो दिल्ली गोल्फ क्लब के लीज को &#8216;शर्तयुक्त&#8217; क्यों नहीं किया जा सकता है, ताकि भारत के लोगों को ऐतिहासिक पुरातत्व और विरासतों को, जो परिसर के अंदर है, प्रतिबंधित है, देखने से वंचित नहीं होना पड़े। लोगों का कहना है कि सरकार ने विभिन्न कानूनों के तहत 3,700 से अधिक प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया है या उन्हें सरल बनाया है, और 40,000 से अधिक अनुपालन आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया है। ज्ञातव्य हो कि भारत के विधि आयोग और विधायी विभाग द्वारा गठित दो-सदस्यीय समिति द्वारा 1824 ऐसे केंद्रीय कानूनों की पहचान किये गए थे, जो अब अनावश्यक और पुराने हो चुके थे। </p>
<p><strong>इतना ही नहीं, 1 जुलाई, 2024 से, भारतीय दंड संहिता, 1860 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की जगह क्रमशः भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने ले ली है। मुख्य बदलावों में सामुदायिक सेवा की शुरुआत, कानूनी प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण, न्याय के लिए अनिवार्य समय-सीमाएं, आतंकवाद की परिभाषाएं, और धाराओं का पुनर्कर्मांकन तथा उन्हें सुव्यवस्थित किया गया। ऐसी स्थिति में, अगर प्रधानमंत्री देश के लोगों के कल्याणार्थ, देश की गरिमा के लिए अंग्रेजी हुकूमत कालीन कानूनों को भारतीय बना सकते हैं तो फिर दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर स्थित पुरातत्व को देखने, समझने के लिए भारत के लोगों के लिए विशेष पहल तो कर ही सकते हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7731" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे भी, यह क्लब कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत रजिस्टर्ड है—जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी कंपनी है जिसका मकसद कॉमर्स, कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, रिसर्च, समाज कल्याण, धर्म, दान या पर्यावरण की सुरक्षा को बढ़ावा देना है। धारा 8 कंपनियों का मुनाफा सिर्फ़ उसी मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जिसके लिए उन्हें बनाया गया है। यह क्लब आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12A के तहत भी रजिस्टर्ड है, जिससे इसे आयकर देने से भी छूट मिलती है। आय-व्यय के बारे में तो सरकार का कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय है ही, जांच करने के लिए। </p>
<p>जाकिर हुसैन रोड पर 179 एकड़ ज़मीन पर बना है दिल्ली गोल्फ क्लब, जिसे केंद्र सरकार ने 1950 के दशक की शुरुआत में क्लब को लीज पर दिया था। हाई कोर्ट में कर्मचारियों की एक याचिका के मुताबिक, भले ही इस ज़मीन की कीमत पचपन हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा है, फिर भी क्लब केंद्र सरकार को हर महीने प्रति एकड़ सिर्फ़ 16,620 रुपये की नाममात्र की लाइसेंस फीस देता है। </p>
<p><strong>प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर शहरी विकास मंत्रालय ने अपने तीन अधिकारियों को क्लब की जनरल कमेटी का सदस्य बनाया है। क्लब आवेदन और सब्सक्रिप्शन फीस लेता है। इसके अलावा, सदस्यता के लिए चुने गए आवेदकों से एंट्री फीस 3.5 लाख रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक ली जाती है, जिसमें लागू टैक्स भी शामिल होता है। कहते हैं यहाँ करीब 4000 + सदस्य हैं। इस क्लब की खासमखास विशेषता यह है कि चतुर्दिक लाल रंग से रंगे चारदीवारी वाले इस क्लब में भारतीय नौकरशाहों, न्यायविदों, न्यायमूर्तियों, राजनेताओं, व्यापारियों, कारोबारियों, के साथ-साथ खिलाड़ियों की सदस्यता की सूची काफी लम्बी है। </strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7732" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><em>दिल्ली गोल्फ क्लब परिसर में नौ स्मारक स्थित हैं। <br />
1. लाल बंगला (प्रवेश द्वार के पास), <br />
2. गोल्फ क्लब में होल नंबर 6 के पास स्थित मस्जिद, <br />
3. गोल्फ क्लब में होल नंबर 4 के पास स्थित बगीची, <br />
4. गोल्फ क्लब में होल नंबर 10 के पास स्थित सैयद आबिद का मकबरा, <br />
5. गोल्फ क्लब में होल नंबर 14-16 के पास स्थित अज्ञात मकबरा, <br />
6. गोल्फ क्लब में होल नंबर 18 के पास स्थित अज्ञात मकबरा, <br />
7. बारह खंभा, 8. मीर तकी का मकबरा और <br />
9. स्विमिंग पूल से सटा हुआ स्मारक। </em></p>
<p>प्रवेश द्वार पर स्थित लाल बंगला को छोड़कर, दिल्ली गोल्फ क्लब में, ऐतिहासिक इमारतों को उनके अपने इतिहास से पूरी तरह से काट दिया गया है। अब वे किसी सांस्कृतिक या पुरातात्विक परंपरा की प्रतिनिधि बनकर खड़ी नहीं हैं, बल्कि उन्हें महज़ एक सजावटी वस्तु के तौर पर इस्तेमाल परिसर के अंदर है। अब तो इनके लाल बलुआही रंग को भी बदलकर सफ़ेद कर दिया गया है। परिसर के अंदर स्थित विरासतों की बात तत्काल के लिए किनारे कर, लाल बंगला, जो क्लब के प्रवेश द्वार के पास बाएं तरफ स्थित है, करते हैं। यह &#8216;प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958&#8217; के तहत संरक्षित है। लाल रंग के एक बोर्ड पर लिखा है। कहते हैं कि सर लाल बंगला ही &#8216;राष्ट्रीय स्मारक&#8217; घोषित है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7733" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>लेकिन यहाँ की अवस्था, बंगले की स्थिति, साफ़-सफाई देखकर ऐसा लगता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी शायद फाइलों पर अधिक साफ़-सफाई दिखा रहे हैं। इस बात को न तो संस्कृति मंत्रालय या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी प्रधानमंत्री को बताएँगे। शौचालय में प्रवेश जैसा मार्ग जो एक तरफ पुरातत्व और दूसरे तरफ दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा निर्मित लोहे के बाड़ से घिरा है, लाल बंगला परिसर की ओर जाता है। यहाँ निजी क्षेत्र के एक सुरक्षाकर्मी दिखे तो जरूर, लेकिन परिसर की गंदगी को देखकर, सूखे पत्तों का विशाल अम्बार देखकर, मिट्टी से बनी कई परतों की काई को देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसकी देखरेख करता है। </strong></p>
<p>दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर बिखरे हुए लगभग 10 स्मारक एक पहेली के टुकड़ों की तरह हैं। सबसे पहले तो, इनमें से ज़्यादातर जगहों पर जाना मना है और परिसर में प्रवेश करने के लिए क्लब अधिकारियों से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।  इसका मतलब यह भी है कि न केवल पर्यटक, बल्कि दिल्ली के कई लोग भी इन मध्ययुगीन इमारतों के अस्तित्व से अनजान हैं। इसके अलावा, गोल्फ कोर्स शायद एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ कोई दिल्ली के सभी सात शहरों के अवशेष देख सकता है। इनमें से ज़्यादातर स्मारक भव्य हैं, लेकिन वे गुमनाम मकबरे हैं — जो शहर के वास्तुशिल्प इतिहास के दस्तावेज़ीकरण में कमियों की ओर इशारा करते हैं।</p>
<blockquote><p>लाल बलुआ पत्थर से बने दो मकबरों का एक समूह, जो निजामुद्दीन की ओर  से आते फ्लाईओवर से दिखाई देता है, का निर्माण 1779-80 में हुआ था। इन उत्तर-मुगलकालीन संरचनाओं के केंद्र में चौकोर कमरे हैं, कोनों पर छोटे चौकोर कमरे हैं जिनके बीच आयताकार हॉल हैं, और चौकोर छतों के केंद्र में गुंबद हैं। प्रवेश द्वार के पास वाला मकबरा ज़्यादा पुराना लगता है, जिसमें एक ऊँचे चबूतरे पर एक चौकोर कमरा बना है। दोनों का लेआउट केंद्रीय कक्ष के चारों ओर बने बड़े मकबरों जैसा है, लेकिन आकार में ये छोटे हैं। पास में ही उत्तर-मुगलकालीन दो-मंज़िला प्रवेश द्वार है, जिसमें एक केंद्रीय मंडप और गुंबददार छतरियाँ बनी हैं। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7734" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>लाल बंगला परिसर में घूमने, देखने से प्रतीत होता है कि यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी, या उनके द्वारा ठेकेदारी प्रथा से ही सही, श्रमिक कभी आये ही नहीं हैं। इस स्मारक या इस परिसर की मरम्मत कभी हुई ही नहीं है। यह जानना शोध का विषय है कि आखिर इसके रखरखाव पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अब तक कितनी राशि व्यय की है।अंदर प्रवेश के साथ दाहिने हाथ दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा निर्मित टेंट दीखते हैं। सामने क्लब के मैदान में घास काटने वालों की भीड़ दिखाई देती है। सामने मैदान में सफ़ेद रंग का मकबरा नुमा विरासत दिखाई देता है, जो सफ़ेद रंग का दीखता है । कहते हैं कि वह मकबरा सैयद आबिद, शाहजहाँ की सेना के एक प्रमुख सिपाही—खान दौराँ खान—के सहयोगी थे, की है। सामने लोहे के ग्रिल पर रसोइयों का वस्त्र भी दिखाई दिया। इस हिस्से में क्लब के कई पुराने सामानों के अलावे टूटे-फूटे सामानों का भण्डार भी दिखा। </p>
<p><strong>कोई पांच साल पहले, यानी 19 अगस्त, 2021 को दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली गोल्फ क्लब और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से एक याचिका पर उनका पक्ष पूछा था । इस याचिका में दावा किया गया था कि नागरिकों को क्लब परिसर में स्थित स्मारकों को देखने की अनुमति नहीं दी जा रही है। जस्टिस रेखा पल्ली ने केंद्र, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग और दिल्ली गोल्फ क्लब को नोटिस भी जारी किए थे, जवाब भी माँगा था। कोर्ट ने केंद्र और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से अपने जवाब में विशेष रूप से इस बात का ज़िक्र करने को कहा कि यहाँ के अन्य ऐसे ही स्मारकों में प्रवेश की अनुमति है या नहीं क्योंकि मामला सिर्फ़ दिल्ली गोल्फ क्लब से जुड़ा नहीं है। लेकिन आज जब दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर अंदर स्थिर विरासतों को देखने पर प्रतिबन्ध देखा तो पांच साल पहले की घटना याद आ गयी। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7735" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>बहरहाल, लाल बंगला के मामले में, इस बात पर कुछ बहस है कि यहाँ किसे दफनाया गया है। ज्यादातर ऐतिहासिक खोजें इस बात की पुष्टि करती हैं कि यह मकबरा बेगम जान—सम्राट शाह आलम द्वितीय की बेटी—और उनकी माँ नवाब ज़ीनत महल साहिबा (जिन्हें लाल कुँवर के नाम से भी जाना जाता था) का है; शायद इसी नाम के कारण इस स्मारक का नाम भी पड़ा हो। कुछ अन्य लोगों का मानना है कि यह मकबरा लाल कुंवर का हो सकता है, जो औरंगजेब के बेटे जहाँदार शाह की पत्नी थीं। मूल लाल बंगला परिसर में तीन गुंबददार मकबरे है। प्राचीन प्रवेश द्वार के पास वाला मकबरा लगभग 1626 ईस्वी में बनाया गया था और इसमें सैयद आबिद की कब्र है, जो शाहजहाँ के प्रमुख सैनिकों में से एक, खान दौरन खान के सहयोगी थे। यह मकबरा आम जनता के लिए सुलभ नहीं है क्योंकि यह दिल्ली गोल्फ क्लब के परिसर के अंदर स्थित है। शेष दो मकबरों में मुग़ल शैली की वास्तुकला को दर्शाता है। ये मकबरे पास में ही बने सफ़दरजंग के मकबरे से वास्तुकला के मामले में काफ़ी मिलते-जुलते हैं।</p>
<p>कहते हैं कि लाल कुँवर को कभी गाने वाली लड़की, कभी नाचने वाली लड़की, कभी &#8216;नौच गर्ल&#8217; या &#8216;कंचनी&#8217; कहकर पुकारा जाता था। उनका दरबार से पहले कोई लेना-देना नहीं था और न ही वे किसी शाही परिवार से थीं, लेकिन धीरे-धीरे वे जहाँदार शाह की सबसे पसंदीदा साथी बन गईं। कहा जाता है कि उनके पिता, ख़ुसूसियत ख़ान, अकबर के ज़माने के मशहूर संगीतकार मियाँ तानसेन के वंशज थे। लाल कुंवर का बादशाह पर बहुत ज़्यादा असर था। उन्होंने बादशाह को ऐशो-आराम और मौज-मस्ती में डूबे रहने के लिए उकसाया, जिसकी वजह से आख़िरकार बादशाह का बहुत ही शर्मनाक पतन हुआ। इसका एक बहुत ही बुरा उदाहरण यह है कि उन्होंने अपनी सहेली ज़ुहरा को, जो दिल्ली की सड़कों पर फल और सब्ज़ियाँ बेचती थी, बादशाह की सबसे खास सेविका बना दिया था।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7736" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>जहाँदार शाह का राज बहुत कम समय तक चला—29 मार्च 1712 से 11 फ़रवरी 1713 तक। उन्हें और लाल कुँवर, दोनों को ही जेल में डाल दिया गया था। इसके बाद जहाँदार शाह को पीट-पीटकर मार डाला गया और फिर उनका सिर काट दिया गया। जहाँदार शाह के शव को बाद में दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया—दो हाथियों से उल्टा लटकाकर—और फिर उन्हें हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया। लाल कुंवर सज़ा से बच गईं, और 17 जून 1759 को अपनी मृत्यु तक उन्हें सुहागपुरा में निर्वासित रखा गया। यह भी कहा जाता है कि दोनों मकबरे ज़ीनत महल साहिबा (जिन्हें प्यार से लाल कुंवर भी कहा जाता था) और बेगम जान के थे; ये दोनों ही दिवंगत मुगल बादशाह शाह आलम II (1728-1806) की माँ और बेटी थीं। </strong></p>
<p>कैर स्टीफन ने अपनी किताब &#8220;The Archaeology and Monumental Remains of Delhi&#8221; (1876 में प्रकाशित) में लिखा है कि इस मकबरे में एक कब्र मौजूद थी, जिसे हाल ही में वहाँ से हटा दिया गया था। यह कब्र बेगम जान की थी—जो शाह आलम II की बेटी थीं। मज़े की बात यह है कि पहले मकबरे में मौजूद कब्रों में से एक कब्र को भी इन्हीं बेगम जान का बताया जाता है! हो सकता है कि पहले मकबरे में मौजूद दूसरी कब्र शाही परिवार के किसी और सदस्य की रही हो। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि पिछले कई सालों में ऐसी बहुत सी कब्रें (या स्मारक) गायब हो चुकी होंगी।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7737" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कुछ विद्वानों का यह भी दावा है कि इस मकबरे में &#8211; जो अब पूरी तरह खाली है &#8211; कभी और भी कब्रें मौजूद थीं। ये कब्रें मिर्ज़ा सुल्तान परवेज़, मिर्ज़ा दारा बख्त (जिनकी मृत्यु 1849 में हुई थी; ये बीसवें और आखिरी मुगल बादशाह, बहादुर शाह ज़फ़र के सबसे बड़े बेटे थे) और मिर्ज़ा दाऊद की थीं। यह बात थोड़ी अजीब लगती है कि मिर्ज़ा दारा बख्त की मृत्यु के महज़ 25 साल बाद प्रकाशित हुई कैर स्टीफन की किताब में इन लोगों का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। इस तरह, यह भी एक और रहस्य बनकर ही रह जाता है। इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि तीन लापता मकबरे अकबर द्वितीय (मृत्यु 1837) के परिवार से जुड़े हैं। ज़ाहिर है, इस जगह में काफ़ी बदलाव आए हैं। लाल बंगला की कुछ मूल इमारतें अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी हैं, इसके घेरे के बचे हुए हिस्से को गोल्फ़ कोर्स में बदल दिया गया है, और पिछले कुछ सालों में छतरियों को भी हटा दिया गया है; ऐसे में आज यहाँ जो कुछ भी बचा है, वह उस मूल स्वरूप का बस एक छोटा सा हिस्सा भर है जो कभी यहाँ मौजूद था।</p>
<p><strong>बहरहाल, विगत दिनों भारत का सर्वोच्च न्यायालय के  न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति  एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिल्ली पुलिस को राजधानी में सभी सुरक्षित स्मारकों और हेरिटेज जगहों को अतिक्रमण और तोड़-फोड़ से बचाने का निर्देश दिया। साथ ही, इन इमारतों को बचाने की तुरंत जरूरत पर ज़ोर दिया। कंजर्वेशनिस्ट और इतिहासकार स्वप्ना लिडल की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए, जिसमें इन ज़रूरी चिंताओं को बताया था। कोर्ट ने कहा, “हम दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को निर्देश देते हैं कि वे उन सभी लोकल स्टेशन हाउस ऑफिसर को निर्देश दें जो या तो सुरक्षित हैं या हेरिटेज या ऐतिहासिक महत्व की जगहों की कैटेगरी में आते हैं, ताकि उन्हें अतिक्रमण या तोड़-फोड़ के खतरे से बचाया जा सके।” कोर्ट दिल्ली के रहने वाले राजीव सूरी की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें डिफेंस कॉलोनी में शेख अली की गुमटी को बचाने की मांग की गई थी। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7738" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>न्यायालय ने लिडल की रिपोर्ट की जांच की, जिसमें महरौली में प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स के 100 मीटर के बैन एरिया में बन रहे स्ट्रक्चर दिखाने वाली तस्वीरें शामिल थीं। उन्होंने कई जगहों पर तोड़-फोड़ के मामलों का भी ज़िक्र किया। लिडल ने दिल्ली सरकार को अपने आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा कंज़र्व किए जा रहे कई स्ट्रक्चर को &#8220;प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स&#8221; के तौर पर नोटिफ़ाई करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। सीनियर एडवोकेट शिखिल सूरी ने कहा, “दिल्ली में 48 मॉन्यूमेंट हैं जिन्हें दिल्ली सरकार को प्रोटेक्टेड के तौर पर नोटिफाई करना है, लेकिन 2015 से ऐसा नहीं किया गया है।” उनकी रिपोर्ट में 1397 के मॉन्यूमेंट ‘तरबूज का गुंबद’ का उदाहरण दिया गया, जो अभी साउथ दिल्ली के एक स्कूल में है। इसमें दिल्ली गोल्फ क्लब में मुगल-काल के तीन स्ट्रक्चर को भी मार्क किया गया है जो बहुत खराब हालत में हैं।</p>
<p>पीठ ने कहा: “हमें लगता है कि गोल्फ क्लब के अंदर के स्ट्रक्चर पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किए गए हैं। इंटेक ने दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा स्ट्रक्चर का पूरी तरह से मेंटेनेंस करने की ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए सुपरविज़न और विजिलेंस न रखकर आंखें मूंद ली हैं। हमें नई दिल्ली म्यूनिपाल कौंसिल का ऐसा बर्ताव लापरवाही का एक बड़ा मामला लगता है।” नई दिल्ली म्यूनिपाल कौंसिल के वकील ने बताया कि ज़मीन क्लब को लीज़ पर दी गई थी। बेंच ने कहा, “एक बार जब आप इसे दे देते हैं, तो आप इस पर सोते रहते हैं और इसकी परवाह नहीं करते। ऐसा लगता है कि राज्य इन स्ट्रक्चर की हेरिटेज वैल्यू को नहीं समझता है। वे पूरी तरह से खराब हो चुके हैं और उन पर पेड़-पौधे उग रहे हैं।”इंटेक की 2021 की रिपोर्ट में दिल्ली में 1,100 से ज़्यादा नोटिफ़ाइड हेरिटेज साइट्स और स्ट्रक्चर्स का डॉक्यूमेंटेशन है, जो मुगल-पूर्व से लेकर कॉलोनियल समय के आखिर तक के समय को कवर करते हैं।</p>
<p>इतना ही नहीं, विगत दिनों अपने आदेश के जानबूझकर किए गए उल्लंघन पर सख्त रुख अपनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को अवमानना का नोटिस जारी किया है। यह नोटिस राष्ट्रीय राजधानी में 173 अधिसूचित विरासत स्थलों के संरक्षण की स्थिति पर जवाब दाखिल करने में विफल रहने के कारण जारी किया गया है।</p>
<p><strong>तस्वीरें: संजय शर्मा </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/modi-hai-toh-mumkin-hai-slogan-lies-flat-on-its-face-at-the-entrance-of-the-delhi-golf-club">&#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित्त&#8217;, आप शताब्दी पुराने &#8216;आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद का इंतकाल 35-45 साल पहले हुआ, उनके कब्र आज भी जीवित हैं, लेकिन &#8230;&#8230;​ दिल्ली में कब्रिस्तानों पर राजनीति जारी है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shah-rukh-khans-parents-graves-are-still-alive-today-politics-over-cemeteries-continues-in-delhi</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 May 2026 03:22:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bahadur Shah Zfara]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[DilliGate]]></category>
		<category><![CDATA[Graveyard politics]]></category>
		<category><![CDATA[Graveyards]]></category>
		<category><![CDATA[indian express]]></category>
		<category><![CDATA[Kabristan]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बहादुरशाह ज़फर मार्ग, नई दिल्ली : मैं नहीं जानता हूँ कि बॉलीवुड के मशहूर कलाकार शाहरुख़ खान से मैं कभी रूबरू हो पाउँगा या नहीं। मैं नहीं जानता हूँ कि वे मुझे मिलने को बुलाएँगे या नहीं। मैं यह भी नहीं जानता हूँ कि जंगे आज़ादी में मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shah-rukh-khans-parents-graves-are-still-alive-today-politics-over-cemeteries-continues-in-delhi">शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद का इंतकाल 35-45 साल पहले हुआ, उनके कब्र आज भी जीवित हैं, लेकिन &#8230;&#8230;​ दिल्ली में कब्रिस्तानों पर राजनीति जारी है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बहादुरशाह ज़फर मार्ग, नई दिल्ली : मैं नहीं जानता हूँ कि बॉलीवुड के मशहूर कलाकार शाहरुख़ खान से मैं कभी रूबरू हो पाउँगा या नहीं। मैं नहीं जानता हूँ कि वे मुझे मिलने को बुलाएँगे या नहीं। मैं यह भी नहीं जानता हूँ कि जंगे आज़ादी में मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों और क्रांतिकारियों के वंशजों की खोज से सम्बंधित मेरे प्रयास की बातों को वे सुनेंगे या नहीं। लेकिन आज शाहरुख़ खान की वालिदा मोहतरमा लतीफ़ फातिमा और उनके वालिद मोहतरम मीर ताज मोहम्मद जी सुबह सवेरे रूबरू होने के लिए &#8216;फरमान&#8217; जारी कर दिए। आज सुबह तक ऐसी कोई बात नहीं थी कि मैं उनके कब्रों पर आऊंगा।</strong> </p>
<p>लेकिन समय कुछ और चाहता था तभी तो उनके वालिद और वालिदा के इंतकाल के क्रमशः 46-वर्ष और 35-वर्ष बाद मैं उनके कब्रों पर जीते-जी आपकी उपस्थिति दर्ज किया &#8216;भींगी आंखों&#8217; के साथ। थरथराते होठों से अपनी बातें कही। अश्रुपूरित भी हुआ। मेरी बातों को उस कब्रिस्तान में चीर निद्रा में सोये, उनके आसपास आराम फरमाते सैकड़ों, हज़ारों रूहें भी मेरी बात सुन रहे थे। फिर मन हल्का कर दिल्ली के इस सौ साल से अधिक पुराने कब्रिस्तान में, जहाँ लाखों लोग, महिला, पुरुष, बच्चे, जो मुद्दत से चीर निद्रा में सोये हैं, उनसे मिला, अपनी बातों को बताया, उनसे दुआएं भी माँगा और फिर मन हल्का कर दिल्ली स्थित कब्रिस्तानों पर कहानी करने में जुट गया क्योंकि विगत कुछ वर्षों से दिल्ली सल्तनत में कब्रिस्तानों पर भी राजनीति हो रही है। </p>
<blockquote><p>अभी सुबह के कोई साढ़े दस बजे हैं और मैं शाहरुख़ खान के वालिद मीर ताज मोहम्मद और वालिदा लतीफ़ फातिमा के कब्रों के पास हूँ। जिस दिन मोहतरमा लतीफ़ फातिमा जी का इंतकाल हुआ था, उस समय कलकत्ता से प्रकाशित आनंद बाजार पत्रिका समूह के &#8216;संडे&#8217; पत्रिका में संवाददाता था। उसके अगले साल बहादुरशाह ज़फर मार्ग पर स्थित दी इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में संवाददाता बनकर आया था। फातिमा जी का इंतकाल 15 अप्रैल, 1991 को हुआ था जबकि शाहरुख़ खान के वालिद का इंतकाल 19 सितम्बर, 1980 को हुआ था। आज इन दोनों के कब्रों के अलावे, लगभग 110+ वर्ष पुराने इस कब्रिस्तान में लाखों लोग सोये हैं अमन और शांति से। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7710" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम इंडियन एक्सप्रेस ही नहीं, लन्दन के तर्ज पर कभी &#8216;फ्लीट रोड&#8217; कहा जाने वाला बहादुरशाह ज़फर मार्ग के पीछे और आईटीओ की दिशा से लालकिले की ओर जाने वाली सड़क (रिंग रोड) के बाएं हाथ स्थित है। इसे दिल्ली गेट कब्रिस्तान के नाम से भी जाना जाता है। 1950 के दशक तक यह सड़क सुनसान थी और यहाँ कीकर और बबूल के पेड़ उगे हुए थे। आज भी उस परिवेश का नजारा देखा जा सकता है। उसी कालखंड में इस इलाके में कई अखबारों के दफ़्तर खुले। सबसे पहले 1953 में &#8216;इंडियन एक्सप्रेस&#8217; ने अपना दफ़्तर खोला, जिसके बाद &#8216;पैट्रियट&#8217;, &#8216;नेशनल हेराल्ड&#8217;, &#8216;टाइम्स ऑफ़ इंडिया&#8217;, &#8216;नवभारत टाइम्स&#8217;, &#8216;उर्दू मिलाप&#8217; और कई दूसरे अख़बारों के दफ़्तर भी यहाँ खुल गए। आज भी दिल्ली गेट की दिशा से आईटीओ की ओर जाने वाला बहादुरशाह ज़फर मार्ग के बाएं हाथ निचली सड़क, जहाँ अख़बारों का दफ्तर है, के पीछे सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों कीकर और बबूल के बड़े-बड़े बृक्ष खड़े हैं। </p>
<p><strong>जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम &#8211; दिल्ली के सबसे पुराने और ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम कब्रिस्तानों में से एक है। यह कब्रिस्तान शाहजहानाबाद, यानी पुरानी दिल्ली के चारदीवारी के ठीक बाहर है। वैसे इस कब्रिस्तान की शुरुआत मुगल काल में हुई थी, लेकिन इसकी जड़ें तुगलक वंश तक जाती हैं। पारंपरिक रूप से, इस्लामी दफ़न शहर की दीवारों के बाहर होते थे, और यह जगह धीरे-धीरे पुरानी दिल्ली के निवासियों के लिए एक मुख्य दफ़नगाह बन गई। मीर ताज मोहम्मद और लतीफ़ फातिमा के कब्रों के पास खड़े होकर जितनी दूर तक निगाह पहुँच रही थी, लाखों लोगों का अंतिम विश्राम स्थल दिख रहा था। शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा का कब्र देखकर ऐसा लगा जैसे यह कल ही यहाँ आराम फरमाने आयी हों। यहाँ मुशीर झिंझियानवी जैसे जाने-माने कवि, यूनुस जाफ़री जैसे विद्वान, और कल्लू निहारीवाले जैसे मशहूर स्थानीय लोग शामिल हैं । </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7711" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>बहरहाल, शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा के फरमान का अमल करते आज सुबह-सवेरे जब दिल्ली गेट पर आया, पैर जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम की ओर बढ़ने लगे। वैसे दिल्ली गेट आज भी अपने अंदर अनगिनत ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे हैं, लेकिन हम कब्रिस्तान की ओर बढ़ रहे हैं, पता नहीं क्यों ? कहते हैं समय आपको वहां जरूर लेकर जायेगा, जहाँ समय ने आपने किये लिखा है। नब्बे के कालखंड में जब इंडियन एक्सप्रेस में संवाददाता था, चाहे-अनचाहे इस कब्रिस्तान में आया करते थे। </p>
<p>अब तक कल का लाल दरवाजा, जो बाद में खुनी दरवाजा के रूप में कलंकित हुआ, के पास पहुंचा था जहाँ दाहिने हाथ मौलाना आज़ाद मेडिकल कालेज का प्रवेश द्वार बना है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान, या यूँ कहें कि आज़ाद भारत के पहले पांच &#8211; छह साल तक यहाँ दिल्ली की पुरानी सेंट्रल जेल हुआ करती थी। मुग़ल कल में यह स्थान सरायों के लिए विख्यात था। इससे दस कदम पर ही लाल किले में प्रवेश के लिए दिल्ली गेट था, आज भी है। अंग्रेजों के कालखंड में वह सराय जेल में बदल गया था जिसे भारतीय क्रांतिकारियों और आपराधिक कैदियों को रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यहीं 1912 में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की हत्या की कोशिश के षड्यंत्रकारियों के साथ-साथ, दिल्ली असेम्बली बम कांड के षड्यंत्रकारी, खासकर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को रखा गया था। बहादुर शाह के बेटों और एक पोते को इसी लाल दरवाजा पर ब्रिटिश मेजर हडसन ने गोली मार दी थी। आज यह सड़क लुटियंस दिल्ली और पुरानी दिल्ली के बीच एक कड़ी का काम करती है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7724" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>आजादी के बाद के भारत में, दिल्ली में लड़कियों के लिए लेडी हार्डिंग कॉलेज के अलावा कोई मेडिकल कॉलेज नहीं था। भारत में जिन जगहों पर पहले से मेडिकल कॉलेज मौजूद थे, वे थीं बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास और अमृतसर वगैरह। उस समय दिल्ली की आबादी 20 लाख थी, और एक मेडिकल कॉलेज की ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी। 1936 में, इरविन अस्पताल के पहले मेडिकल सुपरिटेंडेंट, लेफ्टिनेंट कर्नल क्रूइकशैंक ने दिल्ली के लिए एक अलग मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में सोचा। एक योजना बनाई गई और पेश की गई कि इरविन अस्पताल के ठीक सामने, मौजूदा रामलीला मैदान के पास एक मेडिकल कॉलेज बनाया जाए। बदकिस्मती से, 1939 में दूसरे विश्व युद्ध की वजह से यह योजना रद्द कर दी गई।1939 से 1947 तक इरविन अस्पताल दिल्ली में इलाज के लिए सबसे सम्मानित जगह थी। यह दौर राजनीतिक रूप से भारत के लिए बहुत अनिश्चितता भरा था। विश्व युद्ध की वजह से ब्रिटिश सरकार पर पैसों की भारी तंगी थी और भारत की आज़ादी भी नज़दीक ही थी, इसलिए किसी ने दिल्ली में मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में नहीं सोचा। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7712" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>आज़ाद भारत में 1947 से 1955 के बीच ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता जिससे पता चले कि किसी ने नया मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में सोचा हो। लेकिन दस्तावेज यह कहता है कि डॉ. पी. डिश ने दिल्ली में मेडिकल कॉलेज की कमी की समस्या के बारे में चीफ कमिश्नर ए. डी. पंडित को बताया और उन्होंने डॉ. डिश को सलाह दी कि वे तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत से इस बारे में बात करें। संयोग से, डॉ. डिश नेहरू जी के निजी डॉक्टर भी थे। यह कहा जाता है कि उस समय नेहरू जी इसके लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि आर्थिक हालात ठीक नहीं थे। उसी समय, उनके कुछ साथियों ने दिल्ली की ठेठ बोली में कहा: “पंडितजी, करेला में भी तीन मेडिकल कॉलेज हैं।” पंडितजी ने चिल्ला कर जवाब दिया, &#8220;केरल, मेरे प्यारे दोस्त, करेला नहीं; करेला तो एक सब्जी है।&#8221;</p>
<p>पंडितजी का मूड ठीक करने के लिए, डॉ. पी. सी. ढांडा ने बड़ी होशियारी से बात का रुख मोड़ दिया और एक सुझाव दिया कि अगर कोई मेडिकल कॉलेज मंजूर होता है, तो उसे उनके जाने-माने साथी मौलाना आज़ाद के नाम पर रखना सबसे सही श्रद्धांजलि होगी, जो उनके बहुत करीब थे। इसी बीच, भारत सरकार को भी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की ज़रूरत महसूस हुई, जिसमें मेडिकल कॉलेजों और मेडिकल शिक्षा की ज़रूरतें भी शामिल थीं। भारत सरकार ने दूसरी पंचवर्षीय योजना में—जिसे 2 मई 1956 को पास किया गया था, देश के स्वास्थ्य स्तर को बेहतर बनाने के लिए कई लक्ष्य रखे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7713" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>इस जेल का ज़िक्र कई ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है, जिनमें सैयद अहमद खान की &#8216;आसार-उस-सनादीद&#8217; और &#8216;द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़&#8217; में छपी 1858 की एक नक्काशी शामिल है। आज मौलाना आज़ाद मेडिकल कालेज प्रागण में पुरानी जेल के सम्मानार्थ एक स्थान सुरक्षित है, जहाँ उन दिनों दर्जनों क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाया गया था। साल 1958 में केंद्रीय कारावास तिहाड़ के बनने के बाद दिल्ली की जेल यानी तिहाड़ जेल बन गयी और दिल्ली की पुरानी जेल इतिहास के पन्नों में दफ़न हो गया। बहरहाल, दिल्ली गेट की दिशा से इंडियन एक्सप्रेस भवन के पहले पूरब की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ा। यह इस नुक्कड़ से कब्रिस्तान की दूरी सौ कदम से अधिक नहीं है। मुज्जे विश्वास है कि आज इस सड़क पर स्थित कार्यालयों में काम करने वाले लोग इस कब्रिस्तान के बारे में शायद जानते भी होंगे। वे तो यह भी नहीं जानते होंगे कि इसी कब्रिस्तान में शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा के अलावे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के नेता सैय्यद शहाबुद्दीन भी आराम फार्मा रहे हैं। खैर। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7725" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम में समुदाय की गहरी भावना झलकती है। यहाँ कई कब्रों पर ऐसे पत्थर लगे हैं जिन पर न सिर्फ़ मरने वाले का नाम लिखा है, बल्कि पुरानी दिल्ली की उन तंग गलियों का भी ज़िक्र होता है जहाँ वे कभी रहते थे। शहरीकरण के दबाव और जगह की कमी के बावजूद, इस कब्रिस्तान का रखरखाव बहुत अच्छी तरह से किया जाता है। इसमें कुछ खास हिस्से भी हैं, जैसे कि मृत पैदा हुए शिशुओं के लिए एक अलग जगह।  इतना ही नहीं, कोविड-19 में मृत्यु को प्राप्त किये लोगों को इस कब्रिस्तान में एक अलग हिस्सा दिया है। अनेकानेक चुनौतियों के बाद भी यह दिल्ली के मुस्लिम समुदाय के लिए एक शक्तिशाली सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रतीक बना हुआ है, जो तेज़ी से बदलते शहरी परिवेश में परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है। इस जगह पर जाने से पुरानी दिल्ली के बहु-स्तरीय इतिहास की एक अनोखी झलक मिलती है, जहाँ हर कब्र शहर के दिल में बिताए गए जीवन की एक कहानी बयाँ करती है।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7714" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कुछ वर्ष पहले दिल्ली में कब्रिस्तानों की समस्याओं और स्थिति का अध्ययन करने का विचार दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार द्वारा सामने रखा गया था। कहते हैं कि यह पहल शहर में मुस्लिम आबादी में हो रही वृद्धि और कब्रिस्तानों के लिए जगह की कमी को लेकर मुस्लिम समुदाय की बढ़ती चिंताओं को ध्यान में रखते हुए किया गया था । अख़बारों में, टीवी पर पर, पत्रिकाओं में इस बात को बारम्बार लिखा जा रहा था, कहा जा रहा था कि दिल्ली में  कब्रिस्तानों के लिए जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसके कई कारण भी बताए गए। मसलन, कब्रिस्तान की ज़मीन पर अतिक्रमण, शहरीकरण, नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन का आवंटन न होना, मस्जिदों और दरगाहों से जुड़े कब्रिस्तानों की भारी मांग, और कंक्रीट की कब्रों का निर्माण। </p>
<p>तत्कालीन शोधों में, जो बाद में प्रतिवेदन का रूप लिया, यह कहा गया कि  दिल्ली वक्फ बोर्ड और अन्य एजेंसियों के साथ पंजीकृत अधिकांश मुस्लिम कब्रिस्तान, पिछले कुछ वर्षों में व्यावहारिक रूप से विलुप्त हो चुके हैं। सार्वजनिक और सरकारी, दोनों ही प्रकार की एजेंसियों ने कब्रिस्तानों पर या तो कब्जा कर लिया है अथवा उन पर अतिक्रमण कर लिया है। वहीं दूसरी ओर, नगर-नियोजन योजनाओं में नए कब्रिस्तानों के लिए नई भूमि भी आवंटित नहीं की गयी। परिणाम यह हुआ की प्रतिवेदन में इस बात को उद्धृत किया गया कि मौजूदा (तत्कालीन) कब्रिस्तानों में शेष बची जगह, मुश्किल से अगले दो वर्षों के लिए ही हो सकती है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7715" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>लेकिन जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम में कब्र खोदने वाले एक श्रमिक, जिसे कब्र खोदने के लिए 700/- रुपये मजदूरी मिलते हैं, कहता है कि &#8220;मैं कई वर्षों से यहाँ काम करता हूँ। इस कब्रिस्तान में लाखों लोग, बड़े, बच्चे, महिला, पुरुष आराम फार्मा रहे हैं। कई जन्म के साथ ही यहाँ आ गया तो कई जीवन के अंतिम दिनों में बीमारी के कारण यहाँ आये। कई गरीब थे तो कइ अमीर, कई जनाजों के पीछे गिनती के लोग थे तो कई जनाजों के पीछे समुदाय के काफी लोग थे। आज कल कब्रिस्तानों को भी राजनीति में घसीटा जा रहा है। सरकारी मुलाजिम और सरकार के साथ जुड़े लोग कागज पर यह दिखने लगे हैं की दिल्ली के कब्रिस्तानों में जगह की किल्लत है। यह कहना गुनाह है। इस कब्रिस्तान में पीछे सौ सैलून से लाखों लोग ,आराम फरमा रहे हैं। यकीन  कीजिये, आने वाले सौ सालों तक यहाँ लाखों लोग अगर आएंगे तो अल्लाह उन्हें भी दो गज जमीन मिबा किसी तकलीफ के दे देंगे।&#8221;  </p>
<p><strong>कब्रिस्तानों की प्रबंधन संरचनाएं कब्रिस्तानों की ज़मीन के मालिकाना हक की प्रकृति पर निर्भर करती हैं। जहां दिल्ली वक्फ बोर्ड, दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और समुदायों के मालिकाना हक वाले कब्रिस्तानों के लिए प्रबंधन समितियां मौजूद हैं; वहीं कुछ जगहों पर ऐसे कब्रिस्तान भी हैं जिनका मालिकाना हक परिवारों या समुदायों के पास है, और वहां किसी भी तरह की प्रबंधन समिति मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों में रखरखाव के लिए कर्मचारी/व्यक्ति बहुत कम जगहों पर ही उपलब्ध हैं, क्योंकि ज़्यादातर कब्रिस्तानों (कुल 131 में से 85 या 65%) में इस काम के लिए कोई भी मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही के स्तर को बेहतर बनाने की गुंजाइश है, खासकर उन कब्रिस्तानों में जो रखरखाव के लिए पैसे लेते हैं और खर्च करते हैं।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7716" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>जिन कब्रिस्तानों में एक महीने में कम अंतिम संस्कार होते हैं (51 कब्रिस्तानों में 5 या उससे कम अंतिम संस्कार), उनकी संख्या उन कब्रिस्तानों से ज़्यादा है जहां ज्यादा अंतिम संस्कार होते हैं (9 कब्रिस्तानों में 30 से ज़्यादा अंतिम संस्कार)। कब्रिस्तान में दस्तावेजों की ज़रूरत बहुत कम होती है, क्योंकि कब्रिस्तानों में अंतिम संस्कार के समय केवल पहचान का सबूत मांगा जाता है। ज़्यादातर कब्रिस्तानों (75 या 57%) ने बताया कि उनके अधिकार क्षेत्र में होने वाली मौतों की संख्या के हिसाब से उनके पास जगह कम है। इतना ही नहीं, जहां ज़्यादातर कब्रिस्तान (73 या 56%) इस सुविधा का इस्तेमाल करने के लिए लोगों से कोई पैसा नहीं लेते, वहीं जो कब्रिस्तान पैसे लेते हैं (42 या 32%), उनमें पैसे की रकम 201 रुपये से लेकर 2000 रुपये के बीच होती है। साथ ही, ज़्यादा क्षमता वाले कब्रिस्तानों (4 कब्रिस्तानों की क्षमता 5000 से ज़्यादा है) की संख्या, कम क्षमता वाले कब्रिस्तानों (25 कब्रिस्तानों की क्षमता 200 या उससे कम है) की तुलना में कम है।</p>
<p>दस्तावेजों के अनुसार, कहने के लिए तो दिल्ली में 704 मुस्लिम कब्रिस्तान हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से महज 131 कब्रिस्तान हैं जो मौजूद हैं।शहर के 11 ज़िलों में से, दक्षिण दिल्ली में सबसे ज़्यादा कब्रिस्तान (33 या 25%) है। इसके बाद उत्तर-पश्चिम दिल्ली (19), उत्तर दिल्ली (17), दक्षिण-पश्चिम दिल्ली (11), उत्तर-पूर्व दिल्ली (10), पश्चिम दिल्ली और पूर्वी दिल्ली (हर एक में 9), दक्षिण-पूर्वी दिल्ली (8), मध्य दिल्ली (6), शाहदरा (5), और नई दिल्ली (4)है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि 131 कब्रिस्तानों में से 16 अभी इस्तेमाल में नहीं हैं। इस्तेमाल न होने के कारणों में कब्रिस्तान की ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर कानूनी मामले, खराब बनावट जिसके कारण पानी भर जाता है या दूसरी समस्याएँ हैं, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ विवाद शामिल हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7717" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<blockquote><p>दिल्ली में क़ब्रिस्तानों की समस्याओं और उनकी स्थिति का अध्ययन करते समय बहादुर शाह ज़फ़र का यह शेर याद आ जाता है, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद कुछ इस प्रकार है: &#8220;ज़फ़र कितना बदनसीब है कि उसे अपने प्यारे वतन में दफ़्न होने के लिए दो गज़ ज़मीन भी नसीब न हुई!&#8221; हालाँकि यह शेर उन्होंने अपने निर्वासन काल (रंगून, जिसे अब म्यांमार में यांगून कहा जाता है) के संदर्भ में कहा था, लेकिन दिल्ली के क़ब्रिस्तानों के अध्ययन के संदर्भ में भी यह पूरी तरह प्रासंगिक है।</p></blockquote>
<p>भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, दिल्ली में मुस्लिम आबादी 20 लाख (दो मिलियन) से भी अधिक है। शहर में मुस्लिम आबादी में हो रही वृद्धि के साथ-साथ, क़ब्रिस्तानों के लिए जगह की कमी को लेकर समुदाय की चिंताएँ भी लगातार बढ़ती जा रही हैं। हाल के दिनों की समाचार रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि क़ब्रिस्तानों के लिए उपलब्ध जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे—क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर अतिक्रमण, शहरीकरण, नए क़ब्रिस्तानों के लिए ज़मीन का आवंटन न होना, मस्जिदों और दरगाहों से जुड़े क़ब्रिस्तानों की भारी माँग, और कंक्रीट की क़ब्रें बनाने का चलन। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7718" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कब्रिस्तानों की उम्र जहाँ 34% कब्रिस्तान 101 से 200 साल पुराने हैं, वहीं कुल कब्रिस्तानों में से 12% (या 16) 200 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। दूसरे शब्दों में, शहर के लगभग आधे कब्रिस्तान (46%) 100 साल से ज़्यादा पुराने हैं। 51 से 100 साल की श्रेणी में 24 कब्रिस्तान (18%) हैं, और 26 कब्रिस्तान (20%) 10 से 50 साल पुराने हैं। 10 साल से कम की श्रेणी में सिर्फ़ पांच कब्रिस्तान (4%) होने से, यह कहा जा सकता है कि शहर में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बावजूद, हाल के दिनों में बहुत कम कब्रिस्तान बनाए गए हैं। </p>
<p>इतना ही नहीं, क्षेत्रफल की दृष्टि से ज्यादातर कब्रिस्तान (68% या 89) आकार में छोटे हैं, जिनका क्षेत्रफल 10 बीघा या उससे कम है। इन 68% कब्रिस्तानों में से; 38% के पास एक से पाँच बीघा जमीन है, 22% के पास छह से 10 बीघा जमीन है और केवल 8% बहुत छोटे हैं जिनके पास एक बीघा से भी कम जमीन है। तुलनात्मक रूप से बड़े आकार के कब्रिस्तानों में, 14% के पास 11 से 20 बीघा जमीन है, 8% के पास 20 से 50 बीघा ज़मीन है और केवल 2% या तीन कब्रिस्तानों के पास 50 बीघा से ज़्यादा ज़मीन है। कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा कब्रिस्तान की ज़मीन पर कब्ज़ा एक बड़ी चुनौती है, जिसके कारण इसके मूल उद्देश्य के लिए उपलब्ध जगह लगातार कम होती जा रही है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7719" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>ऐसे सैकड़ों कब्रिस्तान हैं जो कागज़ों में तो मौजूद हैं, पर मुख्य रूप से कब्ज़े के कारण ज़मीनी स्तर पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि DWB के पास 624 कब्रिस्तानों की सूची है, लेकिन उनमें से ज्यादातर आज ढूँढ़े नहीं जा सकते। दिल्ली के 131 कब्रिस्तानों में से, 43 (33%) कब्रिस्तानों की ज़मीन पर कब्ज़ा हो चुका है। जहाँ 30% कब्रिस्तानों में कब्ज़े वाले क्षेत्र का आकार एक से पाँच बीघा के बीच है, वहीं नौ कब्रिस्तानों (21%) में यह एक बीघा से भी कम है। इतना ही नहीं, बड़े आकार की जमीन पर कब्ज़े वाले कब्रिस्तानों की संख्या कम है: चार कब्रिस्तानों में 11 से 20 बीघा ज़मीन पर कब्ज़ा है; दो-दो कब्रिस्तानों में छह से 10 बीघा और 21 से 50 बीघा ज़मीन पर कब्ज़ा है; और केवल एक कब्रिस्तान में 50 बीघा से ज़्यादा ज़मीन पर कब्जे की सूचना मिली है।</strong></p>
<p>दिल्ली गेट-रिंग रोड कब्रिस्तान के सचिव शमीम अहमद खान का कहना है कि &#8220;इस बात को नाकारा नहीं जा सकता कि जनसंख्या की वृद्धि के मद्दे नजर कब्रिस्तानों के पास जितनी जमीन होने किये, वह नहीं है। कई कब्रिस्तान क़ानूनी डाव-पेच में पड़े हैं। अगर सर्कार एयर व्यवस्था के लोग चाहे तो इस मसले को बहुत आसानी से सुलझाया जा सकता है। मथुरा रोड से भैरव मंदिर के रास्ते जब रिंग रोड पर पहुँचते हैं, वहां करीब 14 एकड़ जमीन जो कब्रिस्तान का था, उसे जोतकर मिलेनियम पार्क बना दिया गया है। जब लोग जन्म लेंगे तो उनकी मृत्यु तय है। वैसी स्थिति में उन्हें इज्जत के साथ दफ़नाने की जबावदेही तो सरकार की ही होनी चाहिए। वैसे दिल्ली गेट कब्रिस्तान दिल्ली के किसी भी कब्रिस्तान से सभी मामले में बेहतर है। यहाँ भी जमीन की किल्लत है। आम तौर पर हम एक कब्र पर उसी परिवार के लोग को न्यूनतम दस साल के बाद जगह देते हैं। हमारे कब्रिस्तान में कोरोना काल में तक़रीबन 1600 लोगों को दफनाया गया था। यहाँ जन्म के साथ मृत्यु को प्राप्त करने या छोटे-छोटे बच्चों के आराम के लिए अलग स्थान है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7720" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>शमीम अहमद खान का कहना है कि किसी भी कब्रिस्तान में, जहाँ समाज के बड़े-बड़े लोग, अमीर लोग आराम फार्मा रहे हैं, मेरा मानना है कि उनके परिवार के लोगों को कब्रिस्तानों में आकर देखना जरूर चाहिए कि आखिर जहाँ वे अपने लोगों को आराम से सुलाए थे, उनका कब्र कैसा है। कहना नहीं चाहिए, लेकिन दफ़नाने के बाद, शायद ही लोग कभी देखने आते हैं। वे कब्रिस्तानों को जीवंत बनाये रख सकते हैं, लेकिन ऐसा करते नहीं। जब उनसे पूछा कि शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद यहीं आराम फार्मा रहे हैं, क्या कभी वे आये हैं? खान साहब कहते है, &#8216;मुझसे मुलाकात नहीं हुई है।&#8217;</p>
<p>कब्रिस्तान की ज़मीनों पर ज्यादातर (24 या 56%) समुदाय के लोगों/संगठनों ने कब्ज़ा कर लिया है। सरकार, 10 कब्रिस्तानों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करने वाली के तौर पर, कब्जा करने वालों की सूची में दूसरे स्थान पर है। एक समाचार रिपोर्ट में दर्ज DWB के एक RTI जवाब के अनुसार, शहर में कब्रिस्तानों की संख्या में कमी ज्यादातर जनता और सरकारी एजेंसियों द्वारा किए गए कब्जे के कारण है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने दिल्ली में 11 कब्रिस्तानों पर कब्ज़ा कर लिया है। लोगों के साथ बातचीत और समाचार रिपोर्टों से पता चला कि मथुरा रोड पर दिल्ली पब्लिक स्कूल, रिंग रोड पर इंद्रप्रस्थ पार्क और लोधी रोड पर CGO कॉम्प्लेक्स कब्रिस्तान की ज़मीन पर बनाए गए हैं। छह कब्रिस्तानों की ज़मीनों पर निजी व्यक्तियों ने कब्ज़ा कर लिया है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7721" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>कुल कब्रिस्तानों में से 46 कब्रिस्तान बसी हुई कॉलोनियों में स्थित हैं। हालांकि 15% उत्तरदाताओं ने कब्रिस्तानों को अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित करने का समर्थन किया, लेकिन सभी 46 कब्रिस्तानों को अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की गुंजाइश है, क्योंकि वे आवासीय क्षेत्रों में स्थित हैं। किसी धार्मिक स्थल के बहुत करीब या उसके भीतर स्थित कब्रिस्तान, कई मुसलमानों के लिए अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार करने के लिए एक पसंदीदा विकल्प होता है। मौजूदा 131 कब्रिस्तानों में से 17 (13%) मस्जिदों के बहुत करीब स्थित हैं, छह किसी पीर या मज़ार की कब्र के पास स्थित हैं, और पाँच ईदगाह की जमीन के भीतर संचालित हो रहे हैं। हालाँकि, 103 कब्रिस्तान (79%) ऐसे हैं जो किसी भी धार्मिक स्थल के बहुत करीब स्थित नहीं हैं। ये केवल कब्रिस्तान की ज़मीन हैं। कब्रिस्तान की जमीन के स्वामित्व के संबंध में, उनमें से अधिकांश (47%) का स्वामित्व DWB के पास है। इसके बाद 29 कब्रिस्तानों (22%) के मामले में जमीन का सामुदायिक स्वामित्व आता है, जिसका अर्थ है गाँव या ग्राम सभा या किसी विशिष्ट जाति समूह का स्वामित्व। जहाँ आठ कब्रिस्तानों के मामले में ज़मीन MCD की है और पाँच कब्रिस्तानों के मामले में DDA की, वहीं 11 कब्रिस्तान ऐसे हैं जो निजी व्यक्तियों की ज़मीन पर बने हैं।</strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7722" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कहते हैं कि जो इलाके किसी खास कब्रिस्तान पर निर्भर होते हैं, वे उसकी भौगोलिक पहुँच के साथ-साथ उस सुविधा पर लोगों की निर्भरता की सीमा को भी दर्शाते हैं। 72 कब्रिस्तानों (सबसे ज़्यादा संख्या) के मामले में, कब्रिस्तानों पर निर्भर सबसे दूर के इलाके दो से पाँच किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। जबकि 19 कब्रिस्तानों के मामले में सबसे दूर के इलाके कब्रिस्तान से छह से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं, 17 कब्रिस्तानों के मामले में सबसे दूर के इलाके दो किलोमीटर से कम दूरी पर और तीन कब्रिस्तानों के मामले में 10 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी पर स्थित हैं। शहर के केवल 32 कब्रिस्तानों में ही नमाज़-ए-जनाज़ा के लिए जगह है और 33 में पानी के बोरवेल हैं। जहाँ 77 कब्रिस्तानों में चारदीवारी है और 31 में स्ट्रीट लाइटें हैं, वहीं केवल 30 में ही गार्ड तैनात हैं। जिन कब्रिस्तानों में चारदीवारी नहीं है, वे खुले मैदानों की तरह हैं। </p>
<p>आयोग ने अपनी रिपोर्ट में एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि शहर में हर साल तकरीबन 13,000 मुस्लिमों का अंतिम संस्कार होता है लेकिन 2017 तक मौजूदा कब्रिस्तानों में 29,370 लोगों को ही दफनाने की जगह बची थी। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इसी हिसाब से दफनाने का सिलसिला जारी रहा तो तो आज से एक साल बाद तक कोई जगह नहीं बचेगी। ऐसे में इसके लिए अभी से जरूरी हल खोजने की जरूरत है। वैसे आधिकारिक रूप से दिल्ली में मुसलमानों की कितनी संख्या है यह तो आगामी जनगणना में आएगी, लेकिन जनगणना 2011 के आंकड़ों से प्राप्त 2026 के अनुमानों के आधार पर, दिल्ली में मुस्लिम आबादी लगभग 1.41 मिलियन के आस-पास है, जो कुल आबादी का लगभग 13% से 15% है। इतना ही नहीं, कब्रिस्तानों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7723" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>इस्तेमाल हो चुकी सभी ज़मीनों का दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है, क्योंकि हमारा धर्म तीन साल बाद कब्रिस्तानों को समतल करने की इजाज़त देता है। कुछ सालों के बाद एक ही परिवार के कई शवों के लिए एक ही कब्र का इस्तेमाल करते हैं। ईसाई कब्रिस्तानों पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि आयोग को सिर्फ़ 13 चालू कब्रिस्तान मिले, जिनमें से एक — कश्मीरी गेट स्थित लोथियन कब्रिस्तान — बंद हो चुका है और उसे एक संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया है। कुल कब्रिस्तानों में से सिर्फ़ पाँच ही शहर के सभी ईसाइयों के लिए खुले हैं, जबकि पाँच कब्रिस्तान सिर्फ़ पारिवारिक कब्रों या एक ही कब्र में दो शव दफनाने (doubling) के लिए खुले हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इनमें से दो कब्रिस्तान — एक ओखला में और दूसरा महरौली में — क्रमशः सिर्फ़ पादरी परिवारों और &#8216;चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया&#8217; के सदस्यों के लिए खुले हैं।</p>
<p><strong>तस्वीरें: संजय शर्मा </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shah-rukh-khans-parents-graves-are-still-alive-today-politics-over-cemeteries-continues-in-delhi">शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद का इंतकाल 35-45 साल पहले हुआ, उनके कब्र आज भी जीवित हैं, लेकिन &#8230;&#8230;​ दिल्ली में कब्रिस्तानों पर राजनीति जारी है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;गोद भराई&#8217; में 60+% की गिरावट: न &#8216;महिला&#8217;, ना &#8216;पुरुष&#8217; सांसद &#8216;गांवों को गोद&#8217; लेना चाहते; ना ही सरकारी, गैर-सरकारी क्षेत्र के निकाय &#8216;धरोहरों को&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Apr 2026 04:04:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[adopt a village]]></category>
		<category><![CDATA[aopt a heritage]]></category>
		<category><![CDATA[archeology]]></category>
		<category><![CDATA[asi]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[heritaghe]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: बारह वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ लिए थे, उन्होंने अक्टूबर महीने के दूसरे सप्ताह में, भारत के संसद के दोनों सदनों के सांसदों से कहा था कि वे अपने और अपनी अर्धांगिनी के गाँव को छोड़कर किसी भी ग्राम पंचायत को आदर्श ग्राम के रूप में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/major-downfall-in-adiopt-a-village-and-adopt-ke-heritage">&#8216;गोद भराई&#8217; में 60+% की गिरावट: न &#8216;महिला&#8217;, ना &#8216;पुरुष&#8217; सांसद &#8216;गांवों को गोद&#8217; लेना चाहते; ना ही सरकारी, गैर-सरकारी क्षेत्र के निकाय &#8216;धरोहरों को&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: बारह वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ लिए थे, उन्होंने अक्टूबर महीने के दूसरे सप्ताह में, भारत के संसद के दोनों सदनों के सांसदों से कहा था कि वे अपने और अपनी अर्धांगिनी के गाँव को छोड़कर किसी भी ग्राम पंचायत को आदर्श ग्राम के रूप में विकसित कर सकते हैं। मैदानी इलाकों में स्थित होने पर गांव की आबादी 3000-5000 होनी चाहिए, जबकि पहाड़ी इलाकों में स्थित होने पर यह आबादी 1000-3000 होनी चाहिए। लोकसभा सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र से एक गाँव चुन सकते हैं, और राज्यसभा सांसद उस राज्य से एक गाँव चुन सकते हैं जहाँ से वे चुने गए हैं। मनोनीत सदस्य देश के किसी भी जिले से एक गाँव चुन सकते हैं। शहरी निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद पड़ोसी ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र से एक गाँव चुन सकते हैं।</strong> </p>
<figure id="attachment_7671" aria-describedby="caption-attachment-7671" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7671" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7671" class="wp-caption-text">दक्षिण दिल्ली के महरौली स्थित एक विरासत। तस्वीर: संजय शर्मा<br /></figcaption></figure>
<p>इस योजना के तहत, सांसदों को 2019 तक तीन-तीन गांवों और 2024 तक कुल आठ-आठ गांवों के सामाजिक-आर्थिक और भौतिक बुनियादी ढांचे के विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पहला आदर्श ग्राम 2016 तक विकसित किया जाना था, और दो और 2019 तक। 2019 से 2024 तक, प्रत्येक सांसद को पांच और आदर्श ग्राम विकसित करने थे। यानी 2,65,000 ग्राम पंचायतों में से कुल 6,433 आदर्श ग्राम 2024 तक बनना तय था। इस योजना के लिए कोई नया कोष आवंटित नहीं किया गया है। कोष जुटाने के लिए इंदिरा आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और पिछड़े क्षेत्रों के अनुदान कोष आदि जैसी मौजूदा योजनाओं से प्राप्त धनराशि का उपयोग करने के साथ-साथ सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस), ग्राम पंचायत का अपना राजस्व, केंद्रीय एवं राज्य वित्त आयोग अनुदान, और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निधि से करना था । </p>
<figure id="attachment_7672" aria-describedby="caption-attachment-7672" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7672" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7672" class="wp-caption-text">चांदनी चौक स्थित बेगम फरजाना का महल । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<blockquote><p>2014 में शुरू हुई &#8216;सांसद आदर्श ग्राम योजना&#8217; के तहत, सांसदों ने लगभग 3,154 &#8211; 3,390 ग्राम पंचायतों (गाँवों) की पहचान की है या उन्हें गोद लिया है। इस योजना का उद्देश्य आदर्श गांवों का विकास करना था। अगस्त 2023 तक पिछले पांच वर्षों में 1,782 ग्राम पंचायतों को गोद लिया गया । इस योजना का शुरुआती लक्ष्य था कि प्रत्येक सांसद 2016 तक एक गाँव और 2019 तक दो और गाँव गोद ले, और 2024 तक कुल 6,433 आदर्श गांव का निर्माण करें।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7673" aria-describedby="caption-attachment-7673" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7673" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7673" class="wp-caption-text">महरौली स्थित जफ़र महल की दीवारें  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>एक रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण (2014-2016) में लगभग 703 सांसदों ने गाँव गोद लिए थे। साल 2014–15 से 2022–23 तक सांसदों ने 3,154 ग्राम पंचायतों को गोद लिया। पहले चरण के बाद गोद लेने की दर में काफी गिरावट आई। बाद के चरणों में, फ़रवरी 2018 तक केवल 97 लोकसभा और 27 राज्यसभा सांसदों ने गांवों को गोद लिया। पहले चरण (2014–16) में लगभग 500 लोकसभा और 203 राज्यसभा सांसदों ने हिस्सा लिया। दूसरे चरण में, गोद लेने की संख्या घटकर 326 लोकसभा और 121 राज्यसभा सांसदों तक रह गई। 2024 की शुरुआत तक, नए गांवों को गोद लेने की दर 2014 की तुलना में 60% कम हो गई है। वैसे सरकार का दवा है कि अब तक राज्य सरकारों द्वारा लगभग 1,184 गाँव आदर्श ग्राम घोषित किए जा चुके हैं।</strong> </p>
<figure id="attachment_7674" aria-describedby="caption-attachment-7674" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7674" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7674" class="wp-caption-text">लालकिले का आतंरिक हिस्सा । तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>आइये, अब &#8216;गांव को गोद लेने की कहानी को भारत के उपस्थित ऐतिहासिक धरोहरों को गोद लेने की कहानी से जोड़ते हैं। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने &#8216;अपनी धरोहर &#8211; अपनी पहचान कार्यक्रम के तहत एक विरासत को गोद लें&#8217; परियोजना शुरू किया। यह पर्यटन मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों का एक साझा प्रयास है। इसका मकसद पूरे भारत में फैले ऐतिहासिक / प्राकृतिक / पर्यटन स्थलों पर पर्यटन से जुड़ी सुविधाओं को विकसित करना है, ताकि उन्हें एक योजनाबद्ध और चरणबद्ध तरीके से पर्यटकों के लिए ज्यादा सुविधाजनक बनाया जा सके। </p>
<figure id="attachment_7675" aria-describedby="caption-attachment-7675" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7675" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7675" class="wp-caption-text">सीरी फोर्ट के अवशेषों के बीच खड़ा एक मस्जिद । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>इस परियोजना का लक्ष्य सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र, कॉर्पोरेट नागरिकों, गैर-सरकारी संस्थाओं, व्यक्तियों और अन्य हितधारकों को ‘स्मारक मित्र&#8217; बनने के लिए प्रोत्साहित करना है। ये लोग कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व के तहत एक टिकाऊ निवेश मॉडल के रूप में, अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार, इन स्थलों पर बुनियादी और उन्नत पर्यटन सुविधाओं को विकसित करने और उन्हें बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी उठाने की बात कही गयी। वे इन सुविधाओं के संचालन और रखरखाव की देखरेख भी करेंगे, ऐसा तय किया गया। “एक विरासत को गोद लें&#8217; कार्यक्रम सबसे पहले पर्यटन मंत्रालय द्वारा सितंबर 2017 में शुरू किया गया था। इसका एक नया रूप, जिसका नाम “एक विरासत गोद लें 2.0” है, संस्कृति मंत्रालय द्वारा सितंबर 2023 में शुरू किया।</strong> </p>
<figure id="attachment_7676" aria-describedby="caption-attachment-7676" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7676" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7676" class="wp-caption-text">हौजखास के अवशेषों के बीच । तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>इसका मकसद आगंतुकों के अनुभव को बेहतर बनाना और गोद लिए गए स्मारक को आगंतुक-अनुकूल बनाना है। इन सुविधाओं को चार मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: स्वच्छता, जिसमें शौचालय, पीने का पानी, कचरा प्रबंधन, शिशु देखभाल कक्ष आदि शामिल हैं; पहुंच, जिसमें रास्ते, बाधा-मुक्त पहुंच, बैटरी से चलने वाले वाहन, संकेत, भूनिर्माण, वाई-फाई सुविधा, पार्किंग आदि शामिल हैं; सुरक्षा, जिसमें सीसीटीवी, रोशनी, प्रकाश व्यवस्था, क्लॉक रूम, प्राथमिक उपचार किट आदि शामिल हैं; और ज्ञान, जिसमें प्रकाशन, स्मृति चिन्ह कियोस्क, सांस्कृतिक/लाइट एंड साउंड शो, एआर/वीआर उपकरण, कैफेटेरिया आदि शामिल हैं।</p>
<figure id="attachment_7677" aria-describedby="caption-attachment-7677" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7677" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7677" class="wp-caption-text">दारा शिकोह का पुस्तकालय । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>इस कार्यक्रम के तहत, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग ने पहले ही बर्ड हेरिटेज फाउंडेशन के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया। लोधी रोड फ्लाईओवर के पास स्थित गोल गुंबद को बर्ड हेरिटेज फाउंडेशन ने सितंबर 2019 से सितंबर 2024 तक के लिए गोद लिया है। वसंत विहार स्थित बारा लाओ का गुंबद को बर्ड हेरिटेज फाउंडेशन ने दिसंबर 2019 से दिसंबर 2024 तक के लिए गोद लिया है। कश्मीरी गेट स्थित दारा शिकोह लाइब्रेरी बिल्डिंग को आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज ट्रस्ट और म्यूजियम एंड आर्ट कंसल्टेंसी ने मार्च 2021 से गोद लिया है। अगस्त 2024 तक 19 समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिनमें पूरे भारत के कुल 66 स्मारक शामिल हैं।</p>
<figure id="attachment_7678" aria-describedby="caption-attachment-7678" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7678" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7678" class="wp-caption-text">दारा शिकोह का पुस्तकालय का पिछला हिस्सा  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>इसके अलावा, छात्रों के बीच शहर के प्राचीन स्मारकों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए सीबीएससी ने भी ‘स्मारक गोद लेने&#8217; कार्यक्रम शुरू किया है। विरासत शिक्षा इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि सक्रिय शिक्षण के माध्यम से छात्रों के लिए इतिहास और सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रम को जीवंत बनाया जा सके, और छोटे बच्चों में जागरूकता बढ़ाई जा सके ताकि वे अतीत और वर्तमान की समझ के आधार पर अपना भविष्य गढ़ सकें। यह परियोजना स्कूलों को अपने आस-पास स्थित किसी भी चुने हुए स्मारक को गोद लेने और पूरे वर्ष विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित करने में सक्षम बनाती है; इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों को 100 वर्ष से अधिक पुराने इन स्मारकों के ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व के बारे में जानकारी मिल सके। </p>
<figure id="attachment_7679" aria-describedby="caption-attachment-7679" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7679" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7679" class="wp-caption-text">पुराना​ किला के अंदर खुदाई  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>इस परियोजना के तहत, छात्रों को स्मारक के संरक्षण में मदद करने के लिए, स्मारक के अंदर और उसके आस-पास से झाड़ियाँ हटाने, साफ-सफाई और धूल-मिट्टी पोंछने जैसे काम करने की अनुमति दी जाती है। स्मारकों के संरक्षण और सुरक्षा से संबंधित विषयों पर जनता के लिए नाटक या लघु-नाटिकाएँ प्रस्तुत करने जैसी गतिविधियों को बोर्ड द्वारा पहले ही रेखांकित किया जा चुका है। इसके अलावा, अन्य गतिविधियों में चित्रकला प्रतियोगिता, प्रश्नोत्तरी, मिट्टी के मॉडल बनाना, वाद-विवाद और तत्काल भाषण, रचनात्मक लेखन, पोस्टर बनाना, फोटोग्राफी प्रदर्शनी और प्रतियोगिता, पोस्टकार्ड और ब्रोशर बनाने की प्रतियोगिता, स्मारक और उसके परिवेश से संबंधित कहानी सुनाने की प्रतियोगिता, तथा पौधे लगाना आदि शामिल हैं। पुरातत्व विभाग पूर्ण सहयोग प्रदान करता है और स्कूलों को CBSE द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, स्थानीय महत्व के किसी प्राचीन या ऐतिहासिक स्मारक को गोद लेने के लिए प्रोत्साहित करता है।</strong></p>
<figure id="attachment_7680" aria-describedby="caption-attachment-7680" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7680" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7680" class="wp-caption-text">​हुमायूँ किला परिसर के अंदर एक विरासत  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<blockquote><p>लेकिन, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गोद लेने वाली प्रथा को देखते हैं, चाहे गाँव की बात हो, ग्राम पंचायत की बात हो, ऐतिहासिक धरोहरों की बात हो, उन तमाम लोक सभा, राज्य सभा के सांसदों, भारत के सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों के निकायों की मानसिकता और उनके गोद इतने छोटे पर गए हैं कि प्रधानमंत्री की बातों को वे सभी &#8216;राजनीतिक नज़रों&#8217; से ही देखते हैं। अगर औसा नहीं होता तो विगत 12 वर्षों में भारत के गाओं का कितना अधिक उन्नयन हुआ होता, या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और संस्कृति मंत्रालय के अधिक आने वाले ऐतिहासिक पुरातत्वों और विरासतों का यह हाल नहीं होता &#8211; जो आज है। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7682" aria-describedby="caption-attachment-7682" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7682" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7682" class="wp-caption-text">सफदरजंग का मकबरा । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>भारत सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के ज़रिए, नियमित रूप से 3,685 से ज़्यादा केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों का रखरखाव करती है। हाल के वर्षों में संरक्षण पर होने वाले खर्च में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। 2024-25 तक हर साल ₹300 करोड़ से ज़्यादा खर्च किए जा रहे हैं। 2024-25 में पूरे भारत में केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों के संरक्षण, परिरक्षण और रखरखाव पर लगभग ₹313.04 करोड़ खर्च किए गए। साल 2023-24 में खर्च ₹443.53 करोड़, 2022-23 में ₹391.93 करोड़ और 2021-22 में ₹269.57 करोड़ था। जबकि पुरानी दिल्ली में 13 संरक्षित स्मारकों के लिए, 2023-24 में खर्च ₹36.57 करोड़ और 2024-25 में ₹24.95 करोड़ था। पुरानी दिल्ली के 13 संरक्षित स्मारक और उनके हिस्से, जिनमें लाल किले का दीवान-ए-आम, मुमताज महल, दीवान-ए-खास, दिल्ली गेट, अजमेरी गेट और अन्य शामिल हैं। </p>
<figure id="attachment_7683" aria-describedby="caption-attachment-7683" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7683" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7683" class="wp-caption-text">उग्रसेन की बाउली । तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>लोकसभा में साझा की गई जानकारी के अनुसार, दिल्ली में संरक्षित स्मारकों के संरक्षण पर खर्च 2020-21 में 24.50 करोड़ था, जो 2021-22 में घटकर 19.09 करोड़ हो गया, और फिर 2022-23 में तेजी से बढ़कर 30.50 करोड़ हो गया। यह 2023-24 में 36.57 करोड़ के शिखर पर पहुँच गया और 2024-25 में घटकर 24.95 करोड़ हो गया। इन सभी वर्षों में खर्च आवंटित राशि का लगभग 100% रहा है। पाँच वर्षों में, पुरानी दिल्ली के संरक्षित स्मारकों के संरक्षण पर कुल 135.61 करोड़ खर्च किए गए हैं। पुरानी दिल्ली की संरक्षित विरासत केवल अलग-अलग लोकप्रिय स्मारकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें किलों, द्वारों, मस्जिदों का एक जाल और यहाँ तक कि शाहजहानाबाद की ऐतिहासिक शहर की दीवार के वे अवशेष भी शामिल हैं, जिन्हें संरक्षित किया गया है। </p>
<figure id="attachment_7684" aria-describedby="caption-attachment-7684" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7684" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7684" class="wp-caption-text">हुमायूँ का मकबरा  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, दिल्ली को एक बहुत ही दुर्लभ और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का वरदान मिला है। इसका कारण यह है कि सदियों से, कई राजवंश दिल्ली में आकर बसे हैं। इतिहास से जुड़ने का एकमात्र असली तरीका वे इमारतें हैं जो अतीत में बनाई गई थीं, और जिन्हें आज &#8216;विरासत इमारतें&#8217; के नाम से जाना जाता है। किसी &#8216;विरासत इमारत&#8217; की पहचान उसके साथ जुड़े समृद्ध इतिहास के कारण करना बहुत ज़रूरी है, न कि उसे केवल एक पुरानी इमारत मान लेना जो सरकार के लिए एक बोझ हो। इसके विपरीत, स्मारकों में पर्यटकों को आकर्षित करने की अपार क्षमता होती है और वे हर मायने में एक राष्ट्र के लिए एक संपत्ति  होते हैं।</strong></p>
<figure id="attachment_7685" aria-describedby="caption-attachment-7685" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7685" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7685" class="wp-caption-text">तुग़लकाबाद किला का अवशेष  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>दुर्भाग्य से, दिल्ली में 1300 से ज्यादा ऐसी विरासत इमारतें होने के बावजूद, हमें इनमें से 100 इमारतों के बारे में भी जानकारी नहीं है। केवल कुछ ही इमारतें जिन्हें सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का माना था, उन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षण के लिए चुना गया, और बाकी अभी भी &#8216;असुरक्षित&#8217; हैं। यह तर्क दिया जा सकता है कि अतीत में बनी हर एक इमारत की रक्षा करना संभव नहीं है . लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन विरासत इमारतों में राजस्व कमाने की अपार क्षमता है।<br />
दिल्ली में लगभग 1300 स्मारकों में से, केवल 174 ही केंद्र द्वारा संरक्षित हैं और राज्य पुरातत्व विभाग लगभग 200 स्मारकों को अपने संरक्षण में लेने की योजना बना रहा है। संरक्षित स्मारकों में से, जो स्मारक ज़्यादा लोकप्रिय हैं, उनकी स्थिति तो अच्छी है, लेकिन दुर्भाग्य से, राष्ट्रीय महत्व के कुछ स्मारकों की स्थिति ठीक नहीं है। एएसआई हाल के दिनों में इन स्मारकों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ प्रयास कर रहा है, और इस पहल के तहत कुछ काम निजी संस्थाओं को आउटसोर्स किया गया है।</p>
<figure id="attachment_7686" aria-describedby="caption-attachment-7686" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7686" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7686" class="wp-caption-text">तुग़लकाबाद किला का अवशेष  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>महत्वपूर्ण बात यह है कि एएसआई केवल उन्हीं स्मारकों का काम आउटसोर्स कर सकता है जो केंद्र द्वारा संरक्षित हैं और जिन पर एएसआई का कानूनी स्वामित्व है। लेकिन कई अन्य महत्वपूर्ण विरासत इमारतें भी हैं जो राष्ट्रीय महत्व की तो नहीं हैं, लेकिन उस स्थान से जुड़े ऐतिहासिक महत्व या अपनी वास्तुकला की उत्कृष्टता के कारण महत्वपूर्ण हैं। यदि इन स्थानों का प्रचार-प्रसार समझदारी से किया जाए और लोगों को ऐसे स्थानों के अस्तित्व के बारे में जागरूक किया जाए, तो इन स्थानों को प्रमुख पर्यटक आकर्षण बनने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा।</p>
<figure id="attachment_7687" aria-describedby="caption-attachment-7687" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7687" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7687" class="wp-caption-text">क़ुतुब मीनार । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>भारत में, संरक्षण का पहला उदाहरण तब देखने को मिला जब सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में वन्यजीवों के संरक्षण का आदेश दिया। फिर 14वीं शताब्दी ईस्वी में, फिरोज शाह तुगलक ने प्राचीन इमारतों की सुरक्षा का आदेश दिया। बाद में, ब्रिटिश शासन के दौरान, 1810 में &#8220;बंगाल रेगुलेशन (XIX)&#8221; और 1817 में &#8220;मद्रास रेगुलेशन (VII)&#8221; पारित किया गया। इन रेगुलेशंस ने सरकार को यह अधिकार दिया कि जब भी सार्वजनिक इमारतों के दुरुपयोग का खतरा हो, तो वह हस्तक्षेप कर सके।</p>
<figure id="attachment_7688" aria-describedby="caption-attachment-7688" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7688" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7688" class="wp-caption-text">दक्षिण दिल्ली में जफ़र महल । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>फिर 1863 में, अधिनियम XX पारित किया गया, जिसने सरकार को &#8220;उन इमारतों को नुकसान से बचाने और संरक्षित करने&#8221; का अधिकार दिया, जो अपनी प्राचीनता या अपने ऐतिहासिक अथवा स्थापत्य मूल्य के लिए उल्लेखनीय थीं। हालाँकि, शाहजहानाबाद में कई ऐतिहासिक संरचनाओं को स्वयं सरकार द्वारा ही नष्ट कर दिया गया। पूरे भारत में ऐतिहासिक संरचनाओं की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान शुरू करने हेतु, 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना की गई। 1904 में &#8220;प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम (VII)&#8221; पारित किया गया, जिसने स्मारकों पर प्रभावी संरक्षण और अधिकार प्रदान किया; और 1905 में पहली बार, दिल्ली में 20 ऐतिहासिक संरचनाओं को संरक्षित करने का आदेश दिया गया।</p>
<figure id="attachment_7689" aria-describedby="caption-attachment-7689" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7689" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7689" class="wp-caption-text">नई सड़क पर (जामा मस्जिद का पिछला हिस्सा) । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>स्वतंत्रता के समय, दिल्ली में 151 इमारतें और परिसर केंद्रीय एएसआई द्वारा संरक्षित थे। 1978 में दिल्ली में राज्य पुरातत्व विभाग की स्थापना की गई, लेकिन उसके पास इमारतों को अधिग्रहित करने या संरक्षित करने की शक्ति का अभाव है, और वह केवल एएसआई द्वारा गैर-अधिसूचित किए गए कुछ स्मारकों की देखरेख करता है। 1984 में, लोगों के बीच सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति जागरूकता जगाने के उद्देश्य से, इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटेक) की स्थापना की गई। भारत का संविधान दो स्तरों पर स्मारकों के संरक्षण का प्रावधान करता है। केंद्र सरकार उन स्मारकों की देखभाल करती है जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना गया है, और &#8216;अन्य स्मारकों&#8217; की देखभाल संबंधित राज्य सरकारों द्वारा की जाती है। लेकिन चूँकि शहर नियोजन के एक हिस्से के रूप में संरक्षण को शामिल करना अनिवार्य नहीं है, इसलिए विभिन्न शहर नियोजन एजेंसियों ने विरासत इमारतों के प्रति बहुत कम चिंता दिखाई है।</strong></p>
<figure id="attachment_7690" aria-describedby="caption-attachment-7690" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7690" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7690" class="wp-caption-text">लालकिला का आतंरिक हिस्सा।  तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>नीतिगत समस्याओं पर विचार करने से पहले, दिल्ली में स्थित स्मारकों की सूची और उनके स्वामित्व के विवरण की जाँच करना महत्वपूर्ण था। स्मारकों की सूची बनाने की ज़रूरत एएसआई को ब्रिटिश काल में ही महसूस हो गई थी, और मौलवी ज़फ़र हसन ने दिल्ली में 1317 इमारतों की एक सूची तैयार की, और 1916 से 1922 के बीच चार खंडों में इस सूची को “दिल्ली की हिंदू और मुस्लिम इमारतें” के रूप में प्रकाशित किया। एएसआई आज भी ज़फ़र हसन की सूची का ही इस्तेमाल करता है, हालाँकि इनमें से कई इमारतें ढह चुकी हैं, गिरा दी गई हैं, या उन पर कब्ज़ा कर लिया गया है।</p>
<figure id="attachment_7691" aria-describedby="caption-attachment-7691" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7691" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7691" class="wp-caption-text">लोधी गार्डन ।  तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>इंटेक के दिल्ली चैप्टर ने दिल्ली में 1200 इमारतों की एक सूची प्रकाशित की है, जिसका नाम है “दिल्ली &#8211; निर्मित विरासत: एक सूची”। इस सूची में हर इमारत का पूरा विवरण है, जिसमें मालिकाना हक का विवरण, इमारत का महत्व, इमारत की मौजूदा हालत आदि शामिल हैं। दिल्ली के सभी स्मारकों में से, एएसआई का दिल्ली सर्कल 174 स्मारकों को अपनी सूची में रखता है, और हाल ही में छपे एक लेख के अनुसार, 250 ऐसे स्मारकों की एक सूची तैयार की गई है जो अभी सुरक्षित नहीं हैं, और जिनकी देखरेख का काम राज्य पुरातत्व विभाग करेगा। एएसआई के मालिकाना हक वाले सभी स्मारक 1958 के “प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम”  के तहत विनाश या अवैध निर्माण से सुरक्षित हैं।</p>
<figure id="attachment_7692" aria-describedby="caption-attachment-7692" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7692" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7692" class="wp-caption-text">कमला मार्किट  ।  तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>संक्षेप में कहें तो, दिल्ली में कई ऐसे स्मारक हैं जो ऐतिहासिक और स्थापत्य की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे सुरक्षित नहीं हैं; और इन विरासत इमारतों को विनाश, अवैध निर्माण या अतिक्रमण से बचाने के लिए कोई नीति मौजूद नहीं है। दिल्ली के स्मारकों की खराब हालत के लिए ASI के अधिकारियों ने एक वजह यह बताई कि उनके पास &#8216;कुशल कर्मचारियों&#8217; की कमी है और सरकारी नीतियाँ उनके विस्तार में रुकावट डालती हैं। यही मुख्य वजह है कि एएसआई कुछ स्मारकों के संरक्षण का काम आउटसोर्स कर रहा है। ASI के अनुसार, स्मारकों का संरक्षण एक बहुत ही कुशल काम है और इसके लिए खास तरह की विशेषज्ञता की ज़रूरत होती है। निजी निर्माण कंपनियों के पास इस तरह की विशेषज्ञता नहीं होती, क्योंकि उन्हें स्मारकों के संरक्षण का कोई सीधा अनुभव नहीं होता। </p>
<figure id="attachment_7693" aria-describedby="caption-attachment-7693" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7693" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7693" class="wp-caption-text">ऐतिहासिक चौंसठ खम्भा।  तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>स्मारकों के संरक्षण से जुड़ी एक बड़ी समस्या यह है कि इसमें किसी भी तरह की गलती की गुंजाइश नहीं होती, क्योंकि जिन इमारतों पर काम किया जा रहा होता है, वे बहुत पुरानी होती हैं और किसी भी देश की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी वजह से, निजी कंपनियों को संरक्षण का काम सौंपते समय एएसआई को बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है और इन कंपनियों द्वारा किए जा रहे काम की बारीकी से निगरानी भी करनी पड़ती है। चूँकि ये स्मारक एएसआई के संरक्षण में हैं, इसलिए वह किसी निजी कंपनी को इनकी ज़िम्मेदारी सौंपने में हिचकिचाता है। लेकिन, एक निजी संरक्षण वास्तुकार के अनुसार, अब ASI को यह बात समझ लेनी चाहिए कि स्मारकों के संरक्षण की ज़िम्मेदारी पुरातत्वविदों की नहीं, बल्कि वास्तुकारों की होनी चाहिए।</p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;&#8230;.. जिन्होंने ऐतिहासिक स्मारकों को गोद लिए जानते हैं वे कौन हैं?</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/major-downfall-in-adiopt-a-village-and-adopt-ke-heritage">&#8216;गोद भराई&#8217; में 60+% की गिरावट: न &#8216;महिला&#8217;, ना &#8216;पुरुष&#8217; सांसद &#8216;गांवों को गोद&#8217; लेना चाहते; ना ही सरकारी, गैर-सरकारी क्षेत्र के निकाय &#8216;धरोहरों को&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>ऐसी भी क्या नाराजगी श्रीमान ज्ञानेश कुमार जी &#8216;आम&#8217; फुटपाथ को &#8216;खास&#8217; बना दिए, भवन के सामने &#8216;मोर्चाबंदी&#8217; कर दिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 Mar 2026 10:21:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[asam]]></category>
		<category><![CDATA[assembly]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अशोक रोड, नई दिल्ली : विडम्बना देखिये। &#8216;निष्पक्ष चुनाव&#8217; का विश्वास दिलाते भारत का चुनाव आयोग एक तरफ जहाँ आगामी महीने में देश के चार राज्यों &#8211; असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी &#8211; में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए आदेश दे दिया है। साथ ही, यह भी फरमान जारी कर दिया [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/when-ordinary-footpath-transformed-into-extraordinary-near-election-commission-office">ऐसी भी क्या नाराजगी श्रीमान ज्ञानेश कुमार जी &#8216;आम&#8217; फुटपाथ को &#8216;खास&#8217; बना दिए, भवन के सामने &#8216;मोर्चाबंदी&#8217; कर दिए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अशोक रोड, नई दिल्ली : विडम्बना देखिये। &#8216;निष्पक्ष चुनाव&#8217; का विश्वास दिलाते भारत का चुनाव आयोग एक तरफ जहाँ आगामी महीने में देश के चार राज्यों &#8211; असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी &#8211; में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए आदेश दे दिया है। साथ ही, यह भी फरमान जारी कर दिया है कि  कोई भी मतदाता मतदान केंद्रों के अंदर मोबाइल फोन नहीं ले जा सकते हैं, ले जाने की अनुमति नहीं होगी, और मतदाताओं को उन्हें फोन बूथ के बाहर रखना होगा। वहीँ, नई दिल्ली में देश के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के नाम से अंकित पटेल चौक के रास्ते, अपने दाहिने हाथ पटेल भवन को छोड़ते जब आप अशोक रोड पर आगे बढ़ेंगे, बाएं हाथ जाने वाली सड़क &#8211; महादेव रोड &#8211; के दाहिने हाथ लाल रंग वाला भारत का निर्वाचन भवन जहाँ से शुरू होता है, वहां से गोल डाकखाना की दिशा में परिसर के अंतिम सीमा तक दिल्ली पुलिस का &#8216;बैरिकेट&#8217; तो लगा ही है, भारत का निर्वाचन आयोग &#8216;स्वयं&#8217; सुरक्षा कवच में तो है ही, वहां पदस्थापित सुरक्षाकर्मियों को आदेश है &#8211; नो फोटोग्राफी &#8211; आप तस्वीर नहीं ले सकते हैं । ऐसी भी क्या नाराजगी श्रीमान ज्ञानेश कुमार जी &#8216;आम&#8217; फुटपाथ को &#8216;खास&#8217; बना दिए। </strong></p>
<p>सुरक्षाकर्मियों का कहना है कि धेराबन्द परिसर के अंदर आकर किसी भी प्रकार की तस्वीर नहीं लिया जा सकता हैं, वीडियो नहीं बनाया जा सकता है। सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा आदेश है। चाहे किसी अखबार या पत्रिका के लिए चुनाव आयोग पत्रकारों का बीट हो या फिर प्रदेश सरकार यह भारत के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा निर्गत कार्डधारक पत्रकार हों, आदेश सभी पर लागू है। लेकिन पटेल चौक की दिशा में महादेव रोड से आगे या फिर दिल्ली पुलिस मुख्यालय भवन के तरफ से या फिर गोल डाकखाना की दिशा में चुनाव आयोग सीमा रेखा के बाद तस्वीर लेने के बारे में वे कुछ नहीं कहे। अब आवक-जावक यातायात की तस्वीर में दिल्ली पुलिस का बैरिकेड आता है तो क्या कर सकते हैं।&#8221; खैर। </p>
<p>भारत के चुनाव आयोग के पहले आयुक्त सुकुमार सेन से लेकर श्रीमती वी एस रमा देवी (,सुकुमार सेन, कल्याण सुंदरम, एसपी सेन वर्मा, नागेंद्र सिंह, टी स्वामीनाथन, एसएल सकधर, आरके त्रिवेदी, आरएसवी पेरी शास्त्री और श्रीमती वीएस रमा देवी (1950-1990) के बारे में किताबों में ही पढ़ा, उन्हें देखा और मिला नहीं। लेकिन जब पटना की पत्रकारिता से कलकत्ता की पत्रकारिता के रास्ते दिल्ली की पत्रकारिता में प्रवेश लिए, पटेल चौक के आगे बाएं हाथ अशोक रोड पर स्थित भारत के चुनाव के कार्यालय में टीएन शेषन चुनाव आयुक्त के रूप में विराजमान हो गए थे। टीएन शेषन के बाद वर्तमान भारत के चुनाव आयुक्त की संख्या 17 वां है। इस बीच एमएस गिल, जेएम लिंगदोह, टीएस कृष्णमूर्ति, बीबी टंडन, एन गोपालस्वामी, नवीन चावला, एसवाई कुरैशी, वीएस संपत, हरिशंकर ब्रह्मा, नसीम जैदी, अचल कुमार ज्योति, ओम प्रकाश रावत, सुनील अरोड़ा, सुशिल चंद्रा, राजीव कुमार और ज्ञानेश कुमार मुख्य चनाव आयुक्त के कार्यालय में विराजमान हुए और अपनी पारी खेलकर नमस्कार करते निकल गए। </p>
<blockquote><p>नब्बे के दशक के बाद दिल्ली के अख़बार वालो, पत्रकारों, छायाकारों, चुनाव विशेषज्ञों, संपादक, राजनीतिक विश्लेषकों और समाज के अन्य संभ्रांत लोगों का भारत के मुख्य चुनाव आयुक्तों के साथ साथ अन्य आयुक्तों के बीच कभी भी, किसी भी विषय को लेकर ऐसी कोई रस्सा-कस्सी नहीं हुआ। यदि हुआ भी (याद नहीं है) तो उसे प्रतिबंधित नहीं किया गया। सम्मानित भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके दो अन्य आयुक्त &#8211; डॉ. सुखबीर सिंह संधू  और डॉ. विवेक जोशी &#8211; इस विषय पर विचार जरूर करेंगे। सब समय है। लेकिन यह भी शोध का विषय है कि निर्वाचन आयोग के दफ्तर के ऐसा क्या हुआ था जो फोटोग्राफी के लिए इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर दी गयी। </p></blockquote>
<p><strong>चार राज्यों में विधानसभा चुनाव </strong></p>
<p>बहरहाल, भारत का चुनाव आयोग विगत दिनों असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की तारीख घोषित कर दिया। असम, केरल और पुडुचेरी में एक चरण में 9 अप्रैल को चुनाव होंगे। जबकि, पश्चिम बंगाल में दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को और तमिलनाडु में एक चरण में 23 अप्रैल को मतदान होगा। इन सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश के चुनावों के नतीजे 4 मई को जारी किए जाएंगे। </p>
<p><strong>पांचों राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चुनाव की घोषणा होने के साथ ही तत्काल प्रभाव से आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। पांच राज्यों-एक केंद्र शासित प्रदेश में 17.4 करोड़ मतदाता हैं। यहां 824 स्थानों पर चुनाव होने हैं। 2021 में इन सभी पांच राज्यों के चुनाव का ऐलान 26 फरवरी को किया गया था। पिछली बार बंगाल में 8 चरणों में चुनाव हुए थे।जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें SIR के बाद तमिलनाडु से सबसे ज्यादा वोटर्स के नाम कटे हैं। चुनाव आयोग ने अनुसार, 27 अक्टूबर 2025 को SIR प्रक्रिया शुरू होने के दौरान राज्य में कुल 6,41,14,587 वोटर थे। करीब चार महीने चली SIR में 74,07,207 लोगों के नाम हटाए गए हैं। राज्य में अब 5,67,07,380 मतदाता पंजीकृत हैं। </strong></p>
<p><strong>पश्चिम बंगाल</strong> दूसरे नंबर पर है जहां करीब 58 लाख लोगों के नाम कटे हैं। फिर केरल में 8 लाख, असम में 2 लाख और पुडुचेरी में सबसे कम 77 हजार लोगों के नाम SIR प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची से हटाए गए। असम में स्पेशल रिवीजन कराया गया था।राजनीतिक विशेष्यों का मानना है कि 14 साल से CM ममता के सामने भाजपा के लिए मुख्य चुनौती है। अगर इस चुनाव में टीएमसी जीती तो ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगी। जयललिता के नाम पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड है।294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में है और यहां बहुमत का आंकड़ा 148 सीटों का है। वर्तमान में टीएमसी के पास 223 सीटें हैं। हालांकि राज्य में 2021 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने 213 और बीजेपी ने 77 सीटें जीती थी।राज्य में हुमायूं कबीर ने टीएमसी से बग़ावत कर अपनी नई पार्टी बना ली है और उन्होंने कुछ इलाकों में एक नया सियासी समीकरण बनाने की कोशिश की है। </p>
<figure id="attachment_7493" aria-describedby="caption-attachment-7493" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7493" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7493" class="wp-caption-text">​अशोक रोड पर स्थित भारत का चुनाव आयोग का कार्यालय। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>उधर, पश्चिम बंगाल के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद निर्वाचन आयोग ने राज्य की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती, गृह सचिव जगदीश प्रसाद मीना, पुलिस महानिदेशक पीयूष पांडेय और कोलकाता पुलिस आयुक्त सुप्रतीम सरकार को हटा दिया। आयोग ने कहा कि हटाए गए अधिकारियों को चुनाव से जुड़ा कोई दायित्व नहीं दिया जाएगा। चुनाव तैयारियों की समीक्षा के बाद यह फैसला लिया गया। तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग द्वारा वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के फेरबदल को &#8220;एक ऐसी पार्टी की घबराहट भरी प्रतिक्रिया&#8221; बताया, जिसे यह एहसास हो गया है कि वह लोकतांत्रिक तरीकों से चुनाव नहीं जीत सकती . हालाँकि, भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस फेरबदल को &#8220;स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की दिशा में एक कदम&#8221; बताया। </p>
<p>जबकि, टीएमसी के प्रवक्ता कुनाल घोष का कहना है कि भाजपा पश्चिम बंगाल की जनता और मुख्यमंत्री के बीच के संबंध को कमजोर नहीं कर पाएगी। भाजपा या केंद्र सरकार राज्यपाल या वरिष्ठ अधिकारियों को बदल सकती है, लेकिन पश्चिम बंगाल के मतदाताओं की सोच नहीं बदल सकती। उनके अनुसार, “आप जिसे चाहें बदल लें, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नहीं बदल सकते। वह भारत की शेरनी हैं और जितना विपक्ष उन्हें निशाना बनाएगा, पार्टी उतनी ही मजबूत होकर उभरेगी।” आरोप लगाया कि आयोग ने राज्य की पहली महिला मुख्य सचिव को “मनमाने और अलोकतांत्रिक तरीके से” हटाया है। उन्होंने केंद्र सरकार पर मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं के लिए राज्य के 1.96 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बकाया राशि रोकने का भी आरोप लगाया। वहीं राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि ईमानदार और निष्पक्ष आईएएस व आईपीएस अधिकारियों को अब कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी दी गई है, जिससे शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित हो सके। </p>
<p><strong>तमिलनाडु</strong> में बीजेपी लगातार अपनी सियासी ताकत बढ़ाने के प्रयास में लगी है। यहां विधानसभा की 234 सीटें है। पिछले विधानसभा चुनाव में डीएमके गठबंधन ने 159 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि एआईएडीएमके को 75 सीटों पर जीत मिली थी। बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु की 4 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि कांग्रेस को 18 सीटों पर जीत मिली थी। तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने राज्य में डिलिमिटेशन को एक बड़ा मुद्दा बनाया है और केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वो दक्षिण भारतीय राज्यों की राजनीतिक ताकत को कम करने की कोशिश कर रही है।  इस बार के चुनाव में तमिलनाडु का मुक़ाबला भी काफ़ी रोचक हो सकता है। </p>
<p>आजादी के बाद लगभग दो दशक तक यहां कांग्रेस की सरकार रही। 1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई और इसके साथ ही राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। 1967 के बाद से तमिलनाडु की राजनीति मुख्य रूप से एआईएडीएमके और डीएमके के बीच घूमती रही है। वर्तमान में एमके स्टालिन की अगुवाई में डीएमके की सरकार है, जो 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आई। पार्टी ने कांग्रेस, वीसीके और वामपंथी दल के साथ गठबंधन किया है। बीजेपी ने कई चुनावों में एआईएडीएमके जैसे दलों के साथ गठबंधन जरूर किया, लेकिन राज्य में उसकी अपनी सरकार नहीं रही। </p>
<figure id="attachment_7494" aria-describedby="caption-attachment-7494" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7494" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/E-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7494" class="wp-caption-text">​अशोक रोड पर स्थित भारत का चुनाव आयोग का कार्यालय और घेराबन्दी । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>इसी तरह, <strong>केरल</strong> देश का इकलौता राज्य है, जहां आज भी वाम पार्टी सत्ता में है। यहां सत्ता बदलने की परंपरा रही है, लेकिन 2021 में वाम मोर्चा ने इस ट्रेंड को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। कांग्रेस गठबंधन की कोशिश इस बार एंटी इनकम्बेंसी को कैश करानी की रहेगी। वहीं, भारतीय जनता पार्टी अब तक केरल में एक भी विधानसभा सीट जीत पाई है। पिछले लोकसभा चुनाव में यहां उसने त्रिशूर लोकसभा सीट जीती थी। इसके अलावा दिसंबर 2025 में भी भाजपा ने पहली बार त्रिवेंद्रम (तिरुवनंतपुरम) नगर निगम का चुनाव जीता।उन्होंने बताया कि आयोग ने युवाओं और पहली बार मतदान करने जा रहे मतदाताओं से भी संवाद किया। इसके अलावा चुनाव प्रक्रिया को सुचारू बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) के काम की भी सराहना की गई। </p>
<p>केरल में विधानसभा की 140 सीटें हैं। 2021 में हुए चुनावों में वामपंथी गठबंधन लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने जीत हासिल की थी। एलडीएफ ने इन चुनावों में 99 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ़ को 41 सीटें मिली थी।राज्य में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 115 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। हालांकि उसे किसी भी सीट पर जीत नहीं मिली थी और पार्टी के 84 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। </p>
<p>जबकि, <strong>असम</strong> में 10 साल से भाजपा की सरकार है।  126 सीटों वाली असम विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 20 मई, 2026 को खत्म होने वाला है। 2016 में 60 सीटों पर जीत हासिल कर पहली बार सत्ता में आई बीजेपी ने 2021 में भी एक जैसा ही प्रदर्शन किया था। बीजेपी ने कुल 93 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 60 सीट पर जीत दर्ज की और उसके नेतृत्व वाले एनडीए ने कुल 126 सीटों में से 75 सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि, 2016 के मुकाबले एनडीए को बीते चुनाव में 11 सीटों का घाटा हुआ था। असम में बीते कुछ दिनों से अल्पसंख्यकों का मुद्दा काफी सुर्खियों में रहा है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा कई बार अपने बयानों की वजह से विवादों में भी रहे हैं। </p>
<p>बहरहाल, मुख्य चुनाव आयोग के अनुसार, ये पांचों राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से काफी अलग हैं। ऐसे में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण कराया गया, ताकि कोई भी योग्य मतदाता वोट देने से वंचित न रह जाए और कोई अयोग्य व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल न हो सके।उन्होंने कहा, “मैं युवाओं से कहना चाहता हूं कि अब आप एक बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने जा रहे हैं, मतदान का अधिकार। अपने वोट का इस्तेमाल गर्व और जिम्मेदारी के साथ करें। आपका वोट आपकी आवाज है। चुनाव का पर्व हम सबका गर्व है।” चुनाव आयोग के अनुसार इन पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में कुल 17.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह संख्या ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी और कनाडा जैसे कई देशों की कुल आबादी के बराबर है। </p>
<p>आयोग के अनुसार, इन चुनावों के लिए 824 विधानसभा सीटों पर मतदान कराया जाएगा। चुनाव प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए 2.19 लाख मतदान केंद्र बनाए गए हैं। इसके अलावा पूरे चुनाव को निष्पक्ष और सुचारू तरीके से कराने के लिए करीब 25 लाख चुनाव अधिकारी और कर्मचारी तैनात किए जाएंगे। वहीं, सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी आयोग ने व्यापक तैयारी की है। मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक चुनाव के दौरान करीब 8.50 लाख सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाएंगे, ताकि मतदान शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल में हो सके। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदान के बाद तुरंत मतदान प्रतिशत की जानकारी जारी की जाएगी। मतदान केंद्रों के अंदर मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं होगी, और मतदाताओं को उन्हें फोन बूथ के बाहर रखना होगा। </p>
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		<title>79 वर्ष की आज़ादी, 34 करोड़ से 147 करोड़ की आबादी, 13% से 79% शैक्षिक-दर और सरस्वती पूजा यानी &#8216;हाते खोड़ी&#8217; अनुष्ठान</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/saraswatipuja-and-indias-literacy-rate</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 25 Jan 2026 13:02:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[artists]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[kolkata]]></category>
		<category><![CDATA[pandaal]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कोलकाता / पटना / नई दिल्ली : विगत दिनों दिल्ली मेट्रो के द्वारका-नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी मार्ग पर चलने वाली ब्लू लाइन मेट्रो से यमुना लिंक के रास्ते बोटानिकल गार्डन जा रहा था। यमुना लिंक से अक्षरधाम के रास्ते जब आगे बढ़ा, गाजियाबाद से दिल्ली की ओर आती सड़क के किनारे खानाबदोशों द्वारा बनायीं गयी मूर्तियों पर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कोलकाता / पटना / नई दिल्ली : विगत दिनों दिल्ली मेट्रो के द्वारका-नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी मार्ग पर चलने वाली ब्लू लाइन मेट्रो से यमुना लिंक के रास्ते बोटानिकल गार्डन जा रहा था। यमुना लिंक से अक्षरधाम के रास्ते जब आगे बढ़ा, गाजियाबाद से दिल्ली की ओर आती सड़क के किनारे खानाबदोशों द्वारा बनायीं गयी मूर्तियों पर आखें टिक गयी। रंग-बिरंगी जीवंत मूर्तियां। सड़क के किनारे अपने जीवन का अहम् हिस्सा जीने वाले ये खानाबदोश हिन्दू पर्व-त्योहारों के अनुसार देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाकर अपनी जिंदगी की अगली साँसों को सुरक्षित रहते हैं। प्रत्येक दो-दो मिनट के अंतराल पर हम मयूर विहार, अशोक नगर और नोएडा के विभिन्न सेक्टरों को पार करते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। शरीर से तो दिल्ली मेट्रो में था लेकिन मन से कभी कोलकाता के कुम्हारटोली तो कभी पटना के बंगाली अखाड़ा में आ-जा रहा था। दो-तीन दिन बाद सरस्वती पूजा का दिवस आने वाला था। </strong></p>
<p>पहले चलते हैं कलकत्ता। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध जब आनंद बाजार पत्रिका समूह के दी टेलीग्राफ / संडे पत्रिका के लिए कार्य करना शुरू किया था तो कलकत्ता शहर जैसे रोजमर्रे की जिंदगी में आ गया था। इंटरनेट का जमाना नहीं था और समाचार प्रेषित करने के दो ही साधन थे। हस्तलिखित समाचार या फ़ीचर आम तौर पर स्वीकार नहीं होता था। टंकित कॉपी ही दिया जाता था। या फिर दूरदरस्त होने पर टेलीफोन / ट्रंक काल से कहानियां लिखा दिया जाता था या फिर स्थानीय डाकघरों से टेलीप्रिंटर के माध्यम से कहानियां तत्काल भेजा जाता था। इसके अलावे कोई दूसरा रास्ता नहीं था। उन दिनों मैं दक्षिण बिहार के धनबाद में पदस्थापित था, लेकिन तत्कालीन सम्पादकों &#8211; एम जे अकबर और शेखर भाटिया (दी टेलीग्राफ) और वीर सांघवी, राजीव बागची, उमेश आनंद (संडे) &#8211; के आदेश से कहीं भी, कभी भी विचरण कर कहानियों को करने, प्रेषित करने की छूट थी। भ्रमण करने का खर्च का वहन दफ्तर कर लिया करता था। उन दिनों मेरे पास यासिका कैमरा था और उसके साथ 42-75 एमएम का लेंस था। यह कमरा धनबाद के बैंक मोड़ स्थित एक मित्र दिए थे। </p>
<p><strong>तत्कालीन दक्षिण बिहार का शायद ही कोई हिस्सा &#8211; रांची, जमशेदपुर, बोकारो, देवघर, दुमका, गुमला, पलामू, गिरिडीह, गोड्डा, पाकुर, खूंटी, रामगढ, घनबाद, कोडरमा, चाईबासा, पुरुलिया, वर्धमान, बीरभूम, आसनसोल, दुर्गापुर आदि &#8211;   बचा था जहाँ इस अदना सा संवाददाता का कदम नहीं पड़ा था जहाँ की कहानियां टेलीग्राफ और सन्डे पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुआ था चाहे लुप्त प्राय बिरहोर जनजाति हो या धधकते भूमिगत कोयला माइंस, या तत्कालीन कोयला सरगनों का लहू लहुआन वर्चस्व चाहे तत्कालीन प्रशासनों का उन माफियाओं और पटना से दिल्ली तक विधान सभा और संसद में बैठे कुर्सी तोड़ते राजनेताओं का मिलीभगत, सभी कभी न कभी अख़बारों के, पत्रिका के पन्नों पर अवतरित जरूर हुए थे। काफी लिखने और नाम के साथ समाचार, फीचर प्रकाशित होने के कारण बिहार-बंगाल सीमा क्षेत्रों के बहुत पाठक पहचानते थे, कुछ नाम से, कुछ चेहरे से। जब कभी भी उनके मोहल्ले में, जिलों में जाते थे, बहुत सम्मान के साथ, आदर-सत्कार के साथ बैठते थे, बात करते थे, खाना भी खिलाते थे &#8211; बिना किसी राजनीति के, बिना यह सोचे कि कल अख़बार में नाम प्रकाशित होगा। कई लोगों से सम्बन्ध आज भी बरकरार है।</strong> </p>
<figure id="attachment_7273" aria-describedby="caption-attachment-7273" style="width: 2042px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13.jpg" alt="" width="2042" height="1225" class="size-full wp-image-7273" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13.jpg 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13-300x180.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13-1024x614.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13-768x461.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-13-1536x921.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7273" class="wp-caption-text">माँ सरस्वती &#8211; तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>इसी क्रम में कई मर्तबा कलकत्ता के कुम्हार टोली (कुमार टोली) भी गया था। यहाँ मूर्तियां बनती है। आज का भूगोल अवश्य बदल गया होगा, लेकिन उन दिनों हावड़ा स्टेशन पर उतरकर स्टेशन के बाहर हाबड़ा ब्रिज से आती सड़क अपने बाएं हाथ मुड़कर जब स्टेशन की दीवार तक पहुँचती थी, तो एक रास्ता दाहिना स्टेशन की ओर जाती थी और दूसरा सामने से निकलती शिवपुर होते आगे निकल जाती थी। उन दिनों नया पुल का निर्माण नहीं हुआ था। शिवपुर की ओर जाने वाली सड़क पार कर हुगली नदी के तट पर बांस-फुस आदि से बने दर्जनों होटलों में से एक होटल, जो इस रास्ते हाबड़ा स्टेशन प्रवेश के ठीक सामने था, माँछ &#8211; भात &#8211; दही और दो सफ़ेद रोसगुल्ला खाकर फेरी के रास्ते निकल जाता था। </p>
<blockquote><p>फेरी पर पैर रखते ही जैसे अपने जन्म के दो साल बाद (1961) भारत के सिनेमाघरों में टंगी फिल्म &#8216;काबुलीवाला&#8217; का गीत जिसके गीतकार थे गुलजार, संगीतकार सलिल चौधरी और गायक हेमंत कुमार थे &#8211; गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे, लहराए पानी में जैसे धूप छाँव रे &#8211; गुनगुनाते कभी बाग़ बाजार तो कभी शोवा बाज़ार अहीर टोला फेरी घाट पर उतरकर पैदल कुमार टोली पहुँच जाते थे। वैसे यहाँ आने के लिए लोकल ट्रेन भी थी, लेकिन फेरी से चलने का मजा ही कुछ और होता था। यह अलग बात थी कि उन दिनों पानी में तैरना नहीं आता था, लेकिन जीवन में तैरना शुरू कर दिए थे तभी तो अपने जन्म स्थान दरभंगा के एक गाँव से पटना के रास्ते कलकत्ता में पत्रकारिता सिखने के लिए तैर रहे थे। कभी कभी बस से भी यात्रा कर लेते थे। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7274" aria-describedby="caption-attachment-7274" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7274" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7274" class="wp-caption-text">तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>हकीकत में यह &#8216;कुम्हार टोली&#8217; है, लेकिन बोल चाल की भाषा में यह &#8216;कुमार टोली&#8217; हो गया। ऐतिहासिक दृष्टि से 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी ने फोर्ट विलियम की एक नई बस्ती बनाने का फैसला किया। इसकी आबादी सुतानाती की ओर चली गई, जबकि जोरासांको और उसके आस-पास के इलाके अमीर लोगों के इलाके बन गया  कंपनी के सीधे आदेशों के तहत शहर के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग कारीगरों के लिए बांटा गया था। जगहों के नाम काम से जुड़े रखे गए, जैसे शराब बेचने वालों के लिए सूरीपारा, तेल बेचने वालों के लिए कोल्लोटोला, बढ़ई के लिए छुत्तरपारा, गाय चराने वालों के लिए अहीरीटोला और कुम्हारों के लिए कुमारटोली। </p>
<p><strong>जब शहर का विकास हुआ और बढ़ा, तो बहुत से लोग इन इलाकों में आकर बस गए, जिससे ये इलाके सिर्फ अपने नामों तक ही सीमित रह गया। हालांकि, उत्तरी कोलकाता के कुमारटोली इलाके के कारीगर बड़ी संख्या में बसे रहे। ये कुम्हार जो नदी के किनारे बर्तन बनाते थे और बाद में उन्हें बाज़ार में बेचते थे, जल्द ही देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने लगे, जिनकी पूजा शहर के आस-पास की हवेलियों और महलों में बहुत लोकप्रिय हो गई। उत्तरी कोलकाता में वैसे यह एक छोटी सी जगह है जहाँ कुम्हारों का बाहुल्य है। लेकिन यह इलाका विश्व पटल पर प्रसिद्ध है। यह जगह पूरे साल पश्चिम बंगाल में अलग-अलग त्योहारों के लिए मिट्टी से भारतीय देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने में अपनी महारत के लिए मशहूर है। वे अपनी मूर्तियां दूसरे देशों और समुदायों को भी निर्यात करते हैं। मूर्ति बेचने वालों की मशहूर सड़क का नाम बनमाली सरकार स्ट्रीट है।</strong></p>
<figure id="attachment_7275" aria-describedby="caption-attachment-7275" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7275" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-12-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7275" class="wp-caption-text">तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>कुमारटोली के बहुत सारे महिला, पुरुष अपने जीवन को इन्हीं मूर्तियों को बनाने में समर्पित कर दिए । दुर्गा पूजा के कई माह पहले से देवी दुर्गा की, सरस्वती पूजा से कई माह पहले से देवी सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां को जीवंत रूप देते आ रहे ते हैं। ईश्वर भी इन्हें जीवित रहने का मार्ग बताते आ रहे हैं।इन मूर्तियों को बनाने की प्रक्रिया बहुत कठिन और जटिल है। यह इस इलाके की गलियों में होती है। कभी कलकत्ता आएं तो बनमाली स्ट्रीट का चक्कर अवश्य लगाएं। कारीगरों को मिटी से मूर्ति और फिर उसका जीवंत स्वरुप देखकर आपका जीवन सफल हो जायेगा। कुमारटुली के काफी पास स्थित बाग बाजार घाट और शारदा देवी घाट का इस्तेमाल दुर्गा पूजा के त्योहार के मौसम में मूर्ति विसर्जन समारोहों के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। कुमारटुली श्यामपुकुर, बरताला, जोरासांको, जोराबगान और हुगली से घिरा हुआ है। </p>
<figure id="attachment_7276" aria-describedby="caption-attachment-7276" style="width: 2037px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14.jpg" alt="" width="2037" height="1033" class="size-full wp-image-7276" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14.jpg 2037w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14-300x152.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14-1024x519.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14-768x389.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-14-1536x779.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2037px) 100vw, 2037px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7276" class="wp-caption-text">इंदिरापुरम (गाजियाबाद) स्थित शिप्रा रिवेरा में आयोजित सरस्वती पूजा के अवसर पर प्रसन्नचित महिलाएं।  कहते हैं इस वर्ष महिलाओं की भागीदारी विशेष थी और सबों ने महिला शक्तियों का बेहतर प्रदर्शन की </figcaption></figure>
<p><strong>बीते दिन सरस्वती पूजा मनाया गया। पंचमी हिंदू पंचांग के अनुसार वसंत ऋतु के आरंभ का प्रतीक है। हिंदू पंचम के अनुसार यह माघ मास के पांचवें दिन मनाई जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, विद्या, संगीत और कला की देवी सरस्वती का जन्म इसी दिन हुआ था। इसलिए, उनसे ज्ञान और कला की प्राप्ति के लिए लोग बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं। दिल्ली शहर में भले दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए यह तारीख महत्वपूर्ण नहीं हो, जितना महत्वपूर्ण उनके लिए दिवाली, लेकिन राष्ट्र की राजधानी में कोलकाता, ओड़िसा या बिहार से प्रवासित लोगों के लिए (अपवाद छोड़कर) सरस्वती पूजा उनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह एकजुटता और सद्भाव को दर्शाता है। उनके लिए सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक उत्सव भी है। बसंत पंचमी के दिन पूरा बुहार, बंगाल ओड़िसा पिले रंग की आभा में डूब जाता है और हर गली में पंडालों की रौनक होती है। यह दिन युवाओं कलाओं और विद्या के प्रति एक अलग ही माहौल बनता है। कहते हैं पीला रंग शांति, समृद्धि और ऊर्जा का प्रतीक है। यह सभी को आशावाद से भर देता है।</strong> </p>
<p>अब आते हैं पटना। आज के ही दिन कोई 55-साल पहले, पहली बार पूर्णिया (गढ़बनैली) से पटना आया था बाबूजी के पास। बाबूजी श्री गोपाल दत्त झा (श्री गोपाल जी) उन दिनों पटना कालेज के सामने बुक सेन्टर किताब की दूकान को छोड़कर श्री तारा बाबू (श्री तारानन्द झा) के पास नोवेल्टी एण्ड कंपनी, प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता दूकान में अपनी नौकरी की शुरुआत किये थे। उन दिनों नोवेल्टी एक मंजिला मकान था। नोवेल्टी के दाहिने तरफ त्रिवेदी स्टूडियो और बाएं सरदारजी की एक बिजली की छोटी सी दूकान कृष्णा स्टोर्स थी। इसी नाम से अब यह दूकान फ़्रेज़र रोड स्थित चांदनी चौक मार्केट (तत्कालीन आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्र के दफ्तर के बगल में) ‌है। कृष्णा स्टोर्स के ठीक बगल में नेशनल बुक डिपो था (जो अब पटना कालेज के सामने है), एक फल वाले की दूकान थी और उसके बाद रीगल होटल।</p>
<figure id="attachment_7277" aria-describedby="caption-attachment-7277" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7277" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7277" class="wp-caption-text">माँ​ और महिलाएं</figcaption></figure>
<p>रीगल के बाद एक किताब की दूकान पुस्तक महल थी, पुस्तक महल के बगल में नालन्दा के रस्तोगी का पुस्तक जगत था ‌(जो अब बीएन कॉलेज के सामने है)। फिर एक दवाई की दूकान। इन दो दुकानों के बीच बीरबल पान वाला था। इस दूकान से चार कदम पर एक रास्ता नीचे लुढ़कती थी, खजान्ची रोड और खजान्ची रोड के ठीक सामने अशोक राज पथ पर दाहिने तरफ था ऐतिहासिक खुदाबख्श पुस्तकालय। नोवेल्टी के दाहिने तरफ तत्कालीन पटना के एक सम्भ्रान्त फोटो स्टूडियो था – त्रिवेदी स्टूडियो। इस स्टूडियो में पटना के सम्भ्रान्त, सुन्दर लोग ही फोटो खिंचवाते थे। फिर थी उषा सिलाई मशीन का प्रशिक्षण केंद्र। इस प्रशिक्षण केंद्र के दाहिने दीवार से लगी कोई चार-फिट की एक छोटी सी किताब की दूकान थी, जो इस भवन के पीछे बेगम साहिबा के आवासीय कालोनी में रहने वाले कोई सज्जन चलाते थे। उनकी एक आँख खराब थी। सिलाई मशीन और इस किताब की दूकान के सामने फुटपाथ पर साईकिल बनाने वाले एक मिस्त्री देवकी जी कार्य करते थे। इस किताब की दूकान से कोई दस फिट दाहिने हरिहर पान वाले की एक दूकान थी और उन्हीं के दूकान से लगी थी एक चश्मे की दूकान । मुझे इस दो-सौ कदम तक ही चहलकदमी करने की इजाजत थी। इससे अधिक नहीं। मैं कोई पांच-छः साल का था। </p>
<blockquote><p>हमारे नोवेल्टी भवन में बाएँ तरफ लोहे का खींचने वाला गेट था, जो एक गली-नुमा रास्ते से 25-कदम चलने के बाद छोटा सा आँगन में निकलता था। आँगन के दाहिने कोने पर एक सीढ़ी थी। आँगन से सड़क की ओर दूकान में प्रवेश का रास्ता था। आम तौर पर आँगन में किताबों के बण्डल, रस्सी, सुतली, गत्ता, क़ैंची, चाकू, सुराही,  रखा होता था। ग्राहकों का किताब तक्षण इस आँगन में बांधा जाता था। यह आँगन और बरामदा हमारे पिता-रूपी ब्रह्माण्ड की दुनिया थी। यहीं रहते थे मेरे बाबूजी, इस दूकान के अंदर ही वे अपना आशियाना बना रखे थे। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7283" aria-describedby="caption-attachment-7283" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7283" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7283" class="wp-caption-text">माँ और कलाकार &#8211; तस्वीर इंटरनेट के सौजन्य से </figcaption></figure>
<p>पूर्णिया से बाद मगध की राजधानी, जहाँ चन्द्रगुप्त मौर्य राजा हुआ करते थे, चाणक्य जैसे उनके गुरु थे – मैं इस राजधानी में पहली बार अपना सर पिता-रूपी ब्रह्माण्ड के नीचे तारा बाबू की दुनिया में अपना सर छुपाया। तारा बाबू को हम सभी “मालिक” कहते थे। बहुत कड़क-मिजाज के थे। अनुशासन उनके जीवन में बहुत महत्व रखता था। समय के बहुत पाबंद थे। मेहनत उनके जीवन का मूल-मंत्र था, गायत्री मन्त्र जैसा। मुझे दूकान के अलावे मछुआ टोली स्थित उनके घर पर आने-जाने की पूरी स्वतंत्रता थी। घर पर हमारे उम्र के उनके पोते-पोतियाँ मुझे अपने घर का हिस्सा ही समझते थे। मुझे आज तक ऐसी कोई घटना याद नहीं है जिसमें हमें उन लोगों की बातों से, व्यवहारों से कोई कष्ट हुआ हो, आत्मा दुखी हुआ हो। उस दिन मैं नहीं जानता था कि नोवेल्टी की भूमि पर ही त्रिनेत्रधारी महादेव मेरे जीवन की रेखाएं खींचने का केन्द्र बिंदु बनाएंगे । लेकिन आज छः दशक बाद भी उन तमाम बातों का याद रखना इस बात का गवाह है कि महादेव को मैं कभी धोखा नहीं दिया। </p>
<p>इस दूकान और दूकान की पुस्तकों की छाया में पटना ही नहीं, अविभाजित बिहार के लाखों-करोड़ों छात्र-छात्राएं विद्यार्थी-अवस्था  से वयस्क हुए, और फिर वृद्ध भी ।  जिस तरह नए किताब के सफ़ेद पन्ने समय और उम्र के साथ अपना रंग बदलते, एक गजब की खुसबू छोड़ते सफ़ेद से सीपिया रंग का हो जाता है, जो इस बात का गवाह होता है की उसने अपने रंग यूँ ही नहीं बदले, बल्कि लोगों को जीने का सबक सीखाते बड़ा हुआ है – पटना के अशोक राज पथ पर स्थित नोवेल्टी एण्ड कम्पनी दूकान की सीढ़ियों पर बैठकर न जाने कितने लोग महज मनुष्य से इन्शान बने और इतिहास में अपना नाम हस्ताक्षरित किये। इस एक-मंजिले मकान में कुछ वर्ष दूकान चलायी गयी। 1966 जनवरी से पुराने एक मंजिला मकान तोड़ना प्रारम्भ कर 12 महीने के भीतर तारा भवन बन गया था ।</p>
<figure id="attachment_7278" aria-describedby="caption-attachment-7278" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7278" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7278" class="wp-caption-text">माँ​ और महिलाएं -तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>उन दिनों पटना अशोक राज पथ के बाएं तरफ पटना विश्वविद्यालय के कालेजों, जैसे पटना कालेज, साइन्स कालेज, मेडिकल कॉलेज का पिछले बॉउंड्री गंगा के किनारे समाप्त होता था। सम्पूर्ण इलाका खुला-खुला था। अशोक राज पथ से दाहिने तरफ कोई आधे-किलोमीटर और कम की दूरी पर एक-एक सड़क दाहिने नीचे निकलती थी, अशोक राज पथ के सामानांतर बारी पथ से मिलती थी। इसी बारी पथ (अब नया टोला) पर जहाँ खजांची रोड बारी पथ से मिलती थी, बाएं हाथ पर नोवेल्टी स्टेशनर्स दूकान थी। यह दूकान, आज की काजीपुर आवासीय मोहल्ला में प्रवेश लेने वाली गली के ठीक सामने स्थित नालंदा ब्लॉक सेन्टर थी। आज की पीढ़ी शायद खजांची रोड का भारत के राजनीतिक मानचित्र पर क्या महत्व है, नहीं जानते होंगे।  इसी खजांची रोड के बीचो-बीच (आधी दूरी अशोक राज पथ और आधी दूरी बरी पथ) दाहिने तरफ एक दो मंजिला मकान पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री श्री विधान चंद्र रॉय का जन्मस्थान है। </strong></p>
<p>विधान चंद्र रॉय का जन्म 1 जुलाई, 1882 को पिता प्रकाश चंद्र रॉय और माता अघोर कामिनी देवी के घर में हुआ था। आज भी वह स्थान बिधान चंद्र रॉय की माता “अघोर” को समर्पित है और वहां एक बच्चों का विद्यालय है – अधोर शिशु विद्या मंदिर।  विधान चंद्र रॉय की प्रारम्भिक शिक्षा पटना के अशोक राज पथ पर स्थित, या यूँ कहें कि आज के नोवेल्टी एंड कंपनी दूकान से कोई पांच सौ गज की दूरी पर स्थित टी के घोष अकादमी और पटना कॉलेजिएट स्कूल में 1897 तक हुआ था। बाद में, उन्होंने आईए प्रेसिडेंसी कालेज कलकत्ता से और बी ए (गणित में सम्मान के साथ) पटना कालेज से किये।   श्री रॉय जनबरी 1948 से जुलाई 1962 तक कोई साढ़े बारह वर्ष तक पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री रहे। </p>
<p>बहरहाल, इस नोवेल्टी में तीन तल्लों में पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहते थे। उन छत्रों में पटना चिकित्सा महाविद्यालय के छात्र भी थे। जहाँ तक सरस्वती पूजा का सवाल है, पटना विश्व्वियालय का सरस्वती पूजा बहुत नाम होता था और बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता था। विश्वविद्यालय के सभी महाविद्यालयों &#8211; पटना विमेंस कॉलेज, बी एन कॉलेज, मगध महिला कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, पटना कॉलेज, साइंस कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, न्यू हॉस्टल, जीडीएस हॉस्टल &#8211; छात्रावास में पूजा अर्चना बहुत धूमधाम से होता था। सत्तर के दशक में कई वर्षों तक मेडिकल कॉलेज में सरस्वती पूजा अर्चना करने का दायित्व बाबूजी पर होता था। वजह था नोवेल्टी में मेडिकल कॉलेज के छात्रों का रहना। मैं उसी भवन में लिफ्ट चलाया करता था। बाबूजी का मेडिकल कालेज के छात्र-छात्राएं बहुत सम्मान करते थे। सरस्वती पूजा के दिन दर्जनों छात्र-छात्राएं बाबूजी के लिए धोती, कुर्ता, छाता, ओढ़ना, अन्न, द्वव्य, अन्न आदि निजी तौर पर भी देते थे। </p>
<figure id="attachment_7279" aria-describedby="caption-attachment-7279" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7279" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7279" class="wp-caption-text">देवी और कलाकार &#8211; तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से </figcaption></figure>
<p>उस साल मेडिकल कालेज में अंतिम वर्ष के छात्र एक सरदार जी थे। देखने में बेहद सुन्दर और पढ़ने में अति कुशाग्र। कभी भी उनका परीक्षा परिणाम शिथिल नहीं हुआ था। कालेज के सभी छात्र छात्राएं, चाहे सहपाठी हों या कनिष्ठ, शिक्षक हों या शिक्षकेत्तर कर्मचारी, सभी के लिए वे सम्मानित थे। उन्हें अपने की वर्ग की एक छात्र से, जो पढ़ने में बहुत अब्बल थी, विशेष लगाव था । वर्ग के छात्र-छात्राओं के अलावे परिसर के सभी व्यक्ति उनका भी बहुत सम्मान करत्ते थे। सरदार जी का मन उस महिला सहपाठी के प्रति सकारात्मक था।  मन ही मन बहुत प्रेम करते थे उसे। अभी पूजा के लिए विधि-विधान चल रहा था। बाबूजी सरस्वती की मूर्ति के सामने पूजा अर्चना के लिए सामग्रियां एकत्रित कर रहे थे। अंतिम वर्ष के छात्र होने के कारण सभी यह जानते थे कि अगले वर्ष की पूजा में कौन कहाँ रहेंगे यह मालूम नहीं। सरदार जी नोवेल्टी अक्सर आते थे। </p>
<p><strong>पूजा के सामने कई मन प्रसाद, वस्त्र, मिठाइयां, बुँदिया आदि रखे थे। सम्पूर्ण वातावरण में पुष्प-धुप-दीप का सुगंध उपस्थित था। बाबूजी पूजा अर्चना में मग्न थे। जैसे ही बाबूजी अपने हाथ में आरती के लिए थाली सजाये, दीप प्रज्वलित किये, बगल से एक अंतिम वर्ष की छात्रा कहती है: &#8220;अन्नू बोल दो। पंडित जी बैठे हैं।&#8221; अचानक सभी की निगाहें &#8216;अन्नू जी&#8217; की और उठ गयी और वे सामने सरदजी को देखकर जमीन की ओर देखने लगी। सरदार जी समझ गए। वे भी चाहते थे कुछ ऐसा ही माहौल बने जिससे मन की बात मुख होठों पर आ जाये। वे आगे बढ़े और बाबूजी का हाथ पकड़कर कहते हैं: &#8220;गोपाल बाबू, मेरे पिताजी तो अभी यहाँ उपस्थित नहीं हैं, लेकिन आपको, माँ सरस्वती को और यहाँ उपस्थित सभी मित्र मंडलियों को साक्षी मानकर मैं अनु जी से विवाह करने का प्रस्ताव रखता हूँ यदि वह स्वीकार करे। सम्पूर्ण वातावरण प्रेममय हो गया। अन्नू जी आगे आयीं और देवी सरस्वती की पैरों से अबीर उठाकर सरदार जी के गालों पर लगा दी।&#8221; आज भी वह दृश्य याद आता है तो मन प्रसन्नचित हो जाता है। </strong></p>
<figure id="attachment_7280" aria-describedby="caption-attachment-7280" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7280" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7280" class="wp-caption-text">माँ, देवी और पूजा-अर्चना &#8211; तस्वीर-इंटरनेट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>आम तौर पर पटना में सरस्वती पूजा के सात दिन पहले से स्थान की साफ़ सफाई, चंदा एकत्रीकरण, प्रसाद आदि का विवरण, आगंतुकों की संख्या पर विचार विमर्श प्रारम्भ हो जाता था। शहर के जितने विद्यालय, महाविद्यालय, छात्रावास होते थे, पूजनोत्सव का माहौल बन जाता था। न्यूनतम दो दिन का अवकाश तो होता ही था। सरस्वती पूजा के दिन कोई भी पढ़ने-लिखने का नाम नहीं लेता था। इस दिवस को समयांतराल माता-पिता अपने-अपने पुत्र-पुत्रियों के लिए &#8216;वर&#8217; अथवा  &#8216;वधु&#8217; देखने के लिए भी करने लगे थे ।</p>
<p>जब 1975 में पटना से प्रकाशित आर्यावर्त और इंडियन नेशन पत्र-समूह में नौकरी शुरू किया, महज माध्यमिक कक्षा उत्तीर्ण का प्रमाण पत्र और आगे पढ़ने की भूख लिए पत्रकारिता की पहली सीढ़ी पर पैर रखा तो पटना शहर में सरस्वती की प्रतिमा को बनाने वालों के जगहों पर आना-जाना शुरू हुआ, कुछ कहानी के लिए तो कभी तस्वीरों के लिए। उस ज़माने में मैं &#8216;टेनिया&#8217; के रूप में अपने वरिष्ठ संवाददाता और छायाकार की सवारी के पीछे बैठ जाया करता था। पटना सिटी के अलावे गाँधी मैदान के दक्षिणी कोने पर जहाँ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भवन के सामने और गाँधी मैदान थाना के बीच खाली स्थान में कलाकार मूर्तियां बनाते थे। यही कालिदास रंगालय भी हुआ करता था। इस स्थान के अलावे मूर्तियां इनकम टैक्स भवन से बाएं हाथ जाती सड़क, जहाँ परिवहन भवन होता था, के बाएं हाथ खुले मैदान में भी मूर्तियां बनायीं जाती थी। इसके अलावे बांस घाट से आगे राजपुर के पास, जहाँ से बाएं हाथ बोरिंग केनाल रोड के लिए लुढ़कते थे, खाली स्थानों पर मूर्तियां बनती थी। </p>
<figure id="attachment_7281" aria-describedby="caption-attachment-7281" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7281" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7281" class="wp-caption-text">तस्वीर पंकज प्रसून के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>उस ज़माने के सर्चलाइट के संवाददाता लव कुमार मिश्र</strong>, जो बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार हुए कहते हैं: &#8220;उस जमाने में मैं गर्दनी बाग़ में रहता था। हमारे इलाके के ठाकुरबाड़ी में भी सरस्वती पूजा बहुत धूमधाम से होता था, लेकिन हम निश्चित तौर पर साईकिल उठाकर पहले अपने कालेज (पटना कालेज) पहुँचते थे, जहाँ कॉमन रूम के तरफ इसका आयोजन होता था। यहाँ से पटना कालेज परिसर के सभी छात्रावासों के रास्ते जीडीएस महिला छात्रावास, साइंस कालेज होते लॉ कालेज तक पहुँचते थे। इस बीच जहाँ जहाँ प्रसाद मिलता था साइकिल के बास्केट में रखते कहते थे। लॉ कालेज से मेरा सीधा गंतव्य मगध महिला कॉलेज होता था। उन दिनों मैं सर्चलाइट में काम करना शुरू कर दिया था, काफी इज्जत होती थी। मगध महिला कालेज में पूजा-अर्चा का भार डॉ.वीणा कर्ण पर होती थी, इसलिए वे कभी भी लड्डू, बुंदिया देने में कोताही नहीं करती थी। बैर, केला या अन्य फल-फूल को पहले ही हटा देती थी। आज समय के साथ-साथ सोच में भी परिवर्तन हो गया है।&#8221;</p>
<p>आज के <strong>वरिष्ठ पत्रकार और उन दिनों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र पटना सिटी मंगल तालाब के ज्ञान वर्धन मिश्र</strong> कहते हैं: &#8220;उन दिनों चुकी निजी क्षेत्र के विद्यालयों का कुकुरमुत्तों जैसा विकास नहीं हुआ था, सभी सरकारी विद्यालय थे, सरस्वती पूजा बहुत ही धूम हम से मनाया जाता था। माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मेरे पिताजी (श्री रामजी मिश्र मनोहर&#8217;) मुझे पटना सिटी के गुरु गोविंद सिंह कालेज में नामांकन करा दिए। हमारे कॉलेज में सरस्वती की मूर्ति नहीं बैठती थी। उसी वर्ष छात्र संघ का चुनाव हुआ और हम विद्यार्थी परिषद के तरफ से मंत्री के रूप में चुने गए। फिर उस वर्ष आयोजित सरस्वती पूजा में पहली बार मूर्ति की स्थापना हुयी। उस समय कॉलेज के प्राचार्य थे सरदार बलवंत सिंह, जो बाद में मेरी इस हरकत के लिए कार्रवाई करने पर आमादा थे। वे काफी डराए, धमकाए। किसी की हिम्मत नहीं थी की उस कॉलेज में मूर्ति पूजन करे। खैर उस वर्ष बहुत ही धूमधाम से पूजा संपन्न हुआ। इंटर पास होते ही मैं वहां से पटना कालेज की ओर भागा। </p>
<figure id="attachment_7282" aria-describedby="caption-attachment-7282" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7282" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/P-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7282" class="wp-caption-text">तस्वीर पंकज प्रसून के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, आज देश के विद्यालयों में, खासकर निजी क्षेत्र के विद्यालयों में सरस्वती पूजा अर्चना करने की परंपरा समाप्त ही नहीं, लुप्त हो गयी है। अपवाद छोड़कर छुट्टियां भी नहीं होती। छात्र-छात्राएं भले विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करते हों, लेकिन विद्या की देवी की पूजा अर्चना नहीं होती है। न शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुख अथवा स्थानीय प्रशासन ही इस दिशा में कोई पहल करती। हाँ, इस वर्ष दिल्ली के साथ साथ उत्तर प्रदेश, बिहार  में सरस्वती पूजा के दिन अवकाश की घोषणा की गयी &#8211; वह भी रिस्ट्रिक्टेड। इतना ही नहीं, आगामी 15 अगस्त को हम अपनी आजादी जा 79 वर्षगांठ मनाएंगे और इन 79 वर्षों में देश की आबादी में जितना इजाफा हुआ, शैक्षणिक स्तर में हम पीछे रह गए, आप माने अथवा नहीं। सं १९४७ में देश की आवादी करीब 34 करोड़ थी और आज 79 वर्षों में 147 करोड़ का अनुमान लगा रहे हैं। आंकड़ा यह बताता है कि आज़ादी के वक्त देश में शैक्षिक दर तक़रीबन 13 फीसदी थी। आज 79 वर्ष के बाद व्यावहारिक रूप से 79 फीसदी भजि नहीं पार किये हैं। सैद्धान्ति रूप से आंकड़ा जो भी लिखा जाय।</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/saraswatipuja-and-indias-literacy-rate">79 वर्ष की आज़ादी, 34 करोड़ से 147 करोड़ की आबादी, 13% से 79% शैक्षिक-दर और सरस्वती पूजा यानी &#8216;हाते खोड़ी&#8217; अनुष्ठान</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>किला राय पिथौरा:  भारत की विरासत भारत लौटी: धन्यवाद प्रधानमंत्री, धन्यवाद गोदरेज</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/qila-rai-pithora-indias-heritage-returns-to-india-thank-you-prime-minister</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 03 Jan 2026 12:47:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[buddha]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[heritage]]></category>
		<category><![CDATA[Mehrauli]]></category>
		<category><![CDATA[Quila Rai Pithoura]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>किला राय पिथौरा: भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सवा सौ साल के इंतज़ार के बाद, भारत की विरासत लौटी है, भारत की धरोहर लौटी है। आज से भारतीय जन-मानस, भगवान बुद्ध के इन पवित्र अवशेषों के दर्शन कर पाएगा, भगवान बुद्ध का आशीर्वाद ले पाएगा।  प्रधानमंत्री ने कहा कि &#8216;मैं इस शुभ-अवसर पर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किला राय पिथौरा: भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सवा सौ साल के इंतज़ार के बाद, भारत की विरासत लौटी है, भारत की धरोहर लौटी है। आज से भारतीय जन-मानस, भगवान बुद्ध के इन पवित्र अवशेषों के दर्शन कर पाएगा, भगवान बुद्ध का आशीर्वाद ले पाएगा।</strong> </p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि &#8216;मैं इस शुभ-अवसर पर यहां उपस्थित, सभी अतिथियों का स्वागत और अभिनंदन करता हूं। इस पावन अवसर पर, बौद्ध परंपरा से जुड़े भिक्षु और धर्माचार्य भी हमें आशीर्वाद देने के लिए यहां उपस्थित हैं। मैं आप सभी का वंदन करता हूं। आप सभी की उपस्थिति, इस आयोजन को नई ऊंचाई, नई ऊर्जा दे रही है। 2026 की शुरुआत में ही ये शुभ उत्सव, बहुत प्रेरणादायी है। और मेरे लिए भी सौभाग्य है कि 2026 का मेरा यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम है, जो भगवान बुद्ध के चरणों से शुरू हो रहा है। मेरी कामना है, भगवान बुद्ध के आशीर्वाद से, 2026, दुनिया के लिए शांति, समृद्धि और सद्भाव का नया दौर लेकर के आए।&#8217;</p>
<figure id="attachment_7222" aria-describedby="caption-attachment-7222" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200320.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200320.jpg" alt="" width="2200" height="1872" class="size-full wp-image-7222" /></a><figcaption id="caption-attachment-7222" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में भगवान बुद्ध से संबंधित पवित्र पिपरहवा अवशेषों की ग्रैंड इंटरनेशनल प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर PHOTO:PIB</figcaption></figure>
<p>दक्षिणी दिल्ली के किला राय पिथौरा में भगवान् बुद्ध से सम्बंधित पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि &#8216;जिस स्थान पर ये प्रदर्शनी लगी है, वो भी अपने आप में विशेष है। किला राय पिथौरा का ये स्थान, भारत के गौरवशाली इतिहास की यशभूमि है, इस ऐतिहासिक किले के इर्द-गिर्द, लगभग एक हजार साल पहले, उस समय के पूर्व शासकों ने, एक दृढ़ और मजबूत सुरक्षित दीवारों से घिरे नगर की स्थापना की थी। आज उसी ऐतिहासिक नगर परिसर में, हम अपने इतिहास की एक आध्यात्मिक और पुण्य गाथा को जोड़ रहे हैं।&#8217;</p>
<figure id="attachment_7223" aria-describedby="caption-attachment-7223" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200323.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200323.jpg" alt="" width="2200" height="1778" class="size-full wp-image-7223" /></a><figcaption id="caption-attachment-7223" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में भगवान बुद्ध से संबंधित पवित्र पिपरहवा अवशेषों की ग्रैंड इंटरनेशनल प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर PHOTO:PIB</figcaption></figure>
<p>भगवान बुद्ध से जुड़े ये पवित्र रेलिक्स, भारत की विरासत हैं, शताब्दी भर की प्रतीक्षा के बाद, ये धरोहरें फिर से भारत लौटी हैं, इसलिए मैं देश भर के लोगों से भी कहूंगा, कि वो इन पुण्य अवशेषों के दर्शन के लिए, भगवान बुद्ध के विचारों से जुड़ने के लिए, एक बार यहां अवश्य आएं। हमारे जो स्कूल के विद्यार्थी हैं, जो कॉलेज के स्टूडेंट्स हैं, जो युवा साथी हैं, जो बेटे-बेटियां हैं, वो इस प्रदर्शनी को जरूर देखें। ये प्रदर्शनी, हमारे अतीत के गौरव को, हमारे भविष्य के सपनों से जोड़ने का बहुत बड़ा माध्यम है। मैं देश भर के लोगों से आग्रह करूंगा, कि वो इस प्रदर्शनी में जरूर सहभागिता करें। </p>
<p>उन्होंने कहा कि &#8216;भगवान बुद्ध के पवित्र रेलिक्स को अपने बीच पाकर हम सभी धन्य हैं। इनका भारत से बाहर जाना और लौटकर फिर भारत आना, ये दोनों ही पड़ाव अपने आप में बहुत बड़ा सबक हैं। सबक ये है कि गुलामी सिर्फ राजनीतिक और आर्थिक नहीं होती, गुलामी, हमारी विरासत को भी तबाह कर देती है। भगवान बुद्ध के पवित्र रेलिक्स के साथ भी यही हुआ। गुलामी के कालखंड में इन्हें भारत से छीना गया, और तब से करीब सवा सौ साल तक, ये देश से बाहर ही रहे। जो लोग इन्हें भारत से लेकर गए थे, उनके वंशजों के लिए तो ये सिर्फ निर्जीव एंटीक पीस ही थे। इसलिए उन्होंने इन पवित्र अवशेषों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नीलाम करने का प्रयास किया, लेकिन भारत के लिए तो, ये पवित्र रेलिक्स हमारे आराध्य का ही एक अंश है, हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग है। इसलिए भारत ने तय किया कि हम इनकी सार्वजनिक नीलामी नहीं होने देंगे। और मैं आज गोदरेज समूह का भी आभार व्यक्त करता हूं, उनके सहयोग से भगवान बुद्ध से जुड़े ये पवित्र अवशेष, भगवान बुद्ध की कर्मभूमि, उनकी चिंतनभूमि और उनकी महाबोधि भूमि और उनकी महा-परिनिर्वाण भूमि पर वापस लौटे हैं।&#8217;</p>
<figure id="attachment_7224" aria-describedby="caption-attachment-7224" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200297.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200297.jpg" alt="" width="2200" height="1401" class="size-full wp-image-7224" /></a><figcaption id="caption-attachment-7224" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री ने 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में &#8216;द लाइट एंड द लोटस रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन&#8217; नाम की प्रदर्शनी का दौरा किया।</figcaption></figure>
<p>इतिहास कहता है कि सन् 1160 में चौहान शासकों ने तोमरों से दिल्ली छीन ली और उनके दुर्ग लाल कोट पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने लाल कोट का विस्तार किया और यह किला राय पिथौरा के नाम से जाना जाने लगा। 1192 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस पर अधिकार कर लिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। महरौली-बदरपुर रोड और अधचीनी से कुतुब मीनार जाने वाली सड़क किला राय पिथौरा को काटती हुई जाती है। दिल्ली के चौथे प्राचीन शहर माने जाने वाले जहांपनाह की दीवार किला राय पिथौरा से मिलती है। जहांपनाह की यह दीवार साकेत में प्रेस एनक्लेव एरिया के पास किला राय पिथौरा की दीवार से मिलती है। जहांपनाह को मोहम्मद बिन तुगलक (1325-51) ने पहले दो प्राचीन शहरों किला राय पिथौरा और सीरी के बीच बसे इलाके को घेरकर बसाया था।</p>
<figure id="attachment_7225" aria-describedby="caption-attachment-7225" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200310.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200310.jpg" alt="" width="2200" height="2212" class="size-full wp-image-7225" /></a><figcaption id="caption-attachment-7225" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री ने 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में &#8216;द लाइट एंड द लोटस रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन&#8217; नाम की प्रदर्शनी का दौरा किया।</figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत केवल भगवान बुद्ध के पावन अवशेषों का संरक्षक नहीं है, बल्कि उनकी परंपरा का जीवंत वाहक भी है। पिपरहवा, वैशाली, देवनी मोरी और नागार्जुनकोंडा से प्राप्त भगवान बुद्ध से जुड़े अवशेष, बुद्ध के संदेश की जीवित उपस्थिति हैं। भारत ने इन अवशेषों को, साइंस और आध्यात्म, हर रूप में संभाला है, सहेजा है। उन्होंने कहा कि भारत का ये भी निरंतर प्रयास रहा है, कि दुनिया में बौद्ध विरासत से जुड़े भी स्थान हों, जो भी स्थान हों, उनके विकास के लिए हम यथासंभव योगदान दे सकें। जब नेपाल में आए भीषण भूकंप ने प्राचीन स्तूपों को नुकसान पहुंचाया, तो भारत ने इसके पुनर्निर्माण में सहयोग दिया। म्यांमार के बागान में आए भूकंप के बाद, हमने 11 से अधिक पगोडाओं का संरक्षण किया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। भारत में भी बौद्ध परंपरा से जुड़े स्थानों और अवशेषों की खोज, और उनके संरक्षण का काम निरंतर चल रहा है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि &#8216;हमारा प्रयास है कि बौद्ध विरासत, सहज रूप से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे। वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन, वैशाख और आषाढ़ पूर्णिमा जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के पीछे यही सोच है। आप सभी जानते हैं, कि भगवान बुद्ध के अभिधम्म, उनकी वाणी, उनकी शिक्षाएं मूल रूप से पाली भाषा में हैं। हमारा प्रयास है कि पाली भाषा सामान्य जन तक पहुंचे। इसके लिए पाली को क्लासिकल लैंग्वेज का दर्जा दिया गया है। इससे धम्म को, उसके मूल भाव को समझना और समझाना और अधिक आसान हो जाएगा। इससे बौद्ध परंपरा से जुड़ी रिसर्च को भी बल मिलेगा। </p>
<p>भगवान बुद्ध के जीवन दर्शन ने सीमाओं और भौगोलिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर, दुनिया को एक नई राह दिखाई है। भवतु सब्ब मंगलम्] रक्खन्तु सब्ब देवता, सब्ब बुद्धानुभावेन&#8221;सदा सुत्ति भवन्तु ते। इसमें पूरे विश्व के कल्याण की ही तो कामना है। भगवान बुद्ध ने पूरी मानवता को अतिवाद से बचाने का प्रयास करते हुए, अपने अनुयायियों से कहा- &#8221; अत्त दीपो भव भिक्खवे! परीक्ष्य भिक्षवो ग्राह्यम्, मद्वचो न तु गौरवात्।&#8221; अर्थात भिक्खुओं, अपना दीपक स्वयं बनो। मेरे वचनों की भी परीक्षा करके उनका ग्रहण करो, सिर्फ मेरे प्रति आदर के कारण नहीं।</p>
<figure id="attachment_7226" aria-describedby="caption-attachment-7226" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200314.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200314.jpg" alt="" width="2200" height="1442" class="size-full wp-image-7226" /></a><figcaption id="caption-attachment-7226" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री ने 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में &#8216;द लाइट एंड द लोटस रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन&#8217; नाम की प्रदर्शनी का दौरा किया।</figcaption></figure>
<p>उन्होंने कहा कि &#8216;मैं खुद को बहुत भाग्यशाली समझता हूं, क्योंकि भगवान बुद्ध का मेरे जीवन में बहुत ही गहरा स्थान रहा है। मेरा जन्म जिस वडनगर में हुआ, वो बौद्ध शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र था। जिस भूमि पर भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम उपदेश दिए, वो सारनाथ आज मेरी कर्मभूमि है। जब मैं सरकार के दायित्वों से दूर था, तब भी मैं एक तीर्थयात्री के रूप में बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा करता रहता था। प्रधानमंत्री के रूप में तो मुझे दुनियाभर में बौद्ध तीर्थों में जाने का सौभाग्य मिला है। नेपाल के लुम्बिनी में, पवित्र मायादेवी मंदिर में नतमस्तक होना, अपने आप में अद्भुत अनुभव था। जापान में तो-जी मंदिर और किंकाकु-जी में, मैंने महसूस किया कि बुद्ध का संदेश समय की सीमाओं से आगे है। मैं चीन में शीआन की बिग वाइल्ड गूज पैगोडा में, वहां भी गया, जहाँ से बौद्ध ग्रंथ पूरे एशिया में पहुँचे, वहां भारत की भूमिका आज भी स्मरण की जाती है। मैं मंगोलिया के गंदन मठ में गया, तो मैंने देखा कि लोगों की आँखों में बुद्ध की विरासत से कितना जुड़ाव है। श्रीलंका के अनुराधापुरा में जया श्री महाबोधि के दर्शन करना, उस परंपरा से जुड़ने का एहसास था, जिसके बीज सम्राट अशोक, भिक्कू महेंदा और संघमित्रा जी ने बोए थे। थाईलैंड के वाट फो और सिंगापुर के बुद्ध टूथ रेलिक मंदिर की यात्राओं ने, भगवान बुद्ध के संदेशों के प्रभाव को लेकर मेरी समझ को और गहराई दी। </p>
<figure id="attachment_7227" aria-describedby="caption-attachment-7227" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200305.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/H20260103200305.jpg" alt="" width="2200" height="1747" class="size-full wp-image-7227" /></a><figcaption id="caption-attachment-7227" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री ने 03 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में &#8216;द लाइट एंड द लोटस रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन&#8217; नाम की प्रदर्शनी का दौरा किया।</figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री के कहा कि पिछले 10–11 वर्षों में भारत ने बौद्ध स्थलों को आधुनिकता से जोड़ने का भी प्रयास किया है। बोधगया में कन्वेंशन सेंटर और मेडिटेशन व एक्सपीरियंस सेंटर बनाया गया है। सारनाथ में धमेख स्तूप पर लाइट एंड साउंड शो और बुद्ध थीम पार्क का निर्माण किया गया है। श्रावस्ती, कपिलवस्तु और कुशीनगर में, आधुनिक सुविधाओं का निर्माण किया गया है। तेलंगाना के नालगोंडा में एक डिजिटल एक्सपीरिएंस सेंटर बनाया गया है। सांची, नागार्जुन सागर, अमरावती, इन सभी जगहों पर तीर्थयात्रियों के लिए नई सुविधाएं विकसित की गई हैं। आज देश में एक  बौद्ध सर्किट बनाया जा रहा है, ताकि भारत के सभी बौद्ध तीर्थ स्थलों की आपस में बेहतर कनेक्टिविटी हो, और दुनियाभर के तीर्थयात्रियों को आस्था और आध्यात्म का एक बेहतरीन अनुभव मिल सके।</p>
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		<title>ना भैय्या !!! जीवन में फिर कभी दरभंगा नहीं आऊंगा : छाया पत्रकार रवि बत्रा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 29 Jun 2025 04:15:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[dilli]]></category>
		<category><![CDATA[garib rath]]></category>
		<category><![CDATA[railway]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा / नई दिल्ली : भारत सरकार में भारतीय रेल को देखने के लिए तीन मंत्री हैं &#8211; अश्विनी वैष्णव और उनके दो सहयोगी &#8211; रावणीत सिंह तथा वी. सोमन्ना। मुझे उम्मीद है इन तीनों मंत्रियों में आज तक कोई दिल्ली से बिहार के शहरों की ओर यात्रा नहीं किये होंगे। अपवाद स्वरूप अगर &#8216;राजनीति&#8217; [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा / नई दिल्ली : भारत सरकार में भारतीय रेल को देखने के लिए तीन मंत्री हैं &#8211; अश्विनी वैष्णव और उनके दो सहयोगी &#8211; रावणीत सिंह तथा वी. सोमन्ना। मुझे उम्मीद है इन तीनों मंत्रियों में आज तक कोई दिल्ली से बिहार के शहरों की ओर यात्रा नहीं किये होंगे। अपवाद स्वरूप अगर &#8216;राजनीति&#8217; के लिए गए भी होंगे, तो रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष से लेकर भारतीय रेल के चपरासी तक, सभी स्टेशनों पर नतमस्तक रहे होंगे। आखिर सबकी नौकरी का सवाल है। यात्रा के दौरान दिल्ली के बाद उत्तर प्रदेश का भूभाग आता है और फिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्य का चौहद्दी। उम्मीद है नीतीश कुमार भी शायद ही ट्रेन में सफर करते होंगे, खासकर भारत के मुख्यमंत्रियों की कार्यकाल की सूची में जबसे सबसे लम्बी अवधि के मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज हुए। </strong></p>
<p>विगत दिनों दिल्ली के एक प्रख्यात छाया पत्रकार और मेरे इंडियन एक्सप्रेस के पुराने सहकर्मी रवि बत्रा को बिहार चुनाव के मद्देनजर, बिहार में विकास के दावे के मद्देनजर, एक विदेशी असाइनमेंट के सिलसिले में &#8216;आम मतदाता&#8217; के रूप में दिल्ली से दरभंगा सफर करना था। साथ ही, मिथिला क्षेत्र में विकास के मामले में दिल्ली के साथ-साथ बिहार विधानसभा में &#8216;बिना क्रिच टूटे वस्त्रों को धारण करने वाले सांसद से लेकर विधानसभा सदस्यों के वादे भी देखने थे &#8211; अपनी आखों से और फिर कैमरे से । </p>
<blockquote><p>भारतीय (मिथिला) मूल के एक विदेशी ने बत्रा साहब को यह कार्य सौंपा था और कहा था कि आप एक आम नागरिक बनकर, आम नागरिक वाले ट्रेन से दिल्ली से दरभंगा की यात्रा करेंगे, फिर शहर, खासकर दरभंगा लोक सभा क्षेत्र में आने वाले सभी छह विधानसभा क्षेत्रों का भ्रमण-सम्मेलन कैमरे की नजर से करेंगे, तस्वीरें खीचेंगे और तस्वीरों के आधार पर कहानियां लिखी जाएँगी। उनका कहना था कि &#8216;नेताओं की बोलती को तस्वीर ही बंद करेगी आगामी चुनाव में।&#8217;</p></blockquote>
<p>दिल्ली में ट्रेन पर बैठने और फिर वापस दरभंगा से दिल्ली की ओर यात्रा करने के क्रम में बत्रा साहब लगातार फोन से जुड़े थे। दिल्ली में ट्रेन पर बैठने के साथ ही उन्होंने जो कहा वह कहानी में शब्दबद्ध होंगे; लेकिन दिल्ली से दरभंगा बिहार के लोग कैसे जाते हैं, यह गहन शोध का विषय है। यह विषय भारतीय रेल, भारत के रेल मंत्रालय, ऊंची ऊंची कुर्सियों पर बैठे अधिकारियों के लिए &#8216;नकारात्मक टिपण्णी&#8217; है। प्रदेश के मुख्यमंत्री, पूर्व रेलमंत्री होने के बाद भी, अपने प्रदेश में चलने वाली या प्रदेश से गुजरने वाली ट्रेनों की दशा को शायद कभी नहीं देखते होंगे। यकीन मानिए, 65-वर्ष की आयु में पहली बार दरभंगा आया हूँ, और शायद जीवन में फिर कभी नहीं आऊंगा।&#8221;</p>
<p><strong>रवि बत्रा की बातों को सुनकर भारत रत्न शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान याद आ गए। आज से कोई सैंतालीस वर्ष पूर्व सन 1974 में भारत के शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान दरभंगा किले के अंदर अपनी साँसों को रोकते, शहनाई की धुन को कुछ पल ‘वाधित’ करते दरभंगा राज के तत्कालीन सभी ‘धनाढ्यों’ के सम्मुख, वहां उपस्थित मिथिलाञ्चल के तथाकथित ज्ञानी-महात्माओं के सम्मुख बिना किसी भय के कहते हैं: “मैं राजा बहादुर (विश्वेश्वर सिंह) की शादी में शहनाई बजाया, मैं युवराज (राजकुमार जीवेश्वर सिंह) के विवाह में शहनाई से नई बहु का स्वागत किया। आज उसी शहनाई के धुन से युवराज की सबसे बड़ी बेटी की मांग में उसके शौहर द्वारा सुंदर भरते समय सुखमय जीवन का आशीर्वाद देता हूँ। और आज से यह प्रण लेता हूँ कि आज के बाद कभी दरभंगा राज परिसर में, इस लाल किले के अंदर नहीं आऊंगा, कभी शहनाई नहीं बजाऊंगा।&#8221;</strong></p>
<p>बिस्मिल्लाह खान ने कहा था: &#8220;आज महाराजाधिराज के लिए, राजा बहादुर के लिए मन व्याकुल हो रहा है। उनकी अनुपस्थिति खल रही है। आज उनके बिना रोने का मन कर रहा है। आज इस भूमि पर उन दो महारथियों की अनुपस्थिति ने संगीत की दुनिया को अस्तित्वहीन महसूस कर रहा हूँ। आज शहनाई का मंगल ध्वनि बिलख गया है। आज युवराज को देखकर दरभंगा राज का भविष्य देख रहा हूँ। इस लाल किले की दीवारों के ईंटों से सरस्वती जाती दिख रही हैं। इस दीवार का रंग और भी लाल होना इसका प्रारब्ध है। आज बड़ी महारानी को छोड़कर कोई भी बिस्मिल्लाह खान की शहनाई को देखने वाला, पूछने वाला, समझने वाला नहीं रहा …… और वे फ़ुफ़क फ़ुफ़क कर रोने लगे। उनकी साँसे जिस रफ़्तार से ”रीड” के रास्ते ”पोली” होते हुए ”शहनाई” तक पहुँच रही थी, और जिस प्रकार का धुन निकल रहा था, वह न केवल महाराजाधिराज, राजाबहादुर और युवराज के लिए समर्पण था, बल्कि जीवन में कभी फिर दरभंगा के उस लाल किले में पैर नहीं रखने का वादा भी था। मंगल ध्वनि बजाने वाला वह नायक अपने शब्दों पर जीवन पर्यन्त खड़ा उतरा – कभी पैर नहीं रखा।&#8221;</p>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम से बात करते रवि बत्रा कहते हैं : मुझे 22 जून को सुबह 5.15 पर ट्रेन पकड़नी थी दरभंगा के लिए। लेकिन रात को ही मैसेज आ गया कि गाड़ी शाम 6.15 पर चलेगी फिर दोबारा मैसेज आया कि और देरी हुई है। अब ट्रेन 6.15 के स्थान पर रात को 9.15 पर चलेगी। आनंद बिहार स्टेशन से उसका पहुंचने का समय 23 तारीख रात 80 बजे के करीब था। यहाँ से ट्रेन की यात्रा शुरू हुई। यह ट्रेन 24 जून सुबह 2.42 AM पर दरभंगा स्टेशन पहुंची। दुर्भाग्य से ट्रेन में पानी नहीं, शौचालय का बुरा हाल था। ऐसा लग रहा था कि पुरे प्रदेश का दुर्गन्ध उसी ट्रेन में आ गयी हो।&#8221;</strong></p>
<p>बत्रा जी आगे कहते हैं: &#8220;इतना ही नहीं, उस ट्रेन में जो आधिकारिक एटेंडेंट चल रहे थे, वही चोरी भी कर रहे थे। चोरी के चार मामले हुए।  यात्रा के दौरान ही एक यात्री के हैंड बैग और मोबाइल उठाने का प्रयास किया, लेकिन यात्रियों ने उसे दबोच डाला। उस ट्रेन में जब पुलिस आई और बाद में स्टाफ की कोशिश से सब सामान मिल गया। मैं जिस काम के लिए दरभंगा गया था, निपटा कर फिर 26 की वापसी पर टिकट थी और 12.05 बजे का समय था। लेकिन फिर पता चला कि ट्रेन सुबह 5 बजे आयेगी। दुर्भाग्य से ट्रेन दिन के 2.42 मिनट पर आई और आनंद बिहार पहुंची 28 जून रात 1.33 पर।&#8221;</p>
<p>​बत्रा कहते हैं कि &#8220;वापसी के समय उस ट्रेन के 13 स्टेशन भी कैंसिल किए ओर रूट भी बदला via बनारस or lucknow के रास्ते, मगर फिर भी 36 घंटे का रास्ता। न ही पीने के पानी की व्यवस्था ऊपर से टॉयलेट के बुरे हाल ओर टॉयलेट में भी पानी नहीं था ओर तो ओर उसके दरवाजों पर कुंडिया नहीं साथ ही सफाई के लिए शॉवर टूटे हुए थे, यह हाल था A/C coach का, गरीब रथ स्पेशल ट्रेन का यह हाल देख करके दुख लगा। यात्री मुफ्त में नहीं जाते, उचित पैसे देते हैं, लेकिन उचित सुविधा नहीं मिलती, परिवेश नहीं मिलता।&#8221;</p>
<p>गरीब रथ एक्सप्रेस ट्रेनों का उद्घाटन 2006 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने किया था। पहली गरीब रथ ट्रेन सेवा को बिहार के सहरसा से पंजाब के अमृतसर तक हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया था। इन ट्रेनों को उन यात्रियों को किफायती वातानुकूलित यात्रा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया था जो नियमित एसी कोचों का अधिक किराया वहन नहीं कर सकते थे। भारत में वर्तमान में 26 जोड़ी गरीब रथ एक्सप्रेस ट्रेनें चल रही हैं। ये ट्रेनें नियमित एसी-3 टियर किराए से कम किराए पर पूरी तरह से वातानुकूलित यात्रा प्रदान करती हैं। इन्हें यात्रियों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए एसी यात्रा को अधिक किफायती बनाने के लिए शुरू किया गया था।</p>
<p><strong>​बत्रा का कहना है कि &#8220;खाने और पीने के लिए पानी की बहुत दिक्कत, क्योंकि कोच में कैंटीन नहीं, ऑनलाइन ऑर्डर पर जब स्टेशन आएगा तभी मिलेगा ट्रेन का कोई समय नहीं, मैंने ऑर्डर किया डिनर का 8 बजे​ के स्थान पर आया रात 1.30 बजाए तो भूखे ही सो गए, अकेल होने से समान की भी निगरानी रखनी पड़ती हैं क्योंकि की चोरी का डर, सेशन से नीचे उतरो तो तब भी खतरा, ऑनलाइन खाना भी बासा ओर बेस्वाद होने खाया नहीं जाता, ​प्लेटफॉर्म पर ताजा चाय और बिस्कुट के अलावा कुछ मिलता नहीं, कोई लोकल बेचने आता भी हैं तो भरोसा नहीं पता नहीं कब और कैसा बना ​है। </strong></p>
<p>​बहरहाल, बिहार के चालीस लोक सभा सांसदों में दरभंगा संसदीय क्षेत्र के वर्तमान सांसद सम्मानित गोपाल जी ठाकुर की स्थिति यशपाल की अख़बार में नाम कहानी के आस-पास ही भ्रमण करती है। दरभंगा संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं, जिसमें विद्वान भी हैं, विदुषी भी, सब्जी वाला भी है, रेड़ी वाला भी, व्याख्याता भी हैं, पत्रकार भी, किसान भी हैं, जमींदार भी, निर्धन भी हैं, धनाढ्य भी, दो-टूक बोलने वाले भी हैं, चापलूस भी, बनिया भी हैं, दलाल भी, छात्र भी हैं, छात्राएं भी, स्मार्ट लोग भी हैं, स्मार्ट फोन धारक भी, सभी तबके के लोग सम्मिलित हैं। लेकिन सभी लोगों में एक बात ‘सामान्य’ है।</p>
<p>एक : सांसद महोदय को आम मतदाता नहीं जानता। आम मतदाताओं की समस्याओं से न तो अवगत हैं और ना ही अवगत होना चाहते हैं। दरभंगा राज के वंशजों की तरह चतुर्दिक चमचों और चापलूसों से घीरे हैं। संसदीय क्षेत्र में दीखते नहीं, परन्तु सोशल मीडिया पर, विशेषकर फेसबुक पर, 24x7x356 अवतरित रहते हैं। मतदाताओं से यहीं मिलन सम्मेलन होता है। समस्याएं भी उन्ही के लोग वहीँ लिखते हैं और समाधान भी वहीँ टिपण्णी पेटी में हो जाता है। एक बात और, शायद भयवश, सांसद साहेब स्थानीय पत्रकारों, विद्वानों, समाज सेवकों से रूबरू नहीं होते कहीं कोई गंभीर सवाल न पूछ ले।</p>
<p>दो: ‘अख़बार में नाम’ के लिए ये गुरुदास के बराबर हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि यशपाल का गुरदास कहीं ‘ट्रिंग ट्रिंग’ नहीं करता था, लेकिन दरभंगा के सांसद साहेब स्थानीय अख़बारों में सुबह-सवेरे अपना नाम, अपनी तस्वीर नहीं देखते तो सीधा अखबार के संपादक को ‘ट्रिंग-ट्रिंग’ कर देते हैं। किसी भी राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों से बात नहीं करते। स्थानीय पत्रकारों को क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति पर, मतदाताओं की आकांक्षाओं पर और सांसद द्वारा दुःख निवारण टीकाकरण पर किसी भी प्रकार की टीका-टिप्पणी करने की सख्त मनाही है। अगर कोई मुख खोले, तो कार्यालय मुख मोड़ लेता है ।</p>
<p><strong>दरभंगा के एक विद्वान कहते हैं कि &#8220;मैं किसी सांसद को नहीं जानता हूँ। अख़बारों में नित्य नाम पढता हूँ, बस इतना ही। आज तक मिला नहीं हूँ। बिहार इन दी आईज ऑफ़ ट्रैवेलर्स एंड पेंटर्स 1780-1850, बायोग्राफी ऑफ़ डॉ राजेंद्र प्रसाद के अलावे पांच बेहतरीन किताबों के लेखक, तेजकर कहते हैं: ‘दरभंगा के सांसद को मुझ जैसा पढ़ा लिखा मनुष्य के अलावे समाज के दबे-कुचले, उपेक्षित लोग भी नहीं जानते। इसका वजह यह है कि आम तौर पर लोक सभा का सांसद आम चुनाब में जीत कर भले संसद जाते हों, अपने संसदीय क्षेत्र में कभी आम नहीं होता है। दरभंगा संसदीय चुनाव क्षेत्र से जीतकर कोई अगर संसद तक पहुँच रहे हैं तो यह सिर्फ सम्बद्ध पार्टी अथवा उस पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को ब्रांड होने के कारण। आज दरभंगा ही नहीं, बिहार के 40 संसदीय क्षेत्रों में शायद ही कोई क्षेत्र होगा जिसके उम्मीदवार अथवा विजय नेता की अपनी पहचान होगी। जनता ‘उन्हें’ चयनित की होगी। क्योंकि आज “ब्रांड की सेवा”, “ब्रांड का भजन” “ब्रांड की चापलूसी” ही मूल मंत्र हो गया है राजनीति में जीवित रहने के लिए। और सोशल मीडिया पर प्रचार-प्रसार स्थिति को और भी जटिल बना दिया है।&#8221;</strong></p>
<p>सन् 1990 ई.में पड़री भाजपा पंचायत अध्यक्ष से राजनीतिक सफ़र तय करते हुए सन् 1994 में दरभंगा जिला महामंत्री किसान मोर्चा का दायित्व निभाते हुए सन् 1996 में विरौल अनुमंडल संग़ठन प्रभारी बने। फ़िर बेनीपुर मंडल अध्यक्ष फिर सन 2003 ई.में काफी संघर्ष और कार्यकर्ताओं की माँग पर सर्वसम्मति से दरभंगा जिला अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए। साथ ही साथ पैक्स अध्यक्ष, समस्तीपुर रेलवे परामर्शदाता समिति सदस्य, ललित नारायण विश्वविद्यालय सीनेट सदस्य सहित कई सरकारी और सामाजिक पदों पर भी रहते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सन 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर जीत कर पहली बार विधायक बने और 2017 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी के बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष पद से नवाजा गया ।” </p>
<p>दरभंगा के सांसद गोपालजी ठाकुर और यशपाल की कहानी ‘अख़बार में नाम’ के मुख्य पात्र गुरुदास में एक समानता और है। गुरुदास की हमेशा इक्षा होती थी कि वर्ग में शिक्षक उसका भी नाम लें, उसकी ओर भी दिखें। अब अगर भारत के संसद  को ‘वर्ग’ माना जाय, गोपालजी ठाकुर को छात्र और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को शिक्षक – तो गोपालजी ठाकुर कोई अपनी जानकारी में कोई भी अवसर छोड़ते नहीं हैं जिससे वर्ग (संसद) में उनकी पूछ बनी रहे; शिक्षक (प्रधान मंत्री) उनके तरफ देखते रहें। गोपाल जी ठाकुर पहली बार लोकसभा पहुंचे हैं। स्वाभाविक है दूसरी और तीसरी बार पहुँचने के लिए (पहले टिकट प्राप्ति हेतु) शिक्षक की नजर में ‘विश्वासपात्र’ बने रहना होगा – चाहे उनकी हरकत, क्रिया-कलापों से संसदीय क्षेत्र दरभंगा के मतदाताओं की जीवन रेखा में कोई सकारात्मक परिवर्तन हो अथवा नहीं। </p>
<p><strong>मनोहर झा एक शिक्षक हैं। बच्चों को पढ़ाते हैं। कहते हैं: “माननीय सांसद महोदय एक प्रश्न लोक सभा में पूछे थे। वह यह था कि “दरभंगा,  उतर बिहार व मिथिला का केंद्र है एवं भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान काफी महत्वपूर्ण है। दरभंगा का अतीत अत्यंत गौरवशाली है, यह विद्वानों की धरती रही है। पूर्व से ही दरभंगा के लिए सुरक्षा अत्यंत चिंता का विषय बना रहा है। यह क्षेत्र काफी शांतिप्रिय है एवं क्षेत्र के लोग मृदु भाषी होते है। दरभंगा का एक-एक नागरिक अपनी सुरक्षा, जिले की सुरक्षा, प्रदेश की सुरक्षा और राष्ट्र के सुरक्षा के लिए कटिबद्ध है, प्रतिबद्ध है।&#8221;</strong></p>
<p>मनोहर जी का कहना है कि &#8220;सवाल यह है कि यहाँ जो गिरोह कार्य कर रहा है, नित्य किसी न किसी को अपना शिकार बना रहा है जो भी उसके हित के विरुद्ध जाता है, चाहे पत्रकार अविनाश झा ही क्यों न हो; कभी ये सांसद महोदय स्थानीय प्रशासन के क्रिया-कलापों के विरुद्ध सड़क पर उतरे? नहीं। झा का कहना है कि “अपनी छवि को यत्र-तत्र-सर्वत्र फ़ैलाने के लिए एक खास नेकवर्क तैयार किये हुए हैं जो सोसल साइटों पर कार्य करते हैं। स्थानीय अख़बारों में सांसद के कार्यों का लेखा-जोखा नहीं प्रकाशित हो सकता है। लिखने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता। उसे नौकरी से हाथ धोनी होगी। इनसे तो कई गुना बेहतर पूर्व सांसद कीर्ति आज़ाद थे जो जनता की बात सुनते तो थे। यह बात भी सत्य है कि किसी भी सांसदों ने स्थानीय लोगों के लिए कुछ भी नहीं किया जिसे आपको बता सकूँ। झा कहते हैं : “हां, एक बात अवश्य है कि गोपाल जी ठाकुर मृदुभाषी हैं। लेकिन, मौध (मधु) जनता को खाने का अवसर अभी तक नहीं मिला हैं।”  </p>
<p>​बहरहाल, दरभंगा लोकसभा क्षेत्र में छह विधानसभा क्षेत्र है &#8211; गौरा बौराम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, दरभंगा और बहादुरपुर। दरभंगा के विधाक है संजय सरोगी, बहादुरपुर के विधायक हैं मदन साहनी, गौरा बौरान की विधायिका है श्रीमती स्वर्ण सिंह, बेनीपुर के विनय कुमार चौधरी, अलीनगर के मिश्री लाल यादव, दरभंगा ग्रामीण के ललित कमर यादव विधायक हैं। दरभंगा से लगभग 214 ट्रेन गुजरती है। स्वाभाविक है कि भारतीय रेल के लिए याग मार्ग कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन कितना उपेक्षित है यह न तो नेता मानेंगे, न भारतीय रेल के अधिकारी, न केंद्रीय मंत्री स्वीकार करेंगे और ना ही प्रदेश के मुख्यमंत्री। जनता में अपने-अपने नेताओं, राजनीतिक पार्टियों के अनुसार विभाजन है। </p>
<p>​विस्तार से कहानी आगे </p>
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		<title>​1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध: सायरन का पों-पों, ब्लैक आउट और &#8216;बांग्लादेश (कंजक्टिवाइटिस) से आँख मीचते पटना के लोग</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/sirens-blackouts-and-people-of-patna-averting-their-eyes-from-bangladesh-conjunctivitis</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 May 2025 11:53:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[black out]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[nationa]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली: पचपन वर्ष पहले बांग्लादेश के निर्माण हेतु भारत-पाकिस्तान के बीच प्रत्यक्ष युद्ध भले 13-दिनों का रहा हो, लेकिन साल 1971 के मार्च के अंतिम सप्ताह (26 मार्च) से दिसंबर के मध्य (16 दिसंबर) के बीच भारत के हस्तक्षेप के पूर्व तक बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी और पाकिस्तान के बीच युद्ध, जिसमें कई हज़ार लोग, [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली: पचपन वर्ष पहले बांग्लादेश के निर्माण हेतु भारत-पाकिस्तान के बीच प्रत्यक्ष युद्ध भले 13-दिनों का रहा हो, लेकिन साल 1971 के मार्च के अंतिम सप्ताह (26 मार्च) से दिसंबर के मध्य (16 दिसंबर) के बीच भारत के हस्तक्षेप के पूर्व तक बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी और पाकिस्तान के बीच युद्ध, जिसमें कई हज़ार लोग, महिला-पुरुष, बच्चे वीरगति को प्राप्त किये, नहीं भुलाया जा सकता है। साथ ही, जो आज साठ बसंत के गवाह हैं, खासकर बिहार के, वे यह भी नहीं भुला पाए होंगे कि कैसे उस युद्ध के दौरान प्रदेश में, खासकर पटना में &#8216;कंजक्टिवाइटिस&#8217; लोगों को ग्रसित कर लिया था। युद्ध के कारण इस बीमारी का नाम ही बांग्लादेश हो गया था। इतना ही नहीं, संध्याकाळ होते ही, जैसे ही &#8216;सायरन&#8217; बजता था, गली, मोहल्ले, बाजार, सड़कों पर बत्ती गुल हो जाती थी और मजाल है कोई भी व्यक्ति सरकार और व्यवस्था के विरुद्ध चूं तक कर ले। </strong></p>
<p>उन दिनों हम पटना कॉलेज के सामने वाली गली में रहते थे। यह गली अशोक राजपथ और एनी बेसेन्ट रोड को मिलाती थी। इस गली की विशेषता यह थी कि यह यादवों का इलाका था, जिसमें दो चार घर कायस्थों का, ब्राह्मणों का था। लेकिन पूरे इलाके में &#8216;भैया&#8217; और &#8216;चाचा&#8217; का बोलबाला था। मजाल है कोई किसी से ऊँची आवाज़ में बात कर ले। बुजुर्गों के प्रति सम्मान और बच्चों के प्रति प्यार का पलड़ा बराबर था। इस गली में रहने के कारण पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन छात्र-छात्राओं को, पटना शहर के अधिकारियों को, पुलिस को जानता-पहचानता था। वजह था सड़क पर कमाल बाइंडिंग हॉउस, अनुपम प्रकाशन, ग्रीन स्टोर्स, बनारसी पान वाले, शांति कैफे आदि दूकानों का होना। </p>
<p>इस नुक्कड़ पर पटना यातायात पुलिस के तत्कालीन डीएसपी श्री बनबारी बाबू के आने-जाने के कारण वे हम सभी बच्चों को जानते थे, पहचानते थे। मेरी एक और पहचान थी कि मैं सुबह-सवेरे पटना से प्रकाशित अख़बारों को बेचा करता था, अखबारवाला था। बनबारी बाबू कई मर्तबा अखबार लिया करते थे और हाथ में पांच-दस पैसे अधिक ही दे दिया करते थे। वे यह भी जानते थे कि मैं टीके घोष अकादमी में पढ़ता भी हूँ। युद्ध के उसी कालखंड में एक दिन बनबारी बाबू पटना मार्किट के सामने अंजुमन इस्लामिया हॉल के सामने मिले। वे पटना यातायात पुलिस के जीप पर हॉल के सामने उनके बाएं हाथ पटना चिकित्सा महाविद्यालय की ओर जाने वाली सड़क के नुक्कड़ पर थे। </p>
<p><strong>मुझे देखते ही वे अपनी ओर बुलाये। फिर कहते हैं: &#8220;कल से एक ड्राईव चलेगा गाड़ियों, स्कुटर, मोटर, मोटर साईकिल आदि की अगली बत्ती के ऊपरी हिस्से को काले रंग से रंगने की ताकि सायरन बजने के बाद, ब्लैक आउट होने के बाद अगर कोई वाहन सड़क पर चलती है तो उसकी रोशनी आसमान की ओर नहीं जाय। यह रिक्शा में लगी बत्ती पर भी लागु है।&#8221; मैं उनकी बात और उनके इशारे को समझ गया। उस समय मैं जहाँ खड़ा था, वह से 10 कदम पर पेंट-ब्रश की दूकान थी। नूरानी दवाखाना के पास। रंगने के कार्य के लिए नोवेल्टी एंड कंपनी के नजदीक हरिहर पान वाले के पास शुरू हो गयी सुबह-सवेरे से।  </strong></p>
<p>कोई आधे घंटे तक बनबारी बाबू वहीँ खड़े रहे। पीरबहोर थाना के कुछ कर्मी वाहन चालकों को कहते थे, वे सभी आदेश का सम्मान करते किनारे गाड़ी लगाते थे और मैं अपना काम करता था । चवन्नी, बीस पैसा, दस पैसा यही मोल था मेहनत का। शायद बनबारी बाबू इसी रूप में मेरी मदद करना चाहते थे। कुछ माह बाद, उन्होंने एक और ड्राइव शुरू किया था &#8211; मोटर साईकिल और स्कूटर के आगे-पीछे नंबर लिखा होने का। अब तक साल 1974 आ गया था और मैं इंडियन नेशन अखबार  में नौकरी भी करने लगा था, लेकिन वे दफ्तर आकर सलाह दिए थे और मैं उनके सलाह का सम्मान कर काम भी किया था, कुछ पैसे भी कमाए थे। खैर। </p>
<p>पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के बीच भारत की आपातकालीन प्रतिक्रिया तैयारियों की समीक्षा करने के लिए बड़े पैमाने पर नागरिक सुरक्षा मॉक ड्रिल के तहत बुधवार को भारत भर के कई शहरों में ब्लैकआउट अभ्यास चल रहा है। गृह मंत्रालय ने सोमवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह जांचने के लिए अभ्यास करने का निर्देश दिया था कि क्या वे &#8220;नए और जटिल खतरों&#8221; के लिए तैयार हैं। सोमवार को यह निर्देश तब आया जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत मंगलवार-बुधवार की मध्यरात्रि को नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर पाकिस्तान में आतंकी चौकियों पर हमला करने की तैयारी की। यह हमला 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में किया गया, जिसमें 26 लोग मारे गए थे, जिनमें से ज्यादातर आतंकवादी थे। </p>
<figure id="attachment_6508" aria-describedby="caption-attachment-6508" style="width: 488px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_law.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_law.jpg" alt="" width="488" height="579" class="size-full wp-image-6508" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_law.jpg 488w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/rsz_law-253x300.jpg 253w" sizes="auto, (max-width: 488px) 100vw, 488px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6508" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र कहते हैं &#8216;पटना के लिए मॉक ड्रिल और सायरन कोई नई बात नहीं थी। 1962 में पटना शहर में भूमिगत बंकर भी तैयार किए गए थे। लेखक 1971 में पटना कॉलेज में एक छात्र के रूप में अपने अनुभवों को याद करते हैं, जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया था। 1971 में पटना कॉलेज में एक छात्र के रूप में, मुझे शहर में किए गए युद्ध-समय के अभ्यास और आपातकालीन ऑपरेशन अच्छी तरह याद हैं। तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट आर.एन. दास नागरिक सुरक्षा संगठन के प्रभारी थे और आपातकालीन ऑपरेशन की देखरेख करते थे।</strong></p>
<p>शहर भर में रणनीतिक स्थानों पर सायरन लगाए गए थे, जिनमें बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल, हरमंदिर साहब, गुलजारबाग सरकारी प्रेस, बिहारी जी मिल्स, गोलघर और दरभंगा हाउस शामिल थे। शाम होते ही पूरा शहर कई घंटों के लिए अंधेरा हो जाता था, लोग लालटेन का इस्तेमाल भी नहीं करते थे। रात में सभी दुकानें बंद करने की उम्मीद थी, और यारपुर और चितकोहरा जैसे इलाकों में भूमिगत खाई बंकर बनाए गए थे। पटना और पटना साहिब समेत शहर के रेलवे स्टेशन भी अंधेरे में डूबे रहेंगे। सचिवालय कर्मचारियों को सूर्यास्त से पहले काम छोड़ने की अनुमति होगी, और लोग ऑल इंडिया रेडियो से समाचार प्रसारण के लिए ट्रांजिस्टर रेडियो पर निर्भर रहेंगे।</p>
<p>मिश्रा जी कहते हैं कि &#8216;उन दिनों पटना के बी.एन. कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर रामेश्वर सिंह कश्यप ने लोहा सिंह नामक एक लोकप्रिय रेडियो धारावाहिक लिखा था, जो चीन के साथ युद्ध के दौरान शुरू हुआ था। यह धारावाहिक शाम के मनोरंजन का मुख्य साधन बन गया, जिसमें फाटक बाबा और खदेरन की माँ जैसे किरदार घर-घर में मशहूर हो गए। पचास साल पहले, पटना एक बहुत छोटा शहर था। रात की ट्रेनों से आने वाले लोग सुबह ही स्टेशन से निकलते थे और रात में घर के दरवाज़े और खिड़कियाँ कसकर बंद कर दी जाती थीं। वह समय उथल-पुथल भरा था, लेकिन शहर की लचीलापन और सामुदायिक भावना चमकती थी। जब हम उन दिनों को याद करते हैं, तो हमें प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयारी और समुदाय के महत्व की याद आती है।&#8217;</p>
<p>1971 के इन अभ्यासों में गुप्त सैन्य अभियान, मुक्ति वाहिनी के साथ समन्वय और पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की मुक्ति के लिए तैयारियों हेतु सेनाओं की रणनीतिक स्थिति बनाना शामिल था। अभ्यास में हवाई हमले की चेतावनी और ब्लैकआउट शामिल थे। शहरों ने आने वाले हमलों का संकेत देने के लिए हवाई हमले के सायरन का इस्तेमाल किया गया था । ब्लैकआउट अभ्यास के लिए घरों, दुकानों और सरकारी कार्यालयों को लाइट बंद करनी पड़ी या खिड़कियों को काले कपड़े से ढंक दिया जाता था। लोगों को सिखाया गया कि इमारतों को जल्दी से कैसे खाली किया जाए और निर्दिष्ट आश्रयों में कैसे जाया जाए। अभ्यास के दौरान स्वयंसेवकों को प्राथमिक चिकित्सा, अग्निशमन और बचाव तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। स्कूलों ने लोगों को आपात स्थिति के दौरान कैसे प्रतिक्रिया करनी है, यह सिखाने के लिए नकली बम हमले का अनुकरण किया। पोस्टर, रेडियो घोषणाएँ और अख़बारों के कॉलम में हवाई हमले के दौरान क्या करना है, बच्चों, बुज़ुर्गों और घायलों की सुरक्षा कैसे करनी है और बिना फटे बम या आग लगने की सूचना कैसे देनी है, इस बारे में विशेष निर्देश दिए गए थे। </p>
<figure id="attachment_6507" aria-describedby="caption-attachment-6507" style="width: 958px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24.jpeg" alt="" width="958" height="960" class="size-full wp-image-6507" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24.jpeg 958w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24-768x770.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/WhatsApp-Image-2025-05-08-at-13.26.24-96x96.jpeg 96w" sizes="auto, (max-width: 958px) 100vw, 958px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6507" class="wp-caption-text">पटना जिला सुधार समिति ​के महासचिव और पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता​ राकेश कपूर</figcaption></figure>
<p><strong>पटना जिला सुधार समिति के महासचिव और पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता राकेश कपूर कहते हैं कि &#8220;कल का होने वाला मॉक ड्रिल और ब्लैक आउट से पिछले 1962,1965 और 1971 युद्ध के दौरान होने वाली कवायद का स्मरण हो आया। उस दौरान जो मॉक ड्रिल हुई थी उसमें मोहल्ले के लोगों ने स्वयंसेवक का रोल अदा कर देशवासियों को जागरूक किया था। उसी से अनुभव लेकर पटना में सिविल डिफेंस सर्विस का गठन हुआ और उस समय के स्वयंसेवकों वार्डन बनाया गया था। फिर आगे चलकर गृह रक्षा वाहिनी का भी गठन किया गया। ब्लैक आउट के समय लोगों को कहा गया था बल्ब के ऊपर कैप लगा दें घर और बाहर के लाईट को सायरन बजने पर बुझा दें। उस दौरान जगह जगह पर सायरन लगाया गया था।पटना सिटी में तख्त श्री हरिमंदिर जी गुरूद्वारा के ऊपर भी सायरन लगाया गया था जो काफी दिनों तक रहा।&#8221;</strong></p>
<p>कपूर साहब जो उन दिनों काॅमर्स कालेज मे आई.कॉम के छात्र थे और एनसीसी के कैडेट भी थे कहते हैं: &#8220;1962 में भारत-चीन युद्ध के समय मेरी उम्र करीब बारह साल की थी ।इसलिए थोड़ा-बहुत याद है और घर के सदस्यों ने ब्लैक आउट के दौरान मोहल्ले में सेवा दी थी । 1971 के पाकिस्तान युद्ध समय मैं 8 वीं कक्षा का छात्र था उस समय देश को दो मोर्चों पर पाकिस्तान से युद्ध लड़ा जा रहा था पश्चिम व पूर्वी क्षेत्र के दोंनो ओर पूर्व में बंगाल के नजदीक रहने के कारण बिहार में डर बना था।तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की दृढ इच्छा-शक्ति व जनरल माॅनक शाह कुशल रणनीति के परिणाम स्वरुप पाकिस्तान युद्ध में पराजित हुआ और करीब 90 हजार सैनिको के साथ आत्मसमर्पण भी किया जो इतिहास बनकर बंग्लादेश पाकिस्तान से टूट कर एक नया देश बना।पाकिस्तान के आत्मसमर्पण किये गए सैनिको को देखने का मौका मुझे 1974 में N.C.C के रामगढ़ बिहार में लगे कैम्प के दौरान देखने का अवसर मिला था उन क़ैदियों को दामोदर नदी पर बने पुल के पास सुरक्षा घेरा में रखा गया था। </p>
<figure id="attachment_6510" aria-describedby="caption-attachment-6510" style="width: 848px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Blackout.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Blackout.jpg" alt="" width="848" height="478" class="size-full wp-image-6510" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Blackout.jpg 848w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Blackout-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Blackout-768x433.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 848px) 100vw, 848px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6510" class="wp-caption-text">ब्लैक आउट</figcaption></figure>
<p>दिल्ली में मॉक ड्रिल के दौरान 8 बजे से सवा आठ बजे तक पूरे लुटियन जोन में ब्लैक आउट किया गया। अधिकारियों के अनुसार देश की सीमा पर मौजूदा हालात को देखते हुए मॉक ड्रिल भविष्य में भी जारी रहेगी। दिल्ली के कई इलाकों में अंधेरा छाया रहा।राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, अस्पतालों और डिस्पेंसरियां में आईसीयू को ब्लैकआउट से छूट दी गई। दिल्ली में मौक ड्रिल का नेतृत्व आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) कर रहा है। साथ ही, विभिन्न एजेंसियों की मदद से विभिन्न बाजारों, आइजीआइ एयरपोर्ट, खान मार्केट, पालिका केंद्र व सिविक सेंटर, राम मनोहर लोहिया समेत विभिन्न अस्पतालों, आवासीय कॉलोनियों, स्कूलों व सरकारी कार्यालयों व भीड़भाड़ वाले इलाकों में राहत बचाव कार्य के लिए अभियान चलाया गया। यह भी कहा जाता है कि 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, पाकिस्तान द्वारा संभावित हवाई हमलों से बचाने के लिए ताजमहल को छिपाया गया था। सफ़ेद संगमरमर से बने मुगल युग के मकबरे को एक बड़े हरे कपड़े से ढक दिया गया था। </p>
<p>1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से पहले करीब 50 साल पहले भारत में भी इसी तरह का अभ्यास किया गया था। तब, देश भर में आयोजित नागरिक सुरक्षा अभ्यास पाकिस्तान द्वारा संभावित हवाई हमलों के लिए नागरिक आबादी को तैयार करने की केंद्र सरकार की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। ये अभ्यास खास तौर पर सीमावर्ती और प्रमुख शहरी क्षेत्रों में प्रमुख थे। पाकिस्तान ने 3 दिसंबर, 1971 को भारतीय वायु सेना के ठिकानों को निशाना बनाकर हवाई हमले किए। भारत सरकार ने नागरिक और रणनीतिक स्थानों पर बमबारी की आशंका जताई थी। ऑपरेशन चंगेज खान, 3 दिसंबर, 1971 की शाम को भारतीय वायु सेना (IAF) के अग्रिम एयरबेस और रडार प्रतिष्ठानों पर पाकिस्तानी वायु सेना (PAF) द्वारा किए गए अग्रिम हमलों को दिया गया कोड नाम था।</p>
<p>उधर <strong>गाजियाबाद में जिला मजिस्ट्रेट दीपक मीना</strong> ने बताया कि पांच ऊंची इमारतों में बिजली भी काट दी गई है। डीएम ने कहा, &#8220;हमने निर्देश दिया है कि अभ्यास आगे भी जारी रहना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक छात्रों और अन्य स्वयंसेवकों को इनपुट मिल सके और उन्हें सुरक्षा उपायों का प्रशिक्षण मिल सके। यह विकासशील परिदृश्य के बीच प्रासंगिक है।&#8221; गाजियाबाद उत्तर प्रदेश के उन 15 नागरिक सुरक्षा जिलों में से एक है, जहां अभ्यास आयोजित किए जाने थे। हिंडन एयरबेस के पास स्थित सिविल एयरपोर्ट से उड़ानें बुधवार को एक दिन के लिए निलंबित कर दी गईं। सिविल एयरपोर्ट एयरबेस के रनवे का उपयोग करता है और 15 अलग-अलग गंतव्यों के लिए सिविल उड़ानें संचालित करता है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/sirens-blackouts-and-people-of-patna-averting-their-eyes-from-bangladesh-conjunctivitis">​1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध: सायरन का पों-पों, ब्लैक आउट और &#8216;बांग्लादेश (कंजक्टिवाइटिस) से आँख मीचते पटना के लोग</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>तिहाड़ जेल-7 ✍ तिहाड़ सहित ​भारत के कारावासों में सजा काट रही महिलाओं की &#8216;प्रसव पीड़ा&#8217; बढ़ रही है 😢 बच्चे जन्म ले रहे हैं 🙏  न्यायालय चिंतित 😢 अधिकारी मूर्छित 😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/labour-pain-of-women-serving-sentences-in-indian-prisons-including-tihar-is-increasing</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 02 Apr 2025 07:33:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[administration]]></category>
		<category><![CDATA[birth]]></category>
		<category><![CDATA[child]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जेलरोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहने वाली आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक-बौद्धिक रूप से &#8216;गरीबी की रेखा से बहुत नीचे रहने वाली महिलाएं, चाहे वे अपराधी हों अथवा नहीं, चाहती हैं कि उनका प्रसव पीड़ा ऐतिहासिक तिहाड़ कारावास के चहारदीवारी के अंदर हो। वे आज़ादी के 11-वर्ष बाद अपने [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/labour-pain-of-women-serving-sentences-in-indian-prisons-including-tihar-is-increasing">तिहाड़ जेल-7 ✍ तिहाड़ सहित ​भारत के कारावासों में सजा काट रही महिलाओं की &#8216;प्रसव पीड़ा&#8217; बढ़ रही है 😢 बच्चे जन्म ले रहे हैं 🙏  न्यायालय चिंतित 😢 अधिकारी मूर्छित 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जेलरोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली:  आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहने वाली आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक-बौद्धिक रूप से &#8216;गरीबी की रेखा से बहुत नीचे रहने वाली महिलाएं, चाहे वे अपराधी हों अथवा नहीं, चाहती हैं कि उनका प्रसव पीड़ा ऐतिहासिक तिहाड़ कारावास के चहारदीवारी के अंदर हो। वे आज़ादी के 11-वर्ष बाद अपने अस्तित्व में आये दिल्ली सल्तनत के केंद्रीय कारावास के दीवारों के बीच अपना प्रसव पीड़ा महसूस करना चाहती हैं।</strong></p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=129s">@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p>वे चाहती हैं कि उनके बच्चे की पहली किलकारी जेल के अंदर दीवारों से टकराए। उन्हें विश्वास है कि वह बच्चा उनके और उनके परिवार के जीवन में नई रोशनी लेकर आएगा। और इसके लिए वे सभी प्रकार की यातनाओं को सहने के लिए सज्ज होती है &#8211; ताकि वे कारावास के अंदर प्रवेश कर लें। वे विभिन्न प्रकार की छोटी-मोटी अपराधों में भी स्वयं को सम्मिलित करना पसंद करती हैं ताकि प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस उन्हें तिहाड़ के अंदर बंद कर दे पेट में पलते बच्चों के साथ। </p>
<blockquote><p>यह तो बच्चे की बात हुई। न केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, बल्कि भारत के कोने-कोने में रहने वाले विद्वान, विदुषी, अधिकारी, पदाधिकारी, संत, महात्मा, नेता, अभिनेता, ठेकेदार, जमादार, डाक्टर, वकील, न्यायमूर्ति, मंत्री, संत्री यानी सभी तबके के लोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से तिहाड़ कारावास के अंदर अधिकारियों को निहोरा-विनती करने में तनिक भी कोताही नहीं करते कि एक सांझ के लिए ही सही, उन्हें जेल का खाना उपलब्ध कराया जाए । </p></blockquote>
<p>एक घंटे के लिए ही सही, उन्हें जेल के अंदर प्रवेश कर झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन करने की अनुमति दी जाए &#8211; स्वेच्छा से । उन्हें कारावास परिसर की मिट्टी उपलब्ध करायी जाए । उन्हें उस लकड़ी का छोटा-से-छोटा हिस्सा प्रदान किया जाए जिस पर कैदियों को फांसी दी गयी थी। यह सभी सेवाओं और वस्तुओं की मांग इसलिए होती है कि उन्हें विश्वास है कि ये सभी वस्तुएं उनके जीवन में संकट मोचक के रूप में कार्य करेंगे।  इसे ही कहते हैं &#8216;विश्वास&#8217; और ऐसे विश्वास &#8216;भय&#8217; से ही उत्पन्न होते हैं। खैर। </p>
<p><strong>विगत दिनों पश्चिम बंगाल के एक कारावास में जब एक महिला प्रसव पीड़ा से गुजरी और बच्चे को जन्म दी, यह खबर स्थानीय अख़बारों से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में अपना स्थान सुरक्षित किया। शायद ही कोई क्षेत्र बचा होगा, जहाँ उस महिला के प्रसव पीड़ा से सम्बंधित समाचार प्रकाशित नहीं हुए थे। उस समाचार की मुख्य बात यह थी की जब वह महिला कारावास में आयी थी, वह गर्भवती नहीं थी।</strong> </p>
<figure id="attachment_6282" aria-describedby="caption-attachment-6282" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6282" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6282" class="wp-caption-text">तिहाड़ के अंदर का एक दृश्य। तस्वीर: इंडियन एक्सप्रेस के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>सवाल उठना स्वाभाविक था कि महिला गर्भवती कैसे हो गई? इस घटना के जांच के बाद यह ज्ञात हुआ कि सिर्फ यही महिला नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के विभिन्न जेलों में विगत एक वर्षों में लगभग 196 महिलाओं को प्रसव पीड़ा हुआ और वे बच्चों को जन्म दी। यह सभी महिलाएं जब जेल आयी थी, गर्भ से नहीं थी&#8217; &#8211; आखिर इन बच्चों के पिता कौन है? पिता कैसे बने? फिर शुरू हुआ राजनीतिक आरोप और प्रत्यारोप। कलकत्ता हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की पीठ के तहत एक जनहित याचिका दायर की गई है। यह मामला सिर्फ बंगाल ही नहीं, अगर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कारावासों को एक वृहद् शोध के अधीन रखा जाए तो न जाने शोध के अंतिम अध्याय में क्या-क्या लिखा जायेगा। जेल में इस तरह से बच्चों का पैदा होना चिंता का विषय है। हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते और हैरानी जताते हुए कहा कि जेल में रहने के दौरान महिला कैदी गर्भवती हो रही हैं, जिसके बाद जेलों के अंदर बच्चे पैदा हो रहे ​हैं। </p>
<p><strong>उधर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और ​न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की ​पीठ ने इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाते हुए स्वतः संज्ञान ​लिया और सभी राज्यों से इस मामले पर तुरंत कार्रवाई का आदेश ​दिया। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की दिसंबर 2023 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल 1330 जेलों में कुल 5 लाख 73 हजार 220 कैदी बंद हैं. इनमें 23 हजार 772 महिलाएं हैं। इनमें से 1537 महिलाएं ऐसी हैं, जिनके बच्चे उनके साथ जेलों में रहते हैं। इसमें आधी संख्या ऐसी महिला कैदियों की है, जिन्होंने जेल में ही रहते हुए बच्चे को जन्म दिया है। गनीमत है कि इन सभी बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र में जेल का जिक्र नहीं ​किया। वैसे आकंड़ों के मुताबिक भारत में प्रत्येक घंटे 2651 बच्चे जन्म लेते हैं। ​खैर।</strong></p>
<p>बहरहाल, &#8216;मदर्स एंड बेबीज़ इन प्रिज़न&#8217; ​से सम्बंधित एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट में कहा गया है​ &#8216;जेल शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान नहीं करता है, जिससे अक्सर दीर्घकालिक विकास संबंधी मंदता होती है। फिर भी, यदि शिशुओं और बच्चों को जबरन उनकी माताओं से अलग कर दिया जाता है, तो उन्हें स्थायी भावनात्मक और सामाजिक क्षति होती है। </p>
<p>अधिकांश यूरोपीय जेल प्रणालियाँ शिशुओं को माताओं के साथ रहने के लिए कुछ स्थान प्रदान करती हैं, लेकिन फिर भी कई सैकड़ों शिशुओं को उनकी कैद माताओं से अलग कर दिया जाता है। इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि छोटे बच्चों की उन कुछ माताओं के लिए एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो गंभीर अपराध करती हैं और जो समुदाय के लिए खतरा पैदा करती हैं, और छोटे बच्चों वाली महिला अपराधियों की भारी संख्या को समुदाय में प्रबंधित किया जाना चाहिए।&#8217; </p>
<p>अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भी अक्सर यह सिफारिश की जाती है कि गर्भवती महिला जेल के बाहर किसी अस्पताल में (बिना हथकड़ी के) अपने बच्चे को जन्म दे सके। जन्म का स्थान एक सामान्य अस्पताल होगा। उसके बाद जेल में बच्चे को अपनी माँ के साथ लंबे समय तक रहने के लिए अच्छी सुविधाएं होनी चाहिए, जब तक उसे अपनी माँ की शारीरिक देखभाल की आवश्यकता हो। </p>
<figure id="attachment_6283" aria-describedby="caption-attachment-6283" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6283" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6283" class="wp-caption-text">तिहाड़ के अंदर का एक दृश्य। तस्वीर: सबरंग तिहाड़ के सौजन्य से<br /></figcaption></figure>
<p>ये सुविधाएं विभिन्न देशों में अलग-अलग होती हैं। अन्य स्थितियों में माताएं अपने और अपने बच्चों के लिए एक छोटा सा घर बनाने की कोशिश करती हैं​, उन्हें अक्सर सेल साझा करना पड़ता है, जहाँ वे कुछ छोटे-मोटे भोजन भी पकाती हैं​ । अन्य अधिक &#8216;प्रगतिशील&#8217; जेलों में, बच्चे शाम और रात के समय अपनी माताओं के साथ रहते हैं, जबकि वे दिन के समय जेल के अंदर या बाहर नर्सरी में जाते हैं, जबकि माँ काम कर रही होती है। </p>
<p>यह स्वयंसिद्ध है कि बच्चों को जेल में जन्म नहीं लेना चाहिए और काउंसिल ऑफ यूरोप के सदस्य देशों में सामान्य प्रथा यह है कि उचित समय पर गर्भवती महिला कैदियों को बाहरी अस्पतालों में स्थानांतरित कर दिया जाता है। फिर भी, समय-समय पर, ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ गर्भवती महिलाओं को स्त्री रोग संबंधी जांच और/या प्रसव के दौरान बेड या फर्नीचर के अन्य सामान से बाँध दिया जाता है या अन्यथा उन्हें बांध दिया जाता है। </p>
<p>ऐसा दृष्टिकोण पूरी तरह से अस्वीकार्य है, और निश्चित रूप से इसे अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार माना जा सकता है। जेल में बंद कई महिलाएं बच्चों या अन्य लोगों की प्राथमिक देखभाल करने वाली होती हैं, जिनके कल्याण पर उनके कारावास का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस संदर्भ में एक विशेष रूप से समस्याग्रस्त मुद्दा यह है कि क्या &#8211; और यदि हाँ, तो कितने समय तक &#8211; शिशुओं और छोटे बच्चों को अपनी माताओं के साथ जेल में रहना संभव होना चाहिए। यह एक कठिन प्रश्न है, क्योंकि एक ओर, जेल स्पष्ट रूप से शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान नहीं करते हैं, जबकि दूसरी ओर, माताओं और शिशुओं को जबरन अलग करना अत्यधिक अवांछनीय है। </p>
<p><strong>​अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी मामलों में शासकीय सिद्धांत बच्चे का कल्याण होना चाहिए। इसका तात्पर्य विशेष रूप से यह है कि हिरासत में प्रदान की जाने वाली कोई भी प्रसव-पूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल बाहरी समुदाय में उपलब्ध देखभाल के बराबर होनी चाहिए। जहां शिशुओं और छोटे बच्चों को हिरासत में रखा जाता है, उनके उपचार की देखरेख सामाजिक कार्य और बाल विकास के विशेषज्ञों द्वारा की जानी चाहिए। </strong></p>
<p>यह सुनिश्चित करने के लिए भी व्यवस्था की जानी चाहिए कि जेल में बंद शिशुओं की हरकत और संज्ञानात्मक कौशल सामान्य रूप से विकसित हों। विशेष रूप से, उन्हें जेल के भीतर पर्याप्त खेल और व्यायाम की सुविधाएँ मिलनी चाहिए और जहाँ भी संभव हो, उन्हें जेल से बाहर निकलकर इसकी दीवारों के बाहर सामान्य जीवन का अनुभव करने का अवसर मिलना चाहिए। जहाँ यह संभव नहीं है, वहाँ क्रेच-प्रकार की सुविधाओं तक पहुँच प्रदान करने पर विचार किया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था से महिला कैदियों को जेल के अंदर काम और अन्य गतिविधियों में अधिक हद तक भाग लेने में मदद मिलेगी, जो अन्यथा संभव नहीं हो पाता।&#8217; </p>
<figure id="attachment_6284" aria-describedby="caption-attachment-6284" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6284" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6284" class="wp-caption-text">तस्वीर हिंदुस्तान टाइम्स के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>स्वीडन में, शिशुओं को जेल में शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है, लेकिन उन्हें एक वर्ष तक के लिए रखा जा सकता है और औसतन तीन महीने तक का समय लगता है। जर्मनी में, छह बंद जेल हैं जो तीन वर्ष तक के बच्चों को अनुमति देते हैं, और दो खुली जेलें हैं जो छह वर्ष की आयु तक के बच्चों को अनुमति देती हैं। नीदरलैंड में, बच्चे अपने चौथे जन्मदिन तक आधी खुली जेल टेर पील में रह सकते हैं। माँ-बच्चे की इकाई एक अलग घर में स्थित है, लेकिन जेल क्षेत्र के भीतर, चार माताओं और चार बच्चों के लिए। पाँच बंद जेलों में बच्चे नौ महीने तक रह सकते हैं। आइसलैंड में, केवल बहुत छोटे बच्चे जो स्तनपान कर रहे हैं या जिनकी विशेष ज़रूरतें हैं, वे जेल में रह सकते हैं। पुर्तगाल और स्विट्जरलैंड तीन साल तक के बच्चों को, फ़िनलैंड दो साल तक के बच्चों को जेल में रहने की अनुमति देता है। डेनमार्क में पुरुष और महिला कैदियों को अपने बच्चों को साथ रखने की अनुमति है, बशर्ते कि उन्हें बच्चे के तीन साल का होने तक रिहा किया जाना हो, लेकिन व्यवहार में बहुत कम बच्चे जेल में रखे जाते हैं। इंग्लैंड और वेल्स में, तीन बंद जेलों में 34 बच्चों के लिए जगह है, और एक खुली जेल में 20 बच्चों के लिए जगह है। बच्चे खुली जेल और एक बंद जेल में 18 महीने की उम्र तक रह सकते हैं, अन्यथा सीमा नौ महीने है।</strong> </p>
<p>पश्चिमी देशों में, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, बच्चे के अपनी माँ के साथ जेल में रहने की अवधि को अक्सर लगाव सिद्धांत द्वारा उचित ठहराया जाता है, हालांकि एक आधुनिक दृष्टिकोण में छोटे बच्चे को अपनी जैविक माँ से जुड़ना ज़रूरी नहीं है। इसलिए, यदि कोई पर्याप्त विकल्प (जैसे पिता, दादी या पालक माता-पिता) है, तो बच्चा उस जेल से बाहर रह सकता है जहाँ उसकी माँ को हिरासत में रखा गया है।​ लेकिन इटली में, घर के माहौल में माँ-बच्चे के लगाव को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि तीन साल से कम उम्र के बच्चों वाली माताओं को कैद नहीं किया जाता है, बल्कि उन्हें घर में नज़रबंद रखा जाता है। जब तक बच्चा दस साल का नहीं हो जाता, तब तक वे जेल के बाहर एक वैकल्पिक कार्यक्रम का पालन करते हैं।​ </p>
<p>आइये, दिल्ली के तिहाड़ जेल चलते हैं। द्वापर युग में जब जेल में जन्माष्टमी पर माता देवकी ने भगवान कृष्ण को जन्म दिया था, तो लोगों ने कामना की थी कि भविष्य में फिर कोई गर्भवती महिला जेल में न जाए और इस तरह से कठिनाईयों के बीच बच्चे को जेल में जन्म न दे। मगर, आज कलियुग में इस तरह की घटना की बार-बार पुनरावृति होती है। अपराध में लिप्त बहुत सी गर्भवती महिलाएं जेल में जाती हैं और जेल में ही बच्चों को जन्म देती हैं। जन्म लेने वाले अबोध मासूम मां की कोख रूपी कैद से आजाद होकर दुनिया में तो आते हैं, मगर मां के साथ जेल में ही कैद होकर रह जाते हैं। जेल में जन्म लेने वाले ऐसे अभागे मासूम अपने बचपन के कुछ शुरुआती साल मां की सजा जेल में ही मां के साथ रहकर काटते हैं। </p>
<figure id="attachment_6289" aria-describedby="caption-attachment-6289" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6289" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6289" class="wp-caption-text">तिहाड़ जेल<br /></figcaption></figure>
<p>कानूनन बच्चे की उम्र छह साल की होने तक उसे उसकी मां से अलग नहीं किया जा सकता। यही, कारण है कि तिहाड़ जेल में जन्म लेने वाले बच्चों को उनकी मां के साथ ही जेल में रहना होता है। छह साल की उम्र होने के बाद कानून के अनुसार बच्चों को मां से अलग कर उसे महिला कैदी के परिजनों के पास भिजवा दिया जाता है। जिससे कि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सके। जेल में जन्मे बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तिहाड़ जेल में एक अलग विंग काम करता है। यह बच्चों के लिए खिलौने, झूले व खाने-पीने की अन्य वस्तुओं की पूर्ति करता है। </p>
<p>जेल प्रशासन द्वारा इस बात का ध्यान रखा जाता है कि बच्चे को मां के साथ रहते हुए कैद में होने का अहसास न हो। उसे ऐसा लगे कि वह अपने घर पर है। इसके अतिरिक्त जेल में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। अगर किसी महिला कैदी के बच्चे की जिम्मेदारी लेने वाला कोई परिजन नहीं होता तो ऐसे बच्चों का दाखिला बोर्डिग स्कूल में स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से कराया जाता है। </p>
<p>कुछ वर्ष पूर्व मंडल कारा, बांका (झारखण्ड) में बंद महिला कैदी खुशबू खातून सदर अस्पताल में बच्चे को जन्म दी थी। प्रसव पीड़ा होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। खातून करीब दो माह से जेल में बंद है। उसपर हत्या का आरोप है। उधर, बिहार ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भी सम्बंधित अधिकारी जेल प्रशासन को आदेश दिए हैं कि जेल में रहने वाले अथवा जन्म लिए बच्चों को यह महसूस न हो कि वह जेल में है । अधिकारी पत्र भेज कर जेल में बंद महिला कैदी के बच्चे का जन्म दिन मनाने का आदेश दिया। </p>
<p>इतना ही नहीं, बिहार के जहानाबाद जेल में 19 ऐसे बेगुनाह मासूम थे/हैं, जिनका बचपन गुनहगार मां की ममता और आंचल की छांव पाने के लिए सलाखों के पीछे गुजर रहा था/है। ये सभी महिलाएं दहेज प्रताड़ना, दहेज हत्या, मारपीट और शराब बिक्री मामले में जेल में बंद थी। 2022 में शराब बेचने के आरोप में जहानाबाद व अरवल जिले में 514 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी, जिसमें 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। इनमें तीन महिलाओं की गोद में उनका मासूम बच्चा भी था। मजबूरन अपने साथ मासूम को भी जेल ले जाना पड़ा।  </p>
<figure id="attachment_6285" aria-describedby="caption-attachment-6285" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6285" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/DSC_3582-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6285" class="wp-caption-text">सुनील कुमार गुप्ता, पूर्व जेलर, तिहाड़</figcaption></figure>
<p><strong>विगत दिनों तिहार कारावास के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता जी से मुलाक़ात हुई। गुप्ता साहब अपनी जिंदगी का आधा से अधिक हिस्सा तिहाड़ को दिए है। अब तक के जीवन में उन्होंने जो सांसे ली है, उसमें आधी से अधिक सांसे तिहाड़ जेल के अंदर की हवाओं की है। वे तिहाड़ कारावास के अंदर करीब 35 वर्ष सेवा किये हैं। खूंखार से खूंखार कैदियों से लेकर, फांसी पर लटकने वाले, लटकाये जाने वाले दर्जनों कैदियों का चश्मदीद गवाह बने हैं। तिहाड़ के अंदर रहने विभिन्न मामलों में बंद महिलाओं की कथा-व्यथा को महसूस किये हैं। नीचे के छोटे कर्मचारियों से लेकर ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे बड़े-बड़े अधिकारियों से रूबरू हुए हैं जिनका पदस्थापन तो कारावास और कैदियों की दशा को सुधारने हेतु हुआ था, लेकिन समयांतराल (अपवाद छोड़कर) सभी भ्रष्टाचार की दरिया में गोंता लगाने लगे, बहने लगे। </strong> </p>
<p>गुप्ता साहब दर्जनों ऐसे अधिकारियों का चश्मदीद गवाह बने जिसमें कुछ ने तो कारावास के नियमों को दांत से पकड़कर रखा, कुछ नियमों को दंतहीन बना दिए। उन्हीं सब बातों में कारावास में प्रसव पीड़ा और बच्चों का जन्म भी एक थी। </p>
<p>गुप्ता जी कहते हैं कि &#8220;​स्त्रियों की पुत्र जन्म सुनिश्चित करने हेतु जानबूझ का गिरफ्तार होकर जेल पहुँचने की यह प्रवृति हमें किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं थी, क्योंकि वह पुत्रियों के विरुद्ध प्राचीन काल की पक्षपाती प्रथा को बढ़ावा देती थी। जेल में पुत्र जन्म से सम्बंधित स्त्रियों का विश्वास इतना मजबूत था कि वे अपनी गर्भावस्था के अंतिम कुछ दिनों में कुछ छोटे मोटे झगड़ों या चोरी करने के अपराध के बहाने जेल पहुँच जाती थी। उनकी पुत्र प्राप्ति की लालसा उन्हें इस अतिरिक्त उपाय को आजमाने हेतु बाध्य करती थी। हमें वहां से बाहर निकालने की चुनौती का सामना करना पड़ता था। हम उन्हें किस भांति समझने वाले थे? हमारे पास क्या वास्तव में उन्हें सच्चाई बताकर जागरूक करने के अतिरिक्त कुछ अन्य करने योग्य नहीं था। वास्तव में, वह इतना सरल नहीं था कि वहां प्रसव के बहाने जेल आने वाली स्त्रियां अधिकतर निम्न आयवर्ग परिवार वाली होती थी और बहुत काम शिक्षित होती थी। हमने उसके आंकड़ों को झुग्गी बस्तियों और जेल के निकटस्थ अन्य क्षेत्रों की दफ़ीवारों पर चिपका दिया परन्तु हमें अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुआ।&#8221;  </p>
<p><strong>गुप्ता जी कहते हैं कि &#8220;वहां एक ऐसा भी अन्धविश्वास था (होगा भी) जिसका जेल के अधिकारियों के रूप में हमने सक्रीय तौर पर सामना करने का प्रयास किया। साल 2001 में हमने पाया कि तिहाड़ में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि हो रही है। चूँकि मैं वार्षिक आंकड़े तैयार कर रहा था, जेल में उस समय काम से काम 50 ऐसी स्त्रियां थी, जो गर्भवती थी। अनेक मामलों में स्त्रियां जमानत हेतु आवेदन करती और शिशु जन्म के बाद वहां से चली जाती थी। हमारा प्रारंभिक अनुमान यह था कि बच्चे के जन्म से पहले वे स्त्रियां इसलिए गिरफ्तार होना चाहती थीं क्योंकि वे जेल के उत्तर प्रसव सुविधाओं का लाभ उठाना चाहती थी। यदि आप गरीब थीं तो आपके लिए जेल में होना एक अच्छा विकल्प था, क्योंकि उसका अर्थ यह था आपको नियमित भोजन मिलेगा और आपकी चिकित्सा आवश्यकताओं का भी पूरा ध्यान रखा जायेगा। एक और जहाँ हमारी सुविधाएँ बहुत आकर्षक नहीं थीं, वहीँ निर्धन कैदियों के लिए तिहाड़ के बाहर मुलभुत चिकित्सा सुविधाएँ भी उनकी पहुँच से कोसों दूर थीं।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_6287" aria-describedby="caption-attachment-6287" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6287" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6287" class="wp-caption-text">तस्वीर: सुश्री चेतना कपूर, डाकूमेंट्री फोटो के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>इतना ही नहीं, &#8220;जब मैंने इन स्त्रियों से साथ बात की तो मुझे दूसरी ही बात पता चली कि वे तिहाड़ में इतनी बड़ी तरह क्यों बानी रहने के इक्षुक थीं। उनमें से अनेक स्त्रियों को इस बात का विश्वास था की जेल में प्रसव कराने से पैदा होने वाला बच्चा लड़की के बजाय लड़का ही पैदा होगा। स्पष्टतया उनके इस विश्वास की जेड भगवान्भ श्रीकृष्ण के जन्म से पोषित थीं। हिंदी धर्मग्रंथों के अनुसार, देवकी को उनके पति बासुदेव के साथ भाई राजा कंस ने कारागार में दाल दिया था, क्योंकि वह जानता था कि देवकी के किसी पुत्र के हाथों उसकी मृत्यु होने वाली थी। क्रूर कंस ने देवकी के बच्चों की हत्या करने की व्यवस्था तो कर ली थी, परन्तु जब भगवान्भ विष्णु ने कृष्ण के रूप में अपना दूसरा अवतार लिया और इनके आठवें पुत्र के रूप में जन्म लिया तो वासुदेव ने स्वयं को बेड़ियों से मुक्त पाया और वह शिशु को नन्द और यशोदा के घर छोड़ने आये तथा वहां से अपने साथ एक कन्या को ले आये। इस प्रकार कृष्ण जीवित बच गए और किवदंती के अनुसार कंस का वध हुआ।&#8221;</p>
<p>गुप्ता जी कहते हैं: &#8220;कारागार के भोजन के अतिरिक्त जेल के अन्य वस्तुओं को भी शांतिदायी शक्तियों से से ओत प्रोत माना जाता है। फांसी के तख्ते में प्रयोग की गयी लड़की की अत्यधिक मांग थी, क्योंकि उसे संकट मोचक माना जाता था। कुछ लोगों का विश्वास था कि ऐसी लकड़ी के टुकड़े को बच्चे के शयनकक्ष में रखने से उसकी या उसके मन से भय दूर करने की सहायता मिलेगी और वह बिस्तर गिला करना बंद कर देगी या देगा। वह किसी बच्चे को परीक्षा के भय से भी मुक्ति कर सटी है। अनेक संत फ़क़ीर भी जेल की मिट्टी से बने ताबीज बेचते थे, क्योंकि ऐसा माना जाता था कि उसमें असाधारण शक्तियां होती थी। जब भी कभी कोई तिहाड़ की मिटटी या पानी की मांग करता था, हम उसकी मांग मान लेते थे और सिपाही उसके साथ जाकर उन वस्तुओं की व्यवस्था का देता था।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6288" aria-describedby="caption-attachment-6288" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6288" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/7-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6288" class="wp-caption-text">तस्वीर: सुश्री चेतना कपूर, डाकूमेंट्री फोटो के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>&#8220;कुछ लोगों का विश्वास है कि यदि आप बड़े दौर से गुजर रहे हैं और जीवन में दुर्भाग्य का अनुभव कर रहे हैं तो आपको उसे दूर करने के लिए केवल इतना करना है की आप जेल की रसोई में बना खाना खा लें। इसके लिए एक संभव दलील यह है की तिहाड़ का घृणित खाना खाने के बाद आपकी समस्त व्यथाएँ समाप्त हो जाएगी। लेकिन मैं यह बात गंभीरता पूर्वक कह रहा हूँ कि मेरे पास अपने दोस्तों, वकीलों और यहाँ तक कि उच्च न्यायालय के अनेक जजों के फोन आये थे, जो चाहते थे कि मैं उनके लिए तिहाड़ में बने भोजन का प्रबंध करूँ, ताकि उनका अपना जीवन अधिक सुखमय हो सके। अनेक अन्य ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने जेल की खाने की मांग इसलिए की, क्योंकि उनकी कुंडली में साफ़ लिखा था कि उन्हें किसी बिंदु पर अपने जीवन में कुछ समय जेल में गुजरना होगा। अपने इस पूर्व निर्धारित दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिए वे मुझसे पूछते थे कि क्या वे एक रात जेल में गुजार सकते थे, या जेल का खाना खा सकते थे? यह उपाय सम्भवतः लाल किताब में वर्णित है, जो कुछ लोगों के लिए बाइबल जैसे होती है।</strong> </p>
<p>बहरहाल, यह देखकर बड़ा विचित्र लगता है कि सुशिक्षित व्यक्तियों भी अपने अन्धविश्वास के समक्ष अपने तार्किक मन की बात को ठुकरा देता है। अनेक न्यायधीशों के अलावा एक बैंक के अधिकारी भी थीं जिन्हे अपने काम में कठिनाइयों का सामना करना पर रहा था। उन्होंने किसी से सलाह ली और उन्हें गुप्ता जी से मिलने को कहा गया ,वे मिलने आ गई। गुप्ता जी उन्हें तत्काल खली हाथ नहीं लौटा सके । वह महिला तीन बार आयी और वह वहां न केवल जेल का खाना खाया, बल्कि जेल के अंदर फर्नीचरों, आलमारियों की सफाई की, कमरे में झाड़ू भी लगाई थी। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;&#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/labour-pain-of-women-serving-sentences-in-indian-prisons-including-tihar-is-increasing">तिहाड़ जेल-7 ✍ तिहाड़ सहित ​भारत के कारावासों में सजा काट रही महिलाओं की &#8216;प्रसव पीड़ा&#8217; बढ़ रही है 😢 बच्चे जन्म ले रहे हैं 🙏  न्यायालय चिंतित 😢 अधिकारी मूर्छित 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>सुब्रत रॉय सहारा की मृत्यु के 15 महीने बाद तिहाड़ के पूर्व अधिकारी का &#8216;बिस्फोटक&#8217; दावा, कारावास में &#8216;एयर होस्टेस&#8217; आती थी, केजरीवाल जानते थे, लेकिन &#8230;.</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/15-months-after-subrata-roy-saharas-death-former-tihar-official-makes-explosive-claim</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Feb 2025 13:22:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[arvind kejrival]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : ईस्ट लंदन विश्वविद्यालय से बिजनेस लीडरशिप में डॉक्टरेट की उपाधि से अलंकृत​ थे सुब्रत रॉय &#8216;सहारा&#8217;।​ भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में बसे कोई 11+ लाख बेरोजगार लोगों का नियोक्ता थे सुब्रत रॉय। भारतीय क्रिकेट को दुनिया में शिखर पर ले जाने का श्रेय था उन्हें। &#8216;भारत भावना&#8217; के माध्यम से [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/15-months-after-subrata-roy-saharas-death-former-tihar-official-makes-explosive-claim">सुब्रत रॉय सहारा की मृत्यु के 15 महीने बाद तिहाड़ के पूर्व अधिकारी का &#8216;बिस्फोटक&#8217; दावा, कारावास में &#8216;एयर होस्टेस&#8217; आती थी, केजरीवाल जानते थे, लेकिन &#8230;.</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली :  ईस्ट लंदन विश्वविद्यालय से बिजनेस लीडरशिप में डॉक्टरेट की उपाधि से अलंकृत​ थे सुब्रत रॉय &#8216;सहारा&#8217;।​ भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में बसे कोई 11+ लाख बेरोजगार लोगों का नियोक्ता थे सुब्रत रॉय। भारतीय क्रिकेट को दुनिया में शिखर पर ले जाने का श्रेय था उन्हें। &#8216;भारत भावना&#8217; के माध्यम से राष्ट्र भक्ति और राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले व्यक्ति भी थे सुब्रत रॉय। अपने जीवन काल में प्रदेशों की सरकारी विभागों में कार्य करने वाले चपरासी से लेकर अधिकारी, पदाधिकारी तक, विधान सभाओं, विधान परिषदों, लोकसभा और राज्य सभा में बैठने वाले सम्मानित विधायकों और सांसदों में (अपवाद छोड़कर) बिरले ही कोई व्यक्ति थे जो सुब्रत रॉय से &#8216;उपकृत&#8217; नहीं थे। </strong></p>
<p>लेकिन​ जब समय करवट लिया और सुब्रत रॉय का &#8216;दुर्दिन&#8217; आया, तो सभी लोग कन्धा झुका दिए​, यह भी उतना ही सच है। यहाँ तक कि भय वश अपना पुत्र​ द्वय भी उन्हें मुखाग्नि नहीं दे पाया। भारत के गाँव के खेतों से देश के संसद तक​, अधिकारी से पदाधिकारी तक, नेता से अभिनेता तक, जो सहारा के चौखट पर ​&#8217;सहारा​&#8217; मांगने पहुँचते थे, जीवन के अंतिम दिन में 75-वर्षीय वृद्ध को अकेला छोड़ दिया &#8211; अंतिम सांस के लिए। ​इतना ही नहीं, कोई चोर कहा, कोई बेईमान कहा, कोई भ्रष्ट कहा, कोई वुमेनाइजर शब्द से ​भी अलंकृत किया। लेकिन ​कोई भी इस बात को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता कि सुब्रत रॉय के पास बहुत पैसे थे (चोरी, बेईमानी से ही सही) और अपने जीवन काल में उस पैसे से करोड़ों लोग लाभान्वित हुए​ जो आज भी सांस ले रहे हैं।  </p>
<p>अपनी मृत्यु से दस वर्ष पूर्व जब सहारा के मुखिया के साथ सहारा के 11 लाख कर्मचारी 52 सेकेंड्स में समाप्त होने वाले राष्ट्रगान को 74 सेकेंड्स तक गाते रहे कीर्तिमान स्थापित करने के लिए​, उस दिन यह स्पष्ट हो गया था कि उनकी नज़रों में राष्ट्रगान का क्या मोल है? साल 2013 में सहारा के मुखिया की अगुआई में &#8216;भारत भावना दिवस&#8217; मनाया गया था। उस समय सहारा के मुखिया मंच से कहे कि यह एक विश्व रिकॉर्ड होगा। उनके अनुसार मैदान में उपस्थित कर्मचारी ​के साथ-साथ सहारा के दफ्तरों में उपस्थित ​सभी कर्मचारी एक साथ राष्ट्रगान गाकर विश्व कीर्तिमान स्थापित करेंगे। ​</p>
<p><strong>सुब्रत रॉय की मृत्यु के कोई पंद्रह महीने बाद एक तिहाड़ जेल के पूर्व जनसम्पर्क अधिकारी सुनील कुमार गुप्ता एक समाचार एजेंसी से बात करते हुए एक विस्फोटक दावा किया है कि सहारा एयरलाइंस की एयर होस्टेस जेल में सुब्रत रॉय के पास आती थीं और घंटों उनके साथ रहती थीं। साथ​ ही, कारावास के अंदर वे जो भी करते थे, उसकी जानकारी तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के साथ-साथ कई लोगों को थी, लेकिन वह कुछ नहीं किये। विगत दिनों नेटफ्लिक्स पर &#8216;ब्लैक वारंट&#8217; श्रृंखला के असली हीरो ​सुनील कुमार गुप्ता की तिहाड़ जेल की यात्रा 1981 में शुरू हुई जब उन्होंने खाकी वर्दी पहनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए भारतीय रेलवे की एक स्थिर नौकरी छोड़ दी। उनकी मामूली पृष्ठभूमि और शारीरिक रूप से मजबूत न होने के कारण, जैसा कि श्रृंखला में दिखाया गया है, उन्हें भारत की सबसे कुख्यात जेल में जेलर बनने से नहीं रोका, हालांकि उस समय जेल अधिकारियों के लिए उनके गुणों पर पारंपरिक रूप से जोर नहीं दिया जाता था।</strong></p>
<figure id="attachment_6205" aria-describedby="caption-attachment-6205" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/sunil.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/sunil.jpg" alt="" width="1280" height="720" class="size-full wp-image-6205" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/sunil.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/sunil-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/sunil-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/sunil-768x432.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6205" class="wp-caption-text">​सुनील कुमार गुप्ता (दाहिने) और नेटफ्लिक्स का हीरो बाएं</figcaption></figure>
<p>​उन्होंने मंच से वहां उपस्थित कर्मचारियों​ को &#8216;भावनात्मक भाषण&#8217; भी ​दिया। इस भारत भावना दिवस का प्रचार-प्रसार संवाद के विभिन्न माध्यमों में किया गया। उसी वर्ष बीबीसी विश्व सेवा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक सर्वेक्षण किया था। उस सर्वेक्षण में उस समय तक के सबसे ​प्रसिद्द दस गीतों का चयन करने के लिये विश्व के तक़रीबन 7000 गीतों को चुना गया था। इस सर्वेक्षण में विश्व के देशों के लोगों ने मतदान किया था। उस मतदान के बाद जो दस गीत चयनित हुए थे, दूसरे स्थान पर भारत का &#8216;राष्ट्रगीत&#8217; था। </p>
<blockquote><p>सहारा द्वारा आयोजित उस &#8216;भारत भावना दिवस&#8217; में लोगों ने बहुत उत्साह के साथ राष्ट्रगान गाये थे। लेकिन गाते समय राष्ट्रगान गाने के लिए जो अनुशासित समय सीमा निर्धारित है, उसे नजरअंदाज करते निकलते गए। जिस राष्ट्रगान को गाने के लिए समय सीमा 52 सेकेंड्स है, सहारा के सम्मानित मुखिया के साथ-साथ सहारा के लोग, कर्मचारी 74 सेकेंड्स पहुँच गए। वह तो अन्तिम शब्द &#8216;जय हे !!&#8221; हो गया, अन्यथा वे रुकने का नाम नहीं लेते। उस राष्ट्रगान से विश्व कीर्तिमान स्थापित कर पाया सहारा अथवा नहीं, यह तो कीर्तिमान की गणना करने वाले सम्मानित लोग ही बताएंगे, न तो &#8216;सेबी&#8217; डरा, न भारत सरकार के वित्तीय अन्वेषण विभाग, न अधिकारी, न न्यायालय।</p></blockquote>
<p>​<br />
<strong>मृत्योपरांत जो सुब्रत रॉय जीवन पर्यन्त दूसरों को, संस्था में कार्य करने वाले लोगों को, छोटे-बड़े सभी को &#8216;संस्कार&#8217;, चाहे पारिवारिक हो या सामाजिक, का पाठ पढ़ाये, ज्ञान बाँटें, लेकिन अपने दो-दो पुत्रों के होते हुए भी मरणोपरांत उनके पार्थिव शरीर को पुत्रों के हाथों मुखाग्नि नसीब नहीं हुआ। संस्कार देने-लेने में कहाँ चूक हुई ? मुंबई के एक निजी अस्पताल में लंबे समय से उनका इलाज चल रहा था। उस समय कंपनी के एक बयान में कहा गया है कि उनकी मृत्यु कार्डियोरेस्पिरेटरी अरेस्ट के कारण हुई। वे उच्च रक्तचाप और मधुमेह रोग से लंबे समय से जूझ रहे थे। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें रविवार को मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती कराया गया था।</strong></p>
<p>​उसी दौर में, कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया &#8216;सेबी&#8217; के अकाउंट में पड़ी 25163 करोड़ रुपये। &#8216;सेबी&#8217; ​कहा कि उनकी मृत्यु से जारी मुकदमों/अन्वेषण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सहारा की स्थापना 1978 में हुयी। यह कहा जाता है कि आज सहारा इंडिया की कुल शुद्ध संपति 2,59,900 करोड़ से भी अधिक है। कोई आठ वर्ष पहले 2015 में फोर्ब्स ने लिखा था &#8216;सुब्रत राय की नेटवर्थ करीब 10 अरब डॉलर&#8217; है। एक समय टाइम पत्रिका ने भारतीय रेलवे के बाद भारत में दूसरे सबसे बड़े नियोक्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया था ​सहारा इंडिया को जिसमें बताया गया था कि लगभग 1.2 मिलियन लोग सहारा परिवार के साथ जुड़े हैं। सहारा समूह के पास 9 करोड़ से अधिक निवेशक हैं। </p>
<p>वैसे सुब्रत रॉय का जीवन कई उपलब्धियों के साथ साथ विवादों से भी भरा रहा। लोगों ने सहारा कंपनी की कई स्कीमों में अपना पैसा लगाया था, लेकिन लोगों के पैसों का भुगतान नहीं किया और मामला पटना हाईकोर्ट में चला गया। सहारा इंडिया के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में मामला चल रहा था, लेकिन जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सहारा प्रमुख को इस मामले में कोर्ट से राहत मिल गई। वे जमानत पर थे। सुब्रत रॉय को कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त भी मिले थे । उन्हें ईस्ट लंदन विश्वविद्यालय से बिजनेस लीडरशिप में डॉक्टरेट की उपाधि से भी अलंकृत किये गए थे।​ </p>
<p><strong>​बहरहाल, उनकी मृत्यु वर्ष में ही केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह केन्द्रीय पंजीयक – सहारा रिफंड पोर्टल का शुभारंभ किया। इस पोर्टल को सहारा समूह की 4 सहकारी समितियों – सहारा क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, सहारायन यूनिवर्सल मल्टीपर्पज सोसाइटी लिमिटेड, हमारा इंडिया क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड और स्टार्स मल्टीपर्पज कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड के प्रामाणिक जमाकर्ताओं द्वारा दावे प्रस्तुत करने के लिए विकसित किया गया। अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि इस कार्यक्रम का महत्व इस दृष्टि से है कि जिन लोगों की गाढ़ी कमाई इन 4 सहकारी समितियों में फंसी है, उनके प्रति किसी का ध्यान नहीं गया। ऐसे मामलों में अक्सर मल्टी-ऐजेंसी सीज़र हो जाता है क्योंकि कोई ऐजेंसी निवेशक के बारे में नहीं सोचती। </strong></p>
<p>​शाह ने यह भी कहा कि इसके कारण कोऑपरेटिव सोसाटीज़ के प्रति बहुत बड़ी असुरक्षा और अविश्वास की भावना पैदा हो जाती है। कई बार घपले-घोटाले के आरोप लगते हैं और जो लोग इनमें निवेश करते हैं, उनकी पूंजी फंस जाती है, जैसे सहारा का उदाहरण सबके सामने है। कई सालों तक सुप्रीम कोर्ट में केस चला, ऐजेंसियों ने इनकी संपत्तियां और खाते सील कर दिए, और, ऐसा होने पर कोऑपरेटिव सोसायटीज़ की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है।​ शाह के अनुसार, पारदर्शी तरीके से निवेशकों को 5,000 करोड़ रूपए की राशि लौटाने की शुरूआत हो रही ​है। शाह ने कहा कि लगभग 1.78 करोड़ ऐसे छोटे निवेशकों, जिनका 30000 रूपए तक का पैसा फंसा है, को अपना पैसा वापस मिलेगा, ये एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।</p>
<p>​ज्ञातव्य हो कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने 29 मार्च, 2023 के अपने आदेश में निर्देश दिया था कि सहारा समूह की सहकारी समितियों के प्रामाणिक जमाकर्ताओं के वैध बकाए के भुगतान के लिए “सहारा-सेबी रिफंड खाते” से 5000 करोड़ रुपये सहकारी समितियों के केन्द्रीय रजिस्ट्रार (सीआरसीएस) को हस्तांतरित किए जाएं। भुगतान की पूरी प्रक्रिया की निगरानी और इसका पर्यवेक्षण माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार माननीय सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं जिसमें उनकी सहायता के लिए वकील श्री गौरव अग्रवाल (Amicus Curiae) को नियुक्त किया गया है। इन चारों समितियों से संबंधित रिफंड प्रक्रिया में सहायता के लिए 4 वरिष्ठ अधिकारियों को ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (Officers on Special Duty) के रूप में नियुक्त किया गया है।</p>
<blockquote><p>​बहरहाल, सुब्रत रॉय की मृत्यु के कोई पंद्रह महीने बाद एक तिहाड़ जेल के पूर्व जनसम्पर्क अधिकारी सुनील कुमार गुप्ता एक समाचार एजेंसी से बात करते हुए एक विस्फोटक दावा किया है कि सहारा एयरलाइंस की एयर होस्टेस जेल में सुब्रत रॉय के पास आती थीं और घंटों उनके साथ रहती थीं। यह सहारा समूह के दिवंगत संस्थापक को जेल में रहने के दौरान दी जाने वाली कई सुविधाओं में से एक थी। एएनआई को दिए गए एक साक्षात्कार में गुप्ता ने दावा किया कि दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को इन सबकी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। </p></blockquote>
<p>सुब्रत रॉय के साथ अपने अनुभव को याद करते हुए गुप्ता ने कहा कि जब रॉय जेल में थे, तो उन्हें पहले एक नियमित जेल में रखा गया था। लेकिन उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा की आवश्यकता थी ताकि वे अपने होटलों के खरीदारों से बातचीत कर सकें और उसके बाद वे उधार दाताओं को पैसे वापस कर सकें। गुप्ता ने कहा, &#8220;सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में कहा गया था कि सब कुछ कानूनी तरीके से किया जाना चाहिए। लेकिन मैंने देखा कि बहुत सी अवैध चीजें हो रही थीं&#8230;इससे पहले, दिल्ली हाई कोर्ट ने मुझे बुलाया था और उसने कहा था कि जेल में रिश्वतखोरी और जबरन वसूली की कई शिकायतें हैं।&#8221; </p>
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<p><strong>गुप्ता के अनुसार, &#8220;उन्होंने डीजी जेल की अध्यक्षता वाली बैठकों में इस मुद्दे को उठाया था, लेकिन डीजी को लगा कि गुप्ता उनके खिलाफ शिकायत कर रहे हैं। फिर गुप्ता ने केजरीवाल से संपर्क किया और उन्हें उन सुविधाओं के बारे में बताया जो उन्हें लगता था कि उन्हें अवैध रूप से दी जा रही हैं।&#8221; पूर्व जेल अधिकारी ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर वीवीआईपी को बचाने का आरोप भी लगाया। गुप्ता के अनुसार, सहारा प्रमुख की सेल में शराब की बोतलें भी मिली थीं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने इस बारे में तत्कालीन सीएम अरविंद केजरीवाल से शिकायत की थी। लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।</strong></p>
<p>सुब्रत रॉय को तिहाड़ जेल में दी गई सुविधाओं का खुलासा करते हुए सुनील गुप्ता ने कहा, &#8220;सुब्रत रॉय को जेल में नहीं रखा गया, उन्हें कोर्ट परिसर में रखा गया था। उन्हें अपने निवेशकों का काफी पैसा लौटाना था। सुब्रत रॉय ने कोर्ट से कहा था कि उन्हें अपनी संपत्तियां बेचनी होंगी और उनके ज्यादातर खरीदार यूरोप या पश्चिमी देशों में हैं। सुब्रत रॉय ने कोर्ट से कहा था कि उन्हें ऐसी जगह रखा जाए जहां मैं अपने खरीदारों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात कर सकूं।&#8221;</p>
<p>उन्होंने कहा कि सुब्रत रॉय को रात में परिसर में बंद कर दिया जाता ​था। जबकि अन्य कैदियों को रात होते ही अपने सेल में बंद कर दिया जाता ​है। सुब्रत रॉय ने कहा था कि उन्हें रात में कोर्ट परिसर में बाहर से बंद रखा ​जाए। कोर्ट ने उनकी मांग मान ​ली थी। इसलिए सुब्रत रॉय को बंद नहीं किया ​गया। उन्हें खाने-पीने की पूरी सुविधा दी ​गई। कोर्ट ने सुब्रत रॉय को एक निजी सचिव रखने की भी अनुमति दी ​थी। सुब्रत रॉय ने एक महिला सचिव को अपना सचिव बना रखा ​था। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने सुब्रत रॉय को सचिवालय की सुविधाओं का लाभ उठाने की अनुमति दी ​थी। लेकिन अब वे एयर होस्टेस बुला रहे ​थे। </p>
<p><strong>सुनील गुप्ता ने कहा कि यह करीब छह महीने तक चलता रहा, लड़कियां आती ​रहीं। गुप्ता ने कहा, &#8220;मैं परेशान था और केजरीवाल के पास गया। मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। रॉय के खिलाफ कुछ नहीं किया गया और वे सुविधाओं का आनंद लेते रहे। उन्होंने कहा कि उन पर हमले भी हुए। गुप्ता ने कहा, &#8220;जब मैं सेवानिवृत्त हो रहा था, तो मुझे अनियमितताओं के संबंध में 15 पन्नों की चार्जशीट दी गई। चार-पांच साल बाद मुझे दोषमुक्त कर दिया गया, लेकिन मैं उन पांच सालों में बहुत परेशान रहा।&#8221; </strong></p>
<p>उसी हफ्ते मेरे खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी गई। भारत में ऐसा होता है। यह चार्जशीट वित्तीय अनियमितताओं के लिए थी।&#8221; सुब्रत रॉय सहारा मार्च 2014 से मई 2016 तक तिहाड़ जेल में रहे। निवेशकों के करीब 24,000 करोड़ रुपये न लौटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार किया गया था। &#8220;अरविंद केजरीवाल ने मुझसे पूछा कि क्या मैं इसका वीडियो शूट कर सकता हूं। मैंने उनसे कहा कि यह मेरे लिए सही नहीं होगा और वह यहां आकर खुद इसकी जांच कर सकते हैं। फिर उन्होंने कहा कि डीजी जेल एक आईपीएस अधिकारी हैं जो केंद्र सरकार के अधीन आते हैं और हमें नहीं पता कि हम उनके बारे में कुछ कर सकते हैं या नहीं​।​&#8221;</p>
<p>पूर्व पीआरओ ने दावा किया कि केजरीवाल ने शुरू में छापे में अवैध गतिविधियों का पता चलने पर कार्रवाई करने पर सहमति जताई थी, लेकिन बाद में पीछे हट गए। उन्होंने आरोप लगाया, &#8220;दो दिन बाद, डीजी ने मुझसे कहा कि मेरे (तत्कालीन सीएम) से संपर्क करना अच्छा नहीं था, और मैंने एक &#8216;गरीब आदमी&#8217; को फंसाया&#8230; लेकिन इस बारे में कुछ नहीं किया गया।&#8221; उन्होंने आगे दावा किया कि जेल मंत्री ने जेल अधिकारियों को भविष्य में गलत व्यवहार के खिलाफ चेतावनी दी, &#8220;आखिरकार, कुछ भी ठोस नहीं किया गया। उन्होंने (सुब्रत रॉय सहारा) सुविधाओं का आनंद लेना जारी रखा। जेल प्रशासन उनके सामने झुक गया।&#8221; तिहाड़ जेल के पूर्व अधिकारी ने यह भी आरोप लगाया कि इन चिंताओं को उठाने के लिए उन्हें परेशान किया गया। उन्होंने कहा कि उन्होंने तत्कालीन उपराज्यपाल से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें अपने सचिव के पास जाने का निर्देश दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/15-months-after-subrata-roy-saharas-death-former-tihar-official-makes-explosive-claim">सुब्रत रॉय सहारा की मृत्यु के 15 महीने बाद तिहाड़ के पूर्व अधिकारी का &#8216;बिस्फोटक&#8217; दावा, कारावास में &#8216;एयर होस्टेस&#8217; आती थी, केजरीवाल जानते थे, लेकिन &#8230;.</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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